हेल्थकेयर पेशेवरों के लिए ऑनलाइन डिमेंशिया देखभाल प्रशिक्षण हुआ प्रारंभ

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आगरा। भारत के बढ़ते डिमेंशिया संकट को संबोधित करने के लिए, ODLQC-मान्यता प्राप्त प्रशिक्षण पोर्टल, साइकोलॉजी वर्ल्ड ने हेल्थकेयर पेशेवरों के लिए एक ऑनलाइन डिमेंशिया-ओरिएंटेशन सर्टिफिकेट कोर्स शुरू करने के लिए डिमेंशिया इंडिया एलायंस (DIA) के साथ भागीदारी की है। यह पहल विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के साथ मेल खाती है, जो व्यापक डिमेंशिया देखभाल प्रशिक्षण और देखभाल करने वालों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए समर्थन की महत्वपूर्ण आवश्यकता को उजागर करती है।

भारत में डिमेंशिया का बोझ बहुत ज़्यादा है, वर्तमान में 8.8 मिलियन लोग इससे प्रभावित हैं, अनुमान है कि 2036 तक यह संख्या बढ़कर 17 मिलियन हो जाएगी। डिमेंशिया रोगियों की देखभाल करने का भावनात्मक बोझ तेज़ी से स्पष्ट हो रहा है, स्वास्थ्य सेवा कर्मी अक्सर उचित प्रशिक्षण के बिना चुनौतीपूर्ण लक्षणों को प्रबंधित करने के लिए संघर्ष करते हैं।

इस ऑनलाइन कोर्स का उद्देश्य डिमेंशिया देखभाल प्रशिक्षण में अंतर को पाटना है, नर्सों, फिजियोथेरेपिस्ट और संबद्ध स्वास्थ्य सेवा कर्मियों सहित स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों को सशक्त बनाना है, ताकि वे उचित प्रशिक्षण प्रदान कर सकें। दयालु और प्रभावी देखभाल। मुख्य विशेषताओं में शामिल हैं:

– सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक दृष्टिकोण, भारतीय परिवार और समुदाय की गतिशीलता को स्वीकार करना
– लचीलेपन के लिए स्व-गतिशील, ऑनलाइन प्रारूप
– उच्च गुणवत्ता वाले प्रशिक्षण को सुनिश्चित करने के लिए ODLQC मान्यता
– देखभाल करने वालों द्वारा सामना किए जाने वाले तनाव और भावनात्मक चुनौतियों के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना

DIA अध्यक्ष डॉ. राधा एस. मूर्ति ने जोर देकर कहा, “यह पहल स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों को मनोभ्रंश रोगियों की देखभाल करने के लिए आवश्यक कौशल से लैस करेगी, जबकि उनके स्वयं के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा भी करेगी।”

साइकोलॉजी वर्ल्ड के संस्थापक शब्द मिश्रा ने कहा, “सुलभ, उच्च गुणवत्ता वाला प्रशिक्षण महत्वपूर्ण है। यह पाठ्यक्रम सुनिश्चित करता है कि भारत भर में स्वास्थ्य सेवा कर्मी मनोभ्रंश देखभाल की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बेहतर तरीके से तैयार हों।”

दो अतिरिक्त पाठ्यक्रम शुरू किए जाने हैं: एक डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों के लिए, और दूसरा मनोभ्रंश-अनुकूल अस्पताल बनाने पर केंद्रित है।

डिमेंशिया ओरिएंटेशन सर्टिफिकेट कोर्स अब भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए (लिंक उपलब्ध नहीं है) पर उपलब्ध है, जो मनोभ्रंश देखभाल मानकों को बढ़ाने और स्वास्थ्य सेवा कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य का समर्थन करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह सहयोगात्मक प्रयास देखभाल करने वालों और स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की मानसिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं को संबोधित करने के महत्व को रेखांकित करता है। व्यापक प्रशिक्षण और सहायता प्रदान करके, साइकोलॉजी वर्ल्ड और डीआईए का लक्ष्य मनोभ्रंश देखभाल से जुड़े भावनात्मक तनाव को कम करना, अंततः देखभाल के परिणामों में सुधार करना और एक स्वस्थ, अधिक दयालु स्वास्थ्य सेवा पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देना है।

आगरा में शूट हुई म्यूजिक वीडियो पल्लो लटके तेरा, जल्द होगी रिलीज़

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आगरा में अब फ़िल्म उद्योग गति पकड़ रहा है लेकिन सरकारों का खासा ध्यान नहीं है, सरकार सिर्फ सेलिब्रेटी कलाकारों या बड़े बड़े प्रोडक्शन हाउस के आगे पीछे नाचती है जबकि सत्य ये है कि असली दुनिया और कोई भी उद्योग बिना तकनीशियन एवं अन्य कलाकारों या साहित्यकारों के बिना ना ही पूरा होता है और ना ही पनपता है, जो पहले से ही सेट हैँ यानि कि ब्रांड बन गए हैँ उनको ही मदद देने से और उनको ही अवार्ड्स देने से क्या फायदा जो टैलेंटेड हैँ आगे बढ़ना चाह रहे हैँ अच्छा काम. कर रहे हैँ उन्हें मदद करनी चाहिए, ऐसे लोग इन्हें दीखते नहीं हैँ इनकी फ़िल्म नीति कहती कुछ और हैँ और करती कुछ और इस कारण से कई प्रतिभा धाराशाई हो जाती हैँ, जो भी कला का वर्ग काम कर रहा हैँ wo सिर्फ अपने बलबूते ही काम कर रहा हैँ ना कि सरकार कि बानी हुई फ़िल्म नीति के लिए |

पल्लो लटके तेरा म्यूजिक वीडियो भी उन कामों में से एक हैँ, जो कलाकार अपने प्रयासों से मेहनत करके आगरा एवं उत्तर प्रदेश में फ़िल्म का माहोल एवं उद्योग के रूप में विकसित करने में लगे हुए हैँ |

“पल्लो लटके तेरा” गीत लिखा एवं निर्देशित किया हैँ सूरज तिवारी ने जिसको ग्लैमर लाइव फिल्म्स के बैनर तले फिल्माया गया हैँ| कलाकारों कि बात करें तो मुंबई के प्रसिद्ध टी वी एवं फ़िल्म कलाकार एलन कपूर ने हीरो कि भूमिका निभाई हैँ और हीरोइन के रूप में बालाजी प्रोडक्शन से अभिनय की बारीकिया सीख कर आई शहर कि पलक सक्सेना हैँ |

प्रोडूसर शिल्पी तिवारी एवं सावन चौहान हैँ |

म्यूजिक कुशमेंद्र शर्मा का हैँ और सिनेमाटोग्राफी मुंबई के कमल लोखंडवाला ने की हैँ |

वहीँ डांस मास्टर इंडिया गोट टैलेंट फेम प्रीती सिंह हैँ और अतुल के डांसर्स हैँ |

सिंगर अनुज उपाध्याय, मेकअप माधुरी शर्मा और costume ड्रेसबेरी के जीतेन्द्र ने तैयार किये हैँ |

प्रोडक्शन अमित तिवारी, राहत, रिंकू शाक्य, रजत कुमार, पंकज शर्मा, और अनुज कुंमार ने किया हैँ | गोविंदा और विजय ने सेट देखा स्पॉट पर |

आगरा के डाउनटाउन में गाना शूट किया गया था जिसमें श्री विजय शिवहरे विधायक और उमंग शिवहरे का योगदान था |

कलेवा में हुए आज के कार्यक्रम में मुख्य विधायक श्री पुरुषोत्तम खंडेलवाल, कलेवा के चेयरमैन राजीव शर्मा, गोल्ड जिम रूबी शर्मा, समाजसेवी केशव अग्रवाल, प्रखर शर्मा, प्रदीप अग्रवाल, सोनू भाई,अमित तिवारी, सूरज तिवारी आदि थे |

मीडिया बदल रहा है, बाजारवाद के प्रमोशन के लिए आदर्शों का परित्याग

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भारतीय मास मीडिया की वर्तमान स्थिति रोचक भी है और चिंताजनक भी । यह एक ऐसा समय है जब मीडिया अपने मौलिक लक्ष्यों से भटक गया है, क्योंकि मैंनस्ट्रीम मीडिया पश्चिमी संस्कृति से पोषित और प्रेरित, आम भारतीयों से कटता जा रहा है। निम्न-गुणवत्ता, उपभोक्तावादी और अश्लील सामग्री को बढ़ावा दे रहा है। आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाला माध्यम अब नकारात्मकता और असंवेदनशीलता का प्रतीक बनता जा रहा है। लोकतंत्र के स्तंभों में से एक के रूप में, मीडिया की भूमिका न केवल जानकारी प्रदान करना है, बल्कि समाज के सकारात्मक निर्माण में योगदान देना भी है। हालांकि, आज, इस जिम्मेदारी को छोड़ दिया गया है, और मीडिया व्यावसायिक हितों के जाल में फंस चुका है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो सभ्य, सुसंस्कृत और सहिष्णु समाज की स्थापना करना कठिन हो जाएगा।

वर्तमान में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया ने आदर्शवादी मूल्यों की उपेक्षा करते हुए व्यावसायिक मोड़ ले लिया है। जहां तक समाचार पत्रों का प्रश्न है, व्यवसाय प्रबंधकों और विज्ञापन विभागों ने संपादकों को बेदखल कर दिया है। इससे वैचारिक धार कुंद हुई है। एक जमाना था जब अखबारों की पहचान उनके संपादकों से होती थी, जो रोल मॉडल भी होते थे। फ्रैंक मॉरिस, बीजी वर्गीस, कुलदीप नायर, खुशवंत सिंह, रामा राव, प्रभाष जोशी, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, शंकर, और अनेक। आज के अखबारों के संपादकों के नाम भी नहीं मालूम रहते।

दूरदर्शन वाले दिन लद गए, आज भारतीय मीडिया बदल चुका है। चीखने चिल्लाने वाले एंकर्स ब्रांड एंबेसडर बन चुके हैं। खुलकर पक्ष लेना, अब नीति बन चुकी है। पुराने संस्कारों, आजाद ख्यालों वाले पत्रकार लुप्त प्रजातियों की लिस्ट में शामिल हो चुके हैं।

पुराने पत्रकार मानते हैं कि मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए और हमेशा जनहित को प्राथमिकता देनी चाहिए। हाल ही में कई राज्य सरकारों ने अखबारों, खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को अपनी भूमिकाओं में तटस्थता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की चेतावनी दी है. साथ ही समाज के विभिन्न वर्गों ने विभिन्न कारणों से प्रेस के प्रति असंतोष व्यक्त किया है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इसकी बढ़ती शक्ति और पहुंच के कारण, मास मीडिया ने कुछ अजीब, गैर-पारंपरिक भूमिकाएं निभानी शुरू कर दी हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जिस तरह का कंटेंट परोसा जा रहा है, उससे हमले तेज हो गए हैं। इसके पीछे कारण यह है कि पाठक या उपभोक्ता अब सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं, और कुछ पाठकों की भागीदारी भी बढ़ गई है। सिटीजन जर्नलिस्ट, नई टेक्नोलॉजी की वजह से काफी सक्रिय हैं, लेकिन फिल्टर्स न होने की वजह से इसके खतरे भी बहुत हैं।

अन्य व्यवसायों की तरह, भारतीय मीडिया भी परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रहा है, और शायद यह इसकी रोमांचक परिवर्तन प्रक्रिया है। स्वाभाविक रूप से, कुछ लोग इस बारे में चिंतित हैं। पुरानी पीढ़ी इस प्रक्रिया को पत्रकारिता में गिरावट के रूप में देखती है और पत्रकारिता के आदर्शों के बिगड़ने और भ्रष्टाचार के कई उदाहरण प्रदान करती है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे विचार और प्राथमिकताएं बदल गई हैं। हमारा मीडिया 1947 की मिशनरी मानसिकता से खुद को मुक्त करने के लिए संघर्ष कर रहा है और धीरे-धीरे लाभ कमाने वाली औद्योगिक गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

1970 के दशक तक, प्रेस की भूमिका मुख्य रूप से विपक्षी थी। उस समय मीडिया प्रतिष्ठान न केवल पूंजीपति वर्ग के हितों की ढाल था, बल्कि विपक्ष की भूमिका भी निभाता था। आज भी प्रेस निरंतर सतर्कता के माध्यम से नागरिक समाज को मजबूत करता है और गलत कामों को उजागर करके सत्ता प्रतिष्ठानों को चुनौती देता है।

इसमें कुछ भी गलत नहीं है। भारत एक मुक्त और खुला समाज है। प्रत्येक समूह को वैध साधनों के माध्यम से अपनी विचारधारा को बढ़ावा देने का अधिकार है। लेकिन पिछले 30 वर्षों में, विशेष रूप से 90 के दशक के उदारीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया के बाद, जो हुआ, उसने सभी को आने वाली खतरनाक स्थिति के बारे में चेतावनी दी है और चिंताएं जताई हैं।

यदि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा वैश्विक पूंजीवाद द्वारा समर्थित वाणिज्यिक संस्कृति के साथ अनुबंध करता है, तो मीडिया और जनता के बीच गिरते संबंधों पर कौन ब्रेक लगा सकता है? यह एक ऐसा सवाल है जो लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय बन गया है।

व्यावसायिक गतिविधियों की बढ़ती भूमिका ने पत्रकारिता को लोगों की आवाज बनने के अपने प्राथमिक लक्ष्य से दूर कर दिया है, जिससे मीडिया में नकारात्मक प्रवृत्तियों में वृद्धि हुई है। अखबारों के संपादकों पर आरोप है कि वे विज्ञापन डाटा और फंडर्स के हितों के हिसाब से कंटेंट तैयार करते हैं। यह प्रवृत्ति इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अधिक दिखाई देती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में, टीआरपी के प्रति जुनून है, जो भ्रामक और अवांछनीय जानकारी प्रस्तुत करने, तथ्यात्मकता की उपेक्षा करने और दर्शकों के सामने ऐसी सामग्री पेश करने से हासिल किया जाता है।

हाल के वर्षों में हुई तीन घटनाओं ने हमें हिलाकर रख दिया और हमारा ध्यान इस तथ्य की ओर खींचा है कि टेलीविजन माध्यम गंभीर मानवीय परिस्थितियों की परवाह किए बिना, टीआरपी लाभों के लिए अपने रास्ते से भटक गया है। पहले मामले में पटियाला में एक बिजनेसमैन ने खुद को आग लगा ली और कैमरे के सामने दम तोड़ दिया, लेकिन कोई भी उसे बचाने के लिए आगे नहीं आया। दूसरे मामले में मध्य प्रदेश में आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार के सदस्यों ने कैमरे के सामने जहर खा लिया और उनकी मौत हो गई। गुजरात के सूरत में हुई तीसरी घटना में एक युवा लड़की को उसके कष्टों और कठिनाइयों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए उसके अंत:वस्त्र पहनकर सड़कों पर चलने के लिए कहा गया। लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए इन घटनाओं को व्यवस्थित रूप से अंजाम दिया गया।

अधिकांश मीडियाकर्मियों का मानना है कि यह स्वतंत्रता का दुरुपयोग है। ये पीपली लाइव सिंड्रोम मीडिया के सही दिशा में अग्रसर होने में बाधा बनेंगे।

एकजुट संगठन व हिंदुत्व की विचारधारा ने खिलाया कमल

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सभी मीडिया सर्वेक्षणों, एग्जिट पोल तथा पोल पंडितों को धता बताते हुए भारतीय जनता पार्टी ने जिस प्रकार हरियाणा के चुनावों में लगातार तीसरी बार भारी बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की है उसकी गूंज दूर- दूर तक सुनाई दे रही है। लोकसभा चुनावों में 240 पर सिमट जाने के बाद कांग्रेस और इंडी गठबंधन का लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और नेतृत्व पर प्रश्नचिह्न लगा रहा था और कांग्रेस नेता राहुल गांधी कह रहे थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का आत्मविश्वास हिला दिया है अब प्रधानमंत्री मोदी पहले जैसे नहीं रहे किंतु आठ अक्टूबर को आए हरियाणा विधानसभा चुनाव परिणामों ने बाजी पलट कर रख दी है।

हरियाणा विधानसभा चुनाव के परिणाम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व हिंदू धर्म के खिलाफ नफरत का जहर घोलने वालों, अग्निवीर से लेकर फ्री राशन जैसी सरकारी नीतियों के खिलाफ दुष्प्रचार करने वालों को पर्याप्त संकेत मिल गया है। हरियाणा की जनता ने निराशावादियों की ओर से फैलायी जा रही निराशा को उन्हीं की ओर वापस फेंक दिया है। हरियाणा के परिणामों से पूरे भारत की जनता आनंदित है ।

हरियाणा में भाजपा की यह जीत कई मायने में ऐतिहासिक और परिणाममूलक है क्योंकि इस विजय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भारतीय जनता पार्टी के समस्त कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों में एक नये उत्साह का संचार हुआ है जो आगामी सभी विधानसभा चुनावों झारखंड, महाराष्ट्र और फिर दिल्ली के विधानसभा चुनावों की तैयारी लगे हैं । वहीं उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी बीजेपी अब यूपी की 10 विधानसभा सीटों को जीतने के लिए नये उत्साह व मनोयोग के साथ मैदान में उतरने जा रही है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों में योगी को घेरने की दृष्टि से बसपा जोर आजमाइश करने की तैयारी करने जा रही थी किंतु हरियाणा में गठबंधन के साथ उसको जोरदार झटका लगा है और अधिकांश सीटों पर जमानतें जब्त हो गई हैं। हरियाणा की जनता ने बसपा की विचारधारा को नकार दिया है।

चुनाव परिणाम आने के पश्चात विजयी और पराजित दोनों ही पक्षों ने अपनी अपनी समीक्षा प्रारम्भ कर दी है। हरियाणा में भाजपा ने विधानसभा चुनावों में पूरा ध्यान बूथ प्रबंधन पर रखा, कई क्षेत्रों में तो में सरपंची स्तर की तरह चुनाव लड़ा जिसका बड़ा लाभ चुनाव परिणामों में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। वहीं कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में विजय संकल्प यात्रा निकाली किंतु राहुल गांधी के ओछे बयानों व हरकतों से हुड्डा की रणनीति परवान नहीं चढ़ पाई। भाजपा की ओर से प्रधानमत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में प्रचार किया गया । भाजपा ने 150 रैलियां की जबकि कांगेस ने 70 । कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिह हुड्डा को आगे किया किन्तु कुमारी शैलजा के साथ उनकी अनबन से कांग्रेस की आंतरिक कलह बाहर आ गई।

संघ व योगी की जनसभाओं ने मचाया धमाल – विश्लेषकों का अनुमान है कि हरियाणा विधानसभा चुनावों में संघ का सक्रिय सहयोग भाजपा की बड़ी जीत में अहम रहा है। भाजपा और संघ के नेताओं की समन्वय बैठक हो जाने के बाद डा. मोहन भागवत ने भी तीन दिन तक हरियाणा का प्रवास किया गया और इसका स्वयंसेवकों के बीच सकारात्मक संकेत गया । हरियाणा में संघ ने हिंदू समाज को एकजुटता का संदेश देते हुए 16 हजार जनसभाएं करके वातावरण बना दिया। हरियाणा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अदृष्य शक्ति के रूप में भाजपा की सहायता कर रहा था।

हरियाणा में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जनसभाओं की बहुत मांग थी और उनकी जनसभाओं में भारी भीड़ आ रही थी। योगी जी ने 14 सीटों पर प्रचार किया और उनमे से नौ सीटों पर विजय मिली है। योगी जी ने हिंदुओ को एकजुट होकर राष्ट्र के लिए वोट देने की अपील की थी। योगी जी ने अपनी रैलियों में “बटेंगे तो कटेंगे” का मर्म समझाकर वातावरण बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। योगी जी ने अपनी एक रैली में कहा कि हमें राष्ट्र के लिए एक होना पड़ेगा, उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ हुए अत्याचारों का मुद्दा भी उठाया, योगी जी ने स्पष्ट रूप से अपील करते हुए कहा कि अगर हम बाटेंगे तो कटेंगे, अगर हिंदू एक नहीं होंगे तो हमारे देश का हाल भी बांग्लादेश जैसा हो जाएगा। योगी जी ने राम मंदिर पर बयान दिये। योगी आदित्यनाथ जी के भाषणों व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयासों से हरियाण में हिंदू जनमानस एकजुट हो गया और उससे मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले दलों के होश उड़ गये।

हरियाणा में हिंदू जनमानस को राहुल गांधी के अटपटे बयानों के कारण भी एकजुट होना पड़ गया क्योंकि हरियाणा की जनसभाओं में राहुल गांधी ने अयोध्या में राम मंदिर का एक बार फिर विकृत तरीके से अपमान करते हुए कहा कि वहां पर मंदिर का उद्घाटन हो रहा थ तब वहां खुल रहा था और नाच गाना चल रहा था। इस बयान का हरियाणा की रामभक्त जनता पर विपरीत असर पड़ा और परिणाम सबके सामने है। राम मंदिर पर राहुल गांधी के बयान हरियाणा कांग्रेस के लिए सबसे बड़े पनौती सिद्ध हुए। इसके अतिरिक्त कांग्रेस के मुस्लिम विधायक कह रहे थे कि सरकार आई तो हिंदुओं को देख लेंगे। जूनियर हुड्डा बीजेपी नेताओं को जेल भेजने की धमकी दे रहे थे। कांग्रेस ने चुनाव जीतते ही तथाकथित किसानों के लिए शंभू बार्डर खोलने का ऐलान किया था ।

कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने अमेरिका में जाकर जमकर भारत विरोधी बयानबाजी की और यहां तक कह डाला कि जब उन्हें आभास होगा कि अब भारत के हालात अच्छे हो गये हैं तब वह आरक्षण समाप्त कर देंगे, बदल देंगे और इस प्रकार वह अपने ही बुने जाल में फंस गये क्योंकि लोकसभा चुनाव में वह बीजेपी पर आरोप लगा रहे थे कि अगर बीजेपी 400 पार चली जायेगी तो आरक्षण समाप्त कर देगी। हरियाणा की जनता को कांग्रेस परिवार की बकवास पसंद नहीं आई और उन्होंने अपने युवा मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को ही एक बार फिर अपना समर्थन दे दिया।

हरियाणा चुनावों के समय ही कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारों व कांग्रेस के लोकलुभावन वादों की पोल खुल गई। हिमांचल प्रदेश में अवैध मस्जिदों के खिलाफ हिंदू समाज सड़क पर उतर आया जिसका असर भी हरियाणा में अवश्य पड़ा है।
विपक्ष सहित बहुत से तथाकथित राजनैतिक विश्लेषक आठ अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को समाप्त घोषित करने की तैयारी में जुटे थे, कुछ लोग उनके इस्तीफे की घोषणा सुनना चाहते किंतु उनका यह सपना पूरी तरह टूट चुका है।

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