राहुल देव बनाम अखिलेश चौधरी: उपदेश का अहंकार या संवाद की गरिमा?

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दिल्ली। एक जमाने में पत्रकारिता खबर, संपादकीय और जिम्मेदारी का पेशा थी। आज वही पेशा कई बार सोशल मीडिया पर दिन-रात लिखने का नया रोजगार बन गया है। वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव इसी बदलाव के उदाहरण हैं। सवाल यह नहीं कि सोशल मीडिया मंच है या नहीं। सवाल यह है कि मंच पर शिक्षक बनकर बैठना और पूरे समाज को मंदबुद्धि कक्षा मान लेना पत्रकारिता है या नैरेटिव-निर्माण।

राहुल देव सोशल मीडिया पर स्कूल के उस मास्टर की तरह लिखते हैं, जिसे लगता है कि कक्षा के सारे बच्चे मंदबुद्धि हैं और वह जैसा झूठ-सच पढ़ा देगा, सब ‘यस सर’ कर देंगे। सोशल मीडिया पर यह चाल अच्छे-अच्छों की नहीं चली। अखिलेश चौधरी की शालीन, पर नुकीली टिप्पणी उसी चाल की सीमा दिखाती है।

कक्षा का मास्टर और एकतरफा नैरेटिव

राहुल देव लिखते हैं, “दरअसल आप जैसे हिंदूवादियों को समस्या अपने भीतर की कमजोरियों से है ही नहीं। उनका सामना करने की हिम्मत और बुद्धि भी नहीं है। सारा ध्यान दूसरे पर है।” आगे वे कहते हैं कि संविधान निर्माताओं ने अल्पसंख्यकों के लिए अलग प्रावधान किए, क्योंकि अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की स्थितियाँ अलग होती हैं। फिर आरोप यह है कि हिंदू अपनी संस्कृति की वैश्विकता और सहिष्णुता के गीत “रट्टू तोते की तरह” गाते हैं, विश्वगुरु बनने की “मूर्खतापूर्ण” बातें करते हैं, और अल्पसंख्यकों के साथ “अक्षम्य असहिष्णु, हिंसक, अपमानजनक” व्यवहार करते हैं।

सबसे भारी वाक्य यह है: “99% संघी या संघ-प्रभावित हिंदू अपने प्रमुखतम ग्रंथ भी नहीं पढ़ते इसलिए केवल मुस्लिम-घृणा को पोसते-बढ़ाते रहते हैं।” और चेतावनी-“वे भारत को दूसरे विभाजन और गृहयुद्ध की ओर धकेल रहे हैं।”

यह लेखन पत्रकारिता कम, नैतिक डांट ज्यादा है। “99 प्रतिशत”, “रट्टू तोते”, “मूर्खतापूर्ण”, “जगहँसाई”, “हिंदूवादी”, “संघी”—ये शब्द संवाद नहीं, पूरे समुदाय को एक लाठी से हाँकने का औजार हैं। जो व्यक्ति सम्यक् और सहिष्णु दृष्टि की बात करे, वह पहले अपनी भाषा में सम्यकता दिखाए। दूसरों के दोष देखने, उन्हें कोसने और आहत करने को राहुल देव सम्यक् दृष्टि नहीं मानते; लेकिन स्वयं वही करते हैं।

आंतरिक कमजोरियों से मुँह मोड़ना गलत हो सकता है। लेकिन सांस्कृतिक चिंता, इतिहास की स्मृति और समान कानून की माँग को सिर्फ “पड़ोसी के झगड़े सुलझाने” कह देना भी अधूरी बात है। स्वामी विवेकानंद से आधुनिक सुधारकों तक आंतरिक सुधार और सांस्कृतिक जागरूकता साथ- साथ चलते रहे। दोनों को एक-दूसरे का विरोधी बताना राहुल देव का निजी निष्कर्ष है, इतिहास का अंतिम सत्य नहीं।

अखिलेश के सवाल और असली सम्यक् दृष्टि

पेशे से शिक्षक सामाजिक कार्यकर्ता अखिलेश चौधरी “आदरणीय राहुल देव जी, सप्रेम प्रणाम” से शुरू करते हैं। सम्मान बनाए रखकर वे वही प्रश्न पूछते हैं जो एकतरफा लेखन छिपा देता है।

पहला-क्या स्वस्थ विमर्श में पूरे समाज या संगठन को “99 प्रतिशत”, “रट्टू तोते” और “मूर्खतापूर्ण” कहना तर्कसंगत है? दूसरा-क्या हिंदू समाज की ऐतिहासिक चिंताओं पर चर्चा केवल दूसरों के दोष देखना है? तीसरा-संविधान ने अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी, यह मान्य है; पर जब बहुसंख्यक समाज समान शासन और तुष्टिकरण-मुक्त पंथनिरपेक्षता माँगता है, तो उसे असहिष्णु और हिंसक करार देना कितना उचित है?

चौथा प्रश्न सबसे व्यावहारिक है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को सीधे “गृहयुद्ध” और “दूसरे विभाजन” की ओर धकेलने की आशंका समाधान है, या डर और अलगाव बढ़ाती है? पाँचवाँ-यदि सम्यक् दृष्टि बंधुता और सह-अस्तित्व है, तो क्या यह दायित्व सभी समुदायों पर समान नहीं होना चाहिए?

अंत में भाषा का प्रश्न आता है। “हिंदू” मूल संज्ञा है। उसके पीछे “वादी” लगाकर उसे संकीर्ण राजनीतिक ‘इज्म’ बना देना भाषाई न्याय नहीं, लांछन का औजार है। हिंदू, हिंदुत्व और हिंदूवादी को एक धरातल पर रखकर खारिज करना संवाद नहीं, वर्गीकरण है। ‘संघी’, ‘हिंदूवादी’, ‘रट्टू तोते’ जैसे संकीर्ण लेबल विमर्श खोलते नहीं, वैचारिक खाई और गहरा करते हैं।

यहीं राहुल देव की शिकायत उल्टी पड़ती है। वे कहते हैं कि घृणा भारत को विभाजन की ओर धकेल रही है। अखिलेश पूछते हैं-क्या स्वयं का सामान्यीकरण, अपमान और गृहयुद्ध का डर उसी दिशा में ईंधन नहीं डालता?

पत्रकारिता का पुराना फॉर्मूला था-एक नैरेटिव बदलो, पुष्पम-पत्रम मिल जाए। अब पाठक ‘यस सर’ नहीं कहता। वह पूछता है। अखिलेश चौधरी का लेखन इसी पूछने की संस्कृति है-विनम्र, सटीक और दोनों ओर दायित्व माँगने वाला। राहुल देव का लेखन उपदेश की पुरानी आदत है, जिसमें कक्षा का मास्टर अपनी बात को अंतिम सत्य मान बैठता है।

सम्यक् दृष्टि का अर्थ एक पक्ष को कोसना और दूसरे को संरक्षित घोषित करना नहीं। उसका अर्थ यह है कि भाषा गरिमा रखे, सामान्यीकरण से बचे, आंतरिक सुधार और सजगता को विरोधी न बताए, और बंधुता का पाठ सभी समुदायों को एक जैसा पढ़ाए। इस कसौटी पर अखिलेश के प्रश्न राहुल देव के निबंध से अधिक पत्रकारीय और अधिक लोकतांत्रिक हैं।

11वें मनु के कन्धे पर बन्दूक रखकर हिन्दू धर्म पर हमला करने वाले

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रंगनाथ

दिल्ली। मनुस्मृति आम्बेडकरवादियों द्वारा पढ़ा जाने वाला एक प्रमुख ग्रन्थ है। मनु कम्युनिस्ट दलों द्वारा नारों में याद किए जाने वाले इतिहास पुरुष हैं। मनुस्मृति हिन्दुओं का धार्मिक आधार ग्रन्थ नहीं है। वेद-उपनिषद-पुराण-महाभारत-रामायण में इस स्मृति का जिक्र नहीं मिलता है। न ही वैष्णव-शैव-शाक्त परंपरा के आधार ग्रन्थों में इसका जिक्र मिलता है। आदि शंकराचार्य ने भी इस पर कोई टीका नहीं लिखी है। इसकी पहली टीका 10वीं सदी के आसपास की मानी जाती है यानी वेदों की रचना के करीब तीन हजार साल बाद।

इस ग्रन्थ को जब हिन्दुओं पर ऊपर से थोपा जाता है तो कुछ भावुक या नादान हिन्दू इसकी रक्षा में कूद भी पड़ते हैं। इसकी एक ही वजह है कि पिछले दो सौ सालों में पहले ब्रिटिश मिशनरियों ने और फिर उनके द्वारा प्रमोटेड एंटी-हिन्दू विचारधाराओं ने मनुस्मृति का झूठ इतनी बार बोला कि हिन्दू समाज का एक वर्ग उसे बिना सोचे समझे सच के रूप में स्वीकार कर चुका है।

इस देश में केवल दो राजनीतिक धाराएँ हैं जो आज मनुस्मृति को याद करती हैं। एक मार्क्सवादी और दूसरे आम्बेडकरवादी। मनुस्मृति देश के किसी कोने में हिन्दुओं का सेंट्रल टेक्स्ट नहीं रहा है। स्मृति वाले मनु के पैदा होने से हजारों साल पहले पैदा हुआ आदि मनु को हिन्दू पहला मानव मानते हैं। उन मनु को भारतीय धर्मग्रन्थों में कई बार आदर्श के तौर पर याद किया गया है। एंटी-हिन्दू पॉलेमिक करने वाले जानबूझकर दोनों मनु को मिला देते हैं। हिन्दू धर्मशास्त्रों में एक दर्जन से ज्यादा मनु का उल्लेख मिलता है। हर मनु को स्मृति वाला मनु बताना मूलतः दूध में जहर मिलाकर पिलाने वाली चालबाजी है।

गुलाम बनने से पहले तक भारत ज्ञान-विज्ञान के अनुसंधान का देश रहा है। वैदिक काल, उपनिषद काल, इतिहास काल, पुराण काल, धर्मशास्त्र काल, स्मृति काल इत्यादि काल रहे हैं न कि एक दिन या साल। हिन्दू सभ्यता हजारों साल पुरानी है और उसमें सौ-सौ, दो-दो सौ साल तक खास तरह के ग्रन्थ लेखन का चलन चलता रहता है। जिस दौर में स्मृतियाँ लिखने का चलन शुरू हुआ उस दौर के कई विद्वानों ने स्मृतियाँ लिखीं। ये स्मृतियाँ वैसी ही थीं जैसी आज के प्रोफेसरों की किताबें। किसी प्रोफेसर ने किसी विषय पर अपनी राय लिख दी है इसका यह मतलब नहीं है कि उस प्रोफेसर के धर्म के लोगों ने उसे अपना सेंट्रल टेक्सट बना लिया है। यही कारण है कि आज भी 130 से ज्यादा स्मृतियों का जिक्र मिलता है जिनमें मनु-11, याज्ञवल्क्य, पराशर, नारद इत्यादि की स्मृति पर बाद में भी चर्चा होती रही।
मनु-11 इसलिए लिखा है ताकि लोगों को याद रहे कि स्मृति वाले मनु से पहले कम से कम 10 मनु हो चुके थे। मनु-11 को लेकर भी विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि उनकी जो स्मृति मिलती है उसमें काफी हिस्सा प्रक्षिप्त है। लोकप्रिय ग्रन्थों का प्रक्षिप्त तैयार कर देना तब भी चलता था। उसी तरह जैसे आज वास्तविक घटनाओं पर बनी फिल्मों में पात्रों के जाति और धर्म बदल दिए जाते हैं। कई काल्पनिक दृश्य डाल दिए जाते हैं। इतना ही नहीं किताबों पर बनी फिल्मों में भी मनमाने जोड़घटाव कर दिए जाते हैं।

आप ध्यान दें तो देख सकते हैं कि भारतीय ग्रन्थों में जिस हिस्सों पर ज्यादा विवाद है, उन्हें कई विदेशी विद्वानों ने भी बाद में जोड़ा गया माना है। जैसे कि मूल रामायण भगवान राम के अयोध्या वापसी पर समाप्त हो जाती है। फिर उसमें उत्तर-काण्ड (Post Chapter) काफी समय बाद जोड़ा गया और भगवान राम से जुड़े ज्यादातर प्रमादों का आधार वही उत्तर-काण्ड है। इस विवादित अध्याय को जोड़ने वाले इतनी सत्यवादिता दिखायी कि चैप्टर का नाम पोस्ट चैप्टर रखा ताकि लोगों को पता चले कि यह बाद में जोड़ा गया है। मगर आज के विद्वान इतनी भी ईमानदारी नहीं दिखाते। उसी तरह मनु-11 के स्मृति को लेकर भी विद्वानों के बीच मतभेद है कि इसके विवादित अंशो की विचारात्मक-भावनात्मक-भाषाई संगति अन्य प्रशंसित अंशों से नहीं मिलती है।

अब यह लगभग निर्विवाद तथ्य है कि मनुस्मृति को भारत में स्थापित करने का काम कोलकाता हाईकोर्ट से शुरू हुआ जिसकी जड़ में ईसाई माइंडसेट है। ईसाई जजों को हिन्दुओं की बाइबिल चाहिए थी। उन्होंने सबसे विद्वान जानकर कुछ पण्डितों से सम्पर्क किया। उन पण्डितों ने वह किताब पकड़ा दी जिसमें पण्डितों को सर्वोच्च बताया गया था। ईसाई शाशकों ने मनु-11 की किताब को हिन्दू-लॉ कहना शुरू कर दिया जबकि हाल-फिलहाल तक हिन्दू समाजों में ऐसे फैसले पंचायत या खाप करती रही है न कि कोई किताब। ऐसा भी नहीं है कि एक जाति की पंचायत दूसरी जाति के फैसले करती रही है। जाति के मामले जाति की पंचायतें तय करती रही हैं और परस्पर सम्बन्ध रखने वाले मामले सामुदायिक पंचायतों में तय होते थे।

ईसाइयों शासकों के लिए यह समझना मुश्किल था कि वेद-उपनिषद-इतिहास(रामायण-महाभारत) इत्यादि पीनल कोड और सिविल कोड नहीं हैं। सही  मायनों में ये सारे धर्म हिन्दुओं के धर्म के भी आधार नहीं हैं क्योंकि हिन्दू धर्म अनुपालन (प्रैक्टिस) से आगे बढ़ता है, उपदेश से नहीं। ये सारे ग्रन्थ हिन्दू धर्म के सबसे शिक्षित वर्ग की देन हैं मगर आम हिन्दू जीवन में एक बार भी वेद-उपनिषद-रामायण-महाभारत के दर्शन किए बिना हिन्दू बना रहता है। इन ग्रन्थों की एक भी लाइन जाने बिना भी वह दैनिक जीवन में धार्मिक हिन्दू बना रह सकता है। आप कह सकते हैं कि हिन्दू धर्म वैयक्तिकता का चरम है।

उत्तर भारत में सबसे प्रसिद्ध हिन्दू ग्रन्थ रामचरितमानस है जो 15वीं सदी का है। आगे जाकर हो सकता है कि कोई अन्य ग्रन्थ हिन्दुओं के बीच लोकप्रिय हो जाए।  बाइबिल ईसाई रिलीजन का सेंट्रल टेक्स्ट है। बाइबिल के गलत साबित होते ही रिलीजन का आधार खिसक जाता है। यही कारण है कि यूरोपीय प्रबोधन काल में बाइबिल की जमकर आलोचना हुई। कुछ ब्राह्मणों ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए ईसाई जजों को मनुस्मृति पकड़ायी और उसके बाद इस टेक्स्ट को अकादमिक जगत हिन्दू-लॉ के रूप में स्थापित करने के बाद इसे इस तरह प्रस्तुत किया जाने लगा जैसे यह हिन्दुओं का बाइबिल हो! फिर इसका खण्डन-मण्डन शुरू हुआ।

आधुनिक समय में मनु-11 की स्मृति को जिन्दा रखने का काम डॉ. आम्बेडकर ने किया। डॉ. आम्बेडकर इंग्लिश मीडियम में पढ़े लिखे थे और उनका हिन्दू धर्म का ज्यादातर ज्ञान इंग्लिश अनुवादों पर आधारित था। डॉ. आम्बेडकर ने मनुस्मृति को ब्राह्मण-वर्चस्व के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया और उसके बाद से मनु-11 की स्मृति मूलतः आम्बेडकरवादियों द्वारा याद किया जाने वाला ग्रन्थ बनकर रह गयी। आम हिन्दू का इस ग्रन्थ से कोई लेना-देना नहीं है। वह न इसे पढ़ता है और न ही इसे घर में रखता है और न पूजता है। इसके कुछ सकारात्मक श्लोक विमर्श या डिबेट प्रतियोगिताओं में इस्तेमाल होते हैं। उसी तरह जैसे कई यूरोपीय लेखकों के कोटेशन इस्तेमाल होते हैं।

हिन्दू “मनु-11-वादी” होते हैं यह लांछन है जो हिन्दुओं पर थोपा जाता है। राहुल गांधी ने जिस तरह मनु-11-स्मृति का प्रयोग किया उससे केवल इतना पता चलता है कि उनके सलाहकारों में इस समय आम्बेडकरवादी और मार्क्सवादी हावी हैं। राहुल गांधी के समर्थक बुद्धिजीवी कहेंगे कि राहुल जी ने हिन्दुओं को नहीं बल्कि हिन्दुत्ववादियों को मनु-11-वादी कहा है! मगर यही बुद्धिजीवी यह नहीं बताएँगे कि महज हिन्दू होने के कारण गांधी-नेहरू-इंदिरा को मनु-11-वादी कहा जा चुका है और उन्हीं आम्बेडकरवादियों और मार्क्सवादियों ने कहा है जो आज राहुल जी के सलाहकार बने हुए हैं।

राहुल जी के सलाहकार यह भी भूल गये कि जिन कोटेशन को उन्होंने स्क्रीन पर दिखाया उनके जैसे कोटेशन दूसरे रिलीजने के सेंट्रल टेक्स्ट में पाए जाते हैं जिनकी आलोचना के बाद उन रिलीजन की जड़ उखड़ जाएगी। चूँकि मेरे फेसबुक में राहुल जी के प्रशंसक काफी संख्या में हैं, इसलिए ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा। उनकी अपनी राजनीति है, वह जैसे चाहे करें। मेरा ध्येय मनु-11 के बारे में कुछ तथ्य रखने थे क्योंकि कई महान संपादक भी आदि मनु और 11वें मनु के बीच फर्क किए बिना भी मिलियन व्यूज ला रहे हैं।

— सोशल मीडिया से साभार

मेरिट का मान, मेहनत का सम्मान, मानवता का मान

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लखनऊ। इस देश का हर नागरिक चाहता है कि जब वह अस्पताल जाए तो उसे सबसे अच्छा डॉक्टर मिले, जब उसका बच्चा स्कूल जाए तो उसे सबसे योग्य शिक्षक पढ़ाए, जब वह अदालत में न्याय मांगने जाए तो सबसे अनुभवी जज उसकी बात सुने और जब देश की सीमा पर खतरा हो तो देश की रक्षा सबसे सक्षम सैनिक के हाथों में हो। यह मांग किसी जाति, धर्म या वर्ग की नहीं है, यह हर भारतीय की स्वाभाविक मांग है।
इसी मांग के कारण भारत सरकार ने कुछ संस्थानों को आरक्षण से मुक्त रखा है। सेना में आरक्षण नहीं है, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति में आरक्षण नहीं है, इसरो और डीआरडीओ जैसे वैज्ञानिक संस्थानों में आरक्षण नहीं है और आईएएस, आईपीएस की वरिष्ठ पदोन्नति में भी आरक्षण नहीं है। सवाल यह है कि इन संस्थानों को ही क्यों अलग रखा गया?
इसका उत्तर एक ही शब्द में है – मेरिट, यानी योग्यता।
सरकार का तर्क बिल्कुल साफ है। सरकार कहती है कि रक्षा का मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा है। वहां शारीरिक फिटनेस, मानसिक मजबूती और नेतृत्व क्षमता चाहिए। वहां अगर योग्यता से समझौता किया गया तो कीमत पूरे देश को चुकानी पड़ेगी। न्यायपालिका के बारे में तर्क है कि जज का एक फैसला मिसाल बनता है, वह लाखों लोगों का भविष्य तय करता है। वहां अनुभव और कानून की गहरी समझ चाहिए, वहां आरक्षण से न्याय की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। इसरो और डीआरडीओ के बारे में कहा जाता है कि वे रॉकेट बनाते हैं, मिसाइल बनाते हैं। वहां एक छोटी सी गलती करोड़ों रुपये और देश की सुरक्षा दोनों को खतरे में डाल सकती है। इसलिए वहां भी योग्यता को ही सबसे ऊपर रखा गया है।
अब एक सीधा सा सवाल मन में उठता है। अगर देश की सुरक्षा के लिए योग्यता जरूरी है, तो देश की शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और विकास के लिए योग्यता जरूरी क्यों नहीं है? क्या एक गरीब आदमी के जीवन में डॉक्टर की भूमिका सैनिक से कम है? क्या एक बच्चे के भविष्य में शिक्षक की भूमिका वैज्ञानिक से कम है? क्या एक जिले के कलेक्टर की भूमिका किसी जज से कम महत्वपूर्ण है?
नहीं, बिल्कुल नहीं।
जब हम मान लेते हैं कि कुछ जगहों पर मेरिट से समझौता देश के लिए खतरनाक है, तो हमें यह भी मानना होगा कि हर जगह पर मेरिट से समझौता देश के लिए खतरनाक है। जनता को योग्य जन-सेवक चाहिए, सिर्फ जन-सेवक नहीं।
आज हमारे देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है? चुनौती यह है कि सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता पर आम आदमी का भरोसा कम हो रहा है। लोग सरकारी स्कूल की जगह प्राइवेट स्कूल में जाना चाहते हैं, सरकारी अस्पताल की जगह प्राइवेट अस्पताल में जाना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि वहां उन्हें योग्यता दिखती है। अगर सरकारी विभागों में भी शत-प्रतिशत योग्यता के आधार पर नियुक्ति होगी, तो यह भरोसा वापस आएगा।
मेरिट के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क समानता का है। हमारे संविधान की प्रस्तावना में लिखा है – हम भारत के लोग, समता का अधिकार। समता का मतलब है सबको समान अवसर मिलना। आरक्षण समान अवसर नहीं देता, वह परिणाम को पहले से तय कर देता है। मेरिट समान अवसर देता है। मेरिट में दौड़ सबके लिए खुली है। अमीर हो या गरीब, अगड़ा हो या पिछड़ा, सब एक ही रेखा पर खड़े होते हैं और जो सबसे तेज दौड़ता है, वह जीतता है। यह सच्ची समानता है। इसमें किसी के साथ भेदभाव नहीं होता।
दूसरा तर्क है देश की प्रगति का। 21वीं सदी प्रतिस्पर्धा की सदी है। दुनिया में वही देश आगे बढ़ रहा है जो अपने सबसे योग्य लोगों को आगे ला रहा है। अमेरिका, जापान, जर्मनी, इजरायल जैसे देशों ने विज्ञान और तकनीक में जो तरक्की की है, उसका एक ही राज है – उन्होंने हर पद पर सबसे योग्य व्यक्ति को बैठाया। अगर भारत को विश्वगुरु बनना है, विकसित भारत बनना है, तो हमें भी अपने हर विभाग में इसरो और डीआरडीओ वाला मॉडल अपनाना होगा। जहां योग्यता ही एकमात्र पैमाना हो।
तीसरा तर्क है सामाजिक समरसता का। आरक्षण व्यवस्था ने अनजाने में ही समाज को बांट दिया है। आज नौकरी के फॉर्म में सबसे पहले जाति पूछी जाती है, योग्यता बाद में। इससे युवाओं के मन में एक-दूसरे के प्रति कटुता पैदा होती है। जो युवा दिन-रात मेहनत करके 90 प्रतिशत अंक लाता है और फिर भी चयन से वंचित रह जाता है, उसके मन में निराशा आती है। और जो युवा आरक्षण के सहारे चयनित होता है, उसे भी जीवन भर यह सुनना पड़ता है कि वह योग्य नहीं है। दोनों ही स्थितियों में नुकसान समाज का ही है। अगर चयन सिर्फ मेरिट से होगा, तो न कोई खुद को कमजोर समझेगा, न कोई दूसरे को कम आंकेगा। सबको लगेगा कि जो मिला है, वह अपनी मेहनत से मिला है।
चौथा तर्क है गरीबी को सही मायने में खत्म करने का। अक्सर कहा जाता है कि आरक्षण गरीबों के लिए है। लेकिन सच्चाई यह है कि जाति के आधार पर दिया गया आरक्षण गरीबी को खत्म नहीं करता, वह गरीबी को जाति से जोड़ देता है। आज जरूरत है आर्थिक आधार पर मदद की। अगर किसी भी वर्ग का बच्चा गरीब है, उसे किताबें नहीं मिल रही, कोचिंग नहीं मिल रही, तो सरकार उसे पढ़ने के लिए पैसा दे, छात्रवृत्ति दे, हॉस्टल दे। उसे दौड़ने के लिए जूते दो, लेकिन दौड़ में उसे पहले ही विजेता घोषित मत करो। अगर हम आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को मजबूत करेंगे, तो वह मेरिट की दौड़ में खुद-ब-खुद आगे आ जाएगा। यही सच्चा सामाजिक न्याय होगा।
कुछ लोग कहते हैं कि हजारों साल के भेदभाव की भरपाई आरक्षण से ही होगी। यह बात भावनात्मक रूप से सही लगती है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका उल्टा असर हो रहा है। पिछले 75 सालों से आरक्षण लागू है, लेकिन क्या जातिवाद खत्म हुआ? नहीं, बल्कि जाति की पहचान और गहरी हो गई है। क्योंकि जब भी सरकारी लाभ जाति के आधार पर मिलेगा, लोग जाति को और मजबूती से पकड़ कर रखेंगे। अगर हम सच में जातिविहीन समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें जाति के आधार पर लाभ देना बंद करना होगा। योग्यता के आधार पर चयन ही जाति को अप्रासंगिक बना सकता है।
सेना, न्यायपालिका और इसरो ने हमें रास्ता दिखा दिया है। उन्होंने साबित कर दिया है कि जब चयन योग्यता से होता है, तो संस्थान दुनिया में नाम कमाते हैं। भारतीय सेना दुनिया की सबसे अनुशासित सेनाओं में से एक है। इसरो ने कम लागत में मंगलयान भेज कर दुनिया को चौंका दिया। सुप्रीम कोर्ट पर आज भी देश के लोगों का सबसे ज्यादा भरोसा है। इन तीनों की सफलता का एक ही मंत्र है – योग्यता से कोई समझौता नहीं।
तो क्यों न हम इस मंत्र को पूरे देश में लागू करें? क्यों न हर सरकारी नौकरी में, हर प्रमोशन में, हर कॉलेज में एडमिशन में सिर्फ और सिर्फ मेरिट को आधार बनाया जाए?
इसका लाभ सीधे जनता को मिलेगा। जब ब्लॉक में सबसे योग्य अधिकारी बैठेगा, तो गरीब की पेंशन समय पर बनेगी। जब सबसे योग्य इंजीनियर पुल बनाएगा, तो पुल गिरेगा नहीं। जब सबसे योग्य डॉक्टर अस्पताल में होगा, तो मरीजों को इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। जनता को जाति का अधिकारी नहीं चाहिए, जनता को योग्य अधिकारी चाहिए।
इसलिए अब समय आ गया है कि हम खुल कर इस पर चर्चा करें। उन तर्कों को, जिनके आधार पर सेना और इसरो को आरक्षण से मुक्त रखा गया है, उन्हीं तर्कों को पूरे सिस्टम पर लागू किया जाए। देश की सुरक्षा जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण देश की शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासन भी है।
हमें एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जहां किसी युवा से यह नहीं पूछा जाए कि तुम किस जाति के हो, बल्कि यह पूछा जाए कि तुममें क्या योग्यता है। जहां नौकरी जाति देख कर नहीं, प्रतिभा देख कर मिले। तभी हम जनता को सच में योग्य जन-सेवक दे पाएंगे और तभी बाबा साहेब अंबेडकर का वह सपना पूरा होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि हम एक ऐसा समाज बनाएंगे जहां हर व्यक्ति को उसकी योग्यता के अनुसार सम्मान मिलेगा।

तथ्य जाँच सेंसरशिप नहीं होती—पेंग्विन का सवाल सामान्य है, शोर असामान्य

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दिल्ली। सोनिया गांधी की आत्मकथा Belonging: A Journey of Love पर पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया का रुख राजनीतिक साजिश नहीं, प्रकाशन की साधारण प्रक्रिया है। किताब का अंतरराष्ट्रीय संस्करण 10 नवंबर को अल्फ्रेड ए. नॉफ के जरिए आना है। भारत में पेंग्विन से जुड़े सूत्रों की बात इंडियन एक्सप्रेस ने छापी कि पांडुलिपि के एक हिस्से में संपादकीय बदलाव और कुछ अंश हटाने की माँग की गई थी, जिसे लेखिका ने नहीं माना।

पेंग्विन का जवाब साफ है। कंपनी ने कहा कि वह भारत में इस किताब की प्रकाशक नहीं है। यह कहना गलत है कि लेखिका के इनकार के कारण उन्होंने छापने से मुँह मोड़ लिया। तथ्य जाँच करना प्रकाशक का अधिकार भी है, जिम्मेदारी भी। चर्चाओं के दौरान वे किताब छापने के लिए तैयार रहे।

यह रुख ठीक है। जिम्मेदार प्रकाशक ऐतिहासिक-राजनीतिक संस्मरण छापने से पहले कानूनी जाँच और संदर्भ माँगता है। भारत में मानचित्र की गलत सीमाएँ दिखाना कानूनी जोखिम बन सकता है। पेंग्विन ने अन्य किताबों में भी यही किया है। लेखक का काम है प्रकाशक को संतुष्ट करना। तथ्य सही हैं तो संदर्भ दें। विवाद का कोई और पहलू है तो स्पष्टीकरण दें। छपने के बाद संशोधन करवाना भी आम बात है।

प्रकाशक पर सोशल मीडिया अभियान चलाकर दबाव बनाना गलत है। प्रकाशक विरोधी दल नहीं, व्यावसायिक संस्था है। दबाव से तथ्य नहीं सुधरते।

एक आशंका है। नवंबर की रिलीज से पहले “पेंग्विन ने मना कर दिया” वाला विवाद मुफ्त प्रचार है। दूसरे प्रकाशकों के नाम की चर्चा भी उसी दिशा में जाती है। लेखक-प्रकाशक की मिलीभगत से बिक्री बढ़ाने वाला हथकंडा प्रकाशन जगत में नया नहीं। प्रमाण नहीं है, संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता।

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