वीर कुंवर सिंह : अस्सी वर्ष का अमर शौर्य और बिहार की रणगाथा

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 प्रणय विक्रम सिंह

दिल्ली । इतिहास के विस्तीर्ण आकाश में कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जब समय स्वयं ठहरकर उन्हें नमन करता है। आज वही क्षण है, जब वयोवृद्ध देह में धधकती अजेय आत्मा ने मृत्यु को भी परास्त कर अमरत्व का आलोक धारण किया।

आज महानायक बाबू कुंवर सिंह जी का बलिदान दिवस है। वह दिवस, जब मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए समर्पित एक विराट जीवन, अमर गाथा बन गया। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि राष्ट्र-स्वाभिमान, अदम्य साहस और अटूट संकल्प का स्मरण है।

1857 का स्वाधीनता संग्राम भारतीय चेतना का प्रथम ज्वालामुखी था। यह संग्राम भारत की आत्मा का अमर आलोक, राष्ट्रीय जागरण का प्रथम शंखनाद और संस्कृति के स्वाभिमान की महान मशाल थी।

इस महायज्ञ की अग्नि में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल, महावीर सिंह राठौड़, नाना साहेब, राजा राव राम बक्स सिंह और तात्या टोपे जैसे अनेक हुतात्माओं ने आहुति दी किंतु इनमें भी बाबू वीर कुंवर सिंह का नाम विशेष रूप से चमकता है। अस्सी वर्ष की आयु में भी वे आंधी की तरह उठे, अग्नि की तरह भड़के और सिंह की तरह गर्जे।

इतिहासकार डॉ. आर.सी. मजूमदार ने लिखा है कि “इतनी आयु में जब मनुष्य विरक्ति और विश्राम की ओर अग्रसर होता है, उस समय कुंवर सिंह ने तलवार थामी और ब्रिटिश साम्राज्य को ललकारा। यह उनके आत्मबल और संकल्प का अनुपम उदाहरण है।”

1777 में जगदीशपुर (वर्तमान भोजपुर, बिहार) की धरती पर जन्मे वीर कुंवर सिंह परमार राजपूतों के उज्जैनिया वंश परंपरा से थे। उनका कुल वीरता, धर्म और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक था।

जन्म से ही उनमें पराक्रम का प्रकाश और धर्मनिष्ठा की दृढ़ता थी। वे तलवार के साथ-साथ न्याय के भी साधक थे। प्रजा उन्हें केवल जमींदार नहीं, बल्कि जन-नायक और जन-रक्षक मानती थी।

*अस्सी वर्ष का सेनापति और संग्राम का शंखनाद*

1857 का जब शंखनाद हुआ, तब कुंवर सिंह अस्सी वसंत पार कर चुके थे। वह समय था, जब सामान्यतः मनुष्य संन्यास की शरण लेता है। किंतु इस महायोद्धा ने वृद्ध शरीर में युवा साहस का संचार कर लिया।
उनके साथ उनके भाई बाबू अमर सिंह और सेनापति हरे कृष्ण सिंह ने कंधे से कंधा मिलाया। यही वह सैन्य-संघटन था, जिसने बिहार की धरती को क्रांति का केंद्र बना दिया।

*आरा का रण और आंधी-सी आक्रामकता*

आरा की लड़ाई में अंग्रेज़ों को जबरदस्त पराजय मिली। अंग्रेज अफसर हेरेसन ने आरा हाउस में शरण ली, किंतु कुंवर सिंह की सेना ने उसे चारों ओर से घेर लिया।

अंग्रेज इतिहासकार जॉन के ने लिखा है कि “The old lion of Jagdishpur shook the very foundation of British prestige in Bihar.”
(जगदीशपुर का वृद्ध शेर बिहार में ब्रिटिश प्रतिष्ठा की नींव हिला गया।)

कुंवर सिंह की सबसे बड़ी शक्ति थी गुरिल्ला युद्धकला। वे धरती को ढाल, नदी को रक्षा और जंगल को शस्त्र बना देते। अंग्रेज़ी सेना बार-बार उनके छल-छंद में उलझती रही। आजमगढ़ और गाजीपुर में उनके छापामार युद्ध ने अंग्रेजों को असहाय कर दिया। ब्रिटिश कमांडर मार्क्स ने स्वीकार किया कि “This old rebel was more dangerous than many young leaders put together.”
(यह वृद्ध विद्रोही अनेक युवा नेताओं से अधिक खतरनाक सिद्ध हुआ।)

*कटे हाथ का करुण किंतु कांतिमान प्रसंग*

1858 में गंगा पार करते समय अंग्रेजों की गोली वीर कुंवर सिंह के बाएं हाथ में आ लगी। रक्त की धारा अनवरत बह रही थी, किंतु यह वृद्ध योद्धा विचलित नहीं हुआ। उन्होंने अपनी तलवार उठाई और स्वयं अपना घायल हाथ काटकर गंगा माता की गोद में अर्पित कर दिया। मानो उन्होंने जीवन का एक अंग राष्ट्ररक्षा के यज्ञ में समिधा बनाकर समर्पित कर दिया हो।

यह दृश्य भारतीय इतिहास का करुण किंतु कांतिमान क्षण था, जहां घाव भी गौरव बन गया, पीड़ा भी पूजा में परिवर्तित हो गई और अंग-त्याग अमर-बलिदान का शाश्वत प्रतीक बन गया।

यह प्रसंग केवल रक्तपात नहीं था, यह था गंगा-गर्भ में किया गया एक दिव्य आहुति-यज्ञ, जिसमें योद्धा ने स्वयं को मातृभूमि की रक्षा हेतु समर्पित कर दिया।

आज भी बिहार की धरती इस गाथा को गीतों में संजोए है कि

*”कटल हथवा, ना कटल हिम्मत,”*
*”कुंवर सिंह बनलन जन-जन की इज्जत।”*

*जगदीशपुर की विजय और विजेता की विदाई*

23 अप्रैल 1858 को, अस्सी वर्षीय किंतु अदम्य सेनानी ने अपने गढ़ जगदीशपुर पर पुनः विजय ध्वज फहराया। यह केवल सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि यह था संघर्षरत आत्मा का स्वर्णिम स्वर्गारोहण। तीन दिन बाद, 26 अप्रैल 1858 को उन्होंने इस नश्वर शरीर को त्याग दिया। किंतु वे मरे नहीं, वे तो अमरत्व को प्राप्त हुए। वे गए तो पराजित होकर नहीं, बल्कि विजयी बनकर, विजेता की विदाई लेकर।

अंग्रेज अधिकारी विलियम टेलर भी स्वीकार करने पर विवश हुआ कि “He died, but he died as a victor.”
(वह मरे, परंतु विजेता बनकर मरे।)

*स्मृति और सम्मान : अमर योद्धा की अमिट छाप*

वीर कुंवर सिंह का बलिदान केवल इतिहास के पन्नों में अंकित नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और जनता की वाणी में आज भी गूंजता है। उनके शौर्य को नमन करने हेतु समय-समय पर सरकार और समाज ने अनेक स्मृति-चिह्न स्थापित किए। 23 अप्रैल 1966 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। यह टिकट डाक-विभाग का औपचारिक प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्र की कृतज्ञता का मोहर था।

इसके पश्चात 1992 में आरा में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। शिक्षा का यह मंदिर उनके नाम से अभिषिक्त होकर इस सत्य का उद्घोष करता है कि वीरता केवल रणभूमि तक सीमित नहीं, बल्कि यह नई पीढ़ियों के चरित्र-निर्माण की प्रेरणा भी है।

2017 में गंगा पर बने आरा-छपरा पुल का नामकरण वीर कुंवर सिंह सेतु के रूप में किया गया। यह सेतु केवल उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला मार्ग नहीं, बल्कि अतीत और भविष्य के बीच संवाद का पुल भी है। एक ऐसा शौर्य-स्मारक, जिस पर हर दिन हजारों लोग चलते हैं और अनजाने ही वीरता के पदचिह्नों पर पांव धरते हैं।

उनकी शहादत की 160वीं पुण्यतिथि पर 2018 में पटना का हार्डिंग पार्क परिवर्तित होकर ‘वीर कुंवर सिंह आजादी पार्क’ बना और वहां उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। यह प्रतिमा राजधानी के मध्य खड़ी होकर हर आने-जाने वाले से मानो कहती है कि “यह धरती वीरों की जननी है।”

किंतु वीर कुंवर सिंह की स्मृति केवल इन औपचारिक स्मारकों तक सीमित नहीं है। भोजपुर, शाहाबाद और मगध के गांव-गांव में आज भी आल्हा गायन और बिरहा परंपरा उनकी गाथा का उद्घोष करती है। मेले और अखाड़ों में गायक जब स्वर छेड़ते हैं, तो लोकमानस झूम उठता है

*”सोनवा के किनार बजनवा गूंजे,”*
*”कुंवर सिंह के नाम से धरती पूजे।”*

इन गीतों की गूंज बताती है कि वीरता का असली स्मारक पत्थर या लोहे से नहीं बनता, बल्कि जनता के हृदय में जीवित रहता है। यही कारण है कि बिहार की मिट्टी, लोकगीतों की लय और गांव की चौपालें आज भी उन्हें जीवित रखती हैं।

*अमर संदेश और अलौकिक आदर्श*

वीर कुंवर सिंह की गाथा हमें सिखाती है कि देशभक्ति आयु की सीमाओं से परे है। वृद्धावस्था भी यदि संकल्पवान हो, तो साम्राज्य की जड़ें हिला सकती है। उनका जीवन एक संदेश है, उनका बलिदान एक मंत्र है और उनकी गाथा एक प्रेरणा है।

आइए, हम संकल्प लें कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारेंगे। अन्याय के सामने अडिग रहेंगे, न्याय के लिए निर्भीक बनेंगे और राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पित करने को सदैव तत्पर रहेंगे।

वे मरे नहीं,
वे आज भी जीवित हैं
धरती की धड़कनों में, गंगा की लहरों में,
और भारत माता की संतानों के साहस में।

Meghalaya possesses ancient knowledge system: RSS Prachar Pramukh

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Guwahati: In pursuit of understand the essence of ancient Bharat, one must look towards the Northeast, where traditions continue to thrive in their most organic and spiritual forms, said Dr Sunil Mohanty, Assam Kshetra Prachar Pramukh of Rashtriya Swayamsevak Sangh, while delivering a comprehensive and deeply reflective address during a religious gathering in Meghalaya placing indigenous traditions of the region within the larger civilizational framework of Bharat.

The 36th Seng Khihlang (Tien Phira / Lumphung), one of the most significant indigenous spiritual congregations of the Khasi–Pnar (Jaintia) community, held at Sein Raij Muthlong in West Jaintia Hills on 17 to 19 April 2026, attracted a huge volume of audience. Established in 1981, Seng Khihlang has grown from a small gathering of 30–40 participants into a massive spiritual congregation attended by lakhs of indigenous faith believers, symbolizing a living tradition of cultural continuity, identity, and spiritual resilience.

Recalling Meghalaya’s historical legacy, Dr Mohanty referred to early rulers such as Urmi Rani (c. 600–630 CE), Krishak Pator, Hatak, and Guhak, and stressed the importance of remembering these figures. He also highlighted the historical importance of Jaintiapur, which served as the capital of the Jaintia Kingdom until its annexation by the British in 1835. Further, he mentioned key rulers including Prabhat Ray Syiem (1500–1516), Laxmi Sinha (1670–1701), credited with constructing the Jayant Rajbadi in 1680, and the last ruler Rajendra Singh Syiem (1832–1835).

Paying tribute to struggles against colonial rule, he remembered U Tirot Sing (c. 1802–1835), U Kiang Nangbah (1836–1862), and Pa Togan Sangma (d. 1872), acknowledging their sacrifices in defending sovereignty and identity. Mohanty highlighted the richness of indigenous heritage, referring to the megalithic traditions of menhirs and dolmens as enduring symbols of an ancient civilization. He also spoke about the spiritual significance of the Nartiang Durga Temple and the Jaintia Shaktipeeth in present-day Bangladesh. He further pointed out the existence of a nearly 3,000-year-old iron-smelting tradition in Meghalaya as evidence of advanced indigenous knowledge systems.

Emphasizing the philosophical unity underlying diverse traditions, he noted that indigenous faiths across the north-eastern Bharat including those of Nyishi, Apatani, Galo, Mishings, and Kacharis share common foundations such as reverence for the Pancha Bhutas (earth, water, fire, air, and sky). Drawing from the wisdom of the Rig Veda, he cited the Vedic expression ‘Eko’ham Bahusyamah’ (I am One, may I become many), explaining that diversity is an expression of the One manifesting in multiple forms. He emphasized that in the Bharatiya worldview, diversity is not seen as division or difference as often interpreted in Western thought, but as an intrinsic expression of unity itself, where plurality strengthens, rather than fragments, the whole.

Describing indigenous faith-traditions as the mother or the foundational source of world’s modern civilisations and organised religions, he stated that just as the river Ganges depends on its origin at Gangotri, modern religions and civilizations are rooted in indigenous traditions, and their decline would impact the entire world’s cultural and spiritual balance. He also referred to the International Council for Cultural Studies (ICCS), which brings together representatives of more than 40 indigenous traditions globally, including Māori, Aboriginal, Aztec, and Zulu communities, to explore shared spiritual values and common heritage with the ethos that ‘All are One’.

In the context of the centenary year of the RSS, Mohanty emphasized the need for ‘Panch Parivartan’ like preservation of family values, environmental protection, social harmony, promotion of selfhood, and adherence to civic duties. He also highlighted the core principles of Niam Khasi such as ‘Tip briew tip blei’ (to know humanity is to know God), ‘Tip kur tip kha’, and ‘Kamai ia ka hok’ (earn righteousness), underlining that true spirituality is reflected in conduct, compassion, and selfless service.

The three-day program saw structured participation with the arrival of delegates and ceremonial Mawbynna (monolith) procession on the first day, followed by installation, awareness sessions, and prayers on the second day, and a grand concluding ceremony on the third day. More than 30 Sein Raij and Seng Khasi units participated through traditional songs and dances, reflecting the vibrant cultural heritage of the community.

The event was attended by several prominent dignitaries including Sniawbhalang Dhar, deputy chief minister of Meghalaya, Wailadmiki Shylla, State minister, Sanbor Shullai, State minister, Matthew Beyondstar Kurbah, member of State legislative assembly, Laski Rymbai, deputy chief executive member of JHADC, Sooki Lapasam and Rikut Parien, JHADC executive members along with traditional authorities like the Dollois of Shangpung, Raliang, Jowai, and Nangbah Elakas and a number of government officials. The spiritual congregation concluded with a strong message of unity, cultural pride, and the reaffirmation that preserving indigenous traditions is essential for building a harmonious, spiritually rooted, and inclusive society.

बलबीर पुंज : एक युगद्रष्टा चिंतक का अवसान

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दिल्ली । प्रख्यात चिंतक, लेखक, स्तंभकार और पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज नहीं रहे। मस्तिष्क इसे मान भी ले तो हृदय मानने को तैयार नहीं होता। क्या लिखा जाए, कैसे लिखा जाए, कहाँ से शुरुआत की जाए और कहाँ समाप्त, यह तय कर पाना अत्यंत कठिन हो रहा है। कभी-कभी किसी विराट व्यक्तित्व के जाने से ऐसी रिक्तता उत्पन्न होती है, जिसे भर पाना कदाचित संभव नहीं होता; बलबीर पुंज जी का जाना ऐसी ही रिक्तता का बोध कराता है।

वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जो सदैव लिखने-पढ़ने वाले लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित करते रहते थे। राष्ट्रीय धारा के लेखकों, स्तंभकारों और पत्रकारों के किसी अच्छे लेख पर वे अपनी टिप्पणी देते, उसे पढ़ने के लिए अपने परिचितों के साथ साझा करते और प्रायः स्वयं फोन कर लेखक को बताते कि उसके लेख में क्या खूबियाँ हैं, कहाँ सुधार की आवश्यकता है, तथा विषय को और गहराई से समझने के लिए किन-किन लेखकों को पढ़ना चाहिए। यह वास्तव में एक दुर्लभ गुण था, विशेषतः ऐसे व्यक्ति में – जो स्वयं एक स्थापित चिंतक, दो बार राज्यसभा सदस्य, भाजपा के बौद्धिक रणनीतिकारों में प्रमुख और संगठन के उच्च पदों पर रहा हो। उनकी सादगी, सहजता, सर्वसुलभता और निरहंकारिता केवल प्रभावित ही नहीं करती थी, बल्कि कई बार अविश्वसनीय भी लगती थी। यदि कोई लेखक, पत्रकार या स्तंभकार स्वास्थ्य संबंधी या अन्य किसी समस्या से गुजर रहा हो, तो वे उसका कुशल-क्षेम लेना कभी नहीं भूलते थे। संपर्क-सूत्र उपलब्ध न होने पर भी वे किसी परिचित से उसका नंबर लेकर उससे संवाद स्थापित करते और उसके दुःख-दर्द में सहभागी बनते। आज के समय में, जब संबंधों में औपचारिकता बढ़ती जा रही है, ऐसी आत्मीयता अत्यंत दुर्लभ है।

आयु के आठवें दशक में भी उनकी सक्रियता आश्चर्यचकित करती थी। वे निरंतर लेखन, चिंतन और विमर्श में सक्रिय रहे। अनेक व्हाट्सएप समूहों पर वे न केवल अपने लेख साझा करते थे, बल्कि दूसरों के लेखों और टिप्पणियों को भी ध्यानपूर्वक पढ़कर उन पर सारगर्भित प्रतिक्रिया देते थे। कभी-कभी वे अन्य महत्त्वपूर्ण लेख साझा कर सभी को उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। अपने देहावसान से तीन-चार दिन पूर्व तक उनका लेखन जारी रहा, यह उनकी साधना और प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उनके लिए लेखन केवल विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि एक साधना थी। वे कहा करते थे कि यदि “राम जी” ने लेखनी का सामर्थ्य दिया है, तो उसका उपयोग देश, धर्म और संस्कृति के लिए होना चाहिए। इसी में जीवन की धन्यता और सार्थकता है। वे लेखकों, पत्रकारों और संपादकों को यह प्रेरणा देते थे कि वे लेखन को ही अपना सबसे सशक्त उपकरण बनाएं। कार्यक्रमों और आयोजनों की अपेक्षा लेखन अधिक स्थायी प्रभाव छोड़ता है। सधी हुई लेखनी ही समय के शिलालेख पर अपनी अमिट छाप छोड़ती है। इस संदर्भ में वे सीताराम गोयल, राम स्वरूप और धर्मपाल जैसे चिंतकों से प्रेरणा लेने की बात करते थे। उनका कहना था कि उनके जाने के बाद दुनिया ने उनकी लेखनी के तत्त्व व महत्त्व को समझा।

किसी भी विषय पर उनकी समझ अत्यंत गहरी और व्यापक थी। वे केवल घटनाओं की सतह पर नहीं रुकते थे, बल्कि उनके मूल तक जाकर विश्लेषण करते थे। भारतीय विमर्श (नैरेटिव्स) की उनकी समझ विलक्षण थी। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित उनकी पुस्तक “नैरेटिव्स का मायाजाल” इस संदर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनके लेखों में लिजलिजी-पिलपिली भावुकता के लिए कोई स्थान नहीं होता था; वे तर्कों को स्पष्टता और तथ्यों को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करते थे। यही कारण था कि उनके विचारों का खंडन करना उनके विरोधियों के लिए भी सहज नहीं होता था।

उन्होंने भारतीय सभ्यता, सनातन संस्कृति और उसके इतिहास का गहन अध्ययन किया था। साथ ही उन्होंने अब्राहमिक सभ्यताओं का भी सूक्ष्म विश्लेषण किया था। इस कारण वे वैश्विक स्तर पर चल रहे सभ्यतागत संघर्ष का यथार्थ चित्र प्रस्तुत कर पाते थे। वे हिंदुत्व की उदारता, बहुलता और सह-अस्तित्व की भावना को पहचानते थे, परंतु इसके समक्ष उपस्थित वर्तमान और संभावित संकटों के प्रति भी उतने ही सजग थे। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज को बार-बार इन चुनौतियों व संभावित संकटों के प्रति सचेत किया। वे मानते थे कि खंडित समाज किसी भी वैचारिक या सामाजिक चुनौती का सामना नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने संगठित समाज के महत्त्व को जीवनभर रेखांकित किया। वे जानते थे कि वामी-जिहादी-यूरोपंथी गठजोड़ के समक्ष असंगठित हिंदू-समाज टिक नहीं सकता। अतः उन्होंने अपना लेखकीय-जीवन समाज को संगठित करने की आवश्यकता समझाने में समर्पित किया।

व्यक्तिगत बातचीत में वे संगठनात्मक सुधार के बिंदुओं का उल्लेख अवश्य करते थे, परंतु सार्वजनिक रूप से उन्होंने सदैव संगठन की मर्यादा को सर्वोपरि रखा। वे इस बात के प्रति सजग थे कि किसी भी बड़े ध्येय की प्राप्ति के लिए ध्येयनिष्ठा, अनुशासन और व्यक्तिगत आकांक्षाओं का त्याग आवश्यक होता है। वे संघ विचारों के निकट थे और स्वयंसेवकों को साधक के रूप में देखते थे। उनका विश्वास था कि स्वयंसेवकों की साधना से ही समाज में अनुकूल परिवर्तन संभव हुआ है और राष्ट्र, धर्म व संस्कृति के प्रति गौरव-बोध जागृत हुआ है। फिर भी वे इस बात से चिंतित थे कि बौद्धिक और शैक्षिक क्षेत्रों में वामपंथ का प्रभाव अब भी बना हुआ है। उनका मानना था कि 2014 के बाद राजनीतिक और हिंदी मीडिया जगत में परिवर्तन अवश्य आया है, परंतु अंग्रेजी मीडिया, शैक्षिक संस्थानों व सत्ता-प्रतिष्ठानों में वैचारिक असंतुलन अभी भी विद्यमान है। वहाँ अभी भी वामपंथ व औपनिवेशिक मानसिकता हावी है। वे बार-बार कहते थे कि इक्कीसवीं सदी की मुख्य लड़ाई ‘नैरेटिव्स’ के स्तर पर ही लड़ी जाएगी, जो इस लड़ाई को जीतेगा, वही अंततः समाज की दिशा तय करेगा। इसलिए वे युवाओं और कार्यकर्ताओं को पढ़ने-लिखने की आदत विकसित करने के लिए प्रेरित करते थे।

जनसंख्या के बदलते स्वरूप और उसके सामाजिक प्रभावों को लेकर भी वे अत्यंत गंभीर थे। इस विषय पर वे एक विस्तृत पुस्तक लिख रहे थे और इसके लिए उन्होंने सैकड़ों ग्रंथों का अध्ययन किया था। उनका चिंतन वायवीय नहीं, बल्कि यथार्थपरक और तथ्याधारित होता था। भारत के विभाजन की पीड़ा उनके लेखन और चिंतन में बार-बार प्रकट होती थी। वे इस बात से व्यथित थे कि समाज उस ऐतिहासिक एवं पीड़ादायक अनुभव एवं त्रासदी से अपेक्षित शिक्षाएँ नहीं ले पाया है। वे कहते थे कि यदि समाज अपने अतीत से सबक नहीं लेगा, तो भविष्य में भी वही गलतियाँ दोहराएगा। बदलती जनसंख्या संरचना, मतांतरण, घुसपैठ और जनसंख्या के आनुपातिक असंतुलन को वे गंभीर समस्या मानते थे और समाज को इसके प्रति जागरूक रहने का आग्रह करते थे। उनके अनुसार, आत्ममुग्धता या वास्तविकता से विमुख होना समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इसलिए वे चाहते थे कि हिंदू-समाज सद्गुण-विकृति का शिकार न हो, बल्कि उससे यथाशीघ्र मुक्त हो।

आज जब बलबीर पुंज जी हमारे बीच नहीं हैं, तब यह अनुभूति और भी तीव्र हो उठती है कि राष्ट्र ने एक सजग, निर्भीक, सत्यदर्शी एवं राष्ट्रनिष्ठ वैचारिक प्रहरी खो दिया है। उनका जीवन हमें यह स्मरण कराता रहेगा कि ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा और धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण ही जीवन को सच्ची सार्थकता प्रदान करते हैं। जिस दौर में हिंदुत्व, राष्ट्रीय विचारों और सनातन संस्कृति के अनुकूल लेखन करना सहज स्वीकार्य नहीं था, उस दौर में भी उन्होंने ध्येयनिष्ठा का मार्ग चुना, राष्ट्र का पक्ष चुना और जीवन-पर्यंत उसी पर अडिग रहे। निःसंदेह, उनकी स्मृतियाँ और उनका लेखन आने वाली पीढ़ियों को ध्येयनिष्ठा, साहस और राष्ट्रनिष्ठ चिंतन की प्रेरणा देता रहेगा।

जगतगुरु आद्य शंकराचार्य का जीवन एवं शिक्षा दर्शन

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गिरीश जोशी

श्रीनगर । शारदा पीठ कश्मीर स्थित भारतीय संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मुख्य केंद्र था, यहां पर मां सरस्वती का अत्यंत प्राचीन मंदिर हुआ करता था। इस मंदिर में एक सर्वज्ञ नामक पीठ था। इस पीठ पर आसीन होने के लिए व्यक्ति का सर्व शास्त्रों में पारंगत होना, पराविद्या का विशेषज्ञ होना तथा ब्रह्म ज्ञान में प्रतिष्ठित होना अनिवार्य था। इस पीठ पर आरूढ़ होने की अभिलाषा से आने वाले विद्वान को मंदिर के चारों मुख्य द्वारों पर बैठे हुए विभिन्न मत संप्रदायों के प्रकांड पंडितों से शास्त्रार्थ करना होता था। उन्हें अपने मत से सहमत करने के बाद ही मंदिर में प्रवेश की अनुमति मिला करती थी। इस शर्त के अलावा एक और महत्वपूर्ण शर्त थी। मंदिर में प्रवेश करने के बाद पीठ पर आरूढ़ होने के लिए मां शारदा स्वयं देववाणी से उस व्यक्ति के सर्वज्ञ होने की घोषणा किया करती थी। उसके बाद ही वह व्यक्ति शारदा पीठ पर विराजमान हो सकता था।

अनेक बार अनेक विद्वान दूर-दूर से इस पीठ पर आरूढ़ होने की अभिलाषा से आया करते। कोई शास्त्रार्थ में पराजित हो जाता तो किसी को मां शारदा का आशीर्वाद नहीं मिलता।

अपने शिष्यों के आग्रह पर आचार्य शंकर इस पीठ पर विराजित होने की अभिलाषा से कश्मीर पहुंचे। मंदिर के चारों द्वारों पर वैशेषिक, न्यायिक, सांख्य, मीमांसक, सौतांत्रिक, वैभाषिक, योगाचारी, माध्यमिक, जैन आदि मतों को मानने वाले विद्वान जमा थे,आचार्य का उन से शास्त्रार्थ आरंभ हुआ।
शास्त्रार्थ की कुछ बानगी यहाँ देखते हैं। गौतम मतावलंबी न्यायिक पंडितों ने पूछा कि कणाद और गौतम के मतों में मुक्ति के संदर्भ में क्या भेद हैं? आचार्य ने उत्तर दिया कणाद के मतानुसार आत्मा मुक्ति की अवस्था में विशेष गुण रहित होकर पुनरुत्पत्ति की संभावना से मुक्त होकर आकाश की तरह निसंग एवं निष्क्रिय भाव से विराजित होती है। वही गौतम के मतानुसार आत्मा मुक्त अवस्था में आनंद व सत्य से युक्त होकर स्थित रहती है।

अब सांख्यवादी आगे आए उन्होंने पूछा कि सांख्य मत के अनुसार मूल प्रकृति में विश्व प्रपंच का जो कारण तत्व है वह स्वतंत्र है या चिदात्मा पुरुष के अधीन है? आचार्य ने उत्तर दिया –त्रिगुणात्मक नामरूप की विशेषताओं वाली मूल प्रकृति कपिल के मतानुसार स्वतंत्र है।इसके द्वारा ही विश्व के प्रपंच का आविर्भाव होता है। यही स्वतंत्र मूल प्रकृति संसार के अस्तित्व का कारण है,लेकिन वेदांत के अनुसार मूल प्रकृति माया चैतन्य ब्रह्म के अधीन हैं।
दोनों पक्षों के मध्य अनेक क्लिष्ट विषयों पर शास्त्रार्थ चलता रहा। आचार्य के तर्क सुनकर सांख्यवादी भी संतुष्ट हुए।

अगली बारी बौद्धों की थी।उस समय बौद्ध धर्म के चार संप्रदाय थे माध्यमिक,योगाचार्य,सौतांत्रिक और वैभाषीक। बौद्ध विद्वानों ने पूछा हमारे चारों संप्रदाय में क्या भेद हैं? हमारे चारों मतों के साथ वेदांत किस प्रकार से अलग है? आचार्य ने उन्हें भी संतुष्ट किया। जैन भी संतुष्ट हुए। अंत में जैमिनी मतावलंबियों ने पूछा – जैमिनी के मतानुसार शब्द का क्या स्वरूप है शब्द धर्म है या गुण? आचार्य ने उत्तर दिया,“आप जानते हैं कि शब्द वर्णनात्मक है, वर्ण नित्य और व्यापक है,श्रवण इंद्रिय द्वारा जब शब्द की अनुभूति होती है तभी उसकी उत्पत्ति मानी जाती है इसलिए शब्द द्रव है गुण नहीं।”

आचार्य के तर्कों से संतुष्ट होकर विद्वानों ने मंदिर के द्वार खोल दिए।

मंदिर में प्रवेश कर आचार्य ने मां शारदा की स्तुति की – “सुवोक्षोजकुंभां सुधापूर्णकुंभां प्रसादवलंबामं प्रपुण्यांवलम्बाम।…. भजे शारदाम्बाम मजस्त्रमदाम्बाम।।”
यह अर्चना पूर्ण होते ही आकाशवाणी गूंजी – “वत्स शंकर मैं तुमसे प्रसन्न हूं। आज मैं, तुम्हें सर्वज्ञ की उपाधि से विभूषित करती हूं। तुम इस पीठ के योग्य अधिकारी हो। वत्स तुम मेरी इस सर्वज्ञ पीठ पर आरोहण करो।” आचार्य धीरे धीरे पीठ की ओर बढ़ने लगे, चारों ओर से आचार्य की जय जयकार गूंजने लगी। आज आचार्य वास्तविक रुप से इस दिन जगतगुरु हुए। हमारे देश में जगद्गुरु बनाने की यही पात्रता थी।

जगतगुरु आचार्य शंकर का दर्शन क्या था?

आचार्य शंकर वेदांत दर्शन के पुनःप्रवर्तक माने जाते हैं। वेदांत शब्द का अर्थ जानने के लिए इस शब्द की संधि विच्छेद करने पर वेद + अंत प्राप्त होता है। इसका अर्थ है – वेदों का अंतिम भाग। वेदांत दर्शन के दो मुख्य पक्ष हैं – पहला पक्ष सैद्धांतिक है जो बुद्धि प्रधान है जिसके द्वारा तर्कों के माध्यम से भ्रांतियों को दूर कर परम सत्य का बोध करवाया जाता है। वहीं दूसरे पक्ष में उस लक्ष्य की ओर संकेत किया जाता है जहां पहुंचकर परम शक्ति की अनुभूति होती है। इस हेतु अपनी बुद्धि एवं मन की सीमाओं का अतिक्रमण कर पार जाना होता है।

वेदांत के सिद्धांत अनुसार विश्व का सारा दृश्यमान प्रपंच जिसमें सभी पशु-पक्षी,मानव,देवी-देवता शामिल है, यह नाम एवं रूप वाला विश्व ब्रह्म के अलावा कुछ नहीं है। “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”। जो कुछ भी इस संसार में दिखाई देता है, जो कुछ भी नाम रूप से संबोधित होता है वह सब ब्रह्म की सत्ता से ही संचालित होता है।

मनुष्य जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य परम सत्य की,ब्रह्मज्ञान की,ब्रह्म स्वरूप अथवा मुक्ति की प्राप्ति ही होता है सारे वेदों का अंतिम अभिप्राय यही है।
आचार्य ने जब अपने गुरु गोविंदपाद से शिक्षा पूर्ण की, तब गुरु ने आशीर्वाद दिया था कि तुम व्यास कृत ब्रह्म सूत्र पर भाष्य की रचना कर अद्वैत वेदांत को सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करने, सर्वधर्म के ज्ञान को सार्वभौमिक अद्वैत ब्रह्म की परिधि में लाने में सफल रहोगे।गुरु आज्ञा से आचार्य काशी पहुंचे,यहां उन्हें आद्यशक्ति एवं भगवान शंकर से आगे के कार्य का मार्गदर्शन मिला। भगवान ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम्हारे द्वारा वैदिक धर्म की प्राण प्रतिष्ठा हो। तुम वेदांत की पूर्ण व्याख्या करो, भ्रमित मत वादों का खंडन करो, व्यास कृत ब्रह्मसूत्र भाष्य लिखकर वेदांत के मुख्य लक्ष्य ब्रह्म ज्ञान की पुनः प्रतिष्ठा करो।

भगवान वेदव्यास द्वारा रचित ब्रह्म सूत्र परम ज्ञान की प्राप्ति हेतु मानव के मन मस्तिष्क में जितने भी प्रश्न-जिज्ञासा हो सकती है उन सब का उत्तर देता है। यह ग्रंथ आध्यात्मिक क्षेत्र के साहित्य का सर्वोच्च ग्रंथ है।

गुरु एवं भगवान की आज्ञा का पालन करने आचार्य उत्तर में व्यास क्षेत्र पहुंचे। यहां अनेक दिनों तक गंभीरतापूर्वक ध्यान कर ब्रह्म सूत्र पर भाष्य लिखना आरंभ किया। आचार्य प्रत्येक सूत्र का वाचन करते फिर अपने शिष्यों के साथ उस सूत्र का ध्यान करते। ध्यान में प्राप्त संकेतों के आधार पर प्रत्येक सूत्र का भावार्थ जानकर भाष्य की रचना करते। ब्रह्म सूत्र के लेखन के साथ-साथ आचार्य ने ब्रह्म सूत्र की शिक्षा अपने शिष्यों को देना प्रारंभ किया। इसी अवधि में आचार्य ने ब्रह्मसूत्र के भाष्य के साथ द्वादश उपनिषद, भगवत गीता जिन्हें प्रस्थानत्रयी कहा जाता है के साथ लगभग 16 ग्रंथों के भाष्य की रचना की। आचार्य ने मात्र 4 वर्ष की अवधि में यह कार्य पूर्ण किया। ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्मसूत्र का भाष्य पूरा होने पर भगवान वेदव्यास स्वयं आचार्य से भेंट करने आए और प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि तुम विभिन्न वादों प्रतिवादों के सिद्धांतों को वेदांत मत से सहमत कर सारे मत वालों को पूर्ण करने का कार्य प्रारंभ करो। वेदांत की महिमा के साथ ब्रह्म तत्व के विज्ञान की पुनः प्रतिष्ठा करें।

वेद, उपनिषद आदि शास्त्रों में ज्ञान के सिद्धांत एवं उसे जानने की प्रक्रिया समझाई गई है। शास्त्रों में वर्णित ज्ञान के भावार्थ को समझाने के लिए उनके भीतर प्रयुक्त किए गए हैं, शब्दों एवं परिभाषाओं की व्याख्या करने के लिए जो ग्रंथ रचे जाते हैं उन्हें प्रकरण ग्रंथ कहा जाता है। आचार्य ने ‘आत्मबोध’ के अलावा ‘तत्वबोध’, ‘पंचदशी’, ’विवेक चूड़ामणि’ जैसे ग्रंथों की रचना की ताकि शास्त्रों की समय सापेक्ष सटीक व्याख्या की जा सके।

आत्मबोध के 68 श्लोकों में आचार्य ने कलिष्ट सिद्धांतों को समझाने के लिए दृष्टांतों का उपयोग किया है। प्रत्येक श्लोक एक प्रभावशाली चित्र के समान हमारे समक्ष प्रकट होता है। वेदांत के कठिन प्रतीत होने वाले सिद्धांतों को सरलता से समझाने के लिए आचार्य ने उपमाओ का प्रयोग किया है।

आचार्य अन्य मतावलमबियों को अपने मत से सहमत करवाने के लिए शास्त्रार्थ की पद्धति का उपयोग किया करते थे। जो विद्वान उनके समक्ष अपने मत की महत्ता एवं केवल उनके मत की अधिमान्यता को स्वीकार करने के आग्रह से प्रस्तुत होते थे, आचार्य उनके मत को पूरा सम्मान पूर्वक सुना करते, उसके बाद उस मत की पूर्णता के लिए वेदांत की आवश्यकता प्रतिपादित कर उन्हें पूर्ण रूप से सहमत कर लिया करते थे।

आचार्य ने कोई नया पंथ, संप्रदाय अथवा मत स्थापित नहीं किया। उन्होंने तो प्राचीन वैदिक सनातन ज्ञान को ही तत्कालीन एवं भविष्य की आवश्यकता के अनुसार उनकी समझ स्पष्ट करने तथा समाज को बाकी सभी प्रकार के मतवादों से उपजे संघर्षों से उबार कर मूल जान पर, वास्तविक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया है।

जगतगुरु आद्य शंकराचार्य का शिक्षा दर्शन

भगवान वेदव्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र परम ज्ञान की प्राप्ति हेतु मानव के मन मस्तिष्क में जितने भी प्रश्न-जिज्ञासा हो सकती है उन सबका उत्तर देता है। यह ग्रंथ आध्यात्मिक क्षेत्र के साहित्य का सर्वोच्च ग्रंथ है। ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्मसूत्र का भाष्य पूरा होने पर भगवान वेदव्यास स्वयं आचार्य शंकराचार्य से भेंट करने आए और प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि तुम विभिन्न वादों-प्रतिवादों के सिद्धांतों को वेदांत मत से सहमत कर सारे मत वालों को पूर्ण करने का कार्य प्रारंभ करो। वेदांत की महिमा के साथ ब्रह्म तत्व के विज्ञान की पुनः प्रतिष्ठा करें।

महर्षि वेदव्यास के आशीर्वाद में ही आचार्य शंकर की शिक्षाओं का सार निहित है।
आचार्य की शिक्षा पद्धति को जानने के लिए उनके द्वारा रचित ग्रंथों से संदर्भ लेकर आगे बढ़ते है। आचार्य रचित ‘आत्मबोध’ के अनुसार जिस प्रकार किसी विषय विशेष का अध्ययन करने के पूर्व उस विषय के विशिष्ट शब्दों की परिभाषा जानना आवश्यक होता है। ऐसे पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या समझ लेने से विषय प्रवेश सहज हो जाता है। वेदांत जीवन के विज्ञान का विषय है जो मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य की ओर ध्यान आकृष्ट करता है, ऐसे उपाय एवं योजना बताता है जिससे साधक अपनी जीवन यात्रा सहज रूप से आगे बढ़ाते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। आचार्य रचित ‘आत्मबोध’ वह कुंजी है जिनसे शास्त्रों को खोलकर उनमें निहित दिव्य ज्ञान को बाहर निकाला जा सकता है। ‘आत्मबोध’ वेदांत के परिभाषिक शब्दों की विशद व्याख्या करता है।
आत्मबोध के 68 श्लोकों में आचार्य ने कलिष्ट सिद्धांतों को समझाने के लिए दृष्टांतों का उपयोग किया है। प्रत्येक श्लोक एक प्रभावशाली चित्र के समान हमारे समक्ष प्रकट होता है। वेदांत के कठिन प्रतीत होने वाले सिद्धांतों को सरलता से समझाने के लिए आचार्य ने उपमाओ का प्रयोग किया है।
आत्मबोध के श्लोक-2 में आचार्य कहते हैं –

“बोधोS न्य साधनेभ्यो हि साक्शांमोक्षेक साधनं।
पाकस्य वन्हिवज्ज्ञानं विना मोक्षो न सिध्यति ।।”
अर्थात जैसे बिना अग्नि भोजन नहीं कर सकता वैसे ही बिना ज्ञान के मोक्ष नहीं मिलता। साधनों की तुलना में आत्मज्ञान मोक्ष का सर्वोच्च साधन हैं।
श्लोक-3 में आचार्य कहते हैं –

“अविरोधितया कर्म नाSविद्यां विनिवर्तयेत।
विद्याविद्याम निहंत्येव तेजस्तिमिरसंघवत।।”

अर्थात कोई कर्म अज्ञान का नाश नहीं कर सकता क्योंकि कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं है।

प्रकाश का एक छोटा सा दीपक घनघोर अंधेरे को दूर करता है। वैसे ही अज्ञान का नाश ज्ञान से ही होता है।
वेदांत के विषय का प्रतिपादन करने हेतु आचार्य द्वारा रची गई अनेक रचनाओं में से एक उत्कृष्ट कृति है “विवेक चूड़ामणि”। चूड़ामणि वह अलंकार होता है जिसे मस्तक पर शीर्ष पर धारण किया जाता है। आचार्य द्वारा रचित यह ग्रंथ विवेक का मुकुट मणि है। इस ग्रंथ में 581 श्लोक हैं। इस ग्रंथ के माध्यम से आचार्य ने अनेक विषयों को स्पष्ट किया है। शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत शिक्षकों-विद्यार्थियों के लिए कुछ विषय जैसे ज्ञान उपलब्धि के उपाय, गुरु सपसत्ति और प्रश्न विधि, शिष्य-प्रश्न निरूपण, प्रश्न विचार आदि महत्वपूर्ण है।
सामान्यतः शिक्षकों को इन विषयों के संबंध में एक आरंभिक ज्ञान प्रशिक्षण के दौरान एवं अपने अनुभव से मिलता है किंतु आचार्य ने विवेक चूड़ामणि में परम ज्ञान को प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार से इन विषयों का विशद वर्णन किया है उनका अध्ययन एवं अनुपालन कर कोई भी शिक्षक किसी भी विषय के शिक्षण में आने वाली चुनौतियों का सामना अत्यंत सफलतापूर्वक कर सकता है।
आचार्य शिष्यों को संबोधित करते हुए कहते हैं –

“अतोविचारः कर्तव्यों जिज्ञासोरात्मवस्तुतः।
समासाद्य दयासिंधुम गुरम ब्रम्हविदुत्तमम।।”
श्लोक15 – विवेक चूड़ामणि
भावार्थ है सच्चे ज्ञान पिपासु जिज्ञासु को योग्य गुरु की शरण में जाकर उनसे आत्मा विचार एवं चिंतन करना सीखना चाहिए। वास्तव में देखा जाए तो शिष्यों को संबोधित यह श्लोक शिक्षकों का भी प्रबोधन करता है। यदि शिष्य ‘आत्मविचार एवं चिंतन कैसे करें’ यह सीखने के लिए गुरु के पास आता है तो गुरु को भी इन दोनों विधाओं में पारंगत होकर यह कुशलता विद्यार्थियों में विकसित करने की क्षमता स्वयं के भीतर विकसित करनी होगी। सही अर्थ में देखा जाए तो यही शिक्षा का उद्देश्य भी है।

आगे आचार्य कहते हैं –
“मन्दमध्यमरूपापि वैराग्येण शमादिना।
प्रसादेन गुरो: सेयं प्रवृद्धा सुयते फलं।।”

यदि विद्यार्थी मंद अथवा औसत हो तो यदि गुरु प्रयास करके शिष्यों को शम आदि षटसंपत्ति से युक्त करें तो मंद अथवा आवश्यक विद्यार्थी भी तीव्र हो जाता है।
आचार्य के अनुसार परम ज्ञान को प्राप्त करने के लिए अपने विवेक को विकसित करना होता है। विवेक को विकसित करने के लिए मुमुक्षु अर्थात ज्ञान प्राप्ति हेतु इच्छुक विद्यार्थी को साधन चतुष्ट्य से संपन्न होना चाहिए। आचार्य कहते है –

“साधन चतुष्ट्यमं किंम? नित्या नित्य वस्तु विवेक: यहां मूत्रार्थफलभोग विराग: शमादि षटसम्पत्ति मुमुक्षत्वम चेति:।”

आचार्य के अनुसार चार ऐसे गुण है जिनको आत्मसात करने पर हमारा विवेक विकसित होता है।

नित्य-अनित्य वस्तु का विवेक – इस बात को यहाँ हम लौकिक या व्यवहारिक ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करते है। विद्यार्थी जिस भी विषय का ज्ञान अर्जित करना चाहता है उसे अध्ययन अवधि में इस बात का विचार मन में सदैव रखना चाहिए कि कौन सी बात कार्य या विचार मेरे ज्ञान प्राप्ति में सहायक है और कौन सी बातें अवरोधक है। सहायक बातों का अनुराग रखते हुए निरर्थक बातों का त्याग कर देना चाहिए।

कर्मों के फलभोग से विरक्ति – विद्यार्थियों को ज्ञान अर्जन का यथाशक्ति सम्पूर्ण प्रयास करना चाहिए। लक्ष्य सामने रखना ही चाहिये किंतु उस लक्ष्य को पाने का दुराग्रह मन में नहीं रखना चाहिए। आग्रह प्रेरक होता है, दुराग्रह से मन का बोझ बढ़ता है। दुराग्रह अधिक होने से यदि अनुकूल परिणाम नहीं मिलते तो विद्यार्थी निराशा के दुष्प्रभाव में पड़ कर किसी भी सीमा तक चले जाने को प्रवृत्त हो जाता है।

शम आदि षटसंपत्ति – शम, दम, उपरिति, तितिक्षा, श्रद्धा, और समाधान इस प्रकार की छः संपत्तियां हैं।

शम – इसका का अर्थ होता है अपने मन का निग्रह अर्थात मन पर नियंत्रण। हमारे मन को यहां वहां भटकने का अभ्यास होता है, उसे भटकने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए। हमने अपना जो लक्ष्य तय करके रखा है, जिस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए हम प्रयासरत हैं उस ज्ञान को पाने के लिए अपने मन को केंद्रित करना चाहिये ताकि हमें ज्ञान प्राप्ति हेतु सभी आयामों से सहायता मिल सके।

दम – इस का अर्थ है अपनी इंद्रियों पर आधिपत्य प्राप्त करना। इंद्रियों का निग्रह इस प्रकार से करना कि वह हमारे लक्ष्य के अनुकूल विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित हो एवं उसके लिए किए जाने वाले प्रयासों को यथासंभव सहयोग करे।

उपरिती – इसका का अर्थ है अपने धर्म का पालन करना। यहां धर्म से तात्पर्य शिक्षकों के लिए शिक्षक के धर्म एवं विद्यार्थियों के लिए विद्यार्थी धर्म से है। यानि अपने शिक्षक के कर्तव्य अथवा विद्यार्थी के कर्तव्य का प्राणपन से निष्पादन करना, नवीन विचारों नवीन प्रणालियों, नवीन साधनों का अनुसंधान करना जिससे विद्यार्थी अध्ययन में रुचि ले एवं ज्ञान प्राप्ति का मार्ग उनके लिए सरल हो सके।

तितिक्षा – इसका अर्थ है प्रत्येक प्रकार की आंतरिक एवं बाहरी प्रतिकूलताओं को सहन करने की शक्ति। जिस समाज जीवन में हम जीवन यापन करते हैं यहां पर अनेक प्रकार की प्रतिकूलताओं का सामना हमें दैनंदिन जीवन में करना पड़ता है। यदि हमारे भीतर इन प्रतिकुलताओं को सहन करने की शक्ति नहीं होगी तो हम अपने मार्ग से भटक सकते हैं। हमारा ज्ञान अर्जन का प्रयास प्रभावित हो सकता है। आचार्य ने प्रतिकूलता के संबंध में अपनी सहनशीलता को बढ़ाने का आग्रह किया है। आचार्य के जीवन में भी अगर हम देखें तो उन्हें अनेक प्रकार की प्रतिकुलताओं का सामना करना पड़ा लेकिन उसके बाद वे अपने लक्ष्य से कभी नहीं डिगे।

श्रद्धा – परमसत्ता में अखंड विश्वास का नाम श्रद्धा हैं । पहले शास्त्र, गुरु फिर साधना में श्रद्धा होती हैं, उससे आत्म- श्रद्धा बढती हैं। आत्म-स्वरूप में पूर्ण श्रद्धा होने पर उस निर्गुण,निराकार, परमसत्य ब्रह्म में बुध्दी स्थिर होती है ।

समाधान – यहां समाधान से तात्पर्य चित्त की एकाग्रता से है। शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को अपने चित्र की एकाग्रता पर ध्यान केंद्रित करना अत्यंत आवश्यक होता है। शिक्षा देने एवं शिक्षा ग्रहण करने दोनों प्रक्रियाओं के लिए चित्त का एकाग्र होना अति आवश्यक है।

आचार्य के अनुसार चौथा गुण भी अत्यंत महत्वपूर्ण है ।

मुमुक्षत्व – ज्ञानार्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने की अभिलाषा एवं अचल निष्ठा। यदि शिक्षक विद्यार्थी के ज्ञानार्जन की अभिलाषा जागृत कर देते हैं तथा ज्ञान के प्रति विद्यार्थियों के मन में अचल निष्ठा की स्थापना कर देते हैं तो शिक्षण कार्य सहज हो जाता है।

आचार्य शंकर ने चार गुणों एवं छह संपत्तियों से विद्यार्थियों को युक्त करने के लिए गुरुओं से आग्रह किया है। आचार्य द्वारा प्रतिपादित वेदांत दर्शन की शिक्षा तथा लौकिक जगत की शिक्षा प्रदान करने का शास्त्रों में वर्णित उपाय आचार्य ने पुनर्स्थापित किया है।

आचार्य अन्य मतावलमबियों को अपने मत से सहमत करवाने के लिए शास्त्रार्थ की पद्धति का उपयोग किया करते थे। जो विद्वान उनके समक्ष अपने मत की महत्ता एवं केवल उनके मत की अधिमान्यता को स्वीकार करने के आग्रह से प्रस्तुत होते थे, आचार्य उनके मत को पूरा सम्मान पूर्वक सुना करते, उसके बाद उस मत की पूर्णता के लिए वेदांत की आवश्यकता प्रतिपादित कर उन्हें पूर्ण रूप से सहमत कर लिया करते थे।

आचार्य शंकर परम ज्ञान की प्राप्ति के लिए जिन सिद्धांतों एवं प्रक्रियाओं को अपनाने का आग्रह करते हैं उनका पालन कर हम अपने लक्ष्य को सहजता से प्राप्त कर सकते हैं।

(लेखक संस्कृति अध्येता एवं स्तंभकार हैं)

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