भारत का वित्तीय चमत्कार

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नरेंद्र मोदीजी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, चुनाव परिणाम के ठीक 10 दिन बाद। अर्थात, सोमवार 26 मई 2014 को। शपथ ग्रहण से मात्र तीन महीनों में, अर्थात गुरुवार 28 अगस्त को, मोदी जी ने ‘प्रधानमंत्री जन-धन’ योजना प्रारंभ की। बाद में घोषित अनेक योजनाओं के लिए यह ‘गेम चेंजर’ साबित हुई। इस योजना ने बहुत बड़ी मात्रा में निचले स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार पर रोक लगाई। अनेक अर्थों में यह क्रांतिकारी पहल थी। इस विशाल भारत के बैंकिंग व्यवस्था में, देश का एक बहुत बड़ा वर्ग शामिल ही नहीं था। भारत के रिजर्व बैंक की जानकारी में यह खामी थी। इसलिए आरबीआई, सभी बैंकों को वित्तीय समावेशन (फाइनेंशियल इंक्लूजन) के लिए प्रेरित करती थी। आग्रह करती थी। किंतु गाड़ी बहुत आगे नहीं बढ़ रही थी, और यह बड़ा तबका, बैंकिंग व्यवस्था में न होने के कारण, उस तक सरकार की अनेक योजनाएं पहुंचती ही नहीं थी।

जब लाल किले की प्राचीर से, अपने पहले ही भाषण में मोदी जी ने ‘प्रधानमंत्री जन-धन’ योजना की घोषणा की, तो देश में ऐसे बिरले ही लोग थे, जिन्हें इसका महत्व समझ आ रहा था। मीडिया ने भी शुरुआत में इस योजना की खिल्ली उड़ाई। बैंकिंग समुदाय से भी इस योजना का विरोध हो रहा था।

किंतु 28 अगस्त 2014 को यह योजना प्रारंभ हुई और चमत्कार हो गया ! इस दिन भारत के सभी बैंकों ने एक साथ लगभग 60,000 शिविर लगाए, और पहले ही दिन डेढ़ करोड़ खाते खुल गए। *अनेक वर्षों से भारत का बैंकिंग सेक्टर जो नहीं कर पाया था, वह एक दिन में हो गया। प्रधानमंत्री ने इस अभूतपूर्व अवसर को, भारत के लिए ‘वित्तीय स्वतंत्रता दिवस’ बताया।* 2 अक्टूबर 2014 तक इन खातों की संख्या 5.29 करोड़ हो गई, जिनमें 3.1 2 करोड़ ग्रामीण क्षेत्र के खाते थे।

इस योजना के अंतर्गत 30 जुलाई 2025 तक 56.04 करोड़ खाते खुले और इनमें से 36.98 करोड़ खाता धारकों को रुपे का डेबिट कार्ड दिया गया हैं।

*भारत में वित्तीय बदलाव की, वित्तीय क्रांति की शुरुआत इस योजना के साथ हुई। समूचे विश्व में इस प्रकार का, और इस स्तर का, वित्तीय बदलाव केवल और केवल भारत में हुआ हैं।* मात्र इस एक योजना से ही बहुत कुछ बदल गया। वर्ष 2014 में भारत में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या थी 36.30 करोड़। यह गरीब तबका था। यह गांव में रहता था। बड़े शहरों की झुग्गी झोपड़ियों में रहता था। उनके लिए योजनाएं तो बहुत थी, पर इन तक पहुंचती ही नहीं थी। भ्रष्टाचार सारे तंत्र को निगल रहा था।

इस तबके को गरीबी रेखा से ऊपर लाना यह एक बहुत बड़ी चुनौती थी। भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था बने और इन गरीबों को सीधा लाभ मिले यह आवश्यक था।

‘जन-धन योजना’ ने इन दोनों बातों की पूर्तता की। साथ ही, इस योजना में आने वाले लोगों के लिए बीमा कवर, दुर्घटना बीमा मुफ्त उपचार, ऐसी अनेक बातें जोड़ी।

इन सब का परिणाम हुआ…

वर्ल्ड बैंक के अनुसार वर्ष 2024 में भारत में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या 12.90 करोड़ रह गई हैं। अर्थात वित्तीय बदलाव का प्रत्यक्ष प्रमाण यह हैं, कि पिछले 10 वर्षों में भारत में 23.40 करोड़ लोग, गरीबी रेखा से ऊपर आए हैं। यह सभी अर्थों में ऐतिहासिक हैं। 2014 के पहले के 67 वर्षों में भारत जो नहीं कर सका था, उसने वह 10 वर्षों में करके दिखाया हैं।

मजेदार बात यह हैं, कि ये सारे खाते ‘जीरो बैलेंस खाते’ थे। अर्थात्, एक रुपया भी जमा न करते हुए, आप खाता खोल सकते हैं। शुरुआत में लोगों ने कहा कि इससे तो बैंकिंग सिस्टम का बोझ बढ़ेगा। बैंकों को कुछ मिलने से तो रहा, बस इतने सारे खातों का व्यवस्थापन करने में ही बड़ी मात्रा में संसाधन लगेंगे।

लेकिन वे सारे लोग गलत साबित हुए।

*वर्ष 2025 तक, इन जन-धन खातों में जमा राशि हैं, 2.62 लाख करोड़ रुपये..!*

यह सारा पैसा अभी तक बैंकिंग व्यवस्था से बाहर था। इसलिए इसका उपयोग देश के विकास के लिए नहीं हो रहा था। किंतु अब यह पैसा देश के अर्थतंत्र में शामिल हुआ। इसमें घूमने लगा। इन पैसों का उपयोग, देश के विभिन्न परियोजनाओं में होने लगा।
– प्रशांत पोळ
_(सोमवार, १६ फरवरी को प्रकाशित होने जा रही *’इंडिया से भारत : एक प्रवास’* पुस्तक के अंश।)_

युववाणी के लिए आवेदन आमंत्रित

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नई दिल्ली। आकाशवाणी दिल्ली द्वारा युवाओं को प्रसारण क्षेत्र से जोड़ने के उद्देश्य से प्रतिष्ठित कार्यक्रम “युववाणी” के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। इच्छुक युवा 1 फरवरी से 28 फरवरी तक आवेदन फॉर्म भर सकते हैं। फॉर्म प्राप्त करने का स्थान प्रसारण भवन का कमरा संख्या 37 निर्धारित किया गया है।

कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को आकाशवाणी के मंच पर अपनी प्रस्तुति देने और रचनात्मक अभिव्यक्ति का अवसर उपलब्ध कराना है।

अहर्ता:

अभ्यर्थी 12वीं उत्तीर्ण हो।
उम्र – 18 वर्ष से कम और 30 वर्ष से अधिक न हो।

हिंदी एवं अंग्रेज़ी भाषा का अच्छा ज्ञान हो।

प्रसारण कार्य में रुचि रखता हो।

चयन प्रक्रिया:
उम्मीदवारों का चयन ऑडिशन के माध्यम से किया जाएगा। यह स्पष्ट किया जाता है कि यह कोई स्थायी रोजगार का माध्यम नहीं है। आवश्यकता के अनुसार प्रतिभागियों को असाइनमेंट दिए जाएंगे।

कार्यक्रम प्रमुख मनीषा जैन ने योग्य युवाओं से आह्वान किया है कि वे इस अवसर का लाभ उठाते हुए आकाशवाणी से जुड़ें। मनीषा जैन ने इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि पूर्व में इस कार्यक्रम से जुड़े युवाओं ने प्रसारण और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना लोहा मनवाया है और पत्रकारिता के क्षेत्र में नाम कमाया है।

सहायक निदेशक कार्यक्रम प्रमोद कुमार ने आशा व्यक्त की कि आकाशवाणी के दूसरे कार्यक्रमों की तरह यह कार्यक्रम भी दिल्ली-एनसीआर के युवाओं के लिए उनकी रचनात्मकता अभिव्यक्त करने का सशक्त मंच सिद्ध होगी।

प्रमोद कुमार ने बताया कि सहायक निदेशक कार्यक्रम स्पर्शिता श्रीवास्तव और कार्यक्रम अधिकारी संतोष द्विवेदी मनुज की टीम मिलकर इस कार्यक्रम के संचालन एवं समन्वय का दायित्व निभाएगी।

इच्छुक एवं योग्य युवा निर्धारित तिथियों के भीतर आवेदन कर इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं।

अराजक और असभ्य राहुल को संभालने में सबस्टेंटिव मोशन ला कर भाजपा ने अब सही स्टैंड लिया है

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दयानंद पांडेय

लखनऊ : अराजक और असभ्य राहुल गांधी को सबक़ सिखाने के लिए भाजपा ने अब सही स्टैंड लिया है l भाजपा ने लगातार ढील दे कर राहुल गांधी को भस्मासुर बना दिया है l लेकिन आज लोकसभा में सबस्टेंटिव मोशन पेश कर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने बड़ा काम किया है l संसदीय राजनीति का जो पतन और पराभव राहुल गांधी के मार्फ़त देश ने देखा है , अति हो गई है l बर्दाश्त से बाहर हो गया है l इस अराजक और असभ्य राहुल गांधी की लोक सभा से सदस्यता छीन लेना बहुत ज़रूरी हो गया है l भविष्य में भी चुनाव न लड़े , यह भी l क्यों कि हर सत्र में संसद को गली के गुंडे की तरह हाईजैक करने वाले राहुल गांधी को संसदीय राजनीति से विदा करना भारतीय लोकतंत्र के हित में है l

यह काम बहुत पहले होना चाहिए था l

दिलचस्प यह कि रोज़ बंदर की तरह इस डाल से उस डाल कूदने वाले राहुल गांधी ने आज फिर गोल बदल लिया l नरवड़े की किताब के बाद , ट्रंप की टैरिफ़ के आगे मोदी का सरेंडर , देश बेच दिया और अब आज शाम घर पहुंचते ही किसान आंदोलन की डाल पर कूद गया यह बंदर l हताशा इतनी बढ़ गई कि मीडिया के सवाल पर आज मीडिया को भाजपाई बता दिया l बौखलाहट की पराकाष्ठा आज देखने लायक़ थी l घर पहुंचते ही , किसान आंदोलन के बाबत वीडियो बना कर रिलीज कर दिया l कहा कि किसानों के लिए लड़ता रहूंगा l

तो अब क्या होगा नरवड़े की किताब का ? क्या होगा मोदी द्वारा ट्रंप के हाथ देश बेच देने की लड़ाई का ?कौन लड़ेगा यह मोर्चे ? क्या पता कल परसों कोई और लड़ाई सामने आ जाए l किसान भी भूल जाए !

कुछ भी हो सकता है l मंकी एफ़र्ट का आनंद ही कुछ और है l जबरिया गले लगना , आंख मारना आदि पुरानी बात हो गई l किसी नई परिघटना का आनंद लेने के लिए प्रतीक्षा कीजिए l

मदारी का बंदर क्या मजा देगा , जो कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत संसद का यह बंदर देता रहता है l जाने क्या खा कर सोनिया गांधी ने इसे पैदा किया है l

सोचिए कि यह राहुल गांधी कल संसद में बजट के विरोध में भाषण देने के लिए खड़ा हुआ l दुनिया भर की बात की l पर बजट पर एक बात नहीं की l यह एक वाक्य भी नहीं बोल पाया कि मैं इस बजट का विरोध करता हूं l मार्शल आर्ट , ट्रंप आदि जाने क्या-क्या l पर बजट की बिजली नहीं जली l

संसद से बाहर निकला तो मीडिया से बात कर रहे रेल मंत्री अश्वनी वैष्णव और राज्य मंत्री जोशी के साथ लपक कर खड़ा हो गया l यह दोनों लोग बिदक कर जाने लगे तो हाथ पकड़ कर खींचने लगा l कहने लगा मिल कर बात करते हैं l वह लोग इसे हिक़ारत से देखते हुए चले गए l रुके नहीं l राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष बना कर कांग्रेस ने बंदर के हाथ में उस्तरा थमा दिया l संसद इस के लिए वह अदरक है , जिस का स्वाद नहीं जानता यह l पीठासीन अधिकारी क्रमश: जगदंबिका पाल और संध्या राय ने जिस तरह इस राहुल गांधी की हेकड़ी तार-तार की है , इसे डाँट-डपट कर नर्सरी क्लास के बच्चे की तरह ट्रीट किया है , वह खेल नहीं था l सोचिए कि संध्या राय दूसरी बार की सांसद हैं l और उम्र में भी कम हैं l और यह नेता प्रतिपक्ष हो कर भी उन से दब रहा है तो सिर्फ़ इस लिए कि संध्या राय संसदीय परंपरा और गरिमा इस से ज़्यादा जानती हैं l बेहतर जानती हैं l और यह शून्य है l दरिद्र है l

एक अंतिम बात यह कि सबस्टेंटिव मोशन मातलब भस्मासुर का हाथ, भस्मासुर के सिर रखवाने की रणनीति है यह l एक तीर से अनेक निशाने l समझ लीजिए कि राहुल गांधी की अराजकता और असभ्यता का पानी देश ही नहीं , भाजपा और मोदी की नाक से भी ऊपर चला गया है l यह सबस्टेंटिव मोशन कोई रूटीन मोशन नहीं है l मरो या मार दो का मोड़ है यह l

इस सबस्टेंटिव मोशन के लोकसभा में पारित होने पर राहुल गांधी जेल नहीं जाएगा l बस लोकसभा की सदस्यता जाएगी और फिर कभी चुनाव नहीं लड़ सकेगा l पूरी तरह बधिया !

जनता की सहानुभूति भी पाने लायक़ नहीं रह पाएगा l

वैक्सीन मैत्री

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प्रशांत पोळ

अहमदाबाद : कोरोना ने, पूरे विश्व में वैक्सीन का महत्व फिर से अधोरेखित (underline) किया। कोरोना की महामारी को रोकना, वैक्सीन के बगैर संभव ही नहीं था। भारत ने प्रारंभ से ही इस कोरोना महामारी की वैक्सीन विकसित करने का निश्चय प्रकट किया था। लॉकडाउन के दूसरे चरण में ही, प्रधानमंत्री मोदी जी ने, 14 अप्रैल 2020 को भारत के युवा वैज्ञानिकों से वैक्सीन विकसित करने का आवाहन किया था। देश में इसके प्रयास प्रारंभ हो गए थे। कई विकसित देशों ने भारत की इस पहल को गंभीरता से नहीं लिया। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इस घोषणा की खिल्ली भी उडाई।

वैसे भारत की, इसके पहले की स्थिति खिल्ली उड़ाने जैसी ही थी। हम मान कर चल रहे थे की वैक्सीन बनाने की हमारी क्षमता ही नहीं हैं।

पोलियो वैक्सीन का ही उदाहरण लेते हैं।

विश्व में पहला सफल पोलियो वैक्सीन बना, 1955 में, Jonas Salk द्वारा। पहली मुंह से दी जाने वाली वैक्सीन, Albert Sabin ने बनाई, 1961 में। उन दिनों भारत ने यह मान लिया था, कि किसी रोग या महामारी पर वैक्सीन खोज कर बनाना तो बहुत दूर की बात, पर दूसरे किसी ने खोजा हुआ वैक्सीन बनाने की भी हमारी क्षमता नहीं हैं। इसलिए हम यह सारे वैक्सीन, अमेरिका या यूरोप से आयात करते थे। विश्व में पोलियो के वैक्सीन की खोज के लगभग 35 वर्षों के बाद, भारत ने इस फार्मूले पर वैक्सीन बनाना प्रारंभ किया था।

आप गूगल में ढूंढेंगे, तो आपको पता चलेगा की वैक्सीन की खोज एडवर्ड जेनर ने वर्ष 1796 में की। किंतु एडवर्ड जेनर को वैक्सीन की कल्पना और प्रेरणा कहां से मिली यह बात सामने नहीं आती। डेविड अर्नाल्ड ने 1993 में एक सुंदर और महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी हैं – Colonizing the Body : State, Medicine and Epidemic Disease in Nineteenth Century India. *इस पुस्तक में डेविड अर्नाल्ड ने यह सप्रमाण सिद्ध किया है कि वैक्सीनेशन की पद्धति भारत में सैकड़ो वर्षों से चली आ रही थी। भारतीय समाज के रचयिता पुरखों ने, इस पद्धति को बड़े ही चतुराई से भारत की धार्मिक परंपराओं से जोड़ दिया। ‘शीतला माता व्रत’ यह मूलतः वैक्सीनेशन की पद्धती थी, जो बच्चों में माता (अर्थात चिकन पॉक्स) को रोकती थी। इसी पद्धति को ओलिवर कोल्ट ने पत्रों के माध्यम से, तो डॉक्टर जॉन हॉलवेल ने भाषणों के माध्यम से, इंग्लैंड में पहुंचाया। इसी से प्रेरणा लेकर, एडवर्ड जेनर ने वैक्सीन बनाया।*

अर्थात, किसी जमाने में विश्व में महामारी की रोकथाम के लिए सबसे पहले वैक्सीन बनाने वाले हम, स्वतंत्रता के बाद सब कुछ भूल गए थे। हम हमारी शक्ति को पहचानने से इन्कार करते थे। इस हीन भावना से भारत को बाहर निकाला, कोरोना काल में मोदी सरकार ने।

दिनांक 24 नवंबर 2020 को प्रधानमंत्री मोदी जी ने, देश के आठ सबसे अधिक कोरोना प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की। इस बैठक में उन्होंने कोरोना वैक्सीन पर देशव्यापी योजना की बात की। उन्होंने राज्यों से वैक्सीन वितरण पर लॉजिस्टिक के साथ प्लान देने की भी बात की।

इस बीच हमारे वैज्ञानिक चुपचाप काम कर रहे थे। इस वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल्स भी प्रारंभ हुए।

अंततः शनिवार, 16 जनवरी 2021 को प्रधानमंत्री मोदी जी ने भारत की स्वदेशी वैक्सीन ‘कोवैक्सीन’ का लोकार्पण किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा, “हमारे सैकड़ो साथी ऐसे भी हैं, जो कभी घर वापस नहीं लौटे। उन्होंने एक-एक जीवन बचाने के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी। इसलिए आज कोरोना का पहला टीका, स्वास्थ्य सेवा से जुड़े लोगों को लगाकर, एक तरह से समाज अपना ऋण चुका रहा हैं।”

यह कोवैक्सीन, हैदराबाद की भारत बायोटेक कंपनी ने ‘भारतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान’ (ICMR) के सहयोग से विकसित किया था। वही पुणे की सिरम इंस्टीट्यूट, एस्ट्रोजेनिका कंपनी की ‘कोविडशील्ड’ वैक्सीन बना रही थी। इन वैक्सीन के भारत में बनने के कारण, भारत में वैक्सीन के टीकाकरण का कार्यक्रम तीव्र गति से चलाया गया। विश्व के पहले कुछ देशों में भारत का यह टीकाकरण अभियान शामिल था।

*भारत, कोरोना के वैक्सीन का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक देश रहा। विश्व के कुल वैक्सीन का 60% उत्पादन भारत में हुआ।*

भारत ने कोविड के इस कठिन समय में, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की संकल्पना ‘वैक्सीन मैत्री’ अभियान के द्वारा प्रत्यक्ष में उतारी। न केवल अपने नागरिकों के लिए वैक्सीन का निर्माण किया, बल्कि विश्व के 100 से ज्यादा देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराई। इसका स्वरूप व्यावसायिक आपूर्ति (Commercial Supply) के रूप में तो था ही, पर छोटे देशों को भारत ने दान (Grant) के रूप में भी वैक्सीन के टीके उपलब्ध कराए।

विश्व में इसका जबरदस्त सकारात्मक परिणाम हुआ। जब अधिकांश विकसित देश अपने लिए वैक्सीन जमा कर रहे थे (vaccine hoarding), तब भारत गरीब और विकासशील देशों की सहायता कर रहा था। भूटान यह भारत से वैक्सीन प्राप्त करने वाला पहला देश था। 20 जनवरी 2021 को भारत ने भूटान को वैक्सीन की पहली खेप भेजी। भूटान के प्रधानमंत्री डॉ. लोटे शेरिंग ने कहा कि, “भारत ने न केवल अपने मित्र भूटान का साथ दिया, वरन् मानवता की मिसाल पेश की। भारत ने भूटान को जीवनदान दिया।”

इसी प्रकार की भावनाएं नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव्स, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों ने व्यक्त की। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद्र जगन्नाथ ने वैक्सीन की पहली खेप मिलने पर कहा, “भारत ने केवल दवा नहीं भेजी, बल्कि उम्मीद भेजी हैं…” ब्राजील के राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो ने प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देते हुए जो ट्वीट किया, वह जबरदस्त वायरल हुआ। उन्होंने ट्वीट के साथ, ‘हनुमान जी संजीवनी बूटी ला रहे हैं’ यह चित्र जोड़ा और लिखा, “धन्यवाद भारत, हम इसे वैक्सीन संजीवनी कहते हैं।”

डोमिनिका के प्रधानमंत्री रूजवेल्ट स्केरिट भावूक होकर बोले, “भारत ने भगवान का काम किया हैं। हमारी छोटी सी आबादी की परवाह कि, जब हमें इसकी सबसे अधिक जरूरत थी।” संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने कहा, “भारत की वैक्सीन उत्पादन क्षमता, विश्व की सबसे बड़ी संपत्ति हैं।” कई अमेरिकी समाचार पत्रों ने भारत को ‘Moral Leadership in the Global South’ कहा।

इसका प्रभाव लंबे समय तक रहा। 21 मई 2023 को प्रधानमंत्री मोदी, ‘भारत प्रशांत द्वीप समूह सहयोग’ (FIPIC) के शिखर सम्मेलन के लिए पापुआ न्यू गिनी पहुंचे। हवाई तल पर उनकी अगवानी करने वहां के प्रधानमंत्री जेम्स मारापे उपस्थित थे। जैसे ही मोदी जी विमान से उतरे, जेम्स मारापे ने मोदी के पांव छुए। मोदी जी ने उन्हें गले लगा लिया।

*यह अभूतपूर्व घटना थी। विश्व के किसी भी राष्ट्र प्रमुख ने, दूसरे राष्ट्र प्रमुख का पांव छूकर सार्वजनिक रूप से अभिवादन, इससे पहले कभी नहीं किया था। यह सम्मान इसलिए था, कारण भारत ने अत्यंत मैत्रीपूर्ण भाव से, कोरोना के कठिन कालखंड में पापुआ न्यू गिनी की मदद की थी।*

भारत के इस वैक्सीन मैत्री अभियान ने, भारत को विश्व की औषधि शाला (फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड) के रूप में प्रतिष्ठित किया।

*संक्षेप में, भारत को अपनी विस्मृत क्षमता का, विस्मृत शक्ति का पुर्नस्मरण हुआ। अपने अंदर के ऊर्जा की अनुभूति हुई। और फिर भारत ने, मात्र आठ – दस वर्षों में ही ऐसा कर दिखाया, जो हम स्वतंत्रता के बाद, साठ – पैंसठ वर्ष भी नहीं कर सके थे..!*

_(सोमवार, 16 फरवरी को प्रकाशित *‘इंडिया से भारत : एक प्रवास’* इस पुस्तक के अंश। चित्र सौजन्य – टाईम्स ऑफ इंडिया)

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