भारतीय ज्ञान परम्परा, शिक्षा, समाज व्यवस्था और सांस्कृतिक चिंतन पर हुआ गंभीर विमर्श

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नई दिल्ली। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए), नई दिल्ली के भारत विद्या प्रयोजना विभाग द्वारा समवेत सभागार में श्री आशीष गुप्ता द्वारा संपादित ‘श्री रविन्द्र शर्मा गुरुजी समग्र’ के लोकार्पण एवं विमर्श का आयोजन किया गया। इस एकदिवसीय कार्यक्रम में विद्वानों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों तथा संस्कृति-जगत से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रख्यात विचारक श्री सुरेश सोनी ने कहा, “हमारे यहां पर कहा गया कि तीन स्तर पर जीवन चलता है हमारा। एक अनुभूति का धरातल रहता है, दूसरा विचार का धरातल रहता है और तीसरा व्यवहार का धरातल रहता है। और फिर हमारे यहां तीनों में कोई भेद नहीं है। जो अनुभूति में है, वही विचार में व्यक्त है और जो विचार में है, वो व्यवहार में व्यक्त है। और गुरुजी उसे व्यवहार के अंदर बता रहे हैं। वो जो व्यवहार में बता रहे हैं, वो हमारे विचारों में भी व्यक्त है और वो हमारे पूर्वजों की अनुभूतियों में भी व्यक्त है। यह निरंतरता में है।”

जीवन में विज्ञान और दूसरे पक्षों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “जीवन समग्रता में है और विज्ञान एक पहलू है उसका। कला-संगीत अगर उसके साथ नहीं है, तो उसमें अधूरापन है।” रवींद्र शर्मा ‘गुरुजी’ को उद्धृत करते श्री सुरेश सोनी ने कहा, “गुरुजी दो वाक्य कहा करते थे कि छोटी टेकनोलॉजी मालिक बढ़ाती है समाज में और बड़ी टेकनोलॉजी नौकर बढ़ाती है- यह पहला वाक्य था उनका। दूसरा था, छोटी टेकनोलॉजी को समाज व्यवस्थित करता है। बड़ी टेकनोलॉजी समाज को व्यवस्थित करती है। मेरे ब्रांड में आओ, मेरे डिजाइन के अंदर आओ, मेरे मॉडल के अंदर तुम सामंजस्य बढ़ाओ। वो मालिक हो जाता है।”

उन्होंने कहा, गुरुजी ने जो बातें कही हैं, वो केवल शब्द नहीं है, केवल बौद्धिक व्यायाम नहीं हैं, वो एक जीता जागता एक अनुभूत जीवन है। यह जो उनका समग्र वाङ्मय बना है, इसका प्रचार-प्रसार हो और हम सब मिलकर इसको अधिक से अधिक आगे बढ़ा सकें, इसके लिए परमात्मा हमको सामर्थ्य दे।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, “विचार की दृष्टि से, चिंतन की दृष्टि से जब हम भारतीय ज्ञान परम्परा की बात कहते हैं तो इसक संदर्भ सिर्फ पाठ्यक्रमों तक सीमित न रहकर जीवन में कैसे उतर सकता है, यह गुरुजी का पूरा वाङमय और गुरुजी का जीवन दर्शन बताता है। आने वाले समय में निश्चित तौर पर इसकी बहुत अधिक आवश्यकता भी है, क्योंकि जैसे-जैसे पूरे विश्व में चुनौतियां बढ़ती चली जा रही हैं, वैसे-वैसे हमें सबको यह आभास होने लगा है कि जो हमारी भारत की पारम्परिक जीवनशैली है, जिसमें आपका प्रकृति से तादात्म्य होता है और इसीलिए जो प्रकृति प्रदत्त अनुशासन है, जो हमें हमारे जीवन का मार्ग दिखाता है, वही आने वाले समय में न सिर्फ भारत को बल्कि संपूर्ण विश्व को राह दिखाने वाला है। अगर इस संदर्भ में गुरुजी का वाङमय, गुरुजी का विचार दर्शन कहीं सहायता करता है तो हमें उसकी सहायता निश्चित तौर पर लेनी चाहिए।” आईजीएनसीए के कलाकोश के विभागाध्यक्ष और भारत विद्या प्रयोजना के निदेशक प्रो. (डॉ.) सुधीर लाल ने पूरे दिन के विमर्श का सार प्रस्तुत किया।

इससे पूर्व, उद्घाटन सत्र में प्रो. (डॉ.) सुधीर लाल ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। उद्घाटन सत्र में जहां श्री रविन्द्र शर्मा ‘गुरुजी’ के जीवन, कार्यों और विरासत पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘क्रांतदर्शी गुरुजी’ के टीजर लॉन्च किया गया, वहीं इस एकदिवसीय आयोजन का समापन इसी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डॉक्यूमेंट्री फिल्म के प्रदर्शन के साथ हुआ।

जीविका आश्रम के श्री आशीष गुप्ता ने संपादकीय वक्तव्य देते हुए गुरुजी के चिंतन की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह तथा विशिष्ट अतिथि केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने अपने उद्बोधनों में भारतीय चिंतन पर आधारित शिक्षा मॉडल, स्वदेशी ज्ञान-विज्ञान और सांस्कृतिक स्वाभिमान के महत्व को रेखांकित किया।

इस अवसर पर ‘भारत गाथा’ एवं ‘भारत कथा’ शृंखला के 15 खंडों का औपचारिक लोकार्पण मंचासीन अतिथियों ने किया। उद्घाटन सत्र के उपरांत आयोजित कार्यशाला के प्रथम सत्र ‘भारत गाथा’ में श्री रविन्द्र शर्मा गुरुजी के विचारों पर आधारित वीडियो प्रस्तुति दिखाई गई। इसके बाद ‘शिक्षाविधि, प्रौद्योगिकी, घर-व्यवस्था’ विषय पर गांधी आश्रम, नई दिल्ली के श्री लक्ष्मी दास ने अपने विचार रखे। आईआईटी दिल्ली के प्रो. विजय चेरीयार ने भारतीय ज्ञान प्रणाली, डिजाइन, कला और समाज व्यवस्था के अंतर्संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। वहीं एलबीएसएनएसयू, दिल्ली के कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था और भारतीय समाज व्यवस्था के आधारभूत तत्त्वों पर अपना व्याख्यान दिया।

द्वितीय सत्र ‘भारत कथा’ में पुनः गुरुजी के विचारों की वीडियो प्रस्तुति के साथ चर्चा प्रारम्भ हुई। जीविका आश्रम के श्री आशीष गुप्ता ने ‘मसूरी संवाद’ और ‘विजयनगर संवाद’ पर अपने विचार रखे। सेवा इंटरनेशनल के डॉ. आर.के. अनिल ने ‘आदिलाबाद संवाद’ विषय पर प्रस्तुति दी। इस सत्र की अध्यक्षीय टिप्पणी जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलसचिव प्रो. मोहम्मद महताब आलम रिज़वी ने दी।

दिनभर चले इस आयोजन में भारतीय ज्ञान परम्परा, शिक्षा-दर्शन, समाज व्यवस्था, ग्राम्य जीवन, तकनीक, स्वदेशी दृष्टि और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जैसे विषयों पर सारगर्भित चर्चा हुई।

चंडीपुर में अमित शाह की हुंकार बनाम उत्तम बारीक का ‘100 दिन’ का संकल्प, आखिर कौन मारेगा बाजी!

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नैवेद्य पुरोहित

कोलकाता। पश्चिम बंगाल के पूर्व मेदिनीपुर जिले में 21 अप्रैल की दोपहर चंडीपुर विधानसभा के ‘बिनयकृष्ण स्मृति फुटबॉल मैदान’ में राजनीति का एक नया अध्याय लिखा गया। देश के गृहमंत्री अमित शाह की विशाल जनसभा में उमड़े अपार जनसमर्थन ने चंडीपुर विधानसभा के चुनावी मुकाबले को ‘हाई-वोल्टेज’ बना दिया है। जहां एक ओर भ्रष्टाचार पर तीखे प्रहार हुए, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समस्याओं की ज़मीनी हकीकत ने इस चुनाव को और भी पेचीदा कर दिया है।

भ्रष्टाचार पर शाह का वार, ‘पाई-पाई वसूलेंगे’

गृहमंत्री ने मंच से सीधे तौर पर ममता सरकार की घेराबंदी की। उन्होंने दहाड़ते हुए कहा, “जिस सरकार ने मां, माटी, मानुष के नाम पर सत्ता पाई थी उसने आज केवल बालू माफिया, जमीन माफिया और रिज़ॉर्ट माफिया को संरक्षण देने का काम किया है। मैं चंडीपुर की जनता को भरोसा दिलाता हूँ कि बंगाल में भाजपा सरकार बनते ही एक-एक भ्रष्टाचारी को पाताल से ढूंढ निकालेंगे और जनता की लूटी हुई पाई-पाई वसूली जाएगी।”
उत्तम बारीक का पलटवार, “100 दिन में समाधान का वादा”

इस लहर के बीच चंडीपुर से टीएमसी प्रत्याशी और पटाशपुर के विधायक उत्तम बारीक अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिखे। हमारी विशेष बातचीत में उन्होंने क्षेत्र की समस्याओं को स्वीकारते हुए एक बड़ा विज़न सामने रखा। उन्होंने कहा, “मैं जीतने के 100 दिनों के भीतर चंडीपुर में वॉटर ड्रेनेज की समस्या का स्थाई समाधान कर दूँगा।”

पलायन का दर्द और गंदगी का अंबार

जब मैंने मेचेदा रेलवे स्टेशन से चंडीपुर जाने वाली बस में यात्रियों से स्थानीय लोगों से बात की तो हकीकत अमित शाह के दावों और उत्तम बारीक के वादों के बीच कहीं फंसी नजर आई। नौजवानों की मजबूरी दिखी जहां एक स्थानीय युवक ने आँखों में मायूसी लिए बताया, “भले ही यहाँ स्कूल-कॉलेज खुल गए हों, लेकिन हाथ में काम नहीं है। डिग्री लेकर भी हमें दूसरी जगह पलायन करना पड़ता है।” क्षेत्र में घूमने पर हर तरफ फैली गंदगी की समस्या स्पष्ट दिखी। लोगों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि सालों से बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी की गई है।
क्या काम आएगा ‘कांथी’ का फैक्टर?

कांथी लोकसभा के अंतर्गत आने वाले चंडीपुर में सौमेंदु अधिकारी की हालिया जीत ने भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया है। भाजपा प्रत्याशी डॉ. पीयूष कांति दास को उम्मीद है कि अमित शाह की इस रैली के बाद ‘परिवर्तन की लहर’ वोट में तब्दील होगी। वहीं उत्तम बारीक अपने विधायक अनुभव और 100 दिनों के ‘एक्शन प्लान’ के सहारे इस लहर को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।

चंडीपुर का मुकाबला अब भ्रष्टाचार बनाम स्थानीय विकास की जंग में बदल गया है। क्या जनता माफिया राज के खिलाफ शाह के गुस्से के साथ जाएगी, या फिर उत्तम बारीक के 100 दिनों के वादे पर भरोसा करेगी? इसका फैसला चंडीपुर का वह मतदाता करेगा जो फिलहाल पलायन और जलजमाव सहित हर तरफ से मार झेल रहा है।

कानून को धता बताने की कोशिश नाकाम, सीकर में निषेधाज्ञा से रोका गया दो बहनों का बाल विवाह

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जयपुर । राजस्थान के सीकर जिले के श्रीमाधोपुर में कानून को धता बताकर गुपचुप तरीके से दो बहनों के बाल विवाह को अदालती आदेशों के जरिए रोक दिया गया। जिले में यह पहला मामला है जब बाल विवाह रोकने के लिए अदालत ने निषेधाज्ञा (Injunction Order) जारी की। बाल विवाह की रोकथाम के लिए काम कर रहे नागरिक समाज संगठन गायत्री सेवा संस्थान को अपने एक सदस्य के जरिए सूचना मिली थी कि दो बहनों के बाल विवाह की तैयारी की जा रही है। इस पर त्वरित कार्रवाई करते हुए गायत्री सेवा संस्थान, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण एवं श्रीमाधोपुर थाना पुलिस की संयुक्त टीम मौके पर पहुंची। बच्चियों के परिजनों को बाल विवाह के कानूनी पहलुओं की जानकारी देते हुए उन्हें समझाया गया और इस विवाह को रोकने के लिए नोटिस दिया गया।

पुलिस व प्रशासनिक टीम के मौके से लौटने के बाद बच्चियों के परिजन कानून को धता बता कर गुपचुप तरीके से विवाह के प्रयास में जुटे रहे। अक्षय तृतीया के दिन यानी 19 अप्रैल को सूचना मिली कि दोनों बच्चियों का बाल विवाह होने जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अगले दिन जिला विधिक सेवा प्राधिकरण एवं बाल अधिकारिता विभाग के सहयोग से अदालत में अर्जी दी गई, जिस पर श्रीमाधोपुर न्यायालय के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने परिजनों को अदालत में तलब किया और निषेधाज्ञा जारी कर इस बाल विवाह को रोकने का आदेश दिया।

दोनों बच्चियों की उम्र 15 व 17 साल है और वे स्थानीय विद्यालय में पढ़ रही हैं। इस पूरी कार्रवाई में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव डॉ. शालिनी गोयल, सीताराम जाखड़, बाल अधिकारिता विभाग से सहायक उपनिदेशक डॉ. गार्गी शर्मा, गायत्री सेवा संस्थान से नरेश कुमार सैनी, अभिषेक बगड़िया, चाइल्ड हेल्पलाइन से राकेश कुमार, राहुल दानोदिया और श्रीमाधोपुर थाना पुलिस टीम सक्रिय रूप से शामिल रही।

बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी संगठन गायत्री सेवा संस्थान के निदेशक व राजस्थान बाल आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. शैलेंद्र पंड्या ने कहा कि यह आदेश जिले में बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (पीसीएमए) 2006 के तहत पहली न्यायिक निषेधाज्ञा है जो भविष्य में ऐसे मामलों में एक नजीर पेश करेगी। यह न केवल दो बालिकाओं के जीवन को सुरक्षित करने की दिशा में एक ठोस कदम है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि अब बाल विवाह जैसे अपराधों के विरुद्ध कानूनी हस्तक्षेप और प्रभावी एवं सख्त हो रहा है।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने अदालती आदेश की प्रशंसा करते हुए कहा कि बाल विवाह की रोकथाम के लिए हमारे देश में कानून हमेशा से सख्त और प्रगतिशील रहे हैं। जरूरत इन कानूनों पर गंभीरता से अमल की है। इस तरह की निषेधाज्ञाएं एक स्पष्ट संदेश देती हैं कि कानून के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता और बाल विवाह किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि राजस्थान में जिस तरह से सरकार, समाज व न्यायपालिका बाल विवाह के खिलाफ एकजुटता व दृढ़ संकल्प दिखा रहे हैं, उससे उम्मीद जगी है कि हम जल्द ही बाल विवाह मुक्त राजस्थान के सपने को पूरा होते देखेंगे।

क्या भाजपा परिसीमन के माध्यम से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मॉडल को अपनाना चाहती है?

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बक्सर (बिहार): राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा हाल ही में किए गए विश्लेषण और टिप्पणियों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की प्रस्तावित परिसीमन रणनीतियों और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की केंद्रीकृत सत्ता संरचनाओं के बीच समानताएं बताई गई हैं। उनका आरोप है कि भाजपा एक ऐसे सत्तावादी मॉडल की ओर बढ़ रही है जिसका उद्देश्य “एक राष्ट्र” की राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना है। विपक्षी नेताओं सहित आलोचकों का तर्क है कि भाजपा दीर्घकालिक चुनावी वर्चस्व के लिए निर्वाचन क्षेत्रों में हेरफेर करने के लिए परिसीमन को एक “ट्रोजन हॉर्स” के रूप में इस्तेमाल कर रही है, ठीक उसी तरह जैसे सीसीपी एकदलीय शासन बनाए रखने के लिए राजनीतिक विपक्ष को खत्म करती है।

विश्लेषकों का तर्क है कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार संसद का आकार बढ़ाकर (जैसे 850 सीटें) और व्यक्तिगत सांसदों के प्रभाव को सीमित करके वास्तविक शक्ति को एक केंद्रीकृत कार्यकारी कार्यालय में स्थानांतरित कर रही है, जो चीन के पोलित ब्यूरो की संरचना की नकल है। इस कदम को “संघवाद पर युद्ध” के रूप में देखा जा रहा है, जो “एक देश, एक विधायिका, एक कार्यपालिका” मॉडल का समर्थन करने वाली विचारधारा पर आधारित है। आलोचक इसे भारत को एक विविध लोकतंत्र से सीपीसी के नियंत्रण के समान एक शीर्ष-नियंत्रित, एकीकृत प्रणाली में बदलने का प्रयास बताते हैं। यद्यपि दोनों दल अपनी-अपनी प्रणालियों में प्रमुख हैं, भाजपा एक लोकतांत्रिक, प्रतिस्पर्धी ढांचे के भीतर कार्य करती है, जबकि सीपीसी एक केंद्रीकृत एक-दलीय राज्य के भीतर काम करती है। आलोचकों के आरोप शासन शैली और राजनीतिक पुनर्गठन के लिए राज्य मशीनरी के उपयोग के इर्द-गिर्द घूमते हैं।

विपक्षी नेताओं ने भाजपा पर अपने पक्ष में सीमाएँ पुनर्निर्धारित करने का आरोप लगाया है, और इसके लिए उन्होंने 2020 के जम्मू-कश्मीर और 2023 के असम परिसीमन का उदाहरण दिया है। इन परिसीमनों की आलोचना इसलिए की गई क्योंकि इनमें विशिष्ट समुदायों का प्रतिनिधित्व कम किया गया और भौगोलिक निकटता का ध्यान रखे बिना सीमाएँ बदली गईं। आलोचकों का मानना ​​है कि 2011 की जनगणना पर आधारित परिसीमन दक्षिणी राज्यों को प्रभावी शासन (जनसंख्या नियंत्रण) के लिए दंडित करने जैसा है, जिससे उत्तरी हिंदी भाषी क्षेत्रों में भाजपा को “स्थायी बहुमत” मिल जाएगा।

2011 में ही भाजपा नेताओं ने चीन का दौरा किया था और एक आधुनिक, अनुशासित पार्टी बनाने के लिए सीपीसी के कैडर प्रशिक्षण मॉड्यूल से सीखने में रुचि व्यक्त की थी। भाजपा ने हाल ही में 2026 में सीपीसी प्रतिनिधिमंडल के साथ औपचारिक “पार्टी-टू-पार्टी” बैठकें कीं, जिन्हें भाजपा ने “खुला” संवाद बताया और विपक्ष के कथित “गुप्त” समझौतों से अलग बताया। बैठकों के समय को लेकर आलोचना भी हुई। हालांकि कांग्रेस भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में रहती है और इसके लिए कांग्रेस की आलोचना भी हुई है।

आलोचकों का तर्क है कि समय की कमी के कारण वर्तमान सांसदों को प्रश्न-उत्तर सत्र में पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है। यदि सीटों में 50% की वृद्धि की जाती है, तो प्रश्न-उत्तर सत्र में सांसदों को अपना कर्तव्य निभाने के लिए पर्याप्त समय कैसे मिलेगा? परिसीमन के बाद अतिरिक्त सांसदों के वेतन और भत्तों का वहन करने के लिए सरकारी खजाने पर पड़ने वाला बढ़ा हुआ खर्च भी देश के करदाताओं पर एक अतिरिक्त बोझ होगा। दक्षिण भारत के 5 राज्यों का वर्तमान प्रतिनिधित्व और भी कम हो जाएगा, जिससे दक्षिण भारत में अशांति और आंदोलन पनप सकता है।

दक्षिण भारतीय राज्यों के नेताओं ने चिंता व्यक्त की है कि देश की आर्थिक वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले और मानव विकास सूचकांक में शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाले दक्षिणी राज्य संसद में अपनी आवाज खो देंगे। उन्होंने यह भी महसूस किया कि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों में वृद्धि करना उच्च जनसंख्या वृद्धि को पुरस्कृत करने के समान है। केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों में वृद्धि से दक्षिणी राज्य अपने ही देश में हाशिए पर चले जाएंगे और इससे राष्ट्र की अखंडता पर भी प्रभाव पड़ सकता है। विकास के नाम पर दक्षिणी राज्यों के साथ हो रहे आर्थिक भेदभाव को उजागर करते हुए, दक्षिणी राज्यों के नेताओं का मानना ​​है कि परिसीमन प्रक्रिया से राजनीतिक भेदभाव भी बढ़ेगा।

दरअसल, राष्ट्रीय स्तर पर परिसीमन पर निर्णय 1971 में लिया जाना था, लेकिन 1976 में एक संशोधन के माध्यम से इसे 2001 तक टाल दिया गया और 2001 में एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से इसे 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया गया। 2001 में, राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण उपायों को बढ़ावा देने के लिए परिसीमन पर निर्णय रोक दिया गया था। अब, कम जनसंख्या वाले राज्य, जो अधिकतर दक्षिण भारत में हैं, यह आरोप लगा रहे हैं कि अधिक जनसंख्या के प्रतिनिधित्व को समायोजित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को बढ़ाकर उन्हें दंडित किया जा रहा है। परिणामस्वरूप, लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या (उत्तर की तुलना में) कम हो जाएगी, जिससे निर्णय लेने में दक्षिणी राज्यों के महत्व को खतरा हो सकता है।

इस बीच, आलोचकों का तर्क है कि महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन से जोड़ना केवल दिखावे के लिए है, जबकि संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र का मुख्य एजेंडा परिसीमन और सीटों का पुनर्वितरण है।

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