शिक्षा, संस्कार और स्वत्व चेतना के केंद्र हैं मंदिर

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मंदिर केवल पूजा, उपासना, प्रार्थना या आराधना के स्थल भर नहीं है॔। ये अंतरिक्ष की अनंत ऊर्जा से प्रकृति और प्राणियों से समन्वय बिठाकर मानव जीवन के विकास का आधार, शिक्षा संस्कार, स्वत्व एवं साँस्कृतिक चेतना का केन्द्र होते हैं। भारत यदि विश्व गुरु और सोने की चिड़िया रहा है, तो इसमें मंदिरों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है ।

भारत में मंदिर निर्माण की परंपरा असाधारण है । यह सभ्यता के विकास के साथ आरंभ हुई । अतीत में जहाँ तक दृष्टि जाती है वहाँ आत्म चेतना जागृति स्थल के रूप में मंदिरों का संदर्भ मिलता है । लेकिन इसे समझने के लिये हमें सभ्यता विकास क्रम पर पश्चिमी अवधारणा से परे होकर सोचना होगा । पश्चिमी दर्शन में मानव विकास क्रम केवल पांच हजार वर्ष के भीतर मानी जाती है। जबकि भारत में मंदिर और मूर्तियों के प्रमाण इस कालावधि से बहुत पहले आठ और दस हजार वर्ष पूर्व भी मिलते हैं। उस काल-खंड में मंदिरों की वास्तु उत्कर्ष्ट रही है । यह दो प्रकार की थी । एक ऋषि परंपरा में दूसरी नगर एवं ग्राम्य परंपरा के समाज जीवन में। ऋषि आश्रम वनों में हुआ करते थे । जो शिक्षा, चिकित्सा और अनुसंधान और आध्यात्मिक साधना स्थल थे । वहाँ यज्ञ, तप, और साधना समाधि परम् ब्रह्म की उपासना होती थी । कुछ ऋषि आश्रमों में ध्यान और एकाग्रता के लिये प्रतीक की स्थापना भी होती थी । जैसी पार्वती जी ने वन में जाकर पार्थिव शिवलिंग स्थापित किया और अपनी आत्म चेतनासे शिवजी का आव्हान किया ।जबकि नगर और ग्राम का जीवन सांसारिक होता है । भौतिक आवश्यकता का आधिक्य होता है । इसलिये सीधे साधना कठिन होती है । इसे दो आयामों में बाँटा गया । साधना के पहले चार आयाम “यम” “नियम” “संयम” “आहार” और “प्रणायाम” घर में भी हो सकते हैं लेकिन “धारणा” “ध्यान” और “समाधि” केलिये मंदिर होते हैं । रामायण काल में दोनों उदाहरण मिलते हैं। रावण ने एकांत वन में जाकर शिवजी के प्रतीक की स्थापना करके आव्हान किया जबकि सीताजी ने मंदिर में जाकर पूजन करके आव्हान किया । महाभारत काल में अर्जुन और सुभद्रा का मिलन भी मंदिर में होता है । ये मंदिर साधारण भवन निर्माण भर नहीं होता । इनकी निर्माण कला अंतरिक्ष की अनंत ऊर्जा के केन्द्रीकरण का अद्भुत विज्ञान है । महाभारत काल ईसा से तीन हजार दो वर्ष पूर्व माना जाता है । यह निर्धारण कुरुक्षेत्र की खुदाई और द्वारिका के समुद्रतल से मिले चिन्हों के आधार पर किया गया है । इसका अर्थ है कि पश्चिमी जगत में जब सभ्यता का अंकुरण हो रहा था, तब भारत की सभ्यता इतने उन्नत स्वरूप में थी कि उसे आत्मशक्ति एकाग्र करके और अंतरिक्ष की अनंत ऊर्जा से साक्षात्कार करने की क्षमता अर्जित कर ली थी ।

मंदिरों की निर्माण कला में यह ज्ञान स्पष्ट झलकता है । जिसे भूखंड विशेष के चयन, दिशाओं की गणना करके ऊर्जा केन्द्र केन्द्र का निर्धारण, आकाश की ऊर्जा का संवाहन करने की तकनीक होती है । इस उन्नत स्वरूप की झलक “मंदिर” नाम और इनके निर्माण की वास्तु में मिलती है ।

“मंदिर” शब्द से संबोधन और निर्माण का विज्ञान

“मंदिर” शब्द साधारण नहीं है और न इसका आशय केवल पूजा, उपासना या आराधना केलिये बनाई गई किसी भवन आकृति के संबोधन तक सीमित है । “मंदिर” शब्द रचना में ही अंतरिक्ष की अनंत ऊर्जा का आव्हान करके व्यक्ति परिवार, समाज के संवर्धन और प्रकृति के संरक्षण का संदेश स्पष्ट हो जाता है । “मंदिर” शब्द संस्कृत की दो धातुओं से बनता है । एक धातु “मन् ” और दूसरी “दर्” । जब मन् धातु में दर् धातु की “इकार” अर्थात (छोटी इ की मात्रा) के साथ प्रत्यय के रूप में संधि की जाती है तब शब्द बनता है “मंदिर” । मन, मनन, मन्नत, मान और मनुष्य जैसे शब्द मन् धातु से बनते हैं । जबकि दृश्य, दृष्टि, द्रव्य, दर्शन जैसे शब्द दर् धातु से बनते हैं। दोनों धातुओं की संधि में इकार का प्रयोग “शक्ति” रूप में होता है । तब मंदिर शब्द का अर्थ हुआ “मन और मनन को शक्तिमय दृष्टि देने वाला”। मन की सकारात्मक दृष्टि, मनन की सृजनात्मक दिशा से ही जीवन उत्कृष्ट बनता है । मन बहुत शक्तिशाली होता है और सदैव गतिमान रहता है। मन की गतिशीलता यदि संकल्पशील और सृजनात्मक न हो तो मन की समस्त ऊर्जा नकारात्मक परिणाम देती है। मन को एकाग्र करके विशिष्ट दिशा में गमन करने की प्रेरणा देने का स्थल मंदिर होते हैं ।

भाषा विज्ञान के अनुसार “मंदिर” शब्द रचना हुई और उस विशिष्टता के अनुरूप ऊर्जा संपन्न बनाने केलिये मंदिर निर्माण की वास्तु कला का विकास हुआ । जिस प्रकार आरंभिक “यम” से “समाधि” तक भक्ति के नौ आयाम होते हैं उसी प्रकार मंदिर निर्माण कला के भी कुल नौ आयाम होते हैं। मंदिर वास्तु के इन नौ आयामों सबसे प्रथम है “अधिष्ठान” इसे हम नींव भी कह सकते हैं । यह सम्पूर्ण भवन का आधार होता है। दूसरा आयाम है मसूरक। यह नींव और दीवार का मध्यभाग होता है । तीसरा जगती, यह वह धरातल होता है जिसपर गर्भ गृह का निर्माण होता है । चौथा दीवार । पाँचवा कपोत, यह दीवारों में द्वार, वातायन अथवा अन्य उपलंबों का भाग कहलाता है । छटवां आयाम शिखर है, यह मंदिर का वह शीर्ष है जो गर्भगृह के मध्य में ठीक ऊपर होता है । सातवाँ भाग आमलक है, शिखर के आरंभ और कलश के मध्य का वर्तुलाकार भाग होता है । आठवाँ कलश है, जो शिखर का शीर्ष होता है । और नौवां उत्तुंग जो कलश के ऊपर एक बारीक सूत्र नुमा होता है । इन सभी भागों में परस्पर लम्बाई चौड़ाई और ऊँचाई का एक निश्चित अनुपात होता है । अंतरिक्ष से केवल बिजली ही क्ड़क कर धरती पर नहीं आती। सदैव अदृश्य अनंत ऊर्जा बरसती है जो धरती, जल, अग्नि, आकाश और वायु को चैतन्य रखती है ताकि प्रकृति जीवन्त रहे और प्राणी सक्रिय रहें। मंदिर का यह उत्तुंग विशिष्ट धातु का बनता है और मंदिर शिखर के शीर्ष पर स्थापित किया जाता है । यह उत्तुंग जहाँ विद्युत प्रवाह को खींचकर सीधा भूमि में पहुँचा देता है वहीं सकारात्मक ऊर्जा का संचार पूरे परिसर में व्याप्त करता है जिससे उस परिसर में पहुँचने वालों का मन शांत होता है और चित्त में एकाग्रता आती है । जो उसकी दिनचर्या के कार्यों में गति आती है । मध्यकाल के पूर्व ऐसे स्थान खोजकर मंदिर निर्माण हुये जो ऊर्जा के केन्द्र रहे ।

प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित किये जाने दीपक में बाती रखने का हर मंदिर का अपना विधान होता है । जिसका निर्धारण उस स्थान की ऊर्जा की दिशा के अनुरूप होता है जो शंख-घंटियों की ध्वनि एवं वाले मंत्रोच्चार से एक ब्रह्मांडीय नाद बनता है जिससे मन एकाग्र होता है और मस्तिष्क शाँत । जो ध्यान केलिये आवश्यक है। इसके अलावा मंदिरों में तांबे के एक पात्र में तुलसी और कपूर-मिश्रित जल भरा होता है जिसका सेवन करने से जहां रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है वहीं इससे ब्रह्म-रन्ध्र में शांति मिलती है। इस प्रकार मंदिर में जाने वाले कई अवचेतन शक्ति जागरुक करती है जिससे वहाँ की गई प्रार्थना के पूर्ण होती है ।

समाज के सशक्तीकरण और संस्कारों केलिये मंदिर के विविध आयाम

जिस प्रकार समाज जीवन की सामान्य दिनचर्या में अपने कर्म कर्त्तव्य का पालन करते हुये आध्यात्मिक चेतना जागृत करने के समापन आयाम तक भक्ति के नौ आयाम होते हैं, मंदिर निर्माण कला में अधिष्ठान से लेकर शीर्षतुंग तक नौ आयाम होते हैं उसी प्रकार मंदिर में संचालित विधाओं के भी कुल नौ आयाम होते हैं। जो व्यक्ति के जीवन में व्यक्ति, परिवार, समाज, संस्कृति, स्वत्व के साथ संपूर्ण प्रकृति और प्राणियों से समन्वय की चेतना जागृत करते हैं।

मंदिर के विभिन्न प्रकल्पों का उद्देश्य समाज में शिक्षा, चिकित्सा, अनुसंधान, साधना, भक्ति, सत्संग, समन्वय का संचार होता है । इसके लिये मंदिर के साथ विद्यालय, आरोग्य केन्द्र, प्रवचन कक्ष, साधना कक्ष, यज्ञ शाला, अन्नक्षेत्र, संत निवास, गौशाला और यात्री निवास, कुल नौ आयाम होते हैं । इन सभी प्रकल्पों के लिये मंदिरों मेंस्थाई निर्माण होते हैं । यह नवरूप निर्माण ऋषि आश्रम में भी होते थे । वैदिक काल में महर्षि भृगु और महर्षि वशिष्ठ सहित सभी ऋषि आश्रमों में ऐसे प्रकल्पों का विवरण मिलता है । ठीक इसी प्रकार का विवरण सोमनाथ मंदिर पर गजनवी के आक्रमण के समय और अलाउद्दीन खिलजी के अयोध्या काशी मथुरा आदि के विध्वंस के समय भी मिलता है । लेकिन मध्यकाल में आक्रमण और विध्वंस के दौर में बहुत सी परंपराएँ टूटी लेकिन उनके मूल स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं आया । यह ठीक है कि समाज जीवन में चेतना जगाने के लिये चौराहों पर या किसी पेड़ के नीचे प्रतिमा स्थापित कर पूजन अर्चन आरंभ हुआ । संभवतः यह समय की गति थी । मध्यकाल के समय समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखने केलिये यह आवश्यक भी था । लेकिन जहाँ संत और समाज दोनों के समन्वय से मंदिर निर्माण हो रहे हैं उनमें यह नौ आयाम देखने को मिलते हैं।

इन स्थायी आयामों के अतिरिक्त प्रतिदिन प्रभु विग्रह के सम्मुख सुबह शाम आरती में समाज का एकत्रीकरण, आरती के बाद संकीर्तन आदि में समाज की सहभागिता होती है । जो पूरे क्षेत्र को सामूहिकता में जोड़ने का एक सूत्र है । विवाह का आरंभ मंदिर में माता पूजन से ही आरंभ होता है । यह परंपरा भी समाज और परिवार को सामूहिक सूत्र में बाँधने के लिये आवश्यक है ।

जन कल्याण का संदेश मंदिरों से

मंदिर जहाँ विविध सामाजिक आयाम का केन्द्र होते हैं। वही यह मानसिक वातावरण भी था कि मंदिर के पुजारी से लेकर सभी सेवादार मंदिर से केवल अपनी न्यूनतम आवश्यकतानुसार ही साधन सामग्री लेंगे और स्वयं कोई व्यक्तिगत संपत्ति सृजित नहीं करेंगे । दान या दक्षिणा के रूप में जो भी धन आयेगा उसे संचित करके सुरक्षित रखा जायेगा जो जन कल्याणकारी कार्यों में ही व्यय होगा । मंदिर तीन श्रेणियों के रहे हैं। एक वे मुख्य मंदिर जो ऊर्जा और अंतरिक्ष की अलौकिक शक्ति का केन्द्र होते हैं। इस श्रेणी में हम सभी ज्योतिर्लिंग, शक्तिपीठ और सोमनाथ, बालाजी, मथुरा, काशी, अयोध्या, पुष्कर, नेमिषारण्य आदि मान सकते हैं। दूसरे स्थानीय मंदिर जो स्थानीय देवताओं के होते हैं और तीसरे कुल देवी या देवता के मंदिर । आपात समय आने पर सभी मंदिर अपने अंतर्गत आने वाले समाज क्षेत्र की सहायता केलिये अपना निधि कोष खोल दिया करते थे । ऐसे उदाहरण भी हैं जब समय आने पर मंदिरों के कोष से राज कोष को भी सहायता की गई।

25 जुलाई 1880 सुप्रसिद्ध समाजसेवी गणेश वासुदेव जोशी का निधन

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इनके स्वदेशी आँदोलन से ही गाँधी जी को मिली थी खादी प्रचार की प्रेरणा..

–रमेश शर्मा

अंग्रेजी सत्ता ने भारत में अपनी जड़ों को गहरा करने के लिये व्यापार को माध्यम बनाया था । उन्होंने पहले विदेशी वस्तुओं का आकृषण पैदा किया फिर स्वदेशी उत्पाद का दमन किया । 1857 में क्रान्ति की असफलता के बाद इस तथ्य अनेक महापुरुषों ने पहचाना उनमें सबसे प्रमुख थे गणेश वासुदेव जोशी । इन्होंने न केवल समाज में स्वदेशी अपनाओ का अभियान चलाया अपितु स्वदेशी वस्तुओं के कुछ उत्पादन केन्द्र भी स्थापित किये । आगे चलकर जब गाँधी जी भारत लौटे तब उन्हें स्वदेशी और खादी प्रचार की प्रेरणा इनके आंदोलन से ही मिली ।

स्वत्व, स्वाभिमान और स्वदेशी के लिये अपना जीवन समर्पित करने वाले गणेश वासुदेव जोशी का जन्म 9 अप्रैल 1828 को सतारा में हुआ था । परिवार की पृष्ठभूमि शिक्षित और संपन्न थी । पिता ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करते थे । इस कारण कंपनी के कामों और कूटनीति की चर्चा घर में होती थी । बालपन से ही बालक गणेश के मन में अंग्रेजों की चालाकियों और बारीकियों से अवगत हो गये थे । समय के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और वकालत पास की । इसी बीज 1857 की क्रांति ने उन्हें झकझोर दिया । क्रान्ति के दमन के लिये अंग्रेजों के अत्याचार ने उन्हे विचलित कर दिया और वे मन ही मन अंग्रेज शासन को उखाड़ने का चिंतन करने लगे । वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे की कि अंग्रेज को उनकी शैली में उत्तर दिया जाना चाहिए। अंग्रेजों ने अपना राजतंत्र व्यापार से आरंभ किया था । इसलिए अंग्रेजों के व्यापार को कमजोर करने के लिये स्वदेशी वस्तुओं के प्रति पुनः आकर्षण उत्पन्न करना था ।

उस समय अंग्रेज सारा रा-मेटेरियल भारत से ले जाते थे और अपने कारखानों में बना हुआ समान भारत में खपाते थे । इससे उन्हे दो लाभ होते थे । एक तो भारत में शिल्प की मौलिकता घट रही थी और इससे उत्पन्न बेरोजगारी से उन्हे कामगार मिल रहे थे दूसरा उनका माल बिकने से उनका लाभांश बढ़ रहा था । दुनियाँ के हर देश में व्यापार का यही तरीका अंग्रेजों की सत्ता की नींव व्यापार था । इसलिये गणेशजी जोशी जी ने अंग्रेजों की इसी नींव पर सबसे पहले प्रहार करने का निर्णय लिया ।

उन्होंने युवाओं की एक टोली बनाई उनमें स्वाभिमान और स्वत्व का भाव जगाया और यह प्रचार आरंभ किया कि यदि सभी भारतीय फिर से अपने ही देश में निर्मित वस्तुओं का उपयोग करेंगे और अपनी आजीविका के लिये स्वयं अपने कुटीर उद्योग स्थापित करें तो अंग्रेज स्वयं कमजोर हो जायेंगे । इस टोली में दो युवा युवा माधव गोविन्द रानाडे और गोपाल कृष्ण गोखले भी जुड़े। इन युवाओं को आगे करके उन्होंने 1870 में एक संस्था “सार्वजनिक सभा” का गठन किया और इस संस्था का पूरे महाराष्ट्र क्षेत्र में विस्तार किया । इस संस्था का केन्द्र नागपुर को बनाया । इस संस्था में संयोजन का दायित्व माधव गोविन्द रानाडे के हाथ में था जो बाद में न्यायधीश भी बने । पर उन्होंने इस संस्था से अपना जुड़ाव न छोड़ा। जोशी जी ने पूना, नागपुर, सतारा और बंबई आदि अनेक स्थानों पर पर इस संस्था के संचालन केन्द्र बनाये और निराश्रित परिवारों को जोड़कर उनसे कुटीर उद्योग स्थापित कराकर स्वदेशी वस्तुओं का उत्पादन आरंभ कराया तथा विक्रय केन्द्र भी स्थापित किये । उनके द्वारा स्थापित इन कुटीर उद्योगों और उनके विक्रय केन्द्र में हाथ करघा और चरखे द्वारा कपड़ा और इस कपड़े से बने विभिन्न वस्त्र होते थे ।

काका ने अपना जीवन समाज सेवा के माध्यम से राष्ट्र को समर्पित कर दिया। उनकी बेटी गोपाल कृष्ण गोखले को ब्याही थी । जोशी जी की इस बेटी ने अपने पिता की प्रेरणा से माधव रानाडे की पत्नि रामाबाई रानाडे के साथ महिलाओं में जाग्रति और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्त्री “विचारवती सभा” ​​नामक संगठन का गठन किया । इस संस्था को भी कुटीर उद्योग से जोड़ा । जोशी जी इतने लोकप्रिय हुये कि सब उन्हें काका साहब कहते थे । इस प्रकार जोशी जी, उनका पूरा परिवार और उनके द्वारा जोड़ी गई युवाओं की टोली पूरी तरह स्वदेशी जागरण अभियान के लिये समर्पित थी । काका साहब जोशी जी अपने अभियान के लिये कितने समर्पित थे इसका उदाहरण 1877 के दिल्ली दरबार में देखने को मिला । वे उस दरवार में पूर्ण स्वदेशी निर्मित खादी के वस्त्र पहनकर पहुँचे और एक प्रश्न पूछकर सबका ध्यान अपने वस्त्रों की ओर आकर्षित किया । भारत में भारतीयों के लिये नागरिक सम्मान की सबसे पहले ध्यान आकर्षित करने वाले गणेश वासुदेव जोशी ही थे । उन्होंने बहुत विनम्रतापूर्वक कहा था – “महामहिम महारानी जी भारतीय प्रजा को वही राजनीतिक और सामाजिक दर्जा प्रदान करें जो उसकी ब्रिटिश प्रजा को प्राप्त है”।

यह कहा जा सकता है कि स्वतंत्र भारत के लिए जो अहिसंक और वैचारिक अभियान चला उसकी औपचारिक रूप से शुरूआत यही घटना थी । तब भारत में वायसराय लिटन हुआ करते थे । वे सतत अपने अभियान के प्रति समर्पित रहे । कभी न रुके और न कभी अवकाश लिया ।

25 जुलाई 1880 को हृदय रोग के कारण उन्होंने संसार से विदा ले ली । किन्तु भारत को स्वतंत्रता के लिये एक अहिसंक अभियान चलाने का सूत्र दे गये ।

बाद में स्वतंत्रता आंदोलन में स्वदेशी और खादी का जो अभियान चला उसका सूत्र यही आंदोलन था । आगे चलकर तिलक जी भी इसी संस्था से जुड़े । इस संस्था से संबंध गोपाल कृष्ण गोखले और तिलक जी ने ही गाँधी जी को खादी वस्त्र अभियान से अवगत कराया । जिसे गाँधी जी ने अपने स्वदेशी अभियान में जोड़ा । गाँधी जी गोपाल कृष्ण गोखले को अपना गुरुवत् मानते थे ।

भारत में प्रतिवर्ष सृजित हो रहे हैं रोजगार के 2 करोड़ नए अवसर

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दिल्ली : आजकल विदेशी वित्तीय एवं आर्थिक संस्थान भारत के आर्थिक मामलों में अक्सर अपनी राय देने से चूकते नहीं हैं। अभी हाल ही में सिटीग्रुप इंडिया ने भारत की अपने बढ़ते कार्यबल के लिए पर्याप्त मात्रा में नौकरियां सृजित करने की क्षमता के मामले में चिंता जताई थी और एक प्रतिवेदन में कहा था कि भारत को आगामी दशक में प्रतिवर्ष 1.2 करोड़ नौकरियां सृजित करने की आवश्यकता है, जबकि वह प्रतिवर्ष केवल 80-90 लाख नौकरियां ही सृजित करने की राह पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। यह विदेशी वित्तीय एवं आर्थिक संस्थान अपनी आधी अधूरी जानकारी के आधार पर भारतीय अर्थतंत्र के बारे अपनी राय जारी करते दिखाई देते हैं क्योंकि हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा भी एक प्रतिवेदन जारी किया गया है जिसके के अनुसार वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत में रोजगार के नए अवसर सृजित होने के मामले में 6 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है और इस दौरान लगभग 4.7 करोड़ रोजगार के नए अवसर सृजित हुए हैं और देश में कार्य करने वाले नागरिकों की संख्या अब 64.33 करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है, जबकि पिछले वर्ष यह वृद्धि दर 3.2 प्रतिशत की रही थी। अब कहां सिटीग्रुप इंडिया की भारत में केवल 80-90 लाख नौकरियों के अवसर सृजित होने की राह पर की बात की है और कहां भारतीय रिजर्व बैंक की भारत में 4.7 करोड़ रोजगार के अवसर सृजित होने की बात है, दोनों संस्थानों के आंकलन में भारी अंतर दिखाई देता है।

सिटीग्रुप इंडिया के भारत में रोजगार सृजित होने के संदर्भ में जारी उक्त प्रतिवेदन के जवाब में भारत सरकार के श्रम मंत्रालय द्वारा भी पिरीआडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) एवं भारतीय रिजर्व बैंक के KLEMS डाटाबेस के आंकड़ों का प्रयोग करते हुए बताया गया है कि भारत में वर्ष 2017-18 से 2021-22 के बीच 8 करोड़ रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं, जो कि वर्ष 2020-21 में कोविड-19 महामारी के कारण होने वाले वैश्विक आर्थिक व्यवधानों के बावजूद प्रतिवर्ष औसतन 2 करोड़ से अधिक नौकरियां बनती है। इस जानकारी के उपयुक्त होने को PLFS डाटा से भी बल मिलता है जिसके अनुसार भारत में पिछले पांच वर्षों में रोजगार के अवसरों की संख्या, श्रमबल में नए प्रवेशकों की संख्या से अधिक रही है, जिससे देश में बेरोजगारी दर में लगातार कमी आ रही है। इन आंकड़ों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 में 6 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2022-23 में 3.2 प्रतिशत पर नीचे आ गई है। वित्त वर्ष 2023-24 में भारत में 466,59,221 रोजगार के अवसर निर्मित हुए एवं वित्त वर्ष 2023-24 में देश में कुल रोजगार बढ़कर 64.33 करोड़ के स्तर को पार कर गया जो वर्ष 2022-23 में 59.66 करोड़ के स्तर पर था एवं वर्ष 2019-20 में 53.44 करोड़ के स्तर पर था।

उक्त आंकड़ों की सत्यता एवं विश्वसनीयता को और भी अधिक बल मिलता है जब इस संदर्भ में विभिन्न अनुपातों पर नजर डालते हैं। इससे ध्यान में आता है कि भारत में श्रमिक जनसंख्या अनुपात (Worker Population Ratio) वर्ष 2017-18 के 46.8 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 56 प्रतिशत हो गया है। इसी प्रकार भारत में श्रमिक सहभागिता दर (Labour Force Participation Rate) भी वर्ष 2017-18 के 49.8 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2022-23 में 57.9 प्रतिशत हो गई है। जिसके चलते देश में बेरोजगारी की दर (Unemployment Rate) भी वर्ष 2017-18 में 6 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2022-23 में 3.2 प्रतिशत तक नीचे आ गई है। कृषि, आखेट, वानिकी, मछली पालन के क्षेत्र में वर्ष 2022-23 में 25.3 करोड़ व्यक्ति रोजगार प्राप्त कर रहे हैं, जबकि वर्ष 2021-22 में 24.82 करोड़ व्यक्ति इन क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त कर रहे थे। इसी प्रकार वर्ष 2022-23 में निर्माण, व्यापार, यातायात एवं भंडारण के क्षेत्र मुख्य रोजगार प्रदाता क्षेत्रों में गिने जा रहे थे।

ASUSE के सर्वे में भी भारत में 56.8 करोड़ नागरिकों को रोजगार प्राप्तकर्ता बताया गया है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार वर्ष 2004 से वर्ष 2014 के दशक के बीच में केवल 2.9 करोड़ रोजगार उपलब्ध कराए जा सके थे जबकि वर्ष 2014 से वर्ष 2023 के दशक के बीच 12.5 करोड़ रोजगार उपलब्ध कराए गए हैं। विनिर्माण एवं सेवा के क्षेत्रों में वर्ष 2004-2014 के दशक में 6.6 करोड़ रोजगार उपलब्ध कराए गए थे जो वर्ष 2014 से 2023 के दशक में बढ़कर 8.9 करोड़ हो गए हैं। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग के क्षेत्र में भी कुल 20 करोड़ रोजगार उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में कृषि के क्षेत्र में महिलाओं के लिए रोजगार के अधिक अवसर सृजित हो रहे हैं और यह संख्या 60 से 70 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक पहुंच रही है, क्योंकि पुरुष वर्ग अब रोजगार के लिए शहरी क्षेत्रों की ओर आकर्षित हो रहा है जहां उन्हें विनिर्माण एवं सेवा जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। दूसरे, कृषि के क्षेत्र में हो रही लगभग 4 प्रतिशत प्रतिवर्ष की औसत विकास दर के कारण भी कृषि के क्षेत्र में रोजगार के अधिक अवसर सृजित हो रहे हैं।

भारत के लिए एक अच्छी खबर यह भी है कि केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय एवं आर्थिक क्षेत्रों में लिए गए कई महत्वपूर्ण निर्णयों के चलते अब देश में धीरे धीरे अनऔपचारिक अर्थव्यवस्था का आकार कम होकर, औपचारिक अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ रहा है जिसके चलते अब भारत में औपचारिक क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर अधिक मात्रा में निर्मित हो रहे हैं। EPFO द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023-24 में 1.3 करोड़ कामगारों ने EPFO की सदस्यता ग्रहण की है जबकि वित्तीय वर्ष 2018-19 में केवल 61.12 लाख कामगारों ने ही EPFO की सदस्यता ग्रहण की थी। पिछले लगभग साढ़े छह वर्षों में, सितंबर 2017 से मार्च 2024 के बीच, 6.2 करोड़ कामगारों ने EPFO की सदस्यता ग्रहण की है। EPFO के आंकड़ों में लगातार होने वाली वृद्धि से आश्य यह है कि देश में कम आय वाले रोजगार की तुलना में अधिक आय वाले रोजगार अब तेजी से बढ़ रहे हैं और यह अब अधिकतम औपचारिक क्षेत्र में ही सृजित हो रहे हैं। अनऔपचारिक क्षेत्र के कम आय के रोजगार ही अधिक संख्या में सृजित होते हैं। ASUSE सर्वे के अनुसार अब देश की अर्थव्यवस्था में औपचारिक श्रमिकों की संख्या 55 प्रतिशत तक पहुंच गई है जबकि PLFS सर्वे के अनुसार यह 61 प्रतिशत पर पहुंच गई है।

केंद्र सरकार द्वारा कौशल विकास के क्षेत्र में लगातार किए जा रहे प्रयासों एवं निजी एवं सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अधिक से अधिक अवसर सृजित करने के लिए दिए जाने वाले विभिन्न प्रोत्साहनों का असर भी अब धरातल पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। अब तो कई अन्य देश भी भारत से डाक्टरों, इंजीनियरों, आदि की मांग करने लगे हैं। जापान ने 2 लाख भारतीय इंजीनियरों की मांग की है तो इजराईल एवं ताईवान ने भी एक-एक लाख भारतीय इंजीनियरों की मांग की हैं। आस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी आदि विकसित देशों में तो पहिले से ही भारतीय डॉक्टर, इंजीनियर एवं एमबीए के क्षेत्र में कौशल हासिल भारतीयों की भारी मांग है। अब तो अरब देश भी भारतीय डॉक्टर, इंजीनियर एवं एमबीए के क्षेत्र में पारंगत भारतीयों पर अपनी नजर गढ़ाए हुए हैं।

कई निजी संस्थान दरअसल भारत में रोजगार से सम्बंधित आकड़ें प्रस्तुत करने में प्रामाणिक एवं विश्वसनीय सूत्रों का उपयोग नहीं करते हैं एवं अपने निजी हित साधने के उद्देश्य से उपलब्ध आंकड़ों से अपना निजी निष्कर्ष निकालकर जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं, जो कई बार वस्तुस्थिति से भिन्न निष्कर्ष देते हुए दिखाई देता हैं। जबकि कुछ विश्वसनीय सूत्र जहां प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध हैं, में शामिल हैं, भारतीय रिजर्व बैंक, EPFO एवं PLFS आदि, इन संस्थानों द्वारा जारी की गई जानकारी के अनुसार भारत में पिछले पांच वर्षों से बेरोजगारी की दर लगातार कम हो रही है। इसका आश्य यह भी है कि देश में प्रतिवर्ष रोजगार की मांग से रोजगार के अधिक अवसर सृजित हो रहे हैं, इसी के चलते ही तो बेरोजगारी की दर में कमी आ रही है।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा भारत में ही उपलब्ध डाटा/जानकारी का उपयोग करके वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए देश में उत्पादकता का एक अनुमान लगाने का प्रयास किया गया है और जो 27 उद्योगों में उत्पादकता एवं रोजगार के आकलन पर आधारित है। इन उद्योगों को छह व्यापक क्षेत्रों में बांटा गया है, कृषि, माइनिंग और मछली पकड़ना, खनन और उत्खनन, विनिर्माण, बिजली, गैस और जल आपूर्ति, निर्माण और सेवाएं। इस विश्लेषण के लिए नैशनल स्टेटिस्टिकल ऑफिस (NSO), नैशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस (NSSO) एवं ऐन्यूअल सर्वे ओफ इंडुस्ट्रीज (ASI) सहित विभिन्न स्त्रोतों से आकड़ों को संकलित किया गया है, जो पूंजी (Capital-K), श्रम (Labour-L), ऊर्जा (Energy-E), सामग्री (Material-M) एवं सेवा (Services-S) KLEMS डाटाबेस का निर्माण करता है।

Chhattisgarh Chief Minister participated in the Sushasan Samvad program organised in New Delhi

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Chief Minister Shri Sai highlighted the achievements and initiatives of the Chhattisgarh Government in the Sushasan Samvad program

Chief Minister Shri Sai underscored the Chhattisgarh Government’s dedication to good governance and transparency

New Delhi : Chhattisgarh Chief Minister Shri Vishnu Deo Sai participated in the Sushasan Samvad program held at Ashoka Hotel in New Delhi on July 18. He underscored his government’s dedication to good governance and transparency, detailing the various efforts taken to implement effective policies for the state’s welfare and development.

During the Sushasan Samvad program, marking six months of his government, Chief Minister Shri Sai highlighted the achievements and initiatives undertaken. He noted that the biggest challenge for the BJP government was maintaining the trust of the people. He stated that within just 100 days, the government succeeded in restoring this trust by fulfilling the guarantees promised by Shri Modi ji in the state manifesto.

Chief Minister Shri Sai addressed various public questions, emphasising that his administration had effectively eliminated systemic corruption and revenue loss prevalent under the previous government. He mentioned that public works are now being carried out smoothly, discouraging those who previously benefitted from commissions. He affirmed, “Both the intention and policy of our government are right.”

Focusing on efforts against Naxalism, he stated, “Our government has made significant strides in strengthening security in Naxal-affected areas. We have established security camps in these areas and accelerated development works, achieving substantial success not only in security but also in development.”

During the program, Chief Minister Shri Vishnu Deo Sai emphasised the numerous steps his government has taken to promote transparency and good governance in Chhattisgarh. He stated, “We have simplified and made administrative processes transparent so that the public can quickly and effectively find solutions to their problems.”

Highlighting his government’s achievements, Chief Minister Shri Sai stated that immediately upon taking office, they provided Pradhan Mantri Awas to 18,12,743 needy families, as guaranteed by Shri Modi ji. Farmers received two years of pending paddy bonuses, and paddy purchase commenced at the promised rate of Rs 3100 per quintal, with a limit of up to 21 quintals per acre. Under the Mahtari Vandan Yojana, financial assistance of Rs 1000 per month is being provided to women in the state. The remuneration rate for tendupatta collection has been increased from Rs 4000 to Rs 5500 per standard sack.

Chief Minister Sai stated that his government has brought substantial development and good governance to the state, taking significant steps to enhance security. He stated, “We are adding value and preparing for our vision of Chhattisgarh’s future. We have initiated numerous new projects for the state’s development and are providing all necessary facilities to the public.”

Sharing his vision and plans during the Sushasan Samvad program, Chief Minister Shri Sai affirmed his government’s unwavering commitment to the state’s development and public interest. He stated, “We are continuously working towards making Chhattisgarh a model state.”

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