क्या मोदी सरकार ने सिर्फ चुनाव के कारण तेल के दाम नहीं बढ़ाए?

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कर्नल मूल भार्गव

​कैनबरा ( ऑस्ट्रेलिया)। यह कहना कि तेल की कीमतों में स्थिरता केवल चुनावी रणनीति थी, पूरी तरह सत्य नहीं है। इसके पीछे आर्थिक और रणनीतिक कारण भी थे।

​1. सुदृढ़ अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार

​भारत के पास मौजूद मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और स्थिर अर्थव्यवस्था के कारण हम शुरुआत के कुछ सप्ताहों तक बाहरी दबाव को झेलने में सक्षम थे। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है: यदि किसी परिवार पर अचानक कोई वित्तीय संकट आए या नौकरी चली जाए, लेकिन उनके पास पर्याप्त ‘बैंक बैलेंस’ और बचत हो, तो वे तुरंत अपने खर्चों में कटौती नहीं करते। भारत ने भी अपनी बचत के दम पर शुरुआती झटकों को बखूबी प्रबंधित किया। लेकिन, यह व्यवस्था अनंत काल तक नहीं चल सकती; यदि संकट लंबा खिंचे, तो कटौती अनिवार्य हो जाती है।

​2. वैश्विक परिस्थितियों में अस्थायी सुधार

​जब चुनाव शुरू हुए, तब ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम हो रहा है। कच्चे तेल के दाम गिरने लगे थे और आपूर्ति बढ़ने के संकेत मिल रहे थे। उस समय पूरे विश्व में यह आशा जागी थी कि संकट टल गया है। ऐसे माहौल में तेल के दाम बढ़ाना न तो आर्थिक रूप से तर्कसंगत था और न ही राजनीतिक रूप से। हालांकि इसमें एक राजनीतिक पहलू भी रहा होगा, लेकिन वह मुख्य कारण नहीं था।

​3. वर्तमान संकट: युद्ध की वापसी

​पिछले एक सप्ताह में परिस्थितियां फिर से बदल गई हैं। युद्ध की आग दोबारा भड़क उठी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों में उछाल आया है और भारतीय रुपया कमजोर हुआ है। शांति की जो उम्मीद जगी थी, वह अब धूमिल हो चुकी है। स्पष्ट है कि यह स्थिति भारत के आंतरिक कारणों से नहीं, बल्कि वैश्विक उथल-पुथल का परिणाम है।

​4. अपरिहार्य कटौती और सरकार की भूमिका

​अब जबकि यह संकट लंबा खिंचता नजर आ रहा है और इसका कोई तत्काल अंत दिखाई नहीं देता, तब संसाधनों में कटौती करना अनिवार्य हो गया है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी की ‘कटौती और बचत’ की अपील बिल्कुल उचित है। हमें देश को एक गहरे आर्थिक संकट से बचाना होगा।
​”अर्थव्यवस्था कितनी भी मजबूत क्यों न हो, यदि तेल की आपूर्ति ही बाधित हो जाए, तो विकल्प सीमित हो जाते हैं।”

​5. नेतृत्व को पेश करना होगा उदाहरण

​इस त्याग की शुरुआत शीर्ष स्तर से होनी चाहिए। यदि सरकार, मंत्री और उच्च अधिकारी अपने खर्चों में कटौती कर एक उदाहरण पेश करें—जैसे हवाई यात्राओं और गाड़ियों के काफिलों में कमी—तभी सामान्य जनमानस को इसके लिए प्रेरित किया जा सकेगा।

​यह एक वैश्विक संकट है। वर्तमान में कोई भी देश ट्रंप या ईरान को नियंत्रित करने की स्थिति में नहीं है; पूरी दुनिया इस चुनौती से जूझ रही है। अब हमारे पास दो ही मार्ग हैं: या तो हम राजनीति में उलझकर देश का नुकसान करें, या फिर एकजुट होकर इस संकट का सामना करें। निर्णय हमारा है।

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस 2026 : पोखरण से डिजिटल तक भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारत के इतिहास में 11 मई 1998 का दिन वैज्ञानिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बनकर सामने आया था। राजस्थान के पोखरण में ‘ऑपरेशन शक्ति’ के तहत भारत ने पाँच सफल परमाणु परीक्षण कर दुनिया को यह संदेश दिया कि अब भारत परमाणु शक्ति संपन्न और तकनीकी रूप से सक्षम देश है। इसी ऐतिहासिक उपलब्धि की स्मृति में हर वर्ष 11 मई को “राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस” हम सभी मनाते हैं।

इस दिवस की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी, ताकि देश के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीशियनों के योगदान को सम्मान दिया जा सके। आज, 27 वर्षों बाद भारत की तकनीकी यात्रा पोखरण की रेत से निकलकर चंद्रमा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 5G नेटवर्क और डिजिटल भुगतान तक पहुँच चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा भी है कि “यह दिन वैज्ञानिकों के प्रति गर्व और आभार व्यक्त करने का अवसर है तथा आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ऐतिहासिक कदम की याद दिलाता है।”

चंद्रयान-3 : चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर भारत का परचम

भारत की तकनीकी क्षमता का सबसे बड़ा उदाहरण 23 अगस्त 2023 को देखने को मिला, जब Indian Space Research Organisation के चंद्रयान-3 मिशन ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग की। ऐसा करने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना। करीब ₹615-700 करोड़ की लागत वाले इस मिशन ने साबित किया कि भारतीय वैज्ञानिक सीमित संसाधनों में भी विश्वस्तरीय उपलब्धियाँ हासिल कर सकते हैं। इसके साथ भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद चंद्रमा पर सफल लैंडिंग करने वाला चौथा देश बन गया। इस चंद्रयान-3 ने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में नई पहचान दिलाई।

डिजिटल इंडिया और 5G

पिछले एक दशक में भारत ने डिजिटल क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, 2014 में देश में लगभग 25 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन थे, जबकि आज यह संख्या 100 करोड़ से अधिक हो चुकी है। देश के लगभग सभी जिलों में 5G नेटवर्क पहुँच चुका है और पांच लाख से अधिक 5G बेस स्टेशन कार्यरत हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े डेटा उपभोक्ता देशों में शामिल हो चुका है।

यही कारण है कि भारत में डिजिटल क्रांति का सबसे बड़ा प्रभाव गाँवों और छोटे शहरों में दिखाई देता है। किसान मोबाइल पर मौसम और फसल के दाम देख रहे हैं, विद्यार्थी ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं और छोटे व्यापारी डिजिटल माध्यम से कारोबार कर रहे हैं। तकनीक अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह आम नागरिक के जीवन का हिस्सा बन चुकी है।

UPI और डिजिटल भुगतान से हर हाथ में डिजिटल ताकत पहुंची

भारत की डिजिटल सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण Unified Payments Interface यानी UPI है। आज देश में प्रतिदिन करोड़ों डिजिटल लेनदेन हो रहे हैं। गाँव के छोटे दुकानदार से लेकर बड़े व्यापारियों तक, हर कोई UPI के जरिए भुगतान कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “UPI आज आसान उपयोग की वजह से दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया है।” भारत का यह डिजिटल भुगतान मॉडल अब कई देशों के लिए उदाहरण बन चुका है।

UPI ने न सिर्फ लेनदेन को आसान बनाया है, बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था को भी नई गति दी है। यह भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता और नवाचार की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है। इसके साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI भारत की नई तकनीकी शक्ति बनकर उभर रही है। अनुमान है कि जल्‍द ही भारत का AI उद्योग लगभग 28.8 बिलियन डॉलर तक पहुँच जाएगा। स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और प्रशासन में AI आधारित तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।

इसके साथ ही भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इको-सिस्टम बन चुका है। 2014 में जहाँ देश में करीब 100 स्टार्टअप थे, वहीं आज उनकी संख्या 2026 में देखें तो दो लाख से अधिक हो चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि यह “भारत में नवाचार की नई क्रांति” है। फिनटेक, हेल्थटेक और एग्रीटेक जैसे क्षेत्रों में भारतीय युवा वैश्विक स्तर पर नए समाधान विकसित कर रहे हैं। इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं।

नवाचार और अनुसंधान में बढ़ता भारत

भारत आज वैश्विक नवाचार सूचकांक में लगातार आगे बढ़ रहा है। पेटेंट आवेदन के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल हो चुका है। जहाँ पहले सालाना लगभग 4,000 पेटेंट दर्ज होते थे, वहीं अब यह संख्या 30,000 से अधिक हो गई है। हालाँकि अनुसंधान एवं विकास यानी R&D पर भारत का खर्च अभी GDP का केवल 0.64 प्रतिशत है, जो विकसित देशों की तुलना में कम है। फिर भी सरकार लगातार इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा रही है। यही निवेश भारत को भविष्य में क्वांटम टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर और डीप-टेक जैसे क्षेत्रों में मजबूत बनाएगा।

इस तरह से अनेक क्षेत्रों में आज का भारत तेजी से आगे बढ़ता हुआ दिखता है। भारत के नागरिकों के लिए राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस कहना चाहिए कि भारत की आत्मनिर्भरता, नवाचार और राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक है। 1998 के पोखरण परीक्षणों ने दुनिया को भारत की शक्ति दिखाई थी, जबकि आज का भारत अंतरिक्ष, डिजिटल तकनीक, AI और स्टार्टअप्स के माध्यम से वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है।

यह यात्रा उन लाखों वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और युवाओं की मेहनत का परिणाम है, जो देश को विकसित भारत बनाने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। हर साल आनेवाली यह दिनांक 11 मई हमें यह याद दिलाती है कि विज्ञान और तकनीक मानव जीवन में प्रगति लेकर तो आती ही है, साथ में एक राष्‍ट्र को विश्‍व समुदाय एवं अन्‍य राष्‍ट्रों के सामने शक्‍ति के रूप में भी स्‍थापित करती है। ऐसे में कहना यही है कि वर्तमान समय में जिसके पास जितनी उन्‍नत तकनीकि है, वह उतना ही शक्‍तिशाली देश है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस आज वर्तमान भारत के व‍िकास की गाथा कह रहा है।

Celebration of Europe Day 2026 – A Resounding Success

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New Delhi – The celebration of Europe Day this year unfolded as a vibrant and engaging tribute to the spirit of unity, cultural diversity, and shared values that define the European Union. The event titled ‘Europe in Motion’ was an initiative of EUNIC India organized by the cultural institutes and some embassies. Bringing together members of the diplomatic community, cultural practitioners, and distinguished guests, the event stood as a testament to the enduring and dynamic relationship between Europe and India.

Throughout the celebrations, Europe Day served as a platform to highlight Europe’s rich cultural diversity, shared democratic values, and collaborative spirit. The closing event at the Polish Embassy encapsulated these ideals, offering a fitting finale that blended cultural expression with diplomatic engagement.
The occasion was graced by the presence of eminent dignitaries, including Dr. Piotr Świtalski, Head of Mission of Poland, the Ambassador of Ukraine, Dr. Oleksandr Polishchuk, and the Ambassador of Lithuania, Diana Mickevičienė, also marked their presence, alongside the Deputy Ambassador of Ireland, Raymond Mullen, reflecting the strong and collective participation of European missions in India. The evening was further enriched by the presence of Ms. Małgorzata Wejsis-Gołębiak, Director of the Polish Institute in New Delhi and various other dignitaries.

The celebrations featured a lively array of activities that captured the essence of Europe’s cultural richness. A specially curated Europe Quiz engaged participants in an interactive exploration of the continent’s history, culture, and contemporary achievements, generating enthusiasm and friendly competition among attendees.

The atmosphere was further elevated by captivating musical performances, including a special showcase by acclaimed Polish music sensation Michał Rudaś, whose powerful and evocative rendition left the audience spellbound. Irish musicians added their distinctive energy to the evening, further enriching the cultural tapestry of the event.

A particularly memorable highlight was the spontaneous and spirited musical moment that brought together Ambassador Diana Mickevičienė, Ms. Małgorzata Wejsis-Gołębiak, and Michał Rudaś, as they joined voices to perform a traditional Polish wedding song. The performance carried a unique cross-cultural resonance, recalling the fascinating anecdote of how the melody of this very song is believed to have inspired a classic Bollywood number, after a film composer encountered it at a Polish wedding—an evocative reminder of the deep and often unexpected cultural exchanges between Europe and India.

Guests were also treated to a thoughtfully curated spread of European culinary delights, including an assortment of snacks, soups, and traditional delicacies that offered a taste of the continent’s rich gastronomic heritage. These elements combined to create an evening that was not only celebratory but also deeply immersive.

With the gracious presence of several Heads of Missions and distinguished guests, the evening fostered a spirit of camaraderie and mutual appreciation, perfectly embodying the ideals of unity in diversity.

The resounding success of this year’s Europe Day celebrations highlights the power of cultural diplomacy in bringing people together, strengthening partnerships, and deepening mutual understanding between Europe and India.

पश्चिम बंगाल ‘शपथ ग्रहण’ में प्रतीकों के ज़रिए वैचारिक संदेश

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कोलकाता । चाहे समाजनीति हो-राजनीति हो, याकि विचार-विमर्श हो। सबमें संकेतों और प्रतीकों के गहरे अर्थ होते हैं। प्रतीक भी अपने आप में दिशाबोध उद्घाटित करते हैं। कुछ ऐसा ही दृश्य पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के 9 मई 2026 को शपथग्रहण समारोह में देखने को मिला। भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रतीकों के माध्यम से कई संदेश दिए। अक्सर हम राजनीति की चर्चा करते हुए केवल गणितीय रूप में घटनाक्रमों, परिणामों का मूल्यांकन करते हैं। लेकिन प्रतीकों के माध्यम से ऐसा बहुत कुछ कहा जाता है। जो कई बार शब्दों में प्रकट नहीं हो पाता है। पश्चिम बंगाल के पूरे चुनावी प्रचार अभियान से लेकर शपथ ग्रहण समारोह तक ‘प्रतीकों’ ने बहुत कुछ सुस्पष्ट किया है। शपथ ग्रहण के दौरान कई ऐसे प्रतीक दिखे जो बहुत कुछ कह रहे हैं। पहला प्रतीक है — 25 ‘पच्चीसे बैसाख’ यानी गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की जयंती का अवसर। भाजपा ने शपथ ग्रहण के लिए इसी तारीख़ को चुना। क्योंकि बंगभूमि में जिस ‘सोनार बांग्ला’ का संकल्प भाजपा ने लिया है। वो राष्ट्रीयता का दिशाबोध गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की ‘स्व’ और ‘स्वदेशी’ की वैचारिकी से होकर ही जाएगा। ये अवसर यह भी बताने का निमित्त था कि- राष्ट्रीय अस्मिता और बांग्ला अस्मिता में कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही हैं।

दूसरा प्रतीक है- शपथग्रहण समारोह का स्थान। शपथग्रहण जिस जगह आयोजित हुआ वो है कलकत्ता का ‘बिग्रेड परेड मैदान’। जहां से कभी 16 अगस्त 1946 को बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री और क्रूर आतंक का पर्याय मुस्लिम लीग के नेता हुसैन सुहरावर्दी ने हिन्दुओं का नरसंहार कराया था। सुहरावर्दी ने भारत विभाजन वाले ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के क्रूर आतंक की शुरुआत की थी। उस दिन लाखों मुसलमानों की हत्यारी भीड़ ने बंगाल में रक्तपात की सीमाएं लांघ दी थी। हिन्दुओं का भीषण नरसंहार किया था। कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल को हिन्दुओं के ख़ून से लाल कर दिया। लेकिन अब स्वाधीनता के बाद जब पहली बार पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनी तो वहां हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। भाजपा ने जिस ब्रिगेड परेड मैदान’ का चयन किया— वो ये बता रहा कि – पश्चिम बंगाल में अब राष्ट्रीयता के पर्याय ‘हिन्दुत्व’ की सरकार है। यही बोध ही भाजपा सरकार के कार्यों में परिलक्षित होगा। यहां रक्तपात और हिंसा की कहीं कोई जगह नहीं है। पश्चिम बंगाल में वही दिखेग जो ‘वंदेमातरम्’ की राष्ट्रीय चेतना से प्रकट होता है।

तीसरा प्रतीक है — शपथ ग्रहण के मंच में बैकग्राउंड में लगे बैनर में निहित संदेश। बैकग्राउंड की तस्वीर में एक-एक तस्वीर अपने आप में बड़ी कहानी कहती है। बैकग्राउंड की तस्वीर में ‘शंख बजाती’ नारी शक्ति के ज़रिए ये बताया गया कि—पश्चिम बंगाल में शक्ति जागृत अवस्था में है। नारी जब शंखनाद कर रही है तो उसका अर्थ ही मङ्गल बेला का शुभारम्भ है। आरती करता हुआ पुरुष ; इस भाव में भी शक्ति की आराधना है। वहीं सबसे प्रखर संकेत है कालीघाट शक्तिपीठ जो 51 शक्तिपीठों में से एक महत्वपूर्ण शक्तिपीठ के तौर पर भी जाना जाता है। यह पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का सबसे सशक्त प्रतीक है। वहीं ‘धुनुची’ का चित्रण भी बंगभूमि की सांस्कृतिक पहचान में से एक है। जो शुद्धता और पवित्रता तथा भक्ति भाव का सर्वोच्च रूप है। दुर्गा पूजा में माँ दुर्गा के समक्ष धुनुची नृत्य करने की परंपरा है। इसके साथ ही माँ दुर्गा को असुर वध करते हुए दिखाया गया है। जो ये बता रहा है कि दानवदल भले कितने भी छद्म रूप धरे। जो समाज में विध्वंस फैलाता है। लोगों को दुःख देता है। उसका अन्त सुनिश्चित है। ये असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। जो पश्चिम बंगाल में साकार भी हुआ। वहीं ‘सिंदूर खेला’ का चित्रण – वो पारंपरिक प्रतीक है जो भारतीय संस्कृति में ‘शक्ति’ की उपासना के तौर पर जाना जाता है। इसमें भी मातृशक्ति ही केंद्र में होती है। पश्चिम बंगाल की सुप्रसिद्ध दुर्गा पूजा के समय जब विजयादशमी की तिथि को मां को विदाई दी जाती है। उससे ठीक पहले विवाहित महिलाएं एक दूसरे को सिंदूर लगाकर एक दूसरे के सुहागिन होने की कामना करती हैं।
ये पश्चिम बंगाल के जनजीवन में रचा बसा है। यानी पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने शपथग्रहण के साथ ही ये बता दिया कि- यहां के सांस्कृतिक वैशिष्ट्य और संगठित हिन्दू शक्ति के साथ ही आगे कार्य होंगे।इसी से दशा और दिशा निर्धारित होगी।

ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘विकास और विरासत के सम्मान’ के ध्येय का प्रतिबिंब है। चाहे पूरे चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत तमाम भाजपा नेताओं के सोशल मीडिया अकाउंट से ‘बांग्ला’ में संदेश देने की बात हो। याकि ये सभी प्रतीक। इनके पीछे का संदेश यही है कि हमारे भारत में ‘एकता की विविधता’ है। सभी परंपराएं, त्योहार, कलाएं, बोली-भाषा, वेश-भूषा सब हमारे अपने हैं। इनसे एकत्व प्रकट होता है। यही एकता ही भारत की शक्ति बनती है।

चौथा प्रतीक है — बीजेपी के बलिदानियों का मेमोरियल। शपथ ग्रहण स्थल पर भाजपा ने अपने उन तमाम कार्यकर्ताओं के नामों से जुड़ा मेमोरियल बनाया। जो भाजपा संगठन का विस्तार करते हुए टीएमसी, ममता बनर्जी सरकार की राजनीतिक हिंसा का शिकार हुए। ये बताया गया कि — भाजपा के लिए जिन्होंने जीवन न्योछावर कर दिया। उन बलिदानियों को भाजपा कभी नहीं भूलेगी। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बलिदानियों के परिवारों से मुलाक़ात की। उन्हें ये भरोसा दिलाया कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। न्याय होगा। कोई अपराध बख़्शे नहीं जाएंगे। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा—
“बंगाल में भाजपा को शून्य से शिखर तक पहुँचाने की यात्रा में अपने प्राणों की आहुति देने वाले कार्यकर्ताओं की पावन स्मृति में बना यह मेमोरियल, शपथ ग्रहण स्थल पर उपस्थित हर कार्यकर्ता के हृदय में भावनाओं का ज्वार उत्पन्न कर रहा है।उन पुण्यात्माओं का त्याग, संघर्ष और बलिदान आज सार्थक होने जा रहा है।
राष्ट्र और संगठन के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने वाले उन सभी हुतात्माओं को कोटि-कोटि नमन।”

पांचवां प्रतीक अपनी जड़ों से जुड़े रहना—

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शपथ ग्रहण के मंच पर
माखनलाल सरकार के पांव छूकर उनका सम्मान किया। आत्मीयता और श्रद्धा के साथ उनसे गले मिले। माखनलाल जैसे तपस्वी साधकों का सम्मान अपने विचार के प्रति समर्पण और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है। सिलीगुड़ी के रहने वाले 98 वर्षीय माखनलाल सरकार जनसंघ-भाजपा के उन शुरुआती लोगों में से हैं जिन्होंने विचारधारा के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया।वो जनसंघ के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी रहे। श्यामा प्रसाद
मुखर्जी जी ने जब – “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे”; के नारे के साथ जम्मू-कश्मीर में तिरंगा यात्रा के लिए निकले तो माखनलाल सरकार उनके साथ बढ़ चले।गिरफ्तारी दी। जेल की निर्मम यातना सही। आगे चलकर जब 1980 में भाजपा का गठन हुआ तो संगठन को मजबूत करने में माखनलाल सरकार ने बड़ी भूमिका निभाई। पश्चिम बंगाल में भाजपा की पौध को सींचा। संगठन को खड़ा किया। प्रतिकूल परिस्थितियों में अडिग रहे। सालों के संघर्ष के बाद जब पश्चिम बंगाल में 2026 में ‘कमल’ खिला तो प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अपने नींव के पत्थर को नहीं भूली। शपथ ग्रहण समारोह की अग्रिम पंक्ति में माखनलाल सरकार को आदरपूर्वक को स्थान दिया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने माखनलाल सरकार के चरण स्पर्श कर ये बता दिया कि – विचार के प्रति अनन्य समर्पण क्या होता है। आजकल लोग जब थोड़े में बौरा जाते हैं। उस समय नरेन्द्र मोदी जैसे तपस्वी राजर्षि बताते हैं कि भारत का मूल चिंतन और आदर्श क्या है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तपोभूमि यही सिखाती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उसी तपशाला में तपे हैं। संघ राष्ट्र और समाज के प्रति अनन्य और असंदिग्ध समर्पण सिखाता है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चरितार्थ किया है।

छठवां प्रतीक —जनता ही जनार्दन है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र जब शपथ ग्रहण के दौरान मंच पर पहुंचे तो उन्होंने पहले हाथ हिलाकर वहां मौजूद जनमानस का अभिवादन किया। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनादेश और विश्वास के लिए सबको नतमस्तक होकर प्रणाम किया। ये कोई सामान्य बात नहीं है। शिखर पर होकर इतना विनम्र होना। धन्यता का अनुभव करना‌। ये वही करता है जो राष्ट्र में जागृत देवता देखता है। उपासना करता है। वैसे भी भारत के लोकतान्त्रिक इतिहास में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर वो लीक तोड़ी है। जो जनप्रतिनिधियों को जनता से दूर करती थी। सन् 2014 में संसद में प्रवेश के साथ साष्टांग प्रणाम करना हो। याकि प्रयागराज कुंभ में सफाईकर्मियों के पांव धुलने, उन्हें चप्पल पहनाने का भाव हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐसे अनेकों अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। जो ये बताता है कि उनकी दृष्टि में जनता ही जनार्दन है। कहने का आशय ये कि प्रतीकों के ज़रिए लोक से जुड़ने, उनके साथ समानुभूति स्थापित करने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा का कोई तोड़ नहीं है। इसके पीछे की मंशा केवल राजनीतिक पकड़ मज़बूत स्थापित करना नहीं है। बल्कि ये एकात्म स्थापित करने का बोध है। ये पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानवदर्शन’ और ‘अंत्योदय’ के प्रयोगधर्मी- विचार का प्रतिपादन है। जो वैचारिकी के दिशाबोध को निरूपित करता है।

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