ढाका में सत्ता परिवर्तन: BNP की सरकार और भारत–बांग्लादेश रिश्तों की नई परीक्षण

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी । बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को हुए काफी हद तक निष्पक्ष और शांतिपूर्ण राष्ट्रीय चुनावों के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ है। लंबे समय बाद बांग्लादेश में चुनावी माहौल उत्सवपूर्ण दिखा, जो वहां की राजनीति में असामान्य माना जाता है। लगभग 60 प्रतिशत मतदान के साथ 300 सदस्यीय संसद में BNP ने 212 सीटें हासिल कीं, जबकि महिला सदस्यों की 50 सीटें अलग से जोड़ी जानी हैं।

170 मिलियन से अधिक आबादी वाले इस मुस्लिम-बहुल देश में सत्ता परिवर्तन को केवल आंतरिक राजनीतिक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके दूरगामी क्षेत्रीय प्रभाव भी देखे जा रहे हैं। भारत के लिए—खासकर उसके पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भूभाग के संदर्भ में—यह बदलाव कई नई संभावनाओं के साथ-साथ जटिल चुनौतियाँ भी लेकर आया है। अवैध प्रव्रजन, सीमा सुरक्षा और कट्टरपंथी गतिविधियाँ पहले से ही भारत–बांग्लादेश संबंधों के संवेदनशील बिंदु रहे हैं।

पूर्वी भारत की भौगोलिक स्थिति को लेकर अक्सर सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, का हवाला दिया जाता है। कुछ बांग्लादेशी कट्टरपंथी समूह समय-समय पर इस रणनीतिक गलियारे को भारत की कमजोरी बताने की कोशिश करते रहे हैं। यहां तक कि ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ जैसी अवधारणाओं को हवा देने वाले तत्व भी सक्रिय रहे हैं, जिनमें पूर्वी भारत के बड़े हिस्से को मिलाकर एक विस्तारित बांग्लादेश की कल्पना की जाती है। भाषाई पहचान (बंगाली) को एकधर्मी राज्य की अवधारणा से जोड़ने की बहस भी इसी पृष्ठभूमि में उभरती रही है।

BNP की इस चुनावी जीत का चेहरा बने 60 वर्षीय तारिक रहमान—पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया और पूर्व राष्ट्रपति ज़ियाउर रहमान के पुत्र—ने पूरे चुनाव अभियान के दौरान भारत-विरोधी बयानबाज़ी से दूरी बनाए रखी। बांग्लादेशी राजनीति में भारत-विरोध अक्सर त्वरित लोकप्रियता का साधन रहा है, लेकिन तारिक रहमान ने इस रास्ते से परहेज़ किया। प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद भी उन्होंने भारत सहित सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की समीक्षा और संतुलन की बात कही।

भारत के खिलाफ बयानबाज़ी उस समय तेज़ हुई थी, जब अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना 5 अगस्त 2024 को अचानक बांग्लादेश छोड़कर नई दिल्ली पहुँचीं और अपनी पार्टी अवामी लीग के कई नेताओं के साथ राजनीतिक शरण की मांग की। नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार ने हसीना के प्रत्यर्पण की मांग उठाई, क्योंकि बांग्लादेशी ट्रिब्यूनल में उन्हें मृत्युदंड का सामना करना पड़ सकता था। भारत की ओर से इस पर कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला। इसके बावजूद प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने हसीना के खिलाफ आक्रामक सार्वजनिक बयान देने से परहेज़ किया और इसे कानूनी प्रक्रिया का विषय बताया।

धार्मिक अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर बांग्लादेश लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय आलोचना झेलता रहा है। हाल के वर्षों में अल्पसंख्यक परिवारों पर हमलों की घटनाओं ने वैश्विक मीडिया का ध्यान खींचा। ऐसे माहौल में इस चुनाव में चार गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनमें दो हिंदू उम्मीदवार—गोयेश्वर चंद्र रॉय और निताई रॉय चौधरी—BNP के टिकट पर विजयी हुए और उन्होंने जमात समर्थित प्रत्याशियों को पराजित किया। इसके अलावा सचिन प्रू और दीपेन दीवान भी जीतकर संसद पहुँचे। प्रधानमंत्री रहमान ने रॉय चौधरी और दीवान को मंत्रिमंडल में शामिल कर अल्पसंख्यकों के प्रति एक प्रतीकात्मक लेकिन अहम संदेश दिया।

यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी आज लगभग 13 मिलियन, यानी कुल जनसंख्या का करीब 8 प्रतिशत है, जबकि विभाजन के समय यह 22 प्रतिशत से अधिक थी। अल्पसंख्यकों पर दबाव और पलायन का सिलसिला दशकों से चला आ रहा है और इसमें केवल हालिया सरकारों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

भारत की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम में तेज़ और संतुलित रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BNP की जीत पर तुरंत बधाई दी और तारिक रहमान को फोन करने वाले पहले वैश्विक नेता बने। दोनों देशों के पारस्परिक हितों, क्षेत्रीय शांति और सहयोग को आगे बढ़ाने की इच्छा सार्वजनिक रूप से जताई गई। हालांकि 17 फरवरी को ढाका में हुए शपथ ग्रहण समारोह में मोदी शामिल नहीं हो सके, लेकिन भारत की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने प्रतिनिधित्व किया, जिसे एक सकारात्मक कूटनीतिक संकेत के रूप में देखा गया।

अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में अपने अंतिम टेलीविज़न संबोधन में डॉ. यूनुस ने इस चुनाव को “सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि बांग्लादेशी लोकतंत्र के नए अध्याय की शुरुआत” बताया। उन्होंने नेपाल, भूटान और उत्तर-पूर्वी भारत के साथ क्षेत्रीय सहयोग की संभावनाओं पर भी ज़ोर दिया। ढाका के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज़ है कि डॉ. यूनुस को देश का अगला राष्ट्रपति बनाया जा सकता है। हाल ही में हुए ‘नेशनल जुलाई चार्टर’ पर जनमत संग्रह में 70 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने राष्ट्रपति की शक्तियां बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन किया है, जिससे सत्ता संतुलन को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता हालांकि जमात-ए-इस्लामी का उभार है। 1971 के मुक्ति संग्राम का विरोध करने वाली यह इस्लामी पार्टी पहली बार संसद में मुख्य विपक्ष के रूप में उभरी है। 11-दलीय गठबंधन के साथ 77 सीटें जीतने में जमात की निर्णायक भूमिका रही, जिनमें से 68 सीटें उसने अकेले जीतीं—खासकर भारत की सीमा से सटे इलाकों में। इसके साथ ही नई बनी नेशनल सिटिजन पार्टी ने भी जमात के साथ गठजोड़ कर छह सीटें हासिल की हैं।

कुल मिलाकर, ढाका में BNP की सरकार भारत के लिए एक नई अग्निपरीक्षा है। एक ओर संयमित नेतृत्व, संवाद की इच्छा और अल्पसंख्यकों को सीमित ही सही, प्रतिनिधित्व देने के संकेत हैं; दूसरी ओर कट्टरपंथी ताकतों का मज़बूत विपक्ष और क्षेत्रीय सुरक्षा की जटिल चुनौतियाँ भी सामने हैं। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह बदले राजनीतिक परिदृश्य में ढाका के साथ संबंधों को सतर्कता, संतुलन और दूरदृष्टि के साथ आगे बढ़ाए।

(लेखक उत्तर पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार और दक्षिण एशिया की राजनीति पर लंबे समय से लिखते हैं)

पत्रकारिता में किस जाति के लोग सबसे ज्यादा है

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रवि मिश्रा

फिल्म सिटी (नोएडा)। इस कुतर्क का कोई उत्तर नहीं कि पत्रकारिता में फलां लोग क्यों हैं, फलां लोग क्यों नहीं …पत्रकारिता की पढ़ाई को चुनने का अवसर 12वीं के बाद से सबके लिए खुल जाता है। भारत के सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में दाखिले कि जो प्रक्रिया है यहां भी वैसी ही है। मेरा अपना अनुभव एक छात्र के रूप में ये कहता है कि दाखिला लेने से लेकर पढ़ाई तक इस पेशे को अपने जीवन के रूप में चुनने वाले किसी भी छात्र के दिमाग में कम से कम ये बात कहीं नहीं आती कि वो पत्रकारिता की पढ़ाई इसलिए करेगा क्योंकि उसकी जाति, या धर्म, या राज्य या समाज के लोग इसमें ज्यादा हैं । मुझे नहीं पता कि ये किसी और पेशे में होता है या नहीं पर जर्नलिज्म के चुनाव में कोई भी छात्र ये बात तो कहीं से भी नहीं सोचता ।

पढ़ाई के खत्म होते होते सबको पता चल जाता है कि ये पेशा निर्दयता की हद तक मेहनत करवाने वाला, लगातार सीखने की कभी न खत्म होने वाली यात्रा से भरा , भारी शारीरिक जोखिम, आर्थिक जोखिम, अनपेड से शुरू होकर अंडर पेड रह जाने , ऑफिस और ऑफिस से बाहर की जटिल राजनीति में सदा उलझे रहने और उसपर हर दिन नौकरी के आखिरी दिन की तरह एक्यूरेसी को मैच करने की टाइम के खिलाफ एक अनवरत रेस है ।
नींद, भूख, प्यास परिवार, त्योहार को जो कुर्बान करने में सबसे पहले हाथ उठा कर आगे आता है वही पत्रकार बना रह पाता है। विश्वास कीजिए कि इस हालात को भांप लेने वाले, व्यावहारिक ज्ञान वाले कई छात्र शुरू में ही ये पेशा छोड़ देते हैं।

फिर भी कुछ हम जैसे लोग आगे बढ़ते हैं इसलिए नहीं कि हमारी जाति या धर्म या समाज के लोग यहां हमें हाथों हाथ लेने को तैयार बैठे हैं। बल्कि इसलिए कि हम इन हालात में भी इस पेशे से प्यार करते हैं और बिना सैलेरी, आधी सैलेरी और कभी 18 तो कभी 20 घंटे या उससे भी ज्यादा देर तक दुनिया के सुख – दुख में डूबे रहने का एक पागलपन होता हैं जो इस करियर से शुरू होता है , जैसे – जैसे हम आगे बढ़ते हैं इसका दबाव खुद पर बढ़ता ही जाता है। छोटी शुरुआत से एक अच्छे संस्थान तक पहुंचना सपना होता तो है पर हमारे काम के प्रेशर वाला नेचर कभी और कहीं नहीं बदलता। ये हम सभी जानते भी है और मनाते भी है।

ये कहने में मुझे गर्व है कि करियर शुरू करने से लेकर आजतक मै या मेरे सभी साथी, जितने लोग काम करते रहे हैं किसी को व्यक्तिगत त्याग या मेहनत में कोई आरक्षण नहीं है। ये शायद इकलौता पेशा है जहाँ मेहनत हर विपरीत परिस्थिति में आपको मजबूत बनाए रखती है।

हम में से न जाने कितने पत्रकारों ने अपने सिद्धांतों, आदर्श और उसूल की वजह से नौकरियां छोड़ी, इस्तीफे दिये, लम्बी नाइट शिफ्ट सजा के रूप में काटी, सस्पेंड हुए और अपमानित भी हुए । अगर किसी को लगता है कि जाति या धर्म देखकर ये सब होता होगा तो मुझे ये सोचने वालों पर तरस आता है क्योंकि 90 प्रतिशत लोग वही हैं जो आपके लिए स्टैंड लेने की वजह नौकरियों से इस्तीफा दे रहे होते हैं या संस्थान में संघर्ष कर रहे होते हैं।
जमीन से लेकर स्टूडियो तक खड़ा हर पेशेवर पत्रकार जो बरसों से यहां कठिन हालात में टिका हुआ है कम से कम उसकी तपस्या का उपहास मत कीजिए । आपकी पसंद या नापसंद वाला कोई एक या दो anchor या पत्रकार इन हजारों पत्रकारों की मेहनत , बलिदान और सेवा के उपहास का कारण नहीं बनने चाहिए । अगर आप ये कर रहे हैं तो आप आपके लिए ही देश के कोने कोने में खड़े सिपाहियों को खत्म कर रहे हैं।

जिसे भी लगता है कि ये काम बहुत सरल, प्रभुत्व, एकाधिकार, बहुत पैसे वाला और बहुत सुरक्षित है , मेरी तरफ से उनका स्वागत है कि वो आएं और सिर्फ एक महीने एक पेशेवर माहौल में अपने उसी ज्ञान के साथ काम कर के दिखाएं जो दिन रात फ्री के सोशल मीडिया पर फ्री में देते रहते हैं ।

और जब मैं आप सभी मित्रों और समाज के लोगों को ये बात कह रहा हूं तो मेरा आशय न तो अभिमान का है, न किसी को कमतर बताने जताने का है और न ही खुद को महान बताने का । मेरा आग्रह ये है मेरे हजारों पत्रकार भाई और साथी बहुत मेहनत करते हैं आपके लिए । कुछ कम या कुछ ज्यादा , कुछ सहमति और असहमति के साथ। पर उनकी इस संघर्ष की यात्रा को ये कह कर अपमानित न किया जाए कि जाति, धर्म या समाज को देखकर लोग यहां भीड़ लगा रहे हैं। इस काम में एक ही जाति सबसे ज्यादा और बड़ी है वो है कड़ी मेहनत। जो धैर्य के साथ, लगन के साथ , विपरीत हालत में मान और अपमान सहते हुए जनता के लिए मेहनत करता है वो यहां लंबा चलता है।

आपकी पसंद या नापसंद के एक दो लोगों से ये मेहनती लोग परिभाषित नहीं होने चाहिए। पत्रकारिता में एक ही जाति के लोग सबसे ज्यादा हैं, और ये वही हैं जिनके अंदर कॉलेज में कदम रखने के समय से ही ये आग घर कर जाती है कि आराम नहीं , हमें मेहनत का रास्ता चुनना है ताकि हम किसी की आवाज बन सके ।

हमारी जाति कठिन मेहनत की जाति है और इस जाति में सबका स्वागत है।

डॉ. कमलकांत बुधकर के नाम पर, ‘बुधकर भवन’ कहलाएगा प्रेस क्लब सभागार

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अजित वडनेरकर

हरिद्वार: प्रेस क्लब हरिद्वार एवं भारतीय संवाद परिषद के संयुक्त तत्त्वावधान में एक भावपूर्ण समारोह का आयोजन किया गया। इस दौरान प्रेस क्लब सभागार में 1986 से 2025 तक के सभी पूर्व अध्यक्षों के चित्रों का लोकार्पण किया गया।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. शिवशंकर जायसवाल, कौशल सिखौला एवं गोपाल रावत ने संयुक्त रूप से इन चित्रों का अनावरण किया। यह पहल प्रेस क्लब की कार्यकारिणी द्वारा पत्रकारिता के इतिहास को संरक्षित करने और पूर्वजों के योगदान को याद रखने के उद्देश्य से की गई है।


समारोह में एक और महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने अनुकरणीय योगदान के लिए प्रसिद्ध स्वर्गीय वरिष्ठ पत्रकार डॉ. कमलकांत बुधकर की स्मृति में प्रेस क्लब सभागार का नामकरण “बुधकर भवन” के रूप में किया जाएगा। डॉ. बुधकर हरिद्वार प्रेस क्लब के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
उन्होंने पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य, कविता एवं शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में हिन्दी पत्रकारिता के प्राध्यापक रह चुके थे और कुम्भ मेले जैसे बड़े आयोजनों में सक्रिय पत्रकार के रूप में जाने जाते थे।

प्रेस क्लब के वर्तमान अध्यक्ष धर्मेंद्र चौधरी एवं महामंत्री दीपक मिश्रा ने कहा, “स्वर्गीय डॉ. कमलकांत बुधकर के आदर्शों और योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनकी स्मृति में सभागार का नाम ‘बुधकर भवन’ रखना हमारे लिए गौरव की बात है। हम सभी पत्रकार उनके दिखाए मार्ग पर चलकर पत्रकारिता के मिशन को ईमानदारी से निभाएंगे।”

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि प्रेस क्लब में होली मिलन कार्यक्रम भी उत्साह के साथ मनाया जाएगा, जिसमें सदस्यों और अतिथियों की भागीदारी रहेगी।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. शिवशंकर जायसवाल एवं आदेश त्यागी ने पूर्व अध्यक्षों के चित्र स्थापित करने और सभागार के नामकरण के निर्णय का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि प्रेस क्लब हमेशा से पत्रकारों के हितों के लिए निर्णायक भूमिका निभाता रहा है और यह कदम इतिहास को जीवंत रखने की दिशा में सराहनीय है।
कार्यक्रम में कोषाध्यक्ष काशीराम सैनी, कौशल सिखौला, गोपाल रावत, रमेश खन्ना, रजनीकांत शुक्ला, सुभाष कपिल, बालकृष्ण शास्त्री, अविक्षित रमन, प्रदीप गर्ग, आदेश त्यागी, दीपक नौटियाल, संजय आर्य, अमित शर्मा, अमित गुप्ता सहित अन्य गणमान्य पत्रकार और सदस्य उपस्थित रहे।
यह समारोह हरिद्वार की पत्रकारिता जगत में सम्मान और स्मृति को जीवित रखने की एक खूबसूरत मिसाल पेश करता है।
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पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया से परिचय कराने और इन विधाओं का संस्कार देने वाले एकमेव मार्गदर्शक व गुरु मेरे पूज्य मामा की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए हरिद्वार के पत्रकार बन्धुओं व साहित्य समाज के सभी महानुभावों के प्रति सादर विनत हूँ।

सम्मेलन का उद्देश्य साम्राज्यवाद स्थापित करना नहीं, बल्कि समावेशिता को बढ़ावा देना है – डॉ. सच्चिदानंद जोशी

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नई दिल्ली : संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक अंतःप्रवाह” का समापन गरिमामय समारोह के साथ सम्पन्न हुआ। 18–19 फरवरी को आयोजित इस सम्मेलन में भारत और मंगोलिया के विद्वानों, शोधकर्ताओं, सांस्कृतिक विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं ने भाग लेकर दोनों देशों के बहुआयामी सांस्कृतिक संबंधों पर व्यापक विचार-विमर्श किया।

समापन सत्र की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की। उन्होंने सम्मेलन में सहभागिता के लिए सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि हम इस संवाद की शुरुआत करना चाहते थे, ताकि भारत और उन देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर चर्चा हो सके, जो ‘बृहत्तर भारत’ की परिधि में आते हैं। इसका उद्देश्य किसी प्रकार का साम्राज्यवाद स्थापित करना नहीं है, बल्कि समावेशिता को बढ़ावा देना है। हम केवल यह जानना चाहते हैं कि भारत की सांस्कृतिक छाप किन-किन देशों में दिखाई देती है और विभिन्न देशों के बीच कौन-कौन से साझा तत्व हैं, जो किसी न किसी रूप में भारत से जुड़े हुए हैं। ऐसा महत्वपूर्ण प्रकल्प तभी सशक्त रूप से आगे बढ़ सकता है, जब इस प्रकार का सम्मेलन आयोजित हो।

जैसा कि इस सम्मेलन में हम सबने बात की, कि मंगोलिया में भारत की गहरी उपस्थिति दिखाई देती है। हम यह भी जानना चाहते थे कि भारत में मंगोलिया कितनी मात्रा में विद्यमान है। दुर्भाग्यवश, हमारी शिक्षा-प्रणाली और अकादमिक आवश्यकताओं के दबाव के कारण हम अपने पड़ोसी देशों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाए, जबकि उनके साथ हमारे सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। हमारा प्रमुख ध्यान हमेशा पश्चिम और यूरोप-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर रहा है। यूरोप और अमेरिका को समझने में हम अधिक रुचि लेते रहे, जबकि अपने पड़ोसी देशों के साथ साझा सांस्कृतिक तत्वों को समझने की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही।

‘बृहत्तर भारत’ की मूल भावना यही है कि हम अपने पड़ोसी देशों में उन जड़ों को तलाशें, जिनमें संस्कृति, समाजशास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान और यहां तक कि राजनीति के स्तर पर भी समानताएं मौजूद हैं। इस दृष्टि से यह सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब इस सम्मेलन की अंतिम प्रकाशन सामग्री सामने आएगी, तो वह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दस्तावेज़ सिद्ध होगी। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत-मंगोलिया सम्बंधों के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त करेगी।

हम एक ठोस कार्य-योजना भी तैयार करना चाहते हैं, जिससे यह तय हो सके कि इन अध्ययनों को आगे कैसे बढ़ाया जाए, हमारे विभिन्न विश्वविद्यालयों, संस्थानों और महाविद्यालयों में किस प्रकार के शोध किए जाएं, किस प्रकार की कार्यशालाएं और प्रदर्शनी आयोजित की जाएं, और शिलालेखों, पाण्डुलिपियों तथा अन्य दस्तावेज़ों के अध्ययन को किस प्रकार प्रोत्साहित किया जाए। इन सभी पहलुओं को इस सम्मेलन की सिफारिशों के आधार पर आगे बढ़ाया जा सकता है। मैं उम्मीद करता हूं कि इस सम्मेलन के दौरान जो सम्बंध और आपसी जुड़ाव स्थापित हुए हैं, वे आने वाले वर्षों में और अधिक सुदृढ़ होंगे।

आईजीएनसीए की ट्रस्टी और सम्मेलन की संयोजक प्रो. निर्मला शर्मा ने सम्मेलन के समापन उद्बोधन में दो दिवसीय सत्रों के निष्कर्षों को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक सम्बंधों का आधार आध्यात्मिक निकटता और ऐतिहासिक संवाद रहा है। उन्होंने पाण्डुलिपि संरक्षण, बौद्ध अध्ययन, सांस्कृतिक अनुसंधान और शैक्षिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर बल दिया।

सम्मेलन के दौरान विभिन्न सत्रों में भारत–मंगोलिया के ऐतिहासिक सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत सम्बंध, बौद्ध धर्म और आध्यात्मिक परम्पराओं का साझा विरासत, पांडुलिपि एवं ग्रंथ परम्परा का संरक्षण, कला एवं प्रदर्शनकारी परम्पराएं, लोक-संस्कृति, शिक्षा और अकादमिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कूटनीति तथा समकालीन सहयोग की संभावनाओं जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। विद्वानों ने इस बात पर विशेष बल दिया कि दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को संरक्षित करते हुए युवा पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।

समापन सत्र में मंगोलिया और अन्य देशों से आए कई प्रतिनिधियों तथा भारत की प्रो. सुनीता द्विवेदी ने भी अपना अनुभव बयां किया। इस अवसर पर, भारत में मंगोलिया के पूर्व राजदूत और भारतीय अध्ययन केंद्र (सीआईएस) के निदेशक प्रो. ओ. न्यामदाव्वा ने भी भारत-मंगोलिया के सम्बंधों पर बात की। कार्यक्रम के अंत में, आईजीएनसीए के बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन विभाग के प्रमुख प्रो. धर्म चंद चौबे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन भारत–मंगोलिया सम्बंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने तथा भविष्य में संयुक्त शोध एवं सांस्कृतिक परियोजनाओं के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।

ग़ौरतलब है कि इस सम्मेलन का उद्घाटन 18 फरवरी को केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया था। उन्होंने इस सम्मेलन को केवल अकादमिक अभ्यास भर नहीं, बल्कि साझा आध्यात्मिक और कलात्मक परम्पराओं तथा निरंतर सांस्कृतिक प्रवाह से प्रेरित बताया। उन्होंने भारत और मंगोलिया के बीच ऐतिहासिक आदान–प्रदान के बारे में बताते हुए कहा कि है कि दोनों सभ्यताओं के बीच आध्यात्मिक आदान–प्रदान के साथ–साथ वैज्ञानिक ज्ञान भी प्रवाहित हुआ। मंगोलियाई कंजूर को उन्होंने दोनों देशों के लोगों के बीच एक पवित्र सेतु बताया।

इस प्रकार, यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारत–मंगोलिया के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊर्जा प्रदान कर गया।

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