“ब्लू ड्रम, कटा शव और लुटेरी मोहब्बत: क्या यही है महिला सशक्तिकरण की कीमत

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मथुरा । आज के युवा पति, ब्लू प्लास्टिक ड्रम और सीमेंट के कट्टों से डरते हैं, मानो ये कोई जानलेवा संकेत बन गए हों। वहीं, संयुक्त परिवारों की बुजुर्ग सासें अब शादी के बर्तन नहीं, ‘कटोरे’ इस डर से खरीद रही हैं कि बहू अब केवल रसोई तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसके इरादे कहीं और हैं।
भारतीय समाज में महिला सशक्तिकरण की लहर ने निश्चित रूप से उन्हें शिक्षा, रोजगार और निर्णय लेने की आजादी दी है, लेकिन इसके पीछे एक स्याह परछाईं भी है—बिखरते रिश्ते, अवैध संबंध, और प्रेम के नाम पर की जा रही हत्याएं।
ताजा घटनाएं जो रूह कंपा दें:
आगरा: 40 वर्षीय महिला ने प्रेमी संग मिलकर पति की हत्या कर दी, क्योंकि पति ने उन्हें आपत्तिजनक हालत में देख लिया था।
लखनऊ: 25 वर्षीय महिला ने शिकायत की कि उसका पति उसे कभी बाहर नहीं ले गया, न ही उसकी इच्छाओं को समझा। प्रेमी संग पति की हत्या कर डाली।
बलिया: एक पूर्व सैनिक के शव को छह टुकड़ों में काट कर अलग-अलग जगह फेंका गया—कातिल कोई और नहीं, उसकी पत्नी और उसका प्रेमी थे।
कानपुर: एक महिला ने अपने भतीजे के साथ पति की हत्या की और पड़ोसियों को फंसाने की कोशिश की।
औरैया: शादी के 15 दिन बाद ही महिला ने कॉन्ट्रैक्ट किलर को 2 लाख देकर पति को मरवा दिया, क्योंकि वह प्रेमी के साथ “नई जिंदगी” शुरू करना चाहती थी।

जब बच्चे बनें रुकावट:
तेलंगाना: तीन बच्चों की मां ने अपने प्रेमी के कहने पर उन्हें मार डाला, ताकि वह ‘सिंगल’ होकर शादी कर सके।
पश्चिम बंगाल: एक महिला ने 10 साल के बेटे की हत्या कर दी क्योंकि उसे डर था कि बेटा उसके समलैंगिक संबंध को उजागर कर देगा।
गुरुग्राम: 8 वर्षीय बेटे की हत्या, कारण वही—प्रेमी और ‘नई शुरुआत’।
यूपी: महज तीन साल की बेटी को सूटकेस में भर कर मार डाला गया—क्योंकि प्रेमी को बच्चे पसंद नहीं थे।

इन मामलों में एक समानता है—रिश्ते अब समझौते और परंपराओं पर नहीं, इच्छाओं और इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन पर टिके हैं।
सवाल यह है: क्या हम महिला सशक्तिकरण के नाम पर रिश्तों की कब्रें बना रहे हैं?
आज की औरतें पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बनी हैं। 2023 तक, 49% महिलाएं किसी न किसी रूप में कार्यरत थीं। उनकी आर्थिक आज़ादी ने उन्हें आत्मविश्वास तो दिया, लेकिन यह बदलाव पारिवारिक ताने-बाने के लिए चुनौती बन गया।

सोशल मीडिया—नई मोहब्बत का पुराना जाल
इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और फेसबुक जैसे मंच अब सिर्फ टाइमपास नहीं, नए रिश्तों की जमीन बन गए हैं।
2024 के एक अध्ययन के अनुसार, 70% लोग सोशल मीडिया पर रोज़ाना एक्टिव रहते हैं। उनमें से बड़ी संख्या में लोग भावनात्मक सहारा इन्हीं डिजिटल रिश्तों में तलाशते हैं। कई महिलाएं unhappy marriages से भागने के लिए इसी राह को अपनाती हैं।
लेकिन जब ये ‘डिजिटल मोहब्बतें’ हकीकत में बाधित होती हैं—पति, बच्चे या परिवार की शक्ल में—तो मामला कत्ल, साजिश और ड्रामा तक जा पहुंचता है।

बदलते सामाजिक मूल्य—आशीर्वाद या अभिशाप?

कुछ लोग इस बदलाव को ‘पुराने मूल्यों का पतन’ मानते हैं।
“पहले बहू शादी को धर्म समझती थी, अब वो खुद को CEO समझती है,”—ऐसी बातें सुनना आम हो गया है।
एक सर्वे के अनुसार, 2023 में 30% महिलाओं ने घरेलू हिंसा की शिकायत की थी—इससे यह भी स्पष्ट है कि सभी रिश्ते परफेक्ट नहीं होते।
लेकिन सवाल यह है कि क्या रिश्ते सुधारने की बजाय खत्म कर देना ही विकल्प है?
क्या प्रेम के नाम पर हत्या एक नई सामाजिक स्वीकृति बन रही है?

संयुक्त परिवार और बुजुर्ग—नई दुनिया में अनफिट
सास-ससुर जो कभी परिवार के स्तंभ माने जाते थे, अब बहुओं की नजर में अक्सर ‘बाधाएं’ बनते जा रहे हैं। बुजुर्गों को इन परिवर्तनों के साथ सामंजस्य बिठाना कठिन लग रहा है।

कानून और व्यवस्था—अब क्या करे?

ये घटनाएं केवल ‘क्राइम स्टोरीज़’ नहीं हैं। ये सामाजिक चेतावनी हैं।
कानून तो अपना काम करेगा, लेकिन समाज को भी अब यह सोचना होगा कि आर्थिक आजादी और आधुनिकता के बीच नैतिकता और पारिवारिक मूल्यों को कैसे बचाया जाए।

महिला सशक्तिकरण जरूरी है—उसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सशक्त होना जिम्मेदारी के साथ आता है।
यदि आज की महिला खुद के फैसले लेने के लिए सक्षम है, तो उसे रिश्तों की गरिमा को भी समझना होगा।
वरना, अगली बार किसी पति का शव फिर प्लास्टिक के ड्रम में मिले तो चौंकिए मत—ये आज की ‘आज़ाद मोहब्बत’ की नई क़ीमत है।

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नर्क का रास्ता: भारतीय ‘विकास’

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दिल्ली । धूल फाँकती सड़कें, भरभराकर तेज़ी से गिरकर ढहते पुल, और मलबे में तब्दील होते स्कूल – यही है हमारे ‘विकास’ की हक़ीक़त ! जिस भारत में सरकारी तिजोरी से हज़ारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, वहाँ अवाम के हिस्से में आता है बस घटिया काम और टूटे वादे। यह ठेकेदारी की व्यवस्था असल में मुल्क की तरक़्क़ी को लूटतंत्र में बदल चुकी है, जहाँ गुणवत्ता को क़ुर्बान करके भ्रष्टाचार का महाभोज चल रहा है। ये ऐसा ज़हर है जो भारत के विकास को अंदर ही अंदर चाट रहा है।

कागज़ी घोड़े और अंतहीन इंतज़ार

सरकारी टेंडर हासिल करने वाली बड़ी कंपनियाँ, कागज़ों पर अपनी काबिलियत का डंका बजाने के बाद, काम को छोटे-छोटे ठेकेदारों में बाँट देती हैं। ये छोटे ठेकेदार, जो पहले से ही कई परियोजनाओं में उलझे होते हैं, काम को अनंत काल तक खींचते रहते हैं। जैसे कोई बूढ़ा शायर अपनी नज़्म को दोहराता रहे, उसी तरह यह काम भी कभी ख़त्म होने का नाम नहीं लेता।

2023 की कैग (CAG) रिपोर्ट चीख़-चीख़कर बताती है कि 60% सड़क परियोजनाएँ समय पर पूरी नहीं हो पातीं, और तो और, उनकी लागत 40-50% तक बढ़ जाती है। क्या यह सिर्फ़ लापरवाही है या कोई साज़िश ?

मौत का साया: ढहते ढाँचे

यह सिर्फ़ पैसों की बर्बादी नहीं, बल्कि इंसानी जानों की बर्बादी भी है। 2022 में मुंबई का एक फ्लाईओवर गिरा, जिसमें 5 बेक़सूर लोग मौत के मुँह में समा गए। जाँच हुई तो पता चला – ठेकेदार ने सीमेंट में रेत मिला दी थी! यानी, मुनाफ़े की हवस में उसने लोगों की ज़िंदगियों से खिलवाड़ किया। 2023 में बिहार के एक स्कूल की छत ढह गई, जिसमें 12 बच्चे ज़ख़्मी हुए। वजह? निर्माण सामग्री में घपला।

एनएचएआई (NHAI) के आँकड़े बताते हैं कि 30% नई बनी सड़कें पहले मॉनसून में ही उखड़ जाती हैं। क्या यह सिर्फ़ इत्तेफ़ाक़ (संयोग) है या मौत का इंतज़ार?

नेता और ठेकेदार: एक नापाक गठजोड़

सरकारी अफ़सर और ठेकेदार मिलकर कॉस्ट एस्केलेशन (लागत बढ़ोतरी) का खेल खेलते हैं। टेंडर मिलते ही काम की रफ़्तार धीमी कर दी जाती है, फिर “अतिरिक्त बजट” की मांग की जाती है, जैसे कोई भूखा भेड़िया अपने शिकार का इंतज़ार करे।
सीबीआई (CBI) के 2021 के एक केस में तो यह भी पता चला कि एक ठेकेदार ने 100 करोड़ के प्रोजेक्ट को 300 करोड़ तक पहुँचा दिया, जिसमें से 50 करोड़ अफ़सरों और सियासतदानों की जेब में गए! यह हमारे देश के खून-पसीने की कमाई है, जो ऐसे निकम्मे लोगों के हाथों में लुट रही है।

हुनरमंद क्यों रहते हैं बेकार?

भारत में 15 लाख इंजीनियर बेरोज़गार हैं, लेकिन ठेकेदार अनपढ़ मज़दूरों से काम करवाते हैं ताकि कम लागत में ज़्यादा मुनाफ़ा कमाया जा सके। आईआईटी (IIT) और एनआईटी (NIT) जैसे संस्थानों के पास तकनीकी महारत (विशेषज्ञता) है, लेकिन सरकार उन्हें सीधे प्रोजेक्ट नहीं देती। क्यों? क्योंकि ठेकेदारों का “कमीशन राज” चलता रहे! यह मज़बूरी नहीं, बल्कि मंज़ूरी है इस भ्रष्टाचार की।

कब तक सहेंगे यह ज़ुल्म ?

अंग्रेज़ों के ज़माने का हावड़ा ब्रिज और मुगलों के किले आज भी मज़बूत खड़े हैं, लेकिन आज बनी सड़कें 2 साल भी नहीं टिकतीं! क्या हम अपनी आने वाली नस्लों को यही विरासत देना चाहते हैं? अगर सरकार ने इस ठेकेदारी माफ़िया पर लगाम नहीं कसी, तो “विकास” के नाम पर सिर्फ़ धोखा, धूल और मौतें बचेंगी।

अब नहीं तो कब? समाधान की गुहार

मशीन बैंक योजना: सरकार उद्यमियों को किराए पर निर्माण मशीनें उपलब्ध कराए, ताकि छोटे ठेकेदार भी गुणवत्तापूर्ण काम कर सकें। यह उन्हें आत्मनिर्भर बनाएगा।
टेंडर में टैलेंट नीति:
आईआईटी (IIT) और सरकारी कॉलेजों के छात्रों को छोटे प्रोजेक्ट दिए जाएँ, ताकि नए विचारों को मौका मिले। उन्हें अपनी काबिलियत साबित करने का मंच मिले।
ज़ीरो टॉलरेंस पॉलिसी:
अगर कोई ठेकेदार समय पर काम पूरा नहीं करता, तो उस पर भारी जुर्माना लगे और उसे हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट किया जाए। कोई लिहाज़ नहीं!

यह वक्त है जागने का, यह वक्त है बदलने का! क्या हम इस अंधेरे में ही जीते रहेंगे या रोशनी की तरफ़ बढ़ेंगे?

जीनोम-संपादित चावल: उन्नति का दावा, किसान की स्वतंत्रता पर खतरा

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निलेश देसाई

भोपाल। भारत ने हाल ही में कृषि के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण घोषणा की है: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने देश की पहली जीनोम-संपादित (GE) चावल की किस्में, कमला और पूसा डीएसटी राइस 1 विकसित की हैं। 4 मई, 2025 को जारी की गईं ये किस्में दावा करती हैं कि वे सूखा-सहिष्णु हैं, जल्दी पकती हैं, कम पानी और कम नाइट्रोजन पर उगती हैं, और अधिक उपज देती हुई ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 20% तक कम कर सकती हैं। यह एक बड़ी उपलब्धि लग सकती है, जो जलवायु परिवर्तन से लड़ने और सतत कृषि के लिए भारत की तकनीकी प्रगति को दर्शाती है।

लेकिन, इस चमकती तस्वीर के पीछे कई गहरे सवाल और चिंताएं छिपी हैं, जो हमारी बीज संप्रभुता, खाद्य सुरक्षा, किसान अधिकारों और यहाँ तक कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर भी असर डाल सकती हैं। यह लेख इन जीनोम-संपादित चावलों से जुड़ी वास्तविकताओं और उनके संभावित खतरों को उजागर करता है।

जीनोम संपादन क्या है और क्यों चिंता का विषय है?

जीनोम संपादन एक ऐसी अत्याधुनिक तकनीक है जहाँ CRISPR-Cas9 जैसे “आणविक कैंची” का उपयोग करके पौधे या जानवर के डीएनए में बहुत सटीक बदलाव किए जाते हैं। इसमें जीन को हटाया या बदला जा सकता है। ICAR का दावा है कि उनके GE चावल सूखा और लवणीय मिट्टी को सहन कर सकते हैं, कम पानी और उर्वरक का उपयोग कर सकते हैं, और अधिक उपज के साथ पर्यावरण के लिए भी बेहतर हैं।

हालांकि, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों को इसकी सटीकता और सुरक्षापर गंभीर चिंताएं हैं:

• अनपेक्षित बदलाव (Off-Target Mutations): आणविक कैंची कभी-कभी डीएनए में लक्षित स्थान के अलावा अन्य जगहों पर भी अनचाहे बदलाव कर सकती हैं। इन “ऑफ-टारगेट म्यूटेशन” से नए प्रोटीन बन सकते हैं जो विषाक्त या एलर्जी पैदा कर सकते हैं। इसके उदाहरण भी मिलते हैं: जीन-संपादित मवेशियों में अनजाने में एंटीबायोटिक प्रतिरोध जीन पाए गए, और चूहों में बकरी/गाय का डीएनए मिला, क्योंकि प्रयोगशाला में इनके सीरम का उपयोग हुआ था। ये अनपेक्षित बदलाव फसल के व्यवहार और पर्यावरण पर भी अप्रत्याशित प्रभाव डाल सकते हैं।
• पर्यावरणीय जोखिम और परीक्षण की कमी: पर्यावरणविद इस बात पर जोर देते हैं कि भारत में इन GE किस्मों का कोई पर्याप्त औरस्वतंत्र जैव-सुरक्षा परीक्षण नहीं हुआ है। यह स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा है, क्योंकि संभावित जोखिमों का मूल्यांकन नहीं किया गया है।

कानूनी उल्लंघन और न्यायिक आदेशों की अनदेखी

पर्यावरणविदों का तर्क है कि GE चावल को जारी करना भारत के मौजूदा कानूनों और यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है:

• 1989 के पर्यावरण नियम: ये नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि डीएनए में कोई भी बदलाव (जैसे जीन-संपादन) जेनेटिक इंजीनियरिंग के दायरे में आता है, और ऐसे सभी मामलों को कड़े जैव-सुरक्षा परीक्षणों से गुजरना होगा।
• 2022 का छूट निर्णय: सरकार ने 2022 में SDN-1 और SDN-2 (जीन संपादन के प्रकार जिनमें बाहरी डीएनए शामिल नहीं होता) को जैव-सुरक्षा नियमों से छूट दे दी। यह निर्णय इस तर्क पर आधारित था कि इनमें बाहरी डीएनए नहीं होता, लेकिन आलोचक इसे अवैज्ञानिक और गैरकानूनी मानते हैं, क्योंकि आनुवंशिक संशोधन तो होता ही है।
• सुप्रीम कोर्ट का आदेश (जुलाई 2024): सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा था कि मौजूदा नियामक प्रणाली जैव-सुरक्षा को सुनिश्चित करने में विफल रही है और एक नई, मजबूत नीति की मांग की थी। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना ने विशेष रूप से सावधानी सिद्धांत (precautionary principle) पर जोर दिया था: यदि किसी गतिविधि से मानव स्वास्थ्य या पर्यावरण को गंभीर या अपरिवर्तनीय क्षति का जोखिम है, और वैज्ञानिक निश्चितता नहीं है, तो पहले उसे रोकना चाहिए।
• ICAR की अवज्ञा: सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बावजूद, ICAR ने बिना किसी पर्याप्त परीक्षण के GE चावल जारी किया, जिसे आलोचक कानून और नैतिकता दोनों का उल्लंघन मानते हैं।

पारदर्शिता, जवाबदेही और किसान आवाज पर हमला

GE चावल के इस मुद्दे में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी भी एक बड़ी चिंता का विषय है:

• वेणुगोपाल बदरावदा का मामला: ICAR बोर्ड के सदस्य और किसान नेता वेणुगोपाल बदरावदा ने GE चावल पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए थे: क्या जैव-सुरक्षा परीक्षण हुए हैं? क्या ये किस्में पेटेंट से बंधी हैं? क्या किसानों के बीज बचाने के अधिकार सुरक्षित हैं?
• दमनकारी प्रतिक्रिया: इन सवालों का जवाब देने के बजाय, वेणुगोपाल को बोर्ड से हटा दिया गया और उन पर झूठे आरोप लगाए गए। यह घटना पारदर्शिता, जवाबदेही और किसान समुदाय की आवाज को दबाने के प्रयास के रूप में देखी जा रही है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है।

स्वास्थ्य, पर्यावरण और बीज संप्रभुता पर जोखिम

GE चावल से जुड़े जोखिम सिर्फ कानूनी या प्रक्रियात्मक नहीं हैं, बल्कि सीधे तौर पर हमारे स्वास्थ्य, पर्यावरण और किसानों के भविष्य को प्रभावित करते हैं:

• स्वास्थ्य और पर्यावरण: अनपेक्षित जीन बदलाव नए प्रोटीन बना सकते हैं जो स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकते हैं। पर्यावरण में GE फसलों का व्यवहार भी अप्रत्याशित हो सकता है।
• जैव विविधता का अपूरणीय नुकसान: भारत चावल का उत्पत्ति केंद्रहै, जहाँ 1,00,000 से अधिक देशी किस्में मौजूद हैं। GE चावल से आनुवंशिक प्रदूषण का खतरा है, जो इन अनमोल देशी किस्मों को नष्ट कर सकता है। यह न केवल हमारी पारिस्थितिकी के लिए बुरा है, बल्कि भविष्य की फसल सुधार के लिए उपलब्ध आनुवंशिक विविधता को भी कम कर देगा।
• निर्यात पर प्रभाव: यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजार GE फसलों को लेकर बहुत सख्त हैं। यदि भारत GE चावल को व्यापक रूप से अपनाता है, तो इससे देश के जैविक चावल निर्यात (जो 2023 में $1.2 बिलियन था) पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, क्योंकि उन्हें GE फसलों से दूषित होने का डर होगा।
• बीज संप्रभुता पर हमला: CRISPR तकनीक पर ERS जीनोमिक्स(अमेरिका) जैसी कंपनियों का पेटेंट है। इसका मतलब है कि अगर GE चावल फैलता है, तो किसानों को हर साल महंगे बीज खरीदने होंगे, क्योंकि पेटेंट के कारण उन्हें बीज बचाने या दोबारा उपयोग करने की अनुमति नहीं होगी। यह उन्हें कंपनियों पर पूरी तरह निर्भर कर देगा। पीपीवीएफआर अधिनियम, 2001 किसानों को बीज बचाने का अधिकार देता है, लेकिन ये पेटेंट इसे कमजोर कर सकते हैं। बीटी कपास के मामले में मोनसेंटो ने पेटेंट के जरिए किसानों को कैसे निर्भर बनाया और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में कर्ज और आत्महत्याएं बढ़ीं, यह एक कड़वी याद है।

क्या वास्तव में GE चावल की आवश्यकता है?

लेख यह सवाल उठाता है कि क्या भारत को वास्तव में GE चावल की इतनी आवश्यकता है:

• उत्पादन की अधिकता: भारत पहले ही अपनी जरूरत से ज्यादा चावल (2023 में 135 मिलियन टन) पैदा करता है। गोदामों की कमी के कारण चावल बर्बाद भी होता है।
• असली समस्या: भारत में खाद्य सुरक्षा की असली समस्या उत्पादन में नहीं, बल्कि वितरण, बुनियादी ढांचे और स्थिरता में है।
• मोनोकल्चर का नुकसान: चावल की एकसमान खेती (मोनोकल्चर) मिट्टी को कमजोर करती है और जल संसाधनों को खत्म कर रही है।
• दावे संदिग्ध: GE चावल के अधिक उपज, कम पानी और सूखा-सहनशीलता जैसे दावों का कोई स्वतंत्र वैज्ञानिक परीक्षण नहीं हुआ है। अतीत में जीएम एचटी सरसों के भी ऐसे ही दावे फर्जी पाए गए थे।
• सुरक्षित विकल्प: इसके बजाय, कृषि-पारिस्थितिकी (agroecology), जैसे आंध्र प्रदेश का CNF (Community Managed Natural Farming) मॉडल और मार्कर-असिस्टेड सिलेक्शन (MAS) जैसे सहभागी धान, अधिक सस्ते, सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प प्रदान करते हैं, जो जैव विविधता और किसानों की आत्मनिर्भरता को बनाए रखते हैं।

कॉर्पोरेट नियंत्रण और लोकतंत्र पर मंडराता खतरा

जीनोम-संपादित चावल का मुद्दा सिर्फ कृषि या पर्यावरण का नहीं, बल्किकॉर्पोरेट नियंत्रण और लोकतंत्र के क्षरण का भी है:

• कॉर्पोरेट कब्जा: GE चावल, पेटेंटेड CRISPR तकनीक पर आधारित होने के कारण, कॉर्पोरेट्स (जैसे ERS जीनोमिक्स) को बीजों पर भारी नियंत्रण देगा, जैसा कि मोनसेंटो ने बीटी कपास के साथ किया था।
• पारदर्शिता की कमी और लोकतांत्रिक क्षरण: ICAR ने GE चावल के विकास और मंजूरी में कोई सार्वजनिक बहस या जानकारी साझा नहीं की। वेणुगोपाल जैसे किसान नेताओं का दमन और जैव-सुरक्षा नियमों की अनदेखी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करती है, क्योंकि यह जनता और हितधारकों की आवाज को दबाने का प्रयास है।

जीएम-फ्री इंडिया गठबंधन ने स्पष्ट मांग की है कि GE चावल की मंजूरी तुरंत वापस ली जाए, 1989 के पर्यावरण नियमों को पूरी तरह लागू किया जाए, स्वतंत्र जैव-सुरक्षा परीक्षण अनिवार्य किए जाएं, पेटेंट विवरण सार्वजनिक किए जाएं, और चावल की जैव विविधता व बीज संप्रभुता की रक्षा की जाए।

बाहरी बनाम आंतरिक खतरा

लेख एक महत्वपूर्ण तुलना प्रस्तुत करता है: जहाँ भारत अपनी बाहरी सीमाओं पर आक्रामकता का सामना कर रहा है, वहीं GE चावल का बिना पर्याप्त परीक्षण के जारी होना, किसान आवाज का दमन, और कृषि में कॉर्पोरेट नियंत्रण आंतरिक खतरा है। यह बीज संप्रभुता, खाद्य सुरक्षा और वैज्ञानिक अखंडता पर हमला है। लेख का अंतिम संदेश यह है कि पारदर्शी, जवाबदेह और सुरक्षित तकनीक की वकालत है। गलत तकनीक से खाद्य असुरक्षा, ज्ञान असुरक्षा और लोकतंत्र का क्षरण होगा। यह आंतरिक खतरा बाहरी खतरों जितना ही गंभीर है, और इसे रोकने के लिए पारदर्शी, किसान-केंद्रित नीतियां चाहिए।

 

रवीश कुमार की कांग्रेस भक्ति, पत्रकारिता में धूर्तता के सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है

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उंगलबाज पांडेय

रवीश कुमार, एक पत्रकार जिन्हें कभी भारतीय पत्रकारिता का चमकता सितारा माना जाता था, आज अपने दोहरेपन और पक्षपातपूर्ण रवैये के लिए चर्चा में हैं। उनकी पत्रकारिता, जो कभी सामाजिक मुद्दों और सत्ता की जवाबदेही पर केंद्रित थी, अब एकतरफा और कांग्रेस के प्रति अंधी चाटुकारिता का पर्याय बन चुकी है। यह लेख उनके इस दोहरे चरित्र और उनकी पत्रकारीय विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का प्रयास है, विशेष रूप से उनके तुर्की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति रवैये के संदर्भ में।

रवीश कुमार को 2019 में रैमॉन मेग्सेसे पुरस्कार मिला, जिसे कई लोग उनकी निष्पक्ष और साहसी पत्रकारिता के लिए मानते हैं। लेकिन इस सम्मान के बाद उनकी पत्रकारिता में एक स्पष्ट बदलाव देखने को मिला। उनकी रिपोर्टिंग अब न केवल एकतरफा हो गई है, बल्कि वे बार-बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आलोचना में ही डूबे रहते हैं। यह पक्षपात इतना प्रबल है कि अन्य महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों, जैसे तुर्की में मानवाधिकारों का हनन या वहां की सरकार की तानाशाही नीतियां, पर वे तब तक नहीं बोलते जब तक इसे भारत की सत्तारूढ़ पार्टी से जोड़ने का मौका न मिले। यह रवैया उनकी पत्रकारीय नैतिकता पर सवाल उठाता है।

उदाहरण के लिए, तुर्की में राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोआन की सरकार ने पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों पर अभूतपूर्व दमन किया है। प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में तुर्की 180 देशों में 149वें स्थान पर है। वहां सैकड़ों पत्रकार जेल में हैं, और सोशल मीडिया पर सेंसरशिप आम बात है। लेकिन रवीश ने इस पर कोई गंभीर वीडियो या विश्लेषण नहीं किया। इसका कारण स्पष्ट है: तुर्की के मुद्दों को उठाने से उन्हें वह राजनीतिक लाभ नहीं मिलता, जो भारत में मोदी सरकार की आलोचना से मिलता है। उनकी यह चुप्पी तब और स्पष्ट होती है, जब वे भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर लंबे-लंबे व्याख्यान देते हैं, लेकिन तुर्की जैसे देशों में पत्रकारों के दमन पर चुप रहते हैं। यह दोहरापन उनकी विश्वसनीयता को और कमजोर करता है।

रवीश की पत्रकारिता में कांग्रेस के प्रति उनकी झलकती चाटुकारिता भी उनकी आलोचना का एक प्रमुख कारण है। वे बार-बार मोदी सरकार के खिलाफ बोलते हैं, लेकिन कांग्रेस शासित राज्यों में भ्रष्टाचार, कुशासन या नीतिगत विफलताओं पर उनकी चुप्पी आश्चर्यजनक है। उदाहरण के लिए, राजस्थान या छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में हुए विवादों पर उनकी टिप्पणी लगभग न के बराबर रही है। यह एकतरफा रवैया उनकी पत्रकारिता को केवल एक राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाता है।

मेग्सेसे पुरस्कार के बाद रवीश का रवैया और भी विवादास्पद हो गया है। कई लोग मानते हैं कि यह पुरस्कार उनकी पत्रकारीय स्वतंत्रता को बढ़ाने के बजाय उनके लिए एक तरह का वैचारिक जाल बन गया। वे अब केवल उन मुद्दों पर बोलते हैं, जो उनकी छवि को एक खास विचारधारा के साथ जोड़ते हैं। उनकी यह प्रवृत्ति न केवल पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों—निष्पक्षता और तटस्थता—के खिलाफ है, बल्कि यह उनके दर्शकों को भी गुमराह करती है।

रवीश का यह दोहरापन तब और स्पष्ट होता है, जब वे वैश्विक मुद्दों पर अपनी चुप्पी को भारत-केंद्रित आलोचना से ढकने की कोशिश करते हैं। तुर्की जैसे देशों में लोकतंत्र का क्षरण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले और अल्पसंख्यकों का दमन जैसे मुद्दे उनकी प्राथमिकता में नहीं हैं, क्योंकि ये उनके ‘मोदी-विरोधी’ नैरेटिव को मजबूत नहीं करते। यह उनकी पत्रकारीय नीचता का प्रतीक है, जहां वैश्विक मुद्दों को भी केवल एक स्थानीय राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है।

निष्कर्षतः, रवीश कुमार की पत्रकारिता अब निष्पक्षता से कोसों दूर है। उनकी कांग्रेस के प्रति चाटुकारिता और तुर्की जैसे मुद्दों पर चुप्पी उनके दोहरे चरित्र को उजागर करती है। मेग्सेसे पुरस्कार ने उन्हें एक वैश्विक मंच दिया, लेकिन उनकी पत्रकारीय विश्वसनीयता को बनाए रखने में वे विफल रहे। एक पत्रकार का कर्तव्य है कि वह सत्य को बिना किसी पक्षपात के सामने लाए, लेकिन रवीश की पत्रकारिता अब केवल एक राजनीतिक एजेंडे की गुलाम बनकर रह गई है।

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