ममता का मिथक टूटा, मुखर्जी का मंत्र लौटा: केसरिया हुआ बंगाल

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प्रणय विक्रम सिंह

कोलकाता । पश्चिम बंगाल का सियासी आसमान केसरिया हो गया। ‘ममता’ का अभेद्य महल ढह गया। दिल में ‘काबा’, नयन में ‘मदीना’ रखने वाली TMC आज बंगाल के सियासी समर में नेस्तनाबूद हो गई। जो बात वर्षों तक बंगाल के मन में थी, वह आज साहस के स्वर में ढलकर गूंज रही है कि हम हिंदू हैं… और अपने होने पर हमें गर्व है।

यह जनादेश TMC सरकार के संरक्षण में पल रहे तुष्टिकरण माफिया, सैंड माफिया, कोल माफिया, लैंड माफिया, घुसपैठ माफिया और कैटल माफिया के चंगुल में जकड़े बंगाल की मुक्ति का दस्तावेज है। इस विजय के साथ ही बंगाल की राजनीति का चक्र वहीं लौट आया है, जहां से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपनी वैचारिक यात्रा प्रारंभ की थी। यह जनादेश उनके बलिदान, उनकी दृष्टि और बंगाल के प्रति उनकी अटूट निष्ठा पर इतिहास की सबसे भव्य और भावपूर्ण मुहर है।

भारतीय जनता पार्टी की विजय केवल मतों का गणित नहीं, बल्कि मनों का मंथन और मान्यताओं का परिवर्तन है। बंगाल में रिकॉर्ड मतदान उद्घोष था कि इस बार लोग ‘डरे’ नहीं। लगभग 1 लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती ने मतदान केंद्रों पर सुरक्षा की ऐसी छाया दी, जिसमें मतदाता ने पहली बार ‘मन की मुहर’ खुलकर लगाई।

बंगाल की राजनीति का एक पक्ष लंबे समय तक रक्तरंजित रीतियों, रंजिशों और रसूख की राजनीति से जुड़ा रहा है। पोस्ट-पोल वायलेंस के घाव यहां गांव-गांव में दिखाई देते थे। क्लब कल्चर के नाम पर स्थानीय स्तर पर पनपे दबाव-तंत्र, संगठित समूहों का प्रभाव और प्रशासनिक संरचनाओं पर उनकी छाया लोकतंत्र को सीमित कर दिया था। किंतु इस जनादेश ने स्पष्ट कर दिया है कि जनता अब भय के उस फलक को तोड़कर विश्वास के विस्तार की ओर बढ़ चुकी है।

चुनाव परिणामों में भाजपा और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की सीटों का विशाल अंतर भले संख्यात्मक लगे, पर इसके भीतर मनोवैज्ञानिक बदलाव का विशाल आयाम छिपा है, नाराजगी से निर्णय तक की यात्रा। यह नाराजगी केवल शासन से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से थी जिसे तुष्टीकरण कहते हैं। बहुसंख्यक समाज के भीतर पनपी पीड़ा, अवसरों की असमानता की अनुभूति और प्रशासनिक असंतुलन का आभास ये सभी भाव लंबे समय से भीतर-ही-भीतर सुलगते रहे। इस चुनाव ने उस सुलगन को स्वर दिया।

इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय नेतृत्व की छाया भी स्पष्ट दिखती है। नरेंद्र मोदी का विकास-विश्वास-विस्तार का मंत्र, अमित शाह की संगठन-संरचना-संकल्प की सघनता और योगी आदित्यनाथ का सुरक्षा-सख्ती-सुशासन का मॉडल ने मिलकर एक ऐसा राजनीतिक प्रतिरूप रचा, जिसने बंगाल के मतदाता के मन में विकल्प की स्पष्टता दी।

अब नजर उस भविष्य पर है, जिसे यह जनादेश आकार देगा। विकास के मोर्चे पर यह जनादेश नई अपेक्षाएं लेकर आया है। बंद पड़े कारखानों की चिमनियां फिर से धुआं उगलें, बंदरगाहों की रफ्तार तेज हो और युवाओं के हाथों को काम मिले, यह उम्मीद अब हवा में तैरती है। राज्य का जीडीपी लगभग ₹17 लाख करोड़ के आसपास है, पर इसकी औद्योगिक वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से पीछे रही है। यदि नई सरकार गति, कनेक्टिविटी और रोजगार के त्रिकोण को प्राथमिकता देती है और कोलकाता पोर्ट, हल्दिया डॉक, दीनदयाल औद्योगिक कॉरिडोर और पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं तेज़ी पकड़ती हैं तो बंगाल पूर्वी भारत का आर्थिक इंजन बन सकता है। विदित हो कि निवेश वहीं जाता है, जहां नीतियां स्पष्ट और व्यवस्था विश्वसनीय हो और विश्वसनीयता का बीज सुरक्षा और स्थिरता की मिट्टी में ही पनपता है।

लेकिन बंगाल केवल अर्थशास्त्र नहीं है। वह एक संस्कृति-समृद्ध सभ्यता भी है। दुर्गा पूजा के ढाक की ध्वनि, काली मंदिरों की आरती और स्वामी विवेकानंद की वाणी इस भूमि की आत्मा रचते हैं। पूरी संभावना है कि नई सरकार के सहयोग से यह सभी मिलकर एक ऐसे सांस्कृतिक स्वाभिमान को जन्म देंगे, जहां पहचान पर संकट नहीं, बल्कि आत्मगौरव का आलोक होगा। जहां परंपरा प्रगति की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि प्रेरक शक्ति बनेगी। यह पुनर्जागरण ऐसा हो सकता है, जैसे राख से उठता हुआ फीनिक्स अपनी ही ज्वाला से नया जीवन पाता हुआ।

लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक सीमाएं हिंदी पट्टी तक सिमटी हुई हैं। परंतु बंगाल विजय ने इस मिथक को निर्णायक रूप से तोड़ दिया है। यह स्पष्ट संदेश है कि भाजपा अब एक ऐसी शक्ति है जो पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम है। गंगोत्री से गंगासागर तक भाजपा है।

इस परिणाम का सबसे तीखा प्रभाव विपक्षी राजनीति पर पड़ेगा। तृणमूल कांग्रेस जैसे गढ़ का ढहना केवल एक राज्य की हार नहीं, बल्कि उस पूरी वैचारिक संरचना का संकट है, जो भाजपा के विरोध को ही अपनी राजनीति का आधार मानती रही। अब विपक्ष के सामने केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न खड़ा है नेतृत्व कौन करेगा, दिशा क्या होगी और जनता को क्या विकल्प देगा? इससे विपक्षी दलों के बीच नेतृत्व और दिशा को लेकर असमंजस और गहरा सकता है।

इस जनादेश ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को भी नई राजनीतिक वैधता प्रदान की है। यह विजय केवल संगठनात्मक क्षमता का परिणाम नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रमाण है, जो जनता ने उनकी नीतियों, निर्णयों और दृष्टि पर जताया है। जब कोई राजनेता अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र से बाहर जाकर भी जनसमर्थन अर्जित करता है, तो वह केवल राजनेता नहीं रहता, वह एक राष्ट्रीय प्रवाह बन जाता है। वर्तमान समय में मोदी इस श्रेणी के एक मात्र राजनेता हैं।

बंगाल की इस जीत ने ‘डबल इंजन’ मॉडल को एक नए आयाम में परिवर्तित कर दिया है। अब उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के साथ उभरता Triple Engine Corridor केवल विचार नहीं, बल्कि ठोस नीति की दिशा बन चुका है। यह परिवर्तन पूर्वी भारत को नई आर्थिक ऊर्जा, औद्योगिक विस्तार और अवसंरचनात्मक सशक्तता प्रदान करते हुए आने वाले दशकों की विकास-दिशा तय करेगा।

इसके साथ ही यह परिणाम राष्ट्रीय विमर्श को भी प्रभावित करेगा। 2029 के आम चुनावों की दृष्टि से भी यह विजय अत्यंत महत्वपूर्ण है। बंगाल जैसे बड़े राज्य में भाजपा की सफलता का अर्थ है लोकसभा में संभावित सीटों की बढ़ोतरी, जो भविष्य की सत्ता-समीकरणों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकती हैं। यह जीत भाजपा को न केवल राजनीतिक बढ़त देती है, बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त भी प्रदान करती है, जो किसी भी चुनावी युद्ध में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

अंततः यह परिणाम बंगाल की जीतने से अधिक ‘जागने’ की दास्तान है। यह भय से विश्वास, असंतोष से विकल्प और क्षेत्रीय राजनीति से व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि की ओर बढ़ते भारत की कहानी है।

व्यक्ति, समाज, राष्ट्र निर्माण और साँस्कृतिक मूल्यों के लिये समर्पित संवाद कला

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भोपाल । संवाद सूत्र पत्रकारिता में हों अथवा समाज के प्रबुद्ध जनों में, उनका ध्येय व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण तथा साँस्कृतिक मूल्यों की रक्षा होना चाहिए जिससे मानवीय मूल्यों की रक्षा और पूरे विश्व का कल्याण हो । देवर्षि नारद का पूरा जीवन और उनकी संवाद शैली इसी लक्ष्य के लिए समर्पित यही ।
जिस प्रकार ज्ञान और अज्ञान, अंधकार और प्रकाश साथ चलते हैं उसी प्रकार दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियाँ भी सदैव साथ चलतीं हैं। दैवीय प्रवृत्ति सकारात्मक होती है, प्राणी और प्रकृति दोनों को उनके मौलिक स्वरूप के अनुरूप जीवन विकास में सहायक होती है । जबकि आसुरी प्रवृत्ति हिंसक होती है, बलपूर्वक सत्ता पर अधिकार करती है, विध्वंसक होती है और सबको अपने रंग में रंगना चाहती है । जैसा हिरण्यकश्यपु ने इन्दारासन पर अधिकार करने और नारायण की पूजा उपासना बंद कराने का प्रयास किया या रावण ने कुबेर की लंका पर बलपूर्वक अधिकार करके सबको अपने रंग में रंगने का प्रयास किया । इन दोनों घटनाओं में लाखों वर्षों का अंतर है किंतु नारदजी दोनों स्थानों पर मिलते हैं। इन दोनों ही नहीं अपितु नारदजी प्रत्येक युग में नकारात्मक शक्तियों के विरुद्ध जन जागरण करने और सकारात्मक शक्तियों को चैतन्य करने के लिये सामने आते हैं। उनकी संवाद शीलता और साहित्य रचना दोनों इसी धारा पर है । वे सनातन संस्कृति के विकास विस्तार के लिये सदैव जाने गये। उनकी उपस्थिति हर युग में रही। भारत का कोई ग्रंथ ग्रंथ में उनके उल्लेख के बिना पूरा नहीं होता है। कुछ ग्रंथों के प्रेरणाकार और कुछ के संपादक वही हैं।
समाज, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र रक्षा और मानवीय जीवन मूल्यों की स्थापना के लिये समर्पित नारदजी का प्राकट्य दिवस ज्येष्ठ माह कृष्णपक्ष की द्वितीया है जो इस वर्ष 3 मई को पड़ रही है। उनकी गणना ब्रह्मा जी के उन सात मानस पुत्रों में होती है जो सृष्टि निर्माण के साथ सबसे पहले संसार में आये । इन सात दिव्य विभूतियों में सर्वाधिक सक्रिय और व्यापक चिरंजीवी नारदजी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। उनके लिये कहीं कोई बंधन न था। देव, दानव और मनुष्य सहित प्रकृति के सभी प्राणियों से उनकी भाषा में संवाद करते थे। वे सृष्टि के प्रत्येक भाग में विचरण करते थे और किस कौने में कौन नकारात्मक आचरण और अंहकार में डूबकर दूसरों के अधिकारों का हरण कर अपने रंग में रंगने का प्रयास कर रहा है, इसकी जानकारी रखते, पहले उसे समझाने का प्रयास करते और यदि बात न बनती तो त्रिदेवों को सूचना देते, सकारात्मक शक्तियों को जाग्रत करते जिससे दुष्टों के अंत का मार्ग प्रशस्त होता। देव और दैत्य प्रवृत्ति में यह संघर्ष हर युग में रहा और इस संघर्ष में समाधान कारक मार्ग नारद जी ने ही निकाला।

 

संसार को श्रेष्ठ बनाने के लिये नारद जी ने सकारात्मक संदेश का सदैव आदान प्रदान किया ।

उन्होंने केवल नकारात्मक भूमिका निभाने वालों को ही बिना किसी भय के समझाने का प्रयत्न नहीं किया अपितु जन कल्याण के लिये सकारात्मक शक्तियों को भी उचित मार्गदर्शन किया। देवराज इन्द्र, अवतारी परशुराम, दशरथ नंदन राम, यशोदानंदन कृष्ण, ही नहीं युधिष्ठर से उनके संवाद इसका प्रमाण हैं। जब आसुरी शक्तियों के आतंक से सकारात्मक शक्तियाँ क्षीण हो जाय तब प्रह्लाद जैसे व्यक्तित्व का निर्माण करके सत्य और धर्म की स्थापना का मार्ग नारदजी ने ही निकाला। एक अच्छे राज्य संचालन और समाज निर्माण का संदेश महाराज इक्ष्वाकु और नारद संवाद में मिलता है। तो अपने पूर्वजों एवं परिजनों के कल्याण के लिये भागीरथ को तप करने की सलाह भी नारद जी ने दी थी। कोई शासक या समाज प्रमुख मार्ग से भटका तो उसे सतर्क करने के लिये सबसे पहले नारद जी ही पहुँचते थे । उनके मार्गदर्शन से ही राजकुमार ध्रुव आसमान में सितारे के रूप में चमक रहे हैं, नारदजी के मार्गदर्शन से ही बाल्मीकि जी के जीवन की दिशा बदली और महर्षि बने, नारद जी के सुझाव पर ही बाल्मीकि जी ने रामायण की रचना की। यह ग्रंथ आज भी एक आदर्श व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण का आदर्श सूत्र है। सृष्टि का सफल संचालन केलिये महर्षि भृगु की बेटी श्री लक्ष्मी का विवाह श्रीहरि विष्णु से और हिमाचल राज की पुत्री सती का विवाह देवाधिदेव महादेव से कराने वाले भी नारद जी हैं।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे सर्व सम्मानीय थे। जो लोग नास्तिक थे या स्वयं को ही भगवान् घोषित करते थे वे भी नारद को आदर और आसन देते थे। यदि राजाओं में परस्पर युद्ध हो, मन मुटाव हो तो नारदजी दोनों पक्षों से मिलकर उन्हें समझाने का प्रयत्न करते थे। उनकी जिव्हा पर सदैव नारायण का नाम होता था । कितने शासक ऐसे हुये जिन्होंने नारायण के अस्तित्व को ही चुनौती देते थे फिर भी यदि नारायण नारारण कहते हुये नारदजी वहां पहुँचे तो उन्होने नारद जी का आदर आसन अवश्य दिया है। आधुनिक पत्रकारिता के लिये नारद जी का जीवन, संवाद शैली और साहित्य रचना तीनों एक आदर्श हैं।

पुराणों के अनुसार नारदजी का व्यक्तित्व और उनकी रचनाएँ

नारदजी का व्यक्तित्व बहुत विराट और बहुआयामी है । व्यक्ति, परिवार, समाज और आदर्श संस्कृति निर्माण में उनका अद्भुत योगदान है। वेद उपनिषद और पुराणों की रचनाओं में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। उन्हें “देव-ऋषि” माना जाता है। श्रीमद्भगवत गीता के दसवें अध्याय में भगवान कृष्ण ने अपनी विभूतियों में से एक नारदजी को भी माना है । वेदों में ऋचाओं के वर्गीकरण और उन्हें विभिन्न मंडल एवं सूक्त में निर्धारित करने वाले नारद जी हैं। वे वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ तथा पुराण रचना के मार्गदर्शक हैं । उनके द्वारा रचित ग्रंथ सभी विधाओं पर हैं । जिनमें में न्याय और धर्म के तत्त्‍‌वज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष विद्वान, संगीत की विधा का विवरण और मार्गदर्शन है । उन्होनें बृहस्पति जैसे महाविद्वानों की शंकाओं का भी समाधान किया है। वे धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष चतुर्पुरुषार्थ के ज्ञाता, सांख्य एवं योग के सम्पूर्ण रहस्य को संसार से अवगत कराने वाले हैं। क‌र्त्तव्य और अक‌र्त्तव्य के बीच भेद का जो वर्णन नारद जी ने किया वह कालजयी है और आज भी उपयोगी । अठारह पुराणों में नारद जी द्वारा रचित एक पुराण “नारद पुराण” भी है जिसमें बाइस हजार श्लोक हैं। यद्यपि इस पुराण में कुल पच्चीस हजार श्लोक का वर्णन आता है पर तीन हजार श्लोक उपलब्ध नहीं हैं। एक अन्य ग्रंथ नारद संहिता है। सांख्य, योग, ज्योतिष और नीति की जो विवेचना नारदजी ने कि आगे उसी का विस्तार अन्य विद्वानों ने किया ।

लेकिन भारत में एक षड्यंत्र चला । भारतीय ऋषियों और मनीषियों के बारे में कूटरचित प्रचार का जिससे उनके व्यक्तित्व की गरिमा कम हो । यह क्रम मध्यकाल से आरंभ हुआ और अंग्रेजीकाल में सातवें आसमान पर रहा। इसी षड्यंत्र के अंतर्गत विभिन्न धार्मिक चलचित्रों और धारावाहिकों में नारद जी का चरित्र-चित्रण एक विदूषक अथवा यहाँ की वहाँ खबरें देने वाले नकारात्मक प्रस्तुति की जाती है। देवर्षि की महानता के विपरीत उनके व्यक्तित्व एकदम बौना बताया जाता है। नारद जी के पात्र को जिस प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है, उससे आम आदमी में उनकी छवि लडा़ई-झगडा़ करवाने वाले व्यक्ति अथवा विदूषक की बन गई है। यह उनके प्रकाण्ड पांडित्य एवं विराट व्यक्तित्व के प्रति अन्याय है। नारद जी का उपहास उडाने वाले श्रीहरि के इन अंशावतार की अवमानना के दोषी है। नारद जी प्रत्येक यूग के साक्षी हैं और संस्कृति एवं मानवीय मूल्य स्थापित करने वालों के अनन्य सहयोगी रहे हैं। वे भगवान के पार्षद होने के साथ देवताओं के प्रवक्ता भी हैं। नारद जी वस्तुत: सही मायनों में देवर्षि हैं।

नारदजी का जीवन, उनकी कार्यशैली आज के मीडिया कर्मियों, साहित्य रचना कारों और नीति निर्माताओं केलिए एक आदर्श है। आज कुछ शक्तियाँ भारत और विश्व जिस दिशा में मोड़ने का प्रयास कर रहीं हैं इसमें निष्पक्ष, निर्भीक और सकारात्मक संवाद शैली बहुत आवश्यक है। ताकि प्रकृति का संरक्षण हो और व्यक्ति, परिवार और समाज को ऐसी दिशा मिले जिससे भारत पुनः उस स्थान पर प्रतिष्ठित हो सके जिस पल पहले कभी रहा है। शब्द सृजन और संवाद शीलता की यह धारा न केवल नारद जी की आराधना है अपितु आज भारत के सामने उपस्थित हो रही चुनौतियों का सामना करने केलिये भी आवश्यक है ।

युद्धों के युग में मार्गदर्शक बनें भगवान बुद्ध के उपदेश

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लखनऊ । वैशाख मास की पूर्णिमा का भारतीय संस्कृति व बौद्ध समाज में अद्वितीय स्थान है। इसी दिन भगवान बुद्ध का जन्म (लुम्बिनी), बुद्धत्व की प्राप्ति (बोधगया) और महानिर्वाण (कुशीनगर) तीनों घटनाएँ घटी थीं। इसी अद्भुत संयोग के कारण, इस दिन को ‘त्रिविध पावन अवसर’ के रूप में अत्यंत पवित्र माना जाता है। भारत में न केवल बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले अपितु पूरा भारतीय समाज इस दिन को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से मनाता है।
इस समय पूरे विश्व में लगभग 80 करोड़ लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं अतः यह पर्व भारत के अतिरिक्त उन सभी देशों में मनाया जाता है जहाँ जहाँ भगवान बुद्ध की शिक्षाएं पहुँचीं और उनके मत को मानने वाले लोग हैं। इनमें नेपाल, सिंगापुर, वियतनाम, थाईलैंड, कंबोडिया, मलेशिया, श्रीलंका, म्यांमार, इंडोनेशियाजैसे देश शामिल हैं। तिब्बत में भी बौद्ध मतावलम्बी काफी संख्या में रहते हैं लेकिन वहां पर चीन द्वारा तिब्बतियों की संस्कृति का घोर हनन किया जा रहा है। भारत के बिहार स्थित बोधगया तीर्थस्थल अत्यंत पवित्र स्थान है क्योंकि भगवान बुद्ध यहीं बोधिवृक्ष के नीचे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। श्रीलंका व अन्य दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में इस दिन को बेसाक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पूर्णिमा के दिन बौद्ध अनुयायी अपने घरों में दीपक जलाते हैं। फूलों से घरों को सजाते हैं ।सभी बौद्ध, बौद्ध ग्रंथ का पाठ करते हैं।
इस अवसर पर कुशीनगर में एक माह का मेला भी लगता है। कुशीनगर स्थित महापरिनिर्वाण मंदिर का स्थापत्य अजंता की गुफा से प्रेरित है। इस मंदिर में भगवान बुद्ध की लेटी हुई 6.1 मीटर लम्बी मूर्ति है। यह लाल बलुई मिट्टी की बनी है। यह मूर्ति भी इसी स्थान से निकाली गयी थी। मंदिर के पूर्वी हिस्से में एक स्तूप है, कहा जाता है कि यहां पर भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार किया गया था। बोधगया सहित भगवान बुद्ध सें सम्बंधित सभी तीर्थस्थलों व स्तूपों व महत्व के स्थानों को सजाया जाता है। बोधगया में काफी लोग एकत्र होते हैं। मंदिरों व घरों में भगवन बुद्ध की मूर्ति पर फल फूल चढाये जाते हैं। दीपक जलाकर विधिवत पूजा करते हैं । इस दिन पवित्र बोधिवृक्ष की भी पूजा करते हैं। बौद्ध धर्म में मान्यता है कि इस दिन किये गये कामों के शुभ परिणाम निकलते हैं।
भगवान बुद्ध का जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी, नेपाल में हुआ था। बुद्ध की माता महामाया देवी का उनके जन्म के सातवें दिन ही निधन हो गया था। उनका पालन पोषण दूसरी महारानी महाप्रज्ञावती ने किया था। महाराजा शुद्धोधन ने अपने बालक का नामकरण करने व उसका भविष्य पढ़ने के लिये 8 विद्वानों तथा ज्योतिषियों को आमंत्रित किया। सभी ने एक मत से विचार व्यक्त किया कि यह बालक या तो एक महान राजा बनेगा या फिर महान संत। बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया। महाराज शुद्धोधन ज्योतिषियों की बात सुनकर चिंता में पड़ गये। वे अपने पुत्र का विशेष ध्यान रखने लगे । सिद्धार्थ ने वेद, उपनिषद व अन्य ग्रंथों का अध्ययन गुरु के यहां किया। कुश्ती, घुड़दौड़, तीर- कमान चलाने, रथ हांकने में उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता था। 16 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह राजकुमारी यशोधरा के साथ हुआ। महाराज शुद्धोधन को यह चिंता सता रही थी कि कहीं उनका पुत्र संत न बन जाये इसलिए उसके भेाग विलास के सभी संशाधन उपलब्ध कराते थे।
ज्योतिषियों की गणना धीरे- धीरे सत्य सिद्ध हो रही थी। सिद्धार्थ के जीवन में कई ऐसी घटनाएं घटीं जिनके कारण उनके मन में विरक्ति का आने लग गया। अंततः एक दिन वे अपनी सुंदर पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को – त्यागकर निकल गये। वे राजगृह होते हुये उरुवेला पहुंचे और तपस्या आरम्भ कर दी। सिद्धार्थ ने वहां घोर तप किया। वैशाखी पूर्णिमा के दिन वे वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ थे। समीपवर्ती गाँव की स्त्री सुजाता को पुत्र की प्राप्ति हुई। उसने अपने बेटे के लिए वटवृक्ष की मनौती मानी थी। वह मनौती पूरी होने के बाद सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर पहुंची । सिद्धार्थ ध्यानस्थ थे। उसे लगा कि मानो वृक्ष देवता ही पूजा करने के लिए शरीर धरकर बैठे हैं । सुजाता ने बड़े आदर के साथ सिद्धार्थ को खीर खिलायी और कहा कि जैसी मेरी मनोकामना पूरी हुयी है उसी प्रकार आपकी भी मनोकामना पूरी हो। उसी रात सिद्धार्थ को सच्चा ज्ञान प्राप्त हुआ। तभी से वे बुद्ध कहलाये। जिस पीपल के वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला वह बोधिवृक्ष कहलाया जबकि समीपवर्ती स्थान बोधगया। ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद बेहद वे बुद्ध होकर सरल पाली भाषा में धर्म का प्रचार- प्रसार करते रहे। उनके धर्म की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। काशी के पास मृंगदाव (वर्तमान के सारनाथ) पहुंचे जहाँ उन्होंने अपना पहला औपचारिक धर्मोपदेश दिया।
भगवान बुद्ध ने लोगों को मध्यम मार्ग का उपदेश दिया। उन्होने दुःख, कारण और निवारण के लिये अष्टांगिक मार्ग सुझाया। अहिंसा पर जोर दिया। यज्ञ व पशुबलि की निंदा की।बुद्ध के अनुसार जीवन की पवित्रता, जीवन में पूर्णता, निर्वाण, तृष्णा और यह मानना कि सभी संस्कार अनित्य हैं कर्म को मानव के नैतिक संस्थान का आधार मानना उनके प्रमुख विचार हैं।
भगवान बुद्ध अपने अंतिम भोजन के पश्चात् गम्भीर रूप से बीमार पड़ गये थे। बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को निर्देश दिया कि वह भोजन देने वाले व्यक्ति कुंडा को समझाये कि उसने कोई गलती नहीं करी है ।
वर्तमान समय में जब आधे से अधिक विश्व युद्ध की छाया में है महात्मा बुद्ध की शिक्षाएं व उपदेश अत्यंत प्रासंगिक हो गए हैं । भारत के प्रधानमंत्री जी के शब्दों में कहें तो यह समय युद्ध का नही बुद्ध का है।

गुजरात नगर निगम में भाजपा की ऐतिहासिक विजय 

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लखनऊ । गुजरात नगर निगम, पंचायत तथा पालिका चुनावों ने आगामी विधानसभा चुनावों से पहले गुजरात में भारतीय जनता पार्टी का दबदबा बाना रहने का स्पष्ट संकेत दे दिया है। भाजपा ने अहमदाबाद, सूरत, बडोदरा, राजकोट समेत सभी 15 नगर निगमों व 34 जिला पंचायत में अपना नियंत्रण बरकरार रखा। जिला पंचायत, नगर पालिका व तहसील पंचायत में 90 प्रतिशत से भी अधिक सीटों पर कमल खिला है। भाजपा ने मोरबी व पोरबंदर मनपा मे क्लीन स्वीप किया है।अहमदाबाद में एआईएमआईएम का भी सफाया हो गया और आप का प्रदर्शन भी बेहद निराशाजनक रहा। सभी नए बने नगर निगम नवसारी, गांधीधाम, मोरबी, वापी, आनंद, नडियाद, मेहसाणा, पोरबंदर और सुरेंद्रनगर में भाजपा का कमल खिल गया।
गुजरात में भाजपा की यह जीत इसलिए भी बड़ी हो गई है क्योंकि इस बार प्रधानंमत्री मोदी व गृहमंत्री अमित शाह चुनाव प्रचार के परिदृश्य में शामिल नहीं हुए। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल व भाजपा अध्यक्ष जगदीश विश्वकर्मा की जोड़ी का यह पहला चुनाव था। इन चुनाव परिणामों से भाजपा नेतृत्व को काफी राहत का अनुभव हुआ है। इसका एक कारण नयी पीढ़ी का धीरे धीरे सक्षम होना और स्थानीय चुनावों का नेतृत्व करने का सामर्थ्य जुटा लेना भी है। यदि दूसरी पंक्ति का नेतृत्व चुनावी रणनीति में निपुण होगा तो भाजपा का विजय रथ ऐसे ही आगे बढ़ता जाएगा।
विगत वर्षों से गुजरात में आप और कांग्रेस ने सक्रियता दिखाई है और ऐसा प्रातीत हो रहा था कि यह दल भाजपा के खिलाफ वातारण तैयार करने में कुछ हद तक सफल हो रहे हैं किंतु गुजरात की जनता ने एक बार फिर लिख कर दे दिया है कि वहां अभी भाजपा का गढ़ हिलाने के लिए कांग्रेस, आप व अन्य दलों को बहुत पसीना बहाना होगा। सूरत नगर निगम में आप जैसे दलों का सफाया हो जाना इस बात का प्रमाण है कि वहां अब भी हिन्दुत्व की विचारधारा की जड़ें मजबूत हैं। मतदान के कुछ दिन पूर्व ही एक मुस्लिम ने नाबालिग हिंदू बालिका के साथ छेड़खानी की थी जिसके सूरत का हिन्दू सड़कों पर उतर आया था। यही हिन्दू मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के विरोध में भी खड़ा हुआ। गुजरात में आप की हालत खस्ता होने के पीछे एक बड़ा कारण आप के सात राज्यसभा सांसदों का भाजपा में शामिल होना भी रहा।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में जब कांग्रेस नेतृत्व वाले इंडी गठबंधन ने उत्तर प्रदेश की अयोध्या और गुजरात की एक सीट पर भाजपा को हराने में सफलता प्राप्त कर ली तब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को हराने की बात कहकर कई बार गुजरात का दौरा किया था। राहुल सपा संसद अवधेश प्रसाद को भी गुजरात लेकर गए और अहंकार पूर्ण शब्दों में कहा कि हमने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी जी के हिन्दुत्व की विचारधारा को उनके मुख्य केंद्र में ही पटखनी दे दी है, अब गुजरात की बारी है। गुजरात के हिन्दुओं को अपने अग्रज आडवाणी जी पर की गई यह टिप्पणी अच्छी नहीं लगी और उन्होंने मौका मिलते ही राहुल गाँधी को पटकनी दे दी ।
गुजरात में मिली इस अपार सफलता पर भाजपा के राज्य नेताओं ने कहा कि यह विकास की राजनीति की जीत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रदेश लगातार आगे बढ़ रहा है । गुजरात की छवि को खराब करने वाले कांग्रेस और आप को अपना बोरिया बिस्तर समेट लेना चाहिए। इन पारिणामों ने साफ कर दिया है कि गुजरात राज्य में भाजपा की पकड़ शहरों से लेकर गांवों तक बनी हुई है । कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों ही राज्य मे नैरेटिव की लड़ाई भाजपा से हार गयीं । इन परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि भाजपा सतर्क और सचेष्ट रही तो राज्य में वर्ष 2027 का विधान सभा चुनाव भी आसानी से निकल लेगी।
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