कलमा नहीं पढ़ पाने पर हिंदुओं पर हमले धर्मांतरण के कुचक्र का नया जाल तो नहीं?

images-1.jpeg

दिल्ली । गत 27 अप्रैल, 2026 को देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के मीरा रोड इलाके में 31 साल के जुबैर अंसारी नाम के व्यक्ति ने दो सिक्योरिटी गार्डों राजकुमार मिश्रा और सुब्रतो सेन पर चाकू से हमले की घटना क्या षड्यंत्र के किसी नए ट्रेंड की ओर स्पष्ट संकेत कर रही है? आरोपित ने पहले गार्डों का धर्म पूछा। धर्म हिंदू बताने के बावजूद उनसे ‘कलमा’ पढ़ने को कहा गया। स्वाभाविक था कि दोनों कलमा नहीं पढ़ पाए, तो उसने उन पर तुरंत ही चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। उल्लेखनीय है कि हमला मीरा रोड के मुस्लिम बहुल नया नगर की रिहायशी इमारत के सुरक्षा गार्डों पर किया गया। मामले की जांच महाराष्ट्र एटीएस कर रही है और इसे आईएसआईएस के ऑनलाइन प्रोपेगेंडा से जोड़ कर ‘लोन वुल्फ’ हमला कहा जा रहा है।

जुबैर मूल रूप से मुंबई के कुर्ला इलाके का रहने वाला है। मीडिया रिपोर्टो में अभी तक मिली जानकारी के अनुसार वह साइंस ग्रेजुएट है और ऑनलाइन कोचिंग के माध्यम से गणित और रसायन विज्ञान विषयों की पढ़ाई कराता था। उसके माता-पिता, बहन और पत्नी अमेरिकी नागरिक हैं। वर्क परमिट समाप्त होने के बाद जुबैर 2019 में अमेरिका से भारत लौटा और मीरा रोड क्षेत्र में अकेले रह रहा था। जांच अधिकारियों को उसके मकान से आईएसआईएस विचारधारा और ‘लोन वुल्फ’ अटैक से जुड़े दस्तावेज मिले हैं।

क्या है लोन वुल्फ अटैक?
लोन वुल्फ हमले का चलन पश्चिमी देशों में भी देखने को मिल चुका है। इसमें आतंकी सोच वाला कोई कट्टरपंथी जिहादी अकेले ही लोगों पर हमला करता है। देखने में आया है कि इस तरह के हमले हथियारों के अलावा निर्दोष राहगीरों पर गाड़ी चढ़ा कर भी किए जाते रहे हैं। इस तरह के हमलों को लोन वुल्फ अटैक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि भेड़िए आमतौर पर झुंड में ही शिकार पर हमले करते हैं। लेकिन कभी-कभी यह भी देखने में आया है कि किसी कारण से झुंड से अलग हुआ कोई भेड़िया भूख लगने पर अकेले भी शिकार पर झपट पड़ता है।

पहलगाम के एक साल बाद हमला
क्या यह मात्र संयोग ही है कि कश्मीर के पहलगाम में ठीक एक साल पूरा होने के पांच दिन बाद मुंबई में इस तरह का हमला किया गया है? हम जानते हैं कि 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में आतंकियों ने कम से कम 26 हिंदुओं की हत्या की थी। उस जघन्य आतंकी बर्बरता के पीड़ितों ने बताया था कि हमले से पहले उनके संबंधियों से धर्म पूछा गया और हिंदू सुन सुन कर गोली मार दी गई। मीडिया रिपोर्टों में यह जानकारी भी सामने आई कि धर्म सुनिश्चित करने के लिए हिंदू पर्यटकों के पैंट तक उतरवाए गए।

कलमा सुना कर बचाई जान
पता यह भी चला कि आतंकियों ने हिंदुओं की पहचान करने के बाद कुछ सैलानियों से कलमा सुनाने को कहा। कुछ लोगों ने कलमा पढ़ कर अपनी जान बचाई भी। असम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर देबाशीष भट्टाचार्य ऐसे ही सैलानी थे। उन्होंने कलना सुनाया और आतंकियों ने उन्हें नहीं मारा, जबकि वे हिंदू थे। बड़ा प्रश्न यह है कि पहलगाम के हमलावर आतंकियों का उद्देश्य यह संदेश देना भी था कि जो हिंदू कलमा पढ़ सकते हैं, उन्हें आतंकी बर्बरता का शिकार नहीं बनाया जाएगा? दूसरे शब्दों में कहें, तो क्या संदेश यह भी था कि जो हिंदू कलमा याद कर लेंगे, वे इस तरह की आतंकी वारदात की चपेट में आने से बच सकते हैं?

कलमा रटवाने का षड्यंत्र?
पहलगाम नरसंहार के समय तो यह प्रश्न इस तरह के दृष्टिकोण से उभर कर सामने नहीं आया था। लेकिन अब मुंबई में हिंदुओं के कलमा नहीं सुना पाने पर हमले के बाद यह प्रश्न मुखर हो जाता है। हिंदुओं से कलमा सुनाए जाने की अपेक्षा किसी आतंकी सोच वाले व्यक्ति या किसी भी व्यक्ति को करनी ही क्यों चाहिए? यदि उसकी सोच हिंदुओं पर सिर्फ जानलेवा हमला करने भर की थी, तो हिंदू बताए जाने के बाद उसने गार्डों से कलमा सुनाने को कहा ही क्यों? अब एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि यदि दोनों गार्ड कलमा सुना देते, तो क्या उन पर हमला नहीं किया गया होता?

लोन वुल्फ अटैक की पड़ताल
अब कुछ और पहलुओं की पड़ताल कर लेते हैं। प्रथम दृष्टया मुंबई का हमला अचानक सनक में आ कर नहीं किया गया, यह कहा जा सकता है। आरोपित जुबैर के घर से आतंक से जुड़े दस्तावेज मिले हैं। उसने अप्रैल के महीने में ही हमले के षड्यंत्र को जमीन पर उतारा। वह महीना, जब एक साल पहले विश्व के जघन्यतम आतंकी हमलों में से एक को कश्मीर के पहलगाम में अंजाम दिया गया! अब अगर पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी पर मुंबई में उस तर्ज पर ही हमला किया गया है, तो प्रश्न यह भी है कि भले ही आरोपित अभी एक ही है, लेकिन क्या अंतत: यह लोन वुल्फ अटैक है भी या नहीं?

मुंबई एटीएस मामले की जांच कर रही है। आश्चर्य नहीं होगा कि यह पता लगे कि इस हमले का षड्यंत्र आरोपित जुबैर ने अकेले नहीं रचा था, बल्कि पूरी संस्थागत आतंकी सोच के साथ इसे रचा गया। हमले का उद्देश्य भी एक ही दिखाई देता है कि हिंदुओं को दिमागी तौर पर कलमा याद करने के लिए विवश किया जाए। उन्हें यह संदेश दिया जाए कि यदि ऐसे किसी हमले में इतने भर से ही जान बचाई जा सकती है, तो कलमा याद करने में बुराई क्या है? क्या एक तरह से यह षड्यंत्र धर्म परिवर्तन की जिहाद के ही प्रमुख साधन के रूप में नहीं रचा जा रहा है?

कलमा क्या है?
अब बात कर लेते हैं इस्लाम में कलमा के महत्व की। इस्लाम में छह तरह के कलमों से आस्था की नींव रखी गई है। पहला कलमा है तैयब। सभी छह कलमों में प्रकारांतर से यही कहा गया है कि अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की इबादत नहीं की जा सकती और हजरत मोहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। इस्लाम स्वीकारने वालों के लिए कलमा तैयब पढ़ना पहली आवश्यक शर्त है। वैश्विक मंच पर बहुसंख्य मानव समाज आज विकास के जिस प्रस्थान बिंदु पर खड़ा है, उस वातावरण में सिर्फ कुछ शब्द बोल देने भर से किसी व्यक्ति की आस्था में आमूल-चूल परिवर्तन हो सकता है, यह विचार ही हास्यास्पद लग सकता है। किंतु मध्यकालीन भारत में सनातन समाज के लोगों के धर्म परिवर्तन के लिए तलवार की ताकत के अलावा तरह-तरह के दकियानूसी तरीके भी अपनाए जाते थे, यह सच है।

धर्म परिवर्तन के पुराने षड्यंत्र
भारत में मुगल काल के प्रामाणिक ग्रंथों में हिंदुओं के बलपूर्वक धर्म परिवर्तन की बहुत सी घटनाओं का उल्लेख मिलता है। आक्रांताओं के अधिकृत लेखकों ने ऐसी बहुत सी पुस्तकें लिखी हैं। इतिहास बताता है कि जिन हिंदुओं ने इस्लाम अपनाने से इनकार कर दिया, उन्हें पूरी निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन सामाजिक मान्यताओं के जाल में फंसा कर बहुत से हिंदुओं को धर्मांतरित घोषित कर दिया गया, यह भी सच है। छलपूर्वक धर्म भ्रष्ट घोषित कर दिए गए हिंदुओं को अपने ही समाज से बहिष्कृत कर दिया गया और आखिरकार उन्हें इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने को विवश होना पड़ा। बहुत से ऐतिहासिक सुबूतों और लोक कथाओं में ऐसे उल्लेख मिलते हैं।

ऊंच-नीच की जातीय व्यवस्था और कथित अतार्किक धार्मिक कु-मान्यताओं के अनुसार नीची जाति या दूसरे धर्म का कोई व्यक्ति यदि कुएं में पैर डाल दे या किसी और तरह से जल का स्पर्श कर ले, तो वह जल अपवित्र मान लिया जाता था। ऐसा पानी यदि कोई हिंदू पी ले या पीने के लिए विवश कर दिया जाए, तो उसे धर्म भ्रष्ट और फिर अंतत: धर्मांतरित घोषित कर दिया जाता था। छल या बल पूर्वक मांस से जुड़ा कोई खाद्य पदार्थ या दूसरे धर्म से जुड़ी कोई वस्तु खिला कर भी लोगों को धर्म भ्रष्ट घोषित कर दिया जाता था। आर्थिक सुरक्षा और पद इत्यादि का लालच दे कर भी धर्म परिवर्तन करा दिया जाता था।

लाउडस्पीकर जिहाद!
कुचक्र आज भी जारी हैं, लेकिन अब विश्व हिंदू परिषद समेत बहुत से जन-समूह सतर्क हो कर काम कर रहे हैं। फिर भी धर्मांतरण के लिए नए-नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। आज यदि हिंदुओं को कलमा स्मरण कराने का षड्यंत्र रचा गया हो, तो इस पर बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रसंगवश, विचारणीय यह भी है कि नमाज के समय पर लाउडस्पीकरों पर अजान के प्रसारण का उद्देश्य भी क्या परोक्ष धर्म परिवर्तन से ही जुड़ा हुआ मसला तो नहीं है?

लाउडस्पीकर के प्रयोग को ले कर कई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर निर्णय सुना चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार लाउडस्पीकर का उपयोग कर लोगों को जबरन श्रोता बनाना निजता के अधिकार का उल्लंघन है। इससे आगे जा कर, अजान के लिए लाउडस्पीकरों के प्रयोग पर प्रतिबंध के आग्रही लोगों ने अदालतों में यह तर्क भी दिया है कि उनकी आस्था अनेक देवी-देवताओं में है, इसलिए उन्हें अल्लाह की सर्वोच्चता की घोषणा क्यों सुननी चाहिए, वह भी दिन में कई-कई बार? अजान सुनने से उनकी धार्मिक भावनाओं को आघात लगता है। अगर इस तर्क को मान लिया जाए, तो क्या अजान को ऊंची आवाज में सुनाए जाने को ‘लाउडस्पीकर जिहाद’ कह सकते हैं?

हिंदू समाज में समाप्त हो भेद भाव: नरेंद्र ठाकुर

bhagawa-hindu-rahul.jpg

लखनऊ। हिंदू समाज में जाति, भाषा, प्रांत आदि के आधार पर भेदभाव समाप्त होना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगा है। इसके लिए 32 से अधिक संगठन समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। ये बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर ने गुरुवार को नारद जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम में कहीं।

उन्होंने कहा कि आरएसएस की 100 वर्ष की यात्रा सामान्य यात्रा नहीं है। हमारे कार्यकर्ताओं ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। संघ विश्व में भारत माता की जय जयकार के लिए कार्य करता है। भारत को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनाना संघ का उद्देश्य है। प्रथम सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार को याद करते हुए उन्होंने कहा कि संघ व्यक्ति निष्ठ नहीं, तत्व निष्ठ बनने में विश्वास करता है। इसीलिए हमने किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि परम पवित्र भगवा ध्वज को गुरु माना।

उन्होंने कहा कि संघ की 85000 से अधिक दैनिक शाखाएं और 32000 से अधिक साप्ताहिक मिलन चल रहे हैं। वनवासी क्षेत्रों से लेकर नगरों तक अनगिनत सामाजिक कार्य स्वयंसेवक चला रहे हैं।

नरेंद्र ठाकुर ने संघ के भविष्य की कार्य योजना पर चर्चा करते हुए कहा कि पंच परिवर्तन का कार्य समाज में चल रहा है। सामाजिक समरसता के माध्यम से हम हिंदू समाज के बीच हर प्रकार का भेदभाव मिटाना चाहते हैं। शताब्दी वर्ष में हिंदू सम्मेलनों में समाज के सभी वर्ग एक साथ आए और सहयोग किया। कुटुम्ब प्रबोधन के जरिए संघ चाहता है कि पारिवारिक व्यवस्था ठीक रहे तो समाज भी ठीक रहेगा। पर्यावरण संरक्षण भी समाज का प्रमुख कर्तव्य होना चाहिए। साथ ही स्व के आधार पर समाज का जीवन चलना चाहिए। भाषा, वेशभूषा में भी स्व का भाव होना चाहिए। इसी प्रकार सभी को नागरिक कर्तव्यों का बोध होना चाहिए। हर व्यक्ति देश, समाज के प्रति अपने कर्तव्य को समझे।

यूजीसी दिशा निर्देशों को लेकर किए गए एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है। इसलिए संघ इस विषय पर अपना कोई मत व्यक्त नहीं करना चाहता, फिर भी हमारा मानना है कि समाज में सद्भाव बना रहना चाहिए।

कार्यक्रम में अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य कृपा शंकर जी, पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र प्रचार प्रमुख सुभाष जी, सह क्षेत्र प्रचार प्रमुख एवं राष्ट्रधर्म के निदेशक मनोजकांत जी, प्रांत प्रचारक कौशल जी, प्रांत संघचालक सरदार स्वर्ण सिंह जी , विश्व संवाद केंद्र के प्रमुख डॉ. उमेश जी, विश्व संवाद केंद्र न्यास के उपाध्यक्ष अशोक सिन्हा, प्रांत के विशेष संपर्क प्रमुख प्रशांत भाटिया ,मीडिया संवाद एवं सम्पर्क प्रमुख बृजनन्दन राजू सहित बड़ी संख्या में वरिष्ठ पत्रकार एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे.

चंपारण के लाल भूपेन्द्र भगत हुए डॉक्टर भूपेन्द्र भगत

2-14.jpeg

मोतिहारी। संग्रामपुर प्रखंड के अंतर्गत उत्तरी भवानीपुर गांव के निवासी श्री रामशीष भगत के सुपुत्र भूपेन्द्र भगत को देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने 102वें दीक्षांत समारोह में डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की है। इस दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि देश के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी पी राधाकृष्णन थे। साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. योगेश सिंह, डीन ऑफ कॉलेज प्रो. बलराम पाणी जी और विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर्स, कर्मचारी और डॉक्टरेट से सम्मानित अन्य विषयों के सैकड़ों शोधार्थी रहे। यह उपाधि उनके हिंदी साहित्य में डॉक्टरेट इन फिलोसॉफी (पीएचडी) करने पर प्रदान की गई है।

यह उपाधि प्राप्त करने वाले भूपेन्द्र अपने परिवार, समाज और गांव के पहले छात्र हैं जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से ही स्नातक, स्नातकोत्तर और अब वहीं से अपनी पीएचडी कर डॉक्टरेट हुए हैं।

बता दें कि भूपेन्द्र के पिता एक आम किसान हैं और गांव में रहकर ही खेती किसानी और मजदूरी करते हैं। भूपेन्द्र ने अपने पिता के आदर्शों और संस्कारों से प्रेरणा लेकर यह मुकाम हासिल किया है।

इस विषय में डॉ. भूपेन्द्र का कहना है “दिल्ली विश्वविद्यालय में आने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार विशेषकर पूर्वांचल के हम जैसे छात्र अपनी मेहनत तो करते ही हैं साथ ही उनके कुछ बनने में यहां के माहौल, यहां के वरिष्ठ साथी, प्राध्यापक सबका योगदान होता है। बिना सामाजिक सहयोग के व्यक्ति अकेले कामयाबी की ऊंचाई पर नहीं पहुंच सकता चाहे वह कितनी ही मेहनत क्यों न कर ले।”

डॉ. भूपेन्द्र आगे कहते हैं कि वो आगे चलकर अपने गांव, अपने समाज और अपने जिले के छात्रों को लिए उच्च शिक्षा के लिए सहयोग करना चाहते हैं ताकि अधिक से अधिक बच्चे उच्च शिक्षा में आ सकें और वे भी अपने गांव और जिले का नाम रौशन कर सकें।

आपदा में अवसर तलाशते अजित अंजुम

images-2-2.jpeg

दिल्ली । पत्रकारिता के नाम पर आजकल जो कुछ चल रहा है, उसमें आपदा सबसे बड़ा अवसर बन गई है। गाजियाबाद के इंदिरापुरम में गौर ग्रीन एवेन्यू, अभय खंड की उस सोसायटी में आग लगी, जहां अजित अंजुम रहते हैं। आठ-दस फ्लैट जलकर खाक हो गए। जिन परिवारों की जिंदगी भर की कमाई, यादें, सामान और सपने राख में तब्दील हो गए, उनकी मनःस्थिति की कल्पना आसाननहीं है। वे खाली हाथ भागे, कपड़े तक नहीं बचे। नए सिरे से सब कुछ शुरू करना होगा-महीनों, शायद सालों की जद्दोजहद। लेकिन अजित अंजुम की पोस्ट पढ़िए तो लगता है मानो आपदा उनके ही घर के इर्द-गिर्द घूम रही थी।

अजित अंजुम ने एक्स पर जो लिखा, उसमें ‘मेरे ठीक सामने’, ‘मेरा घर आग की चपेट में आते-आते बचा’, ‘हम लोग हिम्मत करके डटे रहे’, ‘मैंने पानी मारा’, ‘मेरा मेंटल ट्रॉमा’ जैसे शब्द बार-बार आए। सामने वाली टावर की नौवीं मंजिल पर आग लगी, उन्होंने वीडियो बनाया, लोगों को टैग किया, फिर खुद नीचे भागे, फिर ऊपर गए, पांच लोग मिलकर पानी डाला-सब कुछ उनके इर्द-गिर्द। सोसायटी के अन्य लोग अलग-अलग फ्लोर से पानी मार रहे थे, फायर ब्रिगेड आई लेकिन शुरू में हेल्पलेस थी क्योंकि हाइड्रोलिक सीढ़ी नहीं थी। दो फ्लैटों में चार लोग फंसे रहे, उन्हें बालकनी से बचाया गया। “ऊपर वाले की मेहरबानी से सबकी जान बच गई” -यह लाइन जरूर लिखी, लेकिन पीड़ित परिवारों के नाम, उनकी कहानी, उनकी क्षति का विस्तार? शून्य।

यह दोहरा चरित्र है। एक तरफ ‘निष्पक्ष पत्रकार’ होने का दावा, दूसरी तरफ आपदा को अपने एंगल से सेल्फ-प्रमोशन में बदल देना। जिनके घर पूरी तरह जल गए, वे कौन हैं? उनके परिवार कहां शिफ्ट हुए? उनकी आर्थिक क्षति कितनी भारी है? एक-एक फ्लैट की कीमत गौर ग्रीन एवेन्यू में आज एक करोड़ से ढाई करोड़ रुपये के आसपास है। जिनके घर राख हुए, उनकी पूंजी लाखों-करोड़ों में स्वाहा हो गई। लेकिन अजित अंजुम ने यह नहीं बताया। आग कैसे लगी-एसी कंप्रेसर का ब्लास्ट या कोई और वजह-इसकी भी सही पड़ताल नहीं।

उनके मित्र रवीश कुमार ने लिखा“सात-आठ फ्लैट एक सिरे से जले हैं। बगल में अजीत जी का घर है। लपटें वहां तक भी पहुंच रही थीं।” मतलब आग पड़ोस में लगी, अजित का घर बाल-बाल बचा, लेकिन पोस्ट का केंद्र “अजीत अंजुम का घर बचाना” बन गया। वरिष्ठ पत्रकार मिलिंद खांडेकर ने भी यही टोन अपनाई-अजित का फ्लोर, उनकी स्थिति। पीड़ित परिवारों की चिंता गौण। कवयित्री स्वाति खुशबू ने ठीक पकड़ा: ग्रीन गौर में अच्छी-खासी आग लगी, दस फ्लैट लपेटे में आ गए, उसकी चिंता नहीं, मगर ‘अजीत अंजुम के यहां आग पहुंच सकती है’ की चिंता है। कहीं यह “सच की आवाज दबाने की साजिश” न घोषित कर दी जाए!

यह पैटर्न नया नहीं। अजित अंजुम, रवीश कुमार समेत कुछ यू-ट्यूबर पत्रकार सामाजिक होने का दिखावा करते हैं। लेकिन जब असली पीड़ा उनके घर के ठीक बगल में हो रही हो, तो भी रिपोर्टिंग ‘मैं, मेरा, हमारा’ पर अटक जाती है। एक भी पीड़ित परिवार की आवाज उनकी पोस्ट में नहीं आई। न उनके विस्थापन की, न आर्थिक तबाही की, न भविष्य की अनिश्चितता की। फ्लैट की कीमत, अजित ने अपना घर कब खरीदा, अब उसकी वैल्यू कितनी है-ये जानकारियां भी दर्शक ही मांग रहे हैं, क्योंकि पत्रकार ने नहीं दीं।

आपदा में अवसर तलाशना पुराना खेल है। पहले टीआरपी के लिए, अब व्यूज, लाइक्स, फॉलोअर्स और ‘मैंने बचाया’ वाले नैरेटिव के लिए। अजित अंजुम ने सामने वाली टावर की आग को रिपोर्ट नहीं किया, उसे अपने मेंटल ट्रॉमा और हिम्मत की कहानी में बदल दिया। रवीश कुमार और मिलिंद खांडेकर जैसे लोग भी उसी सुर में सुर मिला रहे हैं। सामाजिक होने का दावा करने वाले ये लोग, जब असली समाज उनके सामने जल रहा हो, तो भी खुद को केंद्र में रख लेते हैं।

सच तो यह है कि पत्रकारिता के वेश में आज कई ज़ॉम्बी घूम रहे हैं-अभिसार, साक्षी, विनोद कापरी, आशुतोष गुप्ता और इसी लाइन के अन्य नाम हैं। आज उनका दोहरा चरित्र बहुत से लोगों को समझ में नहीं आता, लेकिन जब कोई ईमानदारी से इनके कामों की समीक्षा करेगा, तो एक-एक करके एक्सपोज होंगे। आपदा पीड़ितों की मदद करने वाले असली लोग चुपचाप काम करते हैं। ये लोग कैमरा और पोस्ट के लिए हिम्मत दिखाते हैं।

गौर ग्रीन एवेन्यू की आग सिर्फ फ्लैट नहीं, कुछ पत्रकारों के चरित्र को भी जला कर राख कर गई है। लेकिन वे उस राख से भी नया अवसर निकाल लेंगे-शायद अगली पोस्ट में ‘मैंने कैसे सामना किया’ या ‘सिस्टम की नाकामी’ के नाम पर।

पीड़ित परिवार उसी वक्त नए सिरे से जिंदगी शुरू करने की जद्दोजहद में लगे रहेंगे, बिना किसी ‘निष्पक्ष’ पत्रकार की आवाज के।

scroll to top