IFFCO MD, U S Awasthi honoured with “Fertilizer Man of India” by Sahakar Bharati

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New Delhi : World’s biggest processed fertiliser cooperative IFFCO’s Managing Director, Dr U S Awasthi is honoured by the tittle “Fertiliser Man of India” by Sahkar Bharati. The Honour was presented Shri Dattatreya Hosabale, Sar Karyavah (General Secretary), Rashtriya Swayamsevak Sangh, Dr Uday Joshi, National General Secretary, Sahakar Bharati and Shri Gulab Chand Kataria, Governor of Punjab & Administrator Chandigarh during 8th National Convention of Sahakar Bharati at Amritsar, Punjab.

Sahakar Bharati is an organisation working to strengthen the cooperatives & cooperative movement across country since 1978. The Title bestowed to Dr Awasthi for his lifetime remarkable contributions in the field of fertilisers & agriculture. His innovative thought of Nano Fertilisers is a game changer for the nation as well as global fertiliser and agriculture sector. The invention and indigenous production of Nano Urea, nano DAP & now Nano NPK will be changing the future agriculture as they will be reducing pollution and enhance the growth & quality. He initiated Save The Soil Campaign to enhance the soil nutrition across the country by adoption green manure & organic content in the soil, farmer education by CORDET. He was presented the honour with a Tamra Patra (Bronze Plaque) along with a citation mentioning his contribution to the industry. Recently Dr Awasthis is bestowed with Rochdale Pioneers Award for his work and contribution in Cooperative Movement in India by putting IFFCO on the global map and taking the vision of Sahakar Se Samriddhi at global level.

Dr. Awasthi said that I am extremely happy that the cooperative fraternity has acknowledged the work done for the farmers and cooperators. I thank Sahakar Bharati for this prestigious honour and tittle for my grassroot work for the growth and development of cooperatives and fertilisers. He further said that in India, we had to become truly AatmaNirbhar in Fertilisers and bring Make in India by reducing the dependency on imports of raw materials of fertilisers by adopting new innovative Nano Technology based fertilisers. This will save forex as well as reduce the intake of rock phosphate, potash, and natural gas.

Dr. Awasthi urged Sahakar Bharati team to actively promote cooperation among cooperatives by supporting small cooperatives in the remotest villages and strengthen them for sustainable business model. He also urged that Sahakar Bharati should come forward and explain the benefits of Nano Fertilizers to farmers across the country emphasizing it’s potential to make India self-reliant in agriculture.

मुस्लिम तुष्टिकरण का नया पर्यटन केंद्र बना संभल

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उत्तर प्रदेश का संभल जिला आजकल चर्चा में है। यहाँ की शाही जामा मस्जिद के पूर्व में प्रसिद्ध हरिहर मंदिर होने के प्रमाण हैं जिसके कारण यह पुरातात्विक महत्व का स्थल है। हिंदू पक्षकार ने इस स्थल को भगवान श्री हरिहर का मंदिर मानते हुए प्रमाणों के साथ स्थानीय अदालत में इसके सर्वेक्षण की याचिका याचिका लगाई थी जिसे स्वीकार करते हुए स्थानीय न्यायलय ने सर्वे कराने का आदेश जारी किया था। प्रथम चरण का सर्वे हो जाने के बाद कोर्ट कमिश्नर ने न्यायालय से दोबारा सर्वे कराने की अनुमति मांगी थी और वह सहमति भी न्यायलय ने दी किंतु सर्वे टीम के वहां पहुँचने पर अराजक तत्वों की उग्र भीड़ ने उस पर हमला कर दिया। इस हमले के साथ बाद भड़की हिंसा में 5 लोगों की मौत हो गई तथा कई लोग घायल हुए। उपद्रवियों ने पुलिस बलों पर भीषण पत्थरबाजी तथा आगजनी की जिसके बाद संभल शहर में तनाव व्याप्त हो गया।

संभल की प्रथम दृष्टया पूर्व नियोजित लगने वाली हिंसा के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्परता दिखाते हुए घटना की जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन कर दिया है जो अपना कार्य कर रहा है। अब तक सामने आई जानकारी के अनुसार संभल हिंसा एक गहरी व सुनियोजित साजिश थी । घटना स्थल से पाकिस्तान व अमेरिका में बने हथियार मिलने से यह बात और भी पुख्ता हो रही।

संभल की घटना पर योगी प्रशासन कड़े तेवरअपना रहा हे और उसने राजनीतिक दलों के नेताओं के संभल पर्यटन पर 10 दिसंबर 2024 तक रोक लगा रखी है किंतु सपा और कांग्रेस सहित इंडी गठबंधन के सभी नेता संविधान की किताब को हाथ में लेकर “संभल- संभल“ का हल्ला बोल रहे हैं और संभल जाने की रट लगा रहे हैं। संभल प्रशासन का स्पष्ट रूप से कहना है कि अभी जांच चल रही है और नेताओं के दौरे से हालात बिगड़ सकते हैं फिर भी समाजवादी और कांग्रेसी नेताअपने मुस्लिम वोटबैंक का तुष्टिकरण करने के लिए संभल जाना चाहते हैं।

सपा मुखिया अखिलेश यादव ने संभल हिंसा के लिए पुलिस प्रशासन को दोषी बताते हुए पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करवाने की मांग की है तथा मारे गए मुस्लिम युवकों के परिवारों को पार्टी फण्ड से पांच पांच लाख रुपए देने की बात भी कही है । लोकसभा में अखिलेश यादव ने पत्थरबाजों को मासूम युवक तक बता डाला और वह भी तब जबकि जांच चल रही है।

लगभग 76 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले शहर संभल में मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए सपा मुखिया अखिलेश यादव को आगे निकलते देखकर भला कांग्रेस कैसे शांत रह सकती थी उसे भी लगा कि मुस्लिम वोटबैंक की बहती गंगा में हाथ धोने का उपयुक्त समय यही है। कांग्रेस ने संसद में संभल मुददे पर सदन में सपा का साथ नहीं दिया किंतु मुद्दे को भुनाने के लिए राहुल गांधी व बहिन प्रियंका गांधी वाड्रा संविधान की किताब को हाथ में लहराते हुए संभल चल पड़े, प्रशासन के रोकने पर भी वह अपनी जिद पर अड़े रहे। उन्होंने मीडिया को बताया कि वह प्रशासन से संभल अकेले और पुलिसबल के साथ जाना चाह रहे थे किंतु प्रशासन ने उन्हें अनुमति नहीं दी।

राहुल गांधी आखिकर संभल क्यों जाना चाहते थे क्या वह उन पत्थरबाजों का समर्थन करने के लिए संभल जाना चाह रहे थे जिन्होंने सुनियोजित तरीके से पुलिसबल पर पत्थरबाजी की थी, या वह उन उपद्रवियों का पक्ष लेने जा रह थे जिन्होंने आगजनी की थी, या फिर ये लोग मुस्लिम लीग का कर्ज उतारने के लिए संभल जाना चाहते थे क्योंकि ये दोनों ही भाई बहिन केरल के वायनाड से मुस्लिम लीग के समर्थन के बल पर ही जीतकर आए हैं। कांग्रेस पार्टी मुस्लिम तुष्टिकरण का कोई अवसर अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती है। जब प्रशासन ने गांधी परिवार को संभल जाने से रोक दिया तब राहुल गांधी ने कहा कि वह नेता प्रतिपक्ष हैं अतः उनका संभल जाना संवैधानिक अधिकार है। मुस्लिम तुष्टिकरण गाँधी परिवार की परंपरा है जो नेहरु के समय से चली आ रही है।

संभल पर्यटन करने के लिए अड़े गाँधी वाड्रा परिवार ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रही हिंसा की बहुत ही मामूली ढंग से निंदा करके इतिश्री कर ली क्योंकि वह उनके वोट बैंक नही हैं। यह वही प्रियंका हैं जिन्होंने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए इजराइल को एक बर्बर देश तक बता डाला था और गाजा के समर्थन में बड़े – बड़े पोस्ट करके मुसलमानों को रिझाया था । ये लोग बहाइच में निर्दोष युवक रामगोपाल मिश्रा की हत्या के समय मुंह में दही जमा कर बैठे थे और संभल के मृतक पत्थरबाजों और उपद्रवियों को पैसे बाँट रहे हैं तथा सरकार से हर उपद्रवी को एक करोड़ देने की मांग कर रहे हैं।

अच्छी बात है कि योगी सरकार बिना विपक्ष के दबाव में आए पूरी तत्परता और निष्पक्षता से काम कर रही है । प्राथमिक जांच तथा प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर इस घटना में सपा सांसद जियाउर्ररहमान बर्क को पहला आरोपी बनाया है । इसी बीच उन पर एक और मामला भी खुल गया है जिसमें उनकी कार से रोहन नामक युवक की सड़क हादसे में मौत हो गई थी, कार खुद बर्क ही चला रहे थे और साथ में उनकी पत्नी भी बैठी हुई थीं ।
भारतीय जनता पार्टी ने कहा है कि राहुल गांधी अगर नेता प्रतिपक्ष हैं तो उन्हें निष्पक्ष राजनीति करनी चाहिए किंतु वह फिलहाल ऐसा करते हुए नहीं दिख रहे। तमिलनाडु के जहरीली शराब कांड में कई निर्दोष मौतें हो गई थीं तब राहुल ने उनके प्रति संवेदना का एक शब्द तक न ही लिखा और न ही बोला, इसी तरह तमिलनाडु में ही बसपा के प्रदेश अध्यक्ष की हत्या पर भी ये मौन साध गए। हिंदू पर्वों पर मुसलमानों द्वारा किये जा रहे एक के बाद एक हमलों में राहुल पत्थरबाजों व उपद्रवियों के साथ ही खड़े दिखाई दे रहे थे। और तो और वायनाड में भूस्खलन में सैकड़ों लोगों की जान जाने के कई दिनो बाद राहुल वहां पर पहुंच सके थे और सहायता के लिए केंद्र सरकार का मुंह ताक रहे थे।

गांधी परिवार का मुस्लिम वोटबैंक के प्रति प्रेम इतना गहरा है कि बंगाल में संदेशखाली की जिन महिलाओं के साथ पूरा भारत खड़ा था उन महिलाओं के प्रति भी राहुल प्रियंका ने कोई संवेदना नहीं दिखाई।आज जो कांग्रेसी नेता संभल- संभल चिल्ला रहे हैं वह बाबा सिद्दीकी और अतीक अहमद जैसे माफिया की मौत पर खूब आंसू बहाते हैं किंतु पालघर में संतो की हत्या पर वह कुछ नही बोलते हैं। कांग्रेस व इंडी गठबंधन के सभी नेताओं का यही मुस्लिम प्रेम उनका एकतरफा संविधान है।

शायद संभल संभल करके गांधी परिवार अपना वो पाप छिपाना चाहता जो 1975 में केंद्र व प्रदेश दोनों जगह उसकी सरकारें थीं तब हुआ था । उस समय संभल में हुए एक बड़े दंगे में 25 हिंदुओं को जिंदा जलाकर मार डाला गया था। इस वीभत्स घटना को मुस्लिम तुष्टिकरण की विकृत राजनीति में डूबे लोग भले ही भूल गये हों किंतु मृत आत्मायें वह नहीं भूली है। संभल जाने से पहले गांधी परिवार को अपना यह पाप तो अवश्य ही याद कर लेना चाहिए। यह दंगा राहुल प्रियंका की जीत की कुंजी मुस्लिम लीग की ओर से फैलाई गई दो अफवाहों की वजह से ही हुआ था।

फिर प्रदेश में मुलायम सिह यादव का दौर आया और वर्तमान सांसद जियाउर्ररहमान बर्क के पिता शफीकुर्रहमान संभल के सांसद बने। उनके दौर में ही प्रभाव का इस्तेमाल करके संभल के हरिहर मंदिर को पूरी तरह शाही जामा मस्जिद का रूप देने का खेल खुल कर खेला गया । वर्ष 2012 तक हिन्दू , मंदिर के परिसर में स्थित एक कुएं पर पूजा करने के लिए जाते थे किंतु एक दिन सांसद जियाउर्ररहमान के कहने पर सपा नेता अखिलेश यादव ने वहां पर पूजा पूरी तरह से बंद करवा दी ओैर बर्क के गुंडो ने वहां से हिंदुओं को भगा दिया। इस बीच शहर की डेमोग्राफी में भी बड़ा परिवर्तन हुआ ।
विरोधी जिस प्रकार छटपटा रहे हैं उससे स्पष्ट है कि हरिहर मंदिर अधक दिनों तक छुपा के नहीं रखा जा सकता हिन्दू पक्ष का दावा नैतिक व ऐतिहासिक तथ्यों के सुदृढ़ आधार पर खड़ा है।

इतिहासकार वैद्य गुरुदत्त : स्वत्व जागरण और राष्ट्रसेवा में जीवन समर्पित

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भारत को स्वतंत्र हुये सत्तहत्तर वर्ष हो गये हैं पर अभी भी ऐसी जन भावना मुखर नहीं हो सकी जो उन राष्ट्रसेवियों का खुलकर सम्मान करे जिन्होने राज्याश्रय की बिना परवाह किये परतंत्रता के अंधकार के बीच निर्भीकता से लेखन किया और स्वत्व जागरण के लिये जीवन समर्पित कर दिया । वैद्य गुरुदत्त ऐसे ही निर्भीक और राष्ट्रीय अस्मिता के लिये समर्पित लेखक और इतिहासकार थे । जिनका पूरा जीवन सत्य को समर्पित रहा ।

समाजिक जागरण केलिये ऐसा कोई विषय नहीं जिसपर गुरुदत्त जी लेखनी न चली हो । इतिहास, राजनीति और साहित्य की जितनी रचनाएँ गुरुदत्त जी ने समाज को दीं उनको देखकर आश्चर्य होता है कि कोई एक व्यक्ति कैसे इतना व्यापक चिंतनशील हो सकता है । यदि अन्य रचनाओं और आलेख को छोड़कर केवल उपन्यास की बात करें तो उन्होंने अपने जीवन में दो सौ से अधिक उपन्यासों की रचना की । ऐसे विलक्षण विचारक और रचनाकार वैद्य गुरुदत्त का जन्म 8 दिसम्बर 1894 लाहौर के एक अरोड़ी क्षत्रिय परिवार में हुआ । पिता कर्मचन्दजी अपने क्षेत्र के सुप्रसिद्ध वैद्य थे । परिवार में आयुर्वेद चिकित्सा का कार्य पीढ़ियों से होता था। इसलिये गुरुदत्त जी ने अपनी शिक्षा के साथ वैद्यक चिकित्सा का ज्ञान सहज हो गया और आगे चलकर उन्होंने आजीविका के लिये यही मार्ग अपनाया । पिता आर्यसमाज से जुड़े थे । माता सुहावी देवी वैष्णवी आस्थाओं के प्रति समर्पित एक विदुषी महिला थीं। इसलिये बहुआयामी आस्था, वैचारिक समन्वय, चिंतन और अध्ययनशीलता गुरुदत्त जी को अपने परिवार के संस्कारों में मिली ।

उनकी पढ़ाई लाहौर में हुई । 1915 में उन्होंने रसायन शास्त्र में एम.एस.सी. किया और नेशनल कालेज में शिक्षक की नौकरी कर ली । दिसम्बर 1917 में गुरुदत्त जी विवाह यशोदादेवी से हुआ । समय के साथ वे पाँच सन्तानों के पिता बने । गुरुदत्त जी ने 1919 में रसायनशास्त्र में शोधकार्य प्रारम्भ किया । पर वह पूरा न हो सका । 1920 में स्वतंत्रता संग्राम तेज हुआ असहयोग आँदोलन का आव्हान हुआ । गुरुदत्तजी भी आँदोलन से जुड़ गये । किसी वे प्रकार गिरफ्तारी से तो बचे पर नौकरी न बचा सके । आँदोलन के दौरान उनका संपर्क लाला लाजपत राय जी से बढ़ा और लाला जी द्वारा आरंभ व्यवसायिक प्रतिष्ठान से गुरुदत्त जी भी जुड़ गए। 1927 में लाहौर छोड़कर उत्तर प्रदेश में अमेठी आ गए। गुरुदत्त जी यहाँ राजपरिवार के उपचार के लिये आये थे लेकिन कुंवर रणंजयसिंह के निजी सचिव के रूप में यहीं कार्य करने लगे । उन्हें यहाँ इतिहास पढ़ने और रजवाड़ों के जीवन का व्यवहारिक अध्ययन करने का अवसर मिला और उनके लेखन में यह विधा भी जुड़ गई। वे अमेठी में दिसम्बर 1931 तक रहे । फिर नौकरी छोड़कर लखनऊ आ गये । लखनऊ आकर आयुर्वेद चिकित्सा औषधालय आरंभ किया । किन्तु यह औषधालय न चल सका और नवम्बर 1932 में लाहौर लौट आए । लाहौर आकर नया औषधालय खोला । परिवार की पृष्ठभूमि के चलते यहाँ औषधालय अच्छा चलने लगा । फिर भी 1937 में दिल्ली आ गये । दिल्ली में वैद्य आनंद स्वामी का मार्गदर्शन लेकर चिकित्सीय कार्य आरंभ किया । वैद्य आनंद स्वामी मूलतः लाहौर के ही रहने वाले थे, आर्यसमाज से जुड़े थे और लाहौर हिन्दू महासभा के मंत्री भी रहे थे। दिल्ली में स्वामीजी का चिकित्सालय बहुत प्रतिष्ठित था । वे अपना यह औषधालय गुरुदत्त को सौंपकर गाजियाबाद चले गये । गुरुदत्त जी ने इस औषधालय को और उन्नत किया । उन्होने अनेक असाध्य रोगी ठीक किये इससे उनकी ख्याति बढ़ी आर्थिक संपन्नता भी। समय के साथ बड़ा बेटा सत्यपाल भी वैद्य बने और सहयोगी के रूप में चिकित्सकीय कार्य संभालने लगे । इससे गुरुदत्त जी को लेखन में अधिक समय मिलने लगा । दिसम्बर 1965 में पत्नि यशोदा देवी का निधन हो गया।पत्नि के निधन का उनपर गहरा प्रभाव पड़ा । यशोदा देवी पूरी गृहस्थी तो संभालती ही थीं साथ ही उनके लेखकीय कार्य में भी सहयोगी रही । विषय का चयन, सामग्री जुटाने और अशुद्धि सुधारने में भी उनका सहयोग रहता था । इसके बाद उनका चिकित्सालय जाना बहुत कम हो गया था लेकिन लेखन कार्य यथावत रहा ।

साहित्य साधना से सामाजिक जागरण

उनका रचना संसार असीम है । उपन्यास, संस्मरण, जीवनचरित, इतिहास, धर्म, संस्कृति, विज्ञान, राजनीति और समाजिक ऐसा कोई विषय नहीं जिसपर उनका लेखन न किया हो । उनका लेखन असाधारण है । एक प्रकार की शोध रचनाएँ हैं। ‘धर्म, संस्कृति और ‘वेदमंत्रों के देवता’ लिखकर उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशेषता का सरल भाषा में विवेचन किया। उन्होंने भगवद्गीता, उपनिषदों और दर्शन-ग्रंथों पर भी भाष्य लिखा। ‘भारतवर्ष का संक्षिप्त इतिहास’ और ‘इतिहास में भारतीय परम्पराएं’ नामक पुस्तकों में उनकी प्रखर प्रतिभा स्पष्ट है । वैद्य गुरुदत्त उन विरले साहित्य शोध कर्ताओं में हैं जिन्होंने कतिपय इतिहासकारों द्वारा भारतीय इतिहास लेखन की विसंगतियों पर तीखे प्रहार किये । “देश की हत्या” एवं “विश्वासघात” जैसी पुस्तकों में गाँधी जी और पंडित जवाहरलाल नेहरू के राजनैतिक निर्णयों पर तीखी आलोचना की । ‘विज्ञान और विज्ञान’ तथा ‘सृष्टि-रचना’-जैसी पुस्तकों में भारतीय दर्शन का वैज्ञानिक दृष्टिकोण स्पष्ट किया । ‘धर्म तथा समाजवाद’ पुस्तक में सामाज जीवन के सामाजिक पक्ष का आदर्श स्पष्ट विवेचन किया । तो “मैं हिन्दू हूँ” और ‘स्व अस्तित्व की रक्षा’, पुस्तकों में मानव के प्राकृतिक स्वरूप को स्पष्ट करते हुये “कम्यूनिज्म” को एक प्रकार से अप्राकृतिक प्रमाणित किया। ‘धर्मवीर हकीकत राय’, ‘विक्रमादित्य साहसांक’, ‘लुढ़कते पत्थर’, ‘पत्रलता’, ‘पुष्यमित्र’, आदि ऐतिहासिक उपन्यास, ‘वर्तमान दुर्व्यवस्था का समाधान हिन्दू राष्ट्र’, ‘डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अन्तिम यात्रा’, ‘हिन्दुत्व की यात्रा’, ‘भारत में राष्ट्र’, ‘बुद्धि बनाम बहुमत’ जैसी अनेक वैचारिक यथार्थ की कृतियाँ हैं । ये रचनाएँ अनेक प्रकार के भ्रमों को तोड़कर पाठक को झकझौर देतीं हैं ।

गुरुदत्त जी 1921 के असहयोग आन्दोलन से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष तक की घटनाओं के प्रत्यक्षद्रष्टा रहे। जब वे लाहौर नेशनल कॉलेज में हेडमास्टर थे तब सरदार भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु इनके सबसे प्रिय शिष्य हुआ करते थे । गुरुदत्त जी को क्राँतिकारियों का गुरु भी कहा जाता था । गुरुदत्त जी ने परतंत्र देश की परिस्थतियों, परतंत्रता से मुक्ति का संघर्ष और संघर्ष काल में लिये गये निर्णयों और उनके परिणामों का गहराई से अध्ययन किया। फिर उस पर कलम चलाई । इसलिये उनकी रचनाएँ कालजयी हैं। अनेक रचनाओं पर अंग्रेजी काल में प्रतिबंध भी लगा। स्वतंत्रता आँदोलन में गरम दल के नेताओं से भी उनका व्यक्तिगत संपर्क रहा । उनका संपर्क ही उनके लेखन में घटनाओं के सटीक विश्लेषण में सहायक रहा । इसकी झलक वैद्य गुरुदत्त जी के ‘सदा वत्सले मातृभूमे’ श्रृंखला में लिखे गये चार राजनीतिक उपन्यासों में मिलती है ये उपन्यास हैं ‘विश्वासघात’, देश की हत्या, ‘दासता के नये रूप’ और ‘सदा वत्सले मातृभूमे! इन रचनाओं की पृष्ठभूमि समाचार-पत्रो में छपे तत्कालीन समाचार, नेताओं के वक्तव्य है। उपन्यासों के पात्र राजनीतिक नेता तथा घटनाएं वास्तविक हैं। भारत-विभाजन की विभीषिका का यदि किसी इतिहासकार ने निर्भीक वर्णन किया है तो वे वैद्य गुरुदत्त हैं। भारत विभाजन पर उनकी पुस्तक ‘भारत: गाँधी-नेहरू की छाया में’ उनके प्रखर चिंतन का प्रमाण है।

वैद्य गुरुदत्त बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी है । उनका सम्पूर्ण रचना संसार भारत राष्ट्र, संस्कृति, परंपरा के गौरवमयी अतीत से परिचित कराता है तो राजनीति के विसंगति पूर्ण निर्णयों से भविष्य की सावधानी का संकेत मिलता है ।

जीवन के अंतिम दिनों में शारिरिक रूप से बहुत अशक्त हो गये थे । चलने, सुनने, देखने आदि की सामर्थ्य बहुत कमजोर हो गई थी फिर भी लेखन से लगाव बना रहा । और सतत चिंतन मनन के साथ 8 अप्रैल 1989 को संसार से विदा हुये । पर उनका रचना संसार आज भी समाज की एक धरोहर है ।

बाल कृष्ण शर्मा नवीन : अंग्रेजों ने खतरनाक कैदी घोषित किया था

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बालकृष्ण शर्मा नवीन एक ऐसे स्वाधीनता संग्राम सेनानी का नाम है जिन्होंने स्वतंत्रता के लिये सामूहिक संघर्ष किया, अपने लेखन से समाज को जाग्रत किया और अपनी पत्रकारिता से अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई।

पत्रकारिता में नवीनजी के आदर्श गणेश शंकर विद्यार्थी और माखनलाल चतुर्वेदी थे । वे कानपुर के उस समाचारपत्र प्रताप से जुड़े थे जो अहिसंक और क्राँतिकारी आँदोलन दोनों का केन्द्र था । 1942 के आँदोलन के बाद उनकी धारा बदली और वे पूरी तरह साहित्य सेवा की ओर मुड़ गये । स्वतंत्रता के बाद राजनीति से जुड़े और चुनाव जीतकर पहले लोकसभा सदस्य और फिर राज्यसभा सदस्य भी बने ।

ऐसे सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, राजनीतिज्ञ और हिंदी साहित्य सेवी बालकृष्ण शर्मा का जन्म 8 दिसंबर 1897 को मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के अंतर्गत गांव भयाना में हुआ था । पिता जमनादास शर्मा स्थानीय स्तर शिक्षकीय कार्य करते थे । माता राधाबाई धार्मिक और साँस्कृतिक विचारों की घरेलू महिला थीं । आर्थिक दृष्टि से परिवार सामान्य था पर वौद्धिक दृष्टि से उन्नत । नवीन जी की आरंभिक शिक्षा जिला मुख्यालय शाजापुर में हुई । 1915 में मिडिल और फिर उज्जैन से 1917 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की । उन्हें लेखन का शौक बचपन से था । अपने नाम के आगे “नवीन” उपनाम छात्र जीवन से ही लगाया करते थे । अनेक रचनाएँ समाचार पत्रों में भी छपीं। इसी बीच उनकी भेंट अपने समय के सुप्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार माखनलाल चतुर्वेदी से हुई । माखनलाल जी मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम के निवासी थे पर उन दिनों कानपुर के समाचार पत्र प्रताप से जुड़े हुये थे । बालकृष्ण जी के लेखन से माखनलाल जी बहुत प्रभावित हुये और अपने साथ कानपुर ले गये । यहाँ उनकी भेंट गणेशशंकर विद्यार्थी जी हुई और नवीन जी प्रताप पत्रिका के संपादकीय विभाग से जुड़ गए। “प्रताप” में काम करने के साथ उन्होंने विद्यार्थी जी की सलाह पर आगे की पढ़ाई के लिये कानपुर के क्राइस्ट चर्च कॉलेज में प्रवेश ले लिया। यह महाविद्यालय यद्यपि चर्च द्वारा संचालित था पर उसमें पढ़ने वाले विद्यार्थियों का मानस स्वाधीनता के प्रति आकर्षित था । इसका कारण कानपुर की पृष्ठभूमि थी । कानपुर स्वाधीनता के लिये एक जाग्रत नगर था । 1857 की क्रांति के समय भी कानपुर में भारी तूफान उठा था । क्रान्ति का भले दमन हो गया था लेकिन जन भावनाओं में स्वाधीनता की ललक थी । जिन दिनों नवीनजी महाविद्यालय में बी ए कर रहे थे तब असहयोग आंदोलन का आव्हान हुआ । नवीनजी ने युवाओं की टोली बनाई और आँदोलन में सहभागी बने । प्रभात फेरी निकाली, सभाएँ की और गिरफ्तार हुये और इसी के साथ पढ़ाई छूट गई। लेखन पत्रकारिता और लेखन यथावत रहा । प्रताप समाचारपत्र मानों क्राँतिकारियों का प्रमुख केन्द्र था । अपने अज्ञातवास के समय सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी भगतसिंह ने भी छद्म नाम से प्रताप में ही काम किया था । चंद्रशेखर आजाद का भी प्रताप और कानपुर से गहरा संबंध था ।

नवीनजी का जीवन पूरी तरह स्वाधीनता आँदोलन, लेखन और पत्रकारिता केलिये समर्पित हो गया । वे साहित्यिक और राष्ट्र जागरण दोनों प्रकार का लिखते थे । नवीन जी 1921 से 1944 के बीच कुल छह बार गिरफ्तार हुये और जेल भेजे गये । तीन बार आँदोलन में और तीन बार प्रताप में अपने लेखन के लिये । तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने उन्हें खतरनाक कैदी घोषित किया था और रिहाई के बाद निगरानी भी की गई । मार्च 1931 में प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी का कानपुर के दंगे में बलिदान हुआ तो उनके स्थान पर प्रताप के संपादक के रूप में नवीन जी को ही दायित्व सौंपा गया । 1942 के आँदोलन के बाद उनकी धारा बदली और स्वयं को पूरी तरह साहित्य सेवा के लिये ही समर्पित कर दिया । किन्तु सार्वजनिक जीवन से बहुत दूर न रह सके । स्वतंत्रता के बाद उन्होंने कांग्रेस की विधिवत सदस्यता लेकर सक्रिय राजनीति में कदम रखा । 1952 में देश का पहला चुनाव जीतकर लोकसभा पहुँचे। इस चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के श्री चन्द्रशेखर को हराया था । 1957 में राज्यसभा के लिए चुने गये और मृत्यु पर्यन्त राज्यसभा सदस्य रहे। 1955 में राजभाषा आयोग के सदस्य बने और सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में अनेक विदेश यात्राएँ कीं।

नवीनजी कहीं भी रहे हों, प्रताप के संपादकीय विभाग में, जेल में या फिर संसद में। उनका लेखन अनवरत रहा । अपने छात्र जीवन में समसामायिक रचनाएँ लिखते तो युवा अवस्था में देशभक्ति की और जीवन के उत्तरार्द्ध में पूरी तरह सामाजिक और साहित्यिक विषयों पर ही कलम चली । उनकी कुमकुम , रश्मिरेखा , अपलक , क्वासी , विनोबा स्टावन और उर्मिला जैसी रचनाएँ हिन्दी साहित्य की धरोहर बनीं । प्रताप के बाद वे साहित्यिक हिन्दी पत्रिका प्रभा के संपादक भी रहे । 1960 में भारत सरकार ने उन्हें तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया । इसी वर्ष 29 अप्रैल 1960 को उनका निधन हो गया । कुछ कविताओं का प्रकाशन तो उनकी मृत्यु के बाद ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशन किया गया । बालकृष्ण शर्मा गद्य रचनावली पाँच खंडों और बालकृष्ण शर्मा काव्य रचनावली तीन खंडों में प्रकाशित हुई । भारत सरकार ने वर्ष 1989 में उनकी स्मृति एक स्मारक टिकट जारी किया । उनका कर्मक्षेत्र उत्तर प्रदेश था इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान ने उनके सम्मान में “बाल कृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार” की स्थापना की है। उनका जन्म मध्यप्रदेश के शाजापुर में हुआ था । मध्यप्रदेश सरकार ने शाजापुर में शासकीय बालकृष्ण शर्मा नवीन स्नातकोत्तर महाविद्यालय की स्थापना की ।

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