1 मार्च 1924 : सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी गोपीनाथ साहा का बलिदान

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क्रूर और दुष्ट अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स ट्रेगार्ट को मौत के घाट उतारने का प्रयास

–रमेश शर्मा

पराधीनता के दिनों में कुछ अंग्रेज अधिकारी ऐसे थे जो अपने क्रूरतम मानसिकता के चलते भारतीय स्वाधीनता सेनानियों से अमानवीयता की सीमा भी पार जाते थे । बंगाल में पदस्थ ऐसा ही अधिकारी चार्ल्स ट्रेगार्ट था । जिसे मौत के घाट उतारने का निर्णय सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी गोपीनाथ साहा ने लिया । समय पर हमला बोला वह बच गया लेकिन एक अन्य नागरिक मारा गया जिस आरोप में साहा को फाँसी दी गई ।

यह घटना 1924 की है । बंगाल ही नहीं देश के विभिन्न भागों में क्राँतिकारी चरम पर था । अंग्रेज सरकार ने क्राँतिकारी आँदोलन का पूरी तरह दमन करने की रणनीति अपनाई इसके लिये खुफिया तंत्र मजबूत किया तथा कुछ विश्वासघात तलाश किये । जिनके माध्यम से पकड़े गए क्राँतिकारियों के साथ क्रूरतम व्यवहार करके जानकारी प्राप्त करने का अभियान चलाया । इसी रणनीति के अंतर्गत चार्ल्स टेगार्ट को बंगाल खुफिया विभाग के प्रमूख के रूप में पदस्थापना हुई । इसने पकड़ धकड़ शुरु की । सूचना ही नहीं संदेह के आधार पर पकड़े गए लोगों के साथ भी अमानुषिक व्यवहार करके जानकारी उगलवाने का प्रयास करता । विशेषकर महिला क्राँतिकारियों के साथ तो ऐसा व्यवहार करता था जिसका वर्णन तक नहीं किया जा सकता । अततः क्राँतिकारियों की संस्था युगान्तर पार्टी ने इस अधिकारी को रास्ते से हटाने का निर्णय लिया और यह काम क्राँतिकारी गोपीनाथ साहा को सौंपा।

गोपीनाथ साहा का जन्म पश्चिम बंगाल में हुगली जिला अंतर्गत ग्राम सरामपुर में 16 दिसम्बर 1901 को हुआ था । पिता विजय कृष्ण साहा का परिवार क्षेत्र में प्रतिष्ठित था । घर में भारतीय संस्कार और स्वाभिमान संपन्न जीवन का वातावरण था । बालक गोपीनाथ को आधुनिक शिक्षा के लिये विद्यालय भेजा । पर किशोर व्यय से ही सामाजिक जागरण की गतिविधियों से जुड़ गये । परिवार से संबंधित थे । उनका झुकाव क्राँतिकारी आँदोलन के प्रति था । उनका संपर्क भी बढ़ा। तभी1921 में असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ। युवा गोपीनाथ इससे जुड़ गए। लेकिन चौरी चौरा काँड के बाद गाँधी जी ने आँदोलन वापस ले लिया । इससे गोपीनाथ सहित युवाओं की पूरी टोली निराश हुई । और गोपीनाथ अपने पुराने मित्र देवेन डे, हरिनारायण और ज्योशि घोष के माध्यम से ‘युगान्तर दल’ में सक्रिय हो गए। उन्हीं दिनों कलकत्ता पुलिस की गुप्तचर शाखा प्रमुख के रूप में चार्ल्स टेगार्ट की पदस्थापना हुई । उसने क्रान्तिकारी आन्दोलन को सख्ती से दमन करने का अभियान चलाया और देशभक्तों पर बहुत ज़ुल्म ढाने लगा उसकी कार्यवाही पर न कोई अपील होती न कोई दलील । उसने संदेह के आधार पर भी अनेक लोगों को फाँसी पर चढ़ा दिया । इसके अतिरिक्त जिन लोगों का क्रान्तिकारियों से जुड़े होने का संदेह होता तो उनके परिवारों की महिलाओं के साथ भी नीचता की सीमा तक अमानुषिक व्यवहार करता था । तब ‘युगान्तर दल’ ने टेगार्ट का काम तमाम करने का निर्णय लिया और यह काम गोपीनाथ साहा को सौंपा।

गोपीनाथ साहा ने ट्रेगार्ट की गतिविधियों का अध्ययन किया और 12 जनवरी 1924 को चौरंगी रोड पर टेगार्ट को निशाना बनाने की योजना बनाई । वे इस मार्ग पर घात लगाकर बैठै और एक अंग्रेज को ट्रेगार्ट समझकर फायर किया । दुर्योग से ट्रेगार्ट ने एन बक्त पर अपना कार्यक्रम बदल लिया था और ट्रेगार्ट के स्थान पर उसका सहयोगी अर्नेस्ट डे आया । क्राँतिकारी गोपीनाथ ने उसे ट्रेगार्ट समझकर फायर कर दिया । अर्नेस्टम मारा गया । गोपीनाथ साहा ने भागने का प्रयत्न किया लेकिन पुलिस ने पीछा पकड़ लिया । उन पर मुक़द्दमा चला । 21 जनवरी 1924 को कोर्ट में पेश हुये उन्होंने बड़ी बहादुरी से अपना कृत्य स्वीकार किया और हिम्मत के साथ दो टूक शब्दों इस बात पर अफसोस जताया कि उनके हाथ से ट्रेगार्ट बच गया । लेकिन यह भी कहा कि मुझे विश्वास है कि कोई न कोई क्रान्तिकारी मेरी इच्छा अवश्य पूरी करेगा। अदालत ने उनके इस बयान पर 16 फरवरी को उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई। सजा सुनकर वे वे खिलखिलाकर हँसे और बोले मैं फाँसी की सज़ा का स्वागत करता हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरे रक्त की प्रत्येक बूंद भारत के प्रत्येक घर में आज़ादी के बीज बोए। एक दिन आएगा जब ब्रिटिश हुक़ूमत को अपने अत्याचारी रवैये का फल भुगतना ही पड़ेगा। और 1 मार्च 1924 को उन्हें फाँसी पर लटका दिया गया। तब उनकी आयु केवल 23 वर्ष की थी ।

स्वतंत्रता के क्राँतिकारी संघर्ष में अपना बलिदान देने के एक दिन पूर्व उन्होंने अपनी माँ को एक पत्र लिखा; तुम मेरी माँ हो यही तुम्हारी शान है। काश! भगवान हर व्यक्ति को ऐसी माँ दे जो ऐसे साहसी सपूत को जन्म दे। गोपीनाथ साहा ने जितने साहस और संकल्प से अपना बलिदान दिया इतिहास में उनका उल्लेख उतना ही कम है ।
शत शत नमन् ऐसे वीर क्राँतिकारी को

आज की चुप्पी, कल की बर्बादी

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गौतम कुमार सिंह

२०२० उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगे 23 फरवरी 2020 की रात से शुरू होकर, उत्तर पूर्व दिल्ली के जाफराबाद इलाके में रक्तपात, संपत्ति विनाश, दंगों और हिंसक घटनाओं की एक श्रृंखला थीं। इसमें 53 लोग मारे गए और 200 से अधिक लोग घायल हुए है।दिल्ली दंगे के दौरान गोकुलपुरी थाना क्षेत्र में मेन ब्रजपुरी रोड चमन पार्क स्थित मिठाई के गोदाम में युवक दिलबर नेगी की आग लगाकर की गई हत्या के मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने 11 लोगों को आरोप मुक्त कर दिया है. इन लोगों के खिलाफ आगे मुकदमा चलाने लायक समुचित साक्ष्य नहीं मिले. केवल एक आरोपी शाहनवाज उर्फ शानू के खिलाफ हत्या, आगजनी समेत कई आरोप तय किए गए हैं. देश की राजधानी दिल्ली के दामन पर कई बार दंगों के दाग लग चुके हैं. पिछले 10 सालों में इस पर नजर डालें तो 100 से अधिक ऐसे मामले सामने आए, जिसमें सांप्रदायिक दंगे भी शामिल हैं.

1984 के सिख दंगों के बाद दिल्ली में सबसे बड़ा सांप्रादायिक दंगा 2020 में हुआ था. 84 के सिख दंगों में 3 हजार से अधिक लोगों की जान गई थी. वहीं 2020 में कुल 53 लोगों की मौत हुई थी, जिसमें एक पुलिस कॉस्टेबल भी शामिल था.

दरअसल, दिलबर उत्तराखंड के पौढ़ी गढ़वाल के रोखड़ा गांव का रहने वाला था. वह घटना से 6 महीने पहले यहां आया था, जिस वक्त उसकी हत्या की गई, वह खाना खा रहा था. 11 आरोपियों को बरी करते समय कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान पर गौर किया और पाया कि उनमें से सभी 22 साल के दिलबर नेगी की हत्या की घटना से सीधे तौर पर संबंधित नहीं थे.

कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग समय के दंगों के वीडियो में कई आरोपियों की पहचान की गई थी, लेकिन इन 2 चश्मदीदों में से किसी ने भी वीडियो के आधार पर उनकी पहचान नहीं की. जिससे यह कहा जा सके कि ये आरोपी गोदाम में आग लगने से ठीक पहले गोदाम में एंट्री करते वक्त शानू के साथ थे. इसलिए शानू उर्फ शाहनवाज को छोड़कर अन्य आरोपी इस मामले में आरोपमुक्त किए जाने के हकदार हैं.

दिल्ली की एक अदालत ने 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में नौ लोगों को दोषी ठहराया है। अदालत ने कहा कि आरोपी व्यक्ति एक अनियंत्रित भीड़ का हिस्सा थे। इस भीड़ का उद्देश्य हिंदू समुदाय के लोगों की संपत्तियों को अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाना था। यह मामला दंगों के दौरान गोकुलपुरी इलाके में दंगे, आगजनी और तोड़फोड़ से संबंधित है। मामले में फैसला सुनाते हुए, अदालत ने कहा कि इस मामले में आरोपी व्यक्ति एक अनियंत्रित भीड़ का हिस्सा बन गए थे, जो सांप्रदायिक भावनाओं से प्रेरित थी।

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019, 11 दिसंबर 2019 को संसद ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2019 पारित कर दिया। राज्यसभा ने इसे 11 दिसंबर 2019 को पारित किया (पीआईबी लिंक) तथा लोकसभा ने 9 दिसंबर 2019 को विधेयक पारित किया।

नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन करने के लिए यह नागरिकता संशोधन विधेयक पहले 2016 में भी लोकसभा में पेश किया गया था। तब इस विधेयक को एक संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया था, जिसकी रिपोर्ट बाद में 7 जनवरी, 2019 को प्रस्तुत की गई थी। 8 जनवरी, 2019 को नागरिकता संशोधन विधेयक लोकसभा द्वारा पारित किया गया लेकिन 16वीं लोकसभा के विघटन के कारण वह विधेयक स्वतः समाप्त हो गया। इस विधेयक को 9 दिसंबर 2019 को 17वीं लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह द्वारा फिर से पेश किया गया। भारत के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह विधेयक अधिनियम बन गया।

इस अधिनियम में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों से संबंधित व्यक्तियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है। इस विधेयक का उद्देश्य किसी की नागरिकता छीनना नहीं बल्कि देना है।

राष्ट्रव्यापी विरोध इस विधेयक को लेकर अफवाहें उड़ाई गईं कि सीएए के बाद मुस्लिम अपनी नागरिकता खो देंगे। कई लोगों ने यह अफवाह भी फैलाई कि सीएए लागू होने के बाद मुसलमानों को डिटेंशन सेंटर में भेज दिया जाएगा। विधेयक पारित होते ही देश में सीएए विरोधी प्रदर्शन शुरू हो गया। पूरे देश से कई विरोध प्रदर्शनों की खबरें आईं लेकिन दिल्ली विरोध का प्रमुख केंद्र बन गया।

न्यायालय की टिप्पणी दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपी मोहम्मद इब्राहिम की जमानत अर्जी खारिज करते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि 2020 के दंगे पूर्व नियोजित थे।

पैरा 41- “फरवरी 2020 में देश की राष्ट्रीय राजधानी को हिला देने वाले दंगे स्पष्ट रूप से तात्कालिक नहीं थे, और वीडियो फुटेज में मौजूद प्रदर्शनकारियों का आचरण अभियोजन पक्ष द्वारा रिकॉर्ड पर रखा गया है वह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यह सरकार के कामकाज को अस्त-व्यस्त करने के साथ-साथ शहर में लोगों के सामान्य जीवन को बाधित करने का एक सोचा-समझा प्रयास था। सीसीटीवी कैमरों को व्यवस्थित रूप से डिसकनेक्ट करना और नष्ट करना भी शहर में कानून व्यवस्था को बिगाड़ने की पूर्व नियोजित साजिश की पुष्टि करता है। यह इस तथ्य से भी स्पष्ट है कि असंख्य दंगाई पुलिस अधिकारियों की संख्या से कहीं अधिक संख्या में मौजूद लोगों पर बेरहमी से लाठी, डंडा, बल्ला आदि लेकर टूट पड़े।”

पैरा 42- “… इस न्यायालय ने पहले लोकतांत्रिक राजनीति में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व पर राय दी है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दुरुपयोग इस तरह से नहीं किया जा सकता है जो सभ्य समाज को अस्थिर करने का प्रयास करके उसके मूल ढांचे को खतरे में डालता है और अन्य व्यक्तियों को चोट पहुंचाते हैं.

दिनांक 11.04.2022 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, कड़कड़डूमा अदालत ने अदालत के समक्ष एसपीपी द्वारा रखे गए प्रासंगिक सबूतों के आधार पर आरोपी शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी। एसपीपी ने अदालत में कहा कि, संरक्षित गवाह बॉन्ड ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत अपने बयान में अन्य बातों के अलावा कहा है कि उमर खालिद, शरजील, सैफुल इस्लाम और आसिफ तन्हा 13.12.2019 को जामिया विश्वविद्यालय परिसर में आए थे। उनकी मौजूदगी में उमर खालिद ने सभी प्रदर्शनकारियों के सामने कहा कि शरजील, सैफुल और आसिफ उनके भाई और उनकी टीम के सदस्य हैं। उमर खालिद ने कहा कि उन्होंने उन्हें चक्काजाम और धरने में अंतर समझाया है। उमर ने शरजील को शाहीन बाग में और आसिफ और सैफुल को जामिया यूनिवर्सिटी के गेट नंबर 7 पर चक्काजाम करने के लिए कहा। उमर खालिद ने कहा कि सही समय पर वे दिल्ली के अन्य मुस्लिम इलाकों में भी चक्काजाम करेंगे। उमर ने आगे कहा कि सरकार एक हिंदू सरकार है और मुसलमानों के खिलाफ है और उन्हें सरकार को उखाड़ फेंकना होगा और सही समय पर ऐसा करेंगे। 16.12.2019 को, उमर खालिद (सैफुल और आसिफ के साथ) और नदीम खान AAJMI के कार्यालय में आए और उनकी उपस्थिति में, उमर ने सैफुल और आसिफ से कहा कि जामिया समन्वय समिति (JCC) की स्थापना की जाए। नदीम खान ने कहा कि जेसीसी दिल्ली में विरोध प्रदर्शन और चक्काजाम का नेतृत्व करेगी। आसिफ और सैफुल उक्त सुझावों पर सहमत हुए और जेसीसी का गठन किया गया।

आरोपी शरजील के संदर्भ में एसपीपी ने यह भी उल्लेख किया कि, यहां यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि सीएए/एनआरसी का विरोध पूरे भारत में हुआ था लेकिन इस पैमाने के दंगे केवल दिल्ली में हुए थे। शरजील इमाम 13.12.2019 के अपने भाषण में दिल्ली को भारत की राजधानी होने का जिक्र करता है और उदाहरण देता है कि अगर एक फ्लाईओवर भी गिर गया तो पूरी दुनिया को पता चल जाएगा। इसके अलावा, संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को 24 फरवरी 2020 को दिल्ली का दौरा करना था। उसी दिन दंगे हो रहे थे जब संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति दिल्ली में थे और पूरी दुनिया की मीडिया इसे कवर करने के लिए वहां मौजूद थी। आरोप पत्र से यह महज़ संयोग प्रतीत नहीं होता। दरअसल, दंगे शुरू होने से पहले राष्ट्रपति के दौरे का जिक्र है। आरोपी उमर खालिद ने अपने अमरावती भाषण में विशेष रूप से 24 फरवरी 2020 को दिल्ली में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति की उक्त यात्रा का उल्लेख किया और इसे चारों ओर के मीडिया के साथ दुनिया को दिखाने की आवश्यकता बताई। विभिन्न गवाहों ने संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति की यात्रा की घोषणा के बाद बढ़ी हुई गतिविधि का भी उल्लेख किया। शरजील इमाम 23.01.2020 के अपने गया भाषण में फिर से दिल्ली में राजमार्गों की रुकावट का जिक्र करते हुए कहता है कि वे सरकार को पंगु बना देंगे। पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन का जिक्र करते हुए वह एक दिलचस्प संदर्भ देता हैं। उसका कहना है कि दिल्ली खास है क्योंकि यहां कुछ भी होगा तो पांच मिनट में अंतरराष्ट्रीय मीडिया पहुंच जाएगा, फायरिंग मीडिया में कवर हो जाएगी और इस तरह अगर सेना तैनात करनी पड़ी तो यह सरकार का अपमान होगा, मुसलमानों का नहीं। यह भी जोड़ना होगा कि जेसीसी, पिंजरा तोड़ और डीपीएसजी जैसे विभिन्न संगठन भी मूलतः दिल्ली के आयोजनों तक ही सीमित थे।

एसपीपी द्वारा रखे गए प्रासंगिक सबूतों के आधार दिनांक 24.03.2022 को दिए आदेश में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, कड़कड़डूमा अदालत ने आरोपी उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज कर दी। एसपीपी ने कहा कि, आरोप पत्र के अनुसार, 08.12.2019 को जंगपुरा कार्यालय में एक बैठक हुई, जिसमें योगेंद्र यादव, उमर खालिद, शरजील सहित अन्य लोगों ने भाग लिया। उक्त बैठक की एक तस्वीर भी दायर की गई थी। गवाह ताहिरा दाउद ने उक्त बैठक और चक्काजाम में पूर्ण समर्थन को लेकर योगेन्द्र यादव व उमर खालिद के निर्देश की बात कही थी। परिणामस्वरूप उसी दिन एक व्हाट्सएप ग्रुप “कैब टीम” का गठन किया गया। इसके सदस्यों में शरजील इमाम, उमर खालिद, योगेन्द्र यादव, नदीम खान, खालिद सैफी शामिल थे।

24 और 25 फरवरी 2020 के दौरान तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के दौरे पर थे। विश्व की सारी मीडिया का ध्यान दिल्ली पर था। ताहिर हुसैन, उमर खालिद, सरजील इमाम, खालिद सैफी और अन्य इस्लामिस्ट एवं शहरी नक्सलियों द्वारा एक साजिश रची गई थी। दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में कहा कि ट्रंप के दौरे के दौरान भारत को बदनाम करने के लिए ताहिर हुसैन, उमर खालिद ने दंगों की साजिश रची थी। आरोपपत्र के मुताबिक उमर खालिद ने वैश्विक प्रचार के लिए डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के दौरान दिल्ली दंगों को भड़काने की साजिश रची थी।
आरोप पत्र में आरोप लगाया गया, “साजिशकर्ताओं ने जो साजिश रची थी उसका अंतिम उद्देश्य था षड्यंत्र, आंतक एवं सांप्रदायिक हिंसा के इस्तेमाल से एक वैध रूप से चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकना।” “अगर साजिशकर्ता पूरी तरह से सफल हो गए होते, तो सरकार की नींव हिल गई होती, जिससे भारतीय लोगों को अनिश्चितता, अव्यवस्था और अराजकता का सामना करना पड़ाता तथा नागरिकों का राज्य से यह विश्वास उठ जाता कि राज्य उनके जीवन और संपत्ति की रक्षा कर सकता है।”
दिल्ली पुलिस ने हाई कोर्ट को बताया कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ शाहीन बाग में चल रहा प्रदर्शन प्राकृतिक या स्वतंत्र आंदोलन नहीं था। पुलिस ने कहा कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) शाहीन बाग और विभिन्न स्थानों के पीछे थे।
दिल्ली में हिंसा भड़काने में षड्यंत्र एवं व्यक्तियों की भूमिका निर्धारित करने के लिए मामले की पुलिस जांच में इस बात के पर्याप्त साक्ष्य सामने आए हैं जो बताते है कि भारत की राजधानी को दहलाने वाले दंगे पूर्व-नियोजित थे, बड़े पैमाने पर योजनाबद्ध थे और एक व्यापक साजिश का हिस्सा थे। आरोपपत्र में उल्लिखित एक आरोपी के फोन से प्राप्त व्हाट्सएप संदेश बिना किसी संदेह के दिल्ली में दंगे भड़काने की साजिश की योजना बनाने और उसे क्रियान्वित करने में उनकी संलिप्तता को साबित करता है। “घर में गरम खौलता हुआ पानी और तेल का इंतजाम करें, तेजाब की बोतल घर में रखे, कार-बाइक से पेट्रोल निकालकर रखे, बॉलकनी और छत पर ईंट-पत्थर रखें, लोहे के दरवाजों में स्विच से करंट का इस्तेमाल करें” ये कुछ वे मेसेज हैं जो दिल्ली में हिंसा की तैयारी के तहत व्हाट्सएप ग्रुपों में प्रचारित किए गए।

ये कानून का लेखन थोड़ा मुश्किल है, लेकिन विवरण थोड़ा है। लेकिन दंगा पीड़ित और जो लोग जिनको इन सब बातों से और अनलोगो के आंख में आंसू, बेगुनाह लोग ।

दिल्ली नहीं भूल पाई दंगों का दर्द

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– डॉ. राजीव प्रताप सिंह
सहायक प्राध्यापक, पत्रकारिता विभाग
आईएमएस कॉलेज, नोएडा

नागरिकता संशोधन क़ानून के आने से जो अल्पसंख्यक अपने ही देश में शरणार्थियों का जीवन जीने के लिए बाध्य थे, उन्हें अब नागरिकता मिल सकेगी और साथ ही वे समस्त नागरिक अधिकारों के साथ अपने धर्म, संस्कृति और परम्पराओं का पालन करते हुए अपना जीवन जी सकेंगे। इससे उन्हें न सिर्फ नागरिकता अपितु शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार इत्यादि में भी सहूलियत मिलेगी। इस प्रकार वे सम्मानपूर्वक अपना जीवन जी सकेंगे और भारत की अर्थव्यस्था में वे भी अपना योगदान दे सकेंगे।

पाकिस्तान और बांग्लादेश के इस्लामिक राज्यों में अल्पसंख्यकों की आबादी पिछले कुछ वर्षों में काफी कम हुई है, जिसके कुछ कारणों में या तो उन्हें मार दिया गया या उन्हें अपना धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य किया गया है। यही करना है कि वे अपने धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए शरणार्थी बनकर भारत आने के लिए मजबूर हुए। धार्मिक आधार पर भारत विभाजन और उसके बाद पाकिस्तान-बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए 1950 के नेहरु-लियाक़त समझौते के विफल होने के कारण आज हमें नागरिकता संशोधन विधेयक ले आने की आवश्यकता पड़ रही है। यदि यह विधेयक 50 वर्ष पहले ही आ गया होता तो यह स्थिति पैदा ही नहीं होती। नागरिकता संशोधन विधेयक हमारे घोषणा पत्र में था। भारत की जनता ने 2019 में एक शानदार जनादेश देकर इस विधेयक के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को सुनिश्चित किया। दिसंबर, 2019 में नागरिकता संशोधन विधेयक को सदन में पेश करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने अपने अभिभाषण में बहुत स्पष्ट ढंग से पटल पर विस्तार से इसके प्रावधानों की चर्चा की थी। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 का अभिप्राय अल्पसंख्यक समुदाय की नागरिकता रद्द करने से नहीं अपितु नागरिकता प्रदान करने से है।
विभाजन के बाद हमने स्वप्न देखा था कि भारत के साथ ही पडोसी देशों के अल्पसंख्यक समुदाय के लोग अपने नागरिक अधिकारों के साथ सम्मान पूर्ण जीवन जी सकें। वे अपनी धर्म, संस्कृति और परम्पराओं का सम्मान के साथ अनुपालन कर सकें। लेकिन जब पड़ोसी देशों के अल्प्संख्यक समुदाय के प्रताड़ित लोग भारत आए तो न तो उन्हें नागरिकता मिली, न ही नौकरी, स्वास्थ्य व शिक्षा इत्यादि की आधारभूत सुविधाएँ उन्हें प्राप्त हुई। ऐसी स्थिति में उनको मुख्य धारा में ले आने के लिए नागरिकता संशोधन कानून की आवश्यकता बढ़ जाती है।

सदन के पटल पर इतनी स्पष्टता से विधेयक के प्रावधानों को रखने के बाद भी आन्दोलन जीवियों, इस्लामिक कट्टरपंथियों और अर्बन नक्सल के एक बड़े समूह ने देश भर में ये दुष्प्रचार करने का काम जोरशोर से किया कि इस विधेयक के माध्यम से एक समुदाय विशेष की नागरिकता छीन जाएगी। देश भर में जिन स्थानों से आन्दोलन शुरू हुए, यदि हम उसकी भौगोलिक स्थति, समय और सामाजिक परिवेश का विश्लेषण करें तो एक समुदाय विशेष के ऐसे लोग जो भ्रमित थे, वे ही आन्दोलन में शामिल हुए। उनको आन्दोलन के षड़यंत्र का पता ही नहीं था। यदि आन्दोलन के समय का विश्लेषण करें तो उन्हीं दिनों दिल्ली में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का भारत दौरा होने को था। पूरी वैश्विक मीडिया का ध्यान उन दिनों भारत पर था। इस दौरान मुस्लिम भीड़ ने जमकर हिंसा की और इसमें दिल्ली पुलिस के जवान रतन लाल जी शहीद हो गए।

दिल्ली उच्च न्यायलय ने कहा कि यह दंगा पूरी तरह से सुनियोजित था। दिल्ली दंगा कट्टरपंथियों के दुष्प्रचार का परिणाम था। आम आदमी पार्टी के एक विधायक और सुन्नी वक्फ बोर्ड के तत्कालीन प्रमुख अमानतुल्ला खान को दिल्ली के जामिया नगर में दंगों का नेतृत्वा करते देखा गया था, इस दौरान भीड़ ने अनेक सरकारी संपत्तियों में आगजनी कर दी थी। इस दौरान अनेक दंगाइयों ने छुपने के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की शरण ले ली थी। आगजनी के बाद दिल्ली पुलिस ने विश्वविद्यालय परिसर में छुपे दंगाइयों को बाहर निकला। इसके साथ दंगे के समय ही आम आदमी पार्टी के एक पार्षद ताहिर हुसैन के घर की छत पर बड़ी मात्र में बम, गुलेल और पत्थर इत्यादि का मिलना ही इस बात का प्रमाण है कि ये दंगे सुनियोजित ढंग से कराए गए और कुछ आतताइयों के दुष्प्रचार का परिणाम मात्र था। इस दंगे में 53 लोगों की जान गई, जिसमें आईबी के अधिकारी अंकित शर्मा और दिल्ली पुलिस के जवान रतन लाल भी मारे गए।

आम आदमी पार्टी से सम्बन्ध अनेक नेताओं का दंगों की साजिश में शामिल होना, दिल्ली सरकार की प्रतिबद्धता पर भी आशंका उत्पन्न करने वाला है। सरकार से सम्बन्ध होने के नाते भीड़ को समझाने की बजे अफवाहें फ़ैलाने में इनके नेता लगे रहे और उनको वित्तीय मदद के गोला-बारूद भी उपलब्ध कराने का काम आम आदमी पार्टी के इन नेताओं ने किया। दिल्ली दंगों में अनेक परिवारों ने न सिर्फ अपना मकान खोया अपितु अनेक पीड़ितों ने अपने घर के सदस्यों को खो दिया। सरकार की तरफ से इस विधेयक के प्रावधानों को लेकर स्पष्ट मत आने के बाद भी अनेक कट्टरपंथियों ने इसके प्रति दुष्प्रचार फैलाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। नागरिकता संशोधन क़ानून के आने से जो अल्पसंख्यक अपने ही देश में शरणार्थियों का जीवन जीने के लिए बाध्य थे, उन्हें अब नागरिकता मिल सकेगी और साथ ही वे समस्त नागरिक अधिकारों के साथ अपने धर्म, संस्कृति और परम्पराओं का पालन करते हुए अपना जीवन जी सकेंगे। इससे उनके सामाजिक-आर्थिक जीवन में सकारात्मक परिवर्तन देखा जा सकेगा और साथ ही वे मुख्य धारा में जुड़ सकेंगे। इससे उन्हें न सिर्फ नागरिकता अपितु शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार इत्यादि में भी सहूलियत मिलेगी। इस प्रकार वे सम्मानपूर्वक अपना जीवन जी सकेंगे और भारत की अर्थव्यस्था में वे भी अपना योगदान दे सकेंगे।

अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनायीं आगरा के ‘ज्योति कथक केंद्र’ की नृत्यांगनाओं ने

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अनिल शुक्ला

हाल के कुछ सालों में आगरा में जिस शख्सियत का एक बड़ी कथक गुरु के रूप में उदय हुआ है वह हैं ज्योति खंडेलवाल। ज्योति जी ने आगरा को कथक के क्षेत्र में अखिल भारतीय स्तर पर पहचान दिलायी है। सदर बाज़ार स्थित ‘गोपीचंद शिवहरे गर्ल्स ईंटर कालेज’ के प्रांगण में शाम के सत्र में संचालित ‘ज्योति कथक केंद्र’ की उनकी शिष्याओं ने बीते सप्ताह खजुराहो में हुए नृत्य महोत्सव के स्वर्ण जयंती समारोह में अपनी प्रस्तुति से आगरा का नाम रोशन किया है।

खजुराहो प्रति वर्ष ‘अंतर्राष्ट्रीय नृत्य समारोह’ का आयोजन करता है। इस वर्ष 20 से 26 फरवरी के बीच होने वाला महोत्सव का यह 50 वां आयोजन था जिसे ‘स्वर्णजयंती समारोह’ का नाम दिया गया। इस समारोह में एक विशाल ‘कथक कुम्भ’ का आयोजन किया गया था जिसमें भारत के विभिन्न शहरों से आये कथक के 1500 कलाकारों ने भाग लेकर ‘गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में अपने नाम अंकित किया।

‘राग बसंत’ पर आधारित कथक की इस 20 मिनट की प्रस्तुति का निर्देशन कथक गुरु पंo राजेंद्र गंगानी ने किया था। इसमें ‘ज्योति कला केंद्र’ आगरा की आकांक्षा सिंह चौहान, मंजरी शर्मा, आरती शर्मा और अजित सिंह ने गुरु ज्योति खण्डेलवाल के निर्देशन में खजुराहो पहुंचकर नृत्य में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। ‘गिनीज़ बुक’ में अपनी गौरवमयी उपस्थिति से ‘केंद्र’ के बच्चे ज़बरदस्त तरीके से उत्साहित हैं। बच्चों और ज्योति जी को आगरा का नाम रौशन करने के उपलक्ष्य में ढेरों बधाई और शुभकामनाएं।

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