विहिप संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन ने भारतीय भाषाओं और राष्ट्रचेतना के संवर्धन पर दिया बल

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संजीव

दिल्ली । न्याय भाषा भारती’ के तत्वावधान में दिल्ली उच्च न्यायालय (एस-ब्लॉक, 6वीं मंजिल स्थित लाउंज) में “भाषा का सम्मान, राष्ट्र का गौरव” के केंद्रीय भाव के साथ ‘हिंदी दिवस एवं वंदे मातरम् सम्मान समारोह’ गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। इस अवसर पर विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि दिल्ली सरकार के कानून मंत्री श्री कपिल मिश्रा ने मुख्य अतिथि के रूप में सहभागिता की। कार्यक्रम में विहिप, इंद्रप्रस्थ के प्रांत संगठन मंत्री श्री सुबोध चंद्र की भी विशेष गरिमामयी उपस्थिति रही।

समारोह को संबोधित करते हुए विहिप के संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन ने भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक गौरव को रेखांकित करते हुए कहा कि हिंदी केवल अभिव्यक्ति या संवाद का माध्यम मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारी अस्मिता, समृद्ध संस्कृति और राष्ट्रीय एकता की सुदृढ़ शक्ति है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश की न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र में जनसामान्य की भाषा को गौरवपूर्ण स्थान मिलना स्वाभिमान तथा सुलभ न्याय, दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत आवश्यक है। इसके साथ ही उन्होंने मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव जगाने वाले अमर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह प्रत्येक देशवासी के भीतर राष्ट्रभक्ति और गौरव का संचार करता है।

समारोह में न्याय, विधि, धर्म और सामाजिक क्षेत्र के अनेक गणमान्य व्यक्तित्व उपस्थित रहे, जिनमें भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) श्री चेतन शर्मा , सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष व वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रदीप राय, अखिल भारतीय संत समिति के आचार्य शुभैन शर्मा , अधिवक्ता परिषद दिल्ली के प्रांत अध्यक्ष अधिवक्ता संजय पोद्दार एवं अधिवक्ता फैज़ल ख़ान प्रमुख रहे। इस सफल आयोजन में न्याय भाषा भारती के मार्गदर्शक श्री कामेश्वर नाथ मिश्र , अध्यक्ष डॉ. प्रदीप शर्मा , संयोजक श्री संतोष कुमार राउत , महामंत्री श्री माधव कृष्ण दुबे तथा संचालिका सुश्री विधि गुप्ता की सक्रिय भूमिका रही। कार्यक्रम का समापन राष्ट्र वंदना और सामूहिक ‘वंदे मातरम्’ के उद्घोष के साथ हुआ।

सुदर्शन का हिंदी स्वप्न: ज्ञान की भाषा को व्यवस्था की चुनौती

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल। भारतीय चेतना को उसकी भाषाओं से अलग करके नहीं समझा जा सकता। जिस देश ने हजारों वर्षों से अपनी ज्ञान परंपरा संस्कृत, प्राकृत, पालि और देशज भाषाओं में विकसित की, वहां आधुनिक भारत में ज्ञान-विज्ञान, चिकित्सा, तकनीक और उच्च शिक्षा का सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी भाषा के सहारे आगे बढ़ा। स्वतंत्रता के बाद भी अंग्रेजी उच्च शिक्षा और रोजगार की सीढ़ी बनी रही। ऐसे समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुप्‍प सी सुदर्शनजी ने एक ऐसा सपना देखा, जोकि सिर्फ हिंदी के विस्तार का स्‍वप्‍न न होकर इससे कहीं आगे भारतीय प्रतिभा को ज्ञान अर्जित करने के लिए विदेशी भाषा की बाध्यता से मुक्त करने का आग्रह है। वे चाहते थे कि भारत की अपनी भाषाओं में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की दुनिया खड़ी की जाए।

सुदर्शनजी की दृष्टि में भाषा संवाद का माध्यम होने के अलावा विचार की स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और मौलिक चिंतन का आधार है। उनका मानना था कि जब कोई विद्यार्थी अपनी सहज भाषा में विज्ञान, तकनीक या चिकित्सा को समझता है, तब उसके भीतर प्रश्न पूछने, प्रयोग करने और नए विचार गढ़ने की क्षमता अधिक स्वाभाविक ढंग से विकसित हो सकती है। इसी विचार का एक संस्थागत रूप भोपाल में स्थापित अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय के रूप में सामने आया।

19 दिसंबर 2011 को इस विश्वविद्यालय की स्थापना बड़े उद्देश्य के साथ हुई। कल्पना यह थी कि हिंदी में इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, प्रबंधन और दूसरे आधुनिक विषयों की उच्च शिक्षा उपलब्ध होगी। यह प्रयोग अपने भीतर एक बड़े भाषायी स्वाभिमान का विचार समेटे हुए था। सवाल था कि क्या हिंदी सिर्फ साहित्य और सामान्य शिक्षा की भाषा रहेगी या वह प्रयोगशाला, अस्पताल, इंजीनियरिंग संस्थान और आधुनिक उद्योग की भाषा भी बन सकेगी?

डेढ़ दशक के आसपास की यात्रा के बाद आज इसी सवाल के सामने विश्वविद्यालय की स्थिति गंभीर चिंता पैदा करती है। 4,280 स्वीकृत सीटों वाले संस्थान में महज 234 विद्यार्थियों का प्रवेश होना और एमए हिंदी जैसे मूल पाठ्यक्रम में एक विद्यार्थी का दाखिला होना उस संकट की गहराई बताता है, जिसकी कल्पना कभी स्‍वयं सुदर्शनजी ने भी निश्चित रूप से नहीं की होगी। लगभग 68 पाठ्यक्रमों में सात प्रमुख तकनीकी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश का आंकड़ा शून्य रहना भी संकेत देता है कि विचार बड़ा था, पर उसके अनुरूप संस्थागत तैयारी नहीं हो सकी।

यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हिंदी की क्षमता के अलावा व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है। विद्यार्थी यह देखता है कि हिंदी माध्यम से डिग्री लेने के बाद उसका भविष्य क्या होगा। यदि तकनीकी शिक्षा हिंदी में प्राप्त करने के बाद रोजगार बाजार में अंग्रेजी की अनिवार्यता उसके सामने खड़ी हो जाती है, तो वह स्वाभाविक रूप से जोखिम लेने से बचता है। भाषा के प्रति भावनात्मक आग्रह रोजगार की निश्चितता का विकल्प नहीं बन सकता। सुदर्शनजी के स्वप्न को सफल बनाने के लिए हिंदी शिक्षा के साथ हिंदी में रोजगार का भरोसा भी पैदा करना होना चाहिए था, पर प्रशासनिक व्‍यवस्‍था को जो इस दिशा में करना चाहिए था, दुर्भाग्‍य से वह आज तक मध्‍य प्रदेश के भाषायी रूप से हिन्‍दी प्रदेश होने के बाद भी आज तक संभव नहीं हो पाया है।

तकनीकि शिक्षा की तरह ही यह संकट हिंदी माध्यम एमबीबीएस के प्रयोग में भी दिखाई दे रहा है। मध्य प्रदेश ने लगभग तीन वर्ष पहले मेडिकल शिक्षा में अंग्रेजी के विकल्प के रूप में हिंदी को स्थापित करने का महत्वाकांक्षी अभियान शुरू किया। लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च कर 50 हजार हिंदी मेडिकल पुस्तकें छापी गईं। 16 विषयों की पुस्तकों का अनुवाद 300 से अधिक डॉक्टरों की टीम ने किया। अनुवाद, मुद्रण और मंदार केंद्रों पर करोड़ों रुपये खर्च हुए। आरंभिक दौर में मुख्यमंत्री और मंत्री स्तर पर अनेक समीक्षा बैठकें हुईं। विद्यार्थियों से संवाद हुआ और इस अभियान से जुड़े लोगों को सम्मानित भी किया गया।

फिर भी आज तस्वीर का दूसरा पक्ष सामने है। अनेक केंद्रों पर ताले की स्थिति, हिंदी पुस्तकों का स्टोर में पड़े रहना, लंबे समय से कार्यसमिति की बैठक न होना और हिंदी प्रकोष्ठ के लिए स्वतंत्र बजट का अभाव यह बताता है कि किसी बड़े भाषायी अभियान को किताबें प्रकाशित करके सफल नहीं बनाया जा सकता, उसके लिए राजनीतिक इच्‍छा शक्‍ति भी चाहिए, जोकि सिर्फ बोलने से व्‍यवहार में यानी कि जमीन पर नहीं उतरनेवाली है।

सबसे गंभीर प्रश्न विद्यार्थियों के भरोसे का है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों में प्रश्न-पत्र उपलब्ध होने के बावजूद पिछले तीन वर्षों में किसी विद्यार्थी द्वारा हिंदी में परीक्षा नहीं लिखना अपने आप में बड़ा संकेत है। विद्यार्थियों के बीच यह धारणा बन जाना कि हिंदी में उत्तर लिखने पर कम अंक मिल सकते हैं या शून्य अंक का खतरा हो सकता है, पूरे अभियान की बुनियादी कमजोरी को सामने लाता है। जब तक परीक्षा, मूल्यांकन, शिक्षक प्रशिक्षण और प्रशासनिक व्यवस्था हिंदी माध्यम के विद्यार्थी को बराबर का भरोसा नहीं देती, तब तक पुस्तकें अलमारियों से निकलकर कक्षा और परीक्षा कक्ष तक नहीं पहुंचेंगी।

वस्‍तुत: यहीं पर सुदर्शन जी के स्वप्न को राज्‍य में मिट्टी में मिलता हुआ हम देखते हैं। क्या हिंदी में ज्ञान संभव है? इसका उत्तर आज विज्ञान और तकनीकी पुस्तकों के हुए अनुवाद दे चुके हैं। प्रश्न अब यह है कि क्या हिंदी में ज्ञान की ऐसी संपूर्ण व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिसमें विद्यार्थी पढ़े, परीक्षा दे, शोध करे और अंततः रोजगार भी पाए?

अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय को इसी व्यापक मिशन का राष्ट्रीय केंद्र बनाया जा सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मातृभाषाओं में उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण आधार देती है। मध्य प्रदेश में हिंदी माध्यम एमबीबीएस का प्रयोग पहले ही हो चुका है। ऐसे में भोपाल स्थित विश्वविद्यालय को हिंदी तकनीकी शब्दावली, उच्च स्तरीय पाठ्यसामग्री, डिजिटल अध्ययन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद और भारतीय भाषाओं में शोध का केंद्रीय केंद्र बनाया जा सकता है।

इसके लिए स्थायी और योग्य प्राध्यापकों की नियुक्ति, आधुनिक प्रयोगशालाओं की स्थापना, देश के प्रमुख तकनीकी और चिकित्सा संस्थानों से अकादमिक साझेदारी तथा हिंदी माध्यम विद्यार्थियों के लिए रोजगार की ठोस व्यवस्था आवश्यक होगी। सरकार को उद्योग जगत के साथ संवाद कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हिंदी माध्यम से पढ़े विद्यार्थी डिग्री लेकर स्‍थायी रोजगार प्राप्‍त करेंगे। क्‍योंकि तकनीकी दक्षता को भाषा के आधार पर रोजगार से वंचित करना भी उतना ही अनुचित है जितना भाषा के नाम पर गुणवत्ता से समझौता करना।

यहां ध्‍यान रहे, सुदर्शनजी का सपना हिंदी को अंग्रेजी या किसी अन्‍य भाषा के विरुद्ध खड़ा करना कभी नहीं रहा, उनका सपना यह था कि भारतीय विद्यार्थी अपनी भाषा में आधुनिक विश्व का ज्ञान हासिल कर सके और अपनी मौलिक प्रतिभा को विकसित कर सके। इस दृष्टि से हिंदी और अंग्रेजी को संघर्ष की दो सेनाओं की तरह देखने के बजाय ज्ञान के दो माध्यमों के रूप में देखना होगा। विद्यार्थी जितनी भाषाएं जाने, उतना अच्छा; पर अपनी भाषा में ज्ञान पाने का अवसर उससे छीन लिया जाए, यह स्वीकार्य स्थिति नहीं होनी चाहिए।

आज अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय और हिंदी माध्यम एमबीबीएस अभियान दोनों एक ही संदेश दे रहे हैं। शासन और प्रशासन भी इस बात को समझें कि भाषा का सपना घोषणाओं से साकार नहीं होता, उसके लिए किताब चाहिए, शिक्षक चाहिए, प्रयोगशाला चाहिए, परीक्षा व्यवस्था चाहिए, शोध चाहिए और सबसे बढ़कर रोजगार का भरोसा चाहिए।

ऐसे में कहना यही है कि सुदर्शनजी ने जिस भाषायी स्वाभिमान का सपना देखा था, वह आज भी प्रासंगिक है। चुनौती यह है कि उस स्वप्न को स्मारक बनने से बचाया जाए। यदि मध्य प्रदेश सरकार इस अवसर को व्यापक नीति में बदल सके, तो भोपाल का हिंदी विश्वविद्यालय भारतीय भाषाओं में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की नई यात्रा का राष्ट्रीय केंद्र बन सकता है। अन्यथा खतरा यही है कि सुदर्शनजी का जीवंत स्वप्न धीरे-धीरे फाइलों, पुस्तकों और सरकारी घोषणाओं में बंद होकर रह जाएगा।अब सब कुछ व्यवस्था की इच्छाशक्ति पर आकर टिक गया है।

सुदर्शनजी का योगमय जीवन

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डॉ. मोहन भागवत

पू. सुदर्शनजी को कृतिरूप श्रद्धांजलि अर्पित की जायेगी।

नागपुर : पूजनीय सुदर्शनजी के नाम के पीछे स्वर्गीय लगाने की आदत होने में बहुत समय लगेगा। उनके सान्निध्य में जितने लोग आये हैं, वे उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। और सुदर्शनजी का जाना इतना अचानक हो गया कि वे अब नहीं हैं, इसकी भी आदत करनी पड़ेगी। ये तो मेरा भाग्य है कि उन्होंने मुझे सरसंघचालक बनाया और वे मेरे लिए उपलब्ध रहे, इसलिये इस पद का गुरुभार सिर पर आने पर भी मैं आश्वस्त था, निश्चिंत था कि कुछ कठिनाई आ गई तो फोन करके पूछ लेंगे। कल मिल लेंगे। परंतु वे अब हमारे बीच नहीं हैं। इस वज्रपात से अब थोड़ा-थोड़ा संभलने लगे हैं, तब हममें से किसी-किसी को यह भी स्मरण में आता है कि कैसे कुछ मास पूर्व से एक-एक परिचित व्यक्ति व परिवार को मिलकर आने का क्रम उन्होंने बनाया था। वे अपनी आयु ९२ वर्ष तक रहेगी, ऐसा कहते थे, यह भी सत्य है। किसी भी संकल्प को धारण करते ही उसको अवश्य सफल कर सकने का आत्मविश्वास उनके मन में स्वयं ही भर जाता था। लगभग एक वर्ष पहले तिनसुकिया (असम) में प्रांत प्रचारकों की बैठक समाप्त कर बहुत सारे तरुण बंधुओं के साथ वे भी परशुराम कुंड की यात्रा करने गये। उनके स्वास्थ्य व आयु को ध्यान में रखकर सभी ने उनको कुंड के शीतल जल में स्नान करने का तथा इस प्रकार कुंड से मंदिर तक की दीर्घ, खड़ी चढ़ाई टालने का अनुरोध किया था। वहाँ पहुँचकर कई तरुण कुंड में न उतरते, सीधे मंदिर दर्शन कर वापस हुए, परंतु सुदर्शनजी ने ३०० फीट गहरी खाई में स्थित कुंड के वेगवान तथा हड्डी में कंपकंपी भर देनेवाले शीतल जल में उतरकर डुबकी लगाई, फिर खड़ी चढ़ाई चढ़कर ऊपर मंदिर में दर्शन किया व सहज रूप से तैयार खड़े वाहन में आकर बैठ गये। उनकी इस निर्भयता व अदम्य आत्मविश्वास को नियति केवल इस बार ही प्रथम व आखिरी बार ठग पाई।

वे चंद्रपुर के ज्युबिली हाईस्कूल से शालांत परीक्षा उत्तम रीति से उत्तीर्ण कर चुके थे। मेरा अनुमान है कि चंद्रपुर के वास्तव्य में उनका हमारे घर में आना-जाना रहा ही होगा। मैं आयु में बहुत छोटा था। कभी हमारे घर में चर्चा निकली कि एक सुदर्शन मेरिट में आये थे, जो अब प्रांत प्रचारक बन गये। पिताजी ने मुझे कहा, ‘देखो, अच्छा पढ़ो-लिखो और प्रचारक हो जाओ। प्रचारक बन जायें तो भी पढ़ने-लिखने में अच्छा होना आवश्यक है।’ उस समय मैं बालक था। सोचा, होंगे कोई सुदर्शन!

उन्हें देखने का प्रथम अवसर मुझे १९७१ में प्राप्त हुआ। उत्कल प्रांत में घोष सिखाने के लिए मुझे शिक्षक के रूप में भेजा गया। मैं नागपुर में वेटरनरी कॉलेज में प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था। तो गर्मी की छुट्टी में संघ शिक्षा वर्ग के समय घोष शिक्षक के नाते मुझे उत्कल प्रांत के वर्ग में भेजा गया। उस समय तक मैं संघ का कार्यकर्ता बन चुका था। इसलिये अपने शारीरिक प्रमुख सुदर्शनजी हैं, इतना तो पता था, परंतु देखा कभी नहीं था। उन्हें देखते ही किसी के मन में सबसे पहले जिस चीज की छाप पड़ती थी, वह है उनकी प्रतिभा। उनका ज्ञानयोग, जिसे सब जानते हैं। दुनिया में जहाँ-जहाँ वे गये, उनका ज्ञानयोग प्रसिद्ध है। कितने विषयों के वे ज्ञाता थे। कितनी सारी बातें वे जल्दी पकड़ लेते थे। कितना गहन अध्ययन करते थे। इसी कारण अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। वहाँ पर वर्ग में आये तब वे शारीरिक प्रमुख थे, तो शारीरिक प्रमुख की बिल्कुल छोटी-छोटी बारीकियाँ, उसे किस ढंग से सिखाना चाहिए, इसके नये-नये गुर, स्वयं द्वारा किये गए प्रयोग, कोई भी शारीरिक कृति वैसी ही क्यों करनी है आदि बातें तर्कपूर्वक बारीकियों में जाकर समझाते व कराते थे। वैसे, शारीरिक विभाग तो एकदम सरल विभाग है, यानी आज्ञा मिली और उसका पालन करो। ‘ऐसा क्यों करना है?’… पूछना नहीं पड़ता। वहाँ ये समझाने की आवश्यकता नहीं रहती। लेकिन वे समझाते थे कि इसके पीछे तर्क है, अनुभव है, इस कारण ऐसा करना है, तो करनेवाला मन में विश्वास लेकर अभ्यास करता था। शारीरिक में भी उनका इतना गहरा चिंतन था। ये दंड कैसे घूमेगा तो हवा में आवाज आयेगी, लेकिन दंड नहीं लगेगा और वह बिना आवाज की लाठी। जैसे भगवान की होती है- के जैसे, कैसे घुमाना कि जहाँ लगेगा वहाँ तोड़ देगा, ऐसी कई सूक्ष्म बातें वे बताते थे। एक सामान्य विषय को सिखाने के बारे में उन्होंने कितना परिश्रमपूर्वक सोचा होगा, इसकी कल्पना हम कर सकते हैं।

असम में भेजा तो असम के विषय में अध्ययन करके उन्होंने जो-जो बातें मार्गदर्शक के रूप में बतायीं, वह आज भी हमारे लिए दिशादर्शक हैं। किसी भी समस्या के मूल में जाकर उसका अध्ययन करना, उनका स्वभाव था। जब वे बौद्धिक प्रमुख बनें, तब उन्हें एक विषय रखना था कि सांस्कृतिक आक्रमण कैसे हो रहा है, इतिहास को किस प्रकार बिगाड़ा जा रहा है? इसके अध्ययन के लिए वे चेन्नई गये। वहाँ के सरकारी ग्रंथालय/लाइब्रेरी में बैठकर उस समय के सारे कागज-पत्र निकालकर उसका अध्ययन किया। और बड़े तर्क के साथ उदाहरण सहित एक घंटे का भाषण दिया। प्रत्येक विषय में वे ऐसा करते थे। उनके अनथक परिश्रम के कारण सभी मामलों में उनकी अद्भुत प्रतिभा दिखती थी।

पंजाब के विषय में उन्होंने जो अध्ययन किया, उसके कारण कितने ही सिख विद्वानों से उन्होंने चर्चा की, उनसे विषय समझ लिया। सब प्रकार के सिखी से संबंधित ग्रंथ और उनका इतिहास समझ लिया। गुरुवाणी का अध्ययन किया। उसका अर्थ, जो वे समझते थे वैसा है कि नहीं, यह जानने के लिए अधिकृत व्यक्तियों से मिले और उनसे गुरुवाणी का अर्थ ठीक तरह से समझ लिया। यह पूजनीय सुदर्शनजी की ज्ञानयोग की प्रतिभा थी। इसके पीछे बहुत बड़ा परिश्रम था।

उनका हर विषय में पारंगत होना, अधिक गति से अनेक विषयों को समझ लेना, यह सबके लिए साध्य नहीं है। लेकिन जिनको साध्य करना है, वे उनके कार्य-परिश्रम को देखकर सीख सकते हैं। इसके लिए मा. बाळासाहेब अंग्रेजी में कहते थे- “10% Inspiration and 90% Perspiration.” उत्कल के उस वर्ग में उन्होंने शारीरिक की छोटी-छोटी बातें हमें बतायीं। तब वे कितना परिश्रम करते हैं, यह ध्यान में आया। वे सुबह ३ बजे हमारा वर्ग लेते थे। ३ से ४.४५ तक संघस्थान पर अभ्यास चलता था। संघस्थान ७.३० बजे समाप्त होता था। सायं संघस्थान के पहले वर्ग हो नहीं सकता था, तो बाद में वर्ग लेते थे, यानी दिन में वे ४ घंटे हमें सिखाते थे। और उनका सिखाना यानी सतत परिश्रम ही था। उन २-४ घंटों में हम लोगों को साँस लेने की भी फुरसत नहीं मिलती थी! लेकिन सुबह ३ बजे जब वे आते थे, तो अपना स्नान, ध्यान और स्वयं का व्यायाम करके पूरी तैयारी के साथ। इस बात से पता चलता है कि वे कितने बजे उठते थे और रात्रि के कार्यक्रम में भी उपस्थित रहते थे, यह उनकी विशेषता थी। अपने शरीर को कार्य के लिये आग्रहपूर्वक चलाने की उनकी क्षमता बड़ी अद्भुत थी।

आराम करना है तो आराम भी कर सकते थे। एक बार उनके जीवन का प्रसंग हमने पढ़ा है- गुरुजी प्रवास पर जा रहे थे, उस समय वे प्रांत प्रचारक थे। उस भागदौड़ में उन्होंने खूब परिश्रम किया। शायद १-२ रात उनकी नींद नहीं हुई और एक जगह भोजन करके निकल जाना था। थोड़ा सुस्ता गये तो सो गये। जाने का समय हो गया तो गुरुजी ने कहा- ‘सुदर्शन सो रहा है, उसको मत जगाओ।’ सुदर्शनजी रातभर सोये रहे और दूसरे दिन वे फिर चले गये। इस प्रकार वे सो भी सकते थे, लेकिन कार्य करने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। अपने शरीर को वे कैसे चलाते थे, पता नहीं! उनके पैरों में खुजली होती थी। डॉ. विलास डांगरे से उन्होंने दवाई ली। डॉ. साहब ने कहा- ‘आप प्रवास पर जा रहे हैं। ये थोड़ा एग्रीवेशन करता है। होमियोपैथी की दवाई है।’ यह कुछ ज्यादा पोटेन्सी की थी। शायद २००। उन्होंने कहा- ‘दे दीजिए। मैं देख लूँगा।’ वह दवाई उन्होंने ली और वे प्रवास के लिए निकल गए।

आगे के चार माह उन्हें भयंकर कष्ट हुआ। हाथ-पैर पर फफोले आ गए। हर दो घंटे के बाद गरम पानी से स्नान करना पड़ता था। दिन में चार बार पट्टियाँ बदलनी पड़ती थीं। परंतु प्रवास का एक भी कार्यक्रम उन्होंने रद्द नहीं किया। वे कहते थे- ‘वो अपना काम कर रहा है और ये तो रोग नहीं है, ये उसका उपचार चल रहा है।’

मैंने कहा- ‘अरे भई, आपको इतना कष्ट?…’

‘कष्ट क्या? मैं अपने सब काम कर रहा हूँ। कुछ दिखता है क्या कष्ट आपको?’ – उन्होंने कहा।

‘लेकिन हो रहा है ना?’ मैंने कहा।

उन्होंने कहा, ‘हो रहा है तो मैं सहन कर लूँगा। आप इसकी चिंता न करें।’ कितना कष्ट वे सहन करते थे! उनका व्यायाम व दो समय की संध्या का नियम जीवन के अंतिम दिन तक चलता रहा। रेलगाड़ी से सतत् यात्रा भी उस नियम में बाधा नहीं बन सकी। अपवाद, हृदयाघात के बाद स्वास्थ्य लाभ के लिए दो महीनों का रहा।

उनके ज्ञानयोग के पीछे था उनका कर्मयोग और उनके पास भक्तियोग भी था। बच्चों में कैसे वे घुल-मिल जाते थे, कैसी कहानियाँ बताते थे! स्वयंसेवक के प्रति कितना स्नेहभाव उनमें था! ये बहुत कम लोगों को मालूम था, क्योंकि वे दिखाते नहीं थे। यह दिखाने की बात थी भी नहीं। लेकिन सहज रूप से, वे इसे सबके सामने प्रकट नहीं होने देते थे।

एक प्रचारक रोग से पीड़ित थे। दुर्भाग्य से वह बच नहीं सके, उनका देहांत हो गया। तब हम लातूर में थे। वहाँ बैठक के दौरान यह समाचार प्राप्त हुआ। अब किसी को तो इस दु:खद क्षण में सांत्वना देने जाना ही था। तो जाने के लिये जिनको फ्री कर सकते थे, वे सुदर्शनजी ही थे। सरसंघचालक थे, अभिभावक के नाते उनका जाना ठीक भी था। तो उनको जाना है, ये तय करके हमने उनको दु:खद समाचार बताया। २ घंटे बाद बाय रोड स्टेशन पर जाना था। अत: सारी व्यवस्था हो गयी। थोड़ी देर के बाद उनकी तैयारी हुई कि नहीं, ये देखने के लिये हमारे सहसरकार्यवाहजी गये, तो उन्होंने देखा, खिड़की के सामने सुदर्शनजी बाहर मुँह करके खड़े हैं, दूर आकाश की ओर देख रहे हैं और उनकी आँखों से अश्रुपात हो रहा है। अब सहसरकार्यवाह सुदर्शनजी के साथ एक ही कार्यालय में रह चुके थे। उनको भी पता नहीं था कि सुदर्शनजी के मन में इतनी कोमलता है। वे जहाँ-जहाँ गये, वहाँ अपनी छाप छोड़ गए। उनका परिश्रम, उनका आग्रह, छोटी-छोटी बातों को ठीक करने की उनकी जिद संघ में सर्वत्र परिचित है। बाहर थोड़ी-बहुत सबको मालूम है। लेकिन उनके जीवन के एक प्रसंग से संघ के स्वयंसेवक अनभिज्ञ हैं।

एक रात वे प्रवास से आये। तब ९ बजे थे। आने के बाद उन्हें एक साधारण कागज में छपा हुआ विवाह का निमंत्रण मिला। उसी रात को विवाह था। किसी सरकारी ऑफिस के चौकीदार के घर पर विवाह था। उस चौकीदार का एक सरकारी ऑफिस के आहाते में ही एक छोटा-सा १५ बाय १२ फीट का कमरा था। यहीं उसका पूरा परिवार रहता था। वहीं विवाह होना था। उस घर का एक बालक शाखा में आता था। इस नाते पत्रिका शाखा के माध्यम से कार्यालय तक आयी। पत्रिका देखते ही सुदर्शनजी ने सबको तुरंत तैयार किया। सबने सोचा कि कल जायेंगे, अभी-अभी तो आये हैं प्रवास से। पर उन्होंने कहा, विवाह में बुलाया है, हमें आज ही जाना चाहिये। और सब विवाह स्थल के लिए निकल गये। आर्थिक दृष्टि से गरीब आदमी का विवाह था। जमाई जिस घर का था, वह भी गरीब। तो बहुत ज्यादा कुछ नहीं था। ढंग का पंडित भी नहीं था। बारात आनेवाली थी। १५-२० लोग आयेंगे, लड़की को ले जायेंगे। कोई ज्यादा विधि वगैरह नहीं था। सुदर्शनजी वहाँ पहुँच गये। पहुँचने पर देखा छोटा-सा घर है, कुछ मेहमान थोड़े-बहुत आये हैं, सब वहीं हैं। वहाँ बहुत गंदगी फैली है। उन्होंने सबको उठाया। ये अधिकार भी उनका रहता था। किसी को पराया नहीं मानते थे। इसलिये किसी को कुछ भी कहते थे और कराते भी थे। सबको उठाया वहाँ से। ‘चलो। चलो। सफाई करो’- ऐसा कहते हुए स्वयं हाथ में झाड़ू लेकर सफाई में जुट गए। लोगों को भी इस सफाई के कार्य में लगना ही पड़ा। आँगन-वाँगन साफ किया। इतने में रात के १२ बज गए और बारात आ गयी। फिर वर के स्नान की विधि अभी बाकी थी। उन्होंने वर से कहा, जाओ, स्नान-वान करके आओ। वधु को भी यह कहकर भेज दिया कि स्नान करके आओ। और इसके बाद वर पक्ष, वधु पक्ष दोनों को बिठाकर उन्होंने एक घंटा भाषण दिया कि रात को विवाह करने से बिजली का खर्चा ज्यादा होता है। इसलिए इतनी रात को विवाह नहीं करना चाहिए। कम खर्चे में विवाह कैसे करना चाहिए, सब बताया। उन्होंने कहा, वैसे आपका विवाह बहुत सादगी से हो रहा है, लेकिन ढंग से होना चाहिये और ऐसे कुछ खर्चे से बचत करके उसे किसी और कार्य में आप लगा सकते हैं। दोनों पक्षों को यह सब समझाकर वधु-वर को शाल-साड़ी आदि जो कुछ ले गये थे, वो सब दिया। जितने मंत्र उन्हें आते थे, वो सब पढ़े और आराम से विवाह सम्पन्न करा दिये। उस व्यक्ति के लिये यह तो चिरकालिक स्मृति हो गयी और हम लोगों के लिये एक वस्तुपाठ हो गया कि वे ऐसे अद्भुत सरसंघचालक हैं एक संगठन के। अपने दिमाग को वे ऐसे उच्च तात्विक विषयों में लगाकर दुनिया को भूल सकते थे, भूल भी जाते थे। लेकिन उनकी आत्मीयता सहजता से स्वभावतः प्रकट हो जाया करती थी। सहज ही हृदय को छूकर बाँध देती थी। उनके अंत्य दर्शन के लिए एक बालक स्वयंसेवक आकर गया। वापस घर जाने पर किसी ने उसे पूछा- ‘‘कहाँ गये थे?’’ उसने उत्तर दिया, ‘‘सुदर्शनजी का दर्शन कर आया। कुछ दिन पहले शाखा में आये थे, उस दिन प्रार्थना मैंने गायी तो उन्होंने बाद में मुझे आधा घंटा बिठाकर मेरी प्रार्थना शुद्ध करवायी थी।’’ ऐसे व्यक्तिगत स्पर्श उनका स्वयंसेवकों के प्रति होता था। ये पहलू सबको बहुत ज्यादा ज्ञात नहीं हैं।

लेकिन ये उनके ज्ञानयोग और कर्मयोग की तरह विस्तृत भक्तियोग है। अब ये हमारे लिए एक उदाहरण है और साथ-साथ एक विश्वास मन में रहता है कि ऐसे बना जा सकता है। ये जीवंत उदाहरण हमारे सामने है, ये असंभव बात नहीं है। इसके लिए किसी अवतारी पुरुष के अवतीर्ण होने की आवश्यकता नहीं है, ये हो सकता है।

वे अत्यंत निर्मल व्यक्तित्व के धनी थे, स्वभाव से एकदम सरल! उनका मन जैसे गंगा का पानी, उस पर पत्थर मारो, लकड़ी से आघात करो, वह टिकता नहीं है। चार क्षण के लिये तरंग उठती है और उसके बाद जल का प्रवाह अपने स्वभाव के अनुरूप बहता है। ऐसे हमारे सुदर्शनजी जब अपने पास थे, तो हम सबके मन में एक भरोसा था। और वे अचानक चले गये।

अभी हाल ही में यहाँ डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति की बैठक हुई। उन्हें फिर से अध्यक्ष चुना गया था। उन्होंने कहा, कोई दूसरा अध्यक्ष चुनो, क्या जब तक मैं जिंदा रहूँगा तब तक मुझे ही अध्यक्ष रखोगे! और मैं सौ साल जिया तो? ऐसा कहकर गये। और बाद के प्रवास में रायपुर में प्राणायाम करते समय उन्होंने देह छोड़ दिया। तो ‘विना दैन्येन जीवनम्। अनायासेन मरणम्।’ ऐसी उक्ति चरितार्थ हुई। अचानक जाने की खबर आयी तो क्षणभर तो विश्वास ही नहीं हुआ।

कुछ दिन पूर्व ही मैसूर में अपने वास्तव्य में वे नित्य क्रम के अनुसार प्रातःकाल घूमने निकले। परंतु रास्ता भूलकर भटक गए थे। सारे देश में पाँच-छह घंटे बड़ी हलचल हुई। देशभर के स्वयंसेवकों का मन ना जाने कैसी-कैसी आशंकाओं से भर गया था। सुदर्शनजी के मिल जाने के बाद सब आश्वस्त हो गए थे। इस बार भी यह शोक समाचार आते ही कई जगह से फोन आए कि सत्य क्या है? बताना पड़ा। यहाँ नागपुर में अंतिम दर्शन करके लौटने वाले कई स्वयंसेवकों ने कहा, ‘विश्वास ही नहीं होता कि वे चले गये।’ वास्तव में, विश्वास करने के लिए विश्वास रखना होगा। लेकिन क्षति तो हुई है। अपना संघकार्य ईश्वरीय है।

व्यक्तिनिरपेक्ष और सामूहिक है। इसलिए उसमें कोई अपूरणीय क्षति नहीं होती। कार्य की चिंता नहीं है। लेकिन हम लोगों के मार्गदर्शन के लिए एक जो रूप सामने था, उसका अभाव तो खलेगा न? एक के जैसा दूसरा आदमी भगवान किसी को पैदा नहीं करता और सुदर्शनजी की तरह बहुमुखी प्रतिभावाले व्यक्ति संसार में कम ही आते हैं। तो संघकार्य तो ठीक चलेगा। वो तो चला ही है और ध्येय की सिद्धि होने तक चलने वाला ही है।

परंतु सुदर्शनजी पुनः नहीं मिलेंगे। सुदर्शनजी के लेख-भाषण पढ़ने को मिलेंगे। शारीरिक करते समय उनके द्वारा सीखाई गई छोटी-छोटी बातें याद आयेगी। उनकी कई ऐसी बातें स्मृति में अंकित रहेंगी। सुदर्शनजी याद आयेंगे, लेकिन सुदर्शनजी को अब चित्रों के सिवा कहीं और देखने का दूसरा कोई अवसर ही नहीं है। सबके और हमारे मन की यह कमी अब पूरी होनी नहीं है। ये दुनिया का नियम है। सब व्यक्तियों के बारे में पीछे बचे लोगों को इस कमी को सहन करना ही पड़ता है। और ये बड़ा दुर्धर काम है मेरे जैसे के लिये। मेरा तो उनसे आत्मीय संबंध रहा है। वे शारीरिक प्रमुख से बौद्धिक प्रमुख बनें। उसके कुछ साल बाद मुझे सहशारीरिक प्रमुख बनाया। उसके पहले से संघशिक्षा वर्ग में शारीरिक में रुचि लेनेवाले व्यक्ति के रूप में उनसे बहुत संपर्क आया। १९७१ के बाद तो कई बार मिले। कई बार उन्होंने कान पकड़ा, छोटी-छोटी बातें ठीक कीं, कई बार उन्होंने गीत सिखाये। कई बार गीत कहलवाये। उसके बाद शारीरिक वर्ग से संबंधित होने के नाते हर शारीरिक वर्ग में उन्हें बुलाते थे। वे आते थे और कई बातें बताते।

सुदर्शनजी को जब पहला हार्ट अटैक आया, तो उनसे सबसे पहले मिलने वाला अखिल भारतीय अधिकारी मैं ही था। उस समय उनको २०० कदम चलने की अनुमति मिली थी। उपचार के बाद उनके निवास के प्रांगण में मैं जब उनसे मिलने गया था, तो २०० कदम चल रहे थे। उन्होंने हाथ के इशारे से मुझे ‘रुको’ ऐसा कहा। तत्पश्चात अपना चक्कर पूरा करने के बाद मेरे पास आये और कहा, २०० कदम पूर्ण होने तक साँस लेने का श्रम करना पड़ता है, इसलिये मैं बोलता नहीं था, अब रुक रहा था। यह कारण (Explanation) बताने की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन वे इसका भी ध्यान रखते थे। बाद में झंडेवाला में रहता था तब उन्होंने कहा, ‘मोहनराव, अब मैं इस बीमारी के कारण शारीरिक के काम का बिल्कुल नहीं रहा।’ बड़े दु:ख से कहा।

शारीरिक में उन्हें बड़ी रुचि थी। उन्होंने उसे हस्तगत किया था। दो साल एमरजन्सी के दौरान वे मीसा बंदी थे, तो शारीरिक की पुस्तकें साथ लेकर गये थे। अकेले सारा अभ्यास किया। एक-एक प्रयोग उन्होंने १०-१० हजार बार करके देखा और उसमें सिद्ध हुए। इसलिए उन्होंने बड़े दु:ख से कहा कि ‘मैं शारीरिक के काम का नहीं रहा।’

मैंने कहा, – ‘देखेंगे।’ क्योंकि थोड़ा उनका स्वास्थ्य अच्छा होने के बाद वे फिर से शारीरिक में हिस्सा लेने लगे और स्वयं अभ्यास करके बताने लगे, सिखाने लगे। बिल्कुल अंतिम दिन तक जो बातें होनी चाहिये, वो उत्कृष्ट होनी चाहिये, उसको ठीक करना चाहिए, ये उनका आग्रह रहता था। जाने के दिन रायपुर कार्यालय में प्रातः स्मरण में बैठे थे। वहाँ पर प्रातःस्मरण के दौरान एकात्मता स्तोत्र के एक श्लोक के उच्चार में एक स्वयंसेवक की विसर्ग की गलती हो गयी, तो प्रातःस्मरण के बाद उन्होंने सबको रोका और संस्कृत में उच्चारण के महत्व को बताते हुए ‘बलिः’, इस शब्द के सही उच्चारण का सभी को अभ्यास करवाया और पाँच बार सबसे कहलवा लिया। तब सबको छुट्टी मिली। हर बात में जो करना है, वह उत्कृष्ट करना है और किसी से करवाना है, तो उसे उत्कृष्ट करने के लिए तैयार करे, ऐसा उनका आग्रह रहता था।

ये उनकी जो सारी बातें हैं, वह उसी ढंग से होती थीं। ऐसी होते हुए देखना अब संभव नहीं और ये कमी पूरी होने वाली नहीं। इस बात की बड़ी टीस रहती है। कुछ लोग बता सकते हैं, तो कुछ लोग व्यक्त नहीं कर पाते। उनके जाने पर देशभर के राष्ट्रीय जीवन से जुड़े समाजसेवियों तथा गणमान्य नागरिकों ने सहसंवेदना जतायी है। सुदर्शनजी गये, लेकिन उनको सच्ची श्रद्धांजलि उनके गुणों का अनुकरण कर उनके तत्वों पर चलकर ही अर्पित की जा सकती है। उन्हें औपचारिक श्रद्धांजलि तो हम सभी अर्पित कर चुके हैं, लेकिन सभी स्वयंसेवकों की ओर से उनको कृतिरूप श्रद्धांजलि अर्पित की जायेगी, ऐसा विश्वास है।
— ( डॉ मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
23 अक्टूबर 2012)

ब्रिक्स सम्मेलन और भारत: दुनिया की उम्मीदें अब नई दिल्ली से

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डॉ० कुँवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह  

दिल्ली। युद्धों और आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच नई दिल्ली से निकलेगा वैश्विक दक्षिण की नई
आवाज का संदेश दुनिया इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां शक्ति का पुराना संतुलन तेजी से बदल रहा है। पश्चिम एशिया में युद्ध, यूक्रेन संकट, ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल, व्यापारिक
प्रतिबंध, आपूर्ति शृंखला की अस्थिरता और महाशक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक
व्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। ऐसे समय में भारत की राजधानी नई दिल्ली में
हो रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन सामान्य कूटनीतिक आयोजन से कहीं बड़ा महत्व रखता है।
भारत की अध्यक्षता में हो रहे 18वें ब्रिक्स सम्मेलन पर दुनिया की निगाहें इसलिए टिकी हैं
क्योंकि आज ब्रिक्स केवल पांच देशों का समूह नहीं रहा। इसके 11 सदस्य देश—ब्राजील, रूस,
भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया
और सऊदी अरब—विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण शक्ति बन चुके हैं।
भारत सरकार के अनुसार ये देश दुनिया की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी, करीब 40
प्रतिशत वैश्विक जीडीपी और लगभग 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यही आंकड़े बताते हैं कि ब्रिक्स अब केवल विकासशील देशों की चर्चा का मंच नहीं, बल्कि
वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाला समूह है।
भारत से क्यों हैं इतनी उम्मीदें?
भारत को ब्रिक्स की अध्यक्षता ऐसे समय मिली है, जब वैश्विक व्यवस्था में संवाद की
आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। भारत की विदेश नीति का मूल स्वभाव टकराव के
बजाय संवाद, रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित रहा है। यही कारण
है कि रूस और पश्चिम, दोनों के साथ संवाद बनाए रखने की भारत की क्षमता को दुनिया
अलग दृष्टि से देखती है। नई दिल्ली सम्मेलन में आर्थिक सहयोग के साथ खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य, आपदा-रोधक क्षमता और महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करने जैसे मुद्दे
प्रमुख हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ब्रिक्स को किसी एक देश अथवा पश्चिम-विरोधी
गठबंधन में बदलने के बजाय समावेशी वैश्विक दक्षिण के मंच के रूप में स्थापित करना
चाहता है। यही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक पूंजी भी है। आधी दुनिया की आबादी, मगर आवाज कितनी?

ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसका आकार है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी यही है।
लगभग आधी दुनिया की आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के करीब 40 प्रतिशत हिस्से का
प्रतिनिधित्व करने वाले इस समूह में राजनीतिक व्यवस्थाएं, आर्थिक हित और सामरिक
प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
रूस और पश्चिम के बीच तनाव है। चीन और अमेरिका के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है।
भारत और चीन के बीच सीमा तथा व्यापार से जुड़े प्रश्न हैं। ईरान और पश्चिम एशिया के
अन्य देशों के बीच गंभीर मतभेद हैं। मौजूदा ईरान युद्ध ने तो ब्रिक्स के भीतर भी कठिन
कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा ले ली है। रॉयटर्स के अनुसार इस संकट ने विशेष रूप से ईरान
और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेदों को बढ़ाया है। ऐसे में नई दिल्ली की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि वह मतभेदों को दबाए बिना सहमति का रास्ता निकाले।
युद्ध के बीच शांति का संदेश आज दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत युद्धों के विस्तार को रोकने की है। पश्चिम एशिया का संघर्ष ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान ने वैश्विक तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने
की स्थिति में पहुंची हैं।
भारत के लिए यह केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। भारत दुनिया के बड़े ऊर्जा
आयातकों में है। तेल की कीमतों में तेज वृद्धि का असर परिवहन, उद्योग, महंगाई और
आम उपभोक्ता तक पहुंचता है। इसलिए भारत का शांति और संवाद पर जोर सीधे उसके
राष्ट्रीय हित से भी जुड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बातचीत में भी संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति की आवश्यकता पर जोर दिया।
भारत की यही भूमिका उसे अन्य शक्तियों से अलग बनाती है-वह किसी खेमे का पिछलग्गू
बनने के बजाय सभी पक्षों से बात करने की क्षमता रखता है। अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बड़ा अवसर
ब्रिक्स की चर्चा अक्सर डॉलर और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था के संदर्भ में होती है, लेकिन
भारत के लिए इसका अर्थ इससे कहीं व्यापक है। भारतीय उद्योग के लिए ब्रिक्स बाजार
दवाओं, कृषि उत्पादों, इंजीनियरिंग वस्तुओं, डिजिटल सेवाओं, ऊर्जा, खनिजों और प्रौद्योगिकी
सहयोग के बड़े अवसर खोल सकता है।
नई दिल्ली सम्मेलन में ब्रिक्स स्टार्टअप इनोवेशन फंड, ब्रिक्स इनक्यूबेटर नेटवर्क और
लॉजिस्टिक्स सप्लाई-चेन सहयोग ढांचे जैसी पहलों को आगे बढ़ाने पर भी जोर है।
भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। दुनिया जब आपूर्ति शृंखलाओं को चीन-केंद्रित
निर्भरता से बाहर निकालने और अधिक विविध बनाने की कोशिश कर रही है, तब भारत
विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था, फार्मा और तकनीकी सेवाओं में बड़ा विकल्प बन सकता है।
ब्रिक्स को घोषणाओं से आगे ले जाने की जरूरत हालांकि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन की वास्तविक सफलता घोषणाओं की संख्या से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से तय होती है। ब्रिक्स के सामने यही चुनौती है।
यदि यह समूह केवल संयुक्त वक्तव्यों तक सीमित रहा तो उसकी विश्वसनीयता कमजोर
होगी। लेकिन यदि वह सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सुरक्षित भुगतान
प्रणालियों, आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा सहयोग, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल तकनीक में
ठोस व्यवस्था खड़ी कर पाया, तो इसकी प्रासंगिकता कई गुना बढ़ सकती है।
इसी संदर्भ में नई दिल्ली से दुनिया को केवल एक और घोषणा नहीं, बल्कि कार्यान्वयन का
रोडमैप चाहिए।
भारत के लिए भी यह अवसर, परीक्षा भी ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के लिए वैश्विक नेतृत्व का अवसर है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। भारत को यह साबित करना होगा कि वह केवल अपने आर्थिक हितों का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि वैश्विक दक्षिण की व्यापक आकांक्षाओं का विश्वसनीय प्रवक्ता बन सकता है। विकासशील देशों की मांग स्पष्ट है—वैश्विक संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व, वित्तीय संस्थानों में सुधार, विकास के लिए सुलभ पूंजी, तकनीक तक न्यायपूर्ण पहुंच और ऐसी वैश्विक
व्यापार व्यवस्था जिसमें विकासशील देशों के हितों की अनदेखी न हो। ब्रिक्स इसी असंतुलन को चुनौती देने की कोशिश है। भारत की प्राथमिकता इसलिए किसी नए ध्रुव की स्थापना नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय और अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था का निर्माण होनी चाहिए।
दुनिया की नजर नई दिल्ली पर ब्रिक्स के भीतर मतभेद हैं और उन्हें नजरअंदाज करना भूल होगी। लेकिन मतभेदों के बावजूद संवाद का मंच बचाए रखना ही बहुपक्षवाद की असली परीक्षा है। आज जब दुनिया में संवाद के दरवाजे बंद होने और युद्ध के मोर्चे खुलने का खतरा बढ़ रहा है, तब भारत के
पास एक दुर्लभ अवसर है।
नई दिल्ली यदि ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, व्यापार, तकनीक और शांति के मुद्दों पर
व्यावहारिक सहमति का रास्ता निकाल पाती है, तो ब्रिक्स की भूमिका नई ऊंचाई पर पहुंच
सकती है। दुनिया भारत से किसी चमत्कार की अपेक्षा नहीं कर रही। अपेक्षा इससे कहीं अधिक
व्यावहारिक है—भारत मतभेदों के बीच संवाद, प्रतिस्पर्धा के बीच सहयोग और संकट के बीच
समाधान का रास्ता दिखाए।
यही भारत की सभ्यतागत शक्ति भी है और आज की कूटनीतिक आवश्यकता भी।
ब्रिक्स का दिल्ली सम्मेलन इसलिए केवल राष्ट्राध्यक्षों की बैठक नहीं है। यह उस बदलती
दुनिया का आईना है जिसमें वैश्विक दक्षिण अब दर्शक बनकर नहीं रहना चाहता। और इस
नई आकांक्षा की अगुवाई करने के लिए दुनिया की निगाहें आज भारत पर हैं।
नई दिल्ली के पास अवसर है कि वह ब्रिक्स को केवल ‘बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह’ नहीं,
बल्कि ‘बड़ी समस्याओं के समाधान का मंच’ बनाने की दिशा में निर्णायक कदम उठाए।
(डॉ० सिंह, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, शिक्षा मंत्रालय,
भारत सरकार, नई दिल्ली से सम्बद्ध हैं)
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