ईश्वर मुझे इतना शक्ति दें कि मैं जीवन पर्यंत इस संगठन में कार्य करता रहूँ

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भूपेन्द्र सिंह

लखनऊ। UGC गाइडलाइन कोई कानून नहीं है, यह लागू भी नहीं हुआ है, इसका ज़मीन कर कोई भी अस्तित्व जीरो है। लेकिन अचानक सवर्ण समाज के ऊपर अत्याचार बढ़ चुका है, वह समाप्त होने के कगार पर पहुँच चुके हैं, देश में बाक़ी जातियां उनके विनाश के लिए लालायित हो उठी हैं। उनका ओपिनियन मेकिंग और डिसिजन मेकिंग में अस्तित्व समाप्त हो चुका है। ये सब चार सप्ताह में हो चुका है, पता नहीं अगले चार सप्ताह में क्या होगा। बच बचाकर रहिए, ऐसे कई कहानी मार्केट में आने वाला है जो “भेड़िया आया” के तर्ज़ पर होगा।

नरेन्द्र मोदी से लगाये, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक सब सवर्ण विरोधी हो चुके हैं। कहीं दूर दूर तक सवर्ण समाज को पूछने वाला नहीं है, ऐसा कब हो गया, कैसे हो गया, किसी को पता नहीं चल पा रहा है। हिंदुत्व अब तमाम लोगों को चूरन लग रहा है। कुछ लोगों को राम मंदिर में अब दिव्यता नहीं दिखाई पड़ रही है। कुछ लोगों को राष्ट्रवाद अब अफीम नज़र आ रहा है। लगातार भाजपा, मोदी, अमित शाह, योगी, संघ सबके ख़िलाफ़ खड़े हैं। इनको पता है कांग्रेस, सपा, राजद सबकी सच्चाई, लेकिन इनको लग रहा है कि मंडल के बाद राजनीति ने जो करवट ली है उसे हम लगातार विरोध करके पलट देंगे। संघ, मोदी, योगी, शाह, भाजपा को वापस मंडल से पहले वाले मोड में रिसेट कर देंगे। किसी को यदि कांस्टीपेशन भी हो गया तो अब गलती मोदी की है। जो वामपंथी और कांग्रेस कर रहे हैं उसकी गलती मोदी जी की है, इसलिए ये नाराज़ है और बदले में वामपंथ और कांग्रेस की वापसी करायेंगे।

जातियों में प्रेम इस कदर है कि पूछिये नहीं, ठाकुर को ब्राह्मण नहीं पच रहा, भूमिहार को ब्राह्मण ठाकुर नहीं पच रहे, ठाकुर को ब्राह्मण नहीं पच रहा। हद तो उत्तर प्रदेश में देखने को मिली कि कुर्मी को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया तो समकक्ष लोधी बिरादरी के नेता लखनऊ में जमावड़ा किए और प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष नाराज़गी दिखा रहे हैं। कुर्मी कोइरी लोधी तीनों यादवों को नहीं देखना चाहते। अभी एक साल तक तमाम जातियां एक के बाद एक कष्ट में आती रहेंगी। उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले यह कष्ट जारी रहेगा।

सच बात ये है की इस देश में हिंदुत्व के अतिरिक्त सब कुछ फ्रॉड है, सब केवल तोड़ने वाली, लड़ाने वाली पहचान है। मूर्ख आदमी, असफल आदमी जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं, जिसकी अपनी कोई उपलब्धि नहीं, वह पुरानी कहानियाँ सुन सुनकर उसी कहानियों में जी रहा है। अपनी वास्तविक स्थिति से इतर एक कल्पना लोक में जी रहा है। मानसिक रोगियों जैसी स्थिति बनी हुई है। मैंने एक रील देखा जिसमें ब्रजेश पाठक जी राजनाथ सिंह जी का पैर छूते नज़र आ रहे हैं, मैंने उसे अपने मित्र ऋषिकांत पांडे जी को भेजा। उसमें नए नए बीस बीस साल के लड़के ब्रजेश पाठक जी को गाली दे रहे हैं कि ब्राह्मण होकर ठाकुर का पैर छू रहे हैं। राजनाथ जी उम्र मे, अनुभव में हर प्रकार से श्रेष्ठ हैं लेकिन ये बीस बीस साल के लड़के जो दस बीस हज़ार के नौकरी के मोहताज हैं, वह दुखी हैं कि पाठक जी ने सिंह साहब का पैर क्यों छुआ?

कुछ दिन पहले कुर्मी समाज में पैदा हुए रीलबाज़ों के बारे में लिखा तो कई लोग दुखी हो गए। कहने लगे कि समाज में कुछ लोग तेज तर्रार निकल रहे हैं तो आप अनावश्यक उनका विरोध क्यों कर रहे हैं? अब मैं कैसे समझाउ कि ये जो बीस बीस गाड़ी लेकर अनावश्यक रील बना रहे हो, फ़र्ज़ी साउंड इफ़ेक्ट्स डाल रहे हो, यह सब कम आईक्यू वालो के लिए ठीक है लेकिन एक औसत आदमी ये पूछेगा की भाई तुम समाज का नेतृत्व करना चाहते हो तो तुम्हारा काम लोगों को शांत, सहज और समझदार बनाना है या फिर ये सब बेवक़ूफ़ी सिखाना है? दूसरे तुमसे क्या सीखें? खेत बेचकर ब्लैक स्कॉर्पियो ख़रीदो?

मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है, व्यक्ति केवल दूसरे से गंदगी सीख रहा है। घर घर मनोरोगी पैदा करने की फैक्ट्री लगी हुई है। ब्राह्मण ही ब्राह्मणवाद से आज़ादी के नारे लगा और लगवा रहे हैं। उन्हीं से भरे संस्थानों में ब्राह्मणों को यूरेशिया भेजा जा रहा है। यादव समाज के नेता गाय गोबर जैसे हमारे सभ्यता के आधारभूत पूंजी से घृणा फैलाते नज़र आ रहे हैं। इन सबके पीछे एकमात्र मनोरोग है जाति। लोग मुझसे कहते हैं कि इसके आधार पर गौरव का भाव जाग्रत हो, यह मार्ग निकालना चाहिए। मुझे यह फ्रॉड समझ में आता है। इससे गौरव का बोध तो पनपता मुझे नहीं दिखता, केवल एक दूसरे को नीचा दिखाने का भाव ही दिखाई पड़ता है। इसलिए मैं बार बार लिखता हूँ कि अपने जातीय पहचान को लेकर सहज रहना चाहिए और हिंदुत्व को लेकर गौरव का भाव उत्पन्न करना चाहिए। जाति के नाते न हमारी नैतिकता तय होती है, न हमारा चिंतन, यह दोनों और सबसे महत्वपूर्ण बात स्वतंत्र चिंतन की प्रक्रिया, यह दुनिया की सबसे बड़ी थाती है, जो हिंदुत्व के नाते हमारे पास है। इसी पर गर्व करना होगा।

ऐसे में जब मैं सुदूर से सुदूर क्षेत्रों में संघ के कार्यकर्ताओं को काम करते देखता हूँ, छोटे से लेकर बड़े तक, तमाम लोगों को बिना प्रतिक्रिया भाव के समाज के प्रति सकारात्मक होकर काम करते देखता हूँ तो इस संगठन के प्रति विश्वास बढ़ता जाता है। ये वो लोग हैं जो हवा के झोके के साथ बहते नहीं हैं, इनका वैचारिक आधार मज़बूत है। ये वो लोग नहीं है जो दस साल पहले तक बाबरी के पक्ष में थे, सेक्युलरज़ीम की अफ़ीम पिला रहे थे और आज़ अचानक हवा बदली तो हिंदुत्व के साथ खड़े हो गए। फिर कोई मुद्दा आया तो भावनाओं में बह गए। वह स्थिर चित्त हैं, विचार को लेकर दृढ़ हैं, नेतृत्व को लेकर विश्वास है। मैं चाहता हूँ कि ईश्वर मुझे इतना शक्ति दें कि मैं इस संगठन में जीवन पर्यंत कार्य करता रहूँ ताकि इस धारा में जुड़कर शांत मन, स्थिर चित्त, गहरी समझ, सकारात्मक ऊर्जा और वास्तविक जमीनी कार्य कर सकूँ। मेरे मन में किसी भी हिंदू जाति, समाज, परिवार के प्रति ख़राब विचार कभी न आए।

निशिकांत दुबे और धर्मेंद्र प्रधान उस समुदाय को गुमराह कर रहे हैं जो परंपरागत रूप से ज्ञानवान है

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बक्सर , बिहार : अब समय तेजी से बीत रहा है और यूजीसी विधेयक के प्रति मतदाताओं की नापसंदगी भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रोश में तब्दील होती जा रही है। निशिकांत दुबे अब राहुल गांधी के लिए नहीं, नरेंद्र मोदी के लिए मुसीबत बनते दिख रहे हैं। धर्मेंद्र प्रधान ने तो भाजपा की नाव ही डुबो दी है। अगर सामान्य वर्ग के मतदाता अगले होनेवाले जनरल इलेक्शन में सभी संसदीय क्षेत्रों में केवल “नोटा” का बटन दबा दें तो बीजेपी अगले लोकसभा में 50 के अंदर सिमट जाएगी।

धर्मेंद्र प्रधान ओडिशा के संबलपुर संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे 2024 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार के रूप में चुने गए थे और भारत के शिक्षा मंत्री भी हैं। निशिकांत दुबे झारखंड के गोड्डा संसदीय क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं। निशिकांत दुबे संसद में अक्सर कांग्रेस की नीतियों पर हमला करते हैं और भाजपा के चहेते हैं। इन दोनों ने मीडिया में यूजीसी के नियमों के मुद्दे पर आम जनता को गुमराह करने की कोशिश की और अब आम जनता आगामी चुनावों में उनके संसदीय क्षेत्र में नोटा (NOTA) बटन दबा करके उन्हें सबक सिखाने की सोच रही है। अगर सामान्य वर्ग के मतदाता अगले होनेवाले जनरल इलेक्शन में सभी संसदीय क्षेत्रों में केवल नोटा का बटन दबा दें तो बीजेपी अगले लोकसभा में 50 के अंदर सिमट जाएगी।

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के प्रति पक्षपातपूर्ण होने के कारण कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है। छात्रों और विभिन्न टिप्पणीकारों सहित आलोचकों ने उन पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया है, क्योंकि उनका दावा है कि नियम संतुलित हैं, जबकि ये नियम केवल विशिष्ट समूहों (Sc, ST, OBC) को ही सुरक्षा प्रदान करते हैं।

निशिकांत दुबे ने X (पूर्व में ट्विटर) पर कहा कि नियम सामान्य वर्ग सहित सभी पर समान रूप से लागू होते हैं और लोगों से “गलतफहमियों” को नजरअंदाज करने का आग्रह किया। X पर समुदाय की टिप्पणियों और विभिन्न आलोचकों ने बताया कि यह तथ्यात्मक रूप से गलत था, क्योंकि नियमों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भेदभाव की शिकायतें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग/महिला/दिव्यांग वर्ग द्वारा दर्ज की जानी चाहिए, न कि सामान्य वर्ग द्वारा। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आश्वासन दिया कि “किसी को भी किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा” और कानून का दुरुपयोग नहीं किया जाएगा। आलोचकों ने तर्क दिया कि उनके आश्वासन खोखले थे क्योंकि उन्होंने लिखित नियम में मौजूद संरचनात्मक पूर्वाग्रह को संबोधित नहीं किया।

“गुमराह करने” के आरोप इसलिए लगे क्योंकि प्रधान और दुबे ने इन नियमों को सार्वभौमिक “समानता” के साधन के रूप में प्रचारित किया, जबकि नियमों का वास्तविक पाठ और संरचना—जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया—एकतरफा दृष्टिकोण का संकेत देती है जिससे जातिगत संघर्ष को बढ़ावा मिल सकता है। असल में, निशिकांत दुबे और धर्मेंद्र प्रधान ने नुकसान को कम करने के बहाने और भी अधिक नुकसान पहुंचाया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि उनके अनुसार भारत में केवल चार ही “जातियाँ” हैं, और उनका ध्यान पारंपरिक जातिगत पहचानों के बजाय सामाजिक-आर्थिक समूहों पर केंद्रित है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा परिभाषित चार “जातियाँ” हैं: 1) गरीब, 2) महिलाएँ, 3) युवा और 4) अन्नदाता। विडंबना यह है कि इनमें से कोई भी जाति यूजीसी के नियमों या किसी अन्य सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है। मोदी ने नवंबर 2023 के अंत में सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से बातचीत के दौरान पहली बार इस मुद्दे को उठाया था, जिससे विपक्ष द्वारा राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना की मांग के बीच उन्हें काफी समर्थन मिला। उन्होंने तर्क दिया कि इन चार समूहों का उत्थान देश की प्रगति के लिए आवश्यक है और उनका सशक्तिकरण उनकी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके विपरीत, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि वे किसी भी कीमत पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को बढ़ावा देने पर तुले हुए हैं। लोग अब उनके द्वारा उल्लिखित जाति और लिखित रूप में जिस जाति की वे बात कर रहे हैं, उस पर उनकी रहस्यमय चुप्पी पर सवाल उठा रहे हैं।

इस बयान को व्यापक रूप से जाति-आधारित राजनीति के प्रतिवाद के रूप में देखा जा रहा है, जो पारंपरिक विभाजनों के बजाय विकास-उन्मुख पहचान पर जोर देता है। उन्होंने इन चार समूहों को विकसित भारत के “अमृतस्तंभ” कहा है। अब लोग जानना चाहते हैं कि क्या उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान और निशिकांत दुबे की सलाह पर जाति की अपनी पूर्व परिभाषा पर अपना रुख बदल दिया है।

भाजपा खुद को दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बताती है और सुधांशु त्रिवेदी और संबित पात्रा जैसे उसके प्रवक्ता मीडिया में हर विषय पर ज्ञान बांटते रहे हैं, लेकिन यूजीसी विवाद के बाद से वे रहस्यमय तरीके से गायब हो गए हैं। ऐसा लगता है कि वे एक चीनी उत्पाद की तरह काम कर रहे हैं जो जरूरत पड़ने पर विफल हो जाता है। भाजपा अपने मूल मतदाताओं को भूल गई है। अगर वे तटस्थ होकर NOTA पर जोर देते हैं, तो भी भाजपा को चुनाव में हार का सामना करना पड़ेगा। उनके पास 2018 के मध्य प्रदेश चुनाव का विश्लेषण करने के सभी कारण हैं कि कैसे NOTA ने भाजपा को मध्य प्रदेश में 11 सीटें, सत्ता और मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवा दी। इस बार निशिकांत दुबे और धर्मेंद्र प्रधान की बेतुकी व्याख्या NOTA के पक्ष को और बढ़ाएगी। अगर सामान्य वर्ग के मतदाता अगले होनेवाले जनरल इलेक्शन में सभी संसदीय क्षेत्रों में केवल नोटा का बटन दबा दें तो बीजेपी अगले लोकसभा में 50 के अंदर सिमट जाएगी।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनियम 2026 से जुड़े हालिया विवादों के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वाकई गंभीर राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जाति आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से बनाए गए ये विनियम वास्तव में जाति आधारित पूर्वाग्रह को बढ़ावा देते हैं। इसका उल्टा असर हुआ है और पार्टी एक ऐसी दुविधा में फंस गई है जिससे उसके मूल मतदाता आधार को खतरा है। निशिकांत दुबे और धर्मेंद्र प्रधान द्वारा मामले को दबाने की कोशिश ने स्थिति को और भी बदतर बना दिया है, क्योंकि पार्टी के मूल मतदाताओं को इसकी जानकारी है और वे मोदी और भाजपा द्वारा अक्षरशः और भावना से ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

यूजीसी मुद्दे ने भाजपा के “हिंदू एकता” के फार्मूले में दरारें उजागर कर दी हैं। इसने भाजपा की राजनीतिक संरचना के मूलभूत घटकों को आपस में भिड़ा दिया है, जिससे पार्टी के सामाजिक गठबंधन प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक चुनौती खड़ी हो गई है। और यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि “मोदी हैं तो मुमकिन है”।

धर्मेंद्र प्रधान का शिक्षा मंत्री के रूप में कार्यकाल (2021-वर्तमान) कई विवादों से घिरा रहा है, जिनमें मुख्य रूप से 2024 के NEET-UG परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने और अनियमितताओं के आरोप शामिल हैं। इन विवादों के चलते देशव्यापी विरोध प्रदर्शन हुए और उनके इस्तीफे की मांग उठी। अन्य विवाद के मुद्दों में तमिलनाडु के साथ तीन-भाषा नीति का विवाद, NTA सुधार और पाठ्यपुस्तक संशोधन विवाद शामिल हैं। NEET-UG 2024 परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक होने, रियायती अंक देने और कुप्रबंधन के आरोप लगे। विपक्षी दलों ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) की “व्यवस्थित विफलता” का हवाला देते हुए उनके इस्तीफे की मांग की। धर्मेंद्र प्रधान को UGC विनियम 2026 में सामान्य वर्ग के खिलाफ जातिगत भेदभाव से संबंधित मुद्दों का सामना करना पड़ रहा है। वे खुलेआम जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उनके मंत्रालय के अंतर्गत UGC विनियम में उल्लिखित आपत्तिजनक प्रावधान प्रथम दृष्टया भेदभावपूर्ण हैं।

यहां यह उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि धर्मेंद्र प्रधान इतने विवादों से घिरे होने के बावजूद नरेंद्र मोदी ने उन्हें दूसरी बार शिक्षा मंत्रालय की कमान क्यों सौंपी? भारत के लोग पूछ रहे हैं।

भारत की कार्य संस्कृति में घातक अत्यधिक अवकाश

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विजय मनोहर तिवारी
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भोपाल। शोध के केंद्र में भारत हो, इस ध्येय का अर्थ क्या है? क्या केवल भारत का इतिहास, संस्कृति, परंपरा और धर्म। यह एक सैद्धांतिक बात है। हम भारत के किस केंद्र की ओर संकेत कर रहे हैं। हम भारत के केंद्र के रूप में क्या अर्थ ले रहे हैं, यह देखना भी जरूरी है।

हमें भारत की मौलिकता के केंद्र पर लौटना जरूरी है। भारत ने अपने दस हजार साल से अधिक की लंबी यात्रा में बहुत कुछ मौलिक रचा है। धर्म की अवधारणा, कर्म के सिद्धांत, विविध कलाओं के विकास, स्थापत्य के आश्चर्य, योग और ध्यान की एकाग्रताएँ, आंतरिक उपलब्धि का मनोविज्ञान, प्रकृति के साथ साहचर्य, जीवन-मरण और पुनर्जन्म के विचार और समयानुकूल इनमें सुधार-संशोधन।

मगर आज का भारत विचित्र किस्म के विरोधाभासों से भरा हुआ है। कर्म और कर्मफलों पर इतिहास प्रसिद्ध व्याख्यान देने वाले योगेश्वर श्रीकृष्ण को भारत ने अपनी सर्वोच्च स्मृतियों में सहेजा हुआ है। निरंतर कर्म करते हुए फल की आकांक्षाएँ न करने वाला विचार। मगर एक हजार साल लंबे संघर्ष के बाद स्वाधीन हुआ भारत आज संसार में सर्वाधिक अवकाशों का आनंद लेने वाला एक देश भी है।

मैं एक साल पहले देश के सबसे बड़े मीडिया विश्वविद्यालय में कुलगुरु बनकर आया और यह देखकर कुछ हैरान और कुछ दुखी हुआ कि हर महीने औसत दस अवकाश हैं। अनेक अवकाश ऐसे हैं जो बिन माँगे मिले हैं। चार वर्ष के 48 महीनों में 480 दिन अवकाश के हैं। ये लगभग सोलह महीने होते हैं। अनेक महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथियाँ हम पूरे दिन के अवकाशों में निष्क्रिय रहकर मनाते हैं। इनमें श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी भी शामिल है और हम कर्म के सिद्धांत में विश्वास करने वाले अद्भुत समाज हैं।

उच्च शिक्षा जगत की मौजूदा स्थितियों को देखते हुए मैं कहूंगा कि अवकाशों को कम करने के विषय में एक विमर्श होना चाहिए। मैं महात्मा गाँधी की जयंती के दिन घर पर ही उनके चित्र पर दो फूल चढ़ाकर रास्ते में वैष्णव जन गाते हुए ऑफिस में दस घंटे काम करना चाहता हूँ।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर हम रात आठ बजे तक काम करें, एक ऐसे अवतार की स्मृति में जिसने कर्म करने की बात कही थी और जिसे हम पाँच हजार साल बाद भी नहीं भूले हैं। हम कर्म करना भूल रहे हैं। अवकाशों ने हमें अकर्मण्यता की सीमा तक लाकर छोड़ दिया है। अवकाश कब अधिकार बन गए हमें पता ही नहीं चला शनिवार-रविवार के आसपास कोई जयंती या पुण्यतिथि हमारी खुशी को दो गुना कर देती है।

हम एक ऐसे देश को अपने आसपास विकसित होता हुआ देख रहे हैं, जिसके प्रधानमंत्री बिना अवकाश लिए काम करते हैं। मगर हमें सारे अवकाश चाहिए। प्रधानमंत्री ने 2047 में एक आत्मनिर्भर और शक्तिसंपन्न भारत का लक्ष्य रखा है, जो विश्वगुरु होगा। इसके लिए हमें दो गुनी गति से काम करने की जरूरत है। हमें अपने विभागों और संस्थानों में काम के दिन बढ़ाने की जरूरत है। बीते दो दशक में बढ़ी महंगाई के अनुपात में विभिन्न वेतनमानों की बढ़ोतरी ने सेलरियों में आसमानी उछाल पैदा किया है। इस दृष्टि से काम के घंटे घटे ही होंगे और किसी के चेहरे पर शिकन नहीं है।

विश्वविद्यालयों को इस बारे में सोचना चाहिए। शोध संस्थानों को प्रयास करना चाहिए। सामाजिक संगठनों को पहल करना चाहिए। यह चर्चा होना चाहिए कि लगातार बढ़ते अवकाश विकास के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हैं। स्वाधीन भारत में 80 साल बाद एक मौलिक दिशा में हमारी सोच आगे बढ़नी चाहिए। कर्म के सिद्धांत हजारों साल पुराने हैं मगर इस समय यह एक मौलिक विचार होगा कि हम अधिक से अधिक काम पर लौटें और अवकाशों की अकर्मण्यता आकांक्षाओं से बाहर निकलें। सरकारी तंत्र की नाकामियों के लिए जिम्मेदार कारणों में एक बड़ा कारण अवकाश और अवकाशों की राजनीति है।

इस शोधार्थी समागम में आए प्रतिनिधि अपने संस्थानों में लौटकर इस विषय पर विचार करें। विमर्श छेड़ें। अन्यथा किसी भी विषय पर शोध करें, तय मानें कि भारत का केंद्र हिला हुआ ही रहेगा।

( दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के तीन दिवसीय शोधार्थी समागम के दूसरे संस्करण के समापन सत्र में)

डॉ अमित आर्य को मिला ‘हरियाणा गौरव सम्मान’

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रोहतक। दादा लख्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स (डीएलसीसुपवा) के कुलगुरु डॉ अमित आर्य को शनिवार को ‘हरियाणा गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान को देखते हुए दिया गया। डॉ आर्य कई न्यूज चैनल में संपादक रहने के साथ ही मुख्यमंत्री मनोहर लाल के मीडिया सलाहकार भी रह चुके हैं।

डॉ अमित आर्य को ‘हरियाणा गौरव सम्मान’ बाबा मस्तनाथ यूनिवर्सिटी में आयोजित राष्ट्रीय हास्य कवि सम्मेलन व ‘हरियाणा गौरव सम्मान समारोह’ के दौरान दिया गया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्य कांत ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए यह सम्मान प्रदान किया। विदित रहे कि डॉ अमित आर्य मीडिया जगत का बड़ा चेहरा रहे हैं। साल 1994 में पत्रकारिता शुरू करने वाले डॉ आर्य का इस क्षेत्र में 30 वर्ष से अधिक का योगदान है। डीएलसीसुपवा के कुलगुरु बनने से पहले वे केंद्रीय सूचना मंत्रालय, उत्तर क्षेत्र के सलाहकार रहे हैं। उससे पहले उनके नाम हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल का सबसे लंबे समय तक मीडिया सलाहकार रहने का रिकॉर्ड है।

बतौर पत्रकार डॉ आर्य ने कई क्षेत्रीय व राष्ट्रीय चैनल खड़े करने व उनके सफल संचालन की जिम्मेदारी निभाई, जबकि मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार के तौर पर पत्रकारों व सरकार के बीच सेतु का सराहनीय कार्य किया। पत्रकारों की पेंशन शुरू करवाने, उनकी मान्यता का सरलीकरण, पत्रकारों के इंश्योरेंस की राशि में इजाफा कराने के साथ ही सैकड़ों ऐसे कल्याण के कार्यों के लिए उन्हें जाना जाता है।

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