ट्रम्प प्रशासन द्वारा टैरिफ सम्बंधी लिए जा रहे निर्णयों का भारत पर प्रभाव

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भोपाल। अमेरिका में दिनांक 20 जनवरी 2025 को नव निर्वाचित राष्ट्रपति श्री डॉनल्ड ट्रम्प द्वारा ली गई शपथ के उपरांत ट्रम्प प्रशासन आर्थिक एवं अन्य क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण फैसले बहुत तेज गति से ले रहा है। इससे विश्व के कई देश प्रभावित हो रहे हैं एवं कई देशों को तो यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि अंततः आगे आने वाले समय में इन फैसलों का प्रभाव इन देशों पर किस प्रकार होगा।

ट्रम्प प्रशासन अमेरिका में विभिन्न उत्पादों के हो रहे आयात पर टैरिफ की दरों को बढ़ा रहा है क्योंकि इन देशों द्वारा अमेरिका से आयात पर ये देश अधिक मात्रा में टैरिफ लगाते हैं। चीन, कनाडा एवं मेक्सिको से अमेरिका में होने वाले विभिन्न उत्पादों के आयात पर तो टैरिफ को बढ़ा भी दिया गया है। इसी प्रकार भारत के मामले में भी ट्रम्प प्रशासन का मानना है कि भारत, अमेरिका से आयातित कुछ उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाता है अतः अमेरिका भी भारत से आयात किए जा रहे कुछ उत्पादों पर 100 प्रतिशत का टैरिफ लगाएगा। इस संदर्भ में हालांकि केवल भारत का नाम नहीं लिया गया है बल्कि “टिट फोर टेट” एवं “रेसिप्रोकल” आधार पर कर लगाने की बात की जा रही है और यह समस्त देशों से अमेरिका में हो रहे आयात पर लागू किया जा सकता है एवं इसके लागू होने की दिनांक भी 2 अप्रेल 2025 तय कर दी गई है। इस प्रकार की नित नई घोषणाओं का असर अमेरिका सहित विभिन्न देशों के पूंजी (शेयर) बाजार पर स्पष्टतः दिखाई दे रहा है एवं शेयर बाजारों में डर का माहौल बन गया है।

अमेरिका में उपभोक्ता आधारित उत्पादों का आयात अधिक मात्रा में होता है और अब अमेरिका चाहता है कि इन उत्पादों का उत्पादन अमेरिका में ही प्रारम्भ हो ताकि इन उत्पादों का अमेरिका में आयात कम हो सके। दक्षिण कोरीया, जापान, कनाडा, मेक्सिको आदि जैसे देशों की अर्थव्यवस्था केवल कुछ क्षेत्रों पर ही टिकी हुई है अतः इन देशों पर अमेरिका में बदल रही नीतियों का अधिक विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। जबकि भारत एक विविध प्रकार की बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था है, अतः भारत को कुछ क्षेत्रों में यदि नुक्सान होगा तो कुछ क्षेत्रों में लाभ भी होने की प्रबल सम्भावना है। संभवत: अमेरिका ने भी अब यह एक तरह से स्वीकार कर लिया है कि भारत के कृषि क्षेत्र को टैरिफ युद्ध से बाहर रखा जा सकता है, क्योंकि भारत के किसानों पर इसका प्रभाव विपरीत रूप से पड़ता है। और, भारत यह किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा कि भारत के किसानों को नुक्सान हो। डेरी उत्पाद एवं समुद्रीय उत्पादों में भी आवश्यक खाने पीने की वस्तुएं शामिल हैं। भारत अपने देश में इन उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उद्देश्य से इन उत्पादों के आयात पर टैरिफ लगाता है, ताकि अन्य देश सस्ते दामों पर इन उत्पादों को भारत के बाजार में डम्प नहीं कर सकें। साथ ही, भारत में मिडल क्लास की मात्रा में वृद्धि अभी हाल के कुछ वर्षों में प्रारम्भ हुई है अतः यह वर्ग देश में उत्पादित सस्ती वस्तुओं पर अधिक निर्भर है, यदि इन्हें आयातित महंगी वस्तुएं उपलब्ध कराई जाती हैं तो वह इन्हें सहन नहीं कर सकता है। अतः यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों को सस्ते उत्पाद उपलब्ध करवाए। अन्यथा, यह वर्ग एक बार पुनः गरीबी रेखा के नीचे आ जाएगा। भारत ने मुद्रा स्फीति को भी कूटनीति के आधार पर नियंत्रण में रखने में सफलता प्राप्त की है। रूस, ईरान, अमेरिका, इजराईल, चीन, अरब समूह आदि देशों के साथ अच्छे सम्बंध रखकर विदेशी व्यापार करने में सफलता प्राप्त की है। जहां से भी जो वस्तु सस्ती मिलती है भारत उस देश से उस वस्तु का आयात करता है। इसी नीति पर चलते हुए, कच्चे तेल के आयात के मामले में भी भारत ने विभिन्न देशों से भारी मात्रा में छूट प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है और ईंधन के दाम भारत में पिछले लम्बे समय से स्थिर बनाए रखने में सफलता मिली है।

अमेरिका द्वारा चीन, कनाडा एवं मेक्सिको पर लगाए गए टैरिफ के बढ़ाने के पश्चात इन देशों द्वारा भी अमेरिका से आयातित कुछ उत्पादों पर टैरिफ लगा दिए जाने के उपरांत अब विभिन्न देशों के बीच व्यापार युद्ध एक सच्चाई बनता जा रहा है। परंतु, क्या इसका असर भारत के विदेशी व्यापार पर भी पड़ने जा रहा है अथवा क्या कुछ ऐसे क्षेत्र भी ढूढे जा सकते हैं जिनमें भारत लाभप्रद स्थिति में आ सकता है। जैसे, अपैरल (सिले हुए कपड़े) एवं नान अपैरल टेक्सटायल का मेक्सिको से अमेरिका को निर्यात प्रतिवर्ष लगभग 450 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहता है और मेक्सिको का अमेरिका को निर्यात के मामले में 8वां स्थान है। अमेरिका द्वारा मेक्सिको से आयात पर टैरिफ लगाए जाने के बाद टेक्सटायल से सम्बंधित उत्पाद अमेरिका में महंगे होने लगेंगे अतः इन उत्पादों का आयात अब अन्य देशों से किया जाएगा। मेक्सिको अमेरिका को 250 करोड़ अमेरिकी डॉलर के कॉटन अपैरल का निर्यात करता है एवं 150 करोड़ अमेरिकी डॉलर के नान कॉटन अपैरल का निर्यात करता है। कॉटन अपैरल के आयात के लिए अब अमेरिकी व्यापारी भारत की ओर देखने लगे हैं एवं इस संदर्भ में भारत के निर्यातकों के पास पूछताछ की मात्रा में वृद्धि देखी जा रही है। इन परिस्थितियों के बीच, टेक्स्टायल उद्योग के साथ ही, फार्मा क्षेत्र, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र, इंजीयरिंग क्षेत्र एवं श्रम आधारित उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी भारत को लाभ हो सकता है।

यदि अमेरिका अपने देश में हो रहे उत्पादों के आयात पर टैरिफ में लगातार वृद्धि करता है तो यह उत्पाद अमेरिका में बहुत महंगे हो जाएंगे और इससे अमेरिकी नागरिकों पर मुद्रा स्फीति का दबाव बढ़ेगा। क्या अमेरिकी नागरिक इस व्यवस्था को लम्बे समय तक सहन कर पाएंगे। उदाहरण के तौर पर फार्मा क्षेत्र में भारत से जेनेरिक्स दवाईयों का निर्यात भारी मात्रा में होता है। यदि अमेरिका भारत के उत्पादों पर टैरिफ लगाता है तो इससे अधिक नुक्सान तो अमेरिकी नागरिकों को ही होने जा रहा है। भारत से आयात की जा रही सस्ती दवाएं अमेरिका में बहुत महंगी हो जाएंगी। इससे अंततः अमेरिकी नागरिकों के बीच असंतोष फैल सकता है। अतः अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन के लिए टैरिफ को लम्बे समय तक बढ़ाते जाने की अपनी सीमाएं हैं।

अमेरिका विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र एवं सबसे बड़ा विकसित देश है और इस नाते अन्य देशों के प्रति अमेरिका की जवाबदारी भी है। टैरिफ बढ़ाए जाने के सम्बंध में इक तरफा कार्यवाही अमेरिका की अन्य देशों के साथ सौदेबाजी की क्षमता तो बढ़ा सकती है परंतु यह कूटनीति लम्बे समय तक काम नहीं आ सकती है। अमेरिकी नागरिकों के साथ साथ अन्य देशों में भी असंतोष फैलेगा। कोई भी व्यापारी नहीं चाहता कि नीतियों में अस्थिरता बनी रहे। इसका सीधा सीधा असर विश्व के समस्त स्टॉक मार्केट पर विपरीत रूप से पड़ता हुआ दिखाई भी दे रहा है। यदि यह स्टॉक मार्केट के अतिरिक्त अन्य बाजारों एवं नागरिकों के बीच में भी फैला तो मंदी की सम्भावनाओं को भी नकारा नहीं जा सकता है। अमेरिका के साथ साथ अन्य कई देश भी मंदी की चपेट में आए बिना नहीं रह पाएंगे। अर्थात, इस प्रकार की नीतियों से विश्व के कई देश विपरीत रूप में प्रभावित होंगे।

अमेरिका को भी टैरिफ के संदर्भ में इस बात पर एक बार पुनः विचार करना होगा कि विकसित देशों पर तो टैरिफ लगाया जा सकता है क्योंकि अमेरिका एवं इन विकसित देशों में परिस्थितियां लगभग समान है। परंतु विकासशील देशों जैसे भारत आदि में भिन्न परिस्थितियों के बीच तुलनात्मक रूप से अधिक परेशानियों का सामना करते हुए विनिर्माण क्षेत्र में कार्य हो रहा है, अतः विकसित देशों एवं विकासशील देशों को एक ही तराजू में कैसे तौला जा सकता है। विकासशील देशों ने तो अभी हाल ही में विकास की राह पर चलना शुरू किया है और इन देशों को अपने करोड़ों नागरिकों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाना है। इनके लिए विकसित देश बनने में अभी लम्बा समय लगना है। अतः विकसित देशों को इन देशों को विशेष दर्जा देकर इनकी आर्थिक मदद करने के लिए आगे आना चाहिए। अमेरिका को विकसित देश बनने में 100 वर्ष से अधिक का समय लग गया है और फिर विकासशील देशों के साथ इनकी प्रतिस्पर्धा कैसे हो सकती है। विकासशील देशों को अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने का अधिकार है, अतः विकासशील देश तो टैरिफ लगा सकते हैं परंतु विकसित देशों को इस संदर्भ में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

काँग्रेस गठबंधन शासित राज्यों में तुष्टीकरण की स्पर्धा

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काँग्रेस और उनके गठबंधन वाली विभिन्न सरकारों में हिन्दू हितों को सीमित करके मुस्लिम तुष्टीकरण की मानों कोई स्पर्धा चल रही है। मुस्लिम तुष्टीकरण की दिशा में एक सरकार कोई घोषणा करती है तो दूसरी सरकार उसका अनुसरण करते हुये और नई सौगात दौड़कर नया इतिहास बना रही है। इसे हिमाचल प्रदेश, तैलंगाना, झारखंड, कर्नाटक, केरल आदि सरकारों की घोषणाओं से समझा जा सकता हैं।

मुस्लिम तुष्टीकरण की यह स्पर्धा देश के नौ प्रदेशों में चल रही है। इनमें काँग्रेस अथवा उनके गठबंधन दलों की सरकारें हैं। इनमें कर्नाटक, हिमांचल, तैलंगाना, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाड और झारखंड जैसी सरकारें हैं। ये सरकारें दोनों प्रकार से तुष्टीकरण कर रही हैं। एक ओर मुस्लिम हितों का संवर्धन और दूसरी ओर हिन्दू हितों का शोषण। इसके लिये हिमाचल प्रदेश सरकार का नया निर्णय सामने आया है । हिमाचल प्रदेश सरकार ने अल्पसंख्यक कल्याण का बजट तो बढ़ाया लेकिन सरकार की दो योजनाओं का व्यय मंदिर ट्रस्ट के कंधे पर डाल दिया है। हिमाचल प्रदेश ही नहीं देशभर के अधिकांश मंदिरों ट्रस्ट के संचालन पर राज्य सरकारों का नियंत्रण होता है। यह हिमाचल प्रदेश में भी है। हिमाचल सरकार ने इसी का लाभ उठाया है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री सुक्कू ने प्रदेश के सभी बड़े मंदिरों को पत्र लिखकर दो योजनाओं में आर्थिक सहायता मांगी है। इस पत्र के साथ ही मंदिर ट्रस्ट से जुड़े अधिकारियों ने सूची बनाकर इन मंदिरों से प्राप्त होने वाली कुल राशि का आकलन कर लिया है।इससे कयी कदम आगे अब कर्नाटक सरकार ने अपने बजट में मुस्लिम समाज को सशक्त बनाने केलिये घोषणाओं की झड़ी लगा दी है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्दरमैया के पास वित्त विभाग भी है। उन्होने पिछले दिनों वर्ष 2025-26 केलिये अपनी सरकार का बजट प्रस्तुत किया। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने बजट में मुस्लिम तुष्टीकरण के लिते एक दो नहीं कुल तेरह योजनाओं की घोषणा की हैं। इसमें सबसे बड़ी घोषणा है सरकारी ठेकों में मुस्लिम ठेकेदारों को चार प्रतिशत आरक्षण देना। इस निर्णय के साथ ही अब कर्नाटक में शासकीय, अर्ध शासकीय निर्माण कार्य के ठेकों में चार प्रतिशत कार्य मुस्लिम ठेकेदारों को ही दिये जायेंगे। अब तक विभिन्न राज्य सरकारों ने सरकारी नौकरियों में तो मुसलमानों को आरक्षण का प्रावधान किया है। लेकिन ठेको॔ में आरक्षण देने की घोषणा करने वाला कर्नाटक पहला राज्य बन गया है। सरकारी ठेकों में मुस्लिम आरक्षण की घोषणा के साथ कर्नाटक में इमामों को छै हजार रुपये मासिक भत्ता देने, मुस्लिम लड़कियों के लिए 15 नये महिला महाविद्यालय खोलने की घोषणा भी की है । ये नये महाविद्यालयों का निर्माण बक्फ की जमीन पर होगा। लेकिन इनके निर्माण कार्य पर पूरा पैसा सरकार लगायेगी। इनके संचालन में बक्फ बोर्ड की भूमिका प्रमुख होगी। तुष्टीकरण की अन्य घोषणाओं में अल्पसंख्यक समाज के सामूहिक विवाह आयोजित करने वाले अशासकीय संगठनों को प्रति जोड़े पचास हजार रुपये की राशि देने, 250 मौलाना आजाद मॉडल इंग्लिश मीडियम स्कूल में चरणबद्ध तरीके से ‘प्री-प्राइमरी’ से पूर्व विश्वविद्यालय कक्षाएं शुरू करने, उर्दू माध्यम की शिक्षा देने वाले सौ विद्यालयों को अनुदान के रूप में सौ करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस योजना पर कुल चार सौ करोड़ का व्यय अनुमानित है। इसमें सौ करोड़ की राशि इस वर्ष केलिये है। कर्नाटक के विभिन्न नगरों में अल्पसंख्यक समाज केलिये अलग कॉलोनियों का विकास होगा। इस मद पर एक हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है। वक्फ संपत्तियों और कब्रिस्तानों के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए सरकार 150 करोड़ रुपये व्यय करेगी। मुस्लिम सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए 50 लाख रुपये का अनुदान दिया जायेगा। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में नए आईटीआई कॉलेज की स्थापना की जायेगी ताकि मुस्लिम समाज के बच्चों का “स्किल डेवलपमेंट हो सके। इनमें मुस्लिम छात्रों के लिए 50 प्रतिशत शुल्क की छूट दी जायेगी। इसके अतिरिक्त उलाल नगर में मुस्लिम लड़कियों के लिए आवासीय महाविद्यालय की स्थापना की जायेगी। जो मुस्लिम छात्र विदेश जाकर पढ़ना चाहते हैं उनके लिए छात्रवृत्ति में वृद्धि की जायेगी। बेंगलुरु नगर के हज भवन का विस्तार किया जायेगा। इसके साथ मुस्लिम छात्राओं को आत्मरक्षा प्रशिक्षण देने की भी घोषणा की गई है। कर्नाटक सरकार का कुल बजट 4.09 करोड़ का है। इसमें मुस्लिम और ईसाई समाज को लगभग 4700 करोड़ का प्रावधान किया गया है। एक सामान्य नागरिक की भाँति कर्नाटक के अल्पसंख्यक समाज को अन्य प्रावधानों के लाभ तो मिलेंगे ही। इनके साथ अल्पसंख्यक कल्याण के इन प्रावधानों का अतिरिक्त लाभ मिलेगा।

कर्नाटक में काँग्रेस सरकार द्वारा मुस्लिम तुष्टीकरण की ये घोषणाएँ पहली नहीं हैं। कर्नाटक सरकार धर्म के आधार पर मुस्लिम समाज को चार प्रतिशत आरक्षण की घोषणा पहले की जा चुकी है। मुस्लिम समाज को यह चार प्रतिशत आरक्षण हिन्दुओं के ओबीसी समुदाय के आरक्षण कोटे से दिया जाना है। ओबीसी हिन्दू समाज का एक वर्ग समूह है। इस वर्ग केलिये आरक्षण कोटे की सीमा 32 प्रतिशत है। इस वर्ग में मुस्लिम समाज को शामिल करने का अर्थ है हिन्दू समाज के ओबीसी समूह के हितों में चार प्रतिशत की कटौती हो जायेगी। कर्नाटक में ओबीसी कोटे से मुसलमानों को यह आरक्षण काँग्रेस ने पहले भी लागू किया था। लेकिन बीच में भाजपा सत्ता में आई तो ओबीसी कोटे से मुसलमानों को आरक्षण दिये जाने इस निर्णय को बदल दिया था। लेकिन कर्नाटक में दोबारा काँग्रेस की सरकार आई तो यह निर्णय पुनः लागू हो गया। कर्नाटक सरकार द्वारा की गईं इन नई घोषणाओं उलेमाओं के उस तेरह सूत्रीय मांगपत्र की झलक है जो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जारी हुआ था। उसमें उर्दू भाषा के विकास, सरकारी ठेकों में प्राथमिकता, मुस्लिम काॅलोनी के विकास आदि की मांगे शामिल थीं। एक मांग में थोड़ा अंतर आया है। तब उलेमाओं ने सेना और पुलिस भर्ती में मुसलमान युवकों को प्राथमिकता देने की माँग की गई थी। कर्नाटक सरकार की घोषणा में यह विन्दु तो नहीं है। लेकिन मुस्लिम लड़कियों को “आत्मरक्षा प्रशिक्षण” की घोषणा की गई है। इससे उनकी क्षमता में वृद्धि होगी जो पुलिस एवं सेना की भर्ती स्पर्धा में लाभ देगा। कर्नाटक राज्य के बजट की एक विशेषता और है। इस बजट में एक ओर अल्पसंख्यक कल्याण के लिये उदारता से नई नई घोषणाएँ कीं गई हैं वहीं दूसरी ओर सरकार के खजाने में मंदिरों से होने वाली आय में वृद्धि का आकलन किया गया है । कर्नाटक के मंदिरों से होने वाली इस आय वृद्धि पर यद्यपि सरकार ने कुछ नहीं कहा लेकिन कर्नाटक के अर्थशास्त्रियों के आकलन के अनुसार इस वर्ष कर्नाटक सरकार को मंदिरों से होने वाली आय में चार प्रतिशत की वृद्धि अनुमानित है। मंदिरों में होने वाली आय का मुख्य स्त्रोत श्रद्धालुओं का दान और चढ़ावा होता है। जाग्रति के साथ मंदिरों में जाने वाले श्रृद्धालुओ की संख्या भी बढ़ रही है और दान का औसत भी। इसी के कारण यह वृद्धि अनुमानित है। अन्य राज्यों की भाँति कर्नाटक में भी सरकार अनेक मंदिर ट्रस्ट संचालन में सहभागिता है। यह आय इन्हीं मंदिरों से होती है। इससे स्पष्ट है कि सरकार मंदिरों से तो धन लेगी और मुस्लिम तुष्टीकरण पर व्यय करेगी।

क्या अगले 25 वर्षों में मांसाहार का अंत मुमकिन है?

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दिल्ली। यूरोप में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जो अगले 25 सालों में मांसाहार को इतिहास की किताबों में दफ़न कर सकता है। एक ऐसा महाद्वीप जो कभी मांसाहारी परंपराओं में गहराई से जुड़ा हुआ था, वह अब पौधे-आधारित इंक़लाब का अगुआ बन चुका है। आर्थिक, पर्यावरणीय और नैतिक कारणों से प्रेरित होकर, यूरोप भोजन के उत्पादन और उपभोग के तरीके को नए सिरे से परिभाषित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

जर्मन मामलों के माहिर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी बताते हैं, “मांस उद्योग, जिसे लंबे समय तक वैश्विक कृषि का आधार माना जाता था, अब अपनी अक्षमताओं के लिए जाँच के केंद्र में है। पशुधन पालन के लिए भारी मात्रा में संसाधनों की आवश्यकता होती है—ज़मीन, पानी और अनाज—जिन्हें सीधे तौर पर बढ़ती आबादी को खिलाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सिर्फ एक किलो गोमांस का उत्पादन करने में लगभग 15,000 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि पौधे-आधारित विकल्पों के लिए इसका एक छोटा सा हिस्सा ही पर्याप्त होता है। इसके अलावा, पशुओं के चारे के लिए विशाल भूमि क्षेत्र का उपयोग किया जाता है, जिसे आलोचकों का मानना है कि मानव उपभोग के लिए फसलें उगाने में अधिक कुशलता से इस्तेमाल किया जा सकता है। पशुधन को बनाए रखने का आर्थिक बोझ भी एक बढ़ती चिंता है। एंटीबायोटिक प्रतिरोध के बढ़ते दौर में जानवरों को बीमारियों से मुक्त रखना अधिक चुनौतीपूर्ण और महंगा होता जा रहा है। एवियन फ्लू और स्वाइन फीवर जैसी बीमारियों के प्रकोप ने मांस उद्योग की कमजोरियों को और उजागर किया है। इन कारकों ने, जलवायु परिवर्तन और खाद्य असुरक्षा से जूझ रही दुनिया में, मांस उत्पादन की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।”
खबरों से पता चलता है कि यूरोपीय संघ ने पहले ही मांस-केंद्रित कृषि से दूर जाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। हाल के कानूनों का उद्देश्य औद्योगिक पशुधन खेती को प्रोत्साहित करने वाली प्रथाओं को हतोत्साहित करना है, जैसे कि मांस उत्पादकों को सब्सिडी देना और पशु कल्याण पर ढीले नियम। ये नीतियाँ खाद्य उत्पादन के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने और स्थिरता को बढ़ावा देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।

साथ ही, वैगनिज्म, या शाकाहारी आंदोलन पूरे यूरोप में अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है। एक बार जो एक विशिष्ट जीवनशैली विकल्प माना जाता था, वह अब मुख्यधारा में शामिल हो चुका है। लाखों लोग सेहत, नैतिक और पर्यावरणीय कारणों से पौधे-आधारित आहार अपना रहे हैं। यह सांस्कृतिक बदलाव पौधे-आधारित खाद्य बाजार की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता में दिख रहा है, जो अगले दशक में अरबों यूरो के मूल्य तक पहुँचने का अनुमान है।

इस इंक़लाब में सबसे रोमांचक विकास मांस के स्वाद, बनावट और पोषण प्रोफ़ाइल की नकल करने वाले पौधे-आधारित विकल्पों का उदय है। यूरोप भर की कंपनियाँ लोकप्रिय व्यंजनों के शाकाहारी संस्करण बनाने के लिए भारी निवेश कर रही हैं, जैसे बर्गर, सॉसेज और पारंपरिक व्यंजन। उदाहरण के लिए, डोनर कबाब—जर्मनी में लोकप्रिय एक मांसाहारी तुर्की व्यंजन—अब शाकाहारी रूप में उपलब्ध है, और कई लोगों का दावा है कि यह मूल से भी बेहतर स्वाद देता है।

यह प्रगति केवल फास्ट फूड तक सीमित नहीं है। उच्च श्रेणी के रेस्तरां भी पौधे-आधारित व्यंजनों को अपना रहे हैं, जो इस धारणा को चुनौती देते हैं कि शानदार भोजन के लिए मांस ज़रूरी है। यह वहम टूट चुका है कि मांस-मुक्त आहार स्वाभाविक रूप से अपर्याप्त होता है। मैसूर, जो भारत की योग राजधानी है, और उदयपुर, जहाँ बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक आते हैं, इन शहरों में शाकाहारी भोजन की माँग काफी बढ़ी है। ऋषिकेश, हरिद्वार, वाराणसी आदि शहरों में पर्यटक शाकाहारी खाना ही पसंद कर रहे हैं।

ग्रीन एक्टिविस्ट पद्मिनी कहती हैं कि मांसाहार से शाकाहार की ओर यूरोप का संभावित बदलाव विशेष रूप से उल्लेखनीय है, यह देखते हुए कि इसका ऐतिहासिक रूप से पशु उत्पादों पर इन्हेसार रहा है। “सदियों से, मांस को समृद्धि और शक्ति का प्रतीक माना जाता था, और कई संस्कृतियों का मानना था कि मनुष्य इसके बिना जीवित नहीं रह सकते। हालांकि, मांस उपभोग के पर्यावरणीय और नैतिक प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ने के साथ यह मानसिकता तेजी से बदल रही है।”

विशेष रूप से युवा पीढ़ी इस बदलाव को आगे बढ़ा रही है। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि मिलेनियल्स और जेन जेड अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में पौधे-आधारित आहार अपनाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वास्तव में युवा पीढ़ी पशु कल्याण, जलवायु परिवर्तन और व्यक्तिगत सेहत के बारे में अधिक जागरूक और चिंतित है। यह पीढ़ीगत बदलाव आने वाले दशकों में मांस उपभोग में गिरावट को तेज कर सकता है।

हालांकि मांस-मुक्त यूरोप की ओर यह परिवर्तन रातोंरात नहीं होगा, लेकिन इसकी नींव पहले ही रखी जा चुकी है। सरकारें, व्यवसाय और उपभोक्ता एक स्थायी और नैतिक खाद्य प्रणाली के साझा दृष्टिकोण के इर्द-गिर्द एकजुट हो रहे हैं। 2050 तक, यह पूरी तरह संभव है कि मांस एक दुर्लभ वस्तु बन जाएगा, जिसे लोगों और ग्रह दोनों के लिए बेहतर पौधे-आधारित विकल्पों द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा।

यूरोप की शाकाहारी इंक़लाब सिर्फ एक प्रवृत्ति से अधिक है—यह भविष्य के भोजन की झलक है। जैसे-जैसे यह महाद्वीप मांस के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है, यह दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए एक उदाहरण स्थापित कर रहा है।

प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड का भेद-भाव भरा रवैया

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कई बार ऐसा लगता है कि Press Club of India और Editors guild of India जैसी संस्थाएं पत्रकारों के हित में आवाज उठाने का धर्म भूल गई हैं, इसीलिए स्टेटमेंट जारी करने से पहले चेक करती हैं कि पीड़ित पत्रकार उनके खेमे का है या नहीं! उनके खेमे का पत्रकार नहीं होने से, वे दो शब्द कहते भी नहीं पीड़ित के पक्ष में। ऐसे में इन दोनों संस्थाओं पर कैसे विश्वास किया जाए?

ऐसे दर्जनों मामले हैं, जहां पीड़ित पत्रकार के पक्ष में प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड ने चुप्पी साध ली क्योंकि पीड़ित पत्रकारों की विचारधारा उनके न्याय के अधिकार की लड़ाई के आड़े आ गई।

जब देश में राष्ट्रीयता में विश्वास रखने वाले सैकड़ों की संख्या में पत्रकार और बड़ी संख्या में संपादक हैं फिर इस दिशा में प्रयास करके दो मजबूत संगठन भी खड़े नहीं किए जा सकते क्या? ऐसे संगठन जिनसे यह विश्वास किया जा सके कि वो अपनी लड़ाई में अकेले पड़ गए पत्रकारों का साथ देंगे। आवश्यकता पड़ी तो उनके समर्थन में सड़क पर उतरेंगे। सोशल मीडिया पर अभियान चलाएंगे।

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वह संगठन ऐसा हो, जो पीड़ित को न्याय दिलाने के संघर्ष के दौरान अपने-पराये का भेद ना करे।

इस दिशा में एक बार सोचने का यह समय है!

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