ABVP Makes Women’s Safety and Hostel Expansion Key DUSU Poll Issues, Sets sight on a clean sweep

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Delhi : The Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP) has intensified its campaign for the Delhi University Students’ Union (DUSU) elections following the announcement of its central panel. Yash Dabas is contesting for President, Ishu Maurya for Vice President, Riya Chhawdi for Secretary and Lakshya Raj Singh for Joint Secretary. With a clear target of winning all four seats, ABVP karyakartas are reaching out to students across colleges, hostels and student hubs, focusing on issues that directly affect campus life and student welfare.

On Saturday, ABVP karyakartas interacted with students staying in various PG accommodations and hostels and raised the issue of safe and affordable student accommodation under its ongoing ‘Aakhir Kab Tak?’ campaign, launched following the Satya Niketan incident. Following sustained demands and protests by ABVP, construction of a 2,400-bed girls’ hostel is underway. ABVP has stressed that the university needs to go beyond this and significantly expand hostel capacity for all students, while ensuring that accommodation remains safe, accessible and affordable.

Women’s safety remains another key priority for ABVP. The organisation has consistently raised the need for stronger safety mechanisms on campus, including Pink Booths, CCTV cameras, women’s safety patrol vehicles and U-Special bus services. Through initiatives such as ‘Nari Tu Narayani’, ‘Swayamsiddha’ and ‘Vamika’, ABVP has also worked to promote the safety, self-reliance and leadership of women students. Dedicated cells for academic, women-related, Northeast and hostel-related concerns have been created in DUSU to ensure that students’ issues are heard directly and taken up for resolution.

ABVP’s candidate for DUSU Secretary, Riya Chhabri, said, “Students should not have to compromise on their safety or education because of a lack of basic facilities. Women’s safety and adequate hostel accommodation are issues that require continuous work, not just election-time promises. ABVP has consistently taken these concerns from the ground to the university administration and pushed for concrete action. The beginning of work on the 2,400-bed girls’ hostel is an important step, but the demand for hostel accommodation across Delhi University is much larger. Expanding hostel capacity and ensuring a safe campus environment will remain among our priorities. The strong response from students gives us confidence that they are ready for change, and ABVP is set to deliver a decisive 4-0 victory in DUSU.”

भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ौतरी 

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जापान क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी (जेसीआरए) ने भारत की सार्वभौम (सावरेन) क्रेडिट रेटिंग में सुधार करते हुए इसे BBB+ से बढ़ाकर A- कर दिया है। भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ौतरी कई कारणों के चलते की गई है। भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार विकास के पथ पर तेजी से दौड़ रही है और भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि दर बनी हुई है। भारत आज पूरे विश्व में समस्त बड़े देशों के बीच सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गई है एवं भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका का निर्वहन करता हुआ दिखाई दे रहा है। दूसरा, भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, इस देश में नागरिकों को अपने विचार रखने की आजादी है अतः विश्व के अन्य देश भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं और भारत में विदेशी निवेश लगातार बढ़ रहा है। अभी हाल ही में अन्य देशों में निवासरत भारत के मूल नागरिकों ने भारत में 13,600 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भारतीय बैंकों में जमा की है। यह भारत की शक्ति एवं मजबूती को दर्शाता है। तीसरा, भारत में आर्थिक सुधार कार्यक्रम लगातार चल रहे है। हाल ही में, वस्तु एवं सेवा कर की दरों में कमी की गई थी जिसके चलते भारतीय नागरिकों की जेब में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि पहुंची है, इससे भारतीय नागरिकों की खर्च करने की क्षमता में वृद्धि हुई है। चौथा, भारत में डिजिटल आधारभूत संरचना को मजबूती प्रदान की गई है। भारतीय यूपीआई की मांग अब विश्व के अन्य देशों द्वारा भी की जा रही है। जनधन योजना के अंतर्गत देश के करोड़ों नागरिकों के बैंक खाते खोले गए हैं, जिन्हें आधार से जोड़ दिया गया है और स्मार्ट मोबाइल आज जैसे जेब में बैंक का कार्य करता हुआ दिखाई दे रहा है। डिरेक्ट बेनिफिट ट्रान्स्फर योजना को भी बहुत सरल बना दिया गया है। इससे देश में भ्रष्टाचार में कमी आई है। पांचवां, भारत में हाल ही के समय में वित्तीय क्षेत्र में मजबूती आई है। मार्च 2026 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में भारतीय बैंकों में सकल गैर निष्पादनकारी आस्तियां 1.8 प्रतिशत से भी नीचे आ गई हैं। यह अपने आप में एक रिकार्ड है। छठा, सरकारी खर्चों के उपयोग में अब सुधार दृष्टिगोचर है और इसकी गुणवत्ता भी सुधरी है। केंद्र सरकार के पूंजीगत खर्च पिछले 5 वर्षों में तीन गुना हो गए हैं। इससे भारत में रेल, रोड एवं पोर्ट की आधारभूत संरचना विकसित हुई है, जो विदेशी निवेशकों को भी भारत में अपना निवेश बढ़ाने के लिए आकर्षित कर रही है। सांतवा, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार 68,400 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गए हैं, जो कि भारत के लिए बहुत अच्छा सुरक्षा कवच बन गया है। आंठवां, भारत का वित्तीय घाटा वित्तीय वर्ष 2020-21 में 9.2 प्रतिशत था, जो वित्तीय वर्ष 2025-26 में घटकर 4.4 प्रतिशत के स्तर पर नीचे आ गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था में उक्त 8 मानकों पर हुए सुधार के चलते जापान क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी ने भारत के सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में बढ़ौतरी की है।

विश्व की क्रेडिट रेटिंग एजेन्सीयों द्वारा विभिन्न देशों की आर्थिक एवं वित्तीय स्थिति के आधार पर इन देशों की क्रेडिट रेटिंग निर्धारित की जाती है। इन देशों द्वारा अथवा इन देशों के बैकों द्वारा एवं इन देशों की कम्पनियों द्वारा वैश्विक बाजार से उधार ली जाने वाली राशि पर ब्याज की दर इस क्रेडिट रेटिंग के आधार पर निर्धारित होती है। यदि क्रेडिट रेटिंग उच्च स्तर की रहती है तो उस देश द्वारा अंतरराष्ट्रीय बाजार में ली जाने वाली ऋणराशि पर ब्याज की दर कम निर्धारित होती है। दूसरे, इससे उस देश में विदेशी निवेश आकर्षित होता है, क्योंकि इन देशों में किया गया विदेशी निवेश सुरक्षित माना जाता है। विभिन्न क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी द्वारा निम्न प्रकार की क्रेडिट रेटिंग प्रदान की जाती है। AAA – यह प्राइम क्रेडिट रेटिंग मानी जाती है एवं यह देश निवेश की दृष्टि से इन्वेस्टमेंट ग्रेड का है। AA – क्रेडिट रेटिंग भी हाई ग्रेड की मानी जाती है। A – क्रेडिट रेटिंग अपर मीडीयम ग्रेड की मानी जाती है। BBB – क्रेडिट रेटिंग लोअर मीडीयम ग्रेड को दर्शाती है। BB – क्रेडिट रेटिंग नोन-इन्वेस्टमेंट ग्रेड एवं स्पेक्युलेटिव की श्रेणी में गिनी जाती है। B – क्रेडिट रेटिंग हाइली स्पेक्युलटिव श्रेणी में आती है एवं C – क्रेडिट रेटिंग अधिकतम रिस्क की श्रेणी में गिनी जाती है। भारत की क्रेडिट रेटिंग BBB+ ग्रेड में मानी जा रही थी जो अब सुधरकर A- कर दिया गया है।

पश्चिमी देशों की क्रेडिट रेटिंग एजेन्सीयों ने भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में पिछले कई वर्षों से बदलाव ही नहीं किया है जबकि भारत ने इस दौरान विशेष रूप से आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में अतुलनीय सुधार करते हुए विकास दर को बढ़ाने में सफलता प्राप्त की है। फिच नामक क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी ने भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग को अगस्त 2006 के बाद से परिवर्तित ही नहीं किया है, जो BBB- के स्तर पर लगातार बनी हुई है। इसी प्रकार, स्टैंडर्ड एंड पूअर नामक क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी द्वारा 18 वर्ष पश्चात भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग को 27 अगस्त 2026 को अपग्रेड करते हुए इसे BBB के स्तर पर ले आया गया है। एक अन्य क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी मूडी ने जून 2020 के पश्चात भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में कोई परिवर्तन नहीं किया है और भारत को Baa3 की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग दी हुई है। उक्त एजेन्सीयां भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग को उचित तरीके से नहीं दर्शाती हैं। जबकि, भारत के आर्थिक संकेतक बहुत मजबूत बने हुए हैं।

हाल ही में, विश्व के चार प्रमुख वित्तीय संस्थानों ने भारत के आर्थिक विकास के संदर्भ में विशेष रिपोर्ट जारी की है। जिसमें भारत की आर्थिक प्रगति की सराहना की गई है। जेफ्रीज नामक वित्तीय संस्थान की रिपोर्ट कहती है कि मोबाइल फोन, स्टील, सीमेंट, सोलर पैनल एवं ट्रक के निर्माण के क्षेत्र में भारत आज दुनिया में दूसरे स्थान पर आ गया है। वर्ष 2014 में स्पेस के क्षेत्र में भारत में केवल एक स्टार्टअप था आज भारत में इस क्षेत्र में 400 से अधिक स्टार्टअप कार्य कर रहे हैं। चिप निर्माण में 12 प्रोजेक्ट पर भारत में काम हो रहा है एवं 2,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश इस क्षेत्र में हो रहा है। साथ ही, 3 विनिर्माण इकाईयों में उत्पादन भी प्रारम्भ हो गया है। जेफ्रीज ने इस रिपोर्ट को नाम दिया है “इंडिया न्यू इंडस्ट्रीयल रेवोल्यूशन”।

दूसरी रिपोर्ट आई है बैंक ओफ अमेरिका से, जो कहती है कि भारत में बहुत कुछ बदल रहा है। पिछले 24 माह में भारत में 18 सुधार कार्यक्रम लागू हुए हैं। वस्तु एवं सेवा कर के ढांचे में 5 के स्थान पर मुख्यतः अब 2 दरें लागू कर दी गई हैं एवं इसे बहुत सरल बना दिया गया है। 12 लाख रुपए की कमाई तक, आय कर शून्य कर दिया गया है। नए लेबर कोड्ज भी लागू कर दिए गए हैं एवं सोशल सिक्यरिटी का दायरा भी बढ़ा दिया गया है।

तीसरी रिपोर्ट आई है (BERNSTEIN) बॉर्नस्टीन नामक संस्थान से, जो कहती है कि भारत के विकास में कुछ हिस्सा सरकारी सहयोग से आ रहा है। केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में अपने पूंजीगत खर्चों में भारी वृद्धि की है। जून 2026 तिमाही में भारत की 200 सबसे बड़ी कम्पनियों की आय 12 प्रतिशत बढ़ी है। वस्तु एवं सेवा कर की दरों में कमी करने से नागरिकों की जेब में करीब 20,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि पहुंची है। भारत के गांवों में कमजोर मानसून के बावजूद उत्पादों की मांग मजबूत बनी हुई है।

चौथी रिपोर्ट आई है मोर्गन सटेनली नामक संस्थान से, इसके अनुसार, पिछले वर्ष विश्व के 24 स्टॉक मार्केट में से भारत का मार्केट, रिटर्न देने के मामले में 23वें स्थान पर रहा है। यह कड़वा सच है। परंतु, ऊपर जाने के रास्ता लम्बा है पर यहीं से निकलता है। अभी भारत का सेन्सेक्स 76000 के आसपास हैं, जो जून 27 तक बढ़कर परिस्थिति अनुसार, 89000 अथवा 100000 के स्तर तक पहुंच सकता है। भारतीय कम्पनियों के शेयर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कुछ सस्ते हो गए है। चूंकि भारतीय स्टॉक मार्केट ने पिछले वर्ष अच्छे रिटर्न नहीं दिए हैं अतः मार्केट इस वर्ष इस गलती को सुधारने को तैयार हो रहा है। भारत में निवेश, नागरिकों की बचत से आ रहा है, प्रति माह करोड़ों नागरिक SIP के माध्यम से हजारों करोड़ रुपए का निवेश देश के पूंजी बाजार में कर रहे हैं। भारतीय शेयर बाजार में आज देशी निवेशकों का निवेश विदेशी निवेशकों के निवेश की तुलना में अधिक हो गया है। जब विदेशी निवेशक वापिस भारतीय शेयर बाजार में लौटेंगे तो उन्हें आज की तुलना में महंगे शेयर खरीदने होंगे। अर्थात, भारतीय शेयर बाजार गिरा जरूर है, परंतु इसीलिए आगे का रास्ता लम्बा हो सकता है लेकिन जाना उसे ऊपर की ओर ही है।

वैश्विक स्तर की उक्त चार बैंकिंग संस्थानों की रिपोर्ट स्पष्ट कहती हैं कि भारत विकास के राह पर बहुत तेज गति से आगे बढ़ रहा है एवं भारत के आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में लगातार सुधार कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं। अब पश्चिमी देशों की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा भी भारत की सार्वभौम क्रेडिट रेटिंग में सुधार किया जाएगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए।

दुनिया की सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा है हिंदी

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लखनऊ। भाषा सिर्फ शब्दों का समूह नहीं होती, भाषा एक सभ्यता की आत्मा होती है और जब हम हिंदी की बात करते हैं तो हम सिर्फ एक भाषा की बात नहीं करते, हम एक जीवंत सभ्यता की बात करते हैं जो आज दुनिया के हर कोने में सांस ले रही है। अंग्रेजों को अपने साम्राज्य पर गर्व था कि उनके राज में सूर्य कभी अस्त नहीं होता, क्योंकि दुनिया के किसी न किसी हिस्से में उनका झंडा लहराता रहता था। आज वही गौरव हिंदी को प्राप्त है और वह भी बिना किसी तलवार और बिना किसी साम्राज्य के, सिर्फ प्रेम, फिल्म, संगीत, योग और अब इंटरनेट और एआई के दम पर। हिंदी का सूर्य कभी अस्त नहीं होता, क्योंकि जब भारत में रात के बारह बजते हैं, तो लंदन में शाम होती है और वहाँ कोई माँ अपने बच्चे को हिंदी में सुला रही होती है, जब लंदन में रात होती है तो टोरंटो में दोपहर होती है और वहाँ टैक्सी में हिंदी गाना बज रहा होता है और जब टोरंटो में रात होती है तो फिजी में सुबह होती है और वहाँ के स्कूल में बच्चे हाथ जोड़कर गा रहे होते हैं – इतनी शक्ति हमें देना दाता। यह चक्र चौबीस घंटे चलता है और कभी रुकता नहीं।

कुछ लोग जो सिर्फ किताबी आंकड़ों पर भरोसा करते हैं, वे कहते हैं कि हिंदी बोलने वाले 60-70 करोड़ हैं, लेकिन यह आधी-अधूरी गिनती है जो सिर्फ मातृभाषा के कॉलम को देखती है। अगर हम भाषा को उसकी व्यावहारिक ताकत से देखें, यानी कौन बोलता है, कौन समझता है, कौन काम चलाता है, कौन गाना सुनता है, कौन फिल्म देखता है, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। आइए इस प्रैक्टिकल गणना को जमीन पर उतर कर देखते हैं, बिना किसी कल्पना के, सिर्फ आंकड़ों और राज्यों की आबादी के आधार पर। सबसे पहले भारत के उन दस राज्यों को लेते हैं जहाँ हिंदी मातृभाषा है, घर की भाषा है। उत्तर प्रदेश की आबादी आज लगभग 25 करोड़ है, बिहार की 14 करोड़, मध्य प्रदेश की 9 करोड़, राजस्थान की 8.5  करोड़, हरियाणा की 3.2 करोड़, झारखंड की 4 करोड़, छत्तीसगढ़ की 3.2 करोड़, दिल्ली की 2.5 करोड़, उत्तराखंड की 1.2 करोड़ और हिमाचल प्रदेश की 80 लाख। इन सबको जोड़ दीजिए तो संख्या 70 करोड़ को पार कर जाती है। ये 70 करोड़ लोग वो हैं जिनके लिए हिंदी सीखने की भाषा नहीं, बल्कि रोज जीने की भाषा है। वे पैदा होते ही हिंदी सुनते हैं और हिंदी में ही सोचते हैं। IAMAI-KANTAR की 2025 की रिपोर्ट और TRAI की मार्च 2026 की रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि भारत में 109.2 करोड़ इंटरनेट सब्सक्राइबर हैं जिनमें 57 प्रतिशत यानी 54.8 करोड़ ग्रामीण भारत से हैं और ये ग्रामीण यूजर इन्हीं दस राज्यों से सबसे ज्यादा आते हैं जो इंटरनेट पर हिंदी में ही सर्च करते हैं, हिंदी में ही वीडियो देखते हैं।

अब दूसरे हिस्से को देखिए जो अक्सर गिनती से छूट जाता है, यानी भारत में ही 40 करोड़ लोग जो हिंदी को दूसरी भाषा के रूप में समझते और बोलते हैं। महाराष्ट्र और गुजरात को लीजिए, जहाँ मराठी देवनागरी में ही लिखी जाती है और गुजराती की लिपि भी देवनागरी से मिलती-जुलती है, यहाँ का व्यापारी, मजदूर और छात्र रोज हिंदी में काम चलाता है। सिक्किम में नेपाली, जम्मू में डोगरी, असम में बोडो, बिहार में मैथिली जैसी भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं और ये हिंदी की सगी बहनें हैं, इसलिए इन क्षेत्रों के लोग बिना पढ़ाए हिंदी समझ लेते हैं। दक्षिण भारत में केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में स्कूलों में हिंदी तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है और वहाँ रेलवे स्टेशन, बाजार, सिनेमा हॉल और अब तो हर मोबाइल में मौजूद ओटीटी, यूट्यूब और सोशल मीडिया रील्स एवं शॉर्ट्स ने हिंदी को घर-घर पहुँचा दिया है, आज करीब 60 करोड़ लोग शॉर्ट वीडियो देखते हैं और उनमें से अधिकतर कंटेंट हिंदी और उससे मिलती-जुलती भाषाओं में है, हैदराबाद में तो हिंदी आम बोलचाल की भाषा बन चुकी है। इस तरह महाराष्ट्र, गुजरात, सिक्किम, डोगरी-बोडो-मैथिली क्षेत्रों और दक्षिण के पाँच राज्यों में मिलाकर 40 करोड़ लोग ऐसे हैं जो हिंदी को अपनी रोजमर्रा की जरूरत के लिए इस्तेमाल करते हैं, वे हिंदी फिल्मों के डायलॉग जानते हैं, वे हिंदी गानों पर नाचते हैं और वे इंटरनेट पर हिंदी में कमेंट करते हैं। तो भारत के अंदर ही कुल संख्या हो जाती है 70 करोड़ जमा 40 करोड़, यानी 110 करोड़। इसका अर्थ है कि 145 करोड़ के भारत में 110 करोड़ लोग, यानी 75 प्रतिशत से ज्यादा आबादी, हिंदी से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।

अब भारत की सीमा से बाहर निकल कर पूरे उपमहाद्वीप को देखिए। भाषा विज्ञान का एक सच्चा नियम है कि हिंदी और उर्दू दो अलग भाषाएँ नहीं हैं, वे एक ही बोली के दो लिखने के तरीके हैं। आम बोलचाल में पानी, रोटी, घर, दिल, प्यार, दोस्त, इज्जत जैसे शब्द हिंदी में भी वही हैं और उर्दू में भी वही हैं। पाकिस्तान की 24 करोड़ आबादी उर्दू बोलती है जो बोलने में 90 प्रतिशत हिंदी ही है, नेपाल की 3 करोड़ आबादी नेपाली बोलती है जो देवनागरी में लिखी जाती है और हर नेपाली हिंदी फिल्म देखकर हिंदी समझता है और बांग्लादेश की 17 करोड़ आबादी में से 8 करोड़ युवा वर्ग बॉर्डर के संपर्क और हिंदी फिल्मों व गानों के कारण हिंदी-उर्दू अच्छी तरह समझता है। इन तीनों देशों को मिलाकर 35 करोड़ लोग ऐसे हैं जो बिना हिंदी की किताब पढ़े ही हिंदी समझ लेते हैं। इस तरह उपमहाद्वीप में कुल संख्या हो जाती है 110 करोड़ जमा 35 करोड़, यानी 145 करोड़। यह संख्या किसी भी सरकारी जनगणना से बड़ी है क्योंकि यह प्रयोग के आधार पर गिनी गई संख्या है, कागज के आधार पर नहीं।

अब दुनिया के नक्शे को और बड़ा करिए। आज दुनिया का कोई देश ऐसा नहीं है जहाँ भारतीय, पाकिस्तानी, नेपाली और बांग्लादेशी न रहते हों। खाड़ी देशों दुबई, सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत में 1 करोड़ से ज्यादा भारतीय और पाकिस्तानी मजदूर और व्यापारी रहते हैं और वहाँ केरल का नर्स और यूपी का मिस्त्री आपस में हिंदी में ही बात करता है, क्योंकि हिंदी ही वहाँ की संपर्क भाषा बन गई है। अमेरिका में 50 लाख, कनाडा में 25 लाख, ब्रिटेन में 20 लाख, ऑस्ट्रेलिया में 10 लाख भारतीय बसे हैं, फिजी में हिंदी सरकारी भाषा है, मॉरीशस की संसद में हिंदी बोली जाती है, सूरीनाम, त्रिनिदाद और गुयाना में आज भी भोजपुरी और हिंदी गीत गाए जाते हैं। इन लोगों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी भले ही स्कूल में अंग्रेजी पढ़ती हो, लेकिन घर में दादी से वीडियो कॉल पर वह हिंदी में ही कहती है – दादी, पैर छू रही हूँ। ऐसे 8 करोड़ लोग दुनिया भर में फैले हैं जो रोज हिंदी से जुड़े हैं और हिंदी को जिंदा रखे हैं।

और अंत में वह सबसे नया परिवार जो पिछले दो साल में सबसे तेजी से बढ़ा है, यानी 5 करोड़ विदेशी प्रशंसक जो न भारतीय हैं, न पाकिस्तानी, फिर भी हिंदी से जुड़े हैं। रूस, जर्मनी, तुर्की, मिस्र, नाइजीरिया में लोग बिना सबटाइटल के हिंदी फिल्म देखते हैं, YouTube पर हिंदी गानों के अरबों व्यूज इसी बात के गवाह हैं। दुनिया में 30 करोड़ से ज्यादा लोग योग करते हैं और योग के साथ वे नमस्ते, शांति, ध्यान, गुरु, कर्म जैसे हिंदी-संस्कृत शब्द सीखते हैं। सबसे बड़ी क्रांति तो AI ने की है, Digital 2026 की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में AI यूजर 1 बिलियन से ज्यादा हो गए हैं और ChatGPT ने मई 2026 में 1 बिलियन मंथली यूजर का आंकड़ा पार किया है जिसमें 20 करोड़ यूजर अकेले भारत से हैं जो AI से हिंदी में सवाल पूछ रहे हैं, हिंदी में कहानी लिखवा रहे हैं और हिंदी में ईमेल बनवा रहे हैं, अब जापान का आदमी भी AI की मदद से हिंदी सीख रहा है क्योंकि AI तुरंत अनुवाद कर देता है। ऐसे 5 करोड़ लोग हैं जो हिंदी फिल्म, योग और AI के कारण हिंदी परिवार के नए सदस्य बन गए हैं।

अब अंतिम जोड़ देखिए – भारत में मातृभाषा के रूप में 70 करोड़, भारत में दूसरी भाषा के रूप में 40 करोड़, भारत के अंदर कुल 110 करोड़, पाकिस्तान-नेपाल-बांग्लादेश में 35 करोड़, उपमहाद्वीप में कुल 145 करोड़, दुनिया भर में बसे भारतीय-उपमहाद्वीपीय लोग 8 करोड़ और दुनिया भर के प्रशंसक 5 करोड़, कुल मिलाकर 158 करोड़ यानी लगभग 150 करोड़ से ज्यादा। यह गिनती किसी को खुश करने के लिए नहीं है, यह वही तरीका है जिससे अंग्रेजी को 150 करोड़ की भाषा माना जाता है, जबकि अंग्रेजी को मातृभाषा के रूप में बोलने वाले सिर्फ 40 करोड़ हैं, बाकी 110 करोड़ लोग दूसरी भाषा के रूप में गिने जाते हैं। अगर वही न्याय हिंदी के साथ किया जाए तो हिंदी भी 150 करोड़ से ज्यादा लोगों की बोली और समझी जाने वाली भाषा है और कई मायनों में तो अंग्रेजी से भी बड़ी है, क्योंकि अंग्रेजी समझने के लिए स्कूल जाना पड़ता है, लेकिन हिंदी-उर्दू समझने के लिए सिर्फ एक फिल्म देखनी पड़ती है।

इसलिए यह कहना कि हिंदी दुनिया की सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है, कोई भावुक नारा नहीं है, यह आंकड़ों, भूगोल और टेक्नोलॉजी तीनों पर खरा उतरने वाला सच है। 109 करोड़ इंटरनेट सब्सक्राइबर, 58.8 करोड़ शॉर्ट वीडियो यूजर और 20 करोड़ AI यूजर इस बात के जीवित सबूत हैं कि हिंदी अब किताबों से निकल कर मोबाइल की स्क्रीन पर राज कर रही है। जब 150 करोड़ लोग अपनी ही भाषा में अपनी कहानी कहेंगे, जब लोकल लोग वोकल होंगे, तब दुनिया को एल्गोरिदम की बनाई हुई कहानी नहीं, इंसान की असली कहानी सुनाई देगी और तभी यह सिद्ध होगा कि हिंदी सिर्फ भारत की ही नहीं, दुनिया की आत्मा की भाषा है, जिसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता।

 

एक वैश्विक कलाकार का अनुभव और ऐतिहासिक यथार्थ

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल। हाल ही में न्यूयॉर्क की प्रसिद्ध टैटू आर्टिस्ट ‘जेमा फेरर’ भारत यात्रा के दौरान राजस्थान की सांस्कृतिक राजधानी जयपुर पहुँचीं। यहाँ उन्होंने वास्तुकला, कला, इतिहास और जनजीवन को करीब से देखा। इस अनुभव ने उनके भारत संबंधी दृष्टिकोण को बदल दिया और सोशल मीडिया पर एक नई बहस को जन्म दिया। उनके विचारों ने पश्चिमी दुनिया के उस पुराने विमर्श पर भी सवाल खड़ा किया, जिसमें भारत को लंबे समय तक गरीबी, पिछड़ेपन, भीड़ और अव्यवस्था की छवियों से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता रहा है।

जेमा फेरर ने दो टूक शब्दों में कहा, “भारत कभी गरीब नहीं था, बल्कि उसे जानबूझकर गरीब बनाया गया।” उनके अनुसार, पश्चिमी फिल्मों और लोकप्रिय संस्कृति में भारत की जो तस्वीर दिखाई जाती रही है, वह उसकी पूरी वास्तविकता नहीं है। हजारों वर्ष पुरानी भारतीय सभ्यता, ज्ञान परंपरा, कला, वस्त्र और जीवन-दर्शन को दुनिया के सामने उस व्यापकता के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके वे अधिकारी हैं।

उनका मानना है कि भारत को समझने के लिए उसकी वर्तमान परिस्थितियों के बजाय उसकी पूरी ऐतिहासिक यात्रा को सामने रखना आवश्यक है। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के ऐतिहासिक स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में मजबूत पारंपरिक उद्योग, हस्तशिल्प और व्यापारिक परंपराएं मौजूद थीं। विशेष रूप से भारतीय कपड़ा उद्योग का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एक समय भारत के सूती कपड़े, मलमल और रेशमी वस्त्रों की दुनिया भर में मांग थी तथा टेक्सटाइल भारत की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल था।

जेमा के अनुसार, ब्रिटिश शासन के दौरान लागू की गई औपनिवेशिक व्यापार नीतियों ने इन उद्योगों को गहरा नुकसान पहुंचाया। उनका कहना है कि ब्रिटिश आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने वाली नीतियों का सीधा असर भारतीय बुनकरों और कारीगरों पर पड़ा और बड़ी संख्या में लोग आर्थिक संकट में पहुंच गए। उनके दृष्टिकोण में भारत की पारंपरिक औद्योगिक शक्ति को कमजोर करना औपनिवेशिक आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

भारत और पश्चिम के सांस्कृतिक संबंधों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने योग, आयुर्वेद और मेडिटेशन का उल्लेख किया। उनका कहना है कि पश्चिमी समाज ने इन भारतीय परंपराओं को अपनाया और इनके इर्द-गिर्द बड़े वैश्विक बाजार विकसित हुए, मगर इन परंपराओं के मूल स्रोत और उन्हें विकसित करने वाले भारतीय समाज को अपेक्षित श्रेय नहीं मिला। उनके लिए यह प्रश्न महज सांस्कृतिक आदान-प्रदान का नहीं, बल्कि पहचान, स्वामित्व और सम्मान का भी है।

भारतीय वस्त्रों की वैश्विक पहचान को भी उन्होंने इसी संदर्भ से जोड़ा। उनके अनुसार, जिस भारतीय टेक्सटाइल परंपरा की कभी दुनिया भर में प्रतिष्ठा थी, उससे जुड़े ऐतिहासिक योगदान को भी व्यापक संदर्भ में समझे जाने की आवश्यकता है। उनका सवाल यही है कि भारतीय विरासत से लाभ लेने वाली दुनिया उस विरासत के मूल देश और समाज को उसका उचित सम्मान और श्रेय क्यों न दे।

जेमा ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और महात्मा गांधी की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि लंबे समय तक चले शोषण के बावजूद भारत ने अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई में व्यापक हिंसा को आधार नहीं बनाया। महात्मा गांधी जैसे नेताओं के नेतृत्व में अहिंसा को आंदोलन की शक्ति बनाया गया। उनके अनुसार, भारत ने दुनिया के सामने यह उदाहरण रखा कि बिना हथियार उठाए और व्यापक रक्तपात के भी एक बड़ी औपनिवेशिक ताकत को चुनौती दी जा सकती है। उनके लिए यह भारत की सभ्यतागत शक्ति का महत्वपूर्ण प्रमाण है।

भारत यात्रा के अपने अनुभव को लेकर जेमा ने कहा कि किसी देश को दूर बैठकर समझना और उसके बीच जाकर उसे महसूस करना दो बिल्कुल अलग अनुभव हैं। भारतीय सभ्यता, संस्कृति और इतिहास से प्रभावित होकर उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अफसोस है कि भारत को समझने में उन्हें इतनी देर लगी। अब वह अपनी कला के माध्यम से दुनिया को भारत की उन कहानियों से परिचित कराना चाहती हैं, जिन्हें वह स्वयं इस यात्रा के दौरान नए सिरे से समझ पाई हैं।

वस्‍तुत: जेमा फेरर के कथनों का व्यापक अर्थ यही है कि भारत की पहचान को उसकी गरीबी या पिछड़ेपन की सीमित छवियों में नहीं बांधा जा सकता। उसकी सभ्यता, ज्ञान, कला, उद्योग, वस्त्र परंपरा और जीवन-दर्शन उसकी वैश्विक पहचान के अभिन्न हिस्से हैं। उनके शब्दों में व्यक्त दृष्टिकोण आज भले ही एक विदेशी कलाकार के अनुभव के रूप में सामने आया हो, मगर इसके पीछे भारत के औपनिवेशिक अतीत और आर्थिक शोषण से जुड़ा एक लंबा ऐतिहासिक विमर्श मौजूद है।

इसीलिए जेमा फेरर का यह कथन, “भारत कभी गरीब नहीं था, बल्कि उसे जानबूझकर गरीब बनाया गया”, आज फिर एक बार भारत के उस इतिहास की ओर संकेत करता है, जिसमें एक समृद्ध पारंपरिक अर्थव्यवस्था, व्यापक हस्तशिल्प और वैश्विक व्यापारिक पहचान रखने वाले समाज ने औपनिवेशिक शासन के दौर में गहरे आर्थिक परिवर्तन और शोषण का सामना किया।

पश्चिमी दुष्प्रचार और ऐतिहासिक भ्रम का पर्दाफाश

लंबे समय तक पश्चिमी इतिहासकारों और औपनिवेशिक विचारकों ने यह विमर्श स्थापित करने का प्रयास किया कि ब्रिटिश राज भारत के लिए एक ‘वरदान’ की तरह था। उनका तर्क था कि अंग्रेजों ने भारत को रेलवे दी, आधुनिक न्याय प्रणाली दी, अंग्रेजी भाषा दी और एक असभ्य समाज को सभ्य बनाने का काम किया। इस विमर्श को ‘व्हाइट मैन्स बर्डन’ (श्वेत मानस का बोझ) के सिद्धांत के तहत सही ठहराया गया, किंतु जब जेमा फेरर जैसे आधुनिक विचारकों और वैश्विक इतिहासकारों ने जब भारत की कला, शिल्प और स्थापत्य का निष्पक्ष अध्ययन किया, तो उन्हें समझ आया कि जो देश इतनी सूक्ष्म और समृद्ध कलाओं को जन्म दे सकता है, वह वैचारिक या आर्थिक रूप से कभी दरिद्र नहीं हो सकता। वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत थी।

भारत के विशद् अध्‍ययन से यह भी ध्‍यान आता है कि भारत अपनी भौगोलिक और सांस्कृतिक विरासत के कारण हमेशा से आत्मनिर्भर और अत्यंत समृद्ध था। यहाँ की गरीबी कोई प्राकृतिक आपदा या भारतीयों की अकर्मण्यता का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश साम्राज्य की सोची-समझी आर्थिक नीतियों और लूट का नतीजा थी।

वैश्विक जीडीपी में भारत का दबदबा

यदि हम जेमा फेरर के इस कथन को शोध की कसौटी पर कसें, तो हमें प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार प्रोफेसर एंगस मैडिसन के आंकड़ों को देखना होगा। मैडिसन ने ‘ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट’ (ओईसीडी) के लिए किए गए अपने व्यापक शोध में साबित किया कि ईसा मसीह के जन्म (1 एडी) से लेकर साल 1700 तक, यानी लगभग सत्रह सदियों तक, दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था (वैश्‍विक जीडीपी) में अकेले भारत की हिस्सेदारी 25 फीसद से 33 प्रतिशत के बीच हुआ करती थी।

इसका सीधा मतलब यह है कि उस दौर में दुनिया का हर तीसरा या चौथा रुपया भारत में बनता था। भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ ही विश्‍व का सबसे बड़ा औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र था। भारत के सूती वस्त्र, रेशम, मसाले, जहाज निर्माण उद्योग और हस्तशिल्प की मांग पूरे यूरोप, मध्य पूर्व और एशिया में थी। जब ब्रिटेन के लोग बुनियादी नागरिक जीवन शैली सीख रहे थे, तब भारत के ढाका, मलमल और सूरत के व्यापारी वैश्विक व्यापार को नियंत्रित करते थे।

ईस्ट इंडिया कंपनी: सभ्यता का प्रसारक नहीं, एक लुटेरा कॉर्पोरेशन

ब्रिटिश इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने अपनी पुस्तक ‘द अनार्की’ में बहुत स्पष्ट रूप से लिखा है कि ईस्ट इंडिया कंपनी कोई ऐसी संस्था नहीं थी जो भारत में सभ्यता या लोकतंत्र का प्रसार करने आई थी। यह दुनिया के इतिहास का सबसे क्रूर और लालची कॉर्पोरेट घराना था, जिसका एकमात्र उद्देश्य था, मुनाफा कमाना और संसाधनों को सोखना। 1757 में प्लासी के युद्ध और 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद जब अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और ओडिशा की ‘दीवानी’ (टैक्स वसूलने का अधिकार) मिली, तो उन्होंने भारत के आर्थिक शोषण का एक नया अध्याय शुरू किया। अंग्रेजों ने भारत के पारंपरिक व्यापारियों और कारीगरों को पूरी तरह से तबाह कर दिया। बंगाल, जोकि कभी दुनिया का सबसे अमीर प्रांत माना जाता था, उसे चंद दशकों के भीतर ही ईस्ट इंडिया कंपनी ने कंगाल बना दिया।

धन का निष्कासन सिद्धांत (ड्रेन ऑफ वेल्थ): कैसे खोखली हुई सोने की चिड़िया

भारत को गरीब बनाने की इस प्रक्रिया को सबसे पहले भारत के ‘ग्रैंड ओल्ड मैन’ दादाभाई नौरोजी ने 1901 में अपनी पुस्तक ‘पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में ‘ड्रेन ऑफ वेल्थ’ (धन के निष्कासन का सिद्धांत) के नाम से दुनिया के सामने रखा था। नौरोजी ने गणितीय आंकड़ों से यह दिखाया कि कैसे भारत का पैसा एकतरफा बहकर ब्रिटेन जा रहा था, जिसके बदले में भारत को कुछ भी हासिल नहीं हो रहा था।

इस धन के निष्कासन के कई माध्यम थे। भारतीय करदाताओं के पैसे से ब्रिटिश अधिकारियों को भारी-भरकम वेतन और पेंशन दी जाती थी। ब्रिटेन द्वारा दुनिया भर में लड़े जाने वाले युद्धों का खर्च भी भारतीय राजस्व से ही निकाला जाता था। यहाँ तक कि भारत से कच्चा माल औने-पौने दामों पर खरीदा जाता था और उसे ब्रिटेन भेजकर वहाँ के कारखानों में तैयार माल वापस भारत में ऊंचे दामों पर बेचा जाता था। इस तरह भारत को एक विनिर्माता देश (मैन्युफैक्चरिंग हब) से बदलकर महज एक उपभोक्ता और कच्चे माल का सप्लायर बना दिया गया।

45 ट्रिलियन डॉलर की ऐतिहासिक लूट

जेमा फेरर ने जिस सच की ओर इशारा किया है, उसकी पुष्टि आधुनिक काल में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर उत्सा पटनायक के शोध से होती है। पटनायक ने लगभग दो सदियों के टैक्स और व्यापारिक आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि 1765 से लेकर 1938 के बीच ब्रिटेन ने भारत से लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर (आज के हिसाब से लगभग 3,000 लाख करोड़ रुपये से अधिक) की संपत्ति लूटी। यह राशि इतनी बड़ी है कि आज के यूनाइटेड किंगडम (यूके) की कुल सालाना अर्थव्यवस्था से भी कई गुना अधिक है।

वस्‍तुत: इस शोध का समर्थन करने वाले ब्रिटिश-आर्थिक मानवविज्ञानी जेसन हिकेल ने साफ लिखा है कि पश्चिमी देशों में जो औद्योगिक क्रांति हुई और आज यूरोप में जो भव्य इमारतें, बैंक और आधुनिक बुनियादी ढांचा दिखाई देता है, उसकी नींव भारत जैसी औपनिवेशिक अर्थव्यवस्थाओं के खून और पसीने से सींची गई थी। ब्रिटेन अमीर इसलिए बना है, क्योंकि वह तकनीक से अधिक भारत को बेरहमी लूटने में आगे रहा।

भारतीय उद्योगों का व्यवस्थित विनाश (डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन)

आर.सी. दत्त ने अपनी पुस्तक ‘द इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में विस्तार से बताया है कि अंग्रेजों ने किस प्रकार भारतीय वस्त्र उद्योग को नष्ट किया। एक समय था जब भारतीय सूती कपड़ा पूरी दुनिया पर राज करता था। ब्रिटेन के कारखानों को बढ़ावा देने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारतीय कपड़ों पर 70 से 80 प्रतिशत तक का आयात शुल्क (इम्‍पोर्ट ड्यूटी) लगा दिया, जबकि ब्रिटेन से भारत आने वाले कपड़ों पर टैक्स लगभग शून्य कर दिया गया।

ऐसे में स्‍वभाविक है इसके कारण भारत के लाखों बुनकर, कतकार और कारीगर बेरोजगार हो गए। जो शहर कभी व्यापार के केंद्र हुआ करते थे, वे वीरान हो गए। भारत की आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया गया। लोगों के पास खेती के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा, जिससे जमीन पर दबाव बढ़ा और देश में बड़े पैमाने पर गरीबी फैल गई।

मानव-निर्मित अकाल और क्रूर नीतियां

भारत को गरीब बनाने की प्रक्रिया आर्थिक नुकसान के साथ ही उन लाखों भारतीयों की जान की कीमत पर की गई थी, जिन्‍हें बिना कारण के अपनी जान गंवाना पड़ी, तत्‍कालीन समय में लाखों परिवार अस्‍त-व्‍यस्‍त हुए। अमेरिकी इतिहासकार माइक डेविस ने अपनी पुस्तक ‘लेट विक्टोरियन होलोकॉस्ट्स’ में उन अकालों का वर्णन किया है जोकि ब्रिटिश काल में भारत में पड़े थे। 1770 के बंगाल के अकाल से लेकर 1943 के कुख्यात बंगाल अकाल तक, करोड़ों भारतीय भूख से तड़प-तड़प कर मर गए।

जनम मुखर्जी ने अपनी पुस्तक ‘हंग्री बंगाल’ में प्रमाणित किया है कि 1943 का अकाल कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की सोची-समझी क्रूर नीति का परिणाम थी। जब बंगाल में लोग भूख से दम तोड़ रहे थे, तब भारत के अनाज भंडार को यूरोप में लड़ रहे ब्रिटिश सैनिकों के लिए आरक्षित कर दिया गया था और गोदामों में अनाज सड़ रहा था। जब चर्चिल को इस स्थिति के बारे में बताया गया, तो उनका क्रूर जवाब था, “यदि अनाज की कमी है, तो महात्मा गांधी अभी तक मरे क्यों नहीं?” यह क्रूरता दर्शाती है कि औपनिवेशिक शासकों के लिए भारतीय जीवन का कोई मूल्य नहीं था, उनका एकमात्र लक्ष्य भारत का आर्थिक दोहन था।

इसी प्रकार कुछ विद्वानों का निष्‍कर्ष है कि जब अंग्रेज भारत आए थे, तब दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत का हिस्सा 23 फीसद से अधिक था, लेकिन जब 1947 में वे भारत छोड़कर गए, तो उन्होंने भारत को सिर्फ 3 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ एक अत्यंत गरीब और अशिक्षित राष्ट्र बनाकर छोड़ दिया। अंग्रेजों ने भारत के शिक्षा तंत्र को भी नष्ट किया। औपनिवेशिक काल से पहले भारत में स्वदेशी पाठशालाओं का एक मजबूत जाल था, लेकिन अंग्रेजों के जाने तक भारत की साक्षरता दर गिरकर महज 16 फीसद रह गई थी।

जेमा फेरर के बयान का वैश्विक निहितार्थ

कुल मिलाकर यदि न्यूयॉर्क की कलाकार जेमा फेरर के विचारों को निष्‍कर्ष के रूप में कहना पड़े तो इस संदर्भ में यही कहा जाएगा कि ज्‍यादातर इतिहास की किताबों में पश्चिमी इतिहासकारों ने भले ही अपनी लूट को ‘सभ्यता के विकास’ के आवरण में लपेट कर पेश किया हो, किंतु सच को लम्‍बे समय तक दबाया नहीं जा सकता और न ही छुपाया जा सकता है। आज की जागरूक और स्वतंत्र दुनिया इस सच को पहचान रही है। भारत कभी स्वाभाविक रूप से गरीब नहीं था, उसकी गरीबी औपनिवेशिक शोषण, क्रूर कर नीतियों, उद्योगों के विनाश और संसाधनों की खुली लूट का परिणाम थी।

अच्‍छा है, आज जब भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और तेजी से तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, तब जेमा फेरर जैसे विदेशी नागरिकों के मुंह से यह सच निकलना इस बात का प्रतीक है कि दुनिया अब भारत के वास्तविक इतिहास और उसकी सामर्थ्य को स्वीकार कर रही है। वस्‍तुत: सच यही है कि भारत का अतीत स्वर्णिम था, उसका वर्तमान संघर्षपूर्ण रहा, किंतु उसका भविष्य एक बार फिर अपनी उसी खोई हुई समृद्धि को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आज का भारत वैश्विक पटल पर पुनः अपनी पहचान स्थापित कर रहा है।

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