क्या ‘ज़ुबीन के लिए न्याय’ अभियान विपक्ष पर पड़ा भारी?

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी । असम विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन की ज़बरदस्त जीत ने एक बार फिर ज़ुबीन गर्ग को सुर्खियों में ला दिया, लेकिन इस बार एक अलग नज़रिए से। यह देखा जा सकता है कि वे सभी उम्मीदवार और पार्टियाँ, जिन्होंने सिंगापुर में ज़ुबीन की असामान्य मौत और उसके बाद की जाँच प्रक्रियाओं के मुद्दे को चुनावी राजनीति में घसीटा, जनता का समर्थन खो बैठीं। उनमें से कई लोगों ने दावा किया था कि युवा आबादी सत्ताधारी गठबंधन के खिलाफ वोट देगी, क्योंकि ‘ज़ुबीन के लिए न्याय’ (Justice for Zubeen) अभियान ने इस सम्मानित सांस्कृतिक हस्ती के लाखों प्रशंसकों और शुभचिंतकों के दिलों को छू लिया था। लेकिन असम के मतदाताओं ने, जिन्होंने शांतिपूर्ण माहौल में भारी मतदान किया, एक अलग ही तरह से प्रतिक्रिया दी; यह एक ऐसा विषय है जिस पर शायद किसी उचित मंच पर गंभीरता से आत्म-मंथन करने की ज़रूरत है।

9 अप्रैल को हुए एक-चरण के चुनाव में, जिसमें असम में अब तक का सबसे ज़्यादा मतदान प्रतिशत (85.91) दर्ज किया गया, 126-सदस्यीय विधानसभा में अकेले BJP को 82 सीटें मिलीं (इस तरह भगवा पार्टी ने लगातार तीसरी जीत दर्ज की), जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस केवल 19 निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ दूसरे स्थान पर काफी पीछे रह गई। भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, BJP के सहयोगी दलों – असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट – को 10-10 सीटें मिलीं। दूसरी ओर, कांग्रेस की सहयोगी पार्टी ‘रायजोर दल’ को दो सीटें मिलीं, जबकि एक अन्य सहयोगी ‘असम जातीय परिषद’ का खाता भी नहीं खुला। ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को दो और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस को एक सीट मिली।

यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि ज़ुबीन के करीबी परिजनों ने सभी से आग्रह किया था कि वे उनकी असामयिक मृत्यु और उसके बाद की जाँच-पड़ताल को चुनावी फ़ायदे के लिए राजनीतिक रंग न दें, लेकिन कुछ तत्वों ने उनकी बात पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। उन कुख्यात तत्वों ने यह मान लिया था कि इस ज़ोरदार चुनावी अभियान के दौरान, 19 सितंबर 2025 को सिंगापुर में लाज़रस द्वीप के पास समुद्री जल में ज़ुबीन की रहस्यमय मौत और उसके बाद की जाँच-पड़ताल, बड़ी संख्या में मतदाताओं – और विशेष रूप से युवा आबादी – का ध्यान अपनी ओर खींचेगी, क्योंकि वे ज़ुबीन की रहस्यमय मौत से काफी नाराज़ थे।

इस बीच, सिंगापुर की एक कोरोनर अदालत ने यह फ़ैसला सुनाया कि 53 वर्षीय गायक की मृत्यु दुर्घटनावश डूबने के कारण हुई थी, जबकि असम में चल रही जाँच में इस मामले को एक संदिग्ध हत्या के तौर पर देखा जा रहा था। स्टेट कोरोनर एडम नखोदा ने अपने निष्कर्ष बताते हुए कहा कि सभी सबूतों की जांच करने के बाद, पुलिस कोस्ट गार्ड के निष्कर्ष से असहमत होने का कोई कारण नहीं है। सिंगापुर जनरल हॉस्पिटल द्वारा जारी मृत्यु प्रमाण पत्र में भी मृत्यु का कारण डूबना ही बताया गया है। अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि संभवतः पानी में ही ज़ुबीन बेहोश हो गए थे, जिसके कारण वे डूब गए। कोरोनर ने यह भी बताया कि इसमें किसी भी तरह की साज़िश का कोई सबूत नहीं मिला, बचाव के प्रयासों में कोई देरी नहीं हुई, और न ही इस बात का कोई संकेत मिला कि किसी ने उन्हें पानी के नीचे दबाए रखा हो। जहाज़ के कैप्टन ने भी कहा कि किसी ने भी ज़ुबीन को ज़बरदस्ती शराब पीने या पानी में उतरने के लिए मजबूर नहीं किया था। संभवतः ज़ुबीन बेहोश हो गए थे, और उनका चेहरा पानी में डूब गया था।

सिंगापुर के फैसले ने असम में एक नया राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया, क्योंकि विपक्षी पार्टियों ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के उस दावे पर सवाल उठाया, जिसमें इस भगवा नेता ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि ज़ुबीन की हत्या एक सोची-समझी साज़िश के तहत की गई थी। विपक्षी नेताओं ने दिसपुर स्थित सरकार से स्पष्टता और जवाबदेही की भी मांग की, और ज़ुबीन की मौत के मामले में असम पुलिस की एक विशेष टीम द्वारा की गई जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। इस मामले में चार लोगों पर हत्या के आरोप लगाए गए थे: श्यामकानु महंता (सिंगापुर में चौथे NE महोत्सव के आयोजक), गायक के मैनेजर सिद्धार्थ शर्मा, और दो सह-कलाकार शेखर ज्योति गोस्वामी तथा अमृतप्रभा महंता। तीन अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया था और वे जेल में ही रहे; इनमें ज़ुबीन के चचेरे भाई संदीपान गर्ग, और दो सुरक्षा अधिकारी—नंदेश्वर बोरा तथा प्रबीन बैश्य—शामिल थे।

हालाँकि, आलोचना का जवाब देते हुए सरमा ने कहा कि सिंगापुर के निष्कर्षों ने असम में दर्ज मामले को और मज़बूत किया है। यह बताते हुए कि असम की जांच सिंगापुर की जांच से स्वतंत्र थी, सरमा ने कहा कि दोनों ही जांचों से यह बात सामने आई कि ज़ुबीन ने तय सीमा से ज़्यादा शराब का सेवन किया था। असम की जांच का एक अतिरिक्त पहलू यह था कि एक बड़ी साज़िश के तहत, ज़ुबीन को पिछली रात जान-बूझकर शराब पिलाई गई थी।
रिकॉर्ड के लिए, ज़ुबीन के चाचा मनोज कुमार बोरठाकुर ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि विधानसभा चुनावों से पहले, कई लोग उनके नाम का इस्तेमाल करके सरकार-विरोधी रंग देकर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे। गरिमा सैकिया गर्ग ने भी हाथ जोड़कर अपनी अपील दोहराई कि उनके पति के नाम का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए न किया जाए। विपक्ष में कुछ ही लोगों ने उनकी अपील पर ध्यान दिया, और किसी न किसी तरह, चुनाव परिणामों ने ही सही राह दिखा दी। ज़ुबीन गर्ग अमर रहें!

(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

अंग्रेजों ने धोखे से पीठ में गोली मारी थी

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भोपाल । भारत की अंग्रेजों से मुक्ति केलिये क्राँतिकारी आँदोलन में असंख्य ऐसे क्राँतिकारी हुये जिनसे अंग्रेजों को भी भय था। इनमें से एक हैं क्राँतिकारी अल्लूरी सीताराम जिन्हें पकड़ने केलिये पहले विश्वासघातियों को तैयार किया और फिर घेरकर पीठ से गोली मारी।

क्रांतिकारी सीताराम राजू ने एक ओर आंध्रप्रदेश के नगरों और वन में रहने वाले सैकडों नौजवानों में स्वत्व जाग्रत करके क्रांति का उद्घोष किया और दूसरी ओर पंजाब बंगाल तथा उत्तराखंड के क्रांतिकारियों से भी संपर्क करके एक बड़ा संगठन तैयार किया। उन्होंने गदर पार्टी के बाबा पृथ्वीसिंह से संपर्क किया। उन्होंने नल्लईमल्लाई की पहाड़ियों में नौजवानों गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण देने केलिए केन्द्र भी आरंभ किये। गोदावरी नदी के आसपास फैली इन पहा़डयों की समूची वन संपदा को अंग्रेजों के शोषण से मुक्त कर लिया गया था। अब व्यापारियों के कारिन्दे ही नहीं स्थानीय पुलिस भी नहीं घुस सकती थी। स्थानीय नौजवान इन पहाड़ियों के गुप्त रास्ते भी जानते थे जिनसे वे न केवल स्वयं ओझल हो जाते थे अपितु पुलिस पर तीर कमान से हमला भी कर देते थे। कयी बार पुलिस को यह पता भी नहीं चलता था कि तीरों का यह हमला किस दिशा से हो रहा है।

ऐसे महान क्रांतिकारी अल्लूरी सीताराम राजू का जन्म 4 जुलाई 1897 को विशाखापट्टणम जिले के अंतर्गत पांड्रिक गांव में हुआ था। परिवार की परंपरा ज्योतिष और आयुर्वेद विशेषज्ञ के रूप में थी। ज्योतिष के कारण ग्राम और नगरीय क्षेत्र में एवं वनोषधि के के कारण वनक्षेत्र में परिवार का अच्छा प्रभाव था। परिवार की परंपरा के अनुरूप क्रांतिकारी राजू की आरंभिक शिक्षा भी वैद्यक और ज्योतिष विषयों में ही हुई। ये दोनों विषय भारतीय परंपराओं और संस्कृति से जुड़े हुये थे लेकिन अंग्रेजों की नीति से वन उजड़ रहे थे और वनवासियों का शोषण हो रहा था। यह बात सभी को खटकती तो थी लेकिन इसका प्रतिकार नहीं हो रहा था। समाज को संगठित करके अपनी आवाज उठाने का बीड़ा अल्लूरी सीताराम राजू ने उठाया। छात्र जीवन से ही उन्होंने समस्त समाज को संगठित करना आरंभ कर दिया था। इसमें दोनों प्रकार के नौजवान थे। वनवासी भी और ग्रामवासी भी। नौजवानों में जाग्रति अभियान राजू ने ही आरंभ किया था लेकिन क्राँतिकारी संगठन के नेतृत्व का दायित्व क्राँतिकारी बीरैयादौरा को सौंपा जबकि समन्वय का काम स्वयं संभाला। एक विश्वासघाती के कारण वर्ष 1918 में बीरैयादौरा गिरफ्तार कर लिये गये तो संगठन के नेतृत्व का दायित्व अल्लूरी सीताराम राजू ने संभाला।

लेकिन बीरैयादौरा जेल में अधिक दिन न रहे, दीवार फाँदकर निकल गये। जंगल में पहुँच कर वे पुनः काँर्तिकारी आँदोलन में सक्रिय हो गये। लेकिन दल का नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू के हाथ में रहा। बीरैयादौरा अपना नाम और पहनावा बदलकर गांव में रहने लगे। गुप्त रहकर वे रणनीतियाँ तैयार करते जिनका क्रियान्वयन अल्लूरी सीताराम राजू करते। इससे मुक्ति संग्राम और तेज हुआ। लेकिन एक बार फिर बीरैयादौरा विश्वासघात का शिकार बने और दोबारा गिरफ्तार कर लिये गए। लेकिन इस बार क्राँतिकारियों ने धावा बोलकर उन्हें मुक्त करा लिया। यह घटना बीरैयादौरा को पुलिस द्वारा अदालत ले जाते समय घटी। सीताराम राजू के नेतृत्व में क्राँतिकारियों ने धावा बोला दिया। बीरैयादौरा को मुक्त कराकर ले गये।

इस घटना को अंग्रेजी सत्ता ने अपने लिये एक बड़ी चुनौती माना। सेना बुलाई गई और क्रांति का दमन करने केलिये गांवों में दमनचक्र चला, जिस जंगल में क्राँतिकारियों के छिपे होने की सूचना मिलती उन जंगलों में आग लगाई जाने लगी। इसके साथ अल्लूरी और बीरैयादौरा को पकड़ने केलिये दस हजार रुपये इनाम घोषित कर दिया गया। वर्ष 1922 में यह धनराशि एक ब़डा प्रलोभन था। फिर भी दोनों क्राँतिकारी पकड़ न आ सके तब ब्रिटिश सरकार ने आन्ध्र पुलिस की सहायता केलिये केरल के मलाबार से अतिरिक्त टुकड़ी बुलाई। 12 अक्टूबर 1922 से नल्लईमल्लई की पहा़डयों में सघन अभियान चला। कुछ स्थानों पर मुठभेड भी हुई लेकिन दोनों क्राँतिकारी हाथ न सके। लगभग डेढ़ वर्ष तक यह अभियान चला। अंत में 6 मई 1924 को इस क्राँतिकारी दल का सघन मुकाबला सुसज्जित असम राइफल्स से हुआ। इसमें बीरैयादौरा सहित अनेक क्राँतिकारी बलिदान हो गये। लेकिन अल्लूरी राजू किसी प्रकार सेना के घेरे से निकल गये। लेकिन वे स्वयं को छिपा न सके। अगले ही दिन 7 मई 1924 को अकेले जंगल में घिर गये। पुलिस दल ने राजू पर पीछे से गोली चलाई। गोली उनकी पीठ में लगी। वे घायल होकर भूमि पर गिर प़डे। इसके बाद क्रूरतम यातनाओं का दौर चला। अन्य साथियों के नाम और शस्त्र सप्लाई का सूत्र पूछा गया। कठोर यातना सहकर भी उन्होंने किसी का नाम नहीं बताया। अंततः इन्हीं यातनाओं ने एक महान क्रांतिकारी को मृत्यु की गोद में पहुँचा दिया। उनके बलिदान के साथ ही गोदावरी नदी के अंचल और नल्लईमल्लई की पहा़डयों के वनक्षेत्र में क्राँति का दमन हो गया। इतिहास की पुस्तकों में अल्लूरी सीताराम राजू का उल्लेख बहुत कम है लेकिन लोक जीवन की गाथाओं में वे अमर हैं।

हिन्दू एकजुटता बनाम जातीय विखण्डन

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अखिलेश चौधरी

“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
— ऋग्वेद

अर्थात् :- एक साथ चलो, एक साथ बोलो और अपने मनों को एक करो।

भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर में पश्चिम बंगाल और असम केवल चुनावी राज्य नहीं रह गए हैं, बल्कि वे भारत के वैचारिक संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र बन चुके हैं। यहाँ की राजनीति अब केवल सत्ता परिवर्तन का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक अस्मिता, तुष्टिकरण, सीमाई सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और जातिगत राजनीति जैसे प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूम रही है। यही कारण है कि इन राज्यों के चुनाव परिणामों को समझने के लिए पारम्परिक जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर उस व्यापक सामाजिक चेतना को समझना आवश्यक है, जो पिछले कुछ वर्षों में तेजी से उभरी है।

एक ओर वह विचारधारा है जो भारत को हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक सभ्यता के रूप में देखती है और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानती है। दूसरी ओर कुछ ऐसे बुद्धिजीवी और राजनीतिक विश्लेषक हैं जो हर जनादेश को केवल जातिगत खांचों में बाँटकर देखने का प्रयास करते हैं। जब हिन्दू समाज सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय अखण्डता के प्रश्नों पर एकजुट होकर मतदान करता है, तो उसे अगड़ा बनाम पिछड़ा या जातिगत ध्रुवीकरण का नाम देना वस्तुतः उस सामाजिक परिवर्तन को नकारने का प्रयास है जो भारत में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।

पश्चिम बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कभी सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना का केन्द्र रहा बंगाल पिछले कई दशकों से राजनीतिक हिंसा, तुष्टिकरण और प्रशासनिक पक्षपात की घटनाओं से प्रभावित रहा है। सन्देशखाली जैसी घटनाओं ने सामान्य हिन्दू परिवारों के भीतर भय और असुरक्षा की भावना को गहरा किया। दुर्गा पूजा, रामनवमी और सरस्वती पूजा जैसे सांस्कृतिक आयोजनों को लेकर उत्पन्न विवादों ने भी यह सन्देश दिया कि राज्य की राजनीति बहुसंख्यक समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं के प्रति संवेदनशील नहीं रही।

इसी के साथ पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठ और जनसांख्यिकीय परिवर्तन का प्रश्न भी लगातार राजनीतिक विमर्श के केन्द्र में रहा है। भारत-बांग्लादेश सीमा से सटे मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में जनसंख्या संरचना में आए बदलावों को लेकर लम्बे समय से बहस होती रही है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी लगभग 66 प्रतिशत और मालदा में 51 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई थी। सीमावर्ती क्षेत्रों में नकली मुद्रा, पशु तस्करी और अवैध घुसपैठ से जुड़े मामलों पर केन्द्रीय एजेंसियाँ और सीमा सुरक्षा बल समय-समय पर चिन्ता व्यक्त करते रहे हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और BSF की रिपोर्टों में भी सीमा पार नेटवर्क और अवैध गतिविधियों का उल्लेख सामने आता रहा है।

स्थानीय समाज के एक बड़े वर्ग में यह भावना विकसित हुई कि राजनीतिक तुष्टिकरण के कारण सीमा सुरक्षा और नागरिक पहचान के प्रश्नों की उपेक्षा की गई। यही कारण है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं ने ऐसे राजनीतिक विकल्प की ओर रुख किया जो राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिकता और सीमाई नियंत्रण के मुद्दों को खुलकर उठाता है। बंगाल का जनादेश केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिन्ताओं की अभिव्यक्ति भी था।

इसी पृष्ठभूमि में बंगाल का हिन्दू मतदाता पहली बार व्यापक स्तर पर जातिगत सीमाओं से ऊपर उठता दिखाई दिया। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग और शहरी मध्यमवर्ग सभी के बीच एक साझा भाव विकसित हुआ कि यदि सांस्कृतिक अस्मिता और सुरक्षा संकट में है, तो जातीय पहचान गौण हो जाती है। यही कारण है कि आरक्षित सीटों पर भी राष्ट्रवादी राजनीति को बढ़ता समर्थन मिला। यह केवल चुनावी गणित नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक एकजुटता का संकेत था।

_जब राष्ट्र चेतना जागती है, तब जातियाँ पीछे छूट जाती हैं, और जब सभ्यता पर संकट आता है, तब समाज अपनी जड़ों की ओर लौटता है।_

कुछ विश्लेषक इस परिवर्तन को स्वीकार करने के बजाय उसे जातिगत दृष्टि से व्याख्यायित करने का प्रयास करते हैं। वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिन्दू समाज कभी एक नहीं हो सकता और यदि कहीं एकता दिखाई दे रही है, तो उसके पीछे कोई सवर्ण वर्चस्व अवश्य होगा। यह दृष्टिकोण न केवल सामाजिक यथार्थ से दूर है, बल्कि लोकतांत्रिक जनादेश का भी अपमान है। लोकतंत्र में मतदाता को अपनी प्राथमिकताएँ तय करने का अधिकार है। यदि कोई मतदाता राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान या प्रशासनिक स्थिरता को प्राथमिकता देता है, तो उसे केवल जातिगत समीकरणों में बाँधकर देखना उसकी चेतना को कमतर आंकना है।

असम की स्थिति इस सन्दर्भ में और भी महत्वपूर्ण है। यहाँ दशकों से अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय चिन्ता का विषय रहा है। 1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन इसी मुद्दे पर आधारित था, जिसमें लाखों लोगों ने विदेशी नागरिकों की पहचान और निष्कासन की मांग की थी। बाद में असम समझौता भी इसी संघर्ष का परिणाम बना।

असम के कई जिलों जैसे धुबरी, बरपेटा, नगांव, करीमगंज और हैलाकांडी आदि में जनसंख्या सन्तुलन में आए परिवर्तनों को लेकर लगातार राजनीतिक बहस होती रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार धुबरी जिले में मुस्लिम आबादी लगभग 79 प्रतिशत तक पहुँच गई थी। पूर्व मुख्यमन्त्री और वर्तमान नेतृत्व द्वारा समय-समय पर यह दावा किया जाता रहा है कि अवैध घुसपैठ राज्य की सांस्कृतिक संरचना और भूमि अधिकारों को प्रभावित कर रही है। सत्रों की भूमि पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी इसी व्यापक विमर्श का हिस्सा रही।

असम में भाजपा को मिला समर्थन इसी व्यापक भावना का परिणाम था। बोडो, अहोम, कार्बी और चाय जनजातियों सहित अनेक समुदायों ने मिलकर यह सन्देश दिया कि वे अपनी सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर एकजुट हैं। इसे केवल जातिगत ध्रुवीकरण कहना वास्तविकता को नकारना है। असम का जनादेश उस चिन्ता का प्रतिबिम्ब था जिसमें स्थानीय समाज को यह भय था कि निरंतर अवैध घुसपैठ भविष्य में राज्य की सांस्कृतिक संरचना को बदल सकती है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि सामाजिक न्याय और जातिगत राजनीति में मूलभूत अन्तर है। भारत जैसे समाज में वंचित वर्गों का उत्थान और समान अवसर अत्यन्त आवश्यक हैं। किन्तु सामाजिक न्याय का अर्थ समाज को स्थायी रूप से जातीय खांचों में बाँट देना नहीं हो सकता। जब राजनीतिक विमर्श केवल जाति आधारित प्रतिनिधित्व तक सीमित हो जाता है, तब वह समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करने लगता है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदाय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ स्वयं को जोड़ते दिखाई दे रहे हैं। वे स्वयं को केवल जातीय पहचान तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि व्यापक हिन्दू और भारतीय पहचान का हिस्सा मानते हैं।

भारतीय राजनीति में यह परिवर्तन नया नहीं है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान भी अंग्रेजों ने “डिवाइड एंड रूल” की नीति के तहत जातीय और साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया था। दुर्भाग्य से आज भी कुछ वैचारिक समूह उसी मानसिकता को नए रूप में आगे बढ़ाते दिखाई देते हैं। “दलित बनाम सवर्ण”, “उत्तर बनाम दक्षिण” या “स्थानीय बनाम प्रवासी” जैसे विमर्श प्रायः राजनीतिक लाभ के लिए खड़े किए जाते हैं। इसका उद्देश्य समाज में स्थायी असन्तोष बनाए रखना होता है ताकि एक साझा राष्ट्रीय चेतना विकसित न हो सके।

_समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,_
_जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।_
— रामधारी सिंह दिनकर

बंगाल और असम के चुनावों ने इस राजनीति को चुनौती दी है। विशेष रूप से हिन्दी भाषी और प्रवासी मतदाताओं की भूमिका ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रहित का प्रश्न क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठ चुका है। इन मतदाताओं ने आर्थिक विकास, सांस्कृतिक सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता के पक्ष में मतदान किया। उनके लिए यह केवल सरकार चुनने का विषय नहीं था, बल्कि उस भारत की परिकल्पना का समर्थन था जहाँ तुष्टिकरण के स्थान पर समान नागरिकता की भावना हो।

हालाँकि यह भी आवश्यक है कि राष्ट्रवाद का अर्थ किसी समुदाय के प्रति घृणा के रूप में प्रस्तुत न किया जाए। भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है, किन्तु विविधता तभी सुरक्षित रह सकती है जब राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा और संवैधानिक ढाँचा सुरक्षित हो। हिन्दू एकजुटता का वास्तविक अर्थ किसी के विरुद्ध संघर्ष नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता, परम्पराओं और राष्ट्रीय अखण्डता की रक्षा के लिए सामूहिक चेतना का निर्माण है।

आज भारत का मतदाता पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक और राजनीतिक रूप से परिपक्व दिखाई देता है। वह केवल जातिगत समीकरणों के आधार पर मतदान नहीं कर रहा, बल्कि सुरक्षा, विकास, सांस्कृतिक पहचान और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा जैसे व्यापक प्रश्नों पर विचार कर रहा है। यही कारण है कि बंगाल और असम जैसे राज्यों के चुनाव परिणामों को केवल जातीय गणित के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

_राष्ट्र केवल भूगोल नहीं होता, वह साझा इतिहास, साझा संस्कृति और साझा चेतना का जीवंत स्वरूप होता है।_

अन्ततः यह स्पष्ट है कि भारत की राजनीति एक निर्णायक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। जातिगत विखण्डन की राजनीति धीरे-धीरे अपनी सीमाओं तक पहुँच रही है, जबकि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता का विमर्श अधिक व्यापक होता जा रहा है। यह परिवर्तन लोकतन्त्र के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मतदाता को छोटी पहचानों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित के व्यापक दृष्टिकोण से सोचने के लिए प्रेरित करता है।

बंगाल और असम का संदेश स्पष्ट है कि जब समाज को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित पर संकट दिखाई देता है, तब जातीय विभाजन पीछे छूट जाते हैं और राष्ट्र सर्वोपरि हो जाता है। यही भारत की लोकतान्त्रिक चेतना और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी शक्ति है।

दिलीप मंडल के नाम पाति

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दिल्ली । दिलीप मंडल जिस तरह बंगाल की इस जीत को फिर जाति में बाँटने की प्रयास कर रहा है, वो सच में गलत है। कुछ दिन शांत रहा, फिर वही एससी, एसटी, ओबीसी वाला नैरेटिव शुरू कर दिया। हिंदुत्व की इतनी बड़ी जीत में भी जाति खोज लेना आखिर कैसी मानसिकता है?

हम स्वयं संघ के स्वयंसेवक हैं। ज़मीन पर जो बदलाव दिख रहा है, वो शायद ये लोग समझ ही नहीं पा रहे। आज हिंदू समाज का बड़ा वर्ग जाति को बस व्यक्तिगत पहचान तक सीमित कर रहा है। अब उसकी पहली पहचान धर्म बन रही है। यही सबसे बड़ा परिवर्तन है।

हिंदू समाज कभी किसी एक केंद्र पर नहीं टिका। उसकी ताकत हमेशा उसकी विकेंद्रीकृत व्यवस्था रही। जाति व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज को तोड़ना नहीं था, बल्कि कुल, वंश, परंपरा और सामाजिक दायित्वों को संभालना था। इसलिए हमारे यहाँ कुलधर्म, समाजधर्म और राष्ट्रधर्म की बात होती थी। व्यक्ति अकेला नहीं होता था, समाज का हिस्सा होता था।

लेकिन पिछले दो सौ साल में अंग्रेजों, कांग्रेस और वामपंथियों ने योजनाबद्ध तरीके से जाति को राजनीति का केंद्र बना दिया। क्योंकि उन्हें पता था कि हिंदू समाज को तोड़ना है तो उसकी सामाजिक संरचना पर हमला करना होगा। उसी का परिणाम है कि आज हर चीज़ जाति के चश्मे से देखी जाती है।

लेकिन अब परिस्थिति बदल रही है। हिंदू समाज फिर धर्म के आधार पर एकजुट हो रहा है। बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। लोकतंत्र में दस में से आठ हिंदुओं का एक दिशा में खड़ा होना साधारण घटना नहीं है। ये हिंदू चेतना का जागरण है।

ऐसे समय में अगर कोई ये कहे कि भाजपा इसलिए जीती क्योंकि फलाँ जाति ने वोट दिया, तो वो इस पूरी चेतना का अपमान है। बंगाल की जीत किसी जाति की जीत नहीं थी। वो सामूहिक हिंदू समाज की जीत थी।

सच कहें तो एससी, एसटी, ओबीसी और जनरल जैसी पहचानें पिछले कुछ दशकों में राजनीति ने हमारे ऊपर थोप दीं। हिंदू समाज की मूल सोच कभी ऐसी नहीं रही। ये वही विचार है जो समाज को स्थायी रूप से वर्गों में बाँटता है। दिलीप मंडल जैसे लोग उसी सोच को आगे बढ़ाते हैं, इसलिए उनका विरोध होना चाहिए। चाहे वो दिलीप मंडल हो, अजीत भारती हो या कोई और।

हिंदू समाज को अभी फिर से स्वधर्म, कुलधर्म, समाजधर्म और राष्ट्रधर्म को समझना बाकी है। जो समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, उसकी रक्षा कोई केंद्रीकृत व्यवस्था लंबे समय तक नहीं कर सकती। सनातन धर्म इतने आक्रमण झेलकर भी इसलिए बचा रहा क्योंकि उसकी शक्ति किसी एक केंद्र में नहीं, पूरे समाज में बिखरी हुई थी। उसी व्यवस्था को तोड़ने के लिए जाति को अपराधबोध बना दिया गया।

आज हालत ये हो गई है कि हिंदू अपने ही समाज की संरचना को लेकर अपराधबोध में जी रहा है। जबकि आवश्यकता इससे बाहर आने की है। हिंदू समाज को आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से और मजबूत करना होगा। यही भविष्य का मार्ग है।

संघ का गीत भी यही कहता है

“युग के साथ मिल के सब, कदम बढ़ाना सीख लो,
एकता के स्वर में गीत गुनगुनाना सीख लो,
भूल कर भी सुख में जाति, पंथ की न बात हो,
भाषा प्रांत के लिए, कभी न रक्तपात हो,
फूट का भरा घड़ा है, फोड़ कर बढ़े चलो।।
भला हो जिसमें देश का, वो काम सब किए चलो।।

और इतिहास भी यही सिखाता है।

जोगेंद्र मंडल के साथ दलित पहचान के आधार पर पाकिस्तान गए हिंदुओं को आखिर में वहाँ से भागना पड़ा। जाति उन्हें बचा नहीं सकी। लेकिन जब वही लोग हिंदू बनकर खड़े हुए, तब पूरा राष्ट्र उनके साथ खड़ा हो गया।

यही हिंदू चेतना है।
यही उसकी असली ताकत है।
और यही बात दिलीप मंडल जैसे लोग कभी समझ नहीं पाएँगे।

: साभार

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