राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बंगाल चुनाव

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इंदुशेखर तत्पुरुष

दिल्ली । कल कार्ल मार्क्स का जन्मदिवस था। और इधर भारत में उनसे प्रेरित राजनैतिक दल का बोरिया–बिस्तर एकमात्र बचे हुए प्रांत से भी उठ गया।

दूसरी ओर भारत के सभी राजनैतिक दल (भाजपा को छोड़कर) जिस सामाजिक संगठन आरएसएस का विरोध करते रहे हैं, या कभी न कभी उसके विरुद्ध खड़े हुए, वह आज देशभर में अपना जन्म शताब्दी वर्ष मना रहा है। उसकी प्रेरणा से राजनीति में खड़े हुए दल भाजपा ने देश के कोने–कोने में अपनी पैठ बनाई है। बंगाल विजय तो कल का ही उदाहरण है।

इसकी वास्तविकता को जानने के लिए हमें एक सदी पूर्व के भारत में जाना होगा।

सन् 1925 में भारत में दो संगठनों की नींव रखी गई। एक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसका आरम्भ एक मेडिकल शिक्षा प्राप्त किये युवक ने नागपुर में 15–20 स्थानीय साथियों को लेकर किया। दूसरा संगठन संसारभर में विख्यात हो चुकी कम्युनिस्ट पार्टी का था, जिसका गठन कानपुर में देश के विभिन्न प्रांतों से एकत्र हुए सैकड़ों प्रबुद्ध लोगों ने किया। पार्टी के प्रेरणापुंज कार्ल मार्क्स की गणना विश्व के महानतम विचारकों में होती थी। सन् 1917 की रूस की क्रांति की कीर्ति के कारण कम्यूनिस्ट पार्टी आरंभ में ही देशभर में चर्चित हो गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तो रूस, चीन जैसी अंतरराष्ट्रीय महाशक्तियों का समर्थन भी उन्हें मिलने लगा था। देश के सभी प्रमुख संस्थानों पर साम्यवाद और समाजवाद की गहरी छाप थी। जबकि संघ को आरंभिक वर्षों में नागपुर से बाहर कोई नहीं जानता था। देश स्वाधीन होते ही उस पर न केवल प्रतिबंध लगा, सरकारों द्वारा संघ के कार्यकर्ताओं को निराधार लांछित और प्रताड़ित भी किया गया। आगे फिर प्रतिबंध लगाया गया। सबकी उपेक्षा, उपहास और तिरस्कार झेलते हुए भी संघ चुपचाप अपना कार्य करता रहा।

आज एक शताब्दी बाद हम देखते हैं कि सारी दुनिया को बदलने का दावा करने वाले, देश में क्रांति करके सत्ता प्राप्ति का स्वप्न देखने वाले कम्युनिस्ट एक कोने में सिमटकर रह गए। जबकि आज देश का ऐसा कोई कोना नहीं, जहां संघ का वर्चस्व नहीं, संघ की उपस्थिति नहीं।

विचारणीय प्रश्न है कि यह जमीन–आसमान का अंतर कैसे संभव हुआ? संघ के निरंतर उत्कर्ष और उसके समान्तर कम्युनिज्म के निरंतर अपकर्ष के मूलभूत कारण क्या रहे? इस पर गहरा मंथन करना चाहिए।

वास्तव में किसी भी संगठन की ऐसी असाधारण उपलब्धि कार्यकर्ताओं की निस्वार्थ कर्मनिष्ठा, समर्पण और त्याग के बिना संभव नहीं। यह सभागारों और विश्वविद्यालयों में बैठकर सिद्धांत बघारने से नहीं समाज में प्रत्यक्ष काम करने से हासिल होती है। कोरी बौद्धिकता झाड़ने से वैचारिक हलचल तो हो सकती है, किन्तु व्यक्ति का मन नहीं जुड़ता। वह जुड़ता है उनके बीच जाकर प्रत्यक्ष कार्य करने से, प्रेमपूर्ण व्यवहार से। व्यक्तियों के संगठन आंदोलकारी नारों से नहीं, नियमित संपर्क और सेवा कार्यों से निर्मित होते हैं।
मत भूलिए कि संघ ही एकमात्र ऐसा संगठन है जहाँ हजारों उच्च शिक्षा प्राप्त नवयुवक अपने सुखमय जीवन को ठोकर मारकर संघ के प्रचारक बन गए। आजीवन अविवाहित रहने का भीष्म संकल्प उन्होंने इसलिए लिया कि उनके जीवन का एकमात्र ध्येय संघ कार्य करना था। लाखों गृहस्थ प्रतिदिन कुछ न कुछ समय संगठन के लिए निकालते हैं।

इसलिए संघ सैद्धांतिक तर्क–वितर्क एवं शास्त्रार्थ के पचड़े में नहीं पड़ा। बनावटी बौद्धिक वातावरण बनाने में शक्ति खर्च नहीं करता। दिखावटी प्रचार के फंदे में नहीं फँसता। उसका स्पष्ट ध्येय है व्यक्ति को संस्कारित करना, समाज में सज्जनों की संगठित शक्ति खड़ा करना और समाज के बीच में प्रत्यक्ष उपस्थित होकर क्षमता अनुसार कार्य करना। उसके असधारण कार्यविस्तार एवं व्यापक जनस्वीकृति का यही एकमात्र आधार था।
इतिहास साक्षी है कि जिन्होंने तथाकथित वैचारिक क्रांतिकारी पैदा किए वे आपस में ही मार–काट में लग गए। सत्ता प्रतिस्पर्धा में पड़ गए। स्वयं को प्रतिष्ठापित करने में ही उनकी शक्ति चुक गई। किन्तु संघ ने व्यक्ति निर्माण की पाठशालाएं चलाई। व्यक्तियों को गढ़ने और जोड़ने की वे छोटी–छोटी पाठशालाएं आज विश्व का व्यक्ति निर्माण का सबसे बड़ा विश्विद्यालय बन गया।

ध्यान रखिए संघ हिन्दू संगठन है किन्तु संघ का कार्य केवल हिंदुओं के लिए नहीं संपूर्ण समाज के अभ्युदय के लिए है। समाज का अभ्युदय राष्ट्र के अभ्युदय के लिए है। और राष्ट्र का अभ्युदय केवल भारतवर्ष के लिए नहीं संपूर्ण विश्व के अभ्युदय के लिए है। पर यह तभी दिखाई देगा जब आप अपना राजनैतिक चश्मा उतारकर देखेंगे। भाजपा के चश्मे से देखेंगे तो भी नहीं दिखेगा। अपने व्यक्तिगत अथवा समूहगत लाभ–लोभ से ऊपर उठकर देखेंगे तभी दिखेगा।

भाजपा की बंगाल विजय के प्रत्यक्ष पचास कारण गिनाए जा सकते हैं। निस्संदेह भारतीय जनता पार्टी ने प्राणांतक संघर्ष किया हैं, सैकड़ों राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने बलिदान किया है, लाखों लोगों का पसीना बहा है। किन्तु इस विराट परिवर्तन के पीछे संघ के स्वयंसेवकों की सतत साधना को मत भूलिए। आज स्वतंत्रता प्राप्ति के आठ दशक बाद पहली बार बंगाल में भगवा लहराया है, तो निश्चित मानिये कल केरल और तमिलनाडु की बारी है। क्योंकि संघकार्य राजनीति प्रेरित तात्कालिक कार्य नहीं राष्ट्रनीति प्रेरित अनवरत चलने वाला कार्य है, जिसका लक्ष्य सत्ता प्राप्ति नहीं व्यक्ति एवं राष्ट्र निर्माण है।

Why Rural India Still Needs Stronger Media Coverage

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Preety Chaudhary

New Delhi: India’s growth story is often told through its cities, but its real foundations lie in its villages. That story, however, remains incomplete if the people driving it are not fully informed or heard. Despite increasing policy attention on rural development, the role of media in supporting this journey is still far from adequate. Nearly 65% of Indians live in rural areas. For many of them, media is not just about staying updated. It is a lifeline. It is how farmers learn about new techniques, how families hear about government schemes, how workers find job opportunities, and how communities understand health services. In places where official communication does not always reach effectively, access to clear and reliable information can make a real difference in people’s lives.

Yet, a major gap remains between what is announced and what actually reaches people. This becomes visible in everyday interactions. During field visits and outreach efforts like mobile health services, it is common to meet people who are unaware of even basic schemes or preventive healthcare practices. This is not because they do not care. It is because the information never reached them in a clear and accessible way. When awareness is missing, even the best-designed policies fall short.

The digital push has certainly opened new doors, but the change is uneven. According to the Internet and Mobile Association of India and the National Sample Survey Office, rural internet use has grown rapidly, even surpassing urban numbers in absolute terms. A 2019 report estimated over 227 million rural internet users compared to 205 million in urban India. This is a significant shift. But numbers alone do not tell the full story. Many users still struggle with weak connectivity, high data costs, or limited digital skills. For some, access is occasional rather than regular. Radio continues to be a reliable medium in many regions, but television and digital platforms do not reach everyone equally. The result is an information gap that quietly reinforces existing inequalities.

Another issue is how rural India is portrayed in the media. Most of the time, it appears only during crises, a flood, a drought, a protest. The everyday realities rarely make it to headlines. Issues like rural unemployment, changing farming patterns, climate pressures, or gaps in local services do not get consistent attention. This creates a one-sided picture, where rural India is seen mainly through hardship, not through its resilience or potential. This imbalance has been noted for years. A study by the Centre for the Study of Developing Societies in 2011 found that leading newspapers dedicated just about 2% of their coverage to rural issues. Even today, despite more platforms and faster news cycles, the space given to rural reporting remains limited. At the same time, there is a clear opportunity. Initiatives like Digital India are expanding connectivity across the country. For the first time, there is a large and growing audience in rural India that is ready to consume news that speaks directly to their lives and concerns.

This is where media can make a real difference. It needs to go beyond reporting events. It should explain policies in simple terms, track how schemes are implemented on the ground, and give space to local voices. There is also a strong need to connect farmers with agricultural research, new technologies, and market insights in a way that is practical and easy to understand. Strong rural journalism does more than inform. It can inspire change. It can highlight what is working, share solutions that others can adopt, and create a stronger link between people and policymakers. But this requires moving away from surface-level coverage and investing in deeper, ground-level reporting.

India’s progress cannot rely only on its cities. Real and lasting development depends on how well its villages are informed, included, and empowered. Strengthening rural media is not just about better storytelling. It is about making development more meaningful and more equitable. Because a country cannot truly move forward if a large part of its population remains unheard and uninformed.

अधिकार और यथार्थ के बीच: भारतीय परिप्रेक्ष्य में वैवाहिकसंबंधों की गरिमा, स्त्री-अस्मिता और कानून की सीमाएँ

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डॉ. स्वीटी तिवारी

दिल्ली । भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी संबंध नहीं, बल्किएक व्यापक सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक संस्था है, जो परिवार औरसमाज की स्थिरता की आधारशिला मानी जाती है। भारतीय परंपरा मेंविवाह को “संस्कार” के रूप में देखा गया है, जहाँ संबंध अधिकारों कीप्रतिस्पर्धा पर नहीं, बल्कि दायित्व, समर्पण, सहमति और पारस्परिक सम्मानपर आधारित होते हैं। किंतु आधुनिक समय में जब “वैवाहिक बलात्कार” (Marital Rape) जैसे प्रश्न उठते हैं, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हमअधिकार और यथार्थ के बीच संतुलन स्थापित करते हुए इस विषय कोभारतीय दृष्टि से समझें।

भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 में बलात्कार की परिभाषा दी गईहै, किंतु इसमें निहित अपवाद यह स्पष्ट करता है कि पत्नी (यदि वह 18 वर्षसे अधिक आयु की है) के साथ पति द्वारा स्थापित यौन संबंध को बलात्कारनहीं माना जाएगा। यह प्रावधान अक्सर आलोचना का विषय बनता है, क्योंकि यह महिला की सहमति के प्रश्न को गौण कर देता है। एकसमाजशास्त्री के रूप में मेरा यह मानना है कि यह बहस केवल कानूनीप्रावधान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सामाजिक संरचना सेजुड़ी है, जिसमें विवाह, परिवार और लैंगिक संबंधों को परिभाषित कियाजाता है। संघ की विचारधारा समाज को एक सजीव और संगठित इकाई केरूप में देखती है, जिसमें परिवार उसकी मूल इकाई है। यदि परिवार सुदृढ़ है, तो समाज भी सशक्त रहता है। इस दृष्टिकोण में विवाह को केवलव्यक्तिगत अधिकारों के संदर्भ में नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता औरसांस्कृतिक निरंतरता के रूप में समझा जाता है। अतः यह विचार महत्वपूर्णहो जाता है कि क्या प्रत्येक वैवाहिक असहमति या तनाव को आपराधिककानून के दायरे में लाना उचित होगा, या फिर इसके लिए अधिकसंवेदनशील और संतुलित सामाजिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। यहस्वीकार करना आवश्यक है कि किसी भी प्रकार की हिंसा-चाहे वहशारीरिक हो, मानसिक हो या यौन-अस्वीकार्य है। विवाह के भीतर भी यदिकिसी महिला के साथ जबरदस्ती या अमानवीय व्यवहार होता है, तो वहनिंदनीय है और उसके विरुद्ध संरक्षण आवश्यक है। किंतु भारतीय संदर्भ मेंइस समस्या का समाधान केवल दंडात्मक कानूनों के माध्यम से करनापर्याप्त नहीं होगा। यदि हम बिना सामाजिक चेतना के विकास के सीधेकठोर कानूनी प्रावधान लागू करते हैं, तो उनके दुरुपयोग और सामाजिकविघटन की संभावना भी बढ़ सकती है।

मेरे सामाजिक अनुभव और अध्ययन यह संकेत करते हैं कि भारतीय समाजमें वैवाहिक संबंधों के भीतर उत्पन्न होने वाले अनेक तनाव संवादहीनता, लैंगिक संवेदनशीलता की कमी और पारंपरिक भूमिकाओं की कठोरता सेजुड़े होते हैं। ऐसे में यदि हर समस्या का समाधान केवल आपराधिक कानूनके माध्यम से खोजा जाएगा, तो यह परिवार संस्था के भीतर अविश्वास औरटकराव को बढ़ा सकता है। इसलिए आवश्यक है कि हम इस विषय कोकेवल “अधिकार बनाम अपराध” के रूप में न देखें, बल्कि इसे “संबंधों केपुनर्संतुलन” के रूप में समझें। National Family Health Survey (NFHS-5) के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि भारत में घरेलू हिंसा एकवास्तविक समस्या है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। किंतु इन आंकड़ों कोसमझते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि हिंसा के विभिन्न रूपों केसमाधान के लिए केवल एक ही प्रकार का कानूनी दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं होसकता। सामाजिक परामर्श, पारिवारिक मार्गदर्शन और नैतिक शिक्षा जैसेउपाय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर United Nations Women और World Health Organization जैसे संस्थान महिलाओं के अधिकारों की रक्षा पर जोर देतेहैं, जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। किंतु भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में इनसिद्धांतों को लागू करते समय स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भों और सामाजिकसंरचनाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। बिना इस संदर्भ के किसी भीकानून का प्रभाव सीमित रह सकता है। Justice Verma Committee नेवैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की सिफारिश की थी, जो इसविषय की गंभीरता को दर्शाती है। वहीं Delhi High Court में इस मुद्दे परहुई बहस यह संकेत देती है कि भारतीय न्यायपालिका भी इस विषय कोलेकर एकमत नहीं है। यह असहमति इस बात का प्रमाण है कि यह विषयसरल नहीं, बल्कि बहुआयामी और जटिल है।

एक समाजशास्त्री और लेखिका के रूप में मेरा स्पष्ट मत यह है किमहिलाओं की गरिमा, सहमति और सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार कासमझौता नहीं किया जा सकता। किंतु इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक हैकि विवाह संस्था की संवेदनशीलता और सामाजिक भूमिका को समझते हुएही कोई भी कानूनी निर्णय लिया जाए। यदि हम केवल दंडात्मक दृष्टिकोणअपनाते हैं, तो हम समस्या के मूल कारणों-जैसे पितृसत्तात्मक मानसिकता, संवाद की कमी और सामाजिक असमानता को अनदेखा कर देंगे।इसलिएसमाधान एक समन्वित दृष्टिकोण में निहित है, जिसमें कानून, समाज औरसंस्कृति तीनों का संतुलन हो। वैवाहिक संबंधों में सहमति और सम्मान कोबढ़ावा देने के लिए शिक्षा, जागरूकता और मूल्य-आधारित प्रशिक्षणआवश्यक है। परिवार के भीतर संवाद और पारस्परिक समझ को सशक्तकरना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

भारतीयता के मूल में स्थित वैवाहिक संस्था के साथ बलात्कार जैसे शब्दोंका प्रयोग अनुचित है। ऐसा करना न केवल विभत्स है बल्कि वैवाहिक संस्थाके आधार पर ही प्रश्नचिह्न लगाना है। वैवाहिक संबंधों में होने वाले अपराधोंके लिए IPC की धाराओं में पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। इसलिए वैवाहिकबलात्कार के संदर्भ में बनने वाला कानून अव्यावहारिक है तथा इसकेदुरुपयोग की संभावना अधिक है। अंततः, “अधिकार और यथार्थ” के इसविमर्श में यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय समाज को एक ऐसे संतुलितमार्ग की आवश्यकता है, जहाँ महिलाओं की अस्मिता और अधिकारों कीरक्षा भी सुनिश्चित हो, और साथ ही परिवार संस्था की स्थिरता औरसामाजिक समरसता भी बनी रहे। यही वह दृष्टिकोण है, जो भारतीयपरिप्रेक्ष्य में अधिक व्यवहारिक, संवेदनशील और दीर्घकालिक समाधानप्रदान कर सकता है।

संदर्भ सूची (Bibliography)

प्राथमिक स्रोत (Primary Sources)

1. भारत सरकार – भारतीय दंड संहिता, 1860 (धारा 375 एवं अपवादप्रावधान)
2. भारत सरकार – घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005
3. भारत का विधि आयोग – बलात्कार कानूनों की समीक्षा पर 172वींरिपोर्ट (2000)
4. न्यायमूर्ति वर्मा समिति – आपराधिक कानून संशोधन पर समिति कीरिपोर्ट (2013)
5. भारत का सर्वोच्च न्यायालय – इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ (2017)
6. दिल्ली उच्च न्यायालय – RIT फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2022)
7. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5), 2019–21

द्वितीयक स्रोत (Secondary Sources)

8. संयुक्त राष्ट्र महिला — महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर कानून निर्माणहेतु हैंडबुक (2012)
9. विश्व स्वास्थ्य संगठन – महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के प्रसार का अनुमान(2021)
10. सिल्विया वॉल्बी – पितृसत्ता का सिद्धांत (Theorizing Patriarchy)
11. सिमोन द बोउवार – द सेकंड सेक्स (The Second Sex)
12. पियरे बोरदियो – पुरुष वर्चस्व (Masculine Domination)
13. एंथनी गिडेन्स – समाजशास्त्र (Sociology)
14. कमला भसीन – पितृसत्ता क्या है?
15. फ्लाविया एग्नेस – “वैवाहिक बलात्कार: भारत में महिलाओं केअधिकारों का प्रश्न

क्षत विक्षत बंगाल पर सनातन के लेप से निखरेगी बंगाल की आत्मा

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सुरेन्द्र चतुर्वेदी, जयपुर

जयपुर । बंगाल ने भाजपा को अपना लिया। अपनाया ही नहीं बल्कि अपने सिर माथे बिठाया है। आजादी के समय विभाजन और उसके बाद बांग्लादेश की प्रसव वेदना को बंगाल ने झेला। *भाजपा को जो बंगाल मिला है वो ना केवल घायल है अपितु आत्मा तक क्षत विक्षत है । भाजपा को सबसे पहले बंगाल की आत्मा पर मरहम लगाना होगा, यह सनातन के लेप से ही होगा!*

*असंख्य साधकों की तपोस्थली बंगाल की सुषुप्त आत्मा को जागृत करना आसान नहीं होगा। सैकड़ों सालों तक बंगाल को तिल तिल कर मारा गया है। 1204 में लक्ष्मण सेन की पराजय के बाद बख्तियार खिलजी के मुगल शासन फिर अंग्रेजी हुकूमत और आजादी के बाद कांग्रेस, वामपंथ और ममता के कुशासन से मुक्त होना ही बंगाल की असली विजय है।* भाजपा को अब उसी धागे को पकड़ कर आगे बढ़ना है। राजनीतिक रूप से भाजपा को वंदेमातरम् गीत में कहे गए सुखदाम वरदाम और दश प्रहर धारिणी बनाने की कठिन अग्नि परीक्षा से निकलना होगा।

दरअसल, बंगाल का चुनाव केवल एक विधानसभा का ही चुनाव नहीं था कि जिसमें राजनीतिक सत्ता किसको मिलेगी ? *यह चुनाव इसलिए और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण था कि इस देश में मुस्लिम तुष्टिकरण, घुसपैठ और देश विरोधी मानसिकता को संरक्षण देने वाले राजनीतिक दलों को भारत का जनमानस नकारता है या नहीं ?*

दुर्भाग्य से आजादी के बाद से ही ऐसी राजनीति स्थापित की गई जो सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण पर केंद्रित थी। मुस्लिमों को तुष्ट करने के लिए बहुसंख्यक हिंदू समाज को निर्लज्ज भाव से अपमानित करना, हिन्दू आख्यानों को उपेक्षित करना और हिंदू समाज को जातियों , भाषाओं और क्षेत्र के आधार पर बांट कर और बहका कर सत्ता में बने रहना ही उनका लक्ष्य होता था। लेकिन देर से ही सही बंगाल ने उस राजनीति को तिरस्कृत कर दिया और मुसलमानों के हाथ में सत्ता की चाभी है, इस भ्रम को चकनाचूर कर दिया। बंगाल के बाद अगले साल उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं, हालांकि यहाँ पर भी मुस्लिम भाजपा के विरोध में ही हैं लेकिन *बंगाल में भाजपा की जीत ने यह सिद्ध कर दिया है कि मुस्लिमों को भारत में विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होगा। वह भी इस देश के वैसे ही नागरिक हैं जैसे कि हिंदू समाज के लोग।*

*बंगाल की जीत उन राजनीतिक दलों के लिए सबक है जो मुस्लिम समुदाय और उनके वोटों को अपना ग़ुलाम समझते हैं और उनकी रणनीति में मुस्लिम वोट प्राथमिकता पर होते हैं।* पहले बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और आने वाले चुनाव में उत्तर प्रदेश में यादव मुस्लिम वोट के भरोसे सत्ता प्राप्त करने की होड़ में समाजवादी पार्टी लगी है। भाजपा विरोधी दलों की यह रणनीति बिहार में ध्वस्त हुई, यही हाल उत्तर प्रदेश में होना है।

भाजपा के लिए अब आगे का रास्ता और ज़्यादा सावधानी बरतने का है। उसे धीरे धीरे ऐसे नेतृत्व को सामने लाना होगा जिनकी सोच में सनातनी स्पष्टता और कार्य शैली में तीव्र आक्रामकता हो। दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने यह विश्वास जगाया है तो असम में हेमंत विश्व सरमा, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ उसी मार्ग पर चल रहे हैं। बंगाल में भी हिंदुओं को आक्रामक नेता चाहिए। जो सच को डंके की चोट पर कहने का साहस रखता हो। जो भरोसे की गारंटी हो।

*बंगाल चुनाव की बात अमित शाह और सुनील बंसल के बिना अधूरी है। इस जोड़ी ने उत्तर प्रदेश के बाद बंगाल को देश द्रोहियों से मुक्त कर दिया। अमित शाह के साथ ने सुनील बंसल को एक ऐसा संगठनकर्ता के रूप में देश के सामने ला खड़ा किया है, जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य रखते हुए एक एक कड़ी को जोड़कर विजय माला तैयार कर देता है।* राजनीतिक विश्लेषक बंसल में काफ़ी संभावनाएं देख रहे हैं। ये आने वाले कल की भाजपा का चेहरा है, जिन पर भारत को सुखदाम वरदाम बनाने की ज़िम्मेदारी है!!

(लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट, जयपुर से संबद्ध हैं)

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