हिंदू जागरण का प्रखर स्वर विश्व हिन्दूपरिषद

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डॉ. परवेश चौधरी

 

दिल्ली । भगवान कृष्ण जन्माष्टमी वर्ष 1964 को देश और दुनिया में फैले हिंदू समाज को प्रखर स्वर देने हेतु विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की गई। हम जानते ही हैं कि हिन्दू ही भारत की पहचान है। इसी हिंदू पहचान ने दुनिया में हमारे गौरव को बढ़ाया भारत में मुस्लिम शासन आने से पूर्व भारत का दुनिया के व्यापार में लगभग ३७ प्रतिशत की हिस्सेदारी थी।शिक्षा , तकनीक आदि में हम बहुत उन्नत थे। परंतु इसी भारत पर वर्षों तक प्रशासनिक अधीनता का कालखंड भी रहा। जिस कालखंड ने हम हिंदुओं के बीच ही कई भेदों को निर्मित कर दिया। इन्हींभेदों को आधार बनाकर हिन्दू समाज को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया गया। हिंदू अपने स्वत्व को विस्मृत करने लगा लेकिन समय-समय तमाम महापुरुषों के आगमन में भारत को भारत के अपने स्व से भिन्न भी नहीं होने दिया।

आदि शंकराचार्य जी के द्वारा भारत के चार कोनों पर मठो की स्थापना वही हिंदू समाज के द्वारा देश भर में फैले शक्ति पीठों हमारे देवालयो एवं हमारी यात्राओं ने हमे आपस में जोड़े रखा। स्वतन्त्रता की लड़ाई में हिन्दू धर्म के मान बिंदुओं ने ही हमे अंग्रेजी शासन के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा दी तो वही इस्लामिक कालखंड में तमाम यातनाओं को सहते हुए भी हम अपने धर्म के साथ डट के खड़े रहे। भारत जब आजाद हुआ तो भारत के जनमानस ने इसे अपनी सामूहिक जीत माना हिंदुओं के साथ मुस्लिम समाज के लोग भी देश की आजादी के साथ कहदे थे। जिन्हें भारत छोड़ना था, वे छोड़कर चले गए, परंतु जो रहे, वे भारत को अपना मानकर रहे। परंतु उसी बीच पश्चिम के बौद्धिक जमात द्वारा कुछ शब्दों को भारत में प्रचारित किया गया जिसमे एक शब्द था सेक्युलरिज्म यानि की पंथनिरपेक्षता। पंथनिरपेक्षता तक तो ठीक था, लेकिन उससे आगे बढ़कर इसेइस देश में धर्मनिरपेक्षता के रूप में समझ लिया गया। जिसका परिणाम हुआ कि बहुसंख्यक हिंदू अपने ही देश में अपने ही धर्म हिंदू का प्रचार प्रसार नहीं कर सकता, नेता मंदिर जाने से भय करने लगता है।

 मुस्लिम हित चिंतक के रूप में सरकार दिखने लगती है, सरकार सेक्युलरिज्म के नाम पर हिन्दुओ के अधिकारो की उपेक्षा करने लगती है। इसीलिए तो राष्ट्रगौरव का प्रतीक सोमनाथ केवल हिंदुओं से जुड़ा हुआ देश के प्रधानमंत्री को दिखने लगता है। सरकार के द्वारा हिंदुओं की आस्था, गौमाता की बात करने वाले लोगों पर गोली चला दी जाती है। मुस्लिम वोट बैंक के चलते मुस्लिम समाज के कब्जों को वैध बनाने हेतु वक़्फ़ जैसा क़ानून बना दिया जाता है। जो मुस्लिम आबादी देश में करोड़ों की संख्या में है राजनीति, सरकार, शिक्षा, व्यापार सभी में उसकी अच्छी दखल है उसे अल्पसंख्यक का दर्जा मिल जाता है। ऐसे में हिंदुओं के मन में यह अवश्य आता है की यह सरकार मुस्लिम परस्त सरकार है। इन ही परिस्थितियों में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना हुई। आज विश्व हिंदू परिषद ना की भारत में कार्य कर रही ही बल्कि कई दर्जन की संख्या में विदेशी भूमि पर भी परिषद की भारी पैठ है। परिषद ने अधीनता के खंड में उपजी जातिवादी बीमारी को सर्वप्रथम ठीक करने का अभियान लिया। वीएचपी ने कहा कि हिन्दव: सोदरा सर्वे, न हिन्दू पतितोंभवेत,मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र समानता इस एक उद्घोष ने समता और समरसता का अहम संदेश दिया। इस उद्घोष का पहला वाक्य कहता है, हम सबहिन्दू आपस में सहोदर है कोई यहा पतित नही,कोई निमन्न नही, कोई उच्च नहीहम सब एक पूर्वज की संतान है हम सब हिंदू है। वही दूसरा वाक्य कहता है कीहिन्दू समाज में कोई पतित कैसे हो सकता है जबकि हम सब तो एक ही है भारतकी पूरी चिंतन परम्परा ने इस बात को साबित किया है “सब हिंदू एक ही है” यहही तो समाजिक  समरसता का मूल मंत्र है।

अगले ही पंक्ति कहती है की हमनेसंकल्प  ही हिन्दू  समाज के संरक्षण का लिया है, वही अंतिम वाक्य है हमारा मंत्रएक ही है वो है समानता। इस प्रकार से भारत की हिन्दू  संस्कृति के गौरव केपुनर्जागरण के ध्येय को लिए परिषद के पथिक चल पड़े। बहुत कम ही लोग इसबात से अवगत होगे की परिषद के निर्माण की पृष्ठभूमि आख़िरकार क्या है, हमदेखे की भारत में इस्लामिक अक्रांता आए ईसाई शासक ब्रितानी आये। हज़ारोंवर्षों भारत में विदेशी अक्रांताओ के आने का इतिहास रहा है , वो मुट्ठी भर औरहम अधिक फिर भी चोर- लुटेरे बन आए मुस्लिम अक्रांता भी भारत के शासक बनबैठे इतना ही नही भारत में शासकों के ग़ुलामों ने भी शासन किया आप देखे कीहम तो ग़ुलामों के भी ग़ुलाम बने। भारत में इस्लाम का आतंक रहा उन्होंने भारतके ज़नमानस को ज़बरन मतांतरित किया , हमारे मंदिर तोड़े अपनी मस्जिदें बनाईखुद मुस्लिम से हिंदू बने वसीमरजा कहते है की दर्जन से ज़्यादा मन्दिरो को तोड़इस्लामिक अक्रांताओ ने मस्जिदें बनाई, सीताराम गोयल ने तो देश भर में हज़ारों मन्दिरो के तोड़ने का वर्णन किया है। इतना ही नहीं हंस बाकेर, ट्राविस एल स्मिथभी काशी के मंदिरों को तोड़ने और मस्जिद को लेकर लिखते हैं। मुस्लिम के बादभारत की सत्ता में अंग्रेज़ आए इन्होंने ने भी इस्लाम की भाँति  अपने धर्म के प्रचारको प्राथमिकता दी लेकिन इनका तरीक़ा मुस्लिम शासकों की भाँति तलवार केदम पर इस्लाम स्वीकार करवाना नही था। बल्कि पढ़े लिखे अंग्रेजो द्वारा “वाइटमेन बर्डन सिद्धांत”  के नाम पर हम गोरे लोगों का दायित्व है की इन जाहिलभारतीयों  को सभ्य बनाये। ब्रिटिश परिलियमेंट में बक़ायदा प्रस्ताव लाया गयाकी अंग्रेज़ी सत्ता की स्वीकारित हेतु हमें अपने ईसाई मत का प्रसार करना होगा।भारत में अंग्रेज़ी को भाषा के रूप में लागू किया गया तमाम हमारा साहित्यअंग्रेज़ी में रूपंतरित  किया गया अर्थ का अनर्थ किया गया। इस सब ने भारत केजन मानस में हीनता के भाव का संचार किया बस इसी से मुक्ति के अभियान कोचलाने का श्रेय किसी को जाता है तो वो है विश्व हिंदू परिषद।

भारत में अंग्रेजोके जाने के बाद भी ईसाई मिशनरियो द्वारा हमारे भोले-भले जनजातीय समाज, वंचित, ग़रीब एवं अनुसूचित जाति बन्धुओ को सेवा, विद्यालय एवं चिकित्सालयके नाम पर उनका ज़बरन मतांतरण किया ज़ाया जा रहा था। ऐसे ही कुछ घटनामध्यप्रदेश के वनवासी क्षेत्रों से मिली की ईसाई जनजातीय समाज को सेवाआदि के नाम पर उनको हिंदू से ईसाई बना रहे है। इसी मुद्दे ने विश्व हिन्दू परिषदके निर्माण में सहयोग किया अगर हिंदू समाज इसी तरह घटता रहेगा तो इससेभारत की अखंडता को भी ख़तरा होगा। वही हमें ये भी ज्ञात ही है की भारत केमंदिर- मठ ही थे।  जिन्होंने भारत को तब भी एक राष्ट्र भाव के साथ जोड़े रखाजब भारत पराधीन था। वी एच पी  ने जहा मतांतरण को लेकर देश भर में हिन्दू समाज के भीतर ज़नजागरण का कार्य प्रारम्भ किया वही इसी  समय “धर्मस्थानमुक्ति अभियान” का भी सूत्रपात हुआ। यह वही समय था जब एकात्मकता यज्ञयात्रा प्रारम्भ की गई  साथ ही गौरक्षा, छुआ-छुत, अशिक्षा, समाजिक असमानताआदि तमाम विषयों को जनमानस के बीच ले जाकर उन्हें इन सब से जोड़ा गया।कर्नाटक उडुपी प्रान्त के प्रथम हिन्दू सम्मेलन 13-14 दिसम्बर 1969 में संतो द्वाराकहा काया कि हिन्दूओ में अखण्ड एकात्मकता के भाव का जागरण होअस्पृश्यता समाप्त होनी चाहिए, इसी में संघ के द्वितीय सर संघचालक गुरु जीद्वारा हिन्दव: सोदरा सर्वे की अहम बात कही गई। जिसे आज वर्तमान सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा की हिन्दू समाज को एकात्म व्यवहारकरना चाहिए सभी समान है और एक ही है। विश्व हिंदू परिषद का समाजिकसमता निर्माण में बड़ी भूमिका है अपने निर्माण से ही व्यक्ति-व्यक्ति के मध्यकिसी भी प्रकार के भेद  को हम नकार देते है।

परिषद जहा सम्पूर्ण हिन्दू समाजका संगठन कर रहा है वही देश की अखंडता भी अपने काम का आधार आजअयोध्या में बन रहे राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण के भूमि पूजन में देश भर के मठों– मन्दिरो से आने वाली मिट्टी एवं जल ये भारत के अखण्ड होने उस संकल्प  कोदोहराता है जिस विचार के लिए हमारे लाखों पूर्वजों ने अपना बलिदान दिया।1970 के असम जोरहाट का परिषद का सम्मेलन जहाँ भारत की प्रमुख नदियों केसाथ 49 नदियों के जल एक निर्मित जल कुंड में डाला गया, देश के एकता कीदिशा में बड़ा काम कहा जा सकता है। वही 1974 का आन्ध्रप्रदेश तिरुपति में हुएपरिषद के सम्मेलन में देश की राजनीतिक पार्टियों को हिन्दू  समाज द्वारा ये चेतादिया गी मुस्लिम तुष्टिकरण छोड़ हिन्दू  केंद्रित राजनीति भी करे, स्वामीचिन्मयानंद जी के “हिन्दू वोट बैंक” बनाने की बात करना अपने में  नई बात हीथी।  हमारी हिन्दू की पहचान में जो भारत को अपनी पुण्य भूमि मानते हुए अपनीसंस्कृति पर गौरव करता है वो हिन्दू है। ऐसे हिन्दू दुनिया में फैले है हमरी हिन्दूमन्यताओ का अनुसरण कारने वाल भी हिन्दू है ऐसे में सम्पूर्ण विश्व में फैले हिन्दू समाज को संगठित करने  हेतु 1979 में प्रयाग विदेशस्थ हिन्दूओ का सम्मेलनकिया गया दुनिया 23 देशो  के प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए। विभिन्न राष्ट्रों मेंबसने वाले हिंदुओं के उनको राष्ट्रों में होने वाली समस्याओं आदि पर चर्चा कीगई। इसी प्रकार समाज में कुछ लोग कहते है हिन्दू महिलाओं को घर में रखनाचटा ऐसे लोगों को भी परिषद ने जवाब दिया 1969 में जहा उडुपी सम्मेलन हो याफिर विशेषकर प्रयाग का मातृ सम्मेलन जिसमें देश भर से आयी हुई मातृशक्तिने भाग लिया। दुर्गा वाहिनी जैसा महिलाओं का संगठन विश्व हिंदू परिषद का हीसंगठन है।

 परिषद ने भारत में हिन्दू समाज के जागरण हेतु तमाम यात्राए निकाली 1983 में एकत्मक यज्ञ यात्रा वही 1984 में राम जानकी यात्रा को हिन्दू समाज नेहाथो-हाथ लिया। काठमांडू से रामेश्वर की यात्रा हो या गंगा सागर से गुजरातसोमनाथ यात्रा या फिर हरिद्वार से कन्यकुमारी की इन यात्राओं ने हिन्दू समाज केभीतर अपने स्व का जागरण किया। हिन्दू समाज के गाय पवित्र है इसके लिएगोरक्षा का पूरा आन्दोलन  परिषद ने संतों के आग्रह  पर किया गया।  अयोध्या मेंप्रभु राम का भव्य मंदिर बने ये भाव तो देश और दुनिया के करोड़ों हिंदुओ के मनमें था इसे सकार रूप देने का कार्य भारत के संतो द्वारा विश्व हिंदू परिषद कोसौंपा  गया। जो आज अपनी पूर्णता की ओर बढ़  रहा है,अयोध्या में प्रभु  राम कामंदिर बड़ी तेज़ी  से आकर रूप ले रहा है।

ये परिषद के प्रति हिंदू समाज काविश्वास ही है की 95 वर्ष के हिरमाराम भी सुदूर झारखंड के जंगल में भगवानराम के मंदिर हेतु निधि समर्पण  हेतु प्रतीक्षा करते है और परिषद के कार्यकर्ताओंको बुला कर निधि  का समर्पण  करते है। उत्तराखंड में फक्कट बाबा अपनी सारीजमा पूँजी राम मंदिर के लिए समर्पित कर देते हैं। सुदूर सिक्किम में एक बूढ़ीमहिला की आख़िरी इच्छा ही राम मंदिर बनते देखना है । लद्दख एवं अरुणाचलप्रदेश के बौद्ध गोंपा हो या फिर सिख गुरु बाबा इक़बाल सिंह सभी ने मंदिरनिर्माण हेतु अपनी निधि का समर्पण किया। यह विश्वास देश के हिन्दू एवं अन्यमतावलंबियों में आज भी विश्व हिन्दू परिषद के लिए दिखता है। इसलिए जबआज लव जेहाद जैसे मुद्दे रोज़ आम देखने को आ रहे या हिन्दू  देवी-देवताओं काअपमान  होते दिखता है तो हिंदू समाज विश्व हिंदू परिषद की तरफ़ ही देखता है।

 

मां भारती डिफेन्स अकादमी: मधुबनी के पूर्व वायुसेना जवान आशीष झा का युवाओं के लिए स्वप्न

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पटना। बिहार के मधुबनी जिले के रांटी चौक क्षेत्र में हाल ही में मां भारती डिफेन्स अकादमी की शुरुआत हुई है। इसे पूर्व वायुसेना जवान आशीष झा (आशीष जी) ने स्थापित किया है। स्थानीय मीडिया जैसे मिथिला मिरर के यूट्यूब चैनल और फेसबुक पर प्रसारित वीडियो में इसकी चर्चा हुई है। आशीष झा ने 2006 में वायुसेना में भर्ती होकर एयर डिफेंस में 20 वर्षों से अधिक सेवा की। वे युवा उम्र में ही उस्ताद बने और ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों में शामिल रहे। मार्च 2026 में वीआरएस लेने के तुरंत बाद उन्होंने यह अकादमी शुरू की।

अकादमी का उद्देश्य ना सिर्फ मधुबनी और आसपास के मिथिला क्षेत्र के युवाओं को सेना, नौसेना, वायुसेना और अर्धसैनिक बलों में भर्ती के लिए तैयार करना है। बल्कि जिस तरह बिहार के युवा पलायन करके दूसरे प्रदेशों में जाते हैं। मधुबनी में एक ऐसे अकादमी के निर्माण का यह प्रयास भी है, जहां देशभर से बच्चे डिफेन्स की शिक्षा लेने आएं। यहां 10वीं और 12वीं के बाद की विभिन्न एंट्री जैसे आर्मी, एयरफोर्स (साइंस और नॉन-साइंस), नेवी (एमआर और एसएसआर), एसएससी जीडी आदि की लिखित परीक्षा, ग्रुप डिस्कशन, इंटरव्यू, फिजिकल टेस्ट और एसएसबी की तैयारी कराई जाती है। तीन क्लासरूम और एक परीक्षा कक्ष हैं, जहां एक समय में करीब 120 विद्यार्थी बैठ सकते हैं। हॉस्टल की सुविधा भी विकसित की जा रही है, जिसके लिए सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, बेनीपट्टी और मुजफ्फरपुर से पूछताछ हो रही है। मासिक फीस 2000 से 4000 रुपये के बीच है, लेकिन 80 प्रतिशत से अधिक अंक पर 50 प्रतिशत और 90 प्रतिशत से ऊपर पर 100 प्रतिशत छात्रवृत्ति दी जाती है। आदर्श वाक्य है “ड्रीम इट एंड ड्रिल इट”।

देश के अन्य रक्षा अकादमियों से यह अलग इसलिए है क्योंकि अधिकांश बड़े संस्थान दिल्ली, कोटा, पुणे या पटना जैसे शहरों में हैं, जो ग्रामीण युवाओं के लिए महंगे और दूर हैं। मधुबनी में यह पहली ऐसी अकादमी बताई जाती है, जो स्थानीय भाषा और संस्कृति को समझते हुए व्यक्तिगत मार्गदर्शन देती है।

आशीष झा का वास्तविक युद्ध अनुभव और सीमा क्षेत्र (नेपाल-भूटान सीमा के निकट) की समझ युवाओं में देशभक्ति और योद्धा की मानसिकता विकसित करती है, न कि सिर्फ नौकरी की तैयारी। व्यावसायिक कोचिंग के बजाय यहां अनुशासन, आचरण, ड्रेसिंग और जुनून पर जोर है। स्थानीय कवरेज में दिग्गज वायुसेना अधिकारियों ने भी शुभकामनाएं दी हैं।

यह अकादमी मिथिला के प्रतिभाशाली युवाओं को अपने घर के पास रक्षा सेवाओं में जाने का सुनहरा अवसर दे रही है और क्षेत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ा रही है।

कृत्रिम मेधा के युग में उच्च शिक्षा में समयानुकूल परिवर्तन की आवश्यकता

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लखनऊ। कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब भविष्य की कोई दूर की तकनीक नहीं रह गई है। यह हमारे आसपास के जीवन, कामकाज, व्यापार, शोध, संचार और शिक्षा को तेजी से प्रभावित कर रही है। कुछ वर्ष पहले जिस काम को पूरा करने में घंटों लगते थे, आज वही काम कुछ मिनटों में किया जा सकता है। लिखने, अनुवाद करने, जानकारी व्यवस्थित करने, चित्र बनाने, कोड तैयार करने और अनेक प्रकार के विश्लेषण में कृत्रिम मेधा का उपयोग हो रहा है। ऐसे समय में यदि उच्च शिक्षा की व्यवस्था पुराने तरीके से ही चलती रहे, तो यह युवाओं को उस दुनिया के लिए तैयार नहीं कर पाएगी, जिसमें उन्हें आगे काम करना है।

भारत में उच्च शिक्षा के सामने यह चुनौती और भी बड़ी है, क्योंकि हमारे विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या बहुत अधिक है। इन विद्यार्थियों के सामने केवल डिग्री हासिल करने की चुनौती नहीं है, बल्कि ऐसी योग्यता हासिल करने की जरूरत भी है जिससे वे बदलती हुई दुनिया में अपने लिए जगह बना सकें। इसलिए अब यह सोचने का समय है कि हम विद्यार्थियों को क्या पढ़ा रहे हैं, कैसे पढ़ा रहे हैं और पढ़ाई के बाद वे उस ज्ञान का उपयोग किस तरह कर पाएंगे।

इसका अर्थ यह नहीं है कि हर विद्यार्थी को कृत्रिम मेधा का विशेषज्ञ बना दिया जाए। हर व्यक्ति का काम मशीन बनाना नहीं है। लेकिन आज के समय में यह समझना जरूरी है कि कृत्रिम मेधा क्या कर सकती है, उसकी सीमाएं क्या हैं, उससे मिलने वाली जानकारी को कैसे जांचना है और उसका जिम्मेदारी के साथ उपयोग कैसे करना है। विश्वविद्यालयों को विद्यार्थियों में यही समझ विकसित करनी होगी।

कृत्रिम मेधा के आने से शिक्षा के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हुआ है। यदि विद्यार्थी किसी विषय पर निबंध, उत्तर, प्रस्तुति या प्रारंभिक शोध सामग्री कुछ ही मिनटों में तैयार कर सकता है, तो फिर शिक्षक उससे क्या करवाएगा? केवल लिखित असाइनमेंट देकर यह मान लेना कि विद्यार्थी ने स्वयं अध्ययन किया है, अब पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षा व्यवस्था को अपने मूल्यांकन के तरीकों में बदलाव करना पड़ेगा।

विद्यार्थियों से ऐसे प्रश्न पूछने होंगे जिनके उत्तर केवल इंटरनेट या कृत्रिम मेधा से प्राप्त न किए जा सकें। उन्हें किसी समस्या का समाधान स्वयं समझाकर बताना होगा, अपने विचारों का कारण देना होगा, किसी स्थानीय समस्या का अध्ययन करना होगा, वास्तविक आंकड़ों का विश्लेषण करना होगा और अपने निष्कर्षों पर चर्चा करनी होगी। कक्षा में बातचीत, बहस, प्रस्तुति, परियोजना, प्रयोग और वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित कार्य का महत्व बढ़ाना होगा। इससे यह पता चलेगा कि विद्यार्थी ने केवल उत्तर प्राप्त किया है या वास्तव में विषय को समझा भी है।

यह बदलाव केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं है। शिक्षकों की भूमिका भी बदलनी होगी। शिक्षक अब केवल जानकारी देने वाला व्यक्ति नहीं रह सकता, क्योंकि जानकारी तक पहुंच पहले की तुलना में बहुत आसान हो गई है। शिक्षक की भूमिका विद्यार्थियों को सही जानकारी चुनने, गलत जानकारी पहचानने, सवाल पूछने, तर्क करने और ज्ञान का उचित उपयोग करने में मदद करने की होनी चाहिए। शिक्षक को यह भी सिखाना होगा कि कृत्रिम मेधा द्वारा तैयार सामग्री को आंख बंद करके सही नहीं माना जा सकता।

यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि कृत्रिम मेधा हमेशा सही उत्तर नहीं देती। वह कभी-कभी गलत जानकारी को भी बहुत आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत कर सकती है। इसलिए विद्यार्थी को यह आदत डालनी होगी कि किसी महत्वपूर्ण जानकारी को विश्वसनीय स्रोत से जांचे। यही वैज्ञानिक सोच और डिजिटल साक्षरता का हिस्सा है। यूनेस्को ने भी शिक्षा में जनरेटिव एआई के उपयोग के लिए मानव-केंद्रित दृष्टिकोण, सुरक्षा, समान अवसर, डेटा गोपनीयता और नैतिक उपयोग पर जोर दिया है।

उच्च शिक्षा में पाठ्यक्रमों को भी समय के साथ बदलना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि पुराने विषयों को हटा दिया जाए और हर जगह केवल एआई पढ़ाई जाए। इतिहास, साहित्य, दर्शन, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र और अन्य मानविकी विषयों का महत्व कम नहीं हुआ है। बल्कि कृत्रिम मेधा के दौर में इन विषयों की जरूरत कई मायनों में और बढ़ सकती है, क्योंकि मशीन जानकारी को व्यवस्थित कर सकती है, लेकिन समाज के नैतिक प्रश्नों, मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों पर अंतिम निर्णय मनुष्य को ही लेना होगा।

इसलिए हमें ऐसे पाठ्यक्रम चाहिए जिनमें तकनीकी ज्ञान और मानवीय समझ दोनों का संतुलन हो। उदाहरण के लिए साहित्य का विद्यार्थी डिजिटल उपकरणों और एआई आधारित भाषा तकनीकों को समझ सकता है, लेकिन साथ ही उसे भाषा की संवेदना और सांस्कृतिक संदर्भ भी समझना होगा। वाणिज्य का विद्यार्थी डेटा और डिजिटल वित्त को समझे, लेकिन उसके साथ आर्थिक नैतिकता और मानवीय व्यवहार को भी समझे। पत्रकारिता का विद्यार्थी एआई से जानकारी व्यवस्थित करना सीख सकता है, लेकिन तथ्य की जांच, स्रोत की विश्वसनीयता और पत्रकारिता की जिम्मेदारी को उससे भी अधिक गंभीरता से समझे।

भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने भी बहुविषयक शिक्षा, तकनीक के उपयोग, उद्योग और उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच सहयोग तथा कृत्रिम मेधा, मशीन लर्निंग और बिग डेटा जैसे क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इन विचारों को केवल नीतिगत दस्तावेजों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि कॉलेजों की कक्षाओं और प्रयोगशालाओं तक पहुंचाया जाए।

विश्वविद्यालयों को उद्योग और रोजगार की बदलती जरूरतों से भी अपना संबंध मजबूत करना होगा। UGC के संस्थागत विकास संबंधी दिशानिर्देशों में भी एआई, मशीन लर्निंग, डेटा एनालिटिक्स, साइबर सुरक्षा, क्लाउड कंप्यूटिंग और दूसरी उभरती तकनीकों से जुड़े कौशल को पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता बताई गई है। साथ ही व्यावहारिक और उद्योग की जरूरत के अनुसार शिक्षा तथा डिजिटल और मिश्रित शिक्षा पर भी जोर दिया गया है।

लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है। केवल इसलिए कि कोई तकनीक लोकप्रिय हो गई है, उसे शिक्षा में बिना सोचे-समझे शामिल कर देना उचित नहीं होगा। हर एआई उपकरण उपयोगी नहीं होता और हर तकनीक हर विषय के लिए जरूरी नहीं है। विश्वविद्यालयों को पहले यह तय करना होगा कि किसी तकनीक से विद्यार्थी की सीखने की क्षमता वास्तव में बढ़ रही है या नहीं। शिक्षा का उद्देश्य तकनीक का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि विद्यार्थी को बेहतर तरीके से सीखने में मदद करना है।

डेटा की सुरक्षा भी गंभीर विषय है। विद्यार्थी और शिक्षक जब एआई उपकरणों का उपयोग करते हैं, तो वे कई बार निजी या शैक्षणिक जानकारी उसमें डाल देते हैं। ऐसी जानकारी का उपयोग कैसे होता है, कहां सुरक्षित रहती है और उसका भविष्य में क्या किया जा सकता है, इसे समझना आवश्यक है। यूनेस्को ने शिक्षा में जनरेटिव एआई के संदर्भ में डेटा गोपनीयता और सुरक्षित उपयोग को महत्वपूर्ण विषय माना है। इसलिए विश्वविद्यालयों को विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए स्पष्ट नियम बनाने चाहिए।

हमें एआई को रोकने की कोशिश करने के बजाय उसे समझदारी से इस्तेमाल करना सीखना होगा। यदि विद्यार्थी एआई का इस्तेमाल केवल अपना गृहकार्य करवाने या बिना पढ़े उत्तर तैयार करने के लिए करेगा, तो इससे उसकी सीखने की क्षमता कमजोर हो सकती है। लेकिन यदि वह एआई का उपयोग किसी कठिन विषय को समझने, अलग-अलग दृष्टिकोण देखने, प्रारंभिक विचार प्राप्त करने या अपनी लिखी सामग्री की भाषा सुधारने के लिए करता है और अंतिम निर्णय स्वयं करता है, तो वही तकनीक उसके लिए उपयोगी सहायक बन सकती है।

इसी कारण परीक्षा और मूल्यांकन की पूरी व्यवस्था पर भी फिर से विचार करने की जरूरत है। विश्वविद्यालयों को यह देखना होगा कि परीक्षा विद्यार्थी की याददाश्त को माप रही है या उसकी समझ को। यदि कोई विद्यार्थी पुस्तक में लिखी बात को याद करके परीक्षा में लिख देता है, लेकिन वास्तविक जीवन में उसका उपयोग नहीं कर पाता, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। अब मूल्यांकन में समझ, तर्क, रचनात्मकता, समस्या समाधान, संवाद और वास्तविक परिस्थितियों में ज्ञान के उपयोग को अधिक महत्व देना होगा।

यह बदलाव आसान नहीं होगा। इसके लिए शिक्षकों का प्रशिक्षण, बेहतर डिजिटल सुविधाएं, विश्वसनीय इंटरनेट, आधुनिक प्रयोगशालाएं और विश्वविद्यालयों में नई सोच की जरूरत होगी। हर विद्यार्थी के पास समान तकनीकी सुविधा भी नहीं है। इसलिए यह भी सुनिश्चित करना होगा कि एआई के कारण शिक्षा में नया असमानता का अंतर पैदा न हो। जिन विद्यार्थियों के पास महंगे उपकरण और बेहतर डिजिटल साधन हैं, वे बाकी विद्यार्थियों से बहुत आगे न निकल जाएं। शिक्षा में तकनीक का उपयोग समान अवसर बढ़ाने के लिए होना चाहिए, असमानता बढ़ाने के लिए नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें यह तय करना होगा कि शिक्षा के केंद्र में मनुष्य रहेगा या मशीन। कृत्रिम मेधा कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, शिक्षा का उद्देश्य केवल तेज काम करना नहीं है। शिक्षा मनुष्य को विचारशील, जिम्मेदार, संवेदनशील और स्वतंत्र सोच वाला नागरिक बनाने का माध्यम भी है। यदि विद्यार्थी हर सवाल का जवाब मशीन से लेने लगे और खुद सवाल पूछना ही भूल जाए, तो तकनीकी सुविधा शिक्षा की कमजोरी बन जाएगी।

इसलिए उच्च शिक्षा में परिवर्तन का सही रास्ता तकनीक और मनुष्य के बीच संतुलन बनाने का है। हमें ऐसे युवा चाहिए जो कृत्रिम मेधा का इस्तेमाल कर सकें, लेकिन उसके गुलाम न बनें। वे मशीन से सहायता ले सकें, लेकिन अंतिम निर्णय अपने विवेक से करें। वे तेज जानकारी प्राप्त कर सकें, लेकिन उसकी सत्यता की जांच भी कर सकें। वे नई तकनीक सीख सकें, लेकिन अपने मानवीय मूल्यों को न छोड़ें।

कृत्रिम मेधा उच्च शिक्षा के लिए खतरा तभी बनेगी, जब शिक्षा व्यवस्था बदलाव से बचती रहेगी। यदि विश्वविद्यालय समय के साथ अपने पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति, परीक्षा प्रणाली और शिक्षक प्रशिक्षण में बदलाव करते हैं, तो यही तकनीक शिक्षा को अधिक उपयोगी, व्यक्तिगत और प्रभावी बनाने में मदद कर सकती है। अब सवाल यह नहीं है कि कृत्रिम मेधा शिक्षा में आएगी या नहीं। वह आ चुकी है। असली सवाल यह है कि हमारी उच्च शिक्षा व्यवस्था उसके साथ कितनी समझदारी, सावधानी और दूरदृष्टि के साथ आगे बढ़ती है।

भारत को ऐसी उच्च शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जो केवल डिग्री देने वाली व्यवस्था न हो, बल्कि बदलती दुनिया को समझने और उसमें सम्मान के साथ आगे बढ़ने की क्षमता पैदा करे। कृत्रिम मेधा के युग में यही समय की सबसे बड़ी मांग है।

जौहर की आग या दाम्पत्य की चुप्पी: स्वरा की जुबान पर आजादी का सवाल

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दिल्ली। स्वरा भास्कर का हालिया बयान एक बार फिर चर्चा में है। ‘वुमन लाइफ फ्रीडम’ कार्यक्रम में उन्होंने पद्मावत के जौहर दृश्य को याद करते हुए कहा कि रेप पीड़िता को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि इज्जत बचाने के लिए जान दे देना ही बहादुरी है। उन्होंने पूछा—क्या बलात्कार महिला की जिंदगी का अंत है?

यह बात सैद्धांतिक रूप से सही लगती है। लेकिन कई श्रोता उसी क्षण एक और सवाल पूछ रहे हैं। स्वरा ने जिसे पहले ‘भाई’ कहा, उसी व्यक्ति को जीवनसाथी क्यों चुना? निकाह के पीछे डर या समझौता तो नहीं था? और जौहर की कहानी सुनाते हुए वे कहीं अपना व्यक्तिगत दर्द तो नहीं बयान कर रही थीं?

स्वरा और फहद अहमद की शादी 2023 में हुई। उससे पहले स्वरा ने सोशल मीडिया पर फहद को भाई कहकर संबोधित किया था। कुछ लोगों के लिए यह मजाक था, कुछ के लिए रिश्ते की अनिश्चितता का संकेत। अंतरधार्मिक विवाह पहले से ही सामाजिक दबाव में रहता है। ऐसे में यह चिंता स्वाभाविक लगती है कि ‘आजादी’ का नारा अब केवल स्वरा की जुबान तक सीमित तो नहीं रह गया।

मां-बाप के घर में स्वरा ने जिस स्वतंत्रता का आनंद लिया, वह विवाह के बाद कितनी बची—यह सवाल निजी है। फिर भी सार्वजनिक व्यक्तित्व जब बार-बार आजादी, सम्मान और जीवित रहने के अधिकार की बात करते हैं, तो लोग उनके जीवन से उसकी तुलना करते हैं। जौहर के संदर्भ में स्वरा ने कहा कि कई बार दिल मर जाना चाहता है, लेकिन जीना पड़ता है। कुछ श्रोताओं को यह वाक्य फिल्म से ज्यादा निजी लगता है।

इतिहास में जौहर एक विशिष्ट परिस्थिति का निर्णय था। उसे आज के संदर्भ में रेप सर्वाइवर से सीधे जोड़ना विवादास्पद है। स्वरा का तर्क यह है कि किसी भी पीड़िता को यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि जीना कायरता है। यह बात सही है। लेकिन जब वही व्यक्ति अपने विवाह को लेकर उठे सवालों का जवाब नहीं देतीं, तो लोग इशारों में छिपा हुआ अर्थ ढूंढने लगते हैं।

व्यक्तिगत जीवन का आकलन बाहरी व्यक्ति नहीं कर सकते। स्वरा की शादी खुशहाल हो सकती है, समझौते पर आधारित भी हो सकती है। दोनों संभावनाएं निजी हैं। सार्वजनिक चर्चा का हक केवल उनके कथनों पर है। यदि वे सच में आजादी की बात कर रही हैं, तो उन्हें अपने जीवन में भी वही स्वतंत्रता दिखानी चाहिए—डर के बिना, समझौते के बिना।

अभी तक स्वरा ने इन आशंकाओं का सीधा जवाब नहीं दिया है। जब तक नहीं देतीं, तब तक जौहर की कहानी और उनके निकाह के बीच का फासला लोगों के मन में बना रहेगा। आजादी सिर्फ जुबान की नहीं, जीवन की भी होनी चाहिए।

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