क्या नक्सलवाद की बारूद भरी राह पुलिस की गोलियों से थमी, या विकास की रोशनी से?

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दिल्ली । सच शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है।
सख्त सुरक्षा अभियान चले। खुफिया तंत्र मजबूत हुआ। राज्यों के बीच बेहतर तालमेल बना। जंगलों में सिर्फ बंदूक नहीं, रणनीति भी उतरी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
राजनैतिक संकल्प ने दिशा दी। “विकास” कागज़ से निकलकर ज़मीन पर उतरा। सड़कें पहुँचीं। मोबाइल टॉवर खड़े हुए। राशन, पेंशन, उजाला और रोज़गार की योजनाएँ उन इलाकों तक पहुँचीं, जिन्हें बरसों से “लाल गलियारा” कहा जाता था।
नतीजा?
नक्सलवाद का नशा उतरने लगा।
पिछले कुछ वर्षों में हजारों बंदूकधारियों ने हथियार डाल दिए। कई बड़े, इनामी लीडर मारे गए। संगठन की कमर टूटी। वैचारिक जज़्बा हकीकत की ज़मीन पर बिखरने लगा।
यह सिर्फ पुलिस की जीत नहीं थी।
यह सिर्फ विकास की कहानी भी नहीं।
यह उस संयुक्त रणनीति का असर था, जिसमें सुरक्षा, संवाद और कल्याणकारी योजनाएँ एक साथ आगे बढ़ीं। बंदूक की धमक के साथ-साथ भरोसे की दस्तक भी सुनाई दी।
और जब उम्मीद लौटती है, तो बंदूक अक्सर झुक जाता है।
जो जंगल कभी गोलियों की गूंज से कांपते थे। आज वहीं सड़कों पर बसें चल रही हैं। जहाँ बारूदी सुरंगें बिछती थीं, वहाँ अब मोबाइल टावर खड़े हैं।समय बदल गया है। और उसके साथ बदल गई है हिंसा की सियासत।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नारा “सबका साथ, सबका विकास” महज़ जुमला नहीं रहा। यह हुकूमत की नई ज़बान बना। योजनाएँ काग़ज़ से निकलकर आख़िरी गांव तक पहुँचीं। बैंक खाते खुले। दलालों की चेन टूटी। सड़कें जंगलों तक आईं। और यहीं से माओवादी असर की ज़मीन दरकने लगी।
नक्सलवाद की कहानी 1967 के नक्सलबाड़ी से शुरू हुई। ज़मीन विवाद भड़का। किसानों ने बगावत की। बंदूक को इंसाफ़ का रास्ता बताया गया। नेताओं ने इसे वर्ग संघर्ष कहा। आदिवासियों को क्रांति का चेहरा बनाया गया।
चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे नाम प्रतीक बने। पर बंदूक की राह लंबी थी। और खून से सनी हुई।
1972 में मजूमदार की मौत के बाद आंदोलन बिखरा। कई गुट बने। अंततः 2004 में अलग-अलग धड़े मिलकर Communist Party of India (Maoist) बने। तब तक तथाकथित “रेड कॉरिडोर” फैल चुका था। बिहार। झारखंड। छत्तीसगढ़। ओडिशा। आंध्र प्रदेश। महाराष्ट्र। तेलंगाना। एक लंबी लाल पट्टी।
2010 इसका चरम था। करीब दो हज़ार हिंसक घटनाएँ। एक हज़ार से ज़्यादा मौतें। स्कूल उड़ाए गए। पुलिस पर घात लगाकर हमले हुए। जंगल खामोश नहीं, खौफ़ज़दा थे। कारण भी थे।
आदिवासियों की ज़मीन छीनी गई।खनन से विस्थापन हुआ। वन अफसरों की मनमानी चली। सरकारी लापरवाही ने नाराज़गी को हवा दी।
माओवादियों ने समानांतर “जन अदालतें” चलाईं। मुखबिर बताकर लोगों को मौत दी गई। ठेकेदारों से लेवी वसूली गई। युवा आकर्षित हुए। बंदूक ग्लैमर बनी। पर धीरे-धीरे क्रांति की चमक उतर गई। विचारधारा पर माफ़ियागीरी हावी हो गई। लेवी का पैसा नेतृत्व की ऐशो-आराम में बहने लगा। अंदरूनी सफ़ाये हुए। शक में अपने ही मारे गए। इधर देश बदल रहा था। समाजवाद से बाज़ार आधारित कल्याण की ओर। राज्य ने रणनीति बदली।
2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ। केंद्र में नई सरकार आई। गृह मंत्री Amit Shah ने साफ़ संदेश दिया , “सख़्ती भी, सरोकार भी।”
एक तरफ़ सुरक्षा अभियान तेज़ हुए।
दूसरी तरफ़ विकास की बारिश शुरू हुई। 2014 में 126 ज़िले प्रभावित थे।2025 तक घटकर 11 रह गए।
सबसे गंभीर 36 से घटकर सिर्फ़ 3।2010 में 1,936 घटनाएँ। 2025 में घटकर 141। मौतें 1,005 से गिरकर 87। 2025 में 390 माओवादी मारे गए। 860 ने आत्मसमर्पण किया।करीब 2,000 ने संगठन छोड़ा। फरवरी 2026 तक तस्वीर और साफ़।
सिर्फ़ 8 घटनाएँ। 2 नागरिक मौतें। 37 उग्रवादी ढेर। दंतेवाड़ा में 63 कैडर एक साथ आत्मसमर्पण।
अब “रेड कॉरिडोर” सिमटकर छत्तीसगढ़ के बस्तर और ओडिशा के कुछ हिस्सों तक रह गया है। पर असली कहानी आँकड़ों से आगे है।
12,000 किलोमीटर से अधिक सड़कें जंगलों में पहुँचीं। 8,500 मोबाइल टावर लगे। 300 से ज़्यादा सुरक्षात्मक बंकर बने। बैंक और डाकघर खुले।मनरेगा ने साल में 100 दिन का रोज़गार दिया। प्रधानमंत्री आवास योजना ने करोड़ों घर बनाए, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी परिवारों की।आयुष्मान भारत ने 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा से जोड़ा। एकलव्य स्कूलों ने आदिवासी बच्चों को नई राह दी। युवाओं के लिए आईटीआई और स्किल सेंटर खुले। रोज़गार की उम्मीद बढ़ी। अब सवाल बदला है।
युवा स्टेनगन नहीं, स्मार्टफोन चाहता है। वह खाड़ी देशों में नौकरी कर रहा है। वह वोट डाल रहा है। माओवादियों ने चुनाव का बहिष्कार किया। लोकतंत्र को “बुर्जुआ ढोंग” कहा। पर आदिवासी भारी संख्या में मतदान केंद्र पहुँचे। 2023 में छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन हुआ। जिन इलाकों को कभी गढ़ कहा जाता था, वहाँ भी नई राजनीति आई। हिंसा ने अपना ही नुकसान किया। टीकाकरण का बहिष्कार हुआ। बच्चे मरे। पुल उड़ाए गए। गांव कट गए। एक आत्मसमर्पण कर चुके कैडर ने कहा, “हम ज़मीन के लिए लड़े थे। उन्होंने हमें घर, शौचालय और नल दे दिए।
नक्सलवाद सैन्य रूप से असफल रहा। राजनीतिक रूप से शून्य। नैतिक रूप से भी सवालों में।
2000 के बाद 10,000 से अधिक नागरिक मारे गए। हिंसा ने सिर्फ़ ज़ख्म दिए। विकास ने विकल्प दिया।
1960 के दशक की उपेक्षा ने इसे जन्म दिया था। 21वीं सदी का कल्याणकारी मॉडल इसे दफना रहा है। लक्ष्य है , 31 मार्च 2026 तक नक्सल मुक्त भारत। लाल साया अब धुंधला है। बंदूक की गूंज फीकी है। रोटी और रोज़गार की मांग उठ रही है।
और शायद यही असली बदलाव है।

यमुना मैय्या की कराह: ब्रज मंडल का टूटता पर्यावरण

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दिल्ली । कभी जिसके तट पर बंसी बजी थी, आज वहीं सन्नाटा है। कभी जिसके जल में आस्था डुबकी लगाती थी, आज वही जल ज़हर बन चुका है।

ब्रज मंडल की जीवनरेखा कही जाने वाली यमुना आज अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही है। नदी नहीं, नाला दिखती है। पानी नहीं, काला, बदबूदार, झाग से भरा तरल बहता है। तस्वीरें चीख रही हैं। सच सामने है। सवाल सिर्फ एक है: क्या हम सचमुच यमुना को बचाना चाहते हैं?
हाल की रिपोर्टों ने साफ कहा: “Pollution choking river Yamuna.” दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) की नवंबर और दिसंबर 2025 की रिपोर्ट्स के अनुसार, यमुना में फेकल कोलीफॉर्म का स्तर 92,000 तक पहुंच गया है, जो सुरक्षित सीमा (2,500) से 37 गुना अधिक है।
नदी दम तोड़ रही है। उसे ड्रेन में बदल दिया गया है। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं, यह जनस्वास्थ्य पर सीधा हमला है। नदी के पानी में घुलित ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से गिर चुका है। टॉक्सिक झाग सतह पर तैरते हैं। बदबू इतनी तीखी कि किनारे खड़ा रहना मुश्किल हो जाए। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि यमुना में माइक्रोप्लास्टिक की सांद्रता प्री-मॉनसून (मई-जून 2024) में औसतन 6,375 कण प्रति घन मीटर थी, जो पोस्ट-मॉनसून (दिसंबर 2024-जनवरी 2025) में घटकर 3,080 रह गई, लेकिन फिर भी खतरनाक स्तर पर है।
इसके अलावा, अमोनिया का स्तर 27.4 mg/L तक पहुंच गया है, जो जल उपचार संयंत्रों को बंद करने पर मजबूर कर रहा है। (बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) 70 mg/L है, जबकि जीवन समर्थन के लिए यह 3 mg/L से कम होना चाहिए।
आगरा और ब्रज क्षेत्र में यमुना की हालत किसी से छिपी नहीं। “Yamuna pollution: Agra loses out on the environment front” ; यह हेडलाइन केवल खबर नहीं, चेतावनी है।
वर्षों से वादे होते रहे। यमुना एक्शन प्लान के बड़े-बड़े दावे किए गए। करोड़ों रुपये खर्च हुए। लेकिन नदी का रंग और गंध दोनों बदलते गए। सुधार नहीं हुआ।
यमुना एक्शन प्लान के तहत शहर के सीवेज को रोकने, ट्रीटमेंट प्लांट लगाने और औद्योगिक अपशिष्ट को नियंत्रित करने की योजनाएँ बनीं। कागज़ों पर सब ठीक था। जमीन पर हालात जुदा निकले। कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या तो अधूरे हैं, या क्षमता से कम काम कर रहे हैं। नालों का गंदा पानी बिना उपचार सीधे नदी में गिर रहा है। यमुना एक्शन प्लान के तीसरे चरण (2018 से) में 11 परियोजनाएं शुरू की गईं, जिनमें सीवर रिहैबिलिटेशन, टर्सियरी ट्रीटमेंट प्लांट और ओखला, रिठाला, कोन्डली जैसे क्षेत्रों में सीवरेज प्रोजेक्ट शामिल हैं, लेकिन प्रदूषण स्तर में कोई खास कमी नहीं आई।
दिल्ली में रोजाना 28 मिलियन गैलन अनुपचारित या आंशिक रूप से उपचारित अपशिष्ट जल नदी में गिरता है। एक रिपोर्ट में साफ कहा गया कि नदी “reduced to a huge sewage canal” बन चुकी है।
यह केवल शब्द नहीं, यथार्थ है। दिल्ली से लेकर मथुरा और आगरा तक, नदी रास्ते भर गंदगी ढोती चलती है। ब्रज मंडल में प्रवेश करते-करते वह थक चुकी होती है।
नदी के किनारों पर कपड़े धोते लोग, मवेशी, प्लास्टिक कचरा, औद्योगिक रसायन, सब मिलकर इस पवित्र धारा को जहरीला बना चुके हैं। यह पानी न पीने योग्य है, न खेती के लिए सुरक्षित। भूजल भी प्रभावित हो रहा है। दिल्ली में भूजल में माइक्रोप्लास्टिक का औसत स्तर 1,200 कण प्रति घन मीटर है।
हाल ही में विश्व जल दिवस पर एक सवाल उठा—“Can Yamuna be saved?” यह सवाल हर साल उठता है। रैलियाँ निकलती हैं। एनजीओ जागरूकता अभियान चलाते हैं। बच्चे पोस्टर बनाते हैं। लेकिन सिस्टम की नींद गहरी है। पर्यावरण कार्यकर्ता जो रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़े हैं, कहते हैं, “यमुना आगरा में वस्तुतः मृत है। सूखा नदी तल और अत्यधिक प्रदूषित पानी नदी के किनारे ऐतिहासिक स्मारकों के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है।”
डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं, “पवित्र ब्रज क्षेत्र अपनी जीवनरेखा, अपनी आत्मा के दर्दनाक अंत का साक्षी बन रहा है, जो दशकों की सरकारी उदासीनता और टूटे वादों की शृंखला से घुट रही है। कभी जीवंत घाट, जो तीर्थयात्रियों की भक्ति और नाविकों की जीवंत बातचीत से गूंजते थे, अब उजाड़ खंडहरों के रूप में खड़े हैं, जो नदी को एक विषाक्त, सड़ते घाव में बदलने के मूक साक्षी हैं।”
हकीकत यह है कि नदी का प्राकृतिक प्रवाह भी बाधित है। ऊपरी बैराजों से पानी का प्रवाह सीमित कर दिया जाता है। जब पर्याप्त पानी ही नहीं बहेगा, तो आत्मशुद्धि की क्षमता कैसे बचेगी? नदी को जीवित रहने के लिए न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह चाहिए। वह नहीं मिल रहा।
औद्योगिक इकाइयाँ भी कम दोषी नहीं। नियम हैं, लेकिन निगरानी ढीली है। अवैध डिस्चार्ज जारी है। केमिकल्स और भारी धातुएँ पानी में घुलती रहती हैं। प्रशासन नोटिस देता है। फिर खामोशी छा जाती है। दिल्ली में 58% अपशिष्ट नदी में डाला जाता है।
सवाल उठता है, इतने वर्षों में बदला क्या? जवाब कड़वा है, लगभग कुछ नहीं।
यमुना एक्शन प्लान का तीसरा चरण भी उम्मीद जगाने में असफल रहा। योजनाओं में पारदर्शिता का अभाव रहा। स्थानीय समुदाय को निर्णय प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया। निगरानी तंत्र कमजोर रहा। परिणाम, नदी की हालत जस की तस, बल्कि और बदतर।
ब्रज मंडल का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अस्तित्व यमुना से जुड़ा है। वृंदावन, मथुरा, गोकुल: इन सबकी आत्मा यमुना में बसती है। जब नदी बीमार है, तो संस्कृति भी बीमार हो जाती है। श्रद्धालु किनारे खड़े होकर आरती तो करते हैं, लेकिन जल को छूने से डरते हैं।
यह विडंबना नहीं तो क्या है?
पर्यावरण विशेषज्ञ वर्षों से चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अभी कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो नदी का पुनर्जीवन लगभग असंभव हो जाएगा। केवल ट्रीटमेंट प्लांट बनाना काफी नहीं। उनका नियमित रखरखाव जरूरी है। अवैध नालों को तत्काल बंद करना होगा। औद्योगिक प्रदूषण पर सख्त कार्रवाई करनी होगी।
सबसे महत्वपूर्ण; नदी को उसका प्रवाह लौटाना होगा। बिना पानी के नदी नहीं बचती।
लेकिन प्रशासनिक इच्छाशक्ति कहाँ है? योजनाएँ घोषणाओं तक सीमित क्यों रह जाती हैं? क्यों हर बार नई परियोजना पुराने वादों की कब्र पर खड़ी होती है?
यमुना का संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, नैतिक संकट भी है। हमने विकास के नाम पर नदी का गला घोंट दिया। शहरों का सीवर, उद्योगों का कचरा, हमारी लापरवाही: सबने मिलकर इसे बीमार कर दिया।
ब्रज मंडल में आज यमुना की जो तस्वीर है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए शर्मनाक विरासत होगी।
फिर भी उम्मीद पूरी तरह मरी नहीं है। स्थानीय समूहों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों ने समय-समय पर आवाज उठाई है। लेकिन उनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुँचते-पहुँचते कमजोर पड़ जाती है। रिवर कनेक्ट कैंपेन, यमुना को बचाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। कैंपेन की मांगें : बैराज निर्माण, न्यूनतम जल प्रवाह सुनिश्चित करना, घाटों की सफाई, प्रदूषकों पर कार्रवाई और नदी तल की ड्रेजिंग।
अब जरूरत है कि यमुना को केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, जीवित पारिस्थितिकी तंत्र माना जाए। उसे कानूनी अधिकार दिए जाएँ। निगरानी स्वतंत्र एजेंसियों को सौंपी जाए। और सबसे बढ़कर: जनभागीदारी को केंद्र में रखा जाए।

रामनंदन मिश्र ग्रंथावली का लोकार्पण समारोह संपन्न

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अनुराग पुनेठा

पटना। लोक भवन, पटना में एक गरिमामय एवं विचारोत्तेजक समारोह में इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) नई दिल्ली द्वारा किताबवाले के सहयोग से संयुक्त रूप से प्रकाशित पाँच खंडों में विभाजित रामनंदन मिश्र ग्रंथावली का औपचारिक लोकार्पण संपन्न हुआ। कार्यक्रम में 400 से अधिक प्रतिभागियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही, जिनमें साहित्य, इतिहास, सामाजिक विज्ञान तथा सार्वजनिक जीवन से जुड़े विद्वान, शोधार्थी, शिक्षाविद् एवं प्रबुद्ध नागरिक सम्मिलित थे।

समारोह के मुख्य अतिथि बिहार के माननीय राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद खान ने अपने संबोधन में कहा कि राम नंदन मिश्र का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वैचारिक ऊंचाइयों और नैतिक प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में मूल्यों की पुनर्स्थापना के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनके विचार विशेष रूप से प्रासंगिक हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष राम बहादुर राय द्वारा की गई। अपने विस्तृत अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने रामनंदन मिश्र के बहुआयामी व्यक्तित्व के प्रत्येक पक्ष पर प्रकाश डाला। उन्होंने उनके सामाजिक सरोकारों, स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय राजनीतिक भूमिका, समाजवादी वैचारिकी के प्रति प्रतिबद्धता तथा आध्यात्मिक साधना के आयामों को विस्तार से रेखांकित किया। उन्होंने विशेष रूप से महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण के साथ उनके घनिष्ठ सम्बंधों तथा स्वतंत्रता संग्राम के अन्य अग्रणी नेताओं के साथ उनके वैचारिक संवाद का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि रामनंदन मिश्र केवल एक स्वतंत्रता सेनानी या समाजवादी चिंतक ही नहीं थे, बल्कि वे भारतीय बौद्धिक परम्परा के ऐसे प्रतिनिधि थे, जिनकी लेखनी आज भी प्रासंगिक है। उनके अनेक लेख और विचार समकालीन सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।

श्री राय ने यह भी कहा कि इस विशिष्ट प्रकाशन को संभव बनाने में संपादक रामचंद्र प्रधान, डॉ. सुरेंद्र कुमार तथा प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़, डीन, आईजीएनसीए के उल्लेखनीय योगदान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके समर्पित प्रयासों से यह ग्रंथावली शोधपरक, प्रामाणिक और सुव्यवस्थित रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हो सकी है।

विशिष्ट अतिथि नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि यह ग्रंथावली स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक विविधता तथा समाजवादी चिंतन को समझने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। प्रो. आईजीएनसीए के डीन एवं कलानिधि विभाग के अध्यक्ष प्रो. रमेश चन्द्र गौड़ ने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि यह संयुक्त प्रकाशन राष्ट्रीय वैचारिक विरासत के संरक्षण एवं पुनर्पाठ की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है। उन्होंने बताया कि पाँचों खंडों में रामनंदन मिश्र के जीवन-संघर्ष, स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका, समाजवादी प्रतिबद्धता तथा आध्यात्मिक साधना के विविध आयामों को समग्रता से प्रस्तुत किया गया है।

उल्लेखनीय है कि यह ग्रंथावली स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी चिंतक एवं आध्यात्मिक साधक राम नंदन मिश्रा (1906–1989) के जीवन और कृतित्व का प्रामाणिक संकलन है। इसमें उनके संस्मरण, वैचारिक लेख, गांधीवादी दृष्टिकोण, समकालीन सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर विचार तथा आध्यात्मिक विमर्श को सुव्यवस्थित रूप में संकलित किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पीड़िता की मां ने कहा, न्याय में भरोसा बहाल हुआ

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दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को खारिज करने के बाद खुशी व राहत की सांस लेते हुए नाबालिग पीड़िता की मां ने कहा कि इस आदेश से न्याय में उनका भरोसा बहाल हुआ है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिछले साल मार्च में दिए गए फैसले में कहा था कि नाबालिग पीड़िता के वक्ष पकड़ने व सलवार का नाड़ा खोलने को बलात्कार का “प्रयास” नहीं माना जा सकता और यह सिर्फ बलात्कार की “तैयारी” थी। बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए नागरिक समाज संगठनों के नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) ने हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ तत्काल पीड़िता की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण और आपराधिक दंड विधान के स्थापित सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ करार देते हुए खारिज कर दिया। साथ ही, शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दोनों आरोपियों के खिलाफ पहले से लगे बलात्कार के प्रयास के आरोप को भी बहाल कर दिया।

पीड़िता, जो घटना के समय सिर्फ 11 वर्ष की थी, की मां ने कहा, “इस फैसले से मेरा यह विश्वास बहाल हुआ है कि कानून बच्चों व पीड़ितों की सुरक्षा कर सकता है। मुझे उम्मीद है कि अब किसी बच्चे को अपने साथ हुए अत्याचार का विश्वास दिलाने के लिए ठोकर नहीं खानी पड़ेगी और इस फैसले से उन बहुत सारे बच्चों को मदद मिलेगी जो आवाज नहीं उठा पा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि जेआरसी तब उनके साथ खड़ा हुआ जब उन्हें लग रहा था कि वे असहाय हैं और कोई उनकी आवाज नहीं सुनेगा। उनके समर्थन से हम न्याय के लिए संघर्ष जारी रखने की हिम्मत जुटा पाए।

नवंबर 2021 में उत्तर प्रदेश के कासंगज में दो युवक 11 साल की नाबालिग बच्ची को जबरन घसीट कर एक पुलिया के नीचे ले गए और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की। बच्ची की चीख पुकार सुन उधर से गुजर रहे दो राहगीर वहां पहुंचे जिसके बाद दोनों आरोपी मौके से भाग निकले। इस मामले में मार्च 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “यह कृत्य सिर्फ बलात्कार की ‘तैयारी’ है और यह स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि यह ‘बलात्कार का प्रयास’ या ‘बलात्कार’ है।” इस फैसले के नतीजे में आरोपों की गंभीरता काफी कम हो गई।

बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी ज्यादा नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता की ओर से शीर्ष अदालत में विशेष अनुमति याचिका दायर की। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इस तरह के मामलों में और अधिक संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश तय करने का अनुरोध भी किया गया।

हाई कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल को निर्देश दिया कि वह यौन शोषण के संवेदनशील पीड़ितों से संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों व न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता विकसित करने के उद्देश्य से एक समग्र व व्यापक दिशानिर्देश तय करने के लिए एक समिति गठित करे। कमेटी से तीन महीने में यह रिपोर्ट तैयार करने व सुप्रीम कोर्ट को सौंपने का अनुरोध किया गया है।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की ओर से पीड़िता की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका ने इसे ऐतिहासिक करार देते हुए कहा, “यह बच्चों की सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक दूरगामी फैसला है। यह एक स्पष्ट संदेश देता है कि न्यायिक विवेचना में पीड़ितों के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव या पूर्वाग्रह की कोई जगह नहीं है। इस फैसले के लिए हम खंडपीठ के आभारी हैं।” शीर्ष अदालत ने दिशानिर्देश तय करने में नेटवर्क से सुझाव भी मांगे हैं।

इसी बीच, जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा, “यह फैसला यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय, गरिमा और संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के हमारे लंबे और दृढ़ संघर्ष का नतीजा है। हम सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हैं जिसने न्यायिक तंत्र में भरोसा बहाल किया है और इस विश्वास को मजबूत किया है कि बच्चों एवं कमजोर व संवेदनशील पृष्ठभूमि के लोगों के खिलाफ अपराधों को गंभीरता और अपेक्षित संवेदनशीलता के साथ देखा जाएगा।”

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