महाकुंभ मेला: आध्यात्मिकता, अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक एकता का अदभुत संगम

images-1-2.jpeg

प्रयाग : विपक्षी नेता, बामपंथी चिन्तक, (HINA) यानी हिन्दू इन नेम ओनली विचारक, बेशक हाल ही में सम्पन्न हुए महा कुंभ मेले से प्रभावित न हुए हों, लेकिन प्रयागराज में महाकुंभ मेले के सफल समापन ने न केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कद बढ़ाया है, बल्कि भारत की परंपरा को आधुनिकता के साथ मिलाने की क्षमता को भी प्रदर्शित किया है। भारत की आध्यात्मिक विरासत में गहराई से निहित यह भव्य आयोजन महत्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक निहितार्थों के साथ एक बहुआयामी घटना के रूप में उभरा है।

“आध्यात्मिकता, राजनैतिक छवि, प्रशासनिक दक्षता, पुलिस प्रबंधन, आधुनिक टेक्नोलॉजी का सदुपयोग, के साथ “गुड इकोनॉमिक्स” का अदभुत संगम बना ये १४४ वर्ष बाद आयोजित महा कुंभ,” सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता गुप्ता के मुताबिक।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए, इस आयोजन ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की उनकी प्रतिबद्धता की पुष्टि की। भगदड़ में हुईं मौतों के बावजूद, साठ करोड़ से ज्यादा द्वारा कुंभ स्नान करना, विश्व को चौंकाने वाली दुर्लभ घटना मानी जा रही है। इस आयोजन के निर्बाध निष्पादन ने भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा उपायों और रसद रणनीतियों के साथ मजबूत प्रशासनिक क्षमताओं का प्रदर्शन किया, जिससे लाखों भक्तों के लिए एक सहज अनुभव सुनिश्चित हुआ।

महाकुंभ मेले ने पारंपरिक हस्तशिल्प, स्थानीय व्यंजनों और धार्मिक कलाकृतियों की मांग में वृद्धि के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को उत्प्रेरित किया। आतिथ्य, परिवहन और रसद क्षेत्र फले-फूले, जिससे अस्थायी रोजगार के अवसर पैदा हुए और पर्यटन और करों के माध्यम से राज्य के खजाने में वृद्धि हुई। बेहतर सड़कें, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवा जैसी बुनियादी संरचना में निवेश से इस क्षेत्र को दीर्घकालिक लाभ मिलने का वादा किया गया है।
इस आयोजन ने जाति, वर्ग और लिंग की बाधाओं को पार करते हुए समानता और सामूहिक पहचान की भावना को बढ़ावा दिया। विभिन्न क्षेत्रों और संस्कृतियों के तीर्थयात्री एकत्रित हुए और परंपराओं और प्रथाओं के आदान-प्रदान के माध्यम से भारत के सांस्कृतिक ताने-बाने को समृद्ध किया। संतों, विद्वानों और आध्यात्मिक नेताओं ने संवादों को सुगम बनाया जिससे आपसी समझ और एकता को बढ़ावा मिला।

कुंभ मेला, जिसे यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी है, ने अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित किया और भारत की वैश्विक सांस्कृतिक छाप को बढ़ाया। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने इसकी पहुँच को और बढ़ाया और वैश्विक दर्शकों के लिए इसकी भव्यता और सांस्कृतिक कथाओं का दस्तावेजीकरण किया। सोशल कंटेंट क्रिएटर्स के लिए तो ये आयोजन लाभकारी और अपनी लोकप्रियता बढ़ाने में मददगार रहा।
पुराणों जैसे प्राचीन ग्रंथों में निहित, कुंभ मेले की उत्पत्ति पौराणिक घटना से मानी जाती है, जहाँ अमरता के अमृत की बूँदें चार स्थानों – प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन पर गिरी थीं। यह समृद्ध इतिहास इस आयोजन में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक गहराई की परतें जोड़ता है।

इस आयोजन से कई लाभ तो हुए, लेकिन इसने पर्यावरण क्षरण और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी चुनौतियाँ भी खड़ी कीं। भविष्य में इन मुद्दों को कम करने के लिए स्थायी प्रथाओं और उन्नत प्रौद्योगिकी को शामिल किया जा सकता है, जिससे परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन सुनिश्चित हो सके।

प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी के अनुसार, “अन्य बातों के अलावा, महाकुंभ ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि भारत अब गरीबों का देश नहीं रहा। ग्रामीण इलाकों से करोड़ों लोग धार्मिक आयोजन में हिस्सा लेने के लिए हजारों रुपये खर्च करते हुए आए। मेरा अपना छोटा सा गांव प्रयागराज की ओर भागा। यह देखने लायक नजारा था। अन्य गांवों में भी कमोबेश यही स्थिति थी। भारत अपने आध्यात्मिक दायित्वों को पूरा करने के लिए खूब खर्च कर रहा था। दरभंगा के एक युवा अर्थशास्त्री का कहना है कि हिंदू भारत ने महाकुंभ पर खूब खर्च किया। खर्च की गई राशि यूरोप के कई देशों के वार्षिक बजट के बराबर थी। इसका मतलब यह है कि भारत न केवल गरीबी में डूबा है, बल्कि समृद्धि के एक बड़े हिस्से को आम बनाने की गंभीर कोशिश भी कर रहा है।”

महाकुंभ मेला भारत में एकता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एक शक्तिशाली राजनीतिक प्रतीक के रूप में कार्य करता है। इसने विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देते हुए भारत की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को उजागर किया। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ देवाशीष भट्टाचार्य ने कहा, “बड़ी संख्या में लोगों के एकत्र होने से, यह एक सामूहिक राष्ट्रीय पहचान के विचार को मजबूत करता है जो क्षेत्रीय और सांप्रदायिक विभाजन से परे है। राजनेता अक्सर सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति अपने समर्पण को प्रदर्शित करते हुए हिंदुओं से जुड़ने के लिए इस अवसर का लाभ उठाते हैं। अंततः, कुंभ मेला समावेशिता, आध्यात्मिकता और भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को आकार देने में सांप्रदायिक जुड़ाव के महत्व का एक राजनीतिक संदेश भी देता है।”

कुंभ मेले से लौटने के बाद बिहार के एक बुद्धिजीवी टी.पी. श्रीवास्तव ने कहा, “महाकुंभ मेला आध्यात्मिकता, आर्थिक विकास और सांस्कृतिक एकता के बीच सामंजस्य स्थापित करने की भारत की क्षमता का प्रमाण है। यह केवल एक धार्मिक समागम नहीं है, बल्कि भारत के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य की आधारशिला है, जिसके दूरगामी प्रभाव राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर प्रतिध्वनित होते हैं।”

गौनाहा, पश्चिम चंपारण (बिहार) में सब ठीक नहीं चल रहा है

08_01_2021-west_champara_21250197.jpg

नितिन कुमार रवि (आचार्य)

मेरा नाम नितिन कुमार रवि है। मैं आप सबका ध्यान नेपाल बोर्डर पर स्थित गौनाहा थाना और अंचल से जुड़े एक मामले की तरफ आकृष्ट करना चाहता हूं। बात अप्रैल 2021 है, जब हमारा पूरा परिवार कॉविड-19 (कोरोना) से संक्रमित था, जिसकी वजह से पूरा घर प्रशासन की तरफ से सील कर दिया गया था। जिस पर लिखा था माइक्रो कंटेनमेंट जोन। उस दौरान कोविड को लेकर समाज में डर का माहैल था, मोहल्ले में यह बात होने लगी थी कि परिवार कोविड से संक्रमित है। कोविड से कोई नहीं बचता है। इस परिवार में भी अब कोई नहीं बचेगा।

उसी दौरान मुजम्मिल शेख, पिता- सलीम शेख, इसके साथ सद्दाम शेख और सज्जाद शेख एवं इसके चाचा और एक चचेरे भाई सभी ग्राम- गम्हरिया,गौनाहा एवं अन्य असामाजिक तत्वों के द्वारा हमारे जमीन की देखभाल करने वाले श्री रामशरण महतो पिता- स्वर्गीय पलट महतो और श्री अनिल काजीके साथ मारपीट की गई और उन्हें जमीन छोड़कर चले जाने के लिए धमकाया गया। कोविड के दौरान जैसे ही परिवार को इस मामले की जानकारी मिली, हमने तत्काल व्हाट्सएप के माध्यम से इसकी सूचना तत्कालीन जिला समाहर्ता महोदय, पश्चिम चंपारण, श्रीमान कुंदन कुमार को दी थी।

जब कोरोना नियंत्रित हुई, तब श्रीमान समाहर्ता महोदय कुंदन कुमार से बात की गई तो उन्होंने इस विषय पर संज्ञान लेते हुए सबसे पहले जमीन पर बोर्ड लगाने और जमीन की पैमाइश के लिए आवेदन देने और अनुमंडल दंडाधिकारी नरकटियागंज को इस आशय का आवेदन देने की बात कही गई। तत्काल जाकर सबसे पहले उक्त जमीन पर एक बोर्ड लगाया गया, जिस पर लिखा था, यह जमीन बिक्री का नहीं है। इस जमीन का मालिकाना हक बामदेव झा के पास है। उसके बाद प्रभात कुमार झा के द्वारा जमीन की पैमाइश करने के लिए एक आवेदन अंचल अधिकारी गौनाहा को दिया गया। जिसमें लिखा गया था कि मेरी जमीन गौनाहा प्रखंड, बिलसंडी हल्का मौज गम्हरिया में है, जिसका खाता नंबर 02, खेसरा 389, थाना संख्या 28, रखवा तीन बीघा है। यह जमीन पंडित उमाकांत झा एवं पंडित बामदेव झा संयुक्त तथा माहेश्वरी झा के नाम से है। जिसकी जमाबंदी क्रमशः 117 तथा 345 है। मुझे इस जमीन की पैमाइश करानी है। इस आशय के आवेदन के साथ 2021-22 का लगान रसीद, जमीन का दस्तावेज, पट्टा एवं जमीन पर जो बोर्ड लगा था उसका एक चित्र भी संलग्न किया गया। सभी दस्तावेजों के साथ आवेदन 03/06/2021 को गौनाहा अंचल में जमा किया गया। जमीन की लगान रसीद 2021-22 लगाया गया जिसे PTC/70 ,30-06-2021विनय कुमार के द्वारा लिया गया फिर बारी-बारी से सबके यहां पुलिस अधीक्षक बेतिया, पश्चिमी चंपारण, डीएसपी नरकटियागंज, अंचलाधिकारी गौनाहा ,अनुमंडल पदाधिकारी नरकटियागंज सभी के यहां आवेदन दिया गया।

30/06/2021 को प्रशांत झा के द्वारा विषय -जमीन पर जबरदस्ती कब्जा कर किसी और से रजिस्ट्री करा लेने के धमकी के संबंध में गौनाहा थाना में आवेदन दिया गया। इस आवेदन को लेकर थाना द्वारा कोई रिसीविंग नहीं दी गई। आवेदन लेकर थाना गौनाहा द्वारा कोई रिसीविंग नहीं दी जाती है।

अब बात करते है तत्कालीन अंचलाधिकारी अमित कुमार की। इस मामले पर हो रही कार्रवाई और जमीन पैमाइश के बारे में पूछा गया तो अंचर अधिकारी श्रीमान अमित कुमार ने 04/09/2021 को जनता दरबार में सारे ओरिजिनल पेपर लेकर आने की बात कही थी। हम लोगों के द्वारा 04/09/2021 को जनता दरबार थाना गौनाहा में जाकर सारे ओरिजिनल पेपर को दिखाया, उनके द्वारा कहा गया कि इसकी छाया प्रति के साथ पूरा विवरण आवेदन में लिखकर दीजिए और कौन-कौन सा पेपर आप इस फाइल में जमा कर रहे हैं, उसका भी विवरण लिख कर दीजिए। अंचालाधिकारी के निर्देशानुसार हमने आवेदन लिखा और उसके साथ जैसा बताया गया था, सभी 18 पेपर जमा किए। जिसमें जमीन का दस्तावेज,पटटा, मालगुजारी रसीद- 2021-22 एवं पूर्व में सरपंच की चिट्ठी, पनवट रसीद, परिवर्तन रसीद- बामदेव झा के नाम से वंशावली, 09/05/1978 को गौनाहा थाने में दर्ज शिकायत 147, 148 एवं 380 आईपीसी की धारा पुष्प कांत झा,अरुण कुमार झा, चंद्रकांत झा एवं प्रेम नाथ झा T.R.No-1778 की दो छाया प्रति एवं जमीन पैमाइश के लिए जो आवेदन प्रभात कुमार झा के द्वारा दिया गया था, उसकी छाया प्रति तथा साथ ही श्रीमती साहिल प्रवीण भारतीय प्रशासनिक सेवा अनुमंडल पदाधिकारी के द्वारा भेजा गया अंचलाधिकारी गौनाहा के नाम पत्र पत्रांक 1064 / सा0 दिनांक 02/07/2021 विषय – शिकायत पत्र के निष्पादन के संबंध में। इन सबकी छाया प्रति संलग्न की गई। पूरी फाइल को जनता दरबार में जमा कर दिया गया।

थाने में शिकायत के बावजूद मुजम्मिल शेख ने अपने लोगों के साथ मिलकर फसल की लूट की। 15/10/2021 को फसल काटा पाया गया। इस संदर्भ में एक वीडियों भी 15 /10 /2021 को आवेदन साथ दिया गौनाहा थाना में जमा कराया गया। जिसका विषय था- खेत में लगे फसल को लूट करके ले जाने के संबंध में। सामने लूट की जानकारी होने के बावजूद तत्कालीन थाना प्रभारी श्रीमान राजीव नंदन सिंहा के द्वारा बताया गया कि यह जनता दरबार का मामला है। जबकि यह law and order का मामला था। जब उस संबंध में उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उन्होंने कहा कि इस तरह का मामला जनता दरबार में भेजने के लिए अंचलाधिकारी श्रीमान अमित कुमार ने कहा है।

फिर बात जनता दरबार की आई। 16-10-2021 को जनता दरबार में आने के लिए कहा गया लेकिन जब हम 16/10/2021 को जनता दरबार के लिए थाने में गए तो मुजम्मिल शेख थाना प्रभारी राजीव नंदन सिंहा के चेंबर में आया और वहीं बैठे एक आदमी से उसका झगड़ा शुरू हो गया। उनकी बहस में सारी सच्चाई सामने आ गई कि कैसे इस जमीन का नकली पटटा, सुखोंना मठ रामनगर में बनवाने का प्रयास चल रहा है। यह पूरा प्रसंग थाना प्रभारी के चेंबर में लगे सीसीटीवी कैमरे में हुआ। यह पूरा प्रसंग 16/10 /2021 को 11:00 am- 3:00pm के बीच का है। जिसमें मुजम्मिल शेख सारे जुर्म कबूल करता है और वह फसल लौटाने की बात करता है। यह फूटेज पाने के लिए सूचना के अधिकार के अन्तर्गत मैने आवेदन भी लगाया था। जिसके बाद भी फूटेज उपलब्ध नहीं कराया गया।

16/10 /2021 को 12:10 बजे हमें थाने में सहोदरा स्थान जाने के लिए कहा जाता है, वहां जनता दरबार लगा है। हम जाते हैं लेकिन मुजम्मिल शेख नहीं जाता है। हम लोग वापस उस दिन थाने आते हैं तो जो कागज FIR करने के लिए दिया जाता है। उस पर अंचलाधिकारी महोदय गौनाहा थाना आने के बाद मुजम्मिल शेख को बुलावा भेजते हैं। काफी इंतजार करने पर वह नहीं आता है तो फिर में श्रीमान राजीव नंदन सिंहा नाम हटाने की बात करते हैं और थाना प्रभारी भी जोड़ देते हैं कि मेरा नाम FIR में से हटा दीजिए लेकिन किसी का नाम इस तरह हटाना विधि सम्मत नहीं था। इसलिए मैने इंकार कर दिया। तब थाना प्रभारी कहते हैं, अगर मुजम्मिल शेख 16/10 /2021 तारीख को आपकी लूटी हुई फसल लौटा देता है और अपनी गलती के लिए आपके परिवार से माफी मांग लेता है, जैसा वह कह कर गया है तो आप फिर FIR नहीं कीजिएगा। अगर वह नहीं लौटाता है तो आपका एफआईआर 17/10/2021 तारीख में कर दिया जाएगा।
कुछ दिन बाद जब मैं FIR की जानकारी लेने गौनाहा थाना पहुंचा तो वहां चौकीदार से मुलाकात हुई जब मैंने कहा कि आपके द्वारा हमारी फसल लुटवाई गई है ऐसा गांव वालों का कहना है तो उसने बताया कि मामले में मामूली चोरी का का FIR दर्ज किया गया था और आपका नाम नितिन कुमार रवि से निश्चित कुमार सिंह और आपके पिता जयशंकर झा का नाम जयशंकर सिंह कर दिया गया था और बड़ी चालाकी के साथ थाने के स्तर पर ही इस पूरे केस को रफा दफा कर दिया गया। l

जब कोर्ट से कागज निकाला गया तो चौकीदार की बात सत्य साबित हुई। इस संबंध में जब मैने आरटीआई डाली तो इसका जवाब थाना प्रभारी गौनाहा द्वारा नहीं दिया जाता। आरटीआई के माध्यम से मेरे द्वारा गौनाहा थाने की उक्त दिनां की सीसीटीवी फुटेज भी मांगी गई। जिसका ऊपर जिक्र किया गया है लेकिन उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया।

इस मामले को लेकर नए एसडीएम नरकटियागंज श्रीमान धनंजय कुमार से मुलाकात की तो उन्होंने शिकायत निवारण पदाधिकारी के पास जाने की बात कही। इधर प्रशांत झा के आवेदन के बाद उन पर प्रशांत झा बनाम मुजम्मिल शेख 107 लगाकर कागज अनुमंडल में भेज दिया गया था। अंचलाधिकारी महोदय और थाना प्रभारी गौनाहा से 107 लगाने के बारे में पूछने पर की क्या इससे हमारे परिवार की छवि खराब नहीं हो रहा? इसका उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
शिकायत निवारण पदाधिकारी श्रीमान बालेश्वर प्रसाद ने पहले विनिश्चय पत्र में लिखा कि कोई पेपर जमा नहीं कराया गया है। जबकि मेरे द्वारा सारे पेपर हाथों-हाथ जमा किए गए थे और बैठकर सारे कागज कंप्यूटर में डाउनलोड करवाया गया था। उसकी रसीद दिखाकर शिकायत करने पर फिर से बुलाया गया, मामले में बार बार गलत विनिश्चय पत्र दिया गया। लगभग श्रीमान बालेश्वर प्रसाद के द्वारा 15 बार बुलाया गया लेकिन कभी भी थाना प्रभारी गौनाहा उपस्थित नहीं हुए और आश्चर्य तो तब होता है जब अंतिम बार मैसेज भेजा जाता है 12:30 पर और बुलाया था उसी दिन 11:00 बजे।

ऐसा कैसे संभव है कि अपराहन 12:30 बजे संदेह भेजा जाए और पूर्वाहन 11 बजे आपको बुलाया जाए। इतना सब होने के बाद भी देश की न्याय व्यवस्था और प्रशासन पर हमें पूरा विश्वास है। इस बीच अंचलाधिकारी श्रीमान अमित कुमार के द्वारा पत्रांक संख्या 11/दिनांक07/01/2022 को जारी किया एक दस्तावेज मिला। जिसमें मुजम्मिल शेख को FIR बचाने के लिए लिखा गया था कि जमीन पंडित उमाकांत झा के वंशज सूर्यकांत झा के द्वारा शेख मुजम्मिल को खेत जोताअवाद के रूप में दिया गया है। जब इस संबंध में आरटीआई डालकर जानकारी मांगी गई तो DR-158/122/26/09/2022 ज्ञापाक 355 दिनांक-28/10/2022 पुलिस अधीक्षक बेतिया कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, अनुसंधानकर्ता उमाशंकर शर्मा के द्वारा लिखा गया है कि विवादित भूमि की जानकारी मांगी गई थी, कोई नाम नहीं दिया गया था। जब अनुसंधानकर्ता द्वारा नाम नहीं दिया गया था तो फिर तत्कालीन अंचलाधिकारी द्वारा नाम कैसे डाल दिया गया?
इस बीच उक्त भूमि पर लगे जामुन और शीशम के पेड़ भी काट दिए गए। रुक रुक कर जमीन की फसल लूटकर मुजम्मिल शेख के लोग ले जाते रहे। बार बार शिकायत के बाद भी थाना ना एफआईआर दर्ज कर रहा है और ना कार्रवाई हो रही है।

इस संबंध में आरटीआई के माध्यम से एक पत्र प्राप्त हुआ। जिसमें पत्रांक 161 दिनांक-17/03/2022 मैं लिखा गया है कि 1942 से बामदेव झा के वंशजों का इस जमीन पर कब्जा रहा है, उमाकांत झा नावल्द हैं। अब इस जमीन पर मुजम्मिल शेख एवं सूर्यकांत झा से विवाद चल रहा है। जबकि जमीन पर विवाद जैसा कुछ है नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि अंचल और थाना मिलकर इसे विवादित बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

जनता दरबार 04 /09/ 2021 से शुरू हुआ और 14/09/ 24 को इस निर्णय पर खत्म हुआ कि विपक्ष सूर्यकांत झा और श्री चंद्रकांत झा कभी उपस्थित नहीं हुए। उनका सहयोग नहीं मिला। 04 /09 /2021 से 14/0 9 /2024 तक मुजम्मिल शेख बटाईदार होने का कोई कागज अथवा प्रमाण नहीं ला सका।

31/08/2024 का 12:15pm से 1: 15pm तक का जनता दरबार के सीसीटीवी का फुटेज सूचना के अधिकार अन्तर्गत मांगा गया। वह उपलब्ध नहीं कराया गया। मुजम्मिल शेख को एक बेतिया के एक कन्स्ट्रक्शन कंपनी और कंपनी के मालिक के ब्यूरोक्रेट दामाद का संरक्षण है। इस बात को मुजम्मिल शेख कहता भी है।

थाना प्रभारी श्रीमान विनोद कुमार यादव एवं श्री विवेक कुमार बालेंद्र द्वारा दी गई जानकारी में कई् विरोधाभास है। उन्होंने जो जानकारी लिख कर दी है, उसे पढ़कर लगता है कि उनके मन में जो भी आया। या उन्हें किसी ने निर्देशित किया, वह सब थाना का मुहर लगाकर वे लिखकर देते रहे। उनके द्वारा दी गई सूचना के सारे कागज सुरक्षित हैं।

इस मामले में RTI डालकर जब पैमाइश के बारे में पूछा गया तो बताया गया कि पत्रांक 58 दिनांक 31/03/ 2022 में मापी शुल्क जमा होने के उपरांत पैमाइश की तिथि निर्धारित कर दिया जाएगा लेकिन वहां के कर्मचारी श्री बागेश सिंह के द्वारा फाइल ना मिलने की बात कही गई तो फिर से आवेदन दिया गया। 20 /04 /2022 को पैमाइश के लिए फिर से आवेदन दिया गया। जिस पर अंचलाधिकारी गौनाहा ने साइन कर आगे बढ़ा दिया था। पैमाइश नहीं हुआ।
उसके बाद फिर से पैमाइश करने का आवेदन ऑनलाइन किया गया लेकिन अभी तक पैमाइश का आदेश श्रीमान विवेक कुमार सिंह, अंचलाधिकारी गौनाहा के द्वारा नहीं दिया गया है।
अंचल और थाना का मुजम्मिल शेख को इतना समर्थन है कि उसने धमकी दी है कि नितिन रवि या इसके परिवार का कोई भी सदस्य अगर फसल काटने आता है तो इस बार औरतों से फसल कटवाया जाएगा और गलत इल्जाम लगाकर केस में फंसा कर जेल भिजवा दिया जाएगा। इस संदर्भ में सारी जानकारी, बिहार पुलिस के साइट पर जाकर डीजीपी बिहार, पटना को भेजा जा चुका है।

श्रीमान मैंने अपनी जमीन की लड़ाई लड़ते हुए अब तक इतने आवेदन/ आरटीआई डाल दिए हैं कि उन्हें एक साथ एकत्रित किया जाए तो सब मिलकर किताब का रूप ले सकते हैं। समाहर्ता महोदय,बेतिया, पश्चिमी चंपारण,अनुमंडल पदाधिकारी, नरकटियागंज, बिहार पुलिस पटना, डीजीपी बिहार, पटना डीएसपी, नरकटियागंज डीसीएलआर, नरकटियागंज, अंचलाधिकारी गौनाहा थाना प्रभारी गौनाहा इत्यादि सारे कागजात दिखाने और ऑडियो—वीडियो सुनाने और दिखाने के बावजूद अगर इंसाफ नहीं हो रहा है तो एक आम आदमी क्या करें। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान जान से मारने की धमकी सुनने को मिली, झूठे मुकदमे के नाम पर डराया गया। अपराधियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही। इस संबंध में आरटीआई का जवाब न अंचलाधिकारी गौनाहा दे रहे हैं और ना ही समाहर्ता महोदय, पश्चिम चंपारण, बेतिया के यहां से ही कोई जवाब प्राप्त हो रहा है।

मेरे द्वारा आरटीआई के माध्यम से कुछ सवाल अनुमंडल पदाधिकारी श्रीमान सूर्य प्रकाश गुप्ता से पूछा गया था और कुछ सवाल गौनाहा अंचलाधिकारी श्रीमान विवेक कुमार सिंह से पूछा गया था। जवाब नहीं मिलने पर फिर मेरे द्वारा आग्रह किया गया अनुमंडल पदाधिकारी नरकटियागंज श्रीमान सूर्य प्रकाश गुप्ता से की आप प्रथम अपील प्राधिकार हैं, इसलिए आप इसका जवाब दे और अंचलाधिकारी गौनाहा श्रीमान विवेक कुमार सिंह से जवाब मांगे कि कैसे अनुमंडल पदाधिकारी के आदेश पर कोई व्हाइटनर चला सकता है और कैसे कोई अंचलाधिकारी का गलत साइन करके कोई आदेश दे सकता है और जब एक अंचलाधिकारी के द्वारा 2 बार ऑफलाइन सारे कागजात चेक करने के बाद पैमाइश का आदेश दे दिया गया था। अब आप ऑनलाइन पैमाइश की मांग करने पर आदेश क्यों नहीं दे रहे हैं? श्रीमान अनुमंडल पदाधिकारी नरकटियागंज ने पत्रांक- 1485 दिनांक 13 /12 /2024 के माध्यम से श्रीमान विवेक कुमार सिंह अंचल अधिकारी गौनाहा से जवाब मांगा है, यह जवाब मुझे अब तक प्राप्त नहीं है। हमें और हमारे परिवार को लगातार जान से मारने की धमकी गलत मामला में फसाने की धमकी दी जा रही है।

अंत में इतना कि इस कहानी के सारे पात्र वास्तविक हैं और यह पूरी कहानी सच्ची है।

दो बच्चे और दो भाषा काफी हैं, तीसरी भाषा ‘विज्ञान’ की हो

bhashavigyann.jpg

चेन्नई: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के पास तीन भाषा फॉर्मूले के जरिए हिंदी को लागू करने का विरोध करने के अपने राजनीतिक कारण हो सकते हैं, लेकिन वैज्ञानिक शिक्षा की बढ़ती जरूरतों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की चुनौतियों का सामना करते हुए, दो भाषा फॉर्मूले पर शिफ्ट होना एक समझदारी भरा कदम माना जाएगा।
तीन भाषा का फॉर्मूला, जो नेहरू के राष्ट्रीय एकता के सिद्धांतों पर आधारित था, अपने समय की परिस्थितियों के हिसाब से उपयुक्त रहा होगा, लेकिन अब टेक्नोलॉजी से चलने वाली दुनिया की नई मांगों के मद्देनजर एक व्यावहारिक बदलाव की जरूरत है। तेजी से हो रही वैज्ञानिक प्रगति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में, भारत के शिक्षा व्यवस्था को जरूरी कौशलों पर ध्यान देने के लिए खुद को ढालना होगा।

छात्रों को सशक्त बनाने और उनके सीखने के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए दो भाषा फॉर्मूला — मातृभाषा के अलावा हिंदी या अंग्रेजी में से एक— समय के हिसाब से एक आकर्षक पहल हो सकती है। इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों पर शैक्षणिक बोझ को कम करना है। मौजूदा तीन भाषा प्रणाली, जो अक्सर विज्ञान, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, और गणित (STEM) जैसे महत्वपूर्ण विषयों से कीमती समय और ऊर्जा को हटा देती है, को बदलने की जरूरत है। ये विषय नवाचार और आर्थिक विकास की नींव हैं, और इनमें महारत हासिल करना भारत के भविष्य के लिए अत्यंत जरूरी है। भाषा की जरूरतों को कम करके, छात्र इन मूल विषयों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, जिससे उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

अध्ययनों से पता चलता है कि ज्यादा भाषाएं सीखने की जरूरत मुख्य विषयों में महारत हासिल करने में बाधा बन सकती है। मातृभाषा और हिंदी या अंग्रेजी पर ध्यान देकर, छात्र गहरी समझ और कौशल हासिल कर सकते हैं, जिससे एक मजबूत शैक्षिक आधार तैयार होता है।

तीन भाषा फॉर्मूले का ऐतिहासिक संदर्भ, जिसमें भाषा दंगे और राजभाषा अधिनियम शामिल हैं, भारत में भाषा नीति के आसपास की जटिलताओं और संवेदनशीलता को उजागर करता है। हालांकि, बदलती जरूरतों के सामने पुराने मॉडलों पर कायम रहना मूर्खता होगी। अतीत की राजनीतिक बारीकियों को वर्तमान के व्यावहारिक हकीकतों पर हावी नहीं होना चाहिए।

तीन भाषा फॉर्मूले की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसका कार्यान्वयन असंगत रहा है, जो अक्सर राजनीतिक और तार्किक चुनौतियों का शिकार हो जाता है। इसके अलावा, यह दलील कि तीसरी भाषा संज्ञानात्मक क्षमताओं या करियर के अवसरों को काफी बढ़ाती है, बेबुनियाद है। इसके विपरीत, 21वीं सदी के जॉब मार्केट में कोडिंग, डेटा एनालिटिक्स, और डिजिटल साक्षरता जैसे कौशलों को तेजी से महत्व दिया जा रहा है।

AI से चलने वाले अनुवाद टूल्स के आगमन के साथ, बुनियादी संचार के लिए कई भाषाएं सीखने की जरूरत कम हो गई है। ये टूल्स भाषा की बाधाओं को दूर करने के लिए प्रभावी और आसान समाधान प्रदान करते हैं, जिससे तीसरी भाषा पर जोर देना कम प्रासंगिक हो गया है।

तीन भाषा नीति पर लगातार बहस करने के बजाय, भारत को ऐसे शैक्षिक सुधारों को प्राथमिकता देनी चाहिए जो छात्रों को तेजी से बदलती दुनिया में सफल होने के लिए सशक्त बनाएं। भाषा शिक्षा में मात्रा के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करके, आधुनिक टेक्नोलॉजी को अपनाकर, और वैश्विक मानकों के साथ तालमेल बिठाकर, भारत अपने युवाओं को भविष्य की चुनौतियों और अवसरों के लिए बेहतर ढंग से तैयार कर सकता है। दो भाषा फॉर्मूला एक व्यावहारिक और दूरदर्शी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि भारत की शिक्षा प्रणाली 21वीं सदी में प्रासंगिक और प्रभावी बनी रहे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी के मुताबिक राष्ट्रीय एकता और भाषाई विविधता को बढ़ावा देने के लिए विकसित नेहरू का तीन भाषा फॉर्मूला, मौजूदा शैक्षिक परिदृश्य में फायदे के बजाय अब एक बोझ बन चुका है।

पचास के दशक में पहली बार प्रस्तावित किया गया तीन भाषा फॉर्मूला 1966 में कोठारी आयोग ने इसमें संशोधन और सिफारिश की थी। इसके कार्यान्वयन ने भाषा दंगों को जन्म दिया। उस समय के मद्रास राज्य में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने हिंदी के विरोध का नेतृत्व किया। उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1963 में राजभाषा अधिनियम लागू किया, जिसने 1965 के बाद अंग्रेजी के उपयोग को सुनिश्चित किया।

शिक्षा में दो भाषा बनाम तीन भाषा फॉर्मूले पर बहस, खासकर भारत जैसे विविध देश में, जटिल और बहुआयामी है। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, और जापान जैसे अधिकांश विकसित देश अपनी शिक्षा प्रणालियों में मुख्य रूप से एक या दो भाषाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं। ये देश अपनी मातृभाषा और अंग्रेजी (वैश्विक संचार के लिए) में महारत पर जोर देते हैं। वैश्विक नेता बनने की इच्छा रखने वाला भारत शिक्षा को प्रभावी बनाने और अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ तालमेल बिठाने के लिए इसी तरह का दृष्टिकोण अपना सकता है।

हालांकि भाषाई विविधता भारत की ताकत है, लेकिन छात्रों को तीसरी भाषा सीखने के लिए मजबूर करना नाराजगी और प्रतिरोध का कारण बन सकता है, खासकर अगर भाषा को उनकी रोजमर्रा की जिंदगी या करियर की आकांक्षाओं के लिए अप्रासंगिक माना जाता है।

दो भाषा फॉर्मूला खेल के मैदान को समतल करता है, यह सुनिश्चित करता है कि सभी पृष्ठभूमि के छात्र तीसरी भाषा के अतिरिक्त बोझ के बिना समान रूप से प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। प्रतिस्पर्धी वैश्विक अर्थव्यवस्था में, नियोक्ता तकनीकी और विश्लेषणात्मक कौशलों को महत्व देते हैं।

सियासी सन्नाटे के पीछे गहमागहमी, भाजपा की महत्वाकांक्षा और कांग्रेस की उलझनें

3-1.jpeg

गुरुवायूर (केरल): बिहार के बाद केरल में विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ जोरों पर हैं, लेकिन राजनीतिक माहौल अभी भी उम्मीद के मुताबिक गर्म नहीं हुआ है। हालांकि, लाल झंडों की मौजूदगी और छोटे कस्बों में हो रही सभाओं के बावजूद चुनावी चर्चा अभी शुरू नहीं हुई है। गुरुवायूर मंदिर के बाहर कॉफी स्टॉल पर राजनीति के बजाय फुटबॉल और खाड़ी देशों में घटते रोज़गार की चिंता लोगों की बातचीत का मुख्य विषय था।

केरल की विधानसभा में कुल 140 सीटें हैं, और यहाँ की राजनीति में तीन प्रमुख गठबंधन सक्रिय हैं: वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF), संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF), और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)। वर्तमान में, मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली LDF सरकार सत्ता में है, जिसमें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) प्रमुख भूमिका निभा रही है। UDF का नेतृत्व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वी.डी. सत्यसंग कर रहे हैं, जबकि भाजपा की अगुवाई राज्य अध्यक्ष के. सुरेन्द्रन कर रहे हैं।

त्रिशूर, गुरुवायूर, पलक्कड़ और तिरुवनंतपुरम जैसे प्रमुख क्षेत्रों में भाजपा ने हिंदू वोट बैंक को मजबूत करने के लिए ताकत झोंक दी है। इसका सीधा निशाना मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की LDF सरकार है। भाजपा की रणनीति 2024 के आम चुनाव में त्रिशूर संसदीय सीट पर एक्टर सुरेश गोपी की ऐतिहासिक जीत के बाद और तेज़ हो गई है। यह केरल में भाजपा की पहली लोकसभा सीट थी, जिसे पार्टी अब विधानसभा चुनाव में भी दोहराने की कोशिश कर रही है।

केरल में हिंदू आबादी 52% से अधिक है, और भाजपा इसका पूरा फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा, पार्टी ईसाई समुदाय में भी अपनी पकड़ बढ़ाने में जुटी है। कई प्रभावशाली ईसाई गुट भाजपा की ओर झुकते दिख रहे हैं, जो पार्टी के लिए एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है।

केरल कांग्रेस इस बार मुश्किल दौर से गुज़र रही है। वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने हाल ही में अपने बयानों से पार्टी के अंदर खलबली मचा दी है। राज्य कांग्रेस में नेतृत्व की कमी पर उनके खुले विचार और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के साथ उनकी चर्चित सेल्फी ने अटकलों को हवा दे दी है। थरूर के मुख्यमंत्री पद की ओर बढ़ते कदम कांग्रेस के लिए अंदरूनी असंतोष का कारण बन रहे हैं, जिससे भाजपा को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिल सकता है।

कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर यह संघर्ष पार्टी की एकता के लिए चुनौती बन गया है। शशि थरूर की शहरी और युवा मतदाताओं में लोकप्रियता उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए एक मजबूत दावेदार बनाती है। अगर कांग्रेस उन्हें किनारे करती है, तो भाजपा के साथ उनके संभावित तालमेल के कयास राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह बदल सकते हैं।

एलडीएफ सरकार, जो केरल की राजनीति में दशकों से मज़बूत रही है, इस बार कई चुनौतियों का सामना कर रही है। राज्य में बढ़ती बेरोज़गारी, आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार और सामाजिक न्याय से जुड़े सवालों के कारण जनता में बदलाव की मांग तेज़ होती जा रही है। केरल की 96% साक्षरता दर और राजनीतिक रूप से सजग जनता पारंपरिक निष्ठा के बावजूद इस बार परिवर्तन के लिए तैयार है।

केरल की राजनीति में मुस्लिम और ईसाई समुदाय हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। सामाजिक समानता, स्वास्थ्य सेवाओं और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देने वाले ये समुदाय अब राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच अपने हितों को लेकर सतर्क हो गए हैं। भाजपा की ओर झुकते कुछ ईसाई गुटों के अलावा वामपंथ के लिए अब तक मज़बूत माने जाने वाले मुस्लिम वोट बैंक में भी हलचल देखी जा रही है।

केरल के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी गर्मी भले ही अभी महसूस न हो रही हो, लेकिन पर्दे के पीछे की चालें इसे बेहद दिलचस्प बना रही हैं। भाजपा की बढ़ती महत्वाकांक्षा, कांग्रेस की अंदरूनी कलह और वाम मोर्चे के सामने बढ़ती चुनौतियाँ राज्य में एक नए सियासी अध्याय की भूमिका लिख रही हैं। देखना होगा कि मतदाता इस बार किस करवट बैठते हैं।

scroll to top