2 मई 2013 : पाकिस्तान की जेल में निर्दोष सरबजीत की हत्या

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दिल्ली । सरबजीत सिंह वो निर्दोष भारतीय नागरिक था जो नशे की हालत में धोखे से पाकिस्तान की सीमा में चला गया । जेल में कठोर यातनायें देकर कैदियों ने हत्या कर दी । और शव भारत आया तो उसके शरीर के सभी आंतरिक अंग गायब थे ।

किसी भी सरकार की विदेश नीति और नेतृत्व कैसा होना चाहिए। कहाँ मानवीय पक्ष को प्राथमिकता हो कहाँ सख्त तेवर दिखाये जाये ये दोनों उदाहरण भारत की विभिन्न सरकारों की कार्यशैली में देखने को मिलते हैं। एक उदाहरण निर्दोष नागरिक सरबजीत सिंह का है जो धोखे से पाकिस्तान चला गया । उसे बंदी बनाकर जेल भेज दिया गया जहाँ तेइस वर्षों तक जेल में कठोर यातनाएँ देकर कैदियों ने मार डाला और भारत सरकार केवल विरोध पत्र लिखने के अतिरिक्त कुछ न कर सकी । भारत का ही दूसरा उदाहरण विंग कमांडर अभिनंदन का है जो एयर स्ट्राइक के लिये विमान लेकर पाकिस्तान सीमा में गये थे, बंदी बनाये गये लेकिन यह भारतीय नेतृत्व का दबाव था कि केवल 60 घंटों में ही पाकिस्तान ने अभिनंदन को सम्मान भारत वापस भेज दिया । जिन दिनों सरबजीत पाकिस्तान की जेल में था तब भारत में हर दल की सरकार रही । सबसे लंबी दो सरकारें काँग्रेस की रहीं। पहले प्रधानमंत्री नरसिंहराव की और फिर दस वर्ष मनमोहन सिंह की सरकार रही । पर सरबजीत की भाग्य न बदला । पाकिस्तानी जेल में उसे सतत यातनायें मिलीं । सरबजीत सिंह का जन्म पंजाब के तरनतारन जिला अंतर्गत गांव भीखीविंद में हुआ था । यह एक किसान परिवार था लेकिन पिता सुलक्षण सिंह ढिल्लो अपने गाँव से दूर उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग में नौकरी करने लगे । मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर सरबजीत गांव लौट आये और खेती करने लगे । अपनी आय बढ़ाने केलिये एक ट्रेक्टर खरीदकर भाड़े पर दूसरे गांवों में भी खेती करने लगे। 1984 में विवाह हुआ और दो बेटियों के पिता बने । जीवन खुशी से बीतने लगा । समय के साथ उन्हें शराब पीने की आदत लग गई और यही आदत पूरे घर का सुख चैन और उनकी जान ले बैठी । वह 28 अगस्त 1990 का दिन था। वे पाकिस्तान सीमा से लगे गांव में भाड़े पर ट्रैक्टर चला रहे थे । शाम को काम समाप्त कर शराब पी, भोजन किया शाम को लौटने लगे । तब सीमा पर तार की बागड़ नहीं लगी थी । सरबजीत नशे में रास्ता भटक गये और पाकिस्तान सीमा में घुस गये । पाकिस्तानी सेना पकड़ लिया । उनपर जासूसी का आरोप लगाकर सात दिन प्रताड़नाएँ दी गईं । उनपर आरोप लगाया गया कि वे सरबजीत सिंह नहीं मंजीत सिंह हैं। पाकिस्तान में इस नाम से एक एफआईआर थी । सेना ने इसी नाम से अदालत में पेश किया और आरोप लगाया कि आरोपी सही नाम न बता रहा । सेना ने सरबजीत सिंह को अदालत में मंजीत सिंह के नाम से पेश किया । अदालत में उन्हें भारतीय गुप्तचर संस्था रॉ का एजेंट बताकर लाहौर, मुल्तान और फैसलाबाद बम धमाकों का आरोपी भी बनाया गया। इन आरोपों पर अदालत ने अक्टूबर 1991 में उन्हें फांसी की सजा सुना दी ।

सरबजीत सिंह के परिवार ने भारत सरकार से भी संपर्क किया और मानवाधिकार संगठनों से भी । प्रमाण के बताया गया कि वे मंजीत सिंह नहीं सरबजीत सिंह हैं। लिखापढ़ी आरंभ हुई । भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने पत्र भी लिखे । इससे फांसी की सजा टलती रही पर सरबजीत रिहा न हो सके ।
1990 से 2013 तक यद्यपि भारत में विभिन्न राजनैतिक दलों की सरकारें रहीं। काँग्रेस के नेतृत्व में नरसिंहराव सरकार, मनमोहन सिंह सरकार और भाजपा नेतृत्व में अटलजी की सरकार । लेकिन ये सभी सरकारें राजनैतिक अस्थिरता के दौर में रहीं और पाकिस्तान सरकार पर कोई दबाव नहीं बना सकीं। इसका पूरा लाभ पाकिस्तान ने उठाया । 1990 से लेकर 2013 तक भारत में न केवल निर्दोष सरबजीत सिंह पर क्रूरता हुई अपितु पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी घटनाएँ भी बढ़ी । पाकिस्तान ने अनेक झूठ रचे । फर्जी दस्तावेज तैयार किये ऐसे गवाह भी खड़े किये कि सरबजीत सिंह ही असली मंजीत सिंह है । और वह खुशी मोहम्मद के नाम से पाकिस्तान में आया था । 2005 में एक दावा तो यह भी किया कि सरबजीत सिंह उर्फ मंजीत सिंह ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है । इस खींचतान और लिखापढ़ी के बीच फांसी की सजा तो टली पर सरबजीत सिंह को रिहाई न मिली ।

रिहाई की उम्मीद और फांसी की आशंका के बीच सरबजीत सिंह लाहौर सेन्ट्रल जेल में यातनाएँ सहते रहे । लेकिन रिहाई उम्मीद कमजोर हो गई। 26 अप्रैल 2013 को लाहौर जेल के कुछ कैदियों ने सरबजीत सिंह पर हमला बोल दिया था। रीढ़ की हड्डी सहित उनके शरीर की कई हड्डियाँ टूट गईं थीं। बहुत गंभीर स्थिति में अस्पताल लाया गया । वे कोमा में थे और उनकी रीड की हड्डी भी टूट चुकी थी। फिर भी हॉस्पिटल में उन्हें वेंटीलेटर पर रखा । 29 अप्रैल 2013 को भारत सरकार ने एक बार फिर पकिस्तान से रिहा करने की अपील की । जिसे पकिस्तान सरकार ने खारिज कर दिया ।

1 मई 2013 को जिन्ना अस्पताल के डॉक्टरो ने सरबजीत सिंह को ब्रेनडेड और 2 मई 2013 को मृत घोषित कर दिया । उनका शव भारत आया । भारत में शव का पोस्टमार्टम हुआ । भारतीय डॉक्टर यह देखकर आश्चर्य चकित रह गये कि उनके शरीर के अधिकांश मुख्य अंग निकाल लिये गये थे । क्यों निकाले इसका उत्तर कभी न मिला और न पाकिस्तान ने स्वीकार किया ।

सरबजीत सिंह के परिवार को पंजाब और केंद्र सरकार ने आर्थिक सहायता दी और पंजाब में तीन दिन का शोक भी घोषित हुआ पर सरबजीत सिंह के प्राण के साथ भारत की प्रतिष्ठा भी न बच सकी ।

इस संदर्भ वर्ष 2019 की उस घटना उल्लेख संभवतः उचित होगा जब एयर स्ट्राइक के दौरान विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान में गिरफ्तार हो गये तब भारत सरकार का यह दबाव था पाकिस्तान ने केवल साठ घंटे के भीतर सम्मान वापस किया । बाद में अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में कहा गया कि यदि पाकिस्तान विंग कमांडर अभिनंदन को रिहा न करता तो भारत ने पाकिस्तान पर आक्रमण की तैयारी कर ली थी । पाकिस्तान की जेल में जब सरबजीत सिंह की क्रूरता पूर्वक हत्या हुआ तब भारत में मनमोहन सिंह की सरकार थी और जब विंग कमांडर अभिनंदन भारत लौटे तब प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी की सरकार थी ।

लोजपा युवा नेता डॉ. विभय कुमार झा ने विभागीय सचिव कपिल अशोक शीर्षत से की मुलाकात

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दरभंगा । डेयरी, मत्स्य पालन एवं पशुपालन विभाग के सचिव श्री कपिल अशोक शीर्षत से लोक जनशक्ति पार्टी के युवा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सह प्रवक्ता डॉ. विभय कुमार झा ने पटना स्थित विकास भवन में शिष्टाचार मुलाकात की। इस दौरान मिथिला क्षेत्र के समग्र विकास, विशेषकर मत्स्य पालन क्षेत्र में संभावनाओं और उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने को लेकर विस्तृत चर्चा हुई।

मुलाकात के दौरान डॉ. विभय कुमार झा ने मिथिला क्षेत्र में मत्स्य पालन के तेजी से बढ़ते अवसरों पर चर्चा करते हुए भरोसा जताया कि सचिव श्री कपिल अशोक शीर्षत के कार्यकाल में यह क्षेत्र मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में नया मानक स्थापित करेगा। उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाओं और प्रशासनिक प्रतिबद्धता के बल पर मिथिला को मत्स्य पालन के एक सशक्त केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।

एक सवाल के जवाब में डॉ. विभय कुमार झा ने कहा कि बिहार राज्य रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक एवं 2011 बैच के आईएएस अधिकारी श्री कपिल अशोक शीर्षत से उनका वर्षों पुराना आत्मीय संबंध रहा है। उन्होंने कहा कि श्री शीर्षत हमेशा समाज और क्षेत्र के विकास के लिए समर्पित रहे हैं। डॉ. झा ने बताया कि उनके गृह जिले में जिलाधिकारी के रूप में श्री कपिल अशोक शीर्षत ने उल्लेखनीय कार्य किए थे। विकास परियोजनाओं को गति देने के साथ-साथ उन्होंने मिथिला की समृद्ध कला-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को भी प्राथमिकता दी थी, जिसकी चर्चा आज भी क्षेत्र में होती है।

उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के मूल निवासी बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी श्री कपिल अशोक शीर्षत मधुबनी के अलावा मोतिहारी और पटना के जिलाधिकारी के रूप में भी अपनी प्रशासनिक दक्षता का परिचय दे चुके हैं। हर स्थान पर उनकी शालीनता, व्यवहार-कुशलता और संवेदनशील प्रशासनिक शैली की सराहना होती रही है। डॉ. झा ने विश्वास व्यक्त किया कि डेयरी, मत्स्य पालन एवं पशुपालन विभाग में उनके नेतृत्व में बिहार, खासकर मिथिला क्षेत्र, विकास के नए आयाम स्थापित करेगा।

असम चुनाव: बड़ी जीत की उम्मीदों के बीच BJP के सामने ज़मीनी चुनौतियाँ

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नव ठाकुरीया
गुवाहाटी: जैसे ही 29 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दूसरे चरण का मतदान समाप्त हुआ, असम, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के लिए एग्जिट पोल सामने आने लगे। उल्लेखनीय है कि लगभग सभी प्रमुख एग्जिट पोल ने असम में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले गठबंधन की सत्ता में वापसी का अनुमान जताया। हालाँकि, 126 सदस्यीय विधानसभा में सीटों की संख्या को लेकर विभिन्न एजेंसियों के अनुमान 70 से लेकर 100 से अधिक सीटों तक रहे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन और अन्य दलों के लिए अनुमान बहुमत के जादुई आंकड़े 64 सीटों से काफी नीचे रहे। अधिकांश सर्वेक्षणों में यह संकेत दिया गया कि BJP अपने दम पर ही बहुमत का आंकड़ा पार कर सकती है, जबकि कांग्रेस के लिए अनुमानित सीटें लगभग आधी ही बताई गईं।
पीपल्स पल्स रिसर्च संगठन ने अपने एग्जिट पोल में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) के पक्ष में स्पष्ट जनादेश का संकेत देते हुए BJP को 69 से 73 सीटें मिलने का अनुमान लगाया। उसके अनुसार, सहयोगी दल असम गण परिषद (AGP) को 8-11 सीटें और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (BPF) को 8-9 सीटें मिल सकती हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस को 22-26 सीटों तक सीमित रहने का अनुमान दिया गया। अन्य दलों — जैसे ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF), यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (UPPL), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) तथा निर्दलीय उम्मीदवारों — को बहुत कम सीटें मिलने की संभावना जताई गई।
‘टुडेज़ चाणक्य’ ने BJP-नेतृत्व वाले गठबंधन को 93-111 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया, जबकि विपक्षी गठबंधन को 14-32 सीटें और अन्य दलों को दो से अधिक सीटें नहीं मिलने की संभावना जताई। इसी प्रकार, JVC के एग्जिट पोल में BJP-AGP-BPF गठबंधन को 88-101 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया, जबकि विपक्षी गठबंधन को 23-33 सीटें और अन्य दलों को लगभग 5 सीटें मिलने की उम्मीद जताई गई।
Metrize ने सत्ताधारी गठबंधन के लिए 85-95 सीटें, विपक्षी गुट के लिए 25-32 सीटें और अन्य के लिए 6-12 सीटों का अनुमान दिया। वहीं Kamakhya Analytics ने BJP गठबंधन को 85-95 सीटें, विपक्षी गठबंधन को 26-39 सीटें और अन्य को 0-3 सीटें मिलने की संभावना व्यक्त की। Axis My India ने भगवा गठबंधन के लिए 88-100 सीटें और विपक्षी गठबंधन के लिए 24-36 सीटें अनुमानित कीं। इसके अनुसार, BJP अकेले 70-80 सीटें और कांग्रेस 22-30 सीटें जीत सकती है।
इसके अतिरिक्त, Poll Diary ने NDA को 86-101 सीटें, कांग्रेस मोर्चे को 15-26 सीटें और अन्य को शून्य सीटें मिलने का अनुमान दिया। People’s Insight ने BJP को 88-96 सीटें, कांग्रेस गठबंधन को 30-34 सीटें और अन्य को 2-4 सीटें दीं। वहीं P-MARQ ने BJP गठबंधन को 82-94 सीटें तथा विपक्ष को 30-40 सीटें मिलने की संभावना जताई, जबकि Janmat ने भगवा गठबंधन को 87-98 सीटें और कांग्रेस मोर्चे को 29-30 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया।
हाल ही में मीडिया से बातचीत में असम के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अनुराग गोयल ने बताया कि 4 मई को मतगणना के लिए सभी तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं। वोटों की गिनती सुबह 8 बजे से राज्य के 35 मतगणना जिलों में स्थापित 40 केंद्रों पर एक साथ शुरू होगी। निर्वाचन आयोग ने इस प्रक्रिया के लिए 126 मतगणना पर्यवेक्षक और 2,348 सूक्ष्म-पर्यवेक्षक तैनात किए हैं। कुल 5,981 मतगणना अधिकारियों की नियुक्ति की गई है और अंतिम परिणाम शाम तक आने की संभावना है।
इसे ऐतिहासिक चुनाव बताते हुए गोयल ने कहा कि असम के 2,50,54,463 मतदाताओं में से 85.91 प्रतिशत ने एक चरण में हुए मतदान में हिस्सा लिया। 722 उम्मीदवारों में से 126 विधायकों का चुनाव होना है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले पाँच विधानसभा चुनावों में मतदाता भागीदारी क्रमशः 2021 में 82.02 प्रतिशत, 2016 में 84.64 प्रतिशत, 2011 में 76.05 प्रतिशत, 2006 में 75.72 प्रतिशत और 2001 में 75.16 प्रतिशत रही थी।
हालाँकि, एग्जिट पोल के उत्साहजनक अनुमानों के बावजूद BJP के लिए ज़मीनी स्थिति पूरी तरह सहज नहीं मानी जा रही है। पार्टी के कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से अपने ही कार्यकर्ताओं पर “गद्दारी” के आरोप लगाए हैं। हाल ही में राज्य मंत्री रंजीत कुमार दास, जिन्होंने भवानीपुर-सरभोग विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा, ने कहा कि वे केवल अपने CPM प्रतिद्वंद्वी से ही नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर सक्रिय “साज़िशकर्ताओं” से भी संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने जल्द ही ऐसे लोगों का पर्दाफाश करने की चेतावनी भी दी।
बाद में BJP असम अध्यक्ष दिलीप सैकिया को सार्वजनिक अपील जारी करनी पड़ी, जिसमें उन्होंने नेताओं और कार्यकर्ताओं से ऐसे भड़काऊ बयानों से बचने को कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी की संस्कृति और मूल्यों के अनुरूप इस प्रकार का व्यवहार स्वीकार्य नहीं है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ उम्मीदवार बहुत कम अंतर से हार का सामना कर सकते हैं।
BJP वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों के बाद असम की सत्ता में आई थी। इन चुनावों में तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के 15 वर्षों के शासन का अंत हुआ और सर्बानंद सोनोवाल ने मुख्यमंत्री पद संभाला। वर्ष 2021 के चुनावों में BJP-नेतृत्व वाले गठबंधन ने 75 सीटों के साथ जीत दर्ज की और हिमंत बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री बने।
सरमा, जो कभी कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री थे, 2015 में BJP में शामिल हुए थे। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने बुनियादी ढाँचे के विकास, जनकल्याणकारी योजनाओं, सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने के अभियान तथा विभिन्न विभागों में एक लाख से अधिक युवाओं को पारदर्शी तरीके से रोजगार देने जैसे कई बड़े कदम उठाए। इन पहलों से उन्हें असम और देशभर में व्यापक लोकप्रियता मिली। हालाँकि, उनके कुछ बयानों और नीतियों को लेकर विवाद भी पैदा हुए, विशेषकर तब जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमा से अवैध रूप से आने वाले बांग्लादेशी मुसलमानों को वापस भेजा जाएगा।
हाल ही में बांग्लादेश विदेश मंत्रालय ने ढाका में भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त को तलब कर सरमा की “पुश-बैक पॉलिसी” संबंधी टिप्पणियों पर नाराज़गी जताई। एक टेलीविज़न इंटरव्यू में सरमा ने कहा था कि यह नीति रात के समय लागू की जाती है, जब सीमा सुरक्षा बल (Border Guard Bangladesh) के जवान हर समय सक्रिय नहीं रहते। उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी, जब तक घुसपैठियों के लिए ऐसा माहौल न बन जाए कि वे स्वयं असम छोड़ दें।
बांग्लादेशी अधिकारियों ने सरमा की उस टिप्पणी पर भी आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने कहा था कि असम के लोग नई दिल्ली और ढाका के बीच तनावपूर्ण संबंध पसंद करते हैं, क्योंकि बेहतर संबंधों की स्थिति में अवैध घुसपैठियों को वापस भेजने के प्रति पर्याप्त रुचि नहीं दिखाई जाती। ढाका ने इन टिप्पणियों को अनुचित और द्विपक्षीय संबंधों के लिए हानिकारक बताते हुए उनकी कड़ी आलोचना की।
(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

हिन्दू समाज में समाप्त हो भेदभाव : नरेन्द्र ठाकुर  जी

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लखनऊ । हिन्दू समाज में जाति, भाषा, प्रान्त आदि के आधार पर भेदभाव समाप्त होना चाहिये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्यक्ति निर्माण से राष्ट्रनिर्माण के कार्य में लगा है। इसके लिए 32 से अधिक संगठन समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। ये बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेन्द्र ठाकुर जी ने गुरुवार को नारद जयन्ती के उपलक्ष्य में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम में कहीं।

 

उन्होंने कहा कि आरएसएस की 100 वर्ष की यात्रा सामान्य यात्रा नहीं है। हमारे कार्यकर्ताओं ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। संघ विश्व में भारत माता की जय जयकार के लिये कार्य करता है। भारत को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनाना संघ का उद्देश्य है। प्रथम सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार जी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि संघ व्यक्तिनिष्ठ नहीं, तत्वनिष्ठ बनने में विश्वास करता है। इसीलिये हमने किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि परम पवित्र भगवा ध्वज को गुरु माना।

 

उन्होंने कहा कि संघ की 85000 से अधिक दैनिक शाखाएँ और 32000 से अधिक साप्ताहिक मिलन चल रहे हैं। वनवासी क्षेत्रों से लेकर नगरों तक अनगिनत सामाजिक कार्य स्वयंसेवक चला रहे हैं।

 

नरेन्द्र ठाकुर जी ने संघ के भविष्य की कार्य योजना पर चर्चा करते हुए कहा कि पंच परिवर्तन का कार्य समाज में चल रहा है। सामाजिक समरसता के माध्यम से हम हिन्दू समाज के बीच हर प्रकार का भेदभाव मिटाना चाहते हैं। शताब्दी वर्ष में हिन्दू सम्मेलनों में समाज के सभी वर्ग एक साथ आये और सहयोग किया। कुटुम्ब प्रबोधन के जरिये संघ चाहता है कि पारिवारिक व्यवस्था ठीक रहे तो समाज भी ठीक रहेगा। पर्यावरण संरक्षण भी समाज का प्रमुख कर्तव्य होना चाहिये। साथ ही स्व के आधार पर समाज का जीवन चलना चाहिये। भाषा, वेशभूषा में भी स्व का प्रभाव होना चाहिये। इसी प्रकार सभी को नागरिक कर्तव्यों का बोध होना चाहिये। हर व्यक्ति देश, समाज के प्रति अपने कर्तव्य को समझे।

 

यूजीसी दिशा निर्देशों को लेकर किये गये एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है। इसलिए संघ इस विषय पर अपना कोई मत व्यक्त नहीं करना चाहता, फिर भी हमारा मानना है कि समाज में सद्भाव बना रहना चाहिए। हमें आपस में नहीं उलझना है।

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