आईटीबीपी द्वारा नई दिल्ली के राष्ट्रीय पुलिस स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित

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नई दिल्ली, 29 अक्टूबर 2024 – भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) द्वारा नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित राष्ट्रीय पुलिस स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक भावपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पुष्पांजलि, सलामी परेड और बैंड प्रदर्शन के माध्यम से वीरगति को प्राप्त जवानों की अमर स्मृतियों को नमन किया गया।

कार्यक्रम में आईटीबीपी के महानिदेशक श्री राहुल रसगोत्रा और हिमवीर वाइव्स वेलफेयर एसोसिएशन (HWWA) की अध्यक्षा श्रीमती गौरी रसगोत्रा ने दस शहीदों के परिजनों का सम्मान किया और उनके अद्वितीय साहस एवं त्याग को नमन किया। वरिष्ठ अधिकारियों, परिजनों और गणमान्य अतिथियों ने ‘वाल ऑफ वेलर’ पर पुष्पांजलि अर्पित कर अपनी श्रद्धांजलि दी।

इससे पूर्व, सुबह के समय एक रक्तदान शिविर का भी आयोजन किया गया था, जिसमें 80 हिमवीरों ने स्वेच्छा से रक्तदान कर अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन किया।

कार्यक्रम का समापन आईटीबीपी के जवानों के साहस, सेवा और देश की रक्षा में योगदान पर आधारित एक वीडियो प्रस्तुति के साथ हुआ।

व्यक्ति, परिवार और समाज ही नहीं राष्ट्र और पर्यावरण की समृद्धि का संदेश

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दीपावली का भारत का सबसे बड़ा त्यौहार है । यह कार्तिक कृष्णपक्ष त्रियोदशी से आरंभ होकर शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक कुल पाँच दिनों तक चलता है । इस उत्सव में पूजन के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण, कुटुम्ब समन्वय, समाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण तथा राष्ट्र की समृद्धि के पाँच प्रमुख संदेश दिये गये है ।

दीपावली रामजी के अयोध्या लौटने की स्मृति का त्यौहार है । विजयादशमी को लंका विजय हुई और दीपावली को अयोध्या लौटे । भारत में पुराण कथाओं का सृजन और तीज त्यौहारों का निर्धारण साधारण नहीं है । इसमें तिथियाँ तो निमित्त है । इनके आयोजन विधान के पीछे प्राणी और प्रकृति दोनों के उत्थान और समन्वय का संदेश है । पुराण कथाओं के माध्यम से समाज जीवन में एक आदर्श शैली स्थापना का प्रयास है और तीज त्यौहार व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और पर्यावरण के संरक्षण और समन्वय का व्यवहारिक संदेश है ।
अब दीपावली उत्सव को देखें। यह कार्तिक अमावस के दो दिन पहले आरंभ होकर दो दिन बाद तक चलता है । यह समयावधि शरद और हेमन्त ऋतु के संगम की है । प्रत्येक ऋतु परिवर्तन का प्रभाव प्रकृति और सभी प्राणियों के जीवन पर पड़ता है । इसे गर्मी, सर्दी, बरसात और फल फूल सब्जी की फसलें आतीं हैं। इसीलिये भारत में प्रत्येक ऋतु का अपना अलग उत्सव है और उसे मनाने का तरीका भी अलग है । जो मनुष्य को ऋतु प्रभाव झेलने की सहज शक्ति देता है । दीपावली उत्सव की तैयारी विजयदशमी से आरंभ हो जाती है । सामान्यतया वर्षा ऋतु का समापन भाद्रपद माह में हो जाता है । लेकिन कुछ भटकते बादल अश्विन माह में भी बरसने आ जाते हैं। बरसात के दिनों में कयी हानिकारक दृश्य अदृश्य जीव घर के सामान, घरों की दीवारों और कोने में अपना स्थान बना लेते हैं । इसलिये दशहरे के बाद सफाई अभियान चलता है । घर की एक एक वस्तु को झाड़ पौंछकर साफ किया जाता । टूटी फूटी वस्तुएँ फेंककर नयी मंगाई जाती हैं। पूरे घर की पुताई होती है । इस सफाई और पुताई अभियान में तीन प्रकार के लाभ होते हैं। पहला लाभ प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य का । वर्षा ऋतु में शरीर में जल तत्व प्रभावी और अग्नि तत्व शिथिल होता है । दीपावली की सफाई घर की सामग्री को यहाँ से वहाँ करने शरीर की कोशिकाएँ सक्रिय होती हैं जो स्वास्थ्य के लिये उत्तम। दूसरे घर की पुताई और सामग्री बदलने में समाज के शिल्प वर्ग से संपर्क समन्वय बनता है । उसे कुछ काम भी मिलता है । घर की साफ सफाई, फटे पुराने वस्त्र अन्य पुरानी वस्तुओं को बाहर करके गुजिया पपड़ी मठरी आदि बनाने का काम होता है । ये पूरा परिवार मिलकर बनाता है । प्रत्येक घर में कुछ विशिष्ठ पकवान बनाने की परंपरा होती है । घर की महिलाएँ दीवारों पर चित्रकारी करतीं हैं। इससे बच्चे सीखते हैं उन्हें अपने घर की परंपराओं से जुड़ाव होता है । स्वयं बनाने में कर्त्तव्य वोध होता है । साफ सफाई, सजावट जमावट आदि के यह सब काम धनतेरस तक पूरे हो जाते है और फिर पाँच दिवसीय दीपोत्सव आरंभ होता है । पहले दिन धनतेरस, दूसरे दिन रूप चतुर्दशी, तीसरे दिन दीपावली, चौथे दिन गोवर्धन पूजन और पाँचवे दिन भाई दूज से इस उत्सव का समापन होता है। इन पाँच दिनों की अलग-अलग पौराणिक कथाएँ हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह अवधि समुद्र मंथन की भी है ।

धनतेरस या धन्वन्तरि जयंति : आरोग्य एवं समृद्धि का संदेश

यह कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रियोदशी का दिन है । इसी दिन समुद्र मंथन से धनवंतरि जी प्रकट हुये थे । धनवंतरि जी को आरोग्य का देवता माना गया है । वैद्य या चिकित्सक की मान्यता अश्विनी कुमारों को हैं। अब यह भगवान धनवंतरि जी के नाम का अपभ्रंश होकर केवल “धन” रह गया हो अथवा स्वास्थ्य को सबसे बड़ा धन की माना गया हो, जो भी कारण हो इस तिथि का नाम धनतेरस हो गया । इस दिन दोनों कार्य होते हैं । आरोग्य वृद्धि का भी और धन वृद्धि की कामना का भी । धन गतिमान होता है । जल की भाँति धन स्वयं अपनी राह निकाल लेता है । इसलिये बुद्धिमान व्यक्ति स्थायित्व के लिये धन को स्थाई संपत्ति में परिवर्तित करने का प्रयास करते हैं । चल मुद्रा को ऐसी अचल या स्थाई संपत्ति में परिवर्तित करने का जो आने वाली पीढ़ियों तक सहेजी जा सके । जो आर्थिक रूप से समृद्ध होगा वही तो स्थाई संपत्ति क्रय कर सकेगा। पुराणों में कहा गया है कि धन इतना कमाओ जैसे रहती दुनियाँ तक आपको रहना, और धर्म इतना कमाओं मानो इसी क्षण संसार से जाना । अर्थात धर्मयुक्त मार्ग से धन कमाना । यही धनतेरस पर खरीदारी का संदेश है । और फिर स्वास्थ्य हो या संपत्ति उसकी सार्थकता सदुपयोग में ही होती है । यदि धन का अपव्यय न हुआ और केवल तिजौरी में बंद रखा गया तब भी उसकी उपयोगिता नहीं रहती। इसलिये स्थाई संपत्ति के रूप यह धन का सकारात्मक परिचालन है। वह स्थाई परिसंपत्ति में भी रहे और परिचालन में भी । धनतेरस के रूप में यही निर्धारण किया है भारतीय मनीषियों ने । इसी प्रकार स्वास्थ्य है । स्वास्थ्य का संरक्षण ही जीवन को सुखद बनाता है । इसलिये धनतेरस के दिन ये दोनों काम होते हैं । प्रातः उठकर जड़ी बूटी युक्त जल से स्नान, व्यायाम, आहार संतुलन ताकि रोगों का संक्रमण न हो । वही व्यक्ति स्वस्थ रहेगा जो अपनी आंतरिक ऊर्जा से रोगाणुओं पर नियंत्रण कर सकता है । धनतेरस पर प्रातः उठकर स्नान, ध्यान व्यायाम आदि की प्रक्रिया कुछ ऐसी है जिससे आंतरिक स्वास्थ्य सशक्त होता है । इस प्रकार धनतेरस के दिन इस तिथि के नाम के अनुरूप दोनों कार्य होते हैं । स्वास्थ्य धन की सुरक्षा और मुद्रा धन के प्रति भी सतर्कता।

रूप चतुर्दशी अर्थात सामर्थ्यवान व्यक्तित्व का निर्माण

अगला दिन रूप चतुर्दशी का है । इसे नर्क चतुर्दशी भी कहते हैं। जो स्वस्थ होगा, वही तो रूपवान होगा । इसीलिए यह तिथि स्वयं की साधना के मूल्यांकन का दिन है । इस दिन प्रातः उठकर स्नान, व्यायाम, योग साधना का विधान है यह एक प्रकार से स्वयं के शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य की साधना और दिनचर्या संकल्प है । आरोग्य एवं संकल्पशक्ति से आंतरिक ऊर्जा का संचार होगा तभी चेहरे की काँति बढ़ती है । इस काँति के कारण ही व्यक्ति को रूपवान कहा जाता है । यह तिथि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की समृद्धि की परीक्षा का दिन है । इसलिये तिथि का नाम रूप चतुर्दशी है । इस तिथि को नर्क चतुर्दशी भी कहा जाता है । पुराण कथाओं के अनुसार इस दिन नरकासुर का वध हुआ था । उसके अत्याचार से मानवता मुक्त हुई थी । नरकासुर के वध के कारण नर्क चतुर्दशी और उसके तनाव से मुक्ति के कारण तिथि का नाम नर्क चतुर्दशी और नरकासुर के अंत से मानवता के जो चेहरे खिले इससे नाम रूप चतुर्दशी मिला । इसे हम दोनों दृष्टि से मान सकते हैं। एक नरकासुर के वध के निमित्त नर्क चतुर्दशी और दूसरे स्वास्थ्य सामर्थ्य और धन के अभाव में व्यक्ति का जीवन नर्क के समान होता है । इसलिए भी इस तिथि को नर्क चतुर्दशी कहा गया है । पुरूषार्थ और परिश्रम से धन अर्जित कीजिये, सुव्यवस्थित दिनचर्या से आरोग्य अर्थात रोग रहित रहकर समाज में प्रतिष्ठित रहिये । यही इन दोनों दिनों का संदेश है ।

लक्ष्मी जी का पूजन : परिवार ही नहीं पड़ौस के बीच भी समन्वय

तीसरा दिन दीपावली का है । इसी दिन भगवान राम चौदह वर्ष वनवास के बाद अयौध्या लौटे थे । उनके आगमन के आनंद में दीपोत्सव हुआ । इस परंपरा के पालन में इस तिथि को दीपावली मनाई जाती है। दीपोत्सव के लिये इस तिथि का निर्धारण भी समाज को एक से अधिक संदेश भी है । सबसे पहला तो यही है कि दुष्टों के सक्रिय रहते किसी को सुख नहीं मिलता । आनंद में डूबना है तो पहले दुष्टों का अंत करना होगा । जैसा रामजी ने किया था । रामजी चाहते तो युद्ध के बिना ही हनुमान जी माता सीता को लेकर आ जाते । पर रामजी ने अयोध्या लौटने से पहले दुष्टों का अंत करना ही मानवता का हित समझा । यह दीपावली का वास्तविक आनंद है । साथ ही एक वैज्ञानिक दर्शन भी है । वर्ष में कुल बारह अमावस होतीं हैं। सभी बारह अमावस में कार्तिक की यह अमावस अपेक्षाकृत अधिक अंधकार मय होती है । चंद्रमा स्वयं प्रकाशमान ग्रह नहीं है । वह सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है । चूंकि दोनों गृह सतत गतिमान हैं, इसलिये हमें दिन और रात दोनों में प्रति क्षण प्रकाश की प्रदीप्ता में अंतर दिखाई देता है । प्रकाश के स्तर एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता । इसलिये प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस पर प्रकाश और अंधकार दोनों की प्रदीप्ता और अंधकार के अनुपात में अंतर होता है । कार्तिक अमावस पर दोनों ग्रहों की स्थिति कुछ ऐसी बनती है, या दोनों कुछ ऐसे कोण पर स्थित होते हैं कि इस अमावस की रात के अंधकार में अधिक गहरापन होता है । अंधकार की गहनता ही प्राणी को एक चुनौती होती है । वह अंधकार प्रकाश के अभाव का हो अथवा ज्ञान के अभाव में अज्ञान रूपी अंधकार। दोनों की गहनता को परास्त करने केलिये पुरुषार्थ और पराक्रम युक्त संकल्प चाहिए । इसी संकल्प का प्रकटीकरण है दीप मालिका । इससे संसार अमावस की घनघोर रात्रि में भी प्रकाशमान हो उठता है । दीपोत्सव यह संदेश भी है कि परिस्थिति कितनी भी विषम हों, अंधकार कितना ही गहन हो, यदि उचित दिशा में उचित प्रयत्न किया जाय तो अनुकूल आनंद हो सकता है । अंधकार भी प्रकाश में परिवर्तित हो सकता है । पुरुषार्थ से अंधकार सदैव परास्त होता है । पुरुषार्थ की दिशा में सतत प्रयत्नशील रहने का संदेश भी दीपावली में है । इस रात पहले लक्ष्मीजी का पूजन होता है । फिर घर के भीतर और बाहर दीप जलाये जाते हैं। लक्ष्मी पूजन के लिये पहले आरती केलिये एक दिया जलाया जाता है फिर अन्य दीपक। घर के भीतर हर कौने में और घर के बाहर द्वार पर और आँगन में दिये रखे जाते हैं, पड़ौस में भी दिये प्रसाद भेजे जाते हैं । यह संदेश गृहलक्ष्मी से जुड़ा है । ध्यान देने की बात यह है कि समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी तो अष्ठमी को प्रकट हुईं थीं। उस तिथि को महालक्ष्मी पूजन भी हो गया है । फिर पुनः कार्तिक अमावस को लक्ष्मी पूजन होता है वस्तुतः कार्तिक अमावस की इस पूजन में देवी लक्ष्मी तो एक प्रतीक रूप में हैं। वास्तव में यह दिन तो गृहलक्ष्मी के लिये समर्पित है । गृहलक्ष्मी अर्थात गृह स्वामिनी। भारतीय चिंतन में घर गृहस्थी का स्वामी पुरूष या पति नहीं होता । पत्नि होती है, नारी होती है । नारी को ही गृहलक्ष्मी, गृह स्वामिनी या घरवाली कहा गया है । पुरुष को गृहविष्णु या गृहदेवता नहीं कहा जाता । नारी के नाम के आगे “देवी” उपाधि स्वाभाविक रूप से लगती है । इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि नारी विवाहित है, अविवाहित है, परित्यक्ता है, विधवा है, बालिका है या वृद्ध है । वह किसी भी स्थिति या आयु में हो सकती है । उसके नाम के आगे “देवी” सदैव लगाया जाता है । नारी की संतुष्टि या आवश्यकता पूर्ति की बात ही दीपावली की तैयारी में है । दीपावली पर सदैव घर गृहस्थी की वस्तुएँ ही क्रय की जातीं हैं। वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार सामग्री सब का संबंध नारी से होता है । नारी की पसंद या आवश्यकता से ही धनतेरस या दीपावली के आसपास वस्तुएँ क्रय की जातीं हैं । एक और बात महत्वपूर्ण है । दीपावली से पहले गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, पितृपक्ष आदि तिथियाँ निकल चुकीं होतीं हैं। इन तिथियों पर गुरु केलिये बहन के लिये, वरिष्ठ जनों के लिये यहाँ तक कि पितृपक्ष में पुरोहित जी के लिये भी वस्त्र या अन्य प्रकार की भेंट भोजन का दायित्व पूरा हो जाता है इसलिये कार्तिक मास की अमावस की तिथि गृहस्वामिनी या गृह लक्ष्मी के लिये निर्धारित है । इसमें जहाँ परिवार जनों में गृह स्वामिनी के माध्यम से परिवार समाज की समृद्धि के उपाय का संदेश है वहीं गृह स्वामिनी को यह संदेश भी है कि वह पहले परिवार समाज के हित की चिंता करे फिर अपनी इच्छा पूर्ति का प्रयास करे । ऋग्वेद से लेकर अनेक पुराण कथाओं तक समाज को यह स्पष्ट संदेश है कि वही घर प्रकाशमान होगा जहाँ नारी संतुष्ट और प्रसन्न है । उसी घर में देवता रमण करते हैं जहाँ नारी का सम्मान जनक स्थान होता है । घर की देवी यदि अपनी पसंद और आवश्यकता पूर्ति से संतुष्ट है तभी घर प्रकाशमान होता है । यह सामर्थ्य नारी में ही है कि वह सबसे अंधेरी अमावस की रात्रि को भी प्रकाशमान बना सकती है । दीपावली के दिन वही दीपों से पूरे घर को प्रकाशमान करती है इसलिये यह त्यौहार देवी लक्ष्मी के पूजन प्रतीक रूप में गृहलक्ष्मी को ही समर्पित है । यदि गृहलक्ष्मी प्रसन्न है, संतुष्ट है तो पूरा परिवार एक सूत्र में बंधा रहता है । एक बात और, दीपावली के दिन पूरा परिवार मिलकर लक्ष्मी पूजन करता है । जैसा अयोध्या में रामजी और सभी भाइयों एवं उनके पूरे परिवार ने मिलकर दीपावली पूजन किया था । इसलिए यह दीपावली पूजन पूरे परिवार की एकजुटता और पड़ौस के समन्वय का प्रतीक है । पड़ौस में दिये भेजना अर्थात पूरे मोहल्ले को एक जुट रखना है। यदि बाहरी असामाजिक तत्वों के उत्पात पर तभी नियंत्रण होगा जब पूरे मोहल्ले में समन्वय होगा । इसीलिए लक्ष्मी पूजन के बाद पड़ौस में दिये भेजे जाते हैं।

गोवर्धन पूजा अर्थात पर्यावरण संरक्षण

दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजन होता है । इस दिन गोबर से पर्वत का प्रतीक बनाकर पूजन की जाती है और पशुओं का श्रृंगार करने की परंपरा है । यह तिथि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने से जुड़ी है । भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर प्रकृति के कोप से मानवता की रक्षा की थी । उसी स्मृति में गोवर्धन पूजन होती है । पर्वत के प्रतीक का पूजन पर्यावरण के संरक्षण से जुड़ा है । प्रकृति और पर्यावरण के केन्द्र में पर्वत होते हैं। पर्वत ही बादलों को बरसात केलिये प्रेरित करते हैं। पर्वतों पर जो प्राकृतिक जड़ी बूटियाँ होती हैं वे प्राणीमात्र को आरोग्य देती हैं। समस्त वन्य प्राणी पर्वतों पर घूमने अवश्य जाते हैं। यही उनके आरोग्य का रहस्य है । विकसित समाज में भी अपनी गाय आदि पालतू पशुओं को प्रतिदिन वन और पर्वत पर भेजने की परंपरा रही है । यह उनके आरोग्य केलिये थी । यदि समाज द्वारा पर्वत संरक्षित है, सुरक्षित है तो पूरी प्रकृति ही नहीं मानवता भी सुरक्षित है । पर्वतों की सुरक्षा से नदी तालाब तथा अन्य जल स्रोत सुरक्षित रहते हैं, पर्वतीय सुरक्षा ही वनों को सुरक्षा देती है । पर्वत पर ही पनपती है औषधीय वनस्पति जो मनुष्य को आरोग्य देती है । इसलिए यह तिथि गोवर्धन पर्वत की प्रतीक पूजन के माध्यम से पर्यावरण को सुरक्षित रखने का संकल्प है । पर्वतों के संरक्षण में ही वनस्पति और मौसम का संतुलन निहित है । विशेषकर गाय का दूध, गौ मूत्र गौबर आदि में औषधीय गुण आते हैं। पशु आधारित कृषि के लिये ये पशु जितने उपयोगी थे उससे अधिक इनकी उपयोगिता आज भी अनुभव की जा रही है । गौबर एवं अन्य अपविष्ट पदार्थ सोलर ऊर्जा आदि का संचालन विज्ञान अब जान पाया है। पर भारतीय चिंतन में यह तथ्य अनादि काल से हैं। समाज इनसे दूर न हो, पर्वत और पशुओं का महत्व समझे इसी प्रतीक रूप से यह गोवर्धन पूजा है ।

भाईदूज अर्थात कुटुम्ब सशक्तीकरण

दीपावली का समापन भाई दूज से होता है । इस दिन भाई अपनी बहन के घर जाकर भोजन करता है और भेंट देता है । रक्षाबंधन पर भाई अपने घर बहन को आमंत्रित करता है । पर भाईदूज के दिन भाई अपनी बहन के घर जाता है । पुराणों में इस तिथि के दो निमित्त बताये गये हैं। एक मृत्यु के देवता यम का अपनी बहन यमुना के घर जाना और दूसरा नरकासुर वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण का अपनी बहन सुभद्रा के घर जाना । यमुना और यम भाई बहन हैं। इनके पिता सूर्यदेव हैं। भाई बहन बचपन में बिछुड़ गये थे । अंत में भाई यम ने अपनी बहन यमुना को खोज लिया, बहन के घर जाकर भोजन किया और घोषणा की कि इस दिन जो भाई अपनी बहन के घर जाकर भोजन करेगा उसे यमपुरी में कोई कष्ट नहीं होगा। इस तिथि भाइयों को संदेश है कि भले बहन का विवाह हो गया हो, वह दूसरे घर चली गई पर उसकी चिंता करना है, उसके घर जाकर उसकी कुशल क्षेम का पता लगाना और बहन के परिवार से भी समन्वय बनाना भाई दूज का संदेश है। हम अपनी समृद्धि में खो न जायें, सभी भाइयों के बीच ही नहीं बिवाहित बहनों के परिवारों से भी समन्वय आवश्यक । यही कुटुम्ब का रूप है। अपनी किसी सफलता पर उत्सव मनाना, समृद्धि का आनंद मनाना तभी सार्थक है जब पूरा परिवार पूरा कुटुम्ब सहभागी होगा । यही इस पाँच दिवसीय दीपोत्सव की सार्थकता है और यही इसका संदेश।
पाँच दिवसीय इस दीपोत्सव में समाज का ऐसा कौनसा वर्ग है जिससे किसी परिवार का संपर्क नहीं बनता । इसमें प्रत्येक समाज और व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण है । फूल माला से लेकर मिट्टीके दिये, जुते चप्पल वस्त्र, आभूषण, बर्तन तक की खरीदारी होती है । लिपाई पुताई सफाई आदि प्रत्येक समाज का प्रत्येक वर्ग समूह की सहभागिता ही नहीं प्रकृति के साथ एकाकार होने का त्यौहार भी है दीपावली।

TWENTY FIRSTDIVIDEND By FCI Aravali Gypsum & Minerals India Limited

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Brigadier Amar Singh Rathore, Chairman & Managing Director, FCI Aravali Gypsum & Minerals India Limited, a Central Government Public Sector Undertaking, under the Ministry of Chemicals & Fertilizers presented a dividend cheque of Rs. 12,84,00,000/-(Rupees Twelve Crore Eight four lakh only) to the Hon’ble Minister of Chemical & Fertilizers, ShriJagatPrakashNadda.

The Hon’ble Minister appreciated the results achieved by the Company. The Hon’ble Minister also expressed the hope that the Company will grow exponentially and contribute to the growth of economy and generate higher dividends in coming years. On this occasion, the CMD informed that the Company is in the process of diversifying into mineral exploration and mining of minerals other than Gypsum.

78th Independence Day Celebrated with Enthusiasm by All ITBP Formations

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The 78th Independence Day was celebrated with great enthusiasm and fervor across all formations of the Indo-Tibetan Border Police (ITBP). Director General Sh. Rahul Rasgotra, IPS, led the flag hoisting ceremony at Galwan (5th Battalion, NW Frontier) and addressed the troops.

At the Headquarters, IG Sh. Jaspal Singh presided over the ceremony, extending Independence Day greetings to all officers and personnel.

ITBP’s various formations, whether stationed at 18,000 feet or in the plains, celebrated the national festival with pride. The occasion also saw the taking of the pledge for a “Drug-Free India.”

ITBP demonstrated its unwavering dedication and patriotism in commemorating this significant day.

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