पाकिस्तान में हिंदू-सिख देवस्थलों का क्रमिक विनाश और भारत का मौन !

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । कई घटनाओं में फिर एक नई घटना दर्ज हो गई। एक उमस भरी सुबह, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के नारोवाल जिले का सिराज गांव के कोने पर स्थित, एक सदी से भी अधिक पुराना ऐतिहासिक हिंदू मंदिर अचानक मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया। स्थानीय प्रशासन और प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) से जुड़े तत्वों की मौन सहमति से इस पवित्र स्थल को इसलिए ढहा दिया गया, ताकि इसकी बेशकीमती लगभग 1,000 वर्ग मीटर जमीन को पास के एक मदरसे में शामिल किया जा सके।

स्‍थानीय हिंदू नेता रतन लाल ने रूंधे गले से कहा, “प्रशासन ने हमसे कहा कि यह इमारत जर्जर थी और भारी बारिश के कारण खुद गिर गई, लेकिन हम जानते हैं कि रात के अंधेरे में वहां क्या हुआ था। अब जब वहां मदरसा बड़ा हो रहा है, तो हमारे लोग उस रास्ते से गुजरने में भी डरते हैं।” हमेशा की तरह पाकिस्‍तान में घटी यह घटना कोई अकेली या छिटपुट घटना नहीं है। यह पाकिस्तान में स्वतंत्रता के बाद से गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के धार्मिक और सांस्कृतिक अस्तित्व को मिटाने के लिए चल रहे एक लंबे, व्यवस्थित और क्रमिक सिलसिले का नवीनतम अध्याय है।

विभाजन के समय जिस देश की सीमाओं के भीतर सैकड़ों भव्य मंदिर, जैन उपासना स्थल और ऐतिहासिक गुरुद्वारे मौजूद थे, आज वहां की अल्पसंख्यक धरोहरें भू-माफियाओं, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और धार्मिक कट्टरपंथ के त्रिकोण में फंसकर दम तोड़ रही हैं। जिन हिन्‍दू पूर्वजों ने बहुत पुरुषार्थ से जब इन मंदिरों, देवस्‍थलों को बनवाया होगा, तब उन्‍हें भला क्‍या पता था कि भविष्‍य में उनकी पीढ़ियां इन्‍हें बचा पाने में असमर्थ रहेंगी। ‘ऑल पाकिस्तान हिंदू राइट्स मूवमेंट’ और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय नागरिक संगठनों द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के समय वर्तमान पाकिस्तान की भौगोलिक सीमाओं के भीतर लगभग 428 प्रमुख हिंदू मंदिर और 588 ऐतिहासिक गुरुद्वारे पूरी तरह सक्रिय थे।

आज इनमें से केवल 22 से 26 हिंदू मंदिर और लगभग 20 से 22 गुरुद्वारे ही ऐसे बचे हैं जहां नियमित पूजा-अर्चना या ग्रन्थ साहिब का पाठ होता है। शेष सभी या तो पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए हैं या उन्हें व्यावसायिक परिसरों में तब्दील कर दिया गया है।

प्रहलादपुरी मंदिर (मुलतान), भगवान नरसिंह का प्राकट्य स्थल, होलिका दहन की उत्पत्ति भूमि 1992 में पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए थे वर्तमान में उजाड़ खंडहर यहां देखा जा सकता है। ऐतिहासिक जैन मंदिर (लाहौर), पंजाब की अनूठी जैन स्थापत्य कला का गगनचुंबी प्रतीक। 1992 में बुलडोजर से जमींदोज कर दिया गया था। अब सड़क और व्यावसायिक क्षेत्र यहां हो गया है।
राम कुंड परिसर (सैदपुर) भगवान राम, लक्ष्मण और सीता के वनवास कालीन पवित्र कुंड से देव मूर्तियों को हटाकर परिसर को ‘पिकनिक स्पॉट’ और रेस्तरां बनाया गया गुरुद्वारा दमदमा साहिब (रावलपिंडी), बाबा खेम सिंह बेदी द्वारा 1876 में निर्मित पवित्र सिख स्थल पर स्थानीय भू-माफिया का कब्जा है। वर्तमान में कसाईखाना और मीट की दुकान यहां देखी जा सकती है।

शिव मंदिर (कोहाट), उत्तर-पश्चिम सीमांत का सदियों पुराना पूजनीय शिव स्थल परिसर पर कब्जा करके उसे सरकारी प्राथमिक विद्यालय में बदला गया है। गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा (साहीवाल), सिख साम्राज्य कालीन स्थानीय सिख समुदाय का मुख्य केंद्र अब प्रशासनिक आदेश पर पुलिस स्टेशन (थाने) में परिवर्तित दिखाई देता है। इस तरह से पाकिस्‍तान में अनेक समृद्ध एवं एतिहासिक महत्‍व के देव स्‍थलों को पूरी तरह से समाप्‍त कर दिया गया। वस्‍तुत: यह कुछ उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि पाकिस्तान में देवस्थलों को इस्‍लामिक जिहादी मानसिकता और मजहबी नफरत के कारण तोड़ दिया गया। अब उनका व्यावसायिक और प्रशासनिक संपत्तियों में उपयोग हो रहा है।

हालांकि 1947 में जब लाखों की संख्या में हिंदू और सिख अपनी जान बचाकर भारत आए, तो उनके पीछे छूटे मंदिर और गुरुद्वारे खाली स्‍थान रह गए थे। तब इन संपत्तियों की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान सरकार ने इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी)का गठन किया। फिर इसकी आड़ में एक नया खेल यहां शुरू हुआ। बोर्ड ने इन पवित्र स्थलों को संरक्षित करने के बजाय इन्हें ‘शरणार्थी पुनर्वास’ के नाम पर स्थानीय लोगों को आवंटित करना शुरू कर दिया और इस तरह से सैकड़ों ग्रामीण मंदिरों को गोदामों, तबेले या रिहायशी मकानों में बदल दिया गया।

फिर जो कमी शेष रही थी, वह जनरल मोहम्मद जिया-उल-हक के सैन्य शासन ने पूरी कर दी। इस दौरान पाकिस्तान की पूरी सामाजिक और कानूनी व्यवस्था का तेजी से कट्टरपंथीकरण किया गया। स्कूलों के पाठ्यक्रमों में गैर-मुस्लिमों के इतिहास को नकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाने लगा। इसी दौर में मदरसों के नेटवर्क को सरकारी फंडिंग दी गई। इसके परिणामस्वरूप, अल्पसंख्यक स्थलों को “काफिरों के प्रतीक” के रूप में देखा जाने लगा और कई प्राचीन परिसरों की जमीनों को बलपूर्वक पास के मदरसों या मस्जिदों में मिला लिया गया।

रही सही जिहादी इस्‍लामिक मानसिकता ने अपनी कसर 1992 में पूरी कर दी, जब उन्मादी भीड़ ने मात्र 48 से 72 घंटों के भीतर पूरे पाकिस्तान में 200 से अधिक हिंदू और जैन मंदिरों को डायनामाइट, बुलडोजर और आग के हवाले कर दिया। लाहौर का प्रसिद्ध जैन मंदिर इसी उन्माद की भेंट चढ़ा। इस घटना ने पाकिस्तान में बची-खुची अल्पसंख्यक वास्तुकला की रीढ़ तोड़ दी।

इस तरह से 21वीं सदी में, विशेषकर 2026 के वर्तमान परिदृश्य में, मंदिरों और गुरुद्वारों को तोड़ने का तरीका अब यहां बदल चुका है। अब सीधे तौर पर दंगों के बजाय एक “प्रशासनिक और कानूनी गठजोड़” के तहत इन संपत्तियों को निशाना बनाया जा रहा है। इस खेल के तीन मुख्य खिलाड़ी हैं- भू-माफिया, भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी, मजहबी कट्टरपंथी संगठन एवं स्थानीय मदरसा संचालक। चूंकि अधिकांश ऐतिहासिक मंदिर और गुरुद्वारे शहरों के मुख्य व्यावसायिक केंद्रों (जैसे कराची का पुराना शहर, लाहौर का अनारकली, या रावलपिंडी का सदर) में स्थित हैं, इसलिए इनकी जमीनों की कीमत अरबों रुपये में है। भू-माफिया इन जमीनों पर नजर गड़ाए रहते हैं।

इसी तरह से विस्थापित संपत्ति बोर्ड (ईटीपीबी) जिसका मुख्य कार्य इन संपत्तियों की रक्षा करना था, स्वयं भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। बोर्ड के अधिकारी गुप्त रूप से इन जमीनों को “व्यावसायिक पट्टे” पर बिल्डरों को दे देते हैं। उदाहरण के लिए, अगस्त 2026 में क्वेटा (बलूचिस्तान) में 200 साल पुराने श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारे को बिना किसी पूर्व सूचना के ढहा दिया गया क्योंकि उसकी जमीन एक कमर्शियल शॉपिंग मॉल के लिए बेच दी गई थी। जब स्थानीय अल्पसंख्यक हिन्दू-सिख इसका विरोध करते हैं, तो बिल्डर या भू-माफिया स्थानीय मौलवियों या कट्टरपंथी संगठनों (जैसे टीएलपी) को शामिल कर लेते हैं।

जमीन के एक हिस्से पर तुरंत मदरसा या मजार घोषित कर दी जाती है। एक बार जब किसी विवाद में धार्मिक रंग आ जाता है, तो पाकिस्तान की पुलिस और अदालतें अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े होने का साहस खो देती हैं। वहीं, पाकिस्तान में देवस्थलों के टूटने के समानांतर ही वहां के हिंदुओं, सिखों और ईसाइयों के खिलाफ होने वाली शारीरिक हिंसा में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। खैबर पख्तूनख्वा और पेशावर के इलाकों में रहने वाले सिख व्यापारी पिछले कुछ वर्षों से लगातार आतंकवादियों और कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं।

जून 2026 में हुई एक अत्यंत वीभत्स घटना में, एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे के भीतर सेवादार सिख दंपति की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इस घटना ने पाकिस्तान के सिखों को झकझोर दिया। वहीं भारत सहित पूरी दुनिया में रह रहे सिख डायस्पोरा में भारी आक्रोश पैदा होते हुए भी देखा गया था, किंतु फिर वही ढाक के तीन पात। यहां ईसाइयों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। अगस्त 2023 का ‘जरनवाला कांड’ (फैसलाबाद) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां ईशनिंदा के एक झूठे आरोप के बाद हिंसक भीड़ ने 21 से अधिक चर्चों और ईसाइयों के सैकड़ों घरों को आग लगा दी थी। 2026 में भी यह सिलसिला थमा नहीं है।

जुलाई 2026 में पादरी अफजल मसीह पर कुल्हाड़ी से हमला किया गया, और हर साल दर्जनों ईसाई सफाईकर्मियों को बिना किसी सुरक्षा उपकरण के सीवेज टैंकों में उतारकर जहरीली गैस से मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसी तरह से सिंध प्रांत में रहने वाले हिंदू समाज के लिए सबसे बड़ा अभिशाप उनकी नाबालिग बेटियों का अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन है। ह्यूमन राइट्स फोकस पाकिस्तान (एचआरएफपी) की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल 1,000 से अधिक हिंदू और ईसाई लड़कियों का अपहरण किया जाता है।

सिंध के घोटकी में स्थित ‘दरगाह भरचुंडी शरीफ’ का मौलवी मियां मिट्ठू इस नेटवर्क का मुख्य सरगना माना जाता है। अपहरण की गई नाबालिग लड़कियों को इन मदरसों में लाकर डरा-धमकाकर इस्लाम कबूल कराया जाता है और अधेड़ उम्र के मुस्लिम पुरुषों से उनका निकाह करा दिया जाता है। जब पीड़ित माता-पिता न्‍यायालयों का दरवाजा खटखटाते हैं, तो कट्टरपंथियों की भीड़ अदालत परिसर को घेर लेती है। बंदूक की नोक पर लड़की से बयान दिलवाया जाता है कि उसने “अपनी मर्जी से धर्म बदला है” और अदालतें उम्र के फर्जी दस्तावेजों को स्वीकार करते हुए मामले को बंद कर देती हैं।

जब भारत में किसी छोटी सी घटना पर भी संयुक्त राष्ट्र (यूएन), एमनेस्टी इंटरनेशनल या पश्चिमी देश तुरंत विस्तृत बयान जारी करते हैं, तो वही संगठन पाकिस्तान में हो रहे इस व्यवस्थित सांस्कृतिक नरसंहार पर रहस्यमयी चुप्पी क्यों साध लेते हैं? इस दोहरे रवैये के पीछे गहरे कूटनीतिक और रणनीतिक कारण समझ आते हैं, जैसे कि पश्चिम के लिए पाकिस्तान भू-राजनीतिक मोहरा है। ‘इस्लामोफोबिया’ के नैरेटिव को बचाने की कोशिश। विफल परमाणु देश होने का भय। महाशक्ति बनते भारत को घेरने का कूटनीतिक टूल। किंतु भारत का इन घटनाओं के बाद भी अक्‍सर चुप रहना समझ नहीं आता है।

आखिर विभाजन हुआ था तो धर्म के आधार पर। मुस्‍लिम लीग का डारेक्‍टर एक्‍शन, कलकत्‍ता से लेकर नोआखाली तक कई घटनाएं हैं जिन्‍होंने इतिहास में भारत को विभाजित करने में भूमिका निभाई, किंतु इसमें हिन्‍दुओं, सिखों या अन्‍य का क्‍या दोष है? नेहरु-लियाकत समझौते में भी जो तय हुआ वह नहीं हुआ, जिन्‍ना ने जो वादा भारत से किया कि वह अपने अल्‍पसंख्‍यकों की पूरी रक्षा करेगा, वह भी नहीं हुआ। पाकिस्‍तान निर्माण के लिए जिन उत्‍तरप्रदेश, बिहार से लेकर तमाम राज्‍यों के मुसलमानों ने जो वोट पाकिस्‍तान को दिया था, वह भी नए बने पाकिस्‍तान में नहीं गए। जो गए भी तो ज्‍यादातर अपनी जमीने वक्‍फ कर गए। यानी शेष भारत ने जमीन भी खोई और संस्‍कृति भी। स्‍वभाविक है अब ऐसे में भारत का चुप रहना बहुत खलता है!

ऐसे में आज कहना यही है कि नारोवाल के सिराज गांव में ढहाए गए मंदिर का मलबा केवल ईंट और गारे का ढेर नहीं है यह उस बहु-सांस्कृतिक और विविध भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का एक हिस्सा है जिसे पाकिस्तान धीरे-धीरे अपने हाथों से मिटा रहा है। किसी भी देश की महानता इस बात से ही आंकी जाती है कि वहां के सबसे कमजोर और अल्पसंख्यक नागरिक अपने को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं। वैसे इतिहास ने इस बात को कई बार बताया है कि जो समाज अपनी विरासतों को नष्ट कर देता है, वह अंततः अपनी पहचान भी खो बैठता है। पाकिस्‍तान भी फिलहाल उसी रास्‍ते पर चल रहा है, मगर इसमें भारत की अक्‍सर चुप्‍पी सबसे अधिक कष्‍टदायक है!

प्रोफेसर रिचर्ड अल्बर्ट आए थे, राम दास हो गए

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सिद्धार्थ अरोरा सहर

देहरादून : एक किस्सा सुन रहा था कि रिचर्ड अल्बर्ट करके हावर्ड के प्रोफेसर थे। वह एलएसडी ड्रग पर रिसर्च कर रहे थे।
ये एक किस्म की नशीली गोली होती है। अगर एक गोली गप्प कर लो तो आँखों की पुतली फैल जाती है। ब्लड प्रेशर तेज़ हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे दुनिया भर के रंगों की किसी ने सैचरैशन बढ़ा दी हो। समय क्या है, कब सुबह हुई कब रात, कुछ समझ नहीं आता।

एक गोली खाने के 20-30 मिनट बाद से ये असर शुरु होता है और नए-नए नशेड़ी को तो 24 घंटे तक परेशान करता है। पर नशेड़ी पुराना हो, रेगुलर हो तो भी 12 घंटे तो हवा में उड़ा ही देता है।
रिचर्ड अल्बर्ट यही गोली लेकर 1967 में नीम करौली बाबा से मिले थे। जैसे मैंने ऊपर एलएसडी की तारीफ़ें लिखी हैं, रिचर्ड ने इससे 10 गुणा ज़्यादा कसीदे पढ़े थे बाबा के सामने…
रिचर्ड ने अपनी किताब में लिखा कि बाबा नीम करौली ने उनके पास से सारी गोलियाँ लीं, कोई मुट्ठी भर तो होंगी; और एक बार में सारी फाँक गए।
रिचर्ड हैरान कि अब या तो इनको दिन में तारे नज़र आ जायेंगे, और या फि इतना ड्रग इनकी बूढ़ी बॉडी बर्दाश्त नहीं कर पायेगी और ये कोलैप्स हो जायेंगे।
लेकिन दोनों में से कुछ भी नहीं हुआ। नीम करौली बाबा अपनी जगह बने रहे, मुस्कुराते रहे।
उस दिन प्रोफेसर रिचर्ड अल्बर्ट ने नीम करौली बाबा को महाराजजी कहना शुरु कर दिया और पूरी तरह से उनकी शरण में चले गए। उस दिन रिचर्ड के तार्किक दिमाग ने घुटने टेक दिए और राम-दास का जन्म हुआ।
2019 में अपनी आखिरी साँस लेने तक वह राम दास ही रहे, खुश रहे, और योग साधना से जुड़े रहे।
नीम करौली बाबा को जानने वाले लोग ऐसे अनोखे किस्से बताते रहते हैं। इनपर बनी फ़िल्म हनुमान अंश अपने आप में एक चमत्कारी किस्सा है। ऐसा लग रहा है जैसे नीम करौली बाबा के भक्त सावन खत्म होने के इंतेज़ार में थे, कि रक्षाबंधन मनाएं और तब फ़िल्म देखने जाएँ।
मुझे लगा था कि हनुमान अंश को जितने भी शो मिल रहे हैं, वो टॉक्सिक के आते
ही ले लिए जायेंगे।
पर ताज्जुब देखिए, शनिवार और इतवार को टॉक्सिक के कोई 2000 और 2500
शो हनुमान अंश को दे दिए गए।
आज सोमवार को ये शिफ्टिंग का आँकड़ा 3000 से ऊपर रहा, 300 शोज़ से शुरु होने वाली हनुमान अंश आज कम से कम 7000 शो चलाकर 4 करोड़ से ऊपर का कलेक्शन कर रही है।
वहीं, विदेशी म्यूजिक, अत्यधिक शराब और सेक्स, बिना मतलब का खून खच्चर दिखाने वाली वर्ल्डक्लास सिनेमा बनाने की कोशिश में, पश्चिमी सिनेमा की नकल करती, 500 करोड़ की टॉक्सिक आज छः साढ़े छः करोड़ पर सिमट रही है।
ऐसा लग रहा है जैसे नीम करौली बाबा रिचर्ड की सारी नशीली गोलियाँ खा गए थे, वैसे ही यश की टॉक्सिक भी खा जायेंगे।
– सोशल मीडिया से साभार

मर रहा सूचना का अधिकार, निष्क्रिय हो देख रही है सरकार

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लखनऊ। सूचना का अधिकार आज खुद ही सांस के लिए संघर्ष कर रहा है और सरकार मूक दर्शक बनी हुई है। जो कानून आम आदमी को अफसर से सवाल पूछने की ताकत देता था, वह आज खुद अपनी सुनवाई का इंतजार कर रहा है। आंकड़े डराने वाले हैं। देश में उनतीस सूचना आयोग हैं, एक केंद्रीय और अट्ठाईस राज्यों के। जून, 2025 तक इन सभी में कुल चार लाख तेरह हजार नौ सौ बहत्तर अपील और शिकायतें पेंडिंग थीं। केंद्रीय सूचना आयोग की ही बात करें तो एक फरवरी, 2026 में सरकार ने राज्यसभा में बताया कि वहां उनतीस हजार चौंतीस अपील और तीन हजार पांच सौ सतहत्तर शिकायतें यानी कुल बत्तीस हजार छह सौ ग्यारह मामले लंबित हैं। अगस्त, 2026 में यह संख्या चालीस हजार पार कर गई, जब छत्तीस हजार तीन सौ पचास अपील और तीन हजार सात सौ तैंतीस शिकायतें पोर्टल पर दिखीं। इसका सीधा अर्थ है कि जिस व्यक्ति ने गांव के हैंडपंप, राशन कार्ड या छात्रवृत्ति के बारे में जानकारी मांगी, उसकी दूसरी अपील की सुनवाई दो साल बाद होगी। तब तक अधिकारी रिटायर हो चुका होगा और सवाल बेमानी हो जाएगा।

यह भीड़ मामलों की अधिकता से नहीं, कुर्सियां खाली रखने से बनी है। सरकार की सबसे बड़ी गैर जिम्मेदारी नियुक्तियां न करना है। अक्टूबर,2025  में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताया गया कि केंद्रीय सूचना आयोग में चीफ का पद 14 सितंबर, 2025  से खाली है और दस में से आठ आयुक्तों के पद खाली हैं। दस में से आठ कुर्सियां खाली हों तो काम कैसे चलेगा। राज्यों में स्थिति और खराब है। जुलाई, 2024 से अक्टूबर, 2025 के बीच 29 में से छह आयोग अलग अलग अवधि में पूरी तरह बंद रहे क्योंकि वहां कोई आयुक्त ही नहीं था। हिमाचल प्रदेश और झारखंड अक्टूबर, 2025 तक बंद थे। जब आयोग ही बंद रहेगा तो नागरिक कहां जाएगा। दूसरी वजह है पुरानी कार्यपद्धति। एक आयुक्त साल में औसतन अट्ठाईस सौ मामलों का निपटारा करता है, जबकि हर साल 30,000 से ज्यादा नए मामले आ जाते हैं। एक गड्ढा भरते ही दो नए खुद जाते हैं। इस गति से पेंडेंसी कभी खत्म नहीं होगी। कई राज्यों में सुनवाई में दो साल लग रहे हैं।

तीसरी वजह सबसे गंभीर है और वह है सरकार की मंशा। आरटीआई कानून की धारा चार एक बी में लिखा है कि हर विभाग को 17 तरह की जानकारी खुद ही वेबसाइट पर डालनी होगी। बजट, वेतन, विदेश यात्रा, सरकारी गाड़ी, बंगला, ठेके, सब्सिडी के लाभार्थी, सब कुछ। इसे स्वतः प्रकटीकरण कहते हैं। सोच यह थी कि जानकारी पहले से सार्वजनिक होगी तो आरटीआई की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। पर हकीकत में अस्सी फीसदी से ज्यादा विभाग इसका पालन नहीं करते। वेबसाइट पर दस साल पुराना डेटा पड़ा है या कुछ है ही नहीं। नतीजा एक ही सवाल पर हजारों आरटीआई आती हैं और आयोग दब जाता है। यह बोझ सरकार ने खुद बनाया है।

चार लाख से अधिक पेंडिंग मामले सिर्फ फाइल नहीं, चार लाख लोगों के टूटे भरोसे की कहानी हैं। इसी कानून से आदर्श सोसाइटी, कॉमनवेल्थ, टू जी जैसे घोटाले उजागर हुए। इसी से गरीब की पेंशन, छात्र की कॉपी, किसान का मुआवजा जैसे सवालों के जवाब मिले। जब सुनवाई दो साल बाद होगी तो अधिकारी को डर ही नहीं रहेगा। वह सोचेगा जानकारी रोक लूं, अपील होगी, दो साल टलेगा, तब तक मेरा तबादला हो जाएगा। यह डर खत्म होना भ्रष्टाचार की जीत है। सरकार अक्सर दुरुपयोग का आरोप लगाती है, पर सच्चाई यह है कि वह दुरुपयोग के बहाने उपयोग को ही खत्म कर रही है। नियुक्ति न करना, बजट न देना, स्टाफ न देना, यह कानून को बिना रद्द किए मारने की रणनीति लगती है।

इसे ठीक करने के लिए पांच ठोस कदम जरूरी हैं। पहला, नियुक्ति का तय कैलेंडर बने। जैसे यूपीएससी और चुनाव आयोग का कैलेंडर होता है, वैसे ही आयुक्तों का भी हो। कार्यकाल खत्म होने से तीन महीने पहले विज्ञापन निकले। पद तीस दिन से अधिक खाली रहे तो संबंधित सचिव की जवाबदेही तय हो। दूसरा, आयुक्तों की संख्या बढ़े और बेंच सिस्टम शुरू हो। दस आयुक्तों से पूरे देश का बोझ नहीं संभलेगा। संख्या पंद्रह की जाए और दो आयुक्तों की बेंच से सुनवाई हो ताकि रफ्तार बढ़े। तीसरा, धारा चार को असली आरटीआई बनाया जाए। हर विभाग को सत्रह बिंदुओं की जानकारी हर तीन महीने में अपडेट करनी अनिवार्य हो। इसका हर साल बाहरी एजेंसी से ऑडिट हो और रैंकिंग सार्वजनिक हो, जैसे स्वच्छता रैंकिंग होती है। सबसे खराब रैंक वाले विभाग के प्रमुख पर कार्रवाई हो। अगर जानकारी पहले से वेबसाइट पर होगी तो पचास फीसदी आरटीआई खुद ही खत्म हो जाएंगी।

चौथा, सुनवाई पूरी तरह ऑनलाइन और समयबद्ध हो। आज भी लोगों को सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग स्थायी हो और कानून में तय हो कि दूसरी अपील का निपटारा नब्बे दिन में होना ही चाहिए, जैसे उपभोक्ता अदालत में है। पांचवां, जुर्माने का डर वापस लाया जाए। धारा बीस में जन सूचना अधिकारी पर ढाई सौ रुपये रोजाना, अधिकतम पच्चीस हजार रुपये जुर्माना लगाने का प्रावधान है, पर आयोग इसका प्रयोग न के बराबर करते हैं। जब तक जेब से पैसा जाने का डर नहीं होगा, अधिकारी जानकारी नहीं देगा।

आरटीआई को कमजोर करने का असर केवल आयोग पर नहीं, पूरी शासन व्यवस्था पर पड़ता है। जब जानकारी समय पर नहीं मिलती तो योजनाओं में गड़बड़ी छुप जाती है। मनरेगा में मजदूरी, अस्पताल में दवा खरीद, स्कूल में मिड डे मील का हिसाब, सब कुछ अंधेरे में चला जाता है। गांव का आदमी थक कर चुप हो जाता है। यही चुप्पी सिस्टम चाहता है। सरकार को समझना होगा कि कई विभाग आरटीआई को टालने के लिए आवेदक को एक विभाग से दूसरे विभाग में भेजते हैं, धारा छह तीन के नाम पर तीस दिन और बढ़ा देते हैं। कई बार व्यक्तिगत जानकारी, धारा आठ एक जे का हवाला देकर हर सवाल को निजी बता दिया जाता है। मेडिकल बिल जैसी निजी जानकारी और सार्वजनिक खर्च में फर्क करना जरूरी है। अगर कुल खर्च बताया जाए तो निजता भी बचेगी और पारदर्शिता भी।

सुधार तभी संभव है जब सरकार इसे बोझ नहीं, मदद समझे। जो अधिकारी ईमानदार है, उसे तो आरटीआई से मदद मिलती है क्योंकि वह कह सकता है कि देखिए सब कुछ वेबसाइट पर है। जो बेईमान है, उसे ही डर लगता है। इसलिए ईमानदार अधिकारियों को पुरस्कृत किया जाए और धारा चार का पालन न करने वालों पर कार्रवाई हो। केंद्रीय सूचना आयोग की वेबसाइट पर हर विभाग की रैंकिंग, ऑडिट रिपोर्ट और लंबित मामलों की रोज की स्थिति लाइव दिखनी चाहिए ताकि जनता खुद निगरानी कर सके। आरटीआई किसी एक दल का कानून नहीं, जनता का कानून है। इसने आम आदमी को कलेक्टर के दफ्तर में जाकर हिसाब मांगने की हिम्मत दी। चार लाख तेरह हजार नौ सौ बहत्तर मामले यह बताते हैं कि जनता अब भी सवाल पूछना चाहती है, पर सरकार जवाब देने को तैयार नहीं। अगर सरकार पारदर्शिता की बात सच में मानती है तो उसे पहले सूचना आयोगों को जिंदा करना होगा, उन्हें स्टाफ, बजट और ताकत देनी होगी। नहीं तो इतिहास लिखेगा कि एक कानून था जिसने राजा से सवाल पूछने की ताकत दी थी और सरकार ने कुर्सियां खाली रखकर उस कानून को मार दिया।

Cinema as a Bridge Between India and Poland

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New Delhi: As part of Film Expo India 2026, the Polish Institute, in collaboration with the Embassy of the Republic of Poland in New Delhi, hosted a special conversation with H.E. Dr. Piotr Antoni Świtalski, Head of Mission of the Republic of Poland in India, focusing on the role of cinema, culture and creative collaboration in strengthening India–Polan -d relations.

The engaging conversation explored the immense potential of cinema as a platform for cultural dialogue and a catalyst for deeper engagement between the creative communities of the two countries. It brought into focus opportunities for filmmakers, cinematographers, artists and storytellers from India and Poland to connect, collaborate and develop new avenues of professional and cultural exchange.

The discussion also highlighted the possibilities of film co-productions, professional exchanges, institutional partnerships and greater visibility for Indian and Polish cinema in each other’s countries. With cinema transcending linguistic and geographical boundaries, the conversation underlined its unique ability to foster mutual understanding and bring people and cultures closer together.

India and Poland share a long and rich history of cultural engagement, and cinema has emerged as an important contemporary dimension of this relationship. From the enduring appreciation of Polish masters among Indian cinephiles to growing interest in Indian cinema in Poland, the cinematic dialogue between the two countries offers considerable scope for further expansion.

The Polish Institute remains committed to strengthening India–Poland cultural relations by creating meaningful platforms for creative exchange, facilitating professional engagement and bringing together artists and institutions from both countries.

The conversation at Film Expo India 2026 reaffirmed the belief that cinema is not merely a form of artistic expression, but also a powerful bridge between cultures, communities and nations.

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