महिमा मंडन, चरित्र हनन और विक्टिमहुड

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देवांशु झा

दिल्ली। जयपुर में कचौरी की हाई-फाई दूकान खोलने वाले वरिष्ठ पत्रकार अभी विक्टिमहुड के श्रेष्ठ उदाहरण बन गए हैं। जबकि वे स्वयं ऐसा कुछ नहीं कह रहे हैं। उन्हें जो करना था, वह कर चुके। वह जो भी कर रहे, सोच समझकर कर रहे हैं। ऊंची-ऊंची संस्थाओं के बड़े ऊंचे-ऊंचे पदों पर रहे हैं। पैंसठ की वय है। घोषित व्यवस्था विरोधी थे। खैर, वह एक भिन्न विषय है।

अभी जो लोग मोदी के समर्थन में हैं,वे आईटी सेल के चूतिया, चाटुकार,अंधभक्त हैं! यह आईटी सेल कहां है, कौन उसका नियंता है, मैं नहीं जानता। मैं बिलकुल नहीं जानता। बहुत सारे संघ समर्थक पत्रकारों को चेहरा चमकाते हुए देखता हूॅं। अलग अलग मंचों से लेकर चैनल तक जाते हैं। नेताओं की चिट्ठियां पाते हैं। उन्हें लगाते हैं। कुछ लोग चुपचाप इस विश्वास के साथ काम करते हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा और हिन्दुत्व की राजनीति का पुरोधा आत्मघात कर सर्वनाश नहीं कर सकता। मैं भी उनमें से एक हूॅं। परन्तु जब इस तरह के निजी हमले झेलता हूॅं तो मन व्यथित हो जाता है।

ध्यान रहे! मैं संघ द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में जाकर उनकी ही आलोचना कर देता हूॅं।‌ इसलिए संघ से जुड़े महानुभाव मुझे बुलाते हुए श्रोता के रूप में ही प्रतिष्ठित करते हैं। उनके महान साहित्यकारों और पत्रकारों की सूची में मेरा नाम नहीं आता। न ही आए तो ही अच्छा। मुझ में उनकी प्रशस्ति की कोई आकांक्षा नहीं है। रत्ती भर भी नहीं। मैं सर्वथा स्वतंत्र आत्मा, लगभग आवारा हूॅं। परन्तु मर्यादा नहीं भूलता। घोर आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भी खखोर बटोर लेने का सपना नहीं देखता।

कहना आवश्यक नहीं कि आप मेरे जीवन संघर्ष के बारे में कुछ नहीं जानते। कुछ भी नहीं। इसलिए बकवास बंद कर दीजिए। मेरे जीवन का ताप आप अनुभव नहीं कर सकते। मैं तो किसी पार्षद को भी नहीं जानता। न जानने की इच्छा है। न पांच अकाउंट नंबर चमकाते हुए चंदा मांगता हूॅं। मुझे गले में चद्दर लपेट कर फोटो खिंचवाने की कोई चाह नहीं है ना ही मैं चैनल के चूचुहार में जाता हूॅं। न्योते बहुत आते रहे। मना कर दिया। अब कोई फोन नहीं करता।

मैं एक मुंहफट पत्रकार रहा हूॅं। अभद्र नहीं। मैं अपने प्रोफेशन से न्याय नहीं कर पाया। छोड़कर आ गया। मैं कभी किसी संस्थान, संपादक को दोषी नहीं ठहराता। दोषी मैं ही हूॅं।‌ किसी दिन मैं भी पकौड़ी की दूकान लगा सकता हूॅं। मैं क्या करूंगा, कोई नहीं जानता। न मेरी मां जानती हैं न मेरी पत्नी। मैं हिन्दू चेतना की बात करता हूॅं। हो सकता है, मैं आपकी तरह वर्तमान संकट को नहीं देख पा रहा। मेरी कमी है। परन्तु आप मुझे सरकार पोषित नहीं कह सकते। यह मेरे लिए मां की गाली है।‌

समय निर्णय करेगा, मैं सही था या गलत।‌ आप उसके निर्णायक न बनिए।‌ निर्णायक ईश्वर हैं। पत्रकारिता धर्म सिखाने का कष्ट उठाना भी व्यर्थ होगा। मैं खराब पत्रकार रहा हूॅं। एक लेखक के रूप में मेरी भ्रूण हत्या हो चुकी है!

(सोशल मीडिया से साभार)

युवाओं व नारी सशक्तीकरण को समर्पित है यूपी बजट

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लखनऊ: विगत कुछ माह से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जनसमुदाय को सरकार के निर्णयों से अवगत कराने के लिए पाती लिखने का अभिनव प्रयोग कर रहे हैं। इस बार बजट के बाद लिखी अपनी पाती में उन्होंने उत्तर प्रदेश के वित्त वर्ष 2026-27 के बजट की विशेषताओ पर प्रकाश डाला है। मुख्यमंत्री ने लिखा है कि यह बजट युवाओं व नारी शक्ति के लिए एक ऐतिहासिक बजट है। उत्तर प्रदेश का यह बजट नवाचार का बजट है। नवनिर्माण के 9 वर्षों की यह यात्रा प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

मुख्यमत्री योगी पूर्व में भी कह चुके हैं कि विगत नौ वर्षों में यूपी असीमित क्षमताओं वाला प्रदेश बन चुका है।इस बजट में युवाओं को रोजगार उपलबध कराने के लिए एमएसएमई, स्टार्टअप, ओडीओपी और स्थानीय उद्यमों को विकसित करते हुए वृहद निवेश की नई योजनाओं को प्रारंभ करने का प्रावधान किया गया है। उभरती हुई नयी तकनीकीकी कई बड़ी घोषणाएं हुई हैं। प्रदेश में पहली बार स्टेट डेटा अथारिटी का गठन करने की ऐतिहासिक पहल की गई है। यह प्रदेश में वास्तविक समय पर आंकड़ों के संग्रह और इसके अनुश्रवण के साथ भविष्य की योजनाओं को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाएगा। उत्तर प्रदेश एआई मिशन, एआई डेटा लैब, एआई सेंटरऑफ एक्सीलेंस तथा डेटा सेंटर क्लस्टर प्रदेश को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी एआइ एवं डीप टेक के क्षेत्र में एक एक नए वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने में सहायक होंगे। बजट के अनुसार ”टेक युवा समर्थ युवा” योजना के अंतर्गत 25 लाख युवाओं को प्रशिक्षित किया जायेगा।

बजट में एआई को प्राथमिकता दी गई है जिसके लिए 225 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। इंडिया एआई मिशन के अंतर्गत प्रदेश की 49 आईटीआई में एआइ लैब स्थापित की जाएगी। एआई सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और एआई ठेटा लैब की स्थापना के लिए 32.32 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है। साइबर सुरक्षा को भी बजट में अहम स्थान मिला हे। प्रदेश में पहली बार स्टार्ट अप इन्क्यूबेटर हब बनने जा रहा है इस कार्य के लिए 30 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यू -हब का मुख्यालय लखनऊ और दूसरा इन्क्यूबेटर गौतमबुद्धनगर में बनाया जाएगा। यू -हब से ऐसे स्टार्टअप को बढ़ावा दिया जाएगा ।राजधानी के परिषदीय विद्यालयों को एआई से जोड़़ा जाएगा। स्मार्ट कक्षाओं में छात्रों को परंपरागत के साथ आधुनिक तकनीक आधारित शिक्षा मिलेगी।

युवाओ के लिए रोजगार के नए क्षेत्रो का सृजन किया जा रहा है। हथकरघा, पावरलूम और गारमेंटिंग सेक्टर में रोजगार सृजन पर विशेष बल दिया गया है। वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में 30 हजार रोजागर सृजन का लक्ष्य रखा गया है। मुख्यमंत्री ग्रामोद्योग योजना के अंतर्गत वर्ष 2026 -27 में 800 इकाइयों की स्थापना कर 16हजार लोगों को रोजगार देने का लक्ष्य है। पंडित दीनदयाल ग्रामोद्योग रोजगार योजना के अंतर्गत उत्पादन के लिए 10 करोड़ और खजनी गोरखपुर स्थित कम्बल उत्पादन केंद्र के आधुनिकीकरण के लिए भी पर्याप्त धन की व्यवस्था की गई है।

युवाओ के लिए पर्यटन के माध्यम से भी रोजगार सृजन करने की व्यवस्था बजट में की गई है । इसके लिए युवा पर्यटन क्लब बनाए जाएंगे। युवाओं को पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार के लिए तैयार किया जाएगा। गोरखपुर में स्टेट इंस्टीटयूट ऑफ होटल मैनेजमेंट की स्थापना की जाएगी और फूड क्राफ्ट इंस्टिट्यूट अलीगढ़ को उच्चीकृत कर स्टेट इंस्टीटयूट ऑफ होटल मैनेजमेंट बनाया जाएगा। वहीं युवा पर्यटन क्लबॉन के लिए तीन करोड़ का प्रावधान किया गया है।
मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के अंतर्गत निःशुल्क कोचिंग व्यवस्था तथा मुख्यमंत्री फेलोशिप कार्यक्रम से युवाओं के लिए अवसरों के नए द्वार खुल रहे हैं। बजट मे एमएसएमई सेक्टर को पर्याप्त धन मिलने से लघु सूक्ष्म और मध्यम उद्यम को बढ़ावा मिलने से युवाओ के लिए रोजगार और नौकरी के बेहतर अवसर उपलब्ध होंगे। युवाओ के समग्र विकास को ध्यान में रखते हुए मंडल मुख्यालय वाले प्रत्येक जनपद में खेल विद्यालय व मैदान बनाने की योजना है जिसके अंतर्गत 2030 के कामनवेल्थ गेम्स एवं 2036 के ओलंपिक के लिए प्रतिभाओं को निखारा जाएगा।

महिला एवं बाल विकास के लिए कुल 18,620 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। महिला उद्यमिता को प्रोत्साहन देने के लिए महिला उद्यमी उत्पाद विपणन योजना, महिला उद्यमी क्रेडिट कार्ड योजना एवं जनपद स्तर पर श्रमजीवी महिला छात्रावास प्रस्तावित है। बजट मे मुख्यमंत्री महिला उद्यमी उत्पाद विपणन योजना के लिए 100 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है जबकि महिला क्रेडिट कार्ड योजना के लिए 151.04 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है। इसके तहत महिलाओं को ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। महिला सामर्थ्य योजना के अंतर्गत गोरखपुर, बरेली और रायबरेली में दुग्ध कंपनियों का गठन कर दुग्ध संग्रहण व विपणन का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है। निराश्रित महिला पेंशन योजना में 3500 करोड़ रुपए, छात्रावासो के निर्माण के लिए 100 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। मुख्यमंत्री श्रमजीवी महिला छात्रावास निर्माण योजना के लिए 35 करोड़ रुपए, मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना के लिए 252 करोड़ रुपए और मुख्यमंत्री बाल आश्रय योजना के अतंर्गत भवन निर्माण के लिए 80 करेड रुपए का प्रावधान किया गया है।

बजट में इस बार धन का आवंटन इस प्रकार से किया गया है यदि सरकार आगे कोई बड़ी योजना घोषित करती है तो उसके लिए भी पर्याप्त धन उपलब्ध रहे जैसे किअभी बुजुर्ग और वृद्ध महिलाओ के लिए सामाजिक सुरक्षा पेंशन में वृद्धि करने से लेकर 60 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुकी महिलाओं के लिए सरकारी बसों में निःशुक्ल यात्रा की व्यवस्था प्रस्तावित है।नवरात्रि के अवसर पर विशेष अभियान चलाये जाते हैं जिनके लिए धन की पर्याप्त व्यवस्था की गई है।
प्रदेश सरकार के बजट को लेकर महिलाओं का कहना है कि इस बर के बजट से बेटियों की पढ़ाईसे लेकर विअव्ह तक की चिंता कम होरही है। यह बजट गरीब महिलाओं को व्यापक रूप से सहारा देने वाला है। इस बजट से कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढे़गी। स्वयं सहायता समूहो के लिए की गई घोषणाओं से महिला समूह के उत्पादों को बाजार दिलाने से गांव की महिलाएं आत्मनिर्भर बनेंगी।

यू जी सी के बहाने बड़े बदलाव का मौका

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सुरेंद्र चतुर्वेदी

जयपुर : केंद्र सरकार के अति उत्साह ने समाज को आंदोलित कर दिया है। यह दूसरा अवसर है जब केंद्र सरकार के निर्णय से आम जनता में ना केवल आक्रोश है अपितु गहरी निराशा भी। यू जी सी दिशा निर्देशों के आने से पहले भाजपा के चार सौ पार के नारे पर समाज का समर्थन नहीं मिला। इसके अलावा किसान सुधार बिल पर जनता में मिश्रित प्रतिक्रिया थी लेकिन किसी ने भी केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल नहीं उठाए। किसान आंदोलन को लोगों ने राजनीतिक हताशा में उपजा आंदोलन माना, और इस प्रमाण को भी स्वीकारा कि किसान आंदोलन के बहाने मोदी के पक्ष में आए जनमत को ठुकराने की वह विदेशी चाल थी, जिसे भारत के कुछ अवसरवादी राजनीतिक दल हवा दे रहे थे ! लेकिन इस बार बात अलग है। समाज के सभी वर्गों में यू जी सी दिशा निर्देशों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया है। आश्चर्यजनक तथ्य तो ये है कि समाज के जिस वर्ग को आश्वस्त करने के लिए ये दिशा निर्देश जारी किए गए, उसमें ही काफ़ी अंतर्विरोध उभर आया है। सर्वोच्च न्यायालय की रोक के बावजूद समाज में यह विषय तेजी से अपनी जगह बनाता जा रहा है।

राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि भाजपा के मातृ संगठन *राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में आए इन दिशा निर्देशों ने संघ के सामाजिक सौहार्द के प्रयासों को बहुत अंदर तक चोट पहुंचाई है। संघ हिंदू समाज को जातिगत भेदभाव से ऊपर उठाकर हिंदू होने के स्वाभिमान के साथ देश में एकात्मता का वातावरण बना रहा है लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय के इस आदेश ने संघ की एकात्मक विचारधारा को ही खोखला करने की शुरुआत कर दी है।* हिंदू समाज को जातियों में बांटने का जो काम विपक्ष के नेता राहुल गांधी नहीं कर पाए, इसे एक सरकारी आदेश ने कर दिखाया।

यह सही है कि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने समाज कई उपेक्षित वर्गों को राजनीतिक रूप से नेतृत्व देने में सफलता पाई है जो आजादी के बाद से अपनी पहचान को तरस रहे थे। पूरे देश में राजनीति के माध्यम से परिवर्तन दिख भी रहा है। लेकिन *यह भी उतना ही कड़वा सच है कि अनुसूचित जाति और जनजाति का बड़ा वर्ग भाजपा की बजाय अन्य दलों के साथ अपनी सहजता महसूस करता है, इनके साथ मुस्लिम मतदाताओं के आ जाने से भाजपा के विरोध में वातावरण बनाने में मदद मिलती है जिस पर ग़ैर भाजपाई दलों की गिद्ध दृष्टि बनी रहती है।* इसलिए वो कोई भी ऐसा मौका नहीं चूकते जिससे समाज के इन वर्गों को बरगलाया जा सके। कांग्रेस द्वारा 2024 के आम चुनावों में संविधान को बदल देने का कथानक इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

*सबसे बड़ी समस्या यह है कि यू जी सी दिशा निर्देशों ने भाजपा के परंपरागत मतदाताओं को बहुत नाराज कर दिया है। उनकी नाराज़गी को दूर करने का उपाय आसान भी नहीं है। दूसरी तरफ़ सरकार के पास यह मौक़ा भी है कि वो सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली, मूल्यांकन और अन्वेषण के पुराने और सड चुके सिस्टम को बदल कर एक ऐसी प्रणाली को सामने लाए जो प्रतिभावान की प्रतिभा को जातीय द्वेष से दूर कर उसकी क्षमता और प्रतिभा के अनुसार अवसर उपलब्ध कराये।* ऐसी व्यवस्था का निर्माण देश से प्रतिभा पलायन को रोकने में भी मददगार साबित होगा। यह ऐसा अवसर भी है जब कि केंद्र सरकार पूरे देश के विश्वविद्यालयों अभिव्यक्ति के नाम पर देश विरोधी गतिविधियों की विषबेल का उन्मूलन कर सकती है।

लेकिन मुद्दा यह है कि क्या मोदी सरकार समाज को बांटने वाले इस तरह के कुत्सित प्रयासों को रोकने के लिए कृत संकल्पित है या वो जातीय वैमनस्यता की नर्सरी बन चुके इन शिक्षा परिसरों को राजनीतिक विचारधारा की प्रयोगशाला बने रहना देना चाहती है ?

(लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट से संबद्ध है)

थिरकती परंपरा या चमकता बाज़ार? भारतीय नृत्य शैलियां दोराहे पर!!

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हैदराबाद : भारत में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं रहा। यह आत्मा की ज़बान रहा है। मंदिरों की देहरी से लेकर राजदरबारों तक, गांव की चौपाल से लेकर बड़े रंगमंच तक, नृत्य ने भाव, राग और रस की परंपरा को ज़िंदा रखा।

भारत नाट्यम की मुद्राएँ हों या Kathak की चक्करदार चाल, Odissi की त्रिभंगी हो या Manipuri की कोमलता, हर शैली में अनुशासन था, साधना थी, एक ख़ामोश समर्पण था।मगर अब मंजर बदल रहा है।

वैश्वीकरण और लोकतंत्रीकरण के इस दौर में कला भी “सबकी” हो गई है। मंच अब घरानों और गुरुकुलों तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया ने दरवाज़े खोल दिए हैं। रील्स, रियलिटी शो, यूट्यूब चैनल, हर हाथ में कैमरा है, हर कोई कलाकार है।

पॉप, हिप-हॉप, कंटेम्परेरी और बॉलीवुड की धुनों पर अब शास्त्रीय मुद्राएँ थिरकती हैं। इसे “फ्यूज़न” कहा जा रहा है। Creativity के नाम पर प्रयोगों की बाढ़ है। सवाल उठता है, यह प्रयोग है या बिगाड़?

उड़ान है या प्रदूषण?
कुछ पुरोधाओं को यह बदलाव रास नहीं आ रहा। उनका कहना है कि शास्त्रीय नृत्य की रूह, उसकी पवित्रता, उसकी तहज़ीब, सब कुछ बाज़ार की चमक में धुंधला हो रहा है। अब मक़सद साधना नहीं, “मास अपील” है। भाव की जगह बाहरी ग्लैमर ने ले ली है।

पहले एक मुद्रा सीखने में सालों का नियमित अभ्यास लगता था। आज कुछ सेकंड की रील में तालियाँ मिल जाती हैं। यह रफ्तार दिलकश है, मगर कहीं गहराई कम तो नहीं हो रही?

लोकप्रियता बढ़ी है, इसमें शक नहीं। हर गली में डांस स्टूडियो है। बच्चे छोटी उम्र से मंच पर हैं। यह लोकतंत्रीकरण एक हद तक सुखद है। कला अब किसी ख़ास वर्ग की मिल्कियत नहीं। पर इसके साथ एक डर भी है, सतहीपन का।

योग का उदाहरण सामने है। कभी वह ध्यान और आत्म-अनुशासन की साधना था। आज फिटनेस उद्योग का हिस्सा है। बुरा नहीं है, मगर मक़सद बदल गया। ठीक वैसा ही नृत्य के साथ हो रहा है। देह की चपलता ज़्यादा दिख रही है, मन की तल्लीनता कम।

तकनीक ने बदलाव को तेज़ कर दिया है। ऑटो-ट्यून, साउंड मिक्सिंग, डिजिटल इफेक्ट्स, संगीत का चेहरा बदल गया। डांस वीडियो में कैमरा एंगल, स्लो मोशन, एडिटिंग, सब मिलकर प्रस्तुति को नया रंग देते हैं। स्टेज की सीमाएँ टूट गईं। इंस्टाग्राम और यूट्यूब नए रंगमंच बन गए हैं।

भाषा का मेल-जोल भी बढ़ा है। हिंदी गानों में अंग्रेज़ी लाइनें, पंजाबी बीट्स पर कथक की घूम, भरतनाट्यम की मुद्राओं में हिप-हॉप का तड़का, यह सिर्फ शब्दों का नहीं, शैलियों का भी मेल, एकता है।

बॉलीवुड ने इस फ्यूज़न को बड़े परदे पर चमकाया है। Devdas के गीत “Dola Re Dola” में Madhuri Dixit की कथक की चक्करें और Aishwarya Rai की भरतनाट्यम-प्रेरित मुद्राएँ दोस्ती और भावनाओं की गहराई दिखाती हैं।

इसी तरह Bajirao Mastani के “Pinga” में Deepika Padukone और Priyanka Chopra ने लावणी और कथक का संगम पेश किया। “Mohe Rang Do Laal” में भाव-रस की गहराई बनी रही।

ये मिसालें बताती हैं, जब फ्यूज़न जड़ों से जुड़ा हो, तो नया सौंदर्य जन्म लेता है। नई पीढ़ी की अपनी रुचि है। उनका अपना अंदाज़ है। वे तेज़ हैं, प्रयोगधर्मी हैं, बेख़ौफ़ हैं। बदलाव हर दौर में हुआ है। कला ने हमेशा समय से गुफ़्तगू की है।

पर परिवर्तन और प्रदूषण के बीच एक नाज़ुक रेखा है। जब मूल तत्व खो जाएँ, जब व्याकरण टूट जाए, तब एहतियात ज़रूरी है।
फ्यूज़न तभी सार्थक है जब उसमें परंपरा के प्रति सम्मान हो, जब रियाज़ की खुशबू बनी रहे।

शास्त्रीय नृत्य केवल स्टेप्स का समूह नहीं। वह दर्शन है। कथा है। आध्यात्म है। उसमें शरीर के साथ मन और आत्मा भी नाचते हैं।
अगर फ्यूज़न इस रूह को साथ लेकर चले, तो यह उड़ान है। अगर उसे पीछे छोड़ दे, तो यह प्रदूषण है।

फैसला हमारे हाथ में है: हम चमक चुनते हैं या गहराई। या फिर दोनों का एक ख़ूबसूरत संतुलन।

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