सोमनाथ से जागृत होता भारत का सांस्कृतिक स्वाभिमान

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मुकेश वशिष्ठ

दिल्ली । भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों पुरानी संस्कृति, अध्यात्म, त्याग और आत्मगौरव की अखंड परंपरा का जीवंत स्वरूप है। इस राष्ट्र की आत्मा उसके तीर्थों, मंदिरों, ऋषि-परंपरा और उन मूल्यों में बसती है, जिन्होंने असंख्य संघर्षों और आक्रमणों के बावजूद भारतीय सभ्यता को अमर बनाए रखा। यदि भारत की इसी सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय स्वाभिमान का कोई सर्वोच्च प्रतीक है, तो वह निस्संदेह सोमनाथ मंदिर है।
सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की अदम्य आस्था, आत्मबल और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। यह वह पवित्र धरा है, जिसने एक ओर विदेशी आक्रमणों की विभीषिका देखी, तो दूसरी ओर पुनर्निर्माण और पुनरुत्थान का गौरव भी अनुभव किया। इतिहास साक्षी है कि विदेशी आक्रांताओं ने अनेक बार इस मंदिर को ध्वस्त करने का प्रयास किया, किंतु भारत की सांस्कृतिक चेतना को कभी पराजित नहीं कर सके। विशेष रूप से 1025 ईस्वी में महमूद गजनवी का आक्रमण भारतीय सभ्यता पर एक क्रूर प्रहार माना जाता है। मंदिर को तोड़ा गया, उसकी संपदा लूटी गई, किंतु भारत की आत्मा को झुकाया नहीं जा सका।

सोमनाथ की सबसे बड़ी विशेषता उसका पुनर्जन्म है। वह जितनी बार टूटा, उतनी ही दृढ़ता और भव्यता के साथ पुनः खड़ा हुआ। यही कारण है कि सोमनाथ भारत के आत्मसम्मान, अटूट संकल्प और सांस्कृतिक जीवटता का अमर प्रतीक बन गया। यह मंदिर हमें स्मरण कराता है कि कोई भी शक्ति उस राष्ट्र को पराजित नहीं कर सकती, जो अपनी संस्कृति, परंपरा और आस्था से गहराई से जुड़ा हो।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब देश विभाजन की पीड़ा और अस्थिरता से गुजर रहा था, तब भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का ऐतिहासिक संकल्प लिया। यह निर्णय केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि नवस्वतंत्र भारत के आत्मगौरव और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करने का राष्ट्रीय प्रयास था। सरदार पटेल भली-भांति जानते थे कि कोई भी राष्ट्र तभी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकता है, जब उसे अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व हो।

11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्मित स्वरूप का लोकार्पण किया गया। वह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत की सांस्कृतिक चेतना की उद्घोषणा थी। अपने ऐतिहासिक संबोधन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि “सोमनाथ का पुनर्निर्माण यह प्रमाणित करता है कि राष्ट्र की आत्मा को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।” उनके ये शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक और प्रेरणादायी प्रतीत होते हैं।

आज जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और लोकार्पण के 75 वर्ष पूर्ण होने पर “अमृत महोत्सव” आयोजित किया जा रहा है तथा इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति प्रस्तावित है, तब यह आयोजन केवल श्रद्धा का विषय नहीं रह जाता, बल्कि भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय चेतना का उत्सव बन जाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की विकास यात्रा को उसकी सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया है। उनकी दृष्टि केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि वे भारत को उसकी सभ्यतागत पहचान के साथ विश्व मंच पर स्थापित करना चाहते हैं। यही कारण है कि आधुनिक अवसंरचना, डिजिटल क्रांति और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों के साथ-साथ काशी विश्वनाथ धाम, केदारनाथ और सोमनाथ जैसे तीर्थों के पुनरोद्धार को भी अभूतपूर्व महत्व दिया गया है।

वर्षों तक भारत में आधुनिकता को अपनी परंपराओं से दूरी बनाकर देखने की प्रवृत्ति रही, किंतु अब यह धारणा तेजी से बदल रही है। आज भारत अपनी संस्कृति, योग, अध्यात्म और सनातन मूल्यों को विश्व के समक्ष गर्वपूर्वक प्रस्तुत कर रहा है। यह केवल सांस्कृतिक जागरण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सभ्यतागत पुनर्जागरण का प्रतीक है।

सोमनाथ का अमृत महोत्सव केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य के भारत की दिशा का संकेत भी है। यह आयोजन हमें यह संदेश देता है कि विकास और विरासत परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जो राष्ट्र अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वही विश्व में स्थायी नेतृत्व स्थापित कर सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को केवल आस्था का विषय न मानें, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय चेतना, सभ्यतागत गौरव और आत्मविश्वास के प्रतीक के रूप में देखें। सोमनाथ हमें यह शिक्षा देता है कि संघर्ष चाहे कितने ही बड़े क्यों न हों, यदि राष्ट्र अपनी आत्मा से जुड़ा रहे, तो उसका पुनरुत्थान निश्चित है।

निस्संदेह, सोमनाथ भारत की अस्मिता, आत्मगौरव और सांस्कृतिक चेतना का अमर प्रतीक है। आज का भारत उसी चेतना को आधार बनाकर एक ऐसे भविष्य की ओर अग्रसर है, जहाँ आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चलती हैं। यही वह मार्ग है, जो भारत को केवल एक विकसित राष्ट्र ही नहीं, बल्कि विश्व की सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।

(लेखक मुख्यमंत्री के मीडिया समन्वयक है)

वामपंथियों की श्रद्धांजलि सभा में मेरी तरफ़ से भी दो पुष्प अर्पित

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शिशु रंजन

दिल्ली । भारत जैसे विशाल और महान लोकतांत्रिक देश में पहली बार ऐसा हुआ है जब किसी भी राज्य में वामपंथी यानी की कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट सरकार नहीं है। देश की स्वतंत्रता के बाद जब १९५१-५२ में पहले आम चुनाव हुए थे तो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया १६ सांसदों के साथ और सोशलिस्ट पार्टी १२ सांसदों के साथ देश में क्रमशः दूसरी और तीसरी बड़ी पार्टी थी। कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा का विकास कुछ इस कदर हुआ कि १९५७ में, यानी की पाँच वर्ष बाद ही EMS Namboodiripad के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने केरल में सरकार बना ली। वामपंथी या समाजवादी का खोल ओढ़ कर वामपंथियों ने अगले कई दशक तक देश के विभिन्न राज्यों में मज़बूत सरकार चलायी। और आज क्या संयोग है कि जब देश को केंद्रीय और राज्य सरकारें मिलकर लगभग नक्सल मुक्त कर चुके हैं, जनता ने भी वोट की चोट से देश को वामपंथ मुक्त कर दिया है।

यह अच्छा हुआ है या बुरा, इस प्रश्न को फिलहाल किनारे रख देतें हैं। चुकी छात्र राजनीति में रहते हुए हमारे कई अच्छे मित्र वामपंथी विचारधारा के रहे हैं और भारतीय परंपरा के अनुसार हम लोग उनके व्यक्तिगत ख़ुशी और दुख में साथ रहते हैं, आज जब वामपंथी विचारधारा की श्रद्धांजलि सभा रखी जाएगी तो अवश्य मेरे तरफ़ से भी उस सभा में दो पुष्प अर्पित किया जाएगा। और उस सभा को संबोधित करते हुए कम्युनिस्ट पार्टी के तथाकथित स्वर्णिम युग की याद कराते हुए यह अवश्य बताया जाएगा कि वामपंथी विचारधारा का इस देश से विदा हो जाने के पीछे के कारण क्या रहे हैं।

लोकोक्ति है कि समय बड़ा बलवान होता है। श्रद्धांजलि सभा में पुष्प तर्पण करने के बाद अगर संबोधन करने का अवसर मिलता तो अवश्य यह कहता कि यह समय ही तो है जिसके कारण अपने जीवनकाल में इस देश में वामपंथ की श्रद्धांजलि सभा होते हुए देख रहे हैं। वरना इस सभा को संबोधित करने की इच्छा तो जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भी रही होगी जो पहली लोकसभा में मात्र ३ सीट के साथ भारतीय राजनीति में राष्ट्रवादी राजनीति की शुरुआत कर रहे थे, वही वामपंथी दल रूस व चीन परस्त राजनीति की फसल खड़ी करने में लगे हुए थे। इस सभा को संबोधित करने की इच्छा डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी की भी रही होगी जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना उसी वर्ष की थी जब १९२५ में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना हुई। एक तरफ़ संघ का अखंड भारत का स्वप्न और दूसरी तरफ़ कम्युनिस्टों का उन तत्वों से प्रेम जो भारत को धर्म के आधार पर विभाजित करने का स्वप्न देख रहे थे। इस प्रकार की सभा को संबोधित करने का स्वप्न भारत रत्न श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने भी देखा होगा या विद्यार्थी परिषद से राजनीति में प्रवेश किये स्वर्गीय श्री अरुण जेटली जी ने देखा होगा क्यूँकि एक तरफ़ भाजपा हिंदुत्व के नीचे समाज को एकत्रित कर रही थी तो कम्युनिस्ट पार्टियां जाति के नाम पर समाज में विष घोल रहे थे। खैर, ऐसे सारे महापुरुष लोगों की पुण्यात्माएं उस श्रद्धांजलि सभा में जरूर आयेंगे क्यूँकि भारतीय परंपरा में विचारधारा के परे व्यक्ति दुख की घड़ियों में एकजुट होकर श्रद्धासुमन अर्पित करता है।

ये समय ही तो है कि आज साथ में जन्म लेने वाला आरएसएस संगठन अपना स्वर्णिम शताब्दी वर्ष मना रहा है और वामपंथ श्रद्धांजलि सभा। वही वामपंथ जिसके अनुयायी संघ को जड़ से समाप्त करने के लिए सौगंध खाते थे, भाजपा को हरा दे इसके लिए कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसी अपनी दुश्मन दलों के गोद में बैठने से परहेज नहीं की, संघ के अनुयायी व विद्यार्थी परिषद और भाजपा के कार्यकर्ताओं का सार्वजनिक मजाक उड़ाते हुए अपमानित करना पसंदीदा शगल हुआ करता था, आज उस वामपंथी विचारधारा की श्रद्धांजलि सभा लगाने के लिए भी पर्याप्त लोग नहीं जुटेंगे। आज उस विचारधारा के लोगों की आत्मा पर दुख का कितना बड़ा पहाड़ टूटा होगा जब वो अटक से कटक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश को भगवामय देख रहे होंगे। कामरेड सीताराम येचुरी जी की आत्मा तो इस बात से प्रसन्न होगी कि यह दिन देखने के पहले “राम नाम सत्य है” का उद्घोष करवाते हुए वो इस पृथ्वीलोक से विदा हो गए। इसीलिए, इस भयंकर पीड़ादायी वेदना में हमसब का कर्तव्य बनता है कि उनके साथ हम संवेदना प्रकट करें।

श्रद्धांजलि सभा में संबोधन समाप्ति के पहले अवश्य उन कारणों पर भी बात करता जिसके कारण यह दुर्दिन देखना पड़ा हो। चिरंजीवी रहने के लिए हमे बीमारी से बचना होता है। कम्युनिस्ट सामाजिक बीमारी को गले लगाते थे। वो बीमारियाँ कौन सी थी।

पहली, अपने विचारधारा में इस देश को ढालने की जिद। यह देश में वेद का भी स्थान है और बुद्ध का भी। इसलिए सिर्फ़ एक विचार से देश चलाने वालों में बीमारी लग जाएगी और यही कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों के साथ हुआ।

दूसरा, क्षद्म धर्मनिरपेक्षता जिसकी आड़ में मुसलमानों और ईसाइयों का तुष्टिकरण। भारत की आम जनता इस बीमारी के कारण कम्युनिस्टों से दूर होती गई।

तीसरा, समाज का जाति में विभक्तीकरण। वोट पॉलिटिक्स के चक्कर में हिंदू समाज को जातियों में बाँटकर उन्हें एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा करके कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टियाँ भारत के लोगो को जड़ो से काटने का कार्य कर रही थी जिसे आम जनमानस ने देर से ही सही पर पहचान लिया।

चौथा, जनमानस को अपने बिचार समझाने के बजाय सभी संस्थानों पर अपने आदमी बिठा कर सिस्टम पर कब्जा करने की प्रवृति। भारतीय संस्कृति में एकाधिकार पसंद नहीं किया जाता, इसका कई उदाहरण हमारे हजारों वर्ष पुराने इतिहास का हिस्सा है।

और पाँचवाँ, अहंकार तो जब रावण का नहीं रहा तो भला कामरेड लोग का कैसे रहता। ये तो बस समय का खेल है। अहंकार वश जब कम्युनिस्ट भगवान राम का अपमान करते थे, ये आस्तिक जनमानस पर नास्तिक विचारों को थोपने जैसा था जिसे समाज कब तक बर्दाश्त करता। कालांतर के वामपंथियों में विचारधारा का न पढ़ना किंतु विचारधारा को समझने का ढोंग करना आत्मघाती सिद्ध हुआ। मजदूर वर्ग की भलाई के नाम पर उद्योग धंधे बंद करवाने वाली विचारधारा अपने मजदूर हित के प्रति ईमानदार नहीं थी, वरना उद्योगपति उनके दुश्मन नहीं बल्कि, उनके साथी रहते। प्रतिस्पर्धा के प्रति उनके विचारधारा की घृणा प्रतिभाशाली लोगों को इनसे दूर करती रही। आरक्षण को सामाजिक प्रगति का पर्याय बनाने के बजाय इसे वोटबैंक राजनीति के टूल की तरह उपयोग करना इसका उदाहरण है। इन सब में वैचारिक भटकाव में इन्हें पता ही नहीं चला कि कुल्हाड़ी ये स्वयं के जड़ो पर चला रहे थे।

खैर, जो हुआ वो इतिहास है और इतिहास की विवेचना सत्ता करती है। रहा न कोई रोवन हारा कहावत चरितार्थ होने पर है। परंतु, इन सब के बीच हमे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कम्युनिस्ट पार्टी के विचार के बीज जीवित है। हम सब के मध्य। अमरलता के बेल की भाँति। आप अपने इर्द गिर्द देखिए, आपको दिखेंगे। आँखे बंद कर लेने से समस्या का अंत नहीं होता है। वामपंथियों रेवड़ियों को देखिए क्या वो नए अवतार में हैं? तुष्टिकरण पर नजर रखिए। सत्ता के दुरुपयोग पर नजर रखिए। अहंकार पर नजर रखिए। अपने अंदर के वामपंथी पर नजर रखिए। १०० वर्ष बाद जब पुनः इतिहास का अवलोकन होगा, किसकी श्रद्धांजलि सभा होगी, ये देखने के लिए न हम रहेंगे न आप। पर हमारे विचार अवश्य रहेंगे।

बंगाल के तपस्वी स्वयंसेवक : माखनलाल सरकार और राष्ट्रवादी आंदोलन की अनसुनी कहानी

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दिल्ली । पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में अनेक बड़े नाम हुए, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी रहे जिन्होंने कभी पद, प्रसिद्धि या सत्ता की इच्छा नहीं की। उन्होंने अपना पूरा जीवन केवल राष्ट्र और विचार के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे ही एक कर्मयोगी थे माखनलाल सरकार, जिनका नाम हाल के दिनों में तब चर्चा में आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच पर उनके चरण स्पर्श कर उनका सम्मान किया।

लेकिन माखनलाल सरकार की कहानी केवल उस एक क्षण की नहीं है। यह कहानी उस पीढ़ी की है जिसने विभाजन, प्रतिबंध, संघर्ष और विरोध के बीच भी राष्ट्रवादी विचार को जीवित रखा।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी

माखनलाल सरकार उन शुरुआती कार्यकर्ताओं में थे जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रवादी आंदोलन को बंगाल की धरती पर मजबूत करने का कार्य किया। वे श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगियों में गिने जाते थे और लंबे समय तक संगठन के विस्तार में सक्रिय रहे।

उस समय बंगाल की राजनीति पूरी तरह अलग दिशा में जा रही थी। राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए जमीन तैयार करना आसान नहीं था। विरोध, हिंसा और राजनीतिक दबाव आम बात थी। लेकिन माखनलाल सरकार जैसे कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों को जोड़ते रहे।

राष्ट्रगान गाने पर हुई गिरफ्तारी

उनके जीवन का एक ऐसा प्रसंग आज भी लोगों को भावुक कर देता है। परिवार के अनुसार, एक समय ऐसा भी आया जब RSS पर प्रतिबंध लगा हुआ था और राष्ट्रवादी गतिविधियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। उसी दौरान माखनलाल सरकार को राष्ट्रगान गाने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था।

आज की पीढ़ी के लिए यह कल्पना करना कठिन है कि कभी “वंदे मातरम्” और “राष्ट्रगान” भी संघर्ष का कारण बन सकते थे। लेकिन उस दौर में ऐसे हजारों स्वयंसेवकों ने जेल और प्रताड़ना झेली।

कश्मीर आंदोलन से बंगाल तक

1952 में जब कश्मीर आंदोलन 1952 चल रहा था, तब माखनलाल सरकार भी उस आंदोलन का हिस्सा बने। वे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ तिरंगा आंदोलन में शामिल हुए और इसी दौरान उन्हें गिरफ्तार भी किया गया।

उस समय “एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे” का नारा पूरे देश में गूंज रहा था। बंगाल के एक साधारण स्वयंसेवक के रूप में माखनलाल सरकार ने भी इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।

संगठन निर्माण में बड़ी भूमिका

1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद बंगाल में संगठन विस्तार की जिम्मेदारी आसान नहीं थी। माखनलाल सरकार को पश्चिम दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग क्षेत्रों में संगठनात्मक कार्य का दायित्व मिला।

बताया जाता है कि केवल एक वर्ष के भीतर उन्होंने हजारों नए कार्यकर्ताओं को संगठन से जोड़ा। लगातार सात वर्षों तक उन्होंने जिला अध्यक्ष के रूप में कार्य किया और बंगाल में राष्ट्रवादी राजनीति की मजबूत नींव रखने में योगदान दिया।

साधारण जीवन, असाधारण समर्पण

97 वर्ष की आयु में भी माखनलाल सरकार का जीवन बेहद साधारण बताया जाता है। न कोई विशेष सुरक्षा, न प्रचार, न राजनीतिक महत्वाकांक्षा। यही कारण था कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक मंच पर उनका सम्मान किया, तो वह दृश्य पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया।

वह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था—वह उन लाखों अनाम स्वयंसेवकों का सम्मान था जिन्होंने दशकों तक बिना किसी पहचान के संगठन और राष्ट्र के लिए काम किया।

बंगाल में विचार की जड़ें मजबूत करने वाले स्वयंसेवक

आज बंगाल में राष्ट्रवादी राजनीति जिस स्थिति में दिखाई देती है, उसके पीछे दशकों का संघर्ष और हजारों कार्यकर्ताओं का परिश्रम रहा है। माखनलाल सरकार उन लोगों में से थे जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी संगठन को जीवित रखा।

जब राजनीतिक हिंसा और विरोध अपने चरम पर था, तब भी वे लगातार लोगों के बीच जाते रहे। उनके लिए राजनीति सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का मार्ग थी।

जिस प्रकार मोरोपंत पिंगले ने इतिहास और सांस्कृतिक चेतना के अभियानों को दिशा दी, जिस प्रकार एकनाथ रानाडे ने समुद्र के बीच चट्टान को राष्ट्रीय स्मारक बना दिया—उसी प्रकार माखनलाल सरकार जैसे स्वयंसेवकों ने विचार की ऐसी नींव तैयार की, जिस पर आज एक बड़ा संगठन खड़ा दिखाई देता है।

यह कहानी किसी बड़े पद या प्रसिद्धि की नहीं है। यह उस निष्ठा की कहानी है, जो दशकों तक बिना थके, बिना रुके केवल राष्ट्र के लिए कार्य करती रही।

और शायद इसी कारण, जब प्रधानमंत्री ने उनके चरण स्पर्श किए, तो वह दृश्य केवल सम्मान का नहीं—एक युग के संघर्ष को प्रणाम करने का क्षण बन गया।

चार क्राँतिकारियों का बलिदान दिवस 1899- वासुदेव चाफेकर, 1915- भाई बालमुकुन्द, मास्टर अमीरचंद और अबध विहारी को हुई थी फाँसी

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भोपाल । भारतीय स्वतंत्रता साधारण नहीं हैं । यह अनंत बलिदानियों के रक्त अर्पण के बाद मिली । इतिहास के पन्नों में लाखों बलिदानियों के नाम तक नहीं । फिर भी कुछ नाम खोजे जा रहे हैं । इनमें आठ मई का दिन चार बलिदानियों की स्मृति का दिन है ।

भाई बालमुकुन्द (१८८९ – 8 मई १९१५) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी थे। सन 1912 में दिल्ली के चांदनी चौक में हुए लॉर्ड हार्डिग बम कांडमें मास्टर अमीर चंद, भाई बालमुकुंद और मास्टर अवध बिहारी को 8 मई 1915 को फांसी दी गयी थी । ये महान क्रान्तिकारी भाई परमानन्द के चचेरे भाई थे । भाई परमानंद के चिरंजीव स्वतंत्रता संग्राम भाई महावीर मध्यप्रदेश में राज्यपाल रहे । इन सब पर आरोप था कि इन्होंने 1912 में चांदनी चौक में लार्ड हार्डिग पर बम फेंका था। हालांकि इनके खिलाफ कोई प्रमाण नहीं था पर अंग्रेजी शासन ने शक के आधार पर फांसी की सजा सुनाई थी । जिस स्थान पर इन्हें फांसी दी गई, वहां शहीद स्मारक बना दिया गया है जो दिल्ली गेट स्थित मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में स्थित है।
भाई अमीर चंद का जन्म 1869 में हैदराबाद की विधानसभा के सेक्रेटरी के घर हुआ था। उनके मन में देश भक्ति की मान्यता इतनी प्रबल थी कि स्वदेशी आंदोलन के दौरान हैदराबाद के बाजार में उन्होंने स्वदेशी स्टोर खोला जहां वह देशभक्तों की तस्वीरें तथा क्रांतिकारी साहित्य बेचते थे । 1919 में दिल्ली में भी स्वदेशी प्रदर्शनी लगाई । 1912 में दिल्ली में उस समय के वायसरोय लार्ड हार्डिग पर बम फेंकने की घटना में सक्रिय भूमिका निभाई । 1914 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया ।
क्रान्तिकारी भाई अवध बिहारी इनका जन्म – 14 नवम्बर, सन 1889 ई. कच्चा कटरा मौहल्ला,चांदनी चौक, दिल्ली में हुआ था । ये भी बहुचर्चित दिल्ली केस में शामिल थे । क्रांतिवीर अवधबिहारी ने केवल 25 वर्ष की अल्पायु में ही अपना शीश मां भारती के चरणों में समर्पित कर दिया ।

अवधबिहारी का जन्म चांदनी चौक दिल्ली के मोहल्ले कच्चा कटरा में 14 नवम्बर सन 1889 को हुआ था. इनके पिता श्री गोविन्द लाल श्रीवास्तव जल्दी ही स्वर्ग सिधार गये, अब परिवार में अवधबिहारी उनकी मां तथा एक बहिन रह गयी । परिवार ने बड़े संघर्ष के दिन देखे । पर अवधबिहारी बहुत मेधावी थे. गणित में सदा उनके सौ प्रतिशत नंबर आते थे । उन्होंने सब परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं । उन्हें पढ़ने केलिये छात्रवृत्ति मिली, परिवार चलाने के लिये उन्होंने ट्यूशन की । अवधबिहारी ने 1908 में सेंट स्टीफेंस कालेज से स्वर्ण पदक लेकर बी.ए किया था । दिल्ली में उनकी मित्रता मास्टर अमीरचंद आदि क्रांतिकारियों से हुई । और वे क्राँतिकारी आँदोलन से जुड़ गये । तब मास्टर अमीरचन्द, लाला हनुमन्त सहाय, मास्टर अवध बिहारी, भाई बालमुकुन्द और बसन्त कुमार विश्वास आदि क्राँतिकारियों द्वारा वायसराय हार्डिंग को बम से उड़ाने की योजना बनी । 23 दिसम्बर सन 1912 को दिल्ली के चांदनी चौक स्थित पंजाब नेशनल बैंक की छत से बम फेंका गया । वायसराय हाथी पर बैठा था. निशाना चूक जाने से वह मरा तो नहीं, पर घायल हो गया । शासन ने इसकी जानकारी देने वाले को एक लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा की । शासन ने कुछ लोगों को पकड़ा । जिनमें से दीनानाथ के मुखबिर बन गया और उसने इस विस्फोट में शामिल सभी क्रांतिकारियों के नाम बता दिये । सभी गिरफ्तार कर लिये गये । उन दिनों देश में अनेक विस्फोट हुए थे । अंग्रेजी पुलिस ने उन काँडों में भी अवधबिहारी को शामिल दिखाया । सभी क्राँतिकारियों को फाँसी की सजा सुनाई गई । अवध बिहारी को सजा सुनाते हुए न्यायाधीश ने लिखा – “अवधबिहारी जैसा शिक्षित और मेधावी युवक गौरव हो सकता है, यह साधारण व्यक्ति से हजार दर्जे ऊंचा है, इसे फांसी की सजा देते हुए हमें दुख हो रहा है.”

8 मई सन 1915 ई. इनकी फांसी की तिथि निर्धारित की गयी ।
वासुदेव हरि चाफेकर वासुदेव चाफेकर का जन्म 1880 में कोंकण में चित्पावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने मराठी भाषा के माध्यम से शिक्षा ले ली। समय के साथ, वह पुणे में चिंचवड में बस गए। बचपन में, तीनों भाइयों ने पिता की मदद करने के लिए हरि कीर्तन की मदद की। इसने चाफेकर भाइयों की शिक्षाओं में विभाजन किया।

वासुदेव चाफेकर ने अपने भाइयों, दामोदर चाफेकर और बालकृष्ण चाफेकर के साथ राजनीति और क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। उन्होंने हथियारों के साथ भारतीय युवाओं को प्रशिक्षण दिया।

पुणे में राजनीतिक विकास से प्रेरित होकर, ये भाई क्रांतिकारी आंदोलन में बदल गए। अंग्रेजों के ब्रिटिश कानून की पुरानी सहमति के लिए अंग्रेजों का एक मजबूत विरोध था। तिलक ने अंग्रेजों के खिलाफ केसरी पर हमला किया, जिन्होंने भारतीय संस्कृति में हस्तक्षेप किया। तीनों भाई इस कॉल से प्रेरित थे। उन्होंने लोगों का आयोजन किया इसी समय, अंग्रेजों ने पुणे में प्लेग की जगह राक्षस पैटर्न पहन कर वाल्टर चार्ल्स रैंडला को भारत में आमंत्रित किया। रंदन ने उपचारात्मक उपायों के अनिवार्य कार्यान्वयन शुरू किया ऐसा करने में, उन्होंने सामाजिक अशांति को दूर करने की कोशिश की। इससे अंग्रेजों के खिलाफ चाफेकर भाई के नफरत का कारण हुआ। उन्होंने जवाबी कार्रवाई करने के लिए एक योजना तैयार की। भाइयों ने अपने खराब व्यवहार के लिए पुणे में रैंड को मारने की साजिश रची। उस समय, हीराम महोत्सव विक्टोरिया की रानी के शासनकाल के साथ मनाया गया था। सब कुछ प्रकाश हो गया था। एक भोज भी आयोजित किया गया था।

22 जून 1897 को दामोदर चाफेकर, एक जवान आदमी ने गाड़ी छोड़ दी और गणेश ख़िंद में इंतजार कर रहे थे, जो रात के मध्य रैंड पर चक्कर लगाकर घर से बाहर निकल गया। रेंड कुछ समय तक कोमा में बना था और अंततः 3 जुलाई 1897 को मृत्यु हो गई। इसी समय, दामोदर के भाई बालकृष्ण ने लेफ्टिनेंट एरिस्ट पर गोली चलाई जो किरण के साथ बैठे थे।
चाफेकर भाइयों को बचने में सफल होने के बाद, तीन भाइयों को बाद में गिरफ्तार किया गया। दामोदर को मुंबई में गिरफ्तार किया गया था और 18 अप्रैल 1898 को उन्हें यरवदा जेल में फांसी दी गई थी। उसके बाद, वासुदेव को 8 मई 18 99 को फांसी दी गई और बालकृष्ण को 16 मई, 18 99 को फांसी दी गई। इस प्रकार तीन चाफेकर बंधु बलिदान हुये।

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