माँ जगरानीदेवी ने अठारह वर्ष ताने सुने : एक एक रोटी का संघर्ष

c3c04ba11b107aa125cb03ce3de755c5.jpg

भारतीय स्वाधीनता संग्रामके इतिहास में कुछ ऐसे प्रसंग भी मिलते हैं जिन्हें पढ़कर रौंगटे खड़े होते हैं और आँखों में आँसू आ जाते हैं । ऐसा ही प्रसंग बलिदानी चंद्रशेखर आजाद का है । चंद्रशेखर आजाद ने बालवय से ही स्वाधीनता का संघर्ष आरंभ कर दिया था । उनका संघर्ष सत्ता केलिये नहीं था राष्ट्र की संस्कृति और स्वाधीनता के लिये था । किंतु उनके संघर्ष काल और उनके बलिदान के बाद उनकी माता जगरानी देवी का संघर्ष भी ऐसा था जो किसी स्वतंत्रता संग्राम से कम नहीं था । यह ऐसा मार्मिक प्रसंग है कि जिसे पढ़कर आँख से आँसू झरते हैं । आज हम भले बलिदानी चंद्र शेखर आजाद के बलिदान को शत शत नमन करते हैं । उनकी स्मृति में प्रयागराज और भाबरा दोनों स्थानों पर स्मारक बने हैं लेकिन तब अंग्रेजों की दृष्टि में वे आतंकवादी थे । चंद्रशेखर आजाद के विरुद्ध स्थाई वारंट था, देखते ही गोली मारने के आदेश थे । उनकी तलाश में सात सौ लोग लगाये गये थे । इनमें बड़ी संख्या में मुखबिर भी थे । घर की निगरानी हो रही थी । परिवार से मिलने जुलने वालों पर भी नजर रखी जा रही थी ।

जिसके कारण सब लोगों ने इस परिवार से किनारा कर लिया था । आजाद के पिता सीताराम जी की नौकरी छूट गई थी । बड़ी मुश्किल से उन्हें छोटा मोटा काम मिलता था । उनके सामने ही परिवार चलाने के लिये जगरानी देवी को भी मजदूरी करना पड़ती थी । चंद्रशेखर आजाद के परिवार में यह स्थिति 1925 से बन गई थी । तभी 27 फरवरी 1931 को बलिदान का समाचार आया । इससे पिता को जो काम मिलता था वह भी बंद हो गया । दोनों पति पत्नि अभाव में किसी तरह जी रहे थे । यह परिवार भी संकल्पवान था झुका नहीं । यदि परिवार में पिता या माता अपने पुत्र चंद्रशेखर को समर्पण करने का संदेश भेज देते तो वे मान जाते और रोटी का संघर्ष कम हो जाता पर परिवार संकल्पवान था । संघर्ष झेला किंतु इसकी भनक पुत्र चंद्रशेखर को लगने दी । चन्द्र शेखर आजाद के बलिदान के दो साल बाद पति सीताराम का भी निधन हो गया ।अकेली रह गईं जगरानी देवी । एक एक रोटी का संघर्ष आरंभ हुआ । उन्होंने जंगल में लकड़ियाँ बीनी, कंडे एकत्र किये और उन्हें हाट बाजार में बेचकर किसी तरह रोटी चलाई । उन्हें आतंकवादी की माँ माना गया था । लोगों ने ताने दिये । ऐसे ताने उन्होंने स्वतंत्रता के दो साल बाद तक सुने । स्वतंत्रता के बाद भी उनका एक एक रोटी जुटाने का संघर्ष बना रहा । 1949 में क्रांतिकारी सदाशिव मलकापुरकर को खबर लगी । वे भाबरा गये और जगरानी देवी को झाँसी ले आये । उन्होंने एक पुत्र की भांति सेवा की, तीर्थयात्रा कराई । जगरानी देवी ने 1951 में अंतिम सांस ली । सदाशिव जी ने ही अंतिम संस्कार किया ।

महान क्रांतिकारी चन्द्र शेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को भाबरा गाँव में हुआ था । यह गाँव मध्यप्रदेश में अलीराजपुर जिले के अंतर्गत आता है । उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के बदरका ग्राम के रहने वाले थे लेकिन प्राकृतिक और राजनैतिक विषम परिस्थितियों के चलते उन्होंने अपना पैतृक ग्राम छोड़ा और अनेक स्थानों से होकर 1905 के आसपास उनके पिता सीताराम तिवारी झाबुआ आ गये । यहीं बालक चन्द्रशेखर का जन्म हुआ । पिता सीताराम तिवारी के पिता 1857 की क्राँति के समय कमल और रोटी का संदेश लेकर गाँव गाँव गये थे । परिवार ने अंग्रेजों का दमन झेला था और स्वाधीनता की आग रक्त में प्रवाहित हो रही थी । 1857 के बाद वह सामूहिक दमन हुआ था, गाँव के गाँव फाँसी पर चढ़ाये गये थे । अंग्रेजों के इस दमन की परिवार में अक्सर चर्चा होती थी । बालक चन्द्र शेखर ने वे कहानियाँ बचपन से सुनी थीं । इस कारण उनके मन में अंग्रेजी शासन के प्रति एक विशेष प्रकार की वितृष्णा का भाव जागा था, उन्हे गुस्सा आता था अंग्रेजों पर । भावरा गाँव वनवासी बाहुल्य प्रक्षेत्र था । अन्य परिवार गिने चुने ही थे । ये परिवार वही थे जो आजीविका या अंग्रेजी शासन की कुदृष्टि से बचने केलिये वहां आकर बसे थे । इस कारण बालक चन्द्र शेखर की टीम में सभी वनवासी बालक ही जुटे । इसका लाभ यह हुआ कि बालक चन्द्र शेखर ने धनुष बाण चलाना, निशाना लगाना और कुश्ती लड़ना बचपन में ही सीख लिया था । परिवार का वातावरण राष्ट्रभाव, स्वायत्ता और स्वाभिमान के बोध भाव से भरा था । इसपर गाँव का प्राकृतिक और सामाजिक वातावरण । इन दोनों विशेषताओं से बालक चन्द्र शेखर क मानसिक और शारीरिक दोनों में तीक्ष्णता समृद्ध हुई । उनमें सक्षमता और स्वायत्तता का बोध भी जागा 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध देश भर में विरोध प्रदर्शन हुये किशोरवय चन्द्र शेखर ने इसमें भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया । लेकिन उनकी दृढ़ता और संकल्पशीलता का परिचय तब मिला जब वे मात्र चौदह साल के थे । यह 1920 की घटना है । वे आठवीं कक्षा में पढ़ते थे । आयु बमुश्किल चौदह वर्ष की रही होगी । जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद पूरे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध वातावरण बनने लगा था । यह क्रम लगभग साल भर तक चला था । चूंकि तब संचार माध्यम इतने प्रबल नहीं थे । जहां जैसा समाचार पहुँचता लोग अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते । गाँव गाँव में बच्चों की प्रभात फेरी निकालने का क्रम चल रहा था । अनेक स्थानों पर प्रशासन ने प्रभात पारियों पर पाबंदी लगा दी थी । झाबुआ जिले में भी पाबंदी लगा दी गयी थी । पर भावरा गाँव में यह प्रभात फेरी बालक चन्द्र शेखर ने निकाली । उन्होंने किशोर आयु में ही किसी प्रतिबंध की परवाह नहीं की और अपने मित्रों को एकत्र कर कक्षा का वहिष्कार किया बच्चो को एकत्र किया और खुलकर प्रभातफेरी निकाली । प्रभात फेरी में रामधुन के साथ स्वाधीनता के नारे भी लगाये । बालक चन्द्र शेखर और कुछ किशोरों को पकड़ लिया गया । बच्चो को चांटे लगाये गये माता-पिता को बुलवाया गया, कान पकड़ कर माफी मांगने को कहा गया । लोग डर गये बाकी बच्चो को माफी मांगने पर छोड़ दिया गया । लेकिन चन्द्रेखर ने माफी न माँगी और न अपनी गल्ती स्वीकारी उल्टे भारत माता की जय का नारा लगा दिया । इससे नाराज पुलिस ने उन्हे डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया और पन्द्रह बेंत मारने की सजा सुना दी गयी । उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम “आजाद” बताया । पिता का नाम “स्वतंत्रता” और घर का पता “जेल” बताया । यहीं से उनका नाम चंद्र शेखर तिवारी के बजाय चन्द्र शेखर आजाद हो गया ।

बेंत की सजा देने के लिये उनके कपड़े उतारकर निर्वसन किया गया । खंबे से बांधा गया और बेंत बरसाये गये । हर बेंत उनके शरीर की खाल उधेड़ता रहा और वे भारत माता की जय बोलते रहे । बारहवें बेंत पर अचेत हो गये फिर भी बेंत मारने वाला न रुका । उसने अचेत देह पर भी बेंत बरसाये । लहू लुहान किशोर वय चन्द्रशेखर को उठा घर लाया गया । ऐसा कोई अंग न था जहाँ से रक्त का रिसाव न हो । उन्हे स्वस्थ होने में, और घाव भरने में एक माह से अधिक का समय लगा । इस घटना से चन्द्रशेखर आजाद की दृढ़ता और बढ़ी । इसका जिक्र पर पूरे भारत में हुआ । सभाओं में उदाहरण दिया जाने लगा । पंडित जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गाँधी ने भी अपने विभिन्न लेखन में इस घटना का उल्लेख किया है ।

अपनी शालेय शिक्षा पूरी कर चन्द्रशेखर पढ़ने के लिये बनारस आये । उन दिनों बनारस क्राँतिकारियों का एक प्रमुख केन्द्र था । यहां उनका परिचय सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी मन्मन्थ नाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी से हुआ और वे सीधे क्राँतिकारी गतिविधियों से जुड़ गये । आंरभ में उन्हे क्राँतिकारियों के लिये धन एकत्र करने का काम मिला । यौवन की देहरी पर कदम रख रहे चन्द्र शेखर आजाद ने युवकों की एक टोली बनाई और उन जमींदारों या व्यापारियों को निशाना बनाते जो अंग्रेज परस्त थे । इसके साथ यदि सामान्य जनों पर अंग्रेज सिपाही जुल्म करते तो बचाव के लिये आगे आ जाते । उन्होंने बनारस में कर्मकांड और संस्कृत की शिक्षा ली थी । उन्हे संस्कृत संभाषण का अभ्यास भी खूब था । अतएव अपनी सक्रियता बनाये रखने के लिये उन्होंने अपना नाम हरिशंकर ब्रह्मचारी रख लिया था और झाँसी के पास ओरछा में अपना आश्रम भी बना लिया था । बनारस से लखनऊ कानपुर और झाँसी के बीच के सारे इलाके में उनकी धाक जम गयी थी । वे अपने लक्षित कार्य को पूरा करते और आश्रम लौट आते । क्रांतिकारियों में उनका नाम चन्द्र शेखर आजाद था तो समाज में हरिशंकर ब्रह्मचारी । उनकी रणनीति के अंतर्गत ही सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी भगतसिंह अपना अज्ञातवास बिताने कानपुर आये थे । 1922 के असहयोग आन्दोलन में जहाँ उन्होंने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया वही 1927 के काकोरी कांड, 1928 के सेन्डर्स वध, 1929 के दिल्ली विधान सभा बम कांड, और 1929 में दिल्ली वायसराय बम कांड में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है । यह चन्द्र शेखर आजाद का ही प्रयास था कि उन दिनों भारत में जितने भी क्राँतिकारी संगठन सक्रिय थे सबका एकीकरण करके 1928 में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का गठन हो गया था । इन तमाम गतिविधियों की सूचना तब अंग्रेज सरकार को लग रही थी । उन्हे पकड़ने के लिये भावरा और लाहौर से झाँसी तक लगभग सात सौ खबरी लगाये गये । पर चंद्र शेखर आजाद तो हरिशंकर ब्रह्मचारी के रूप में ओरछा आ गये । उनके साथ कुछ क्राँतिकारी भी साधु वेष में उनके आश्रम में रहने लगे थे । लेकिन क्राँतिकारी आंदोलन के लिये धन संग्रह का दायित्व अभी भी चन्द्र शेखर आजाद पास अभी भी था । वे हरिशंकर ब्रह्मचारी वेष में ही यात्राये करते और धन संग्रह करते । धनसंग्रह में उन्हे पं मोतीलाल नेहरू का भी सहयोग मिला । आजाद जब भी प्रयाग जाते तो हमेशा इलाहाबाद के बिलफ्रेड पार्क में ही ठहरते थे । और यही पार्क उनके बलिदान का स्थान बना । वह 27 फरवरी 1931 का दिन था । पूरा खुफिया तंत्र उनके पीछे लगा था । वे 18 फरवरी को इस पार्क में पहुंचे थे । यद्यपि उनके पार्क में पहुंचने की तिथि पर मतभेद हैं लेकिन वे 19 फरवरी को पं जवाहरलाल नेहरु की तेरहवीं में शामिल हुये थे । तेरहवीं के बाद उनकी कमला नेहरू से भेंट भी हुईं । कमला जी यह जानती थीं कि पं मोतीलाल नेहरू क्राँतिकारियों को सहयोग करते थे । कहा जाता है कि उनके कहने पर चन्द्र शेखर आजाद की 25 फरवरी को आनंद भवन में पं जवाहरलाल नेहरु से मिलने पहुंचे । इस बातचीत का विवरण कहीं नहीं है । मुलाकात हुई ।

अनुमान है कि पं नेहरू ने भी सहयोग का आश्वासन दिया था पर इसके प्रमाण कहीं नहीं मिलते । हालांकि बाद में पं नेहरू ने अपनी आत्मकथा में क्राँतिकारियों की गतिविधियों पर नकारात्मक टिप्पणी की है । और चन्द्र शेखर आजाद को फ़ासीवादी लिखा है । जो हो दो दिन चन्द्रशेखर आजाद उसी पार्क में ही रहे । और 27 फरवरी को पुलिस से बुरी तरह घिर गये । पुलिस द्वारा उन्हे घेरने से पहले सीआईडी ने पूरा जाल बिछा दिया था । मूंगफली बेचने, दाँतून बेचने आदि के बहाने पुलिस पूरे पार्क में तैनात हो गयी थी और 27 फरवरी को सबेरे वे क्राँतिकारी सुखदेव राज से चर्चा कर रहे थे कि पार्क के तीनों रास्तों से पुलिस की गाड़ियां पहुँच गयीं पहुँची । पुलिस की इस टीम का नेतृत्व सीआईडी एस पी नाॅट कर रहा था । इसके साथ थाना कर्नलगंज का एस ओ तथा अन्य पुलिस वाले एनकाउन्टर आरंभ हुआ । आजाद ने तीन पुलिस वाले ढेर कर दिये पर यह एनकाउन्टर अधिक देर न चल सका । यह तब तक ही चला जब तक उनकी पिस्तौल में गोलियाँ रहीं । वे घायल हो गये थे और अंतिम गोली बची तो उन्होंने अपनी कनपटी पर मारली । वे आजाद ही जिये और आजाद ही विदा हुये ।

उनके बलिदान के बाद अंग्रेजों शव का अपमान किया और दहशत पेदा करने के लिये पेड़ लटकाया । यह खबर कमला नेहरू को लगी । उस समय पुरुषोत्तमदास टंडन आनंद भवन आये थे । कमला जी टंडन जी को लेकर पार्क पहुँची । अंग्रेजी अफसरों से बात की । शव उतरवाया और सम्मान पूर्वक अंतिम संस्कार का प्रबंध किया । अब इस बिलफ्रेड पार्क का नाम चंद्र शेखर आजाद हो गया है ।

शिवरात्रिः दुनिया की सबसे बड़ी ‘वेडिंग सेरेमनी’

shiv-3.jpeg

हेमंत शर्मा

आज शिवरात्रि है. शिव के विवाह की सालगिरह. जो आदि हैं अनंत हैं, उनके वरण की वार्षिकी. शिव के सिद्ध और संयोग का अद्भुत दिन. इस दिन शिव एकलता से निकल अंगीकरण को चुनते हैं. पाणिग्रहण करते हैं. लोक मंगल के लिए. और देव, दानव, मनुष्य, जीव सबको धन्य करते हैं.

शिव का विवाह दरअसल सृष्टि का सबसे सुखद और अलौकिक क्षण है. यह विवाह तप, ज्ञान, योग और ध्यान की महान अवस्थाओं का सांसारिक अवतरण है. ये विवाह आध्यात्म और ज्ञान की परम अवस्थाओं को कर्म और व्यवहार की वेणी तक लाता है. यह सूत्र ही सृष्टि के संतुलन को स्थापित करता है. क्यों एक योगी भोग के लिए तैयार होता है. इसलिए शिव के विवाह को समझे बिना सृष्टि की गति को समझा नहीं जा सकता. यही घटना शिव को समाधि से समाज तक खींच लाती है. ध्यानस्थ को जगत पर ध्यान देने का अवसर देती है. ज्ञान की अनंत शून्यता को व्यवहार और लोक के कलरव में नायकत्व देती है. साहित्य में इस विवाह के अद्भुत वर्णन हैं.

हम बचपन से शिव के बाराती हैं. काशी का हूँ, तो ऐसा साक्षात लगता है कि ये झांकी नहीं, सच में शिव की ही बारात है. शिव साक्षात. बाराती साक्षात. विवाह भी साक्षात. शिवरात्रि का जश्न है. उत्सव और आनंद है. शिवरात्रि को आप दुनिया की सबसे बड़ी ‘वेडिंग सेरेमनी’ कह सकते हैं, जो अब लोक पर्व में तब्दील हो गयी है. सबसे लम्बा चलने वाला वैवाहिक कार्यक्रम, सबसे ज़्यादा शामिल होने वाले लोग, सबसे ज़्यादा जगहों पर होने वाला रिसेप्शन. बिना किसी इंवेट मैनेजमेंट कंपनी के… यही महाशिवरात्रि की ताक़त है. इस शिव बारात में भी समतामूलक समाज की अवधारणा है. भूत, पिशाच, गंधर्व, गण, मनुपुत्र, नायक, देव, तपस्वी, कोढ़ी, पागल, नंगे, भिखारी, नचनिया, बजनिया, लूले, लंगड़े, नशेड़ी, शराबी, कबाबी सब. अकेला त्योहार जो कश्मीर में ‘हेराथ’ से लेकर रामेश्वरम् तक एक साथ मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि सृष्टि का प्रारम्भ भी इसी दिन हुआ. पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ. शिव बारात की ख़ास बात थी बेटे ने बाप की बारात का नेतृत्व किया. गणेश बारात के आगे आगे चले. बेटा बाप को ब्याहने चला.

इस अनोखी और अड़भंगी शिव बारात ने इतिहास रचा. इसके प्रथा प्रमाणों को ऐसे समझें. जनमानस में बारात की मौजूदा प्रथा का श्रीगणेश भी इसी दिन हुआ होगा. इसी के बाद विवाह में सर्वप्रथम द्वार-पूजा और उसमें भी गणेश पूजा अनिवार्य हुई. बूढ़े लोगों को दूसरी शादी करने का अधिकार मिला. बैल की प्रतिष्ठा हुई. बैल सत्ता का निशान बना. इन्हीं परम्पराओं से शिव की बारात अमर हो गई.

शिव पहले गुरु हैं जिनसे ज्ञान उपजा. वह सुन्दर भी हैं और वीभत्स भी. आदियोगी भी हैं आदि गुरु भी. शिव से ही सब जन्मता है और उसी में सब समाता है. देव और दानव दोनों उनके उपासक हैं. वे रक्षक भी हैं और विनाशक भी. वे कल्पना भी हैं और वास्तविकता भी. वे अर्धनारीश्वर होकर भी काम पर विजेता हैं. गृहस्थ होकर भी परम विरक्त हैं. नीलकण्ठ होकर भी विष से अलिप्त हैं. उग्र होते हैं तो ताण्डव, नहीं तो सौम्यता से भरे भोला भण्डारी. परम क्रोधी पर दयासिंधु भी शिव ही हैं. विषधर नाग और शीतल चन्द्रमा दोनों उनके आभूषण हैं. उनके पास चन्द्रमा का अमृत है और सागर का विष भी. वे योगी भी हैं और अघोरी भी. ऐसा योगी साधना से उठकर शिवरात्रि पर भोग की तरफ़ जाएगा. हालाँकि उन्होंने काम को जलाया है. पर सृष्टि के कल्याण के लिए वे विवाह को राज़ी हैं. इसलिए शिवरात्रि जागृति की रात है.

मैं बरसों तक बनारस में निकलने वाली शिव बारात का बाराती रहा हूँ. इस बार भीड़ के चलते प्रशासन ने बारात एक दिन के लिए स्थगित कर दी है. यानी विवाह पहले होगा बारात बाद में निकलेगी. बनारस की शिव बारात अनोखी होती है. अपना जीवन भी शिव बारात जैसा ही चल रहा है. रक़म रक़म के लोग हैं. कभी-कभी लगता है पूरा जीवन ही शिव बारात है. मेरे बचपन में पूरा घर शिवरात्रि के उपवास पर रहता था. हम बच्चे थे सो उपवास कैसे हो? पर हम उपवास की ज़िद करते थे. तभी माँ ने जुगत निकाली कि तुम बाराती हो. और शिव के बाराती सब खा-पी सकते हैं. इसलिए तब से हम खा-पी कर उपवास करते हैं. पीकर मतलब ठण्डाई पीकर.

औघड़ दानी, भूतभावन, गंगाधर, शशिधर, विरूपाक्ष आदि नामों से वर्णित शिव अकेले ऐसे देवता हैं जो पूरे देश के हर कोने में पूजे जाते हैं और सभी उनके विवाह का ये उत्सव मनाते हैं. भगवान शिव और पार्वती के विवाह का ये उत्सव बसंत पंचमी के दिन से ही शुरू हो जाता है. उस दिन बाबा का तिलकोत्सव होता है. उसके बाद शिवरात्रि के दिन उनका विवाह होता है. विवाह के बाद माँ पार्वती रस्म के हिसाब से अपने मायके चली जाती हैं. और जब बाबा उनका गौना कराकर उन्हें कैलाश लाते हैं तो वह दिन रंगभरी एकादशी (होली से चार दिन पहले) का होता है और उसी रोज़ से बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों से जमकर रंगारंग होली खेलते हैं.

शिव देवताओं के ज़बर्दस्त दबाव में इस विवाह के लिए राज़ी हुए थे. यज्ञकुण्ड में पहली पत्नी के जलकर मरने के बाद शिव लम्बे समय तक उनके शोक में पागल रहे. उन्होंने कैलाश का आश्रम उजाड़ दिया. श्मशान में ही धूनी रमाने लगे. वहीं भूत-प्रेतों से संग-साथ हुआ. ’बिन घरनी घर भूत का डेरा’ के माहौल में औघड़ दानी ने दीन दुनिया से लगभग वैराग्य ले लिया. देवलोक परेशान. शिव को इस अवस्था से कैसे बाहर निकाला जाए. देवताओं ने शिव से विवाह का निवेदन किया. राय बनी कि शिव का दोबारा विवाह हो. शिव ने मना किया कि ढलती उम्र में विवाह से जगहँसाई होगी. तब रास्ता निकला कि अगर कोई कन्या ख़ुद शिव से विवाह के लिए तपस्या करे तो शिव क्या करेंगे. वही हुआ. कुबेर ने नारद को समझाया. ऐसे मौक़ों पर नारद ही काम आते थे. नारद ने हिमालय के घर आई कन्या को आशुतोष का महत्व समझाया. पार्वती अन्न-जल छोड़ शिव के लिए तप करने लगीं. शिव को मानना पड़ा. विवाह तय हुआ. पार्वती शिव की हो गईं.

बारात में जाने के लिए सब देवता अपने-अपने वाहन और विमान को सजाने लगे, अप्सराएँ गाने लगीं. शिवजी के गण उनका श्रृंगार करने लगे. जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर साँपों का मौर सजाया गया. शिवजी ने साँपों के ही कुण्डल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र की जगह बाघम्बर लपेट लिया. शिव के माथे पर चन्द्रमा, सिर पर गंगा, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला थी. वेष अशुभ होने पर भी वे कल्याण के धाम लग रहे थे. उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू था. शिव बैल पर चढ़कर बारात में चले. दृश्य भयावह था. बाजे बज रहे हैं. शिवजी को देखकर देवांगनाएँ मुस्कुरा रही हैं कि इस वर के योग्य दुलहिन संसार में नहीं मिलेगी. इस विवाह का यह वर्णन तुलसी दास कर रहे हैं:-

गल भुजंग भस्म अंग शंकर अनुरागी.
सतगुरु चरणारबिन्द शिव समाधि लागी.
तीन नयन अमृत भरे गले मुंड माला.
रहत नगन फिरत मगन संग गौरी बाला.
अपने पति को निरख-निरख पारवती जागी.
औरन आशीष देत आप फिरत त्यागी.
गल भुजंग भस्म अंग.

शिव पुराण में शिव की विवाह यात्रा का विस्तार से ज़िक्र है. शिव पुराण, हमारे अठारह महापुराणों में से एक है.
मत्स्य पुराण, लिंग पुराण और पद्म पुराण में भी शिव विवाह का ज़िक्र मिलता है लेकिन श्रीरामचरितमानस और शिव महापुराण जितना विस्तृत वर्णन कहीं नहीं है.
वेदों में शिव के बाबत 39 ऋचाएँ और 75 दूसरे सन्दर्भ मिलते हैं. ऋग्वेद में शिव से जुड़े तीन सूक्त हैं… प्रथम मंडल के 114वें सूक्त में 11 मंत्र हैं, दूसरे मंडल के सूक्त संख्या 33 में 15 मंत्र हैं तथा 7वें मंडल के सूक्त 46 में 4 ऋचाएँ हैं. इसके अलावा 9 दूसरे मंत्र भी हैं.इनमें बारात का ज़िक्र नहीं है. शतपथ ब्राह्मण, वृहदारण्यक उपनिषद्, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में भी रुद्र-शिव संबंधित मंत्र मिलते हैं. ऋग्वेद में रुद्र को ही डील करता है. रुद्र, शिव के उग्र रूप हैं.

ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 114वें सूक्त में रुद्र की विशेषताओं का वर्णन है. इसमें कहा गया है कि रुद्र पशुओं को सुख देने वाले हैं, जटाधारी हैं, रोग प्रतिरोधक शक्ति प्रदाता हैं, सात्विक आहार लेने वाले, सुंदर रूप धारण करने वाले, सर्व विष को दूर करने वाले हैं. यहां उनके शूल से बचने की प्रार्थना भी की गई है. दूसरे मंडल के 33वें सूक्त में जो 15 मंत्र हैं, उनमें रुद्र को 100 वर्ष की आयु देने वाला, रोग नष्ट करने वाला, (भेषजेभि: भिषिक्तमं त्वा भिषजां शृणोमि-4) वैद्यों के वैद्य, अनेक रूपों के स्वामी, आभूषण युक्त, वनों के स्वामी, असुर संहारक, धनुष-बाण धारी तथा सुखी सम्पन्न, निरोग बनाने वाला कहा गया है.

7वें मंडल के 40वें सूक्त के चार मंत्रों में भी रुद्र को सुखी सम्पन्न और निरोग बनाने वाले बताया गया है. ‘त्र्यंबकम् यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम्’ (ऋग्वेद-7.59.12) में शिव को तीन नेत्रों वाला बताया गया है. उनके तीन नेत्र सूर्य, चंद्रमा और अग्नि माने गए हैं. जैसे ही हम ऋग्वेद से यजुर्वेद की ओर बढ़ते हैं, रुद्र से शिव में परिवर्तन का अनुभव करते हैं. शिव, संस्कृत शब्द “शिव” से लिया गया है, जो शुभता और पवित्रता का प्रतीक है. इस चरण में, भगवान शिव को तपस्वी योगी के रूप में चित्रित किया गया है, जो हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों पर ध्यान कर रहे हैं. वह वैराग्य, आत्मज्ञान और परोपकार के आदर्शों का प्रतीक हैं. यजुर्वेद शिव को ध्यान और आध्यात्मिकता के दिव्य आदर्श के रूप में महिमामंडित करता है.

शिव पुराण के मुताबिक शिव बारात में अप्सराओं ने भरत नाट्यम पेश किया. डाकिनियों ने लोकनृत्य. धूमधाम से बारात हिमालय के दरवाज़े पर पहुँची. सास वर के परछावन के लिए दरवाज़े पर आयी. पर यह क्या? शिव का यह स्वरूप… वर के सिर पर साँप का मौर, गले में मुण्डमाल, कटि पर कड़कड़ा चर्म, हाथ में डमरू और त्रिशूल देख सास के हाथ से स्वागत की थाली गिर गयी. सभी स्त्रियाँ भाग गईं. पार्वती की माँ गिरते-पड़ते घर में वापस आकर नारद की सात पुश्तों का शाब्दिक अभिषेक (गरियाने) करने लगी.

रामचरितमानस के बालकाण्ड में शिवजी के विवाह का अद्भुत वर्णन है. पर्वतराज हिमाचल ने हाथ में कुश लेकर तथा कन्या का हाथ पकड़कर उन्हें भवानी जानकर शिवजी को समर्पित किया. जब महेश्वर ने पार्वती का पाणिग्रहण किया, तब देवता बम-बम हुए. मुनिगणों ने मंत्रों का पाठ किया. शिव का यह विकराल रूप ही उनके विवाह में अड़चन था. कोई भी माता या पिता किसी भूखे, नंगे, मतवाले से बेटी ब्याहने की इजाज़त कैसे देंगे. शिव की बारात में नंग-धड़ंग, चीख़ते, चिल्लाते, पागल, भूत-प्रेत, मतवाले सब थे. शिव की यह बारात लोक में उनके व्याप्ति की मिसाल है.

क्या उत्तर क्या दक्षिण. उत्तर में उत्तुंग कैलाश से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक और सोमनाथ से लेकर अरुणाचल तक शिव एक जैसे पूजे जाते हैं. इस व्यापक आधार की शोकेस है उनकी बारात. समाज के भद्रलोक से लेकर शोषित, वंचित, भिखारी तक उन्हें अपना मानते हैं. बारात उन्हें सर्वहारा का देवता साबित करती है. इतने व्यापक दायरे वाले शिव ज्ञान के स्रोत भी हैं और मुक्ति के भी. विपरीत ध्रुवों और विषम परिस्थितियों से अद्भुत सामंजस्य बिठानेवाला उनसे बड़ा कोई दूसरा भगवान नहीं है. शिव विलक्षण समन्वयक हैं. साँप, सिंह, मोर, बैल, सब आपस का बैर-भाव भुला समभाव से उनके सामने हैं. वे समाजवादी व्यवस्था के पोषक हैं. वे सिर्फ़ संहारक नहीं, कल्याणकारी, मंगलकर्ता भी हैं.

शिव गुट निरपेक्ष हैं. सुर और असुर दोनों का उनमें विश्वास है. राम और रावण दोनों उनके उपासक हैं. दोनों गुटों पर उनकी समान कृपा है. आपस में युद्ध करने से पहले दोनों पक्ष उन्हीं को पूजते हैं. लोक कल्याण के लिए वे हलाहल पीते हैं. वे डमरू बजायें तो प्रलय होता है. लेकिन इसी प्रलयंकारी डमरू से संस्कृत व्याकरण के चौदह सूत्र भी निकलते हैं. इन्हीं माहेश्वर सूत्रों से दुनिया की कई दूसरी भाषाओं का जन्म हुआ.

शिव का व्यक्तित्व विशाल है. वे काल से परे महाकाल हैं. सर्वव्यापी हैं. सर्वग्राही हैं. सिर्फ़ भक्तों के नहीं देवताओं के भी संकटमोचक हैं. उनके ‘ट्रबल शूटर’ हैं. शिव का पक्ष सत्य का पक्ष है. उनके निर्णय लोकमंगल के हित में होते हैं. विभेद से परे है शिव का आशीष. तपस्या का फल तपस्वी की पहचान के अनुरूप देना शिव का स्वभाव नहीं. इसीलिए शिव असुरों के भी वरदायी रहे और देवों के भी. जीवन के परम रहस्य को जानने के लिए शिव के इन रूपों को समझना जरूरी होगा, क्योंकि शिव उस आम आदमी की पहुँच में हैं, जिसके पास मात्र एक लोटा जल है.

शिव को समझने का मतलब है सृष्टि को समझना. प्रकृति को समझना. उसके जनन, जन्म और विध्वंस को जानना. उसकी विराट, उदार और समन्वय दृष्टि को समझना. शिव विराट नर्तक हैं.नटराज हैं. मंच कला के विधानाध्यक्ष हैं. आज रात वे नाचेंगे. गायेंगे. उल्लास मनायेंगे. प्रकृति का हर अंश नृत्य में झूमेगा. देवाधिदेव महादेव नाचते हुए देवता हैं. शिव के साथ उनके गण भी नाचते हैं. शिवगण असाधारण हैं. तुलसी कहते हैं कोई “मुखहीन विपुल मुख काहू”.

ऐसे रुद्र, अंगीरागुरु, अंतक, अंडधर, अंबरीश, अकंप, अक्षतवीर्य, अक्षमाली, अघोर, अचलेश्वर, अजातारि, अज्ञेय, अतीन्द्रिय, अत्रि, अनघ, अनिरुद्ध, अनेकलोचन, अपानिधि, अभिराम, अभीरु, अभदन, अमृतेश्वर, अमोघ, अरिदम, अरिष्टनेमि, अर्धेश्वर, अर्धनारीश्वर, अर्हत, अष्टमूर्ति, अस्थिमाली, आत्रेय, आशुतोष, इन्दुभूषण, इन्दुशेखर, इकंग, ईशान, ईश्वर, उन्मत्तवेष, उमाकांत, उमानाथ, उमेश, उमापति, उरगभूषण, ऊर्ध्वरेता, ऋतुध्वज, एकनयन, एकपाद, एकलिंग, एकाक्ष, कपालपाणि, कमण्डलुधर, कलाधर, कल्पवृक्ष, कामरिपु, कामारि, कामेश्वर, कालकण्ठ, कालभैरव, काशीनाथ, कृत्तिवासा, केदारनाथ, कैलाशनाथ, क्रतुध्वसी, क्षमाचार,गंगाधर, गणनाथ, गणेश्वर, गरलधर, गिरिजापति, गिरीश, गोनर्द, चन्द्रेश्वर, चन्द्रमौलि, चीरवासा, जगदीश, जटाधर, जटाशंकर, जमदग्नि, ज्योतिर्मय, तरस्वी, तारकेश्वर, तीव्रानन्द, त्रिचक्षु, त्रिधामा, त्रिपुरारि, त्रियम्बक, त्रिलोकेश, त्र्यम्बक, दक्षारि, नन्दिकेश्वर, नन्दीश्वर, नटराज, नटेश्वर, नागभूषण, निरंजन, नीलकण्ठ, नीरज, परमेश्वर, पूर्णेश्वर, पिनाकपाणि, पिंगलाक्ष, पुरन्दर, पशुपतिनाथ, प्रथमेश्वर, प्रभाकर, प्रलयंकर, भोलेनाथ, बैजनाथ, भगाली, भद्र, भस्मशायी, भालचन्द्र, भुवनेश, भूतनाथ, भूतमहेश्वर, भोलानाथ, मंगलेश, महाकान्त, महाकाल, महादेव, महारुद्र, महार्णव, महालिंग, महेश, महेश्वर, मृत्युंजय, यजन्त, योगेश्वर, लोहिताश्व, विधेश, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, विषकण्ठ, विषपायी, वृषकेतु, वैद्यनाथ, शशांक, शेखर, शशिधर, शारंगपाणि, शिवशम्भु, सतीश, सर्वलोकेश्वर, सर्वेश्वर, सहस्रभुज, साँब, सारंग, सिद्धनाथ, सिद्धीश्वर, सुदर्शन, सुरर्षभ, सुरेश, सोम, सृत्वा, हर-हर महादेव, हरिशर, हिरण्य, हुत, हम सबका कल्याण करते हैं.

महाशिवरात्रि एक अवसर भी है और सम्भावना भी, जब आप स्वयं को, अपने भीतर बसी असीम रिक्तता के अनुभव से जोड़ सकते हैं, जो सारे सृजन का स्रोत है. एक ओर शिव संहारक कहलाते हैं और दूसरी ओर वे सबसे अधिक करुणाकर भी हैं. वे उदार दाता हैं. यौगिक गाथाओं में वे, अनेक स्थानों पर महाकरुणाकर के रूप में सामने आते हैं. उनकी करुणा के रूप विलक्षण और अद्भुत रहे हैं. इसी कारुण्य में शिव का न्याय समाहित है, प्रेम समाहित है, अभेद और अनुकम्पा समाहित है.

आप सभी को शिवरात्रि की बहुत शुभकामनाएं. विराम लेते हुए आपको शिव महिमा के दो शानदार उदाहरण देना चाहता हूँ. ताकि नज़ीर अकबराबादी और मलिक मोहम्मद जायसी के रचना संसार के ये पुष्प आपको भी सुगन्धित करें.

जय जय.

•••••
नज़ीर अकबराबादी

पहले नाम गनेश का, लीजै सीस नवाय।
जासे कारज सिद्ध हों सदा महूरत लाय॥
बोल बचन आनन्द के, प्रेम पीत और चाह।
सुन लो यारों, ध्यान धर महादेव का व्याह॥

जोगी जंगम से सुना, वह भी किया बयान।
और कथा में जो सुना, उसका भी परमान॥
सुनने वाले भी रहें, हँसी ख़ुशी दिन-रैन।
और पढ़ें जो याद कर, उनको भी सुख चैन॥

और जिसने इस व्याह की, महिमा कही बनाय।
उसके भी हर हाल में शिव जी रहें सहाय॥
ख़ुशी रहे दिन रात वह, कभी न हो दिलगीर।
महिमा उसकी भी रहे, जिसका नाम ‘नज़ीर’।

जायसी

ततखन पहुँचे आइ महेसू। बाहन बैल, कुस्टि कर भेसू॥
काथरि कया हडावरि बाँधे। मुंड-माल औ हत्या काँधे॥
सेसनाग जाके कँठमाला। तनु भभुति, हस्ती कर छाला॥
पहुँची रुद्र-कवँल कै गटा। ससि माथे औ सुरसरि जटा॥
चँवर घंट औ डँवरू हाथा। गौरा पारबती धनि साथा॥
औ हनुवंत बीर सँग आवा। धरे भेस बादर जस छावा॥
अवतहि कहेन्हि न लावहु आगी। तेहि कै सपथ जरहु जेहि लागी॥
की तप करै न पारेहु, की रे नसाएहु जोग?।
जियत जीउ कस काढहु? कहहु सो मोहिं बियोग॥
कहेसि मोहिं बातन्ह बिलमावा। हत्या केरि न डर तोहि आवा॥
जरै देहु, दुख जरौं अपारा। निस्तर पाइ जाउँ एक बारा॥
जस भरथरी लागि पिंगला। मो कहँ पद्मावति सिंघला॥
मै पुनि तजा राज औ भोगू। सुनि सो नावँ लीन्ह तप जोगू॥
एहि मढ सेएउँ आइ निरासा। गइ सो पूजि, मन पूजि न आसा॥
मैं यह जिउ डाढे पर दाधा। आधा निकसि रहा, घट आधा॥
जो अधजर सो विलँब न आवा। करत बिलंब बहुत दुख पावा॥
एतना बोल कहत मुख, उठी बिरह कै आगि।
जौं महेस न बुझावत, जाति सकल जग लागि ॥
पारबती मन उपना चाऊ। देखों कुँवर केर सत भाऊ॥
ओहि एहि बीच, की पेमहि पूजा। तन मन एक, कि मारग दूजा॥
भइ सुरूप जानहुँ अपछरा। बिहँसि कुँवर कर आँचर धरा॥
सुनहु कुँवर मोसौं एक बाता। जस मोहिं रंग न औरहि राता॥
औ बिधि रूप दीन्ह है तोकों। उठा सो सबद जाइ सिव-लोका॥
तब हौं तोपहँ इंद्र पठाई।गइ पदमिनि तैं अछरी पाई॥
अब तजु जरन, मरन, तप जोगू।मोसौं मानु जनम भरि भोगू

(सोशल मीडिया से)

राष्ट्र और समाज को दिया सारा जीवन

नानाजी_देशमुख.jpg

हजार वर्ष की दासता के अंधकार के बीच यदि आज राष्ट्र और संस्कृति का वट वृक्ष पुनः पनप रहा है तो इसके पीछे उन असंख्य तपस्वियों का जीवन है जिन्होंने अपना कुछ न सोचा । जो सोचा वह राष्ट्र के लिये सोचा, समाज के लिये सोचा और संस्कृति रक्षा में अपने जीवन को समर्पित कर दिया । इन्हीं महा विभूतियों में एक हैं नानाजी देशमुख । स्वतंत्रता के पूर्व उन्होंने असंख्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तैयार किये और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रसेवा के लिये सैकड़ों स्वयंसेवक तैयार किये ।

ऐसे हुतात्मा संत नानाजी की पुण्यतिथि 27 फरवरी को है । नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्तूबर 1916 को महाराष्ट्र के हिगोंली जिला के छोटे से कस्बे कडोली में हुआ था । उनका प्रारंभिक जीवन अति अभाव और संघर्ष से भरा था । लेकिन चुनौतियों ने उन्हे कमजोर नहीं सशक्त बनाया, संकल्पशक्ति को दृढ़ किया । उन्होंने पुस्तकें खरीदने के लिये सब्जी बेचकर पैसे जुटाये, पढ़ाई की । मंदिरों में रहे लेकिन उच्च शिक्षा प्राप्त की । उन्होंने पिलानी के बिरला इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा की डिग्री ली। अपनी शिक्षा के दौरान उन्होने राष्ट्र और समाज की दयनीय स्थिति को अपनी आँखों से देखा और समझा। सनातन समाज के भोलेपन का लाभ लेकर विभाजन का षड्यंत्र सब । उन्होंने साहित्य का अध्ययन किया । दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द और तिलक जी के साहित्य से बहुत प्रभावित हुये और समय के साथ संघ से परिचय हुआ । वे 1930 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े । और जीवन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ही समर्पित कर दिया । संघ के संस्थापक डा हेडगेवार से उनके व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंध थे । नानाजी ने डा हेडगेवार की कार्यशैली देखी । डा हेडगेवार ने अपना व्यक्तित्व, अपना जीवन ही नहीं अपितु अपना पूर्ण अस्तित्व ही राष्ट्र और संस्कृति की सेवा के लिये समर्पित कर दिया था । ठीक उसी प्रकार नानाजी ने भी उच्च शिक्षा से सम्पन्न अपना जीवन संघ की धारा पर राष्ट्र और संस्कृति की सेवा में अर्पित कर दिया । उन्होंने संघ रचना का प्रारंभिक कार्य महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से आरंभ किया । उनका कार्य त्रिस्तरीय था । परिवार से संपर्क, शिक्षण संस्थान से संपर्क और खेल मैदान में बच्चों से संपर्क करके उन्हेरचनात्मक कार्यों में जोड़ा । नानाजी का कार्य केवल संघ की संगठन रचना तक सीमित भर नहीं था। उनका प्रयास पीढ़ी में संस्कार, संयम, समाज सेवा और संगठन का भाव उत्पन्न करना था । उन्होंने ऐसे समर्पित और अनुशासित युवाओं की एक पीढ़ी तैयार की । उनके द्वारा तैयार स्वयंसेवकों ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया । पूरे विदर्भ ही नहीं अपितु संपूर्ण विदर्भ क्षेत्र के साथ महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के महाकौशल क्षेत्र में भारत छोड़ो उस आँदोलन का नेतृत्व भले किसी ने किया हो पर बड़ी संख्या । समय के साथ नाना जी को महाराष्ट्र से बाहर संगठन विस्तार के दायित्व मिले । उनका अधिकांश जीवन राजस्थान और उत्तर प्रदेश में बीता । सबसे पहले उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में संघ प्रचारक का दायित्व मिला । उन्होंने गोरखपुर में संघ की पहली शाखा आरंभ की । नाना जी धर्मशाला में रहते थे, स्वयं अपने भोजन का प्रबंध करते और संघ और राष्ट्रसेवा कार्य में जुटे रहते थे । गोरखपुर के बाद उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में संघ कार्य करने के बाद वे उत्तर प्रदेश ही प्रांत प्रचारक बने । संघ ने जब “राष्ट्र-धर्म” और “पाञ्चजन्य” समाचार पत्र निकालने का निर्णय लिया तो नानाजी इसके प्रबंध संपादक थे । अटलजी और दीनदयाल जी के साथ उनकी एक ऐसी सशक्त टोली बनी जिसने पूरे देश को एक वैचारिक दिशा दी । 1951 में जब तत्कालीन सरसंघचालक गुरु जी राजनीतिक दल गठित करने का निर्णय लिया तो इसकी रचना में महत्वपूर्ण भूमिका नाना जी की रही ।

वे नवगठित इस राजनैतिक दल “भारतीय जनसंघ” के संस्थापक महासचिव बने । उन्होंने एक ओर जहाँ जनसंघ को कार्य विस्ता, देने का कार्य किया वहीं भारतीय विचारों के समीप राजनेताओ से भी संपर्क साधा । इसमें समाजवादी पार्टी के नेता डा राम मनोहर लोहिया भी थे । यह नानाजी का प्रयास महत्वपूर्ण था कि समाजवादी पार्टी और जनसंघ की निकटता बढ़ी । यदि 1967 में देश के कुछ प्रांतों में संविद सरकारें बनी तो इसके पीछे नानाजी और डा लोहिया की निकटता ही रही है । नानाजी ने ही उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति की शुरूआत की थी जो देशभर एक उदाहरण बनी । इसी शक्ति के कारण उत्तर प्रदेश के चंद्रभानु गुप्ता जैसे बड़े नेता को पराजय का मुँह देखना पड़ा ।

1977 में जनता पार्टी की केंद्रीय सरकार बनी तो प्रधानमंत्री मोरारजी भाई ने नानाजी के सामने मंत्री पद का प्रस्ताव रखा । नानाजी यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि वे साठ वर्ष की आयु पार कर चुके हैं इस आयु के बाद व्यक्ति को समाज सेवा करना चाहिए । और अपने संकल्प के साथ नानाजी समाज सेवा में जुट गये । उन्होंने चित्रकूट में ग्रामोदय विश्व विद्यालय आरंभ किया । चित्र कूट का यह प्रकल्प नानाजी का पहला प्रकल्प नहीं था । वे जहां रहे वहां उन्होंने ऐसे प्रकल्प कार्यकर्ताओं से आरंभ कराये । इसके लिये उन्होंने सदैव पिछड़े गाँव चुने । उनके संकल्प में स्वत्व और स्वावलंबन को प्राथमिकता रही । उन्होंने इसी दिशा के प्रकल्प आरंभ किये । उन्हे अपने अभियान में दीनदयाल जी के आकस्मिक निधन से भारी क्षय अनुभव किया । वे दीनदयाल उपाध्याय की असामयिक मृत्यु के बाद काफी दिनों तक अन्यमनस्क रहे और अंततः उन्होंने 1972 में दीन दयाल शोध संस्थान की स्थापना की और पूरा जीवन इसी संस्थान को सशक्त करने में लगा दिया । नानाजी ने 1980 में राजनैतिक और सार्वजनिक जीवन से सन्यास लेकर चित्र कूट प्रकल्प में ही अपना जीवन और समय इसी संस्थान को अर्पित कर दिया । इस संस्थान में आधुनिक कृषि, स्वरोजगार और स्थानीय वस्तुओं की आत्म आत्म निर्भरता का जीवन जीने को प्रोत्साहित किया । इसी प्रकल्प के चलते उन्हे पद्म भूषण और 2019 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया ।

उन्होंने 95 वर्ष की आयु में 27 फरवरी 2010 को इसी प्रकल्प में शरीर त्यागा । 2019 में भारत सरकार ने मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया ।
शत शत नमन्

PCA advocates reactivation of Press Council in India

3-4.jpeg

Guwahati: Press Club of Assam (PCA) expresses worries that the country’s statutory and quasi-judicial body to safeguard the press freedom remains non-functional for nearly five months. PCA in a statement insisted on constituting the 15th Press Council (of India) as the term of the 14th Press Council expired on 5 October 2024. It also demanded to empower the PCI bringing the news channels and digital platforms under its jurisdiction and giving a new meaning as Media Council of India.

Mentionable is that the PCI is an autonomous body, initially set up in 1966 under the Press Council Act 1965 and later re-established in 1979 following the Press Council Act 1978 with a primary objective to preserve the press freedom and also improve the standards of newspapers and news agencies in India. India today nurtures nearly 100,000 publications (endorsed by the Registrar of Newspapers for India) in various frequencies and languages including English. The largest democracy on the globe with its billion plus population also supports nearly 400 satellite news channels along with thousands of portals, whatsapp channels and other digital outlets.

Terming the delay in the constitution of a new council as surprising, various media bodies in India alleged that the PCI has been turned into a non-functional entity over the last few months. The council enjoys a three-year term and the continuity broke last year as the chairperson did not initiate to constitute a new council on time. A recent statement of Mumbai Press Club (MPC) alleged that ‘at the core of the crisis was an attempt to oust two important and active journalist bodies (namely MPC and Editors Guild of India) from their representation. The MPC also wrote a letter to Union information & broadcasting minister Ashwini Vaisnav requesting his intervention and necessary direction to the PCI chairperson.

“As the PCI discharges its functions primarily through adjudications on complaints received against a particular newspaper/news agency or an editor/working journalist alleging professional misconduct deteriorating the standard of journalistic behaviours, it needs to be in an alert mode always,” said PCA president Kailash Sarma, working president Nava Thakuria and general secretary Hiren Ch Kalita, adding that the PCI is also empowered to make observations if the conduct of any authority including the government is found interfering with the guaranteed freedom of the press.

It may be mentioned that the PCI comprises a chairman (by convention a retired Supreme Court judge is assigned) and 28 members where 13 individuals represent the professional journalists out of whom 6 need to be editors of newspapers and 7 working journalists. Another 6 members represent the management of newspapers (including the owners), 2 each taken from the big, medium and small newspapers, whereas 1 member represents the news agencies. Two houses of Indian Parliament send 5 members, and 3 individuals are nominated by the University Grants Commission, Bar Council of India and Sahitya Academy from the fields of education, law and literature respectively.

scroll to top