देश का युवावर्ग ही भारत को एक बार पुनः बनाएगा विश्व गुरु 

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ग्वालियर । विश्व में भारत को आज एक युवा देश के रूप में जाना जा रहा है और कई विकसित देश आज भारत से कुशल युवाओं की मांग करते हुए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि इन देशों में जन्म दर न्यूनतम स्तर तक पहुंच गई है जबकि यहां के नागरिकों की औसत आयु तेजी से बढ़ रही है और इन देशों में कार्यशील नागरिकों की संख्या तेजी से घट रही है तथा यह देश प्रौढ़ देशों की श्रेणी में शामिल होते जा रहे हैं। इसके विपरीत, भारत की लगभग 68 प्रतिशत जनसंख्या 15 से 64 आयु वर्ग की हैं, एवं 26 प्रतिशत जनसंख्या 10 से 24 आयु वर्ग में शामिल हैं। भारत की 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या (लगभग 60 करोड़ से अधिक) 25 वर्ष से कम आयु की है, जबकि 65 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। वर्तमान में भारतीय नागरिकों की औसत आयु 28.4 वर्ष है और इसके चलते ही आज भारत को विश्व के सबसे युवा देशों में गिना जा रहा है और भारत आज जनसांख्यिकी लाभांश की श्रेणी में शामिल हो गया है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की परिभाषा के अनुसार, जनसांख्यिकी लाभांश “आर्थिक विकास की वह क्षमता है जो जनसंख्या की आयु संरचना में परिवर्तन के परिणामस्वरूप उत्पन्न हो सकती है, मुख्यतः तब जब कार्यशील आयु वर्ष (15 से 64) की जनसंख्या में हिस्सेदारी गैर कार्यशील आयु वर्ग (14 वर्ष और उससे कम तथा 65 वर्ष और उससे अधिक) की जनसंख्या हिस्सेदारी से अधिक हो।” एक अनुमान के अनुसार भारत में वर्ष 2030 तक कार्यशील आयु वर्ग के नागरिकों की संख्या 104 करोड़ होगी। इस प्रकार, भारत का निर्भरता अनुपात वर्ष 2030 तक इसके इतिहास के न्यूनतम स्तर 31.2 प्रतिशत पर होगा। आगामी दशक में वैश्विक कार्यबल में लगभग 24.3 प्रतिशत की वृद्धि के साथ भारत विश्व में मानव संसाधन का सबसे बड़ा प्रदाता बना रहेगा। भारत ने वर्ष 2005-06 में जनसांख्यिकी लाभांश अवसर खिड़की में प्रवेश कर लिया था एवं वर्ष 2055-56 तक इसी स्थिति में बना रहेगा। भारत में एक गतिशील युवा जनसंख्या मौजूद है जो यदि पर्याप्त रूप से शिक्षित, कुशल, स्वस्थ और रोजगार सम्पन्न हो तो न केवल भारत बल्कि विश्व के कई अन्य देशों में भी महत्वपूर्ण प्रभाव डालने में सक्षम है।

अभी हाल ही में दिल्ली के जंतर मंतर स्थल पर जनरेशन-जी (जेन-जी) युवाओं ने कुछ विषयों को लेकर आंदोलन छेड़ा था, इन युवाओं में कुछ युवा हमारी सनातन संस्कृति द्वारा पोषित संस्कारों से एक तरह से भटकते हुए दिखाई दिए क्योंकि इन युवाओं ने देश के प्रबुद्ध वर्ग के विरुद्ध जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया, वह किसी भी रूप में भारतीय सनातन संस्कृति के संस्कारों के अनुरूप नहीं थी। यह हम सभी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि हमारे देश का युवावर्ग (भले ही बहुत कम संख्या में हो) आज किस दिशा की ओर बढ़ चला है। जब भारत आज पूरे विश्व का नेतृत्व करने की ओर बढ़ चला हो, और भारतीय युवाओं की मांग वैश्विक स्तर पर कई विकसित देशों में भी बढ़ रही हो, ऐसे समय में देश में अराजकता का माहौल पैदा करना किसी भी प्रकार से सूझबूझ भरी सोच तो नहीं कही जा सकती है।

कुछ शताब्दी पूर्व पुर्तगाली, डच, अंग्रेज आदि भारत की खोज करने के लिए आगे बढ़े थे। उस खंडकाल में भारत लगभग पूरे विश्व को कपड़ा, मसाले, स्टील एवं अन्य कई खाद्य पदार्थों को उपलब्ध करा रहा था। इन पदार्थों के भारी मात्रा में निर्यात के चलते ही भारत को “सोने की चिड़िया” कहा जाता था। क्योंकि, भारत से विभिन्न पदार्थों के निर्यात के एवज में भुगतान स्वर्ण मुद्राओं में होता था और पूरे विश्व का सोना भारी मात्रा में भारत में जमा हो गया था। लगभग 1000 वर्ष की पराधीनता के चलते भारत को सोने की चिड़िया से एक अति गरीब देश बना दिया गया। लगभग 45 लाख करोड़ डॉलर की लूट तो अंग्रेजों ने की थी, जबकि अरब के देशों से आए आक्रांताओं ने भारत को कितना लूटा था इसका तो कोई हिसाब ही नहीं है। वर्ष 1947 में स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात भी भारत में आर्थिक नीतियां कुछ इस प्रकार की बनी कि देश में आर्थिक विकास दर लगभग 5 प्रतिशत के अंदर ही बनी रही और भारत लगातार एक गरीब देश बना रहा। परंतु, वर्ष 1991 में आर्थिक एवं वित्तीय क्षेत्र में लागू किए गए आर्थिक सुधार कार्यक्रम के चलते एवं वर्ष 2014 के पश्चात देश में तेजी से चलाए गए आर्थिक सुधारों के चलते भारत एक बार पुनः वैश्विक स्तर पर बड़े देशों के बीच सबसे तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया है और आज भारत की विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में भागीदारी, क्रमिक आधार (इनक्रीमेंटल) पर, 16 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है। इस संदर्भ में आगामी कुछ समय में ही भारत, चीन को पीछे छोड़कर विश्व में प्रथम स्थान पर पहुंचने की स्थिति में पहुंच गया है।

भारत आज जनसांख्यिकी लाभांश अवसर खिड़की में पहुंच चुका है एवं भारत से आज प्रतिवर्ष 7 लाख से अधिक नागरिक अन्य देशों में जाकर बस रहे हैं क्योंकि अन्य देशों में इन नागरिकों को रोजगार एवं अपने व्यवसाय में वृद्धि करने के पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं। कई भारतीय कम्पनियों ने अपने व्यवसाय कार्यालय अन्य देशों में स्थापित कर लिए हैं एवं इन देशों में अपने व्यवसाय को बढ़ा रहे हैं अतः भारत से अपने परिवार के सदस्यों को इन देशों में भेज रहे हैं। आज विभिन्न देशों में निवास कर रहे भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या लगभग 4 करोड़ के आसपास पहुंच गई है। भारतीय मूल के नागरिक इन देशों में मेहनत करते हैं एवं इन्हें सनातन संस्कृति का वाहक भी कहा जा सकता है क्योंकि वे उस देश को अपनी कर्मभूमि के रूप से स्वीकार करते हैं एवं पूरे मनोयोग से उस देश की सेवा में रत हो जाते हैं और भारतीय मूल के नागरिक इन देशों में अपने लिए एक विशेष स्थान बना लेते है। अमेरिका में भारतीय मूल के नागरिकों की वार्षिक औसत आय 1.20 लाख अमेरिकी डॉलर से ऊपर है जबकि स्थानीय नागरिकों की वार्षिक औसत आय 60,000 अमेरिकी डॉलर है। विशेष रूप से स्वास्थ्य (डॉक्टर एवं नर्स), इंजिनीयर, वैज्ञानिक, रिसर्च एवं प्रशासन जैसे क्षेत्रों में भारतीयों की अत्यधिक मांग बन गई है। इन देशों में निवासरत भारतीय मूल में नागरिक अपनी बचत की राशि को भारत में भेजते हैं जिससे भारत को विदेशी मुद्रा की कमी महसूस नहीं होती है और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार आज 73,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। पिछले वर्ष विभिन्न देशों में निवासरत भारतीय मूल के नागरिकों ने भारत में 14,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर की राशि भारत में भेजी थी, जो पूरे विश्व में किसी भी देश में भेजी जाने वाली विदेशी मुद्रा की राशि में सबसे अधिक है। सिलिकोन वेल्ली से लेकर यूरोपीयन देशों तक भारतीय नागरिकों का महत्वपूर्ण प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। जापान, इजराईल, वियतनाम, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, कनाडा एवं यूरोपीयन देश (फ्रान्स, जर्मनी, आदि) आज कुशल भारतीय कारीगरों की मांग लगातार कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2030 तक इन देशों में 5 करोड़ से अधिक कुशल कारीगरों की कमी होने वाली है। अतः कुछ देशों ने तो इस सम्बंध में अपनी संसद में प्रस्ताव पेश किए हैं एवं भारत से कुशल कारीगरों की औपचारिक मांग की है। भारत सरकार ने भी भारत के युवाओं में कौशल विकसित करने के उद्देश्य से कई प्रकार की योजनाएं – यथा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, उड़ान, संकल्प, प्रशिक्षु अधिनियम 1961 के अंतर्गत प्रशिक्षता प्रशिक्षण, महिलाओं के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम, प्रधानमंत्री कौशल केंद्र, कौशल ऋण योजना, भारतीय कौशल संस्थान की स्थापना – प्रारम्भ की हैं। इतने कार्यक्रम प्रारम्भ करने के उपरांत भी, हाल ही में जारी एक प्रतिवेदन के अनुसार भारत में आज लगभग 8 करोड़ युवा न तो कहीं अध्ययनरत हैं और न ही अपने कौशल को विकसित कर रहे हैं। अतः भारत सरकार इस संदर्भ में अतिरिक्त प्रयास कर रही है ताकि भारतीय प्रतिभा की मांग को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाई जा सके एवं इन देशों में भारतीय कुशल कारीगरों को स्थापित किया जा सके। भारत आज प्रतिवर्ष 25 लाख से अधिक कुशल कारगर तैयार कर रहा है। भारत आज कुशल कारीगरों की आपूर्ति के क्षेत्र में एक वैश्विक इंजिन बन गया है। विभिन्न देशों के साथ भारत द्वारा सम्पन्न किये जा रहे द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के माध्यम से भी भारत की ओर से यह प्रयास किया जाता है कि भारत से कुशल कारीगरों को इन देशों में बसाने के लिए इन देशों की सरकारों द्वारा विशेष सहायता (वीजा प्रदान करने के सम्बंध में नियमों को आसान बनाना) उपलब्ध कराई जानी चाहिए। भारत ने हाल ही में जर्मनी, फ्रान्स, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया एवं जापान के साथ प्रवास एवं गतिशीलता साझेदारी समझौते सम्पन्न किये हैं ताकि भारतीय मूल के कुशल कारीगरों को इन देशों में आवश्यकता पड़ने पर कानूनी सहायता उपलब्ध हो सके। भारतीय कुशल कारीगरों की इन देशों में पर्याप्त मांग बन रही है। साथ ही, भारत इन देशों के साथ परस्पर मान्यता समझौते भी सम्पन्न कर रहा है ताकि भारतीय युवाओं को इन देशों में किसी प्रकार की अतिरिक्त शिक्षा ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं पड़े और भारतीय शिक्षा को इन देशों में समान मान्यता प्रदान की जाय। भारत उक्त देशों के साथ सम्पूर्णता समझौता भी सम्पन्न करने का प्रयास कर रहा है। कुछ देश भारतीयों को प्रदान किए जाने वाले वेतन में से सोशल सिक्यरिटी के नाम पर भारी भरकम राशि काट लेते हैं, जो उन्हें कभी वापिस ही नहीं मिलती है। उक्त समझौता इस प्रकार के नियमों को भारतीयों पर लागू करने से इन देशों को रोकता है। एक अनुमान के अनुसार, अकेले ब्रिटेन में भारतीयों को प्रतिवर्ष 48 करोड़ डॉलर की राशि की बचत होगी।

आज भारत अपने युवा वर्ग को अन्य देशों में भेजकर यह अपेक्षा भी करता है कि इन देशों में वे नई तकनीकी सीखकर भारत में वापिस आकर अपने व्यवसाय प्रारम्भ करें ताकि भारत में ही रोजगार के अतिरिक्त अवसर निर्मित किए जा सकें एवं भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात को बढ़ाया जा सके। इस प्रकार, आज भारतीय युवा, भारत के लिए अमूल्य सम्पत्ति है। अतः उक्त वर्णित परिस्थितियों के बीच भारत के युवा वर्ग (जेन-जी) को यह सोचना होगा कि वे पूरे विश्व में बड़े देशों के बीच सबसे तेज़ गति से आगे बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था को किस प्रकार अपना सहयोग प्रदान कर सकते हैं एवं विभिन्न देशों में लगातार बढ़ रही भारतीय कुशल कारीगरों की मांग की आपूर्ति में किस प्रकार अपना योगदान देकर अपने लिए रोजगार प्राप्त कर सकते हैं ताकि भारत को एक बार पुनः विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया जा सके।

आईआईएमसी हिन्दी पत्रकारिता का एक केन्द्र हुआ बंद

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दिल्ली। भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के अमरावती केंद्र में हिंदी पत्रकारिता का स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम इस शैक्षणिक सत्र में बंद कर दिया गया है। कारण सीधा है—एक भी छात्र का दाखिला नहीं हुआ। चार वर्ष पहले, 2022 में शुरू हुए इस पाठ्यक्रम की स्वीकृत क्षमता 30 सीटें थी। संस्थान के अनुसार किसी पाठ्यक्रम को चलाने के लिए न्यूनतम 10 छात्रों का होना जरूरी है। इस शर्त के पूरा न होने पर कोर्स रोक दिया गया। जो थोड़े छात्र दाखिला ले चुके थे, उन्हें जम्मू परिसर स्थानांतरित कर दिया गया।

अमरावती केंद्र 2011 में संत गाडगे बाबा अमरावती विश्वविद्यालय परिसर में पश्चिमी क्षेत्रीय केंद्र के रूप में खुला था। पहले अंग्रेजी पत्रकारिता, फिर 2017 में मराठी और 2022 में हिंदी पाठ्यक्रम शुरू हुए। उद्देश्य विदर्भ के युवाओं को पेशेवर पत्रकारिता प्रशिक्षण देना था। लेकिन 2026-27 के आंकड़े इसके उलट तस्वीर दिखाते हैं। अंग्रेजी पत्रकारिता में 30 सीटों पर शुरू में 9 छात्र आए। दो बाहरी छात्रों को जोड़ने के बाद संख्या 11 हुई। मराठी पत्रकारिता में 30 सीटों पर 10 छात्र दाखिल हुए। हिंदी बंद होने के बाद शेष दो पाठ्यक्रमों में कुल करीब 21 छात्र रह गए, जबकि तीनों पाठ्यक्रमों की कुल स्वीकृत क्षमता 90 थी। खाली सीटें भरने के लिए 13 अगस्त को स्पॉट प्रवेश भी आयोजित किया गया।

देशभर में पत्रकारिता की पढ़ाई को लेकर छात्रों की घटती रुचि की बड़ी वजह सीमित प्लेसमेंट और करियर के अनिश्चित अवसर हैं। मराठी पत्रकारिता के छात्रों के अनुसार, दाखिला रोजगार की उम्मीद में होता है, लेकिन बाद में पर्याप्त प्लेसमेंट सहायता नहीं मिलती। नौकरी के लिए व्यक्तिगत संपर्क और नेटवर्किंग पर निर्भरता बढ़ जाती है। संस्थान की ओर से प्रचार के प्रयास बताए गए हैं। अंग्रेजी और हिंदी प्रवेश सीयूईटी-पीजी पर आधारित हैं, जबकि मराठी में स्थानीय प्रवेश परीक्षा होती है। फिर भी सीटें नहीं भरीं।

इसी समय परिसर विस्तार का काम भी चल रहा है। बडनेरा में 15 एकड़ भूमि पर नया परिसर बन रहा है। अमरावती परिसर के लिए करीब 90 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है, जबकि संस्थान स्तर पर बुनियादी ढांचे के विस्तार का कुल आंकड़ा लगभग 200 करोड़ रुपये का है। विरोधाभास यही है कि भवन बन रहा है, लेकिन कक्षाएं खाली हो रहीं हैं। क्षेत्रीय परिसरों का मूल मकसद स्थानीय भाषा और स्थानीय छात्रों को अवसर देना था। व्यावहारिक स्थिति में कई केंद्रों पर क्षेत्र के छात्र कम या इक्के-दुक्के ही दिखते हैं।

यह घटना केवल एक केंद्र की नहीं है। उर्दू पत्रकारिता जैसे अन्य पाठ्यक्रम भी कम आवेदन के कारण दबाव में रहे हैं। डिजिटल मीडिया, कम वेतन, अनिश्चित नौकरियां और नेटवर्किंग पर निर्भर बाजार ने पारंपरिक पत्रकारिता शिक्षा की मांग घटाई है। हाल में नेपाल के पत्रकारिता छात्रों की शिकायतें नेपाली मीडिया के माध्यम से सामने आईं, जो इसी दिशा में संकेत कर रहीं थीं।

तथ्य यह है कि अमरावती में हिंदी पत्रकारिता इस सत्र में बंद हो चुकी है और शेष पाठ्यक्रम क्षमता से काफी नीचे चल रहे हैं। भवन और सीटें बढ़ाने से पाठ्यक्रम नहीं चलते। चलाने के लिए छात्र, शिक्षक व्यवस्था, प्लेसमेंट और स्थानीय जुड़ाव चाहिए। इनके बिना क्षेत्रीय केंद्र विस्तार का दावा अधूरा रह जाता है।

Kamala Trust Continues Relief Efforts for Flood-Affected Communities in Assam

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Guwahati: Assam, August 2026: In the wake of the devastating floods in Assam, the Kamala Ankibai Ghamandiram Gowani Trust, under the leadership of Trustee Mrs. Nidarshana Gowani, continues to extend relief and humanitarian support to families affected by the floods.Through its “Kamala With Assam” initiative, Trust volunteers are working continuously on the ground and reaching flood-affected communities with essential relief material. Relief distribution is being carried out across affected areas, including Jorhat and Sivasagar, with relief kits comprising essential household items such as plates, glasses, cooking vessels, kadhais, spoons, sanitary pads, candles and matchboxes, mosquito-protection essentials and other necessary supplies.

As part of the Trust’s continued support for Assam, Mrs. Nidarshana Gowani met Hon’ble Chief Minister of Assam Shri Himanta Biswa Sarma Ji and apprised him of the relief and service initiatives being undertaken by Kamala Trust. The Trust also extended its support to the Chief Minister’s Relief Fund, reaffirming its commitment to the ongoing relief and rehabilitation efforts.

Speaking on the relief initiative, Mrs. Nidarshana Gowani, Trustee, Kamala Ankibai Ghamandiram Gowani Trust, said:

“Our volunteers are continuously working on the ground to reach essential relief material to families affected by the floods. At this difficult time, our priority is to stand with the people of Assam and support them with whatever assistance is possible. Relief is only the first step; as the situation improves, Kamala Trust will also come forward to support reconstruction and rehabilitation wherever our assistance is needed. We will continue to stand with Assam through this difficult journey.”

The Trust has also appealed to citizens to come forward and contribute towards relief efforts, encouraging collective participation in supporting flood-affected families.

Kamala Trust remains committed to extending assistance in the days ahead and will continue to assess the situation on the ground to identify areas where further support can make a meaningful difference.

नेपाल की पत्रकारिता कक्षाएँ खाली क्यों हो रही हैं

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काठमांडू पोस्ट में 21 अगस्त 2026 में प्रकाशित दया दुद्रज की रिपोर्ट पर यह आलेख आधारित है। दुद्रज कांतिपुर डेली के लिए मीडिया, सूचना-संचार प्रौद्योगिकी और युवा मुद्दों पर लिखते हैं

काठमांडू (नेपाल ) :  कभी देशभर से महत्वाकांक्षी रिपोर्टरों को खींचने वाली मीडिया की कक्षाएं अब शांत पड़ रहीं हैं क्योंकि नेपाल में पत्रकारिता पढ़ने वाले छात्रों की संख्या तेजी से घट रही है। यह गिरावट केवल किसी एक कॉलेज की समस्या नहीं, बल्कि सिकुड़ते मीडिया उद्योग, कम वेतन, देरी से मिलने वाली तनख्वाह और असुरक्षित नौकरियों का सीधा संकेत है। शिक्षक और मीडिया पेशेवर कह रहे हैं कि युवा अब इस पेशे की बजाय दूसरे विषयों या विदेश की पढ़ाई को तरजीह दे रहे हैं।

भक्तपुर के जनप्रेमी वर्ल्ड स्कूल की पहचान कभी पत्रकारिता विभाग की वजह से हुआ करता था। 2009 में प्लस-टू स्तर पर यह कोर्स शुरू होने के बाद 57 जिलों के छात्र यहाँ नामांकन की उम्मीद लेकर आए। एक समय ऐसा भी था जब एक बैच में 76 छात्र तक भर्ती हुए और कई पूर्व छात्र मुख्यधारा के मीडिया में गए। लेकिन पिछले चार वर्षों से नया छात्र नहीं आया। प्रधानाचार्य निलेश आचार्य कहते हैं कि आखिरी बैच में केवल 19 छात्र रहने पर भी विभाग चलाया गया, लेकिन गिरती संख्या के कारण विभाग बंद करना पड़ा। विज्ञान, प्रबंधन और कानून जैसे विषय आज भी छात्रों को खींच रहे हैं।

यह अनुभव अकेला नहीं है। राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड के आँकड़ों के अनुसार, ग्रेड 11-12 में पत्रकारिता और जनसंचार पढ़ाने वाले स्कूलों की संख्या शैक्षणिक वर्ष 2022-23 में 209 से घटकर 2026-27 में 105 रह गई। छात्रों की संख्या उसी अवधि में 4,303 से 1,303 पर आ गई।

विश्वविद्यालय स्तर पर भी तस्वीर वैसी ही है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक कार्यालय के अनुसार स्नातक स्तर पर 2020-21 में 2,760 छात्र पत्रकारिता और जनसंचार में भर्ती हुए थे। 2024-25 में यह संख्या 1,132 रह गई। बीच के वर्षों का सफर भी गिरावट का ही रहा—2021-22 में 3,097, 2022-23 में 2,059, 2023-24 में 1,277 और फिर 1,132। त्रिभुवन विश्वविद्यालय से संबद्ध परिसरों की संख्या 2020-21 में 74 थी, 2023-24 में 61 और 2024-25 में केवल 57 रह गई। पूर्वांचल विश्वविद्यालय में भी नामांकन 2021-22 के 122 छात्रों से 2025-26 में 74 पर आ गया।

मैतीघर स्थित सेंट जेवियर्स कॉलेज में पत्रकारिता विभाग प्रमुख चुन बहादुर गुरुंग अपने ही कक्ष में बदलाव देख रहे हैं। कभी एक बैच में 34 छात्र पढ़ाए जाते थे, अब औसत 14-15 रह गए हैं।

कम वेतन, अनिश्चित नौकरी और विदेश की चमक

शिक्षक और कॉलेज प्रशासन कई कारण गिनाते हैं—मीडिया संस्थानों की घटती संख्या, कम वेतन, देरी से भुगतान, नौकरी की असुरक्षा, विदेश शिक्षा की बढ़ती चाह और उन विषयों की माँग जिनमें करियर साफ दिखता है। निलेश आचार्य कहते हैं कि परामर्श के लिए आने वाले ज्यादातर छात्र यही पूछते हैं कि विदेश जाने के लिए कौन सा विषय बेहतर होगा। एक हजार में शायद एक ही पत्रकारिता में रुचि दिखाता है।

कई छात्रों के लिए विदेशी शिक्षा का आकर्षण इस धारणा से और मजबूत होता है कि नेपाल में पत्रकारिता में सुरक्षित करियर कम हैं। मीडिया उद्योग स्थिर नौकरियाँ और सम्मानजनक कार्यस्थितियाँ नहीं दे पाया है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर ऋषिकेश दाहाल कहते हैं कि पत्रकारिता स्वयं समस्याग्रस्त अवस्था में है। कई मीडिया आउटलेट गायब हो गए हैं और पहले जैसी प्रतिस्पर्धा नहीं रही। ऐसी अनिश्चित पेशे से छात्रों का मुँह मोड़ना स्वाभाविक है।

दाहाल के अनुसार क्षेत्र न केवल सिकुड़ते व्यापार मॉडल से जूझ रहा है, बल्कि जनता के भरोसे के गंभीर क्षरण से भी। 2015 का भूकंप उद्योग के लिए शुरुआती चेतावनी था, लेकिन तैयारी नहीं हुई और कोविड महामारी ने फिर जोरदार झटका दिया। आर्थिक कठिनाइयों ने पत्रकारों के काम करने और दर्शकों के समाचार उपभोग का तरीका भी बदल दिया। सोशल मीडिया ने सूचना प्रकाशित और वितरित करना पहले से आसान बना दिया है, लेकिन पत्रकारिता, टिप्पणी, मनोरंजन और प्रभाव के पारंपरिक दायरे कमजोर पड़ गए हैं।

कोविड के दौरान नेपाली मीडिया पर भारी दबाव था। सितंबर 2025 के जेन-जेड प्रदर्शनों ने और विनाश लाया। पत्रकार घायल हुए और कई न्यूजरूम हमले या आगजनी का शिकार बने।

कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन के संचालक दीपेश आचार्य हालांकि कहते हैं कि समाज की सूचना तक पहुँच बहुत बढ़ी है, लेकिन भ्रामक सूचना और क्लिकबेट भी बढ़ा है। ऐसे में पेशेवर पत्रकारिता की भूमिका और महत्वपूर्ण है। जरूरत इस बात की है कि क्षेत्र में आने वाली नई पीढ़ी ठहर सके।

पाठ्यक्रम समय से पीछे, फिर भी लोकतंत्र के लिए पत्रकारिता जरूरी

शिक्षकों का कहना है कि पत्रकारिता शिक्षा उद्योग के बदलावों के साथ नहीं चली। सीजेएमसी की संस्थापक प्रधानाचार्य मंजू मिश्रा कहती हैं कि सोशल मीडिया और नई तकनीक ने सूचना के उत्पादन और वितरण का तरीका बदल दिया, लेकिन विश्वविद्यालय और कार्यक्रम उसी गति से नहीं ढले। कक्षा में जो पढ़ाया जाता है और वास्तविक न्यूजरूम में जो होता है, उसके बीच बड़ा अंतर है। नियमित इंटर्नशिप, न्यूजरूम आधारित अभ्यास और आधुनिक संचार उपकरणों के बिना शिक्षा को प्रासंगिक और बाजारोन्मुख बनाना मुश्किल है।

गुरुंग भी पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव की बात करते हैं। सवाल यह है कि हम किस तरह का पाठ्यक्रम पढ़ा रहे हैं—क्या वह समय के अनुकूल है या पुराना सिलेबस चल रहा है? बाजारोन्मुख और समकालीन पाठ्यक्रम जरूरी है। उनके अनुभव में छात्र पारंपरिक पत्रकारिता से ज्यादा कंटेंट क्रिएशन में रुचि रखते हैं। इस बदलाव को केवल खतरा नहीं मानना चाहिए। पत्रकारिता शिक्षा इसका उपयोग कर छात्रों को कई प्लेटफॉर्म पर विश्वसनीय सूचना रिपोर्ट करने, जाँचने और वितरित करने का हुनर सिखा सकती है।

गुरुंग कहते हैं कि पत्रकारिता केवल अकादमिक विषय नहीं है। यह ऐसे कुशल लोग तैयार करती है जो नागरिकों के सूचना के अधिकार की रक्षा करते हैं, जवाबदेही बनाए रखते हैं और सार्वजनिक बहस को जीवित रखते हैं।

नेपाल में पत्रकारिता शिक्षा का इतिहास आज के डिजिटल परिदृश्य से कहीं पुराना है। संस्थागत विकास आमतौर पर 1898 के सुधा सागर और 1901 के गोरखापत्र से जोड़ा जाता है। औपचारिक अकादमिक शिक्षा बाद में रत्न राज्य लक्ष्मी परिसर में शुरू हुई, जहाँ 1976 में सर्टिफिकेट स्तर पर पत्रकारिता आई, 1981 में स्नातक और 2001 में स्नातकोत्तर स्तर पर।

बाहरखरी न्यूज वेबसाइट के प्रधान संपादक प्रतीक प्रधान कहते हैं कि मीडिया संस्थानों की अपनी कमजोरी भी पत्रकारिता को करियर के रूप में कम आकर्षक बना रही है। संगठन आर्थिक रूप से ठीक से नहीं चल पाए, इसलिए समय पर वेतन नहीं दे सके। नतीजा यह धारणा बनी कि शायद पत्रकारिता पढ़नी ही नहीं चाहिए। वे चेतावनी देते हैं कि जब पेशेवर नैतिकता की स्पष्ट समझ के बिना लोग सोशल मीडिया से इन्फ्लूएंसर बन जाते हैं, तो पत्रकारिता की सार्वजनिक छवि को नुकसान होता है। सिद्धांतों और मूल्यों को समझे बिना सोशल मीडिया पर पत्रकारिता के नाम पर जो चाहे करने वाले लोगों की प्रमुखता छात्रों को हतोत्साहित करती है। यह कहने का प्रयास कम हुआ है कि पत्रकारिता सिर्फ पढ़ने से नहीं बल्कि ‘करने’ से बचेगा।

गुरुंग का निष्कर्ष साफ है—पत्रकारिता मरनी नहीं चाहिए, खासकर जब दुनिया भर में लोकतंत्र दबाव में है। यह मरी नहीं है। बेहतर यही कहना है कि यह बदल रही है। समय के अनुरूप और बाजार की जरूरत के मुताबिक बहुविषयक दृष्टिकोण चाहिए।

काठमांडु पोस्ट में 21 अगस्त 2026 को दया दुद्रज की यह रिपोर्ट याद दिलाती है कि खाली होती कक्षाएँ केवल शिक्षा की समस्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए जरूरी पेशे को बचाने को लेकर चेतावनी भी है।

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