भारत टॉप 10 शिक्षण संस्थानों में शामिल गलगोटिया

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सर्जना शर्मा

दिल्ली। गलगोटिया युनिवर्सिटी और बाकी प्राईवेट शिक्षा संस्थानों कोचिंग सेंटरों का भ्रमजाल हमारी शिक्षा प्रणाली में दीमक हैं जो युवा पीढी के भविष्य के साथ खिलवाड कर रहे हैं। इनके फलने फूलने में राज्य सरकारों , केंद्र सरकार ( चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल की हो) राजनेताओंऔर मीडिया की अहम भूमिका है। जी हां जबरदस्त नेक्सस है इनका मैं ये दावे के साथ इसलिए कह सकती हूं कि हमारा परिवार भुगत भोगी है। सबसे पहले तो दौलतमंद लोग अपने रसूख के बल पर राज्य सरकारों से जमीन ले लेते हैं । फिर सरकारी तंत्र में पैठ बना कर मान्यता प्राप्त कर लेते हैं और ग्रांट ले लेते हैं। गलगोटिया का तो झूठ ही पकड़ा गया अभी पिछले साल अल फलाह युनिवर्सिटी कैसे फली फूली ऐन केंद्र की नाक के नीचे कैसे आंतकवाद को पनाह दी ये तो सब जानते ही हैं।

दुख इस बात का है कि गलगोटिया का भंडाफोड गलत समय पर हुआ । जब भारत एआई पर अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन कर रहा है तब इसके झूठ ने भारत का अपमान करवा दिया। सरकार ने तुंरत एक्शन लिया लेकिन विरोधियो को बोलने का मौका मिला।
सबसे पहले दोषी है मीडिया हाऊस जो इनको झूठी रैंकिग देते हैं देश का एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान जो पत्रिका , न्यूज चैनल डिजिटल सब चलाता है वो अपनी अंग्रेंजी और हिंदी दोनों पत्रिकाओं में हर साल शिक्षा संस्थानों को रैंकिग देता है गलगोटिया उनकी रैंकिंग में हमेशा पहले दस में उपर रहती है। सारा खेल पैसे और विज्ञापन का है मीडिया को विज्ञापन मिल रहा है तो कमियां क्यों बताएगा गुणगान ही करेगा वो भी सरासर झूठ । और सबसे बड़ी बात है केंद्रीय मंत्री मुख्यमंत्री इनके कनोवोकेशन में भी जाते हैं बिना ये पता लगाए कि कौन सा संस्थान क्या कर रहा है।

बहुत साल बाद मैं अपना अनुभव साझा करना चाहती हूं सच पूछिए आज तो AI समिट 2026 में गलगोटिया के पाप का घड़ा फूटा है जो कि सरकारी तंत्र की सजगता की कमी शिक्षा मंत्रालय की लापरवाही और मीडिया के पैसे के लालच के कारण भरता रहा। गलगोटिया युनिवर्सिटी में मेरे भांजे का दाखिला हमने प्रतिष्ठित मीडिया हाऊस की पत्रिका की रैंकिग पर भरोसा करके करवाया था। लेकिन वहां की बदहाली के किस्से ऐसे हैं कि आप यकीन नहीं कर सकते केवल वहीं करेंगे जो भुगत भोगी है। निर्माणाधीन इमारत में छात्रों को आवास देना डबल बेड रूम की फीस लेकर रूम में तीसरा बेड लगा देना। खाना तो ऐसा की मुंह में न जाए। अब कोई पूछे कि जो ह़ॉस्टल अभी बना ही नहीं वहां छात्रों को रूकवाने का खतरा मोल कैसे लिया। लेकिन शिक्षा विभाग का कोई अफसर देख कर भी अनदेखा कर देगा जब तक अपना हित सध रहा है कायदे कानून जाएं भाड़ में। ये शिक्षा संस्थान केवल बच्चों के साथ अन्याय करते हैं ऐसा नहीं अपनी फैकल्टी को तीन तीन महीने वेतन नहीं देते। कितनी बार गलगोतिया के अध्यपाकों से मेरी बात हुई मात्र 40 हजार वेतन और वो भी तीन तीन महीने बाद।

खैर पढाई न लिखाई फीस मोटी सिक्योरिटी मोटी ले कर रखते हैं। हमारा बच्चा घटिया खाना . कमरे में मच्छरों का धावा आदि के कारण वहां ज्यादा दिन नहीं रह पाया। अब सिक्योरिटी का एक लाख रूपया जब 6 महीने तक नहीं आया तो हमने तकाजा शुरू किया। गलगोतिया का एक कैंपस नोएडा के नॉलेज पार्क में भी है। युनिवर्सिटी जेवर के पास है उन्होंने कहा हमारा सीएफओ ऩॉलेज पार्क कैंपस में बैठता है आप वहां जाएं। मैं वहां गयी सीएफओ साहब के स्टॉफ ने उनसे मिलने नहीं दिया कोई सरदार जी थे । खैर मैं फोन नंबर ले कर आ गयी। आप हज़ार फोन कर लो क्या मजाल कोई फोन उठा ले। मैनें लगातार चक्कर काटे उन दिनों हम दिल्ली कैंट रहते थे 60 किलोमीटर आना 60 किलोमीटर जाना होता था। जहां उनका कांऊटर है वहां बहुत सारे गरीब माता पिता से मुलाकात होती थी जिन्होंने अपनी जमीन बेच कर अपने बच्चों का दाखिला करवाया था । लेकिन उनकी सिक्योरिटी वापस करने का नाम नहीं । मैनें कई माता पिता को वहां रोते देखा हाथ पैर जोड़ते देखा इनका कलेजा कभी नहीं पिघलता। एक दिन मैं गयी तो सीएफओ के ऑफिस में घुस गयी , स्टॉफ अंदर न जाने दे । सरदार जी अंदर कमरे में थे मेरे पास कोई चारा नहीं था मैं जोर जोर से चिल्लाने लगी और कहा आज मैं मिल कर ही जाऊंगी। तब सरदार जी ने मुझे पहली बार अपने कमरे में बुलाया। मैनें अपनी बात रखी उन्होंने एक समय सीमा दी। समय सीमा पार हो गयी महीनों तक कोई खबर नहीं फिर मैं गयी लारे लप्पे चलते रहे। पैसा वापस देने का नाम नहीं सरदार जी उल्टे मुझे समझाएं कि वो किसी से डरते नहीं वो पार्लियामेंट स्ट्रीट के पंजाब एंड सिंध बैंक के मैनेजर रहे हैं उन्होंने कभी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजेपयी की भी नहीं सुनी। मुझे क्या फर्क पड़ना था।

अब मैनें अपने बहुत सारे पत्रकार मित्रों से बात की सबने हाथ खड़े कर दिए कहा कि गलगोटिया मोटे विज्ञापन देता है हमारे यहां उनके खिलाफ न छपेगा न न्यूज चैनल में रिपोर्ट चलेगी। एक साधारण नागरिक के लिए भारत में जीवन बहुत मुश्किल है ये सिस्टम उसी का है जो रसूखदार है ताकतवर है पैसे वाला है। मैने अपना संघर्ष जारी रखा । हिम्मत नहीं हारी आखिरकार मुझे दो साल के बाद सफलता मिली लेकिन देखिए यहां भी एक लाख में से 15000 रूपए काट कर 85000 रूपए का चैक दिया।

गलगोटिया अकेला उच्च शिक्षा संस्थान नहीं है जहां झूठ की बुनियाद पर शिक्षा के मंदिर खडे हैं। आज मेरे दिल को बहुत तसल्ली मिली कि देर से ही सही पाप का घडा फूटा तो सही । वैसे तो इसके मालिक की पत्नी और बेटा किसी मामले में जेल भी जा चुके हैं । सवाल तो ये हैं कि ये संस्थान फलते फूलते कैसे हैं क्या मानको की जांच करने वाले शिक्षा विभाग के अधिकारी अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं। (फेसबुक से साभार)

हिंदू समाज को संगठित औऱ सशक्त होने की आवश्यकता : सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत डॉ. अतुल मोहन

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लखनऊ। हिंदू समाज को संगठित औऱ सशक्त होने की आवश्यकता है। हमको किसी से खतरा नहीं है, लेकिन सावधान रहना है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत ने लखनऊ के निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में सामाजिक सद्भाव बैठक में बोलते हुए कही। हिंदुओं की घटती जनसंख्या पर चिंता जताते हुए उन्होंने लालच और जबरदस्ती हो रहे मतांतरण पर रोक लगाने की बात कही। उन्होंने कहा कि घर वापसी का काम तेज होना चाहिए। जो लोग हिंदू धर्म में लौटें, उनका ध्यान भी हमें रखना होगा। बढ़ती घुसपैठ पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि घुसपैठियों को डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट करना होगा। उन्हें रोजगार नहीं देना है। उन्होंने कहा कि हिंदुओं के कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए। वैज्ञानिकों के हवाले से उन्होंने कहा कि जिस समाज में औसतन तीन से कम बच्चे होते हैं, वह समाज भविष्य में समाप्त हो जाता है। यह बात हमारे परिवारों में नव दंपतियों को बताई जानी चाहिए। डॉ. भागवत ने कहा कि विवाह का उद्देश्य सृष्टि आगे चले, यह होना चाहिए, वासना पूर्ति नहीं। इसी भावना से कर्तव्य बोध आता है।

सद्भाव बढ़ाने की जरूरत : उन्होंने कहा कि सद्भाव ना रहने से भेदभाव होता है। हम सभी एक देश, एक मातृभूमि के पुत्र हैं। मनुष्य होने के नाते हम सब एक हैं। एक समय भेद नहीं था, लेकिन समय चक्र के चलते भेदभाव की आदत पड़ गई है, जिसे दूर करना होगा। उन्होंने कहा कि सनातन विचारधारा सद्भाव की विचारधारा है। जो विरोधी हैं, उन्हें मिटाना है, ऐसा हम नहीं मानते। एक ही सत्य सर्वत्र है। इस दर्शन को समझ कर आचरण में लाने से भेदभाव समाप्त होगा।

मातृशक्ति परिवार का आधार : सरसंघचालक ने कहा कि घर-परिवार का आधार मातृशक्ति है। हमारी परंपरा में कमाई का अधिकार पुरुषों को था, लेकिन खर्च कैसे हो, यह मातायें तय करती थी। मातृशक्ति विवाह के बाद दूसरे घर में आकर सभी को अपना बना लेती है। महिला को हमें अबला नहीं मानना है, वह असुर मर्दिनी है। हमने स्त्री की, प्रकृति की जो कल्पना की, वह बलशाली है। महिलाओं को आत्म संरक्षण का प्रशिक्षण होना चाहिए। पश्चिम में महिलाओं का स्तर पत्नी से है, हमारे यहां उन्हें माता माना जाता है। उनका सौंदर्य नहीं, वात्सल्य देखा जाता है।

कानून सभी को मानना है : यूजीसी गाइडलाइन को लेकर किए गए एक प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक ने कहा कि कानून सभी को मानना चाहिए। यदि कानून गलत है तो बदलने का उपाय भी हैं। जातियां झगड़े का कारण नहीं बनना चाहिए। समाज में अपनेपन का भाव होगा तो इस तरह की समस्या नहीं होगी। जो नीचे गिरे हैं, उन्हें झुक कर ऊपर उठाना पड़ेगा। सभी अपने हैं, यह भाव मन में होना चाहिए। संघर्ष से नहीं, समन्वय से दुनिया आगे बढ़ती है। एक को दबाकर दूसरे को खड़ा करने का भाव नहीं होना चाहिए।

विश्व का मार्गदर्शन करेगा भारत : डॉ.भागवत ने कहा कि भारत निकट भविष्य में विश्व को मार्गदर्शन देगा। विश्व की अनेक समस्याओं का समाधान भारत के पास ही है।

नियमित हों समाजिक सद्भाव की बैठकें : डॉ. भागवत ने समाज की सज्जन शक्ति का आह्वान करते हुए कहा कि बस्ती स्तर पर सामाजिक सद्भाव से जुड़ी बैठकें नियमित होनी चाहिए। हम आपस में मिलेंगे तो गलतफहमियां दूर होंगी। इस प्रकार की बैठकों में रूढ़ियों से मुक्त होने पर चर्चा होनी चाहिए। जो समस्याएं सामने आएं, उनको दूर करने का प्रयास होना चाहिए। जो दुर्बल है, उनकी सहायता करना चाहिए।

विदेशी शक्तियों के प्रति चेताया : उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन जैसे देशों में बैठे कुछ लोग हमारी सद्भावना के विरुद्ध योजना बना रहे हैं। इससे हमें सावधान रहना होगा। एक दूसरे के प्रति अविश्वास समाप्त करना होगा। एक दूसरे के दुख दर्द में शामिल होना होगा।

सम्मलित हुए विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि : कार्यक्रम में सिक्ख, बौद्ध, जैन समाज के साथ ही रामकृष्ण मिशन, इस्कॉन, जय गुरुदेव आश्रम, शिव शांति आश्रम, आर्ट ऑफ लिविंग, संत निरंकारी आश्रम, संत कृपाल आश्रम, कबीर मिशन, गोरक्षा पीठ, आर्य समाज, संत रविदास पीठ, दिव्यानंद आश्रम, ब्रह्म विद्या निकेतन, सहित विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए।

सरकारी नौकरी का इतना हौवा ठीक नहीं

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राजीव मिश्रा

दुनिया में क्या हो रहा है यह समझना है तो पहली शर्त है कि देखें कि मेरी अपनी जिंदगी में क्या हो रहा है? 

मैं स्वयं मंडल कमीशन से पहले की पीढ़ी हूँ. लेकिन फर्स्ट ईयर में था तभी मंडल कमीशन आया था. तब मैं बेहद उत्तेजित हुआ था और उस आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया था. मैं और मेरे बड़े भैया सारे दिन लोगों को इकट्ठा करते थे, दीवारों पर पोस्टर लगाते थे और नारे लिखते थे, पेटीशन लिख कर, साइन करवा कर भेजते थे, जुलूस ऑर्गनाइज करते थे, ट्रेन रोकते थे. जेल जाने जाने की नौबत आ गई थी. दुर्गा पूजा के पंडाल में हमने अपने विरोध प्रदर्शन के लिए स्टॉल लगा दिया और आंदोलन के लिए फंड जुटाने के लिए जूते पॉलिश किए.

उस समय मुझे लगता था कि मंडल कमीशन लग गया तो मेरी दुनिया खत्म हो जाएगी, अनर्थ हो जाएगा, जीवन असम्भव हो जाएगा. और यह बात कुछ हद तक सही भी हुई होती अगर इसके बाद नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री नहीं बने होते.

लेकिन मैं अपनी पीढ़ी में अपने भाइयों बहनों, कजिन्स में भी लगभग सबसे छोटा हूँ. मेरे सारे बड़े भाई मंडल कमीशन से पहले के हैं. हमने मंडल के पहले की दुनिया देखी है, जब उस पीढ़ी के ज्यादातर युवाओं का जीवन नौकरी खोजते, एम्प्लॉयमेंट न्यूज पढ़ते, फॉर्म भरते, एग्जाम देते बीत जाता था. सारी नौकरियां सिर्फ सरकारी थीं, और लोग एज निकलने तक एग्जाम देते रहते थे. किसी की बैंक, LIC, रेलवे और एसएससी में नौकरी लगी है तो उसका जीवन धन्य हो जाता था. पूरे देश की सारी एम्प्लॉयमेंट ऑपर्च्युनिटी एक सोलह पन्ने के साप्ताहिक अखबार में सिमटी होती थी. औसत चार छह साल की बेरोजगारी रूल था. बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग में एडमिशन तो स्वर्ग का द्वार लगता था.

आज अगली पीढ़ी में मेरे परिवार में सारे बच्चे टेक्निकल कॉलेजों में एडमिशन ले रहे हैं, इंजीनियरिंग, लॉ, अकाउंटेंसी से लेकर क्या क्या नहीं पढ़ रहे. एक भी बच्चा कहीं थोड़े दिन भी बेरोजगार नहीं बैठा है. मैं अपने खानदान में सरकारी नौकरी करने वाला आखिरी और छोड़ने वाला पहला व्यक्ति हूँ. मेरे बाद किसी ने सरकारी नौकरी का फॉर्म तक नहीं भरा.

आज यूजीसी के विवाद को यूजीसी से निकाल कर रिजर्वेशन की ओर मोड़ दिया गया है. इसे यूजीसी तक सीमित रहने दिया जाता तो बात खत्म हो जानी थी. लेकिन लोगों की भावनाएं उसी दिशा में हैं जिस दिशा में मेरी 1990 में थीं. यह भावना भड़काई जा रही है जैसे संसार नष्ट हो जाएगा.. हम बर्बाद हो जाएंगे. समस्या के डिस्प्रोपोर्शनेट प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं. पर्सपेक्टिव ही समाप्त हो गया है.

मेरा अगली पीढ़ी से सिर्फ यह कहना है – अपनी लड़ाइयां सावधानी से चुनो. जैसे तुम रिजर्वेशन को लेकर भावनात्मक हो रहे हो, उधर भी कोई और इसे अपने अस्तित्व का प्रश्न माने बैठा है. लेकिन दुनिया जीरो-सम-गेम नहीं है. एक को मिलेगा तो वह दूसरे से छीन कर ही मिलेगा ऐसा नहीं है.

तुम्हारी समस्या का हल इस रिजर्वेशन से लड़ना नहीं है. तुम्हारी समस्या का हल आर्थिक प्रगति है, कैपिटलिज्म है, प्रोडक्शन है, फ्री मार्केट है. फ्री मार्केट एक अद्भुत अलादीन का चिराग है. यह इतना दे सकता है कि सबको पहले से अधिक मिल जाएगा. तुम अपनी दृष्टि इस अलादीन के चिराग पर केंद्रित करो. तुम फ्री मार्केट को बचाओ. तुम ऐसी सरकार चुनो जो फ्री मार्केट के लिए अधिक उपयुक्त हो. सरकारों से मांगना है तो तुम यह मांगो कि वह मार्केट को फ्री छोड़ दे.

रिजर्वेशन, और विक्टिमहुड नैरेटिव समाजवाद की बीमारियां हैं जहां संसाधन सीमित माने जाते हैं, जहां एक की प्रगति दूसरे के कॉस्ट पर हुई समझी जाती है, जहां असमानता का अर्थ भेदभाव और अन्याय समझा जाता है… इस बीमारी को पिछली पीढ़ी की बीमारी समझ कर इससे बाहर निकलो. रिजर्वेशन और इक्विटी के कीड़े सिर्फ पॉवर और वर्चस्व के रोग हैं. तुम्हारा उद्देश्य पॉवर और वर्चस्व नहीं, प्रॉस्पेरिटी है. और प्रॉस्पेरिटी सबको मिल सकती है. बस, मांगना सही चीज है.

Star Voices, Folk Performances and Multilingual Performances Steal the Spotlight at the 25th Bharat Rang Mahotsav

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Delhi: The 25th Bharat Rang Mahotsav (BRM) 2026, the world’s largest international theatre festival organised by the National School of Drama (NSD), witnessed a vibrant day filled with programmes for audiences as well as aspiring and budding theatre practitioners. The festival highlights included highly engaging talk shows with NSD alumni and noted film personalities such as Tigmanshu Dhulia and Pankaj Tripathi, along with wonderful performances by children, young students, and established theatre groups.

The day began with an insightful session by actor Pankaj Tripathi, who spoke candidly about his life, sharing how his experiences shaped him as an artist. He narrated engaging anecdotes and reflected on the constant support of his life partner, whom he described as an inseparable part of his journey and success.

Similarly, Tigmanshu Dhulia offered a glimpse into his creative evolution—from his involvement as a casting professional in Bandit Queen to his long association with the late actor Irrfan Khan. Fondly remembering their bond, Dhulia said that Irrfan was not only a remarkable actor but also a deeply creative individual who approached scripts with a holistic understanding that went far beyond his own lines.

The day also witnessed the graceful conclusion of Baal Sangam, a programme dedicated to folk performances by children from diverse states including Rajasthan, Gujarat, Odisha, Assam, Nagaland and Tripura, among others. The ceremony was graced by Shri Rajiv Velicheti, theatre academic and Associate Professor at the University of Hyderabad; Shri Marto Bagra, Assistant Resident Commissioner representing the State of Arunachal Pradesh; and Vaishali Singh, IAS (2019 batch), Administrator of HSVP, Gurugram.

The festival featured WYSIWYG, written and directed by Teertha Bhatt and performed by Pitara from Ahmedabad, Gujarat, in English, setting a witty and imaginative tone for young audiences.
This was followed by Sojan Badiar Ghat, written and directed by Goutam Halder with verses by Jasim Uddin and presented by Naye Natua from Kolkata, West Bengal, in Bengali.

The day further elevated with the visually rich Karna No Vesh – Bhavai, directed by P. S. Chari and performed by Triveni from Vadodara, Gujarat, in Hindi, celebrating the compelling vibrancy of traditional storytelling.

Also featured was Manduka Upakhyana, written by Ramesh Prasad Panigrahi and directed by Dolgovind Rath, presented by the RANGADHAARAAA Academy of Theatre Art & Repertoire from Odisha in Odia.
The energy continued with La Ilaaj, directed by Faiz Mohammed Khan and staged by Roopkatha Rangmanch from Mumbai in Hindi.

A special non-ticketed presentation, Veer Abhimanyu, directed by Hema Singh, showcased a spirited first-year Parsi demo by students.

Another highlight of the evening was a multimedia theatrical dance production, Sarees of India (Textile), written and directed by Jayalakshmi Eshwar and performed by the Abhinaya Group from Delhi in English, offering a visually captivating narrative of textile heritage.

The festival also hosted the internationally collaborative production Life Is a Dream, written by Pedro Calderón de la Barca and directed by Ignacio Garcia, presented by the Monica De La Fuente Company with artists from Spain, performed in Spanish, Hindi, and Malayalam.

On the sidelines of various insightful and entertaining activities during BRM 2026, NSD also commenced its Theatre Appreciation Course — a week-long learning journey designed to introduce participants to the essential elements of theatre. Through expert-led sessions, discussions on performance, design, music, and direction, along with curated screenings of significant plays, the course offered a rich and engaging experience for anyone seeking a deeper understanding of the art form.

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