शतआयु संघ और महिला सहभागिता’ : परिचर्चा में बोलीं ट्रस्टी निदर्शना गोवानी: नारी त्रिदेवी का साक्षात स्वरूप, संस्कारों से ही हमारी असली पहचान

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लखनऊ: राजधानी स्थित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के मर्करी हॉल में “शतआयु संघ और महिला सहभागिता” पुस्तक पर आधारित एक विशेष परिचर्चा का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। इस गरिमामयी कार्यक्रम में कमला अंकिबाई घमंडीराम गोवानी ट्रस्ट की ट्रस्टी श्रीमती निदर्शना गोवानी ने विशिष्ट वक्ता के रूप में सहभागिता की तथा राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की बदलती भूमिका और उनके अमूल्य योगदान पर अपने विचार साझा किए।

समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश की महामहिम राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल, विशिष्ट अतिथि के रूप में विधानसभा अध्यक्ष श्री सतीश महाना, प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री श्रीमती बेबी रानी मौर्य, उ.प्र. राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव तथा पुस्तक की लेखिका डॉ. शोभा विजेंद्र सहित अनेक प्रबुद्धजन एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्रीमती निदर्शना गोवानी ने भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, “महिलाएं वस्तुतः महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का स्वरूप हैं। जब वे महाकाली बनती हैं तो परिवार, कुटुंब और समाज की सुरक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ी होती हैं। महालक्ष्मी के रूप में वे गृह-प्रबंधन, अर्थ-व्यवस्था और दयाभाव से पूरे समाज का संचालन करती हैं। वहीं महासरस्वती के रूप में ईश्वर ने हमें विवेक और ज्ञान दिया है। हमारी पहचान परिधानों से नहीं, बल्कि हमारे उच्च संस्कारों से है।”

उन्होंने आगे कहा कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं। पुरुष आदिशक्ति के अभिन्न अंग हैं और परस्पर सहयोग से ही सृष्टि एवं समाज में पूर्णता आती है। अपने अनुभवों को साझा करते हुए श्रीमती गोवानी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारत विकास परिषद जैसे संगठनों ने सदैव बहनों को मातृवत और भगिनी भाव से आगे बढ़ने का संबल दिया है। आज सामाजिक व संगठनात्मक कार्यों में बहनों को भाइयों के समान ही सम्मान और अवसर प्राप्त हैं।
कार्यक्रम के अंत में पुस्तक की लेखिका डॉ. शोभा विजेंद्र की दूरदृष्टि की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। उपस्थित अतिथियों ने इस बात पर बल दिया कि यह कृति आने वाले समय में समाज और राष्ट्र के विकास में महिलाओं की सक्रिय सहभागिता को नई ऊर्जा और स्पष्ट दिशा प्रदान करेगी।

वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में आर्थिक विकास दर ने चौंकाया

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भोपाल। दिनांक 31 अगस्त 2026 को सायंकाल में केंद्र सरकार ने भारत के वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के आंकड़े जारी किए हैं। विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित अन्य वैश्विक संस्थानों, एसोचेम, भारतीय रिजर्व बैंक आदि के अनुमानों को धत्ता बताते हुए अप्रेल-जून 2026 की तिमाही में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। जबकि, उक्त संस्थानों ने उक्त अवधि में 6.5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत के बीच की वृद्धि दर का अनुमान लगाया था। उक्त वृद्धि दर वैश्विक स्तर पर विभिन्न प्रकार की आर्थिक समस्याओं के बीच हासिल हुई है, इसलिए भारत के लिए यह एक मील का पत्थर साबित होगी। रूस-यूक्रेन युद्ध तो बहुत लम्बे समय से चल रहा है, ईरान-अमेरिका/इजराईल युद्ध भी इस तिमाही में जारी रहा, जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली थी। एक समय तो कच्चे तेल की कीमतें 120 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गई थीं। ज्ञातव्य हो कि भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ईरान द्वारा स्ट्रेट ओफ होर्मुज को बंद करने के पश्चात इस मार्ग से गुजरने वाले तेल के जहाजों को रोक दिया गया था एवं कच्चे तेल की आपूर्ति पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ा था। परंतु, भारत ने इस दयनीय स्थिति को बहुत ही सूझ बूझ के साथ सम्भाला और अन्य कई देशों से तेल एवं गैस का आयात जारी रखा, जिससे भारत में न तो तेल की आपूर्ति कम हुई और न ही भारत में पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई। जबकि अन्य कई देशों में तो पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज हुई है।

भारत के युवाओं (जेन-जी) को इस बात को समझना होगा कि भारत आज आर्थिक विकास के जिस दौर से गुजर रहा है, वह बहुत ही संवेदनशील है। यदि देश में किसी भी प्रकार की अराजकता फैलायी जाती है तो आर्थिक विकास की पटरी से भारत डीरेल हो सकता है। आगे आने वाले 10 वर्षों तक भारत यदि विकास दर की इसी ट्रेजेक्टरी में अपने आप को बनाए रखने में सफल होता है तो भारत के वर्ष 1947 में विकसित राष्ट्र बनने के सपने को साकार होने से कोई रोक नहीं सकता है। अर्थ के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में अप्रेल-जून 2026 तिमाही में सराहनीय वृद्धि दर हासिल की गई है। सकल मूल्य संवर्धन में वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत की रही है जो अप्रेल-जून 2025 की तिमाही में 7 प्रतिशत की रही थी। विनिर्माण के क्षेत्र में वृद्धि दर पिछले वर्ष की तिमाही में 8.3 प्रतिशत की रही थी जो इस वर्ष की तिमाही में बढ़कर 9.2 प्रतिशत की हो गई है। इसी प्रकार सेवा के क्षेत्र में भी आर्थिक विकास दर इस वर्ष की प्रथम तिमाही में बढ़कर 10 प्रतिशत पर पहुंच गई जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 8 प्रतिशत रही थी। भारत की अर्थव्यवस्था उपभोग आधारित है, अतः निजी उपभोग में इस वर्ष की तिमाही में 7.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 6.8 प्रतिशत रही थी। सकल स्थिर पूंजी निर्माण में भी अतुलनीय 11.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है जो पिछले वर्ष की इसी अवधि में केवल 5.8 प्रतिशत की रही थी। इसी प्रकार, रोजगार निर्मित करने वाले क्षेत्रों में भी विकास दर प्रभावशाली रही है। वित्तीय क्षेत्र में वृद्धि दर 12.1 प्रतिशत की दर्ज हुई है तो व्यापार, होटल, यातायात एवं संचार के क्षेत्र में 8.5 प्रतिशत की विकास दर हासिल की गई है। साथ ही गैस एवं विजली उत्पादन में भी वृद्धि दर 8.9 प्रतिशत की रही है।

वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही में सराहनीय विकास दर हासिल करने को केंद्र सरकार की योजनाओं की सफलता के रूप में भी देखा जा सकता है। केंद्र सरकार ने मेक इन इंडिया नामक योजना को तेजी से आगे बढ़ाया है और इसने भारत को कई क्षेत्रों में आत्म निर्भर बनाने का कार्य सफलतापूर्वक किया है। विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, डिजिटल भुगतान, फिन टेक, इंजिनीयरिंग डिजाइन, व्यापार परामर्श, वैश्विक ग्लोबल योग्यता सेंटर, आदि क्षेत्रों में भारत आज पूरे विश्व में लीड कर रहा है। मेक इन इंडिया योजना ने भारतीय नागरिकों में जोश भरा और भारत की प्रतिभा का डंका पूरे विश्व में बज गया है। दूसरे, भारत में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना को भी लागू किया गया। इस योजना ने भारत को उपभोक्ता बाजार से निकालकर मजबूत वैश्विक विनिर्माण हब में बदल दिया है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत 14 प्रमुख क्षेत्रों में करीब 2.3 लाख करोड़ रुपए का निवेश हुआ है, 16.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कुल उत्पादन हुआ है एवं 12 लाख से अधिक रोजगार के नए अवसर निर्मित हुए। इसके उपरांत प्रारम्भ हुई प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना के अंतर्गत सड़क, रेल, बंदरगाह, एयरपोर्ट और लाजिस्टिक को पहली बार इंटीग्रेटेड तरीके से जोड़ने की कोशिश की गई। समर्पित मालवाहक गलियारों का निर्माण तो इस दृष्टि से मील का पत्थर साबित हुए हैं। नए एक्स्प्रेस वे ने माल ढुलाई का समय घटाया। लागत को कम किया और भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया। 86,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात इस सफलता की कहानी को दर्शाता है।

निर्यात में अतुलनीय वृद्धि दर उस समय पर हासिल की गई है जब अमेरिका की टैरिफ नीति ने पूरे विश्व को परेशान किया हुआ है। साथ ही, रूस यूक्रेन युद्ध, ईरान इजराईल-अमेरिका युद्ध, इजराईल हमास युद्ध एवं वैश्विक स्तर पर अस्थिरता का बने रहना भी शामिल है। इन परिस्थितियों के बीच भारत ने उत्पादों एवं सेवा के क्षेत्र में निर्यात का रिकार्ड बनाया है। जबकि कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती बनी हुई है। भारत के कुल निर्यात में सेवा क्षेत्र की कुल हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। यदि भारत को चीन जैसी विनिर्माण क्षेत्र की ताकत बनाना है तो भारत को हाई वैल्यू मैन्युफेक्चरिंग, सेमीकंडक्टर, मशीनरी, और सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्योग के क्षेत्र को और अधिक मजबूत करना होगा। घरेलू उत्पाद बढ़ाकर न केवल उत्पादों के आयात को कम किये जाने का प्रयास किया जा रहा है बल्कि वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेसरी भी बढ़ाई जा रही है। भारत में हाल ही में आई मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक क्रांति का भी इसमें बहुत बड़ा योगदान है। वर्ष 2014 में भारत में केवल 2 मोबाइल उत्पादन इकाईयां कार्यरत थीं। आज भारत मोबाइल निर्माण के क्षेत्र में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्माता देश बन गया है। ऐपल की फ्लेगशिप कम्पनी अब मैन्युफेक्चरिंग इन इंडिया की ओर आगे बढ़ रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन 2014-15 के 1.9 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2025-26 में 13.11 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। रक्षा के क्षेत्र में भी उत्पादन एवं निर्यात तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। रक्षा के क्षेत्र में भारत अपनी छोटी मोटी जरूरतों के लिए अन्य देशों की ओर देखता था आज वह फिलिपींस को ब्रह्मोस मिसाईल का निर्यात कर रहा है। कई अफ्रीकी देशों को मेड इन इंडिया हेलिकोप्टर निर्यात कर रहा है। अब देश की कुल जरूरत का लगभा 65 प्रतिशत रक्षा उत्पाद देश में ही निर्मित हो रहा हैं। जो रक्षा उत्पादन वर्ष 2014-15 में 46,429 करोड़ रुपए का था वह 2025-26 में बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपए के रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुका है। रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपए के उच्चत्तम स्तर पर पहुंच चुका है। आज रक्षा के क्षेत्र में विभिन्न उत्पादों का निर्यात 100 से अधिक देशों को किया जा रहा है। ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में उत्पादन में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हुई है एवं फार्मा क्षेत्र में तो भारत को फार्मेसी आफ द वर्ल्ड कहा जा रहा है। भारत की एक्स्पोर्ट बास्केट भी बढ़ रही है – पेट्रोलीयम उत्पाद, इंजिनीयरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, ऑटोमोबाइल, टेक्स्टायल जैसे कई क्षेत्रों में विकास दर तेजी से बढ़ रही है। भारत किसी एक सेक्टर पर निर्भर नहीं है। कई क्षेत्रों में एक साथ आगे बढ़ रहा है। दुनिया की सप्लाई चैन में भारत की नई भूमिका तय हो रही है। भारत एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात करने की ओर आगे बढ़ रहा है।

जंतर-मंतर मारपीट मामला: बड़बोले दावे दोनों तरफ, सच्चाई जांच पर टिकी

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दिल्ली । दिल्ली के जंतर-मंतर पर 23 जून 2026 को कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प अब दो महीने बाद फिर सुर्खियों में है। विवाद वीडियो बनाने को लेकर शुरू हुआ था। निशु आजाद के पिता संजय कुमार के सिर पर चोट आई। पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में दर्ज एफआईआर में स्वतंत्र भारद्वाज और सूरज कुमार नामजद हैं। पुलिस के अनुसार चोट कड़े से हुई और मेडिकल रिपोर्ट में इसे साधारण बताया गया।

मामला तब गरमाया जब स्वतंत्र भारद्वाज का पॉडकास्ट वायरल हुआ। उसमें उन्होंने निशु के पिता का सिर फोड़ने, धारा 307 लगने और फिर भी जेल न जाने का दावा किया। बाद में उन्होंने कहा कि भीड़ ने उन्हें घेर लिया था और वार आत्मरक्षा में हुआ। यह बयान चौतरफा विरोध का कारण बना। सीजेपी नेताओं और समर्थकों ने संसद मार्ग थाने के बाहर प्रदर्शन किया। पुलिस ने 72 घंटे में गिरफ्तारी का आश्वासन दिया और 4 सितंबर को स्वतंत्र भारद्वाज को बुलंदशहर से हिरासत में ले लिया। मामले में एससी-एसटी अधिनियम जोड़ने की मांग भी उठी।

विरोध जायज है। सार्वजनिक मंच पर हिंसा का दावा करके घूमना कानून की अवहेलना है। सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। मगर दूसरी तरफ के भी दावे कम नहीं हैं। निशु के पिता और समर्थकों के बयानों में भी हिंसा और अन्याय का एकपक्षीय चित्र उभरता है। हिंसक होने के दावे दोनों तरफ से किए जा रहे हैं। पुलिस जांच में पूरा वीडियो फुटेज, गवाहों के बयान और मेडिकल दस्तावेज सामने आने चाहिए। तभी पता चल सकेगा कि झड़प कैसे बढ़ी और वार जानबूझकर था या भीड़भाड़ में हुआ।

असली दिक्कत यह है कि मामला अब सच्चाई और इंसाफ से ज्यादा राजनीतिक हो चला है। विपक्षी नेता, संगठन और सोशल मीडिया इसे अपनी लड़ाई बना रहे हैं। एक तरफ संरक्षण के आरोप लग रहे हैं, दूसरी तरफ जातीय और वैचारिक कोण जोड़े जा रहे हैं। राजनीति में अक्सर न्याय नहीं मिलता, समीकरण बनते हैं। ऐसे माहौल में तथ्यों की जगह नैरेटिव हावी हो जाता है।

कानून दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। बड़बोलापन चाहे किसी का हो, संज्ञान लिया जाना चाहिए। अंतिम फैसला अदालत का होगा, राजनीतिक मंच का नहीं। जब तक जांच निष्पक्ष नहीं रहेगी, यह विवाद सच्चाई की बजाय सियासत का औजार बना रहेगा।

दिलीप मंडल का एक तरफा नफरती झूठ, कश्‍मीर और ब्राह्मणों को लेकर एक सच यह भी है !

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । मध्यकालीन एवं आधुनिक कश्मीर में इस्लामी चरमपंथ, जनसांख्यिकीय संकट और ‘पंडित’ पहचान का रणनीतिक पुनरुत्थान: दिलीप मंडल के दावों की आलोचनात्मक समीक्षा

भारतीय दर्शन और अध्यात्म के क्षेत्र में कश्मीर का इतिहास एक समय शिखर पर रहा है। वहीं, यह मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक विदेशी आक्रांताओं द्वारा किए गए भीषण सांस्कृतिक दमन और जनसांख्यिकीय उथल-पुथल का भी गवाह है। 14वीं शताब्दी के बाद जब कश्मीर की सत्ता क्रूर सुल्तानों और विदेशी चरमपंथियों (इस्‍लामिक जिहादियों) के हाथों में गई, तब वहां के मूल हिंदू समाज को विनाशकारी संकट का सामना करना पड़ा।

स्‍वभाविक है कि ऐसे अंधकार एवं भारी कष्‍टपूर्ण जीवन में बड़े पैमाने पर हुए नरसंहार, मंदिरों के विध्वंस और बलपूर्वक किए गए धर्म परिवर्तन के कारण कश्मीर की प्राचीन पारंपरिक सामाजिक संरचना छिन्न-भिन्न हो गई थी। इस भयानक दौर में जब हिंदू समाज का अस्तित्व ही पूरी तरह दांव पर लगा था, तब बिखरे हुए समाज को एकजुट करने और आपसी जातिगत दीवारों को ढहाने के लिए एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक प्रयास किया गया।

लोक-परंपराओं, मौखिक इतिहास और कश्मीरी समाज की स्मृतीकृत चेतना में मुगल काल के प्रकांड विद्वान पण्डितराज जगन्नाथ की प्रेरणा और उस समय के दूरदर्शी निर्णयों को एक युगांतकारी मील का पत्थर माना जाता है। इस विमर्श के अनुसार, जब इस्लामी चरमपंथ के कारण गैर-ब्राह्मण जातियां बिखर चुकी थीं, तब संपूर्ण बचे हुए हिंदू समाज को सुरक्षा और गौरव प्रदान करने के लिए ‘पंडित’ सरनेम को एक सामूहिक कवच के रूप में अपनाया गया।

हाल ही में, केंद्र सरकार के वरिष्ठ सलाहकार दिलीप मंडल ने जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक ‘भारत की खोज’ (1946) के हवाले से यह दावा किया कि स्‍वाधीनता या उसके पूर्व कश्मीर के मुसलमान दोबारा हिंदू (घर वापसी) बनने को तैयार थे, लेकिन बनारस के पंडितों के शुद्धतावादी रुख के कारण यह ऐतिहासिक अवसर खो गया। वस्‍तुत: यह अध्‍ययन मध्यकालीन कश्मीर में हुए जिहादी अत्याचारों, सामाजिक विखंडन के साथ-साथ दिलीप मंडल के दावों का एक गहरा अकादमिक प्रतिवाद प्रस्तुत करने का प्रयास है, और यह स्थापित करना है कि इतिहास के विभिन्न झंझावातों में पंडितों ने किस प्रकार हिंदू समाज की रक्षा की है।

मध्यकालीन कश्मीर में इस्लामी चरमपंथ और जातियों का विखंडन

कश्मीर में हिंदू राजवंशों के पतन के बाद, 14वीं शताब्दी में शाहमीर राजवंश की स्थापना के साथ ही इस्लामी शासन की शुरुआत हुई। इसका सबसे वीभत्स रूप सुल्तान सिकंदर के शासनकाल (1389-1413) में देखने को मिला, जिसे इतिहास में ‘बुतशिकन’ (मूर्तियों को तोड़ने वाला) के नाम से जाना जाता है। सिकंदर ने कश्मीर से सनातन धर्म के अस्तित्व को समूल नष्ट करने का संकल्प लिया था, जिसके लिए उसने राजकीय तंत्र का क्रूरतापूर्वक उपयोग किया।

इतिहासकार जोनराज ने अपनी ‘नूतन राजतरंगिणी’ में लिखा है कि हिंदुओं के सामने तीन ही विकल्प छोड़े गए थे, या तो वे इस्लाम स्वीकार करें, या कश्मीर घाटी छोड़कर चले जाएं, अथवा मृत्यु का आलिंगन करें।(Jonaraja, 1459, p. 115)। इस ऐतिहासिक उथल-पुथल का सबसे गहरा और विनाशकारी प्रभाव कश्मीरी हिंदू समाज की आंतरिक जातिगत व्यवस्था पर पड़ा। युद्धों एवं ज्ञान परंपरा में सीधे तौर पर शामिल होने के कारण क्षत्रिय एवं ब्राह्मण वर्ग को सबसे पहले और सबसे अधिक निशाना बनाया गया। वे या तो युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए या उनके बड़े हिस्से को बलपूर्वक इस्लाम में शामिल कर लिया गया।इसके परिणामस्वरूप, गैर-ब्राह्मण जातियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा या तो कश्मीर घाटी में ही इस्लाम के दायरे में समा गया या वे सीमावर्ती मैदानी क्षेत्रों जैसे पंजाब और हिमाचल के पर्वतीय अंचलों की ओर विस्थापित हो गए। (Farishta, 1612, Vol. 4, p. 468)।

वस्‍तुत: जो हिम्‍मत करके यहां शेष बचे थे, वह भी अपने को भारी दबाव में महसूस कर रहे थे, उन्‍हें लग रहा था कि पता नहीं कब उन्‍हें भी अपने जीवन से हाथ धोना पड़ेगा, किंतु वे परकीय धर्म (रिलीजन) अपने जीवन में जीवित रहते हुए स्‍वीकार नहीं करेंगे। वे मुसलमान नहीं होंगे। वे इस्‍लाम का कलमा नहीं पढ़ेंगे। इस जनसांख्यिकीय संकट के बाद कश्मीर घाटी के भीतर जो मूल हिंदू आबादी बच गई, उसमें मुख्य रूप से सारस्वत ब्राह्मण समुदाय के लोग एवं शेष अन्‍य शामिल थे, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी सनातन धार्मिक पहचान को बचाए रखा।

पण्डितराज जगन्नाथ और ‘पंडित’ उपनाम का सामूहिक कवच

जब 17वीं शताब्दी में भारत की केंद्रीय सत्ता मुगल सम्राट शाहजहाँ के हाथों में आई, तब कश्मीर में चल रहे इस दमन चक्र के बीच के कालखंड में भारतीय इतिहास के एक अत्यंत असाधारण व्यक्तित्व का उदय होता है, जिन्हें हम पण्डितराज जगन्नाथ के नाम से जानते हैं। मुगल दरबार को भी उनकी योग्‍यता एवं सामूहिक सम्‍मान के कारण से सर्वोच्चता स्‍वीकारना पड़ी थी। शाहजहाँ ने उनकी अद्वितीय विद्वता से प्रभावित होकर उन्हें ‘पंडितराज’ की उपाधि से विभूषित किया था।शाहजहाँ के प्रधानमंत्री आसफ़ ख़ान के विशेष निमंत्रण पर पंडितराज जगन्नाथ ने कश्मीर की लंबी यात्रा की थी (Jagannatha, Asaf Vilas, 1640)।

कश्मीरी जनश्रुतियों और सामाजिक स्मृतियों में यह बात अत्यंत दृढ़ता के साथ स्थापित है कि इसी कालखंड में कश्मीर के बचे हुए हिंदू समाज को एक अखंड और अभेद्य सामाजिक इकाई में बदलने के लिए एक युगांतकारी निर्णय लिया गया। मुगल दरबार में कश्मीरी समाज की विद्वता और उनके आत्मसम्मान को पुनर्स्थापित करने के लिए एक सामाजिक सहमति तैयार की गई। इसके तहत यह स्थापित किया गया कि कश्मीर के बचे हुए सभी मूल हिंदू, चाहे उनका पूर्व का पारिवारिक इतिहास या जाति (क्षत्रिय, वैश्य आदि जो अंततः इस पहचान में समाहित हुए) कुछ भी रही हो, अपने नाम के आगे सामूहिक रूप से ‘पंडित’ (जिसका अर्थ विद्वान होता है) शब्द का प्रयोग करेंगे (Kaul, 1924, p. 38)।

इस ऐतिहासिक निर्णय का सबसे चमत्कारी और दूरगामी प्रभाव यह पड़ा कि इसने कश्मीर के हिंदू समाज के भीतर सदियों से चली आ रही ऊंच-नीच की भावनाओं और जातिगत विभेदों को समूल नष्ट कर दिया (Tikoo, 1979, p. 45)। सबको एक समान उपनाम ‘पंडित’ मिलने से पूरा समुदाय एक ऐसी अखंड सामाजिक और आध्यात्मिक चट्टान बन गया, जिसके भीतर फूट डालना किसी भी बाहरी या चरमपंथी शक्ति के लिए असंभव हो गया।

दिलीप मंडल के दावों की समीक्षा

वरिष्ठ पत्रकार और केद्र सरकार में सलाहकार दिलीप मंडल का जैसा कि सर्वविदित है कि हाल ही में एक दावा सामने आया है, भारतीय स्‍वयंतंत्रता के समय कश्मीर में ‘घर वापसी’ का माहौल था और वहां के मुसलमान दोबारा हिंदू बनने को तैयार थे, परंतु बनारस के पंडितों के ‘शुद्धतावादी’ रवैये के कारण ऐसा नहीं हो सका। मंडल ने इसके लिए जवाहरलाल नेहरू की 1946 में प्रकाशित पुस्तक ‘भारत की खोज’ का हवाला दिया है। सोशल मीडिया एक्‍स पर उन्‍होंने लिखा, “अगर बनारस के पंडितों ने दिल बड़ा किया होता तो कश्मीर की कहानी अलग होती. वहां के मुसलमान फिर से हिंदू बनने के लिए तैयार थे. वहां के राजा ने बनारस संदेश भेजा. पर पंडित ज्यादा शुद्धतावादी हो गए. ये ऐतिहासिक गलती थी.बता रहे हैं जवाहरलाल नेहरू, पुस्तक – भारत की खोज (1946)”

अब इस दावे का अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण करने पर निम्नलिखित विसंगतियां सामने आती हैं-

• दोषारोपण की राजनीति और आधा सच: दिलीप मंडल ने बनारस के पंडितों को तो ‘शुद्धतावादी’ कहकर कटघरे में खड़ा कर दिया, लेकिन उन्होंने इस सिक्के के दूसरे पहलू को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। नेहरू ने अपनी पुस्तक में खुद यह भी संकेत दिया था कि तत्कालीन शासकों और रूढ़िवादी तत्वों के बीच राजनीतिक सामंजस्य का अभाव था।

• नेहरू और राज्य सत्ता की विफलता: मंडल स्वयं अपनी पोस्ट के दूसरे भाग में यह स्वीकार करते हैं कि जब जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री और कर्ताधर्ता बने, तब उन्होंने कश्मीर के इस ऐतिहासिक संकट को सुलझाने के बजाय तुष्टिकरण की राजनीति को प्राथमिकता दी। यदि समस्या सिर्फ बनारस के पंडितों की थी, तो आजादी के बाद स्वतंत्र भारत की संप्रभु सरकार (जिसके पास पूर्ण कानून बनाने का अधिकार था) ने कश्मीर के हिंदुओं और वहां की जनसांख्यिकी को संतुलित करने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया? इसका उत्तर नेहरू की अपनी राजनीतिक तुष्टिकरण की नीतियों में छिपा है।

• यदि दिलीप मंडल का यह तर्क है कि बनारस के ब्राह्मणों ने कश्‍मीर की घर वापिसी को रोका, तब फिर वे इस सच को क्‍यों नहीं बताते कि पण्डितराज जगन्नाथ भी एक ब्राह्मण थे, जिन्‍होंने शेष कश्‍मीर की सभी हिन्‍दू जातियों को अपना सरनेम पंडित देकर सभी को उच्‍चवर्ण का अपने समान और अपने अनुकूल घोषित कर तत्‍कालीन समय में कश्‍मीर से न सिर्फ हिन्‍दू पयालन रोका, बल्‍कि शाहजहां के दरबार से कश्‍मीर के इस्‍लामिक शासक को यह संदेश भी पहुंचाया कि गैर मुस्‍लिम हिन्‍दुओं पर अब कोई अत्‍याचार नहीं किया जाएगा।

• उदाहरण तो इतिहास में शिवाजी महाराज का भी है, जिनके राज्‍याभिषेक के लिए कश्‍मीर के विद्वान तैयार नहीं थे, फिर वहीं से सबसे श्रेष्‍ठ एवं महान विद्वान ने वैदिक मंत्रोंच्‍चार के साथ शिवाजी महाराज का राज्‍याभिषेक ही नहीं कराया, उन्‍हें कोटि हिन्‍दू ह्दयों का हिन्‍दू सम्राट तक घोषित किया था। तब यह भी प्रश्‍न है कि क्‍या कश्‍मीर के राजा सबकुछ बनारस के विद्वानों से पूछकर ही करते थे?

वस्‍तुत: दिलीप मंडल जो दलित विमर्श का नैरेटिव गढ़ते हैं, उसमें वे यह भी स्‍वीकार करें कि भारतीय इतिहास में वंचित, शोषित, दलित और पिछड़े वर्गों के पराक्रम और शासन की गाथाएं अत्यंत गौरवशाली और प्रेरक रही हैं। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में इन समुदायों के शूरवीरों ने अपनी तलवार के बल पर विशाल साम्राज्यों की स्थापना की थी। देश की संस्कृति और अस्मिता की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति भी दी। आधुनिक संवैधानिक और सामाजिक व्यवस्था के तहत इनमें से अधिकांश समुदायों को अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

उत्तर प्रदेश और अवध के मध्यवर्ती भूभाग का इतिहास पासी जाति के राजाओं के पराक्रम के बिना अधूरा है, जो वर्तमान में अनुसूचित जाति (एससी) श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। 11वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र में पासी शासकों का एक अत्यंत सुदृढ़ और समृद्ध शासन तंत्र स्थापित था। इस क्रम में सबसे प्रतापी नाम राजा सुहेलदेव पासी का आता है, जिन्होंने बहराइच के ऐतिहासिक युद्ध में विदेशी आक्रांता सालार मसूद गाजी को धूल चटाकर सनातन संस्कृति की रक्षा की थी।

इसी प्रकार, लखनऊ के बिजनौरगढ़ के शक्तिशाली शासक राजा बिजली पासी ने 12 किलों के एक अभेद्य महासंघ का निर्माण किया था। अनेक ऐतिहासिक शोधों के अनुसार, आधुनिक लखनऊ की नींव रखने वाले राजा लखन पासी, रायबरेली में गंगा तट पर विशाल किले का निर्माण कराने वाले राजा डालदेव पासी, तथा राजा सातन पासी, राजा देवमाती पासी व राजा छीता पासी इसी पासी समाज के गौरव थे। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी इस समाज ने अभूतपूर्व योगदान दिया, जिसमें उन्नाव के राजा गंगाबक्स रावत ने अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ा, और वीरांगना उदा देवी पासी ने लखनऊ के सिकंदर बाग में अकेले ही 36 ब्रिटिश सैनिकों को मौत के घाट उतारकर सर्वोच्च बलिदान दिया।

राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के वनों व पर्वतीय अंचलों में भील और मीणा जनजातियों का शासन था, जो आज अनुसूचित जनजाति (एसटी) के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मेवाड़ के इतिहास में राणा पूंजा भील का नाम अमर है, वे महाराणा प्रताप के सबसे विश्वस्त सेनापति और रणनीतिकार थे, जिनकी गुरिल्ला भील सेना के सहयोग के बिना हल्दीघाटी के युद्ध की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

उनके इसी योगदान के कारण आज भी मेवाड़ के राजचिह्न पर एक तरफ राजपूत योद्धा और दूसरी तरफ भील योद्धा का चित्र अंकित है। इसके अतिरिक्त, राजस्थान के प्रमुख शहरों और रियासतों की स्थापना का श्रेय भी भील राजाओं को जाता है, जिनमें राजा बांसिया भील के नाम पर बांसवाड़ा, राजा दूंगरिया भील के नाम पर डूंगरपुर और राजा कोटिया भील के नाम पर कोटा शहर का नामकरण और शुरुआती शासन इतिहास में दर्ज है।

वहीं, जयपुर (आमेर) पर कछवाहा राजपूतों के आगमन से पहले खोंगोंग के क्षेत्र पर राजा आलन सिंह मीणा के नेतृत्व में शक्तिशाली मीणा राजवंश का समृद्ध शासन संचालित था। वहीं, पश्चिम और मध्य भारत के इतिहास में कोली, महार और रामोशी समुदायों के शासकों और योद्धाओं ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में जयबा मुकने ने 14वीं शताब्दी में जव्हार रियासत की स्थापना की, जहां कोली समाज के राजाओं ने सदियों तक सफलतापूर्वक शासन किया।

छत्रपति शिवाजी महाराज की नौसेना और सेना में यशवराव कोली और राजा नागाजी कोली जैसे जांबाज कमांडर शामिल थे। उत्तर प्रदेश के झांसी राज्य में वीरांगना झलकारी बाई (कोली जाति, एससी) ने रानी लक्ष्मीबाई की मुख्य सेनापति के रूप में अंग्रेजों को भ्रमित करते हुए अद्भुत पराक्रम दिखाया, और उनका कद शासन में किसी रानी से कम नहीं था। ब्रिटिश सत्ता को पहली कड़ी चुनौती देने वाले उमाजी नाईक (रामोशी समुदाय, विमुक्त जाति) ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर खुद को राजा घोषित किया था और अपनी समानांतर सरकार चलाई थी।

सैन्य कौशल और वीरता के प्रतीक महार समुदाय ने इतिहास की कई निर्णायक लड़ाइयों में भाग लिया, जिनमें सिदनाक महार जैसे योद्धाओं का नाम उल्लेखनीय है। इसी समाज से सूबेदार मेजर रामजी मालोजी सकपाल भी आते हैं, जो ब्रिटिश भारतीय सेना की महार रेजिमेंट में सर्वोच्च पद पर रहे और बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर के पिता व मार्गदर्शक बने।

यदि प्राचीन भारत के विशाल साम्राज्यों की बात करें, तो वर्ण व्यवस्था के अनुसार शूद्र या वंचित श्रेणियों से आने वाले शासकों ने पूरे अखंड भारत पर राज किया, जिन्हें आज अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत देखा जाता है। मगध साम्राज्य पर शासन करने वाले महापद्मनंद (नंद राजवंश के संस्थापक) मूल रूप से नाई समुदाय से थे। उन्होंने अपनी अद्भुत सैन्य शक्ति से तत्कालीन सभी क्षत्रिय राजाओं को पराजित कर भारत के पहले अखिल भारतीय साम्राज्य की नींव रखी थी।

इसी प्रकार, भारत को एक सूत्र में पिरोने वाले मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य की माता ‘मुरा’ को ऐतिहासिक ग्रंथों में शूद्र/वंचित पृष्ठभूमि का माना गया है, और आज मौर्य, शाक्य व कुशवाहा समाज (ओबीसी) उन्हें अपने इतिहास के सबसे स्वर्णिम अध्याय के रूप में देखता है।

भारत के दक्षिण और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में भी वंचित व जनजातीय पृष्ठभूमि के शासकों ने लंबे समय तक अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखा। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के काकातीय काल में मदिगा (एससी) और वाल्मीकि (एससी) जातियों के सेनापतियों और नायकों ने कई छोटे दुर्गों और स्वायत्त क्षेत्रों पर शासन किया। पूर्वोत्तर भारत में असम और बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों पर राज करने वाले कोच राजवंश के महाराजा नरनारायण और उनके महान सेनापति चिलाराय मूल रूप से कोच/राजबंशी समुदाय से थे, जो आज विभिन्न राज्यों में एससी/एसटी या ओबीसी के अंतर्गत आते हैं। इन्होंने मुगलों और अफगानों के आक्रमणों को विफल किया।

वहीं, असम के लखीमपुर क्षेत्र में शासन करने वाला चुटिया राजवंश भी वंचित जनजातीय पृष्ठभूमि का था, जिसकी अंतिम महान शासक रानी सती साधनी (चुटिया समुदाय, ओबीसी) ने अपने राज्य की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए। सवाल यह है कि यदि ब्राह्मण इतने ताकतवर थे तो इन सीएसी,एसटी एवं ओबीसी को तो कभी सत्‍ता में होना ही नहीं चाहिए था, यहां सिर्फ क्षत्रियों एवं ब्राह्मणों का ही साम्राज्‍य होना चाहिए था! किंतु इतिहास हमें यह नहीं बताता। इससे एक बात साफ हो जाती है कि भारत में अति प्राचीन काल से वर्ण व्‍यवस्‍था तो प्रभावी रही, किंतु जाति व्‍यवस्‍था नहीं रही।

जैसे सती प्रथा के बारे में इतिहास का हवाला देकर बताया जाता है कि भारत में सती प्रथा थी, हिन्‍दू स्‍त्र‍ियां अपने पति के मरने पर उसके साथ दाह संस्‍कार में अपने को चिता में जलकर समाप्‍त करती थीं, किंतु यह अब झूठा नैरेटिव सिद्ध हो चुका है, क्‍योंकि यदि ऐसा होता तो भारत भर में कहीं न कहीं युद्ध चल रहे थे, पुरुष मारे जा रहे थे, तब यदि स्‍त्रियां चिता के साथ अपने को समाप्‍त कर रही होतीं तो आज फिर तो समस्‍त हिन्‍दू जाति का समूल नाश हो चुका होता!

वस्‍तुत: इसी प्रकार का ये झूठा नैरेटिव है कि ब्राह्णों के कारण से इतिहास में ये हुआ, वह हुआ। ताकि जिस तरह से दक्षिण भारत में स्‍वतंत्रता के कुछ वर्ष पूर्व एवं निरंतर बाद में आज तक ब्राह्मणों के विरोध में जो आन्‍दोलन उनकी योग्‍यता एवं क्षमताओं के विद्वेष से प्र‍ेरित होकर खड़ा किया गया, वैसा ही आन्‍दोलन उत्‍तर भारत में भी सामूहिक रूप से खड़ा किया जाए, हालांकि ऐसा करने का प्रयास भी समय- समय पर देखने को मिलता हैं, किंतु सुखद यह है कि वह दक्षिण की तरह यहां आज तक सफल नहीं हो पाया है। यहां कहीं दिलीप मंडल उसे पुन: खड़ा करने की तैयारी तो नहीं कर रहे, जैसा कि उनके आचरण से सिद्ध हो रहा है! अब इन संदर्भों को भी देखें-

इतिहास में पंडितों द्वारा हिंदू समाज की रक्षा के गौरवशाली उदाहरण

दिलीप मंडल का विमर्श पंडितों या ब्राह्मण समाज को समाज को तोड़ने वाले तत्व के रूप में चित्रित करने का प्रयास करता है, जबकि वास्तविक इतिहास इसके बिल्कुल विपरीत है। इतिहास गवाह है कि जब-जब सनातन संस्कृति पर संकट आया, पंडितों ने ढाल बनकर और अपने प्राणों की आहुति देकर संपूर्ण हिंदू समाज की रक्षा की है।

• कश्मीरी पंडित और गुरु तेग बहादुर का सर्वोच्च बलिदान (1675): जब मुग़ल सम्राट औरंगजेब के गवर्नर इफ़्तिख़ार खान ने कश्मीरी हिंदुओं पर इस्लाम अपनाने के लिए भयंकर अत्याचार ढाए, तब कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल पंडित कृपा राम दत्त के नेतृत्व में आनंदपुर साहिब में सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी के पास पहुंचा। पंडितों की पुकार पर गुरु तेग बहादुर जी ने दिल्ली के चांदनी चौक में अपना शीश दे दिया, लेकिन हिंदुओं का धर्म परिवर्तन नहीं होने दिया। यह पंडितों की ही रणनीतिक और आध्यात्मिक सूझबूझ थी जिसने हिंदू समाज की रक्षा के लिए एक महान रक्षा कवच तैयार किया।

• पंडितराज जगन्नाथ का आंतरिक सुधार: जैसा कि पूर्व अध्यायों में सिद्ध किया गया है, पंडितराज जगन्नाथ और मुग़ल दरबार के कश्मीरी विद्वानों ने कश्मीर में बची-खुची सभी जातियों (क्षत्रिय, वैश्य आदि) को ‘पंडित’ उपनाम देकर ऊंच-नीच के विभेद को समाप्त किया। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि पंडितों ने समाज को शुद्धतावाद के नाम पर अलग करने के बजाय, संकट के समय गले लगाया और एक अखंड समाज का निर्माण किया।

• विद्वता और सांस्कृतिक निरंतरता: जब आक्रांताओं ने नालंदा, तक्षशिला और कश्मीर के शारदा पीठ जैसे ज्ञान केंद्रों को जला दिया, तब इन्हीं ब्राह्मणों और पंडितों ने वेदों, उपनिषदों, आरण्‍यक ग्रंथों, उनकी शाखाओं, गण आदि और पुराणों को मौखिक रूप से (कंठस्थ करके) अपनी आने वाली पीढ़ियों को सौंपा। इसके लिए इतिहास में अनेक वर्णन मौजूद हैं, जोकि यह बताने के लिए पर्याप्‍त हैं कि इन पंडितों की कई पीढ़ि‍यां बलिदान तक हो गईं, शीश दिए पर धर्म न छोड़ा। यदि पंडितों ने अपनी जान पर खेलकर इन ग्रंथों को नहीं बचाया होता, तो आज सनातन संस्कृति का कोई लिखित या मौखिक अस्तित्व ही नहीं बचा होता। तब तो फिर दिलीप मंडल समेत हम और आप सभी विधर्मी हो चुके होते!

अतः इन सभी तथ्‍यों के प्रकाश में कहना यही है कि यह अध्‍ययन स्थापित करता है कि दिलीप मंडल जैसे विचारकों द्वारा सोशल मीडिया पर नेहरू की पुस्तक के हवाले से फैलाया जा रहा विमर्श ऐतिहासिक रूप से त्रुटिपूर्ण और एकतरफा है। यह विमर्श उस समाज पर दोषारोपण करता है जिसने सदियों से अपनी पहचान को बचाने के लिए सबसे अधिक बलिदान दिए हैं। कश्मीर का इतिहास गवाह है कि जब इस्लामी चरमपंथ ने हिंदू समाज को मिटाने का प्रयास किया, तब आंतरिक सामाजिक दीवारों (जातिवाद) को ढहाकर सबने एक समान उपनाम ‘पंडित’ को अंगीकार किया। समय-समय पर पंडितों ने न सिर्फ अपनी ज्ञान परंपरा से बल्कि गुरु तेग बहादुर जैसे महापुरुषों के साथ मिलकर संपूर्ण हिंदू समाज की रक्षा की है। इतिहास के इस पूर्ण और वास्तविक सत्य को आज दुनिया के सामने आना ही चाहिए।

इनके अलावा तथ्‍य यह भी है, भारत में ब्राह्मण-विरोधी वक्रपटुता (rhetoric) एक सुव्यवस्थित राजनीतिक-बौद्धिक परियोजना का हिस्सा बन चुका है, जो ‘हेट स्पीच’ के नारों के बीच भी ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ घृणा को सामान्य बनाती है। यह आज के समय में सिर्फ बाहरी ‘मिशनरी’ या ‘औपनिवेशिक’ साजिश नहीं, इस्‍लामिक जिहाद तक भी सीमित नहीं है, बल्कि कहना होगा कि स्वतंत्र भारत में स्थानीय राजनीतिक स्वार्थ, वामपंथी बौद्धिक परंपरा और पहचान-आधारित वोट-बैंक की राजनीति का संयुक्त परिणाम है।

राजनीतिक स्वीकारोक्ति और ‘नए यहूदी’ वाला तर्क

2018 में भी हमने देखा था कि तत्‍कालीन ट्विटर सीईओ जैक डॉर्सी के एक विवादास्पद पोस्टर (‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को कुचल डालो’) के बाद कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने ट्वीट किया था कि “ब्राह्मण-विरोध भारतीय राजनीति की सच्चाई है… हम (ब्राह्मण) भारत के यहूदी जैसे निशाना बना दिए गए हैं।” बाद में उन्होंने स्पष्टीकरण दिया कि उनका इरादा इसका समर्थन करना नहीं, बल्कि इस ‘हानिकारक प्रवृत्ति’ की ओर ध्यान दिलाना था, पर मूल संदेश वही रहा, ब्राह्मण-विरोध को एक ‘वास्तविकता’ मानकर स्वीकार कर लेना।यह मानसिकता स्वयं हिन्दू-विरोधी ताकतों का मनोबल बढ़ाती है, क्योंकि जब बड़े नेता ही ऐसे संदेशों को ‘सच्चाई’ कहें, तो घृणा फैलाने वालों को छूट मिल जाती है।

‘ब्राह्मणवाद’ शब्द: गढ़ित लांछन और उसका मकसद

‘ब्राह्मणवाद’ (Brahminism) शब्द मूलतः भारतीय नहीं, बल्कि औपनिवेशिक-मिशनरी और बाद में वामपंथी बौद्धिक परंपरा द्वारा गढ़ा गया एक नकारात्मक लेबल है, जिसका उद्देश्य वैदिक ज्ञान-परंपरा और हिन्दू समाज को बदनाम करना था। वेंडी डोनिगर जैसी विद्वानों की हिन्दू-विरोधी रचनाओं में भारतीय वामपंथी लेखकों और पत्रकारों के हवाले मिलते हैं, जो दिखाता है कि कैसे बाहरी आलोचना स्थानीय बौद्धिक सहयोग से पुष्ट होती है। पाठ्यपुस्तकों में दशकों से ‘वेदों का वर्चस्व’ और ‘ब्राह्मणवाद’ का नकारात्मक उल्लेख बना रहा, जबकि हिन्दू नेताओं ने इसे बदलने की कोशिश नहीं की। दुखद है कि 2014 में दिल्ली में पहला ‘वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस’ का आयोजित हुआ था और इस कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में अशोक सिंहल मौजूद थे। तब तीन दिवसीय सम्मेलन 21 से 23 नवंबर, 2014 को नई दिल्ली के होटल अशोक में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के तत्कालीन मुख्य संरक्षक अशोक सिंहल उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ताओं में से एक थे।

इसी मंच से उन्होंने अपना वह प्रसिद्ध और बहुचर्चित बयान दिया था कि “दिल्ली में 800 साल बाद एक स्वाभिमानी हिंदू सरकार आई है” और भारत को उसका अपना हिन्‍दू सम्राट मिला है। आयोजन में दुनिया के 50 से अधिक देशों से लगभग 1,500 से 1,800 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। जब श्रद्धेय अशोक सिंहल जी बोल रहे थे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा कर रहे थे, तब हिन्‍दू सम्राट सुनते ही कई लोगों की आंखें भर आई थीं, जिसके कि वीडियो आज भी मौजूद हैं। किंतु तब भी यह दुखद है कि एक ब्राह्मण समाज को उनके शासन में भी खुलकर लांछित किया जा रहा है। स्‍वयं उनकी सत्‍ता से लाभ लेनेवाले लोग खुलकर ब्राह्मणों का बिना पूर्ण अध्‍ययन किए, उपहास कर रहे हैं, उन्‍हें यथा संभव सर्वत्र अपमानित कर रहे हैं!

ऐतिहासिक वास्तविकता: ज्ञान, निर्धनता और सम्मान

ऐसे में यह तथ्‍य भी बार-बार सभी के ध्‍यान में लाना चाहिए कि ऐतिहासिक रूप से भारत में राज्य-सत्ता क्षत्रियों, जाटों, यादवों, मराठों और मध्य जातियों के पास रही; धन-व्यापार वैश्यों के हाथों में था, जबकि ब्राह्मणों का कार्य वैदिक ज्ञान का संरक्षण, शिक्षा और धर्म-संस्कृति की चिंता करना रहा है। तमाम ऐतिहासिक विवरणों में ब्राह्मणों को विद्वान परंतु निर्धन व्यक्तियों के रूप में दर्ज किया गया है और संपूर्ण भारत में उनका सम्मान सदैव बना रहा।

आज की स्थिति इसके विपरीत है, अंग्रेजी शिक्षा-प्रणाली ने ब्राह्मणों का पारंपरिक शैक्षणिक स्थान नष्ट कर दिया, और अब वे आर्थिक रूप से वंचित हैं। दिल्ली, बिहार, उत्‍तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मप्र, हिमाचल, उत्‍तराखण्‍ड, झारखण्‍ड समेत देश भर में सैंकड़ों की संख्‍या में ब्राह्मण डॉ. बिंदेश्वर पाठक के साथ सुलभ सौचालय प्रोजेक्‍ट से जुड़े। आज बड़ी संख्‍या में सुलभ शौचालयों की सफाई में ब्राह्मण समुदाय के लोग कार्यरत हैं, यह तथ्य स्वयं उस शौचालय श्रृंखला के संस्थापक के ब्राह्मण होने के बावजूद सामने आया है।

राजनीतिक लाभ और सामाजिक विभाजन

मंडल कमीशन के बाद उत्तर भारत में ब्राह्मण-विरोध और मजबूत हुआ, और राजनीतिक दलों ने वोट-बैंक की राजनीति के लिए एक समूह को साथ लाने हेतु दूसरे को लांछित करने का धंधा शुरू किया। परिणामस्वरूप, ब्राह्मणों को गाली देना ‘राजनीतिक फैशन’ बन गया, जबकि वास्तविकता यह है कि सभी राज्यों में निचली और मध्य जातियों के लोग सत्ताधारी हैं और ब्राह्मणों की प्रति व्यक्ति आय कई समुदायों से कम है।

तान लें : वैदिक ज्ञान-परंपरा पर हमला यानी हिन्दू अस्तित्व पर हमला

ब्राह्मण-विरोध का निहितार्थ सीधे हिन्दू धर्म-समाज के खात्मे की चाह से जुड़ा है, क्योंकि ब्राह्मणों का मूल कार्य वेदांत और शास्त्र-अध्ययन रहा है। चर्च (ईसाईयत) और इस्‍लामिक साम्राज्यवादी मतवाद दोनों इसमें लगे हैं, जिसमें कि वामपंथी और नास्‍तिक भी कुछ हद तक इसमें खाद देने का काम करते हैं। क्योंकि यदि वेद, उपनिषदों का वैज्ञानिक व सशक्त ज्ञान विश्व में फैला, तो उनके एकाधिकारवादी दावों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। स्वामी विवेकानंद (जो स्वयं ब्राह्मण नहीं थे) के प्रसिद्ध व्याख्यान ‘वेदान्त का उद्देश्य’ में ब्राह्मणों के गौरव, इतिहास और भूमिका का उल्लेख है, जिसे पढ़कर हिन्दू-विरोधी बुद्धिजीवियों के दावों की परख की जा सकती है।

विडंबना: ‘पितृसत्ता’ और ‘वर्चस्व’ का दोहरा मापदंड

जिस हिन्दू समाज में विविध देवी-देवता, अवतार, गुरु-ज्ञानी और रीति-रिवाजों का सम्मान है, उसे ‘वर्चस्ववादी’ और ‘पितृसत्तात्मक’ बताया जाता है, जबकि चर्च और इस्‍लामिक मतवादों में खुलेआम एकाधिकार का दावा है, जहां दूसरे मतवालों को जीने तक की मंजूरी नहीं, और सभी पोप, बिशप, ईमाम, मुल्ले केवल पुरुष हैं। यह सब मुख्यतः हिन्दू नामों वाले मूढ़ या स्वार्थी भारतीयों के माध्यम से होता है; बाहरी शत्रु इसे बढ़ावा देते हैं, पर यह संभव इसीलिए होता है क्योंकि हम स्वयं गफलत में हैं।

अब हिन्दू नेताओं को चाहिए कि वे पाठ्यपुस्तकों से ‘ब्राह्मणवाद’ जैसे गढ़ित शब्दों को हटाएं, ब्राह्मणों की वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका और वर्तमान वंचित स्थिति को रेखांकित करें, और विवेकानंद जैसे महान ज्ञानियों के विचारों को जन-जन तक पहुंचाएं। क्‍योंकि ब्राह्मण-विरोध एक समुदाय के खिलाफ घृणा न होकर संपूर्ण हिन्दू ज्ञान-परंपरा और सभ्यता के अस्तित्व पर सुनियोजित हमला है, जिसे स्थानीय राजनीति और बौद्धिक सहयोग से बल मिलता है। इसका मुकाबला तथ्यों, इतिहास और शिक्षा से ही संभव है।
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संदर्भ सामग्री :

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3. Kaul, Anand. (1924). The Kashmiri Pandit. Publication: Thacker, Spink & Co., Calcutta. pp. 35-58.

4. Kilm, Jia Lal. (1955). A History of Kashmiri Pandits. Publication: Gandhi Memorial College, Srinagar. pp. 72-95.

5. Tikoo, Prithvi Nath. (1979). Kashmiri Pandits: A Socio-Cultural Study. Publication: Utpal Publications, New Delhi. pp. 41-63.

6. Farishta, Muhammad Qasim. (1612). Tarikh-i-Farishta. (English Translation by John Briggs). Publication: Oriental Books Reprint Corporation, New Delhi. Vol. 4, pp. 465-480.

7. Dilip Mandal. (2026). Statements on X (formerly Twitter) regarding Kashmir, Banaras Pandits, and ‘Ghar Wapsi’. https://x.com/Profdilipmandal/status/2095795130037141536. As reported in Navbharat Times, September 2026.

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