स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं

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लंदन। न्यूयॉर्क, अमेरिका में 29 अगस्त तथा टोरंटो, कनाडा में 31 अगस्त को संबोधन के पश्चात्, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने 6 सितम्बर को यूनाइटेड किंगडम के लंदन में आयोजित ‘Celebration of Oneness’ (एकात्मता का उत्सव) कार्यक्रम के दौरान संघ की 100 वर्षों की यात्रा से संबंधित विभिन्न प्रश्नों के उत्तर देते हुए संघ की दृष्टि को रेखांकित किया। “संघ का ऐसा कौन-सा एक तत्व है, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है’ इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, “यदि मुझे एक ही सिद्धांत का उल्लेख करना हो, तो मैं ‘अपनापन’ कहूंगा, जिसका अर्थ है सभी के प्रति शुद्ध, सात्त्विक प्रेम। व्यक्ति, समुदाय, समाज और समूची मानवता के प्रति प्रेम- यही हिन्दू का पारंपरिक स्वभाव है। हिन्दू विश्व को संतुलित दृष्टि प्रदान कर सकते हैं।”

संघ की सेवा गतिविधियों के संबंध में डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा,“स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं, इसलिए उनके कार्य के पूरे विस्तार का सार प्रस्तुत करना कठिन है। राजनीतिक कारणों से हमारा विरोध करने वाले लोग भी हमारे कार्य तथा स्वयंसेवकों के गुणों और योगदान को स्वीकार करते हैं। समय-समय पर वे महत्वपूर्ण विषयों पर हम से सहयोग की अपेक्षा करते हैं और हमसे संवाद भी करते हैं। यह समाज के विभिन्न वर्गों में हमारे कार्य की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है। जहां कोई कुछ नहीं कर रहा होता, वहां संघ सेवा कर रहा होता है – लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक।”

अगले 100 वर्षों के लिए संघ के लिए एक प्रमुख संदेश के संबंध में पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने कहा कि संघ को अगले सौ वर्षों तक भी वही कार्य निरंतर आगे बढ़ाना होगा, जो उसने अब तक किया है। उन्होंने कहा, “सबसे पहले मेरे मन में यह बात आती है कि सारे कार्यों को पूरा करने में इतना समय नहीं लगना चाहिए। अभी मेरी तीसरी पीढ़ी कार्य कर रही है। संघ में अब दो पीढ़ियां और भी साथ काम कर रही हैं। इस प्रकार पांच पीढ़ियां साथ काम कर रही हैं। सातवीं पीढ़ी आने से पहले हिन्दू समाज के संगठन का कार्य पूरा हो जाना चाहिए।”

‘विश्व के लिए हिन्दू सभ्यता का ऐसा क्या योगदान है, जिसकी विशेष आवश्यकता है” – इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, “सभी हिन्दू विचार इसी एक सूत्र पर आधारित रहे हैं कि प्रत्येक कर्म के पीछे कोई कारण है। अस्तित्व वास्तव में एक है, यद्यपि वह विविध दिखाई देता है। विविधता हमारा स्वभाव है। इसलिए हमें उसे स्वीकार करना है और उसका सम्मान करना है। लेकिन विविधताओं के साथ इस बात को ध्यान में रखते हुए व्यवहार करना होगा कि ये अस्तित्व की एकता के विभिन्न शृंगार हैं। एक ही अनेक हुआ है, इसलिए अनेक का सम्मान किया जाता है। सब एक हैं। इसी आधार पर हम हर विषय को देखते और उससे व्यवहार करते हैं।”
उन्होंने कहा, “हिन्दू’ शब्द को हम किसी धार्मिक आचरण या जीवन-शैली के आधार पर नहीं समझ सकते। हिन्दू एक प्रकृति है। समाज को ऐसी प्रकृति की आवश्यकता है, जो सभी विविधताओं को स्वीकार करे और उनका सम्मान करे, क्योंकि उसका विश्वास है कि सभी मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं। सभी विविधताएं एकता की ही विविध अभिव्यक्तियां हैं। इसलिए जब हम उस एकता को देखते हैं, तब सभी विविधताओं का सम्मान और स्वीकार करना संभव होता है। यही हिन्दू विचार है, यही हिन्दू प्रकृति है। हिन्दू समाज और भारत के इतिहास में यही दिखाई देता है। इसलिए जब हम हिन्दू कहते हैं, तो यह कोई धर्म नहीं है। यह केवल एक शब्द भी नहीं है। हिन्दू धर्म की विभिन्न परंपराएं अपनी विशिष्ट दर्शन-पद्धतियों और आचरण के साथ इस व्यापक हिन्दू सभ्यतागत परिवेश के भीतर अस्तित्व में रह सकती हैं।” उन्होंने यह बात ‘हिन्दू राष्ट्र’ और ‘हिंदुत्व’ की अवधारणा से संबंधित प्रश्न के उत्तर में कही।

भविष्य की पीढ़ी की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उन्हें नई पीढ़ी पर अधिक विश्वास है। उनमें दुनिया को बेहतर बनाने की तीव्र आकांक्षा है और इस उद्देश्य के लिए वे विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे मतभेदों से ऊपर उठने को तैयार हैं। “वे अधिक ईमानदार होते हैं। उम्र बढ़ने के साथ स्वाभाविक रूप से ऐसा होता है कि हम अनेक अनुभवों से गुजरते हैं और इसलिए अधिक सतर्क हो जाते हैं। हम हर समय खुलकर नहीं बोलते। हम यह सोचते रहते हैं कि आगे क्या होगा, क्योंकि हमें पता होता है कि क्या-क्या हो सकता है। युवा पीढ़ी के पास ऐसे अनुभव नहीं होते। यदि उन्हें कुछ सही लगता है, तो वे उसे सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं और उसी के अनुसार कार्य करते हैं। वे परिणामों को लेकर चिंतित नहीं होते, क्योंकि वे युवा हैं। इसलिए यदि हम उन्हें यह उद्देश्य दें और अपने अनुभव से प्राप्त आवश्यक ज्ञान तथा दृष्टि प्रदान करें, बिना उसे उन पर थोपे, तो हमें उन्हें अपना मार्ग स्वयं खोजने देना चाहिए।”

भारत के सामने भविष्य की चुनौतियों से निपटने में युवा हिन्दुओं की भूमिका के संबंध में सरसंघचालक जी ने कहा कि युवा पीढ़ी का दायित्व अपने मूल्यों के अनुसार जीवन जीना है। इसलिए सेवा के क्षेत्र में भी उन्हें यही भाव रखना होगा। “सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। सेवा ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिससे आप महान बनते हैं। यह उपकार नहीं है और न ही यह ऐसा कुछ है जो आप मानवता पर किसी करुणा के रूप में कर रहे हैं। हम कहते हैं कि सेवा ईश्वर के निकट जाने का आपका अवसर है। आप जिनकी सेवा कर रहे हैं, उन पर कोई उपकार नहीं कर रहे। वे आपको सेवा का अवसर देकर आपके ऊपर बहुत बड़ा उपकार कर रहे हैं। इसलिए सेवा इसी भाव के साथ की जानी चाहिए।”

ब्रिटिश हिन्दुओं की निष्ठा को लेकर यूनाइटेड किंगडम में उठाए जाने वाले प्रश्न तथा एक ब्रिटिश स्वयंसेवक से संघ की अपेक्षाओं के संबंध में अंतिम प्रश्न पूछा गया। इसका उत्तर देते हुए सरसंघचालक जी ने कहा, “कोई संघर्ष नहीं है। यदि ब्रिटिश हिन्दू अच्छे, पक्के और सच्चे हिन्दू हैं, तो ब्रिटेन और भारत के हितों के बीच कभी कोई संघर्ष नहीं होगा। यदि कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, तो स्वाभाविक रूप से ब्रिटिश हिन्दू ब्रिटेन के साथ जाएंगे। अपवाद हो सकते हैं, लेकिन हिन्दुत्व इस विषय पर स्पष्ट है। आपकी कर्मभूमि ही वह स्थान है, जहां आपकी निष्ठा होती है। आपकी जन्मभूमि – अर्थात आपकी उत्पत्ति या जन्म का स्थान – और आपकी पुण्यभूमि वह स्थान है, जहां से आपको अपने मूल्य प्राप्त होते हैं। आपको उन्हीं मूल्यों को अपनी कर्मभूमि में जीना है और जिस भूमि पर आप रहते हैं, उसकी सेवा करनी है।”
हिन्दुओं के एकजुट न होने की धारणा तथा एकता के सार के संबंध में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा, “यदि आप श्रोताओं को देखें या सामान्य रूप से समाज को देखें, तो मानव समाज में विविधता है और यह स्वाभाविक है। हमें इसके साथ चलना है। लेकिन अपना जोर इस बात पर होना चाहिए कि हमें क्या जोड़ता है, न कि इस बात पर कि हमें क्या विभाजित करता है। यदि हम ऐसा करेंगे, तो हमारे समुदाय, हमारा समाज समृद्ध होगा और दुनिया एक बेहतर स्थान बनेगी। हमें यही करना होगा।”

इस संवाद का संचालन यूनाइटेड किंगडम निवासी वेलनेस विशेषज्ञ ममता सुब्रह्मण्यम ने किया। हिन्दू स्वयंसेवक संघ, यूनाइटेड किंगडम (HSS UK) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 600 लोग उपस्थित रहे, उन्होंने 326 संगठनों का प्रतिनिधित्व किया। कार्यक्रम में हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य, सांसद (हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य), मेयर, काउंसिलर्स तथा यूनाइटेड किंगडम में भारत के उच्चायुक्त पेरियासामी कुमारन, उप उच्चायुक्त कार्तिक पांडे सहित समुदाय के अन्य प्रमुख नेता उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत नेपाल में आई बाढ़ के कारण जान गंवाने वाले लोगों तथा विस्थापित परिवारों की स्मृति में मौन रखकर हुई। कार्यक्रम के दौरान बताया गया कि Sewa UK ने नेपाल में राहत कार्यों के लिए अंश दान के माध्यम से 1,00,000 पाउंड जुटाए हैं।

सरसंघचालक जी की यह यात्रा आरएसएस के शताब्दी वर्ष के तहत सेवा, सामाजिक समरसता और साझा मूल्यों पर केंद्रित सभ्यतागत संवाद कार्यक्रम का हिस्सा है। लंदन प्रवास के दौरान सरसंघचालक जी ने विभिन्न धर्मों के प्रमुख नेताओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं तथा अन्य सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों से मुलाकात की। अंतरधार्मिक संवाद के अंतर्गत उन्होंने श्री स्वामीनारायण मंदिर, विल्सडन, खालसा जत्था ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारा तथा लंदन के अन्य धार्मिक स्थलों का भी दौरा किया। यूके में हिन्दू समाज के विभिन्न वर्गों और भाषायी विविधता का प्रतिनिधित्व करने वाले 11 भाषा-समुदायों ने भी इस कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

भारत में लांच हुआ बच्चों की सुरक्षा के लिए दुनिया का अपनी तरह का पहला एआई आधारित टूल ‘रक्षा’

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दिल्ली । भारत ने बच्चों को निशाना बनाकर किए जाने वाले अपराधों के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में स्वयं को अग्रिम पंक्ति में स्थापित करते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से संचालित अपनी तरह का पहला और अनोखा प्रौद्योगिकी सक्षम टूल ‘रक्षा’ पेश किया है जिसे बच्चों की ट्रैफिकिंग, बाल विवाह तथा बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (सी-सीम) की प्रभावी रोकथाम के लिए तैयार किया गया है। एआई आधारित इस टूल को 16 से 20 फ़रवरी 2026 के बीच आयोजित होने वाले भारत सरकार के इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 से पहले लांच किया गया है। बच्चों की सुरक्षा के लिए विकसित इस क्रांतिकारी प्रौद्योगिकी-सक्षम टूल ‘रक्षा’ को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी तथा वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने ‘प्रॉस्पेरिटी फ़्यूचर्स: चाइल्ड सेफ्टी टेक समिट’ में लांच किया, जो भारत सरकार के एआई इम्पैक्ट समिट 2026 का आधिकारिक प्री-समिट कार्यक्रम है। यह सम्मेलन इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सहयोग से जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) ने अपने रणनीतिक साझेदार इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन के साथ मिलकर आयोजित किया।

बच्चों की सुरक्षा के लिए इस टूल ‘रक्षा’ को जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने तैयार किया है जिसके 250 से अधिक सहयोगी नागरिक समाज संगठनों का नेटवर्क बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों की रोकथाम, पहचान और प्रभावी प्रतिक्रिया को सशक्त बनाने के लिए देश के 451 जिलों में जमीन पर काम कर रहा है।
‘रक्षा’ देशभर के बच्चों से संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण करता है और उन्नत एआई क्षमताओं का उपयोग कर वास्तविक समय में बच्चों की ट्रैफिकिंग और बाल विवाह के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों का मानचित्रण, संवेदनशील बच्चों और समुदायों की पहचान, ट्रैफिकिंग जैसे मुनाफे वाले संगठित अपराध में शामिल गिरोहों की निगरानी, उसके स्रोत और गंतव्य बिंदुओं की ट्रैकिंग तथा शोषण के उभरते रुझानों व नए केंद्रों का पता लगाने में सक्षम बनाता है।

बाल सुरक्षा पर अपनी तरह के पहले सम्मेलन को डिजिटली संबोधित करते हुए केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी और वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने कहा, “प्रौद्योगिकी का वास्तविक मूल्यांकन सबसे संवेदनशील तबकों व लोगों की सुरक्षा में निहित है। बच्चे हमारे भविष्य का प्रतिनिधित्व करते हैं और यह हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि जिस डिजिटल दुनिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को वे विरासत में पाएं, वह सुरक्षित, समावेशी और उन्हें सशक्त करने वाली हो। यह जानकर मुझे प्रसन्नता है कि जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन बच्चों की सुरक्षा, सशक्तीकरण और संरक्षण के लिए एआई-आधारित टूल की शुरुआत कर रहा है।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भावनाओं को प्रतिध्वनित करते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने आगे कहा कि ‘रक्षा’ टूल बच्चों की सुरक्षा व संरक्षण के मूल्यों को समाहित करने के साथ और एक सुदृढ़ बाल संरक्षण प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए काम कर रहा है। उन्होंने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन को इस जिम्मेदारी को पूरी प्रतिबद्धता के साथ निभाने और एआई व प्रौद्योगिकी के उपयोग के माध्यम से देश के बच्चों के सुरक्षित वर्तमान व समृद्ध भविष्य पर रचनात्मक विमर्श के लिए सभी पक्षों व हितधारकों को एक मंच पर लाने व इस सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए बधाई दी।

इस बात को रेखांकित करते हुए कि ‘रक्षा’ किस प्रकार बाल संरक्षण के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को रूपांतरित कर सकता है, जस्ट राइट्स फ़ॉर चिल्ड्रेन के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा, “बाल संरक्षण प्रणालियों को सुदृढ़ करने और बच्चों की सुरक्षा व समृद्धि को आगे बढ़ाने में एआई के उपयोग में भारत अग्रणी भूमिका निभा रहा है। तकनीक के उपयोग से दुनिया का सबसे समग्र बाल संरक्षण पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित करने की दिशा में ‘रक्षा’ भारत के वैश्विक नेतृत्व का एक ऐतिहासिक पड़ाव है। ‘रक्षा’ का एक मंच के रूप में उपयोग करते हुए, भारत तकनीक के सहारे देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले प्रत्येक बच्चे और हर संवेदनशील परिवार की पहचान और निगरानी कर सकता है। आंकड़ों को ज्ञान और ठोस कार्रवाई में रूपांतरित कर यह दृष्टिकोण न्याय तक पहुंच का विस्तार कर रहा है, संवेदनशील परिवारों के लिए सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार ला रहा है, और बच्चों के सुरक्षित व समृद्ध भविष्य के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ कर रहा है। साथ मिलकर हम हर बच्चे के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल करेंगे।”

बच्चों के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम में एआई की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए सांसद लावू श्रीकृष्ण देवरायलु ने कहा, “कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब कोई भविष्य का वादा नहीं रही, बल्कि मौजूदा समय की सच्चाई बन चुकी है। यह इस बात को आकार दे रही है कि हम कैसे सीखते हैं, शासन करते हैं, काम करते हैं और इससे आगे बढ़कर यह भी तय कर रही है कि हमारे बच्चे किससे और कैसे जुड़ते हैं। एआई हमें प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर रोकथाम की ओर, नुकसान के महज दस्तावेजीकरण से आगे बढ़कर जोखिम का पूर्वानुमान लगाने की क्षमता देती है। भौगोलिक परिस्थितियों, प्रवासन, स्कूलों में उपस्थिति और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से जुड़ी बाल-संवेदनशीलता के पैटर्न पहले से ही समेकित डेटा प्रणालियों में मौजूद हैं। एआई इन बिंदुओं को जोड़कर समय से पूर्व चेतावनियां और ऐसे हस्तक्षेप संभव बनाती है, जिनसे नुकसान होने से पहले ही उसे रोका जा सके। ऐसे तंत्र मानवीय विवेक का स्थान नहीं लेते, बल्कि उसे सशक्त करते हैं, क्योंकि रोकथाम केवल एक तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि एक नैतिक अनिवार्यता है। हमारे सामने मौजूद चुनौती सरकार, तकनीक विशेषज्ञों, नागरिक समाज, शिक्षा जगत और समुदायों के बीच सहयोग की मांग करती है।” लावू ‘एमपी’ज फॉर चिल्ड्रेन’ के संयोजक हैं जो बच्चों और उनके अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाला मंच है।

‘रक्षा’ को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि वह बाल संरक्षण पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर रोकथाम और जांच एजेंसियों- दोनों को सुदृढ़ करे। इसके लिए यह तीन लक्ष्य केंद्रित टूल का उपयोग करता है। पहला टूल व्यापक स्तर पर परिवारों की आर्थिक असुरक्षा को कम कर रोकथाम पर काम करता है, विशेषकर बाल विवाह के विरुद्ध। दूसरा टूल ट्रैफिकिंग जैसे संगठित आर्थिक अपराध से निपटता है। यह एक तरफ अपराध के घटित होने से पहले ही उसका पूर्वानुमान और रोकथाम, व दूसरी ओर पैसे के लेनदेन की पड़ताल कर संगठित आपराधिक गिरोहों की जड़ों और उनके विस्तार की पहचान करने पर केंद्रित है। तीसरा टूल डिजिटल बाल संरक्षण को सशक्त करता है और यह बाल यौन शोषण सामग्री के निर्माण, उसके अपलोड, डाउनलोड और देखने से जुड़े ऑनलाइन हीट जोन और आईपी पतों का पता लगाने, उनके विश्लेषण और मानचित्रण में सक्षम है।

यह शिखर सम्मेलन चार पूर्ण सत्रों में विभाजित था, जिनमें ‘सामाजिक परिवर्तन में एआई की भूमिका’, ‘रक्षा: बच्चों के लिए सुरक्षित डिजिटल स्पेस की रूपरेखा’, ‘टेक फॉर गुड’ तथा ‘एआई, जागरूकता और कार्रवाई: भविष्य के लिए संप्रेषण और विमर्श’ शामिल थे। इन सत्रों के दौरान वक्ताओं ने पूर्वानुमान आधारित रोकथाम, व्यवहार विश्लेषण में एआई की भूमिका, कानून और जमीनी कार्रवाइयों के साथ उसके समन्वय, तथा डिजिटल युग में बच्चों के लिए जोखिमों, अधिकारों और जिम्मेदारियों पर विस्तार से चर्चा की।

दिन-भर चले इस शिखर सम्मेलन में दया शंकर, उप सचिव एवं निदेशक, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय; प्रियंका ऋभु, प्रमुख, सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियरल चेंज फॉर चिल्ड्रेन (सी-लैब); मैथिल्द सेरियोली, मुख्य वैज्ञानिक, एवरीवन एआई, परिषद सदस्य, चैटजीपीटी; नोमिशा कुरियन, सहायक प्रोफेसर, वारविक विश्वविद्यालय; जी. के. गोस्वामी, अपर महानिदेशक एवं निदेशक, फॉरेंसिक संस्थान, उत्तर प्रदेश; हर्षवर्धन, पुलिस अधीक्षक, तेलंगाना साइबर सुरक्षा ब्यूरो; धनंजय टिंगल, कार्यकारी निदेशक, एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन; अनिल रघुवंशी, संस्थापक एवं अध्यक्ष, चाइल्डसेफनेट; बैली सैपल, विकास प्रमुख, वी प्रोटेक्ट ग्लोबल एलायंस; अनुप्रिया मोहता, पब्लिक पॉलिसी मैनेजर, यूट्यूब; डॉ. ई. खलियाराज, निदेशक, राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा अनुसंधान परिषद; मयंक, अपर महानिदेशक, रेलवे पुलिस बल; व संपूर्णा बेहुरा, कार्यकारी निदेशक, इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन, गौरव मित्तल, प्रिंसिपल अप्लाइड साइंटिस्ट, माइक्रोसॉफ्ट यूएस और अतुल अग्रवाल, सीईओ एस्प्रिफाई एंटरप्राइजेज प्राइवेट लिमिटेड मौजूद थे।

नीति आयोग के साथ साझेदारी में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने अकेले 2025 में आर्थिक रूप से संवेदनशील 20 लाख से ज्यादा परिवारों को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा, 198,628 बाल विवाह रोके और ट्रैफिकिंग व शोषण के शिकार 55,146 बच्चों को मुक्त कराया। जेआरसी की याचिका पर फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन शोषण व दुर्व्यवहार सामग्री देखने, डाउनलोड करने व साझा करने को अपराध घोषित किया और चाइल्ड पोर्नोग्राफी शब्द की जगह बाल यौन शोषण व दुर्व्यवहार सामग्री शब्द के उपयोग का आदेश दिया। नेटवर्क ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ समन्वय से सी-सीम के 73,258 मामलों में कार्रवाई शुरू की। रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) के साथ समझौते के तहत यह रेल के जरिए बच्चों की ट्रैफिकिंग की रोकथाम व उन्हें मुक्त कराने में उसके साथ करीबी समन्वय से काम करता है।

भारत सरकार 16 से 20 फरवरी तक इंडिया-एआई इंपैक्ट समिट का आयोजन कर रही है जो ग्लोबल साउथ में अपनी तरह का पहला आयोजन है। इस शिखर सम्मेलन में वैश्विक नेता, सीईओ और नीति निर्माता कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इस पर विमर्श को आकार देने में भारत की बढ़ती भूमिका पर चर्चा करेंगे। इससे पहले भारत सरकार के सहयोग से एआई पर इस तरह के आयोजन किए जा रहे हैं।

जब PCI में पत्रकार ही नहीं, तो उसकी प्रासंगिकता क्या?

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी। कई महीनों की अनिश्चितता के बाद भी, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को अपना चेयरमैन तो मिल गया, लेकिन 13 कामकाजी पत्रकारों (एडिटर और नॉन-एडिटर दोनों कैटेगरी में) की जगह अभी भी खाली है। PCI एक कानूनी, अर्ध-न्यायिक और स्वतंत्र संस्था है। इसे शुरू में 1966 में प्रेस काउंसिल एक्ट 1965 के तहत बनाया गया था और बाद में 1979 में प्रेस काउंसिल एक्ट 1978 के तहत फिर से स्थापित किया गया, जिसका मकसद भारत में अखबारों और समाचार एजेंसियों के स्टैंडर्ड को बेहतर बनाना था। गौरतलब है कि जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई, जिन्होंने 17 जून 2022 से 16 दिसंबर 2025 तक PCI चेयरमैन के तौर पर काम किया, उन्होंने 24 अप्रैल 2026 को फिर से पद संभाला। सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज को तीन साल के एक और कार्यकाल के लिए नॉमिनेट किया गया था। लेकिन कामकाजी पत्रकारों का कोटा अभी भी खाली है, क्योंकि PCI की 15वीं काउंसिल को पूरा करने के लिए सात सदस्य (एडिटर के अलावा पेशेवर पत्रकारों द्वारा प्रतिनिधित्व) और छह सदस्य (पत्रकार-एडिटर द्वारा) अभी चुने जाने बाकी हैं।

कुछ महीने पहले, राज्यसभा सदस्य सस्मित पात्रा ने नई दिल्ली में केंद्र सरकार से आग्रह किया था कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा और मीडिया की जवाबदेही को मजबूत करने के मकसद से PCI की मौजूदा काउंसिल को पूरा किया जाए। 10 फरवरी को संसद के ऊपरी सदन में बोलते हुए, बीजू जनता दल के नेता ने कहा कि 14वीं काउंसिल, जिसका कार्यकाल 5 अक्टूबर 2024 को खत्म हो गया था, के बाद पूरी काउंसिल का गठन एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और जिम्मेदार प्रेस के लिए जरूरी था। पात्रा ने खास तौर पर नए चेयरमैन की नियुक्ति पर जोर दिया, क्योंकि PCI पिछले साल 17 दिसंबर से बिना प्रमुख के चल रही थी, ताकि PCI की काउंसिल को पूरा करने का रास्ता साफ हो सके। इससे पहले, केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद को बताया था कि इन सदस्यों (कामकाजी पत्रकारों की कैटेगरी के तहत) के नॉमिनेशन की प्रक्रिया दिल्ली हाई कोर्ट में विचाराधीन थी।
फिलहाल PCI के काम कर रहे सदस्यों में डॉ. सुधांशु त्रिवेदी, बृज लाल (राज्यसभा सांसद), डॉ. संबित पात्रा, नरेश गणपत म्हस्के और काली चरण मुंडा (लोकसभा सांसद), प्रो. अश्विनी के. महापात्रा (यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन), मनन कुमार मिश्रा (बार काउंसिल ऑफ इंडिया), डॉ. के. श्रीनिवासराव (साहित्य अकादमी), सुधीर कुमार पांडा (छोटे-मंझोले-बड़े अखबारों की सोसाइटी), एम.वी. श्रेयम्स कुमार (इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी), गुरिंदर सिंह (ऑल इंडिया छोटे और मंझोले अखबारों का फेडरेशन और छोटे-मंझोले-बड़े अखबारों की सोसाइटी), अरुण कुमार त्रिपाठी (ऑल इंडिया छोटे और मंझोले अखबारों का फेडरेशन और छोटे-मंझोले-बड़े अखबारों की सोसाइटी), ब्रज मोहन शर्मा (छोटे-मंझोले-बड़े अखबारों की सोसाइटी, इंडिया छोटे और मंझोले अखबारों का फेडरेशन और इंडिया छोटे अखबारों का एसोसिएशन) और आरती त्रिपाठी (इंडिया छोटे अखबारों का एसोसिएशन, छोटे-मंझोले-बड़े अखबारों की सोसाइटी और इंडिया छोटे और मंझोले अखबारों का फेडरेशन) शामिल हैं।
बार-बार रुकावटें आने के बावजूद, बाकी 14 सीटों (जो काम करने वाले पत्रकारों – जैसे एडिटर/एडिटर के अलावा अन्य और समाचार एजेंसी मैनेजमेंट – का प्रतिनिधित्व करती हैं) को भरने की कोशिशें जारी हैं। 29 सदस्यों वाली मीडिया वॉचडॉग की 15वीं काउंसिल का कार्यकाल 4 अक्टूबर 2027 को खत्म होगा। लेकिन अब तक, 13 सदस्यों के पद (जो पेशेवर पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनमें से 6 का एडिटर होना ज़रूरी है और 7 अखबारों/समाचार एजेंसियों के काम करने वाले पत्रकार होने चाहिए) अभी भी खाली हैं। यह संकट तब शुरू हुआ जब कुछ राष्ट्रीय पत्रकार संगठनों ने PCI के नियमों में बदलाव का विरोध किया, जिसके तहत काम करने वाले पत्रकारों की राष्ट्रीय यूनियन के बजाय अलग-अलग प्रेस क्लबों से सदस्य चुने जाने थे। उनका तर्क है कि प्रेस क्लब असल में मनोरंजन के लिए बने संगठन हैं और उनका दायरा आम तौर पर किसी खास इलाके, शहर या कस्बे तक ही सीमित रहता है।
कई प्रेस क्लब अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए गैर-पत्रकारों (जैसे शिक्षाविदों, लेखकों, फिल्मी हस्तियों और राजनयिकों) को भी सदस्यता देते हैं, इसलिए हो सकता है कि उनके सदस्य कई अहम मौकों पर पेशेवर मीडिया कर्मियों के हितों का सही तरह से ध्यान न रख पाएं। साफ तौर पर कहें तो, प्रेस क्लब/प्रेस गिल्ड/मीडिया क्लब पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन नहीं हो सकता (भले ही उसका नाम ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ जैसा ही क्यों न हो), क्योंकि इसमें इतने बड़े देश के अलग-अलग हिस्सों से प्रतिनिधि नहीं होते। दूसरी ओर, उनका तर्क था कि मान्यता प्राप्त पत्रकार यूनियनों में आम तौर पर भारत के अलग-अलग हिस्सों से सदस्य होते हैं। इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन और ऑल इंडिया वर्किंग न्यूज़ कैमरामैन एसोसिएशन ने मीडिया पेशेवरों के लिए न्याय की मांग करते हुए अदालत का दरवाज़ा भी खटखटाया था।
जब PCI कई महीनों तक बिना चेयरमैन के रही (ऐसा PCI के इतिहास में पहली बार हुआ था), तो यह सवाल उठा कि भारत के बड़े प्रिंट मीडिया समुदाय (जिसमें ‘रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स फॉर इंडिया’ द्वारा मान्यता प्राप्त 1,00,000 से ज़्यादा प्रकाशन शामिल हैं, जो अलग-अलग भाषाओं और समय-अंतराल पर छपते हैं) की देखभाल कौन कर रहा था। क्योंकि PCI के पास किसी भी अखबार/समाचार एजेंसी या एडिटर/काम करने वाले पत्रकार के खिलाफ पेशेवर कदाचार (जिससे पत्रकारिता के व्यवहार का स्तर गिरता हो) की शिकायतें स्वीकार करने का अधिकार है, भले ही उसके पास नियमों के उल्लंघन के लिए प्रिंट आउटलेट और उनके एडिटर्स व काम करने वाले पत्रकारों को दंडित करके अपने दिशानिर्देशों को लागू करने की सीमित शक्ति ही क्यों न हो।
अखबारों की भारी संख्या के अलावा, एक अरब से ज़्यादा आबादी वाला यह देश लगभग 400 सैटेलाइट न्यूज़ चैनलों के साथ-साथ लाखों पोर्टल्स, व्हाट्सऐप और अन्य डिजिटल मीडिया आउटलेट्स का भी घर है। लेकिन वे अभी PCI के दायरे में नहीं आते हैं। असल में, टेक्नोलॉजी पर आधारित सभी आधुनिक न्यूज़ आउटलेट इसके दायरे से बाहर ही हैं। चूंकि PCI को प्रेस की आज़ादी सुनिश्चित करते हुए किसी भी सरकार के गलत व्यवहार पर टिप्पणी करने का अधिकार है, इसलिए अब सभी न्यूज़ चैनलों, रेडियो और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को PCI के अधिकार क्षेत्र में लाने की मांग बढ़ रही है। क्या भारतीय मीडिया जगत जल्द ही ज़्यादा अधिकार और बड़े दायरे वाली एक मज़बूत और पूरी तरह से काम करने वाली PCI की उम्मीद कर सकता है !
(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया मामलों पर स्तंभकार)

असम और मणिपुर में NRC का मुद्दा फिर गरमाया

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी। पूर्वोत्तर क्षेत्र में कुछ दिलचस्प घटनाक्रम हो रहे हैं। मणिपुर में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC, 1951) को अपडेट करने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो गया है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने NRC, जिसे असम में अपडेट तो किया गया, लेकिन अभी तक रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) ने मंजूरी नहीं दी है, की समीक्षा के लिए एक याचिका स्वीकार की है। इसके अलावा, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने असम में मई 2014 से अक्टूबर 2019 के दौरान हुई NRC अपडेट प्रक्रिया में वित्तीय गड़बड़ी के मामले में केस दर्ज किया है।

इन सबके बीच, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 26 अगस्त 2026 को अवैध प्रवासियों से सख्ती से निपटने के लिए केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। नई दिल्ली में एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए—जिसमें सुरक्षा एजेंसियों, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों समेत वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे—शाह ने घोषणा की कि अवैध रूप से घुसने वालों से संबंधित कानून के तहत निपटा जाएगा। दरअसल, ऐसी अटकलें हैं कि सरकार जल्द ही पूरे भारत में अनधिकृत लोगों की पहचान के लिए देशव्यापी स्क्रीनिंग शुरू कर सकती है।
इस बीच, मई 2023 से बार-बार हिंसा की आग में जल रहे मणिपुर में जनगणना-2027 से पहले NRC को अपडेट करने की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर जन-प्रदर्शन हुए हैं। बहुसंख्यक मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच जारी झड़पों में 250 से अधिक लोग मारे गए और हजारों लोग विस्थापित हुए। मणिपुर में घर-घर जाकर डिजिटल सर्वे 1 सितंबर से शुरू होने वाला है, लेकिन राज्य के निवासियों का एक बड़ा वर्ग इससे पहले NRC को अपडेट करने के लिए आंदोलन कर रहा है। उनका तर्क है कि जनगणना के आंकड़ों की मदद से कई अवैध प्रवासी, खासकर म्यांमार के लोग, नागरिकता सूची में अपना नाम दर्ज करा लेंगे।
‘कैंपेन फॉर जस्ट एंड फेयर डेलिमिटेशन’ (JFD) के नेतृत्व में और मणिपुर के नागरिक समाज संगठनों, महिला तथा छात्र-युवा निकायों के समर्थन से चल रहा NRC समर्थक आंदोलन इम्फाल घाटी, जहां हिंदू मैतेई लोगों का वर्चस्व है, से आगे फैल गया है। कुकी-ज़ो लोगों के विपरीत, नागा समूहों ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया है। मणिपुर के मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने भी NRC का समर्थन किया है और राज्य विधानसभा ने 2022 में जनगणना से पहले NRC के पक्ष में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था। खेमचंद से पहले मुख्यमंत्री रहे और भारतीय जनता पार्टी के नेता बीरेन सिंह ने हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में गृह मंत्री शाह को जनगणना गतिविधियों से पहले मणिपुर में NRC के महत्व के बारे में जानकारी दी थी।
लेकिन असम में NRC को अपडेट करने की प्रक्रिया में अनावश्यक अफरातफरी और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई और असम के एक जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारी ने इसके पूरी तरह से दोबारा सत्यापन के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। असम NRC के पूर्व समन्वयक हितेश देवशर्मा अब ड्राफ्ट और सप्लीमेंट्री NRC के व्यापक और समयबद्ध सत्यापन की मांग कर रहे हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में तैयार किया गया था। देवशर्मा ने व्यक्तिगत तौर पर, और साथ ही असम के मूल निवासियों के एक बड़े वर्ग की ओर से, सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। इसके बाद अदालत ने केंद्र सरकार, असम सरकार, NRC राज्य समन्वयक और RGI को नोटिस जारी किए। उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया गलतियों और अनियमितताओं से भरी थी और इससे देश की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
बता दें कि असम के लिए NRC का एक ड्राफ्ट 30 जुलाई 2018 को प्रकाशित किया गया था और बाद में 31 अगस्त 2019 को एक सप्लीमेंट्री सूची जारी की गई थी। इस सूची में 19 लाख से अधिक आवेदक छूट गए थे, जिन्होंने या तो आवेदन नहीं किया था या फिर नकली दस्तावेज जमा किए थे। हैरानी की बात है कि NRC असम के तत्कालीन समन्वयक प्रतीक हजेला ने इसे अंतिम सूची बताकर प्रचारित किया, जबकि ऐसा करना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था। अब देवशर्मा ने चिंता जताई है कि कई अवैध प्रवासियों यानी बांग्लादेशी मुसलमानों को NRC सूची में शामिल किया गया था। इसके लिए हेरफेर वाले सॉफ्टवेयर और कुछ कर्मचारियों, जिनमें उनके पूर्ववर्ती हजेला भी शामिल थे, की व्यक्तिगत भ्रष्टाचार की भूमिका थी। हजेला अब असम प्रशासन से VRS सुविधा का लाभ उठा रहे हैं।
देवशर्मा ने अपने व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि कामरूप जिले में कई लोगों को ‘मूल निवासी’ (OI यानी वे भारत के स्वाभाविक नागरिक हैं और उन्हें कोई दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं है) बताया गया था, जबकि वे सभी बांग्लादेश से आए प्रवासी थे। देवशर्मा ने यह चिंता भी जताई कि कई लोग ‘फैमिली ट्री मैचिंग’ मानदंड को पूरा नहीं कर पाए, फिर भी उनके नाम पिछली NRC सूची में शामिल कर लिए गए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कई गंभीर गलतियों और चूक के बाद इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। इसलिए उन्होंने तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की।
हैरानी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर की गई है, जिसमें उन लोगों को नागरिकता प्रमाण-पत्र जारी करने की अपील की गई है, जिनके नाम NRC सूची में शामिल थे। याचिकाकर्ताओं—जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन—ने शायद इसे अंतिम आधिकारिक दस्तावेज मान लिया है। अब उम्मीद है कि सितंबर के अंत तक अदालत में इन दोनों मामलों की सुनवाई होगी।
ED के शामिल होने से NRC को अपडेट करने की प्रक्रिया—जिस पर केंद्र सरकार ने करीब 1,600 करोड़ रुपये खर्च किए थे—और भी उलझ गई है। कम से कम 260 करोड़ रुपये के गलत इस्तेमाल का मामला सामने आया है, जैसा कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG ने बताया है। 31 मार्च 2020 को समाप्त हुए वर्ष के लिए सामाजिक, आर्थिक और सामान्य क्षेत्रों पर CAG की रिपोर्ट में NRC अपडेट करने के दौरान हुई अनियमितताओं का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट में हजेला और सिस्टम इंटीग्रेटर विप्रो लिमिटेड के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की भी सिफारिश की गई थी।
असम के लोगों को NRC पर लिखी गई एक किताब याद हो सकती है, जिसे असम के ही एक टेलीविजन पत्रकार ने लिखा था। इसमें हजेला की बेहतरीन कार्य के लिए जमकर तारीफ की गई थी। सोशल मीडिया पर उसका नाम लेकर उन्हें NRC घोटाले से फायदा उठाने वाला बताया गया। वह टॉक शो होस्ट हजेला की बात को ही दोहराता रहा कि यह फाइनल NRC है और असम के लोगों को इसे बिना किसी और जांच-पड़ताल के स्वीकार कर लेना चाहिए। पता नहीं ऐसा कहने से उसे क्या फायदा हुआ, लेकिन असमिया समुदाय को इससे नुकसान होने की पूरी संभावना है। भगवान उसे सद्बुद्धि दे!
(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)
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