शाश्वत चैतन्य का आलोक: आचार्य शंकर!

images-7.jpeg

करुणा सागर पण्डा

रायपुर । केवल दीर्घायु हो जाने से ही जीवन श्रेष्ठ बन जाता है, ऐसा नहीं है। जीवन की श्रेष्ठता उसकी आयु से नहीं, कर्मों की प्रगाढ़ता से होती है। शायद इसीलिए इतिहास कभी वर्षों की गिनती को याद नहीं रखता, वह परिवर्तन के हस्ताक्षर को याद रखता है। आयु का संबंध केवल घड़ी की सुइयों और कैलेंडर के पन्नों तक ही है।

देखिए न! एक व्यक्ति मात्र आठ वर्ष की अपनी आयु में एक ऐसा सपना संजोता है कि उसे उस समय के खंडित होते भारत को एक वैचारिक और सांस्कृतिक इकाई के रूप पुनर्स्थापित करना है… और वह बत्तीस वर्ष की आयु के होते तक भारत की आध्यात्मिक चेतना और भौगोलिक सीमाओं को अद्वैत के सिद्धांत में ऐसा बांधता है कि तब का वह देश, एक राष्ट्र बनकर मुस्कुराने लगता है। क्यों, है न यह एक व्यक्ति के कालजयी होकर समय की सीमा को अपने पुरुषार्थ से छोटा कर देने वाली बात? बिल्कुल है!
जी हाँ ! मैं बात कर रहा हूँ आचार्य शंकर की….

यदि आपने सत्य को ज्यों का त्यों परोसने वाले किसी इतिहासकार की कोई पुस्तक पढ़ी है तो याद कीजिए आठवीं सदी का वह समय जब बौद्ध मत अपने उत्कर्ष पर था और वैदिक धर्म पतन की ओर अग्रसर था, तब कैसे आचार्य शंकर ने अपने तर्कों और अद्वैत दर्शन के माध्यम से वैदिक धर्म का पुनरुद्धार किया था? कैसे उन्होंने दक्षिण और उत्तर के पुजारियों के लिए विनिमय नियम बनाए ताकि सांस्कृतिक मेलजोल बना रहे? कैसे उन्होंने पूरे भारत की यात्रा की और शास्त्रार्थ के माध्यम से विभिन्न मतों के विद्वानों को पराजित कर अद्वैत वेदांत की स्थापना की, जिससे वैचारिक एकता आई? कैसे उन्होंने षठमत की स्थापना कर धार्मिक मतभेद को समाप्त किया? कैसे उन्होंने संन्यास की दशनामी परंपरा को स्थापित कर भारत भर के साधु-संतों को एक अनुशासित व्यवस्था में बांध सके? कैसे उन्होंने उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता पर भाष्य लिखकर दार्शनिक एकता को स्थापित किया? और, कैसे उन्होंने देश की चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना कर यह सुनिश्चित किया था कि भारत के अलग-अलग कोनों में रहने वाले लोग भाषा और वेशभूषा के अंतर के बाद भी एक ही आध्यात्मिक चेतना से जुड़े रहें।

यह सत्य है कि भारत की पुण्यधरा पर जब-जब वैचारिक शून्यता और अधर्म का अंधकार गहराया, तब-तब किसी महापुरूष ने आकर ज्ञान के दीपक को प्रज्वलित किया है। आचार्य शंकर को भी उसी बौद्धिक आर्ष परंपरा का सबसे बड़ा पुनरुद्धारक माना जाता है। जब यह परंपरा लुप्त हो रही थी या भ्रांतियों में घिरी हुई थी, तब आचार्य शंकर ने ही अपने भाष्यों के माध्यम से ऋषि-मत को पुनः शुद्ध रूप में स्थापित कर भारतीय चिंतन की दिशा बदली थी।

मैं कुछ दिन पहले जब एस.एल. भैरप्पा जी की पुस्तक ‘सार्थ’ को पढ़ रहा था जिसमें भैरप्पा कहते हैं कि शंकराचार्य केवल सन्यासी नहीं बल्कि एक युग प्रवर्तक थे जो हमेशा ही प्रासंगिक रहेंगे…. तो उनकी इस बात पर मेरे मित्र को आपत्ति होती है। वह आचार्य शंकर की शाश्वत प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाता है। वह पूछता है कि क्या ग्यारह सौ साल पहले का कोई दर्शन आज के इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीक के युग में भी प्रासंगिक हो सकता है?

मैं कहता हूँ – “हाँ! हो सकता है।”

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केवल सूचना दे सकता है, चेतना नहीं। मनुष्य की विशिष्टता प्राप्त सूचनाओं में नहीं, उसकी चेतना और आत्म-बोध पर टिकी है। जब तक इस संसार में दुख है और सत्य की खोज की प्यास है… आचार्य शंकर हमेशा ही प्रासंगिक बने रहेंगे। आचार्य शंकर के दर्शन का सातत्य हमेशा भारतीय जनमानस में जीवित ही बना रहेगा।

वैशाख शुक्ल पंचमी – भगवत्पाद आदिगुरु शंकराचार्य की जयंती शुभ हो!

दिल्ली के दिलशाद गार्डेन में ‘संघ गंगा के तीन भगीरथ’ नाटक का मंचन 21 अप्रैल को

WhatsApp-Image-2025-12-19-at-9.28.29-PM.jpeg

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के दिलशाद गार्डेन स्थित अर्वाचीन इंटरनेशनल स्कूल में 21 अप्रैल को शाम 6 बजे से ‘संघ गंगा के तीन भगीरथ’ नामक विशेष हिंदी नाटक का मंचन किया जाएगा। नाटक के निर्देशक संजय पेंडसे ने यह जानकारी दी।
पेंडसे ने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पूरे देश में इस नाटक का मंचन किया जा रहा है। ‘संघ गंगा के तीन भगीरथ’ नाटक संघ के प्रथम तीन सरसंघचालकों- डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) और बालासाहेब देवरस के जीवन एवं उनके योगदान पर आधारित है। उन्होंने बताया कि नाटक के माध्यम से संघ की सौ वर्षों की यात्रा को सजीव रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

पेंडसे ने बताया कि दिल्ली में इसके पहले 15 एवं 18 अप्रैल को अलग-अलग स्थानों पर नाटक का मंचन किया गया। उन्होंने बताया कि आज शाम 6 बजे श्यामाप्रसाद मुखर्जी कॉलेज में नाटक का मंचन किया जाएगा। दिल्ली में इसके बाद 21 अप्रैल के अलावा 22, 24, 25, 26 एवं 28 अप्रैल को भिन्न-भिन्न स्थानों पर नाटक के मंचन की योजना है।

*दिल्ली में कब और कहां होगा मंचन*
— 21 अप्रैलः शाम 6 बजे, अर्वाचीन इंटरनेशनल स्कूल, दिलशाद गार्डेन।
– 22 अप्रैलः शाम 4 बजे, एलटीडी ऑडिटोरियम, मंडी हाउस।
– 24 अप्रैलः शाम 6 बजे, द्वारका सेक्टर तीन।
– 25 अप्रैलः शाम 6 बजे, एआईसीटीई, नेल्सन मंडेला मार्ग, वसंतकुंज।
– 26 अप्रैलः सुबह 9 बजे, सत्यवती कालेज, अशोक विहार।
– 26 अप्रैलः शाम 5:30 बजे, कमला नेहरू कालेज।
– 28 अप्रैलः शाम 6 बजे, शहीद सुखदेव कालेज, सेक्टर-11, रोहिणी।

(हिन्दुस्थान समाचार)

पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की लहर : ममता को सताने लगा हार का डर

mamata-banerjee-1.webp

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर : पश्चिम बंगाल चुनाव दिनों-दिन बेहद दिलचस्प होता दिख रहा है। अजेय समझी जाने वाली

ममता बनर्जी हैरान, परेशानी और आक्रोशित दिखाई दे रही हैं। हाल ही में एक चुनावी सभा में उनका ये बयान – ‘रहा तृणमूल तो फिर मिलेंगे’ ; ख़ूबचर्चा में है। जहां कुछ सियासी पंडित इसे ममता बनर्जी के चुनाव में सरेंडरकरने से जोड़ रहे हैं। वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि- ये उनका शक्ति प्रदर्शन का अंदाज़ ए बयां है। लेकिन जिस तरह से पश्चिम बंगाल के चुनाव में दृश्य दिखाई दे रहे हैं। वो किसी भी लिहाज़ से ममता बनर्जी के पक्ष में नहीं हैं।

अपने चुनावी अभियान के बीच ममता बनर्जी उकसावे वाले बयान दे रही हैं।चुनाव कराने आए सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ लोगों को उकसा रही हैं। 25 मार्च 2026 को दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में नंदप्रसाद गर्ल्स हाई स्कूल के मैदान में आयोजित एक जनसभा में उनका उकसावे वाला बयान सामने आया। एक वीडियो में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कथित तौर पर CRPFके जवानों को ‘धमकाती’ नजर आ रही हैं। आरोप है कि जनसभा के दौरान उन्होंने सभी महिलाओं और लड़कियों से अपील की कि- वे भारी संख्या में पोलिंग बूथ पर मौजूद रहें। चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार उन्होंने कथित तौर पर यह भी कहा कि —“अगर जरूरत पड़े तो महिलाएं CRPF जवानों से ‘निपटने’ के लिए घरेलू रसोई के उपकरणों (जैसे बर्तन या अन्य सामान) का इस्तेमाल करें।”

इस खीझ, उकसावे से — ये आईने की तरह साफ़ हो रहा है कि बंगाल की सियासी पिच से ममता बाहर हो चुकी हैं। इसी के चलते वो किसी भी मुद्दे पर जनता के बीच ख़ुद को साबित नहीं कर पा रही हैं।तिस पर ऐसे बयान दे रही हैं मानो पश्चिम बंगाल — भारत से अलग कोई देश है। जहां ममता बनर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलेगा। ममता बनर्जी को लगता है कि वोसंविधान से ऊपर हैं।लेकिन ऐसा कतई नहीं है। यहां जनता से बढ़कर कोई नहीं।ममता बनर्जी जिस मुस्लिम वोटबैंक के नाम पर एक छत्र राज कर रही थीं। वो मुस्लिम समुदाय अब अपने ‘इस्लामी’ एजेंडे की ओर बढ़ चला है। हुमायूं कबीर, असद्दुदीन ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता — मुस्लिम सत्ता और वर्चस्व की वकालत कर रहे हैं। कांग्रेस, टीएमसी की वोटकटवावाली भूमिका में है। साफ़ है कि इसका सीधा फायदा बीजेपी के खाते में क्रेडिट होगा। कांग्रेस के दिग्गज नेता कहे जाने वाले अधीर रंजन चौधरी,ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण के ख़िलाफ़ बिगुल फूंक रहे हैं। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वर्ग भी भाजपा की रैलियों और जनसभाओं में नज़र आ रहा है। मुस्लिम महिलाएं और पुरुष ये कहते देखे गए हैं कि —“ममता बनर्जी ने भ्रष्टाचार किया है। उन्होंने कोई काम नहीं किया है। ममता मुसलमानों को बीजेपी के नाम पर केवल डराने का काम कर रही हैं। जबकि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है। वहां मुसलमानों में कोई भय नहीं है वहां विकास हो रहा है।”

पश्चिम बंगाल के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले मेरे कई परिचित लोग जिनका राजनीति से कोई विशेष सरोकार नहीं है। उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। 2021 के चुनाव में जहां वो बीजेपी की राह कठिन बता रहे थे। वहीं इस बार पश्चिम बंगाल में बड़े परिवर्तन को भांप रहे हैं। उनका कहना है कि — इस बार पश्चिम बंगाल, कुछ अलग तरह के चुनावी माहौल में है। जहां पिछले चुनावों में ममता समर्थकों की गुंडागर्दी, हिंसा और उत्पात से लोग डरे-सहमे रहते थे। वहीं अब लोग ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आ रहे हैं। उन्हें अब किसी चीज़ का भय नहीं लग रहा है। जिन पोलिंग बूथों में टीएमसी के गुंडों का खौफ़ रहता था। वहां अब लोग ममता बनर्जी का खुला विरोध जता रहे हैं । साथ ही साइलेंटली भी बीजेपी के पक्ष में वहां हवा चल पड़ी है। ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण से बंगाल की जनता मुक्ति चाहती है। डेमोग्राफिक बदलाव को लेकर स्थानीय लोग ख़ासे चिंतित हैं। पश्चिम बंगाल में खुलेआम होती गौहत्याएं, जनसांख्यिकी बदलाव, गुंडागर्दी, हिंसा, अराजकता और अपराधियों को मिलते संरक्षण से वहां की जनता त्रस्त हो चुकी है।

ये संकेत बता रहे हैं कि वंदेमातरम् की राष्ट्रीय चेतना वाली बंगभूमि जागृतहो चुकी है। वहां का जन-मानस ऐतिहासिक परिवर्तन करने वाला है। बंगाली भद्रोलोक में इस बार गहन चिंतन मंथन चला है।उनका मानना है कि अगर ममता बनर्जी, अपने मज़हबी तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठियों को संरक्षण न देतीं। दुर्गा पूजा, रामनवमी, हिन्दू त्योहारों पर लगातार अंकुश लगाने का प्रयास न करती तो उनके प्रति सहानुभूति बनी रहती।लेकिनममता बनर्जी ने जिस ढंग से हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ हुई हिंसाओं में मौन साधे रखा। मज़हबी कट्टरपंथियों को संरक्षण देती रहीं। उससे बंगाली समुदाय के स्वाभिमान को धक्का लगा। संदेशखाली, आर जी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, दुर्गापुर लॉ कॉलेज, साउथ कोलकाता लॉकॉलेज में महिलाओं के साथ हुए दुराचार, अत्याचार की — वीभत्स घटनाओं ने, उनके महिला सुरक्षा के तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक महिला होने के नाते भी ममता बनर्जी का असंवेदनशील रूप पश्चिम बंगाल की जनता ने देखा है। जो ये बताता है कि वो सिर्फ़ अपने वोटबैंक की राजनीति करती हैं। उनके लिए महिला सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती है।

वहीं ममता बनर्जी का खुलकर मुस्लिम पक्षकार के तौर पर आना। लगातार केंद्र की जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू न करना। केंद्र से हर मुद्दे पर टकराव लेना। SIR— के विरोध में उतरना। मालदा में ममता राज में,

एसआइआर के काम में लगे 3 महिला सहित 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की झकझोर देने वाली घटना ने एक गंभीर ख़तरे की ओर संकेत किया है। जब एक भीड़ ने 9 घंटे तक उन्हें बंधक बनाए रखा। उकसावे के बयान दिए जाते रहे। अधिकारी अपनी जान बचाने की गुहार लगाते रहे। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद केंद्रीय सुरक्षाबलों ने उन्हें रेस्क्यू किया।

स्थिति की भयावहता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्वत: संज्ञान लिया। देर रात 2बजे तक सुनवाई की और NIA को जांच सौंपी। मामले में सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि —“कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल ने उन्हें देर रात और फिर सुबह इस स्थिति के बारे में सूचित किया था। सूचना मिलने के बावजूद मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और स्थानीय एसपी की भूमिका को ‘बेहद निराशाजनक’ है।”

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि — “न्यायाधीशों को डराने-धमकाने या उनके काम में बाधा डालने के प्रयासों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और न्यायपालिका अपने अधिकारियों की सुरक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्पित है। पीठ ने आगे कहा कि राज्य सरकार की निष्क्रियता ‘बेहद निंदनीय’ है। यह घटना न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराने और चल रही चुनावी प्रक्रिया को रोकने के लिए सोची-समझी साजिश प्रतीत होती है।”

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां ममता बनर्जी सरकार का असल चरित्र पेश करती हैं। आप सोचिए कि सीमावर्ती राज्य में ऐसे दृश्य कितने ख़तरनाक हैं। जहां एक संगठित भीड़ न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लेती हो। खुलेआम देश के संविधान और कानून को चुनौती दी जाती हो। हिंसा, उत्पात के दृश्य दिखाई देते हों। क्या ये देश की एकता और अखंडता को चुनौती नहीं है? आख़िर ये दुस्साहस कहां से आया? स्पष्ट है राज्य की ममता बनर्जी सरकार की उस तानाशाही और तुष्टिकरण की नीति से, जो केवल सत्ता चाहती है। उनके लिए राष्ट्रीयता जैसे मूल्य कोई मायने नहीं रखते हैं। कोई आम नागरिक भी सोचे कि — अगर सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप ना करता, केंद्रीय बल रेस्क्यू न करते— तो क्या न्याय अधिकारी सुरक्षित रहते? अगर वहां न्याय अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं तो क्या आम नागरिक सुरक्षित हो सकता है? क्या ये दृश्य अलगाव, आतंक को स्पष्ट बयां नहीं करते हैं? क्या किसी भी नेता, राजनीतिक दल को, देश की एकता और अखंडता को चुनौती देने की छूट दी जा सकती है?

पहले कम्युनिस्ट शासन उसके बाद ममता बनर्जी सरकार के लंबे समय के अराजक शासन से बंगाल त्रस्त हो गया है। वो अब इन सबसे मुक्ति चाहता है। इसी के दृश्य पश्चिम बंगाल में सर्वत्र दिखाई देते हैं। कोलकाता के रहने वाले एक युवा ने कहा कि— “पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाक़ों में अचानक बदलती डेमोग्राफी। पश्चिम बंगाल के संसाधनों पर डाका डालते, बांग्लादेशी घुसपैठियों, रोहिंग्याओं से लोगों में भय का वातावरण बना है।” लेकिन ममता सरकार में उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई। ये सारी बातें ममता बनर्जी को ख़ासा डैमेज कर रही हैं। सुवेंदुअधिकारी के नामांकन रोड शो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सभाओं में लगातार उमड़ता विशाल जनसमूह—बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा है। बीजेपी को‌ लेकर जनता में जैसा उत्साह 2026 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिल रहा है। वो परिवर्तन की बड़ी आहट के तौर पर दिखाई दे रहा है। महिलाओं, युवा, बुजुर्ग — सभी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के केन्द्रीय नेतृत्व, भाजपा की नीतियों को लेकर विश्वास की लहर दौड़ रही है। छोटे-छोटे बच्चे तक अपने माता-पिता के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैलियों में, सभाओं में पहुंच रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र के इंतज़ार में बच्चों के निश्छल, भावुक कर देने वाले वीडियो देखने को मिल रहे हैं। जहां तक नज़र जाती है वहां विशाल जनसमूह दिखाई देता है। जबकि दूसरी ओर ममता बनर्जी की संभाएंखाली दिख रही हैं। इसी के चलते प्रेशर से बचने के लिए उन्होंने जनसभाओं के आकार को छोटा कर दिया। ममता बनर्जी की सभाओं में लोग उनका बॉयकॉट करते नज़र आ रहे हैं। ये सब स्पष्ट संकेत हैं कि — पश्चिम बंगाल की भूमि इस बार अपने मूल स्वरूप में लौट आई है। संन्यासी क्रांति, वंदेमातरम् की भूमि- हिंसा, अत्याचार, अराजकता से मुक्ति चाहती है। वहीं पश्चिम बंगाल के अतिसंवेदनशील और संवदेनशील इलाक़ों में सेना ने जिस तरह से भयमुक्त निर्वाचन के लिए मोर्चा संभाला है। उससे जनता में उत्साह की लहर देखने को मिली है। लोग भयमुक्त होकर अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं। नए परिवर्तन के लिए आगे आ रहे हैं। स्पष्ट है कि हाल-फिलहाल पूरा गेम ममता के हाथों से फिसलता जा रहा है। पश्चिम बंगाल भाजपा की ओर रुख कर रहा है।‌येआश्चर्य की कोई बात नहीं होगी कि — 4 मई को रिजल्ट के दिन हरियाणा और महाराष्ट्र जैसा मैजिक देखने को मिले। टीएमसी दो अंकों में सिमट जाए और बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ विजय तिलक करे।

आधी आबादी बनाम आधी सोच: सदन में ठहरा न्याय

mahila-aarakshan-bill-politics-analysis-nari-shakti-vandan.webp

प्रणय विक्रम सिंह

भोपाल । लोकतंत्र केवल बहुमत का खेल नहीं, वह मूल्य और मर्यादा का विधान भी है। और जब वही लोकतंत्र उस प्रस्ताव के सामने ठहर जाए, जो आधी आबादी को निर्णय के केंद्र में स्थापित करने का साहस रखता हो, तब प्रश्न केवल एक विधेयक का नहीं, उस सोच का होता है, जो परिवर्तन से कतराती है।

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के लिए आवश्यक संविधान संशोधन बिल का सदन में पारित न हो पाना एक राजनीतिक घटना भर नहीं है, यह उस मानसिकता का अनावरण है, जो नारी के सम्मान की बातें तो करती है, पर उसे सत्ता-संरचना में वास्तविक स्थान देने से हिचकती है।

भारतीय संस्कृति में नारी केवल शक्ति नहीं, बल्कि ‘मेधा’ और ‘लोक-मंगल’ की अधिष्ठात्री रही है। यह वही भूमि है जहां गार्गी प्रश्न करती हैं, मैत्रेयी ज्ञान को सर्वोपरि मानती हैं और द्रौपदी सत्ता से धर्म का उत्तर मांगती है। ऐसे देश में नारी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सीमित रखना केवल विरोधाभास नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विस्मरण है। ‘नारी वंदन अधिनियम’ उसी सनातन संस्कार का आधुनिक संसदीय रूप था, जहां परंपरा नीति में रूपांतरित होती और श्रद्धा व्यवस्था में प्रतिष्ठित होती।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह केवल एक राजनीतिक पहल नहीं थी, बल्कि एक व्यापक दृष्टि का विस्तार थी, ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का स्वाभाविक उत्कर्ष, जिसमें नारी केवल सहभागी नहीं, बल्कि सह-निर्माता बनती है। जनधन, उज्ज्वला, शौचालय, मातृत्व सुरक्षा और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जो आधार निर्मित हुआ, वही इस अधिनियम में अपनी तार्किक परिणति पाता।

परंतु संसद में जो हुआ, वह केवल एक विधेयक का रुकना नहीं है, यह भारत की वैचारिक परंपरा के साथ एक विचलन का क्षण है।

ज्ञातव्य है कि महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत, अर्थात 352 मतों की आवश्यकता थी। किंतु इसके पक्ष में मात्र 298 मत ही प्राप्त हो सके, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया और इसी के साथ यह ऐतिहासिक अवसर अधूरा रह गया।

इसी संदर्भ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे ‘भारत माता के सम्मान पर आघात’ बताया, वहीं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तीखा प्रश्न उठाया कि देश की आधी आबादी लगभग 70 करोड़ महिलाओं को अधिकार से वंचित कर कोई कैसे विजय का उत्सव मना सकता है? किंतु विडंबना यह है कि ऐसा हो भी रहा है।

यही वह विडंबना है, जहां राजनीति का चरित्र स्पष्ट होता है। अधिकारों के प्रश्न पर भी तर्क नहीं, तरकीबें हावी हो जाती हैं।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के तर्क न केवल विरोधाभासी थे, बल्कि वे इस मूल प्रश्न से भी विमुख दिखाई दिए कि क्या नारी को समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए या नहीं। वैसे भी मातृशक्ति को अधिकार देने के मामलों में कांग्रेस हमेशा पीछे हटी है। शाहबानो मामले में पीछे हटी, ट्रिपल तलाक में पीछे हटी और अब महिला आरक्षण में भी पीछे हट गई।

वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने तुष्टीकरण की एक नई रेखा खींचते हुए महिला आरक्षण के भीतर अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए पृथक कोटा की मांग कर दी। यह मांग न केवल व्यावहारिक दृष्टि से असंगत है, बल्कि सिद्धांततः भी संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल है। भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता है।

वैसे महिला आरक्षण बिल का विरोध सपा के लिए कोई नया नहीं है। मुलायम सिंह यादव ने भी हमेशा इसका विरोध किया था। सपा प्रमुख अखिलेश ने भी अपनी उसी विरासत को आगे बढ़ाया है। दास्तान सिर्फ इतनी नहीं है, अखिलेश यादव के विरोध के पीछे एक बड़ा कारण परिसीमन भी माना जा रहा है।

प्रस्ताव के लागू होने के बाद यदि परिसीमन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और उत्तर प्रदेश की संसदीय संरचना में परिवर्तन होता है, तो शक्ति-संतुलन का पूरा समीकरण बदल सकता है।
स्वाभाविक है कि ऐसे परिवर्तन उन दलों के लिए असहजता का कारण बनते हैं, जिनकी राजनीति स्थापित समीकरणों पर टिकी रही है।

यहीं एक बात और साफ हो जाती है कि समाजवादी पार्टी के ‘सामाजिक न्याय’ की परिकल्पना में ‘महिला प्रतिनिधित्व’ अभी भी हाशिए पर ही है।

संसद में केवल एक प्रस्ताव नहीं ठहरा… ठहर गया डॉ. भीमराव आंबेडकर का वह संवैधानिक स्वप्न, जिसमें समानता केवल शब्द नहीं, अधिकार थी।

डॉ. राम मनोहर लोहिया का वह सामाजिक संघर्ष ठहर गया, जो स्त्री-पुरुष समानता को लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त मानता था।

जयप्रकाश नारायण का वह लोकनैतिक आग्रह ठहर गया, जिसमें सत्ता को समाज के प्रति उत्तरदायी होना था।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की वह कल्पना भी ठहर गई, जिसमें नारी को नैतिक नेतृत्व का केंद्र माना गया था। और यह केवल उत्तर भारत की चेतना नहीं थी, दक्षिण की धरती पर सावित्रीबाई फुले के संघर्ष से लेकर पेरियार के सामाजिक विद्रोह तक, नारायण गुरु के समता संदेश से लेकर किट्टूर रानी चेनम्मा के साहस तक, हर धारा ने नारी को केवल सहायक नहीं, बल्कि परिवर्तन का अग्रदूत माना। वे सब हार गए क्योंकि उनका मूल विश्वास यही था कि लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक उसमें नारी की पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित न हो।

दुर्भाग्य यह रहा कि विपक्ष ने इस ऐतिहासिक अवसर को अपनी संकीर्ण राजनीति की भेंट चढ़ा दिया। जिस विषय पर राष्ट्र एकमत हो सकता था, वहां विरोध केवल असहमति नहीं, बल्कि उस परिवर्तन के प्रति भय का संकेत है, जो स्थापित समीकरणों को तोड़ देता है। यह विरोध तर्क का नहीं, सत्ता के संरक्षण का था।

यह दृश्य अनायास ही महाभारत की उस सभा की स्मृति जगा देता है जहां द्रौपदी प्रश्न कर रही थी और सत्ता मौन थी। उस दिन केवल दुशासन दोषी नहीं था, वह मौन भी दोषी था, जिसने अन्याय को होने दिया। आज भी प्रश्न वही है… क्या हम फिर उसी मौन के सहभागी बन रहे हैं?

यह केवल विधेयक का गिरना नहीं था, यह उस अवसर का चूकना था, जहां भारतीय लोकतंत्र स्वयं को और अधिक समावेशी और संतुलित बना सकता था। यह उस विश्वास पर आघात था, जो करोड़ों महिलाओं ने इस आशा के साथ जोड़ा था कि अब उनकी आवाज निर्णयों में दिखाई देगी।

परंतु इतिहास साक्षी है कि भारत में नारी कभी पराजित नहीं होती। प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय जनता पार्टी ने इस विषय को जिस स्पष्टता और दृढ़ता से उठाया है, वह यह सिद्ध करता है कि यह संघर्ष रुकने वाला नहीं है। क्योंकि यह किसी दल का नहीं, भारत की आत्मा का प्रश्न है।

अब प्रश्न है कि इस संशोधन अधिनियम की सियासी बिसात पर कौन जीता? विपक्ष भले ही अपनी जीत का जश्न मना रहा हो किंतु इस बिसात पर चित और पट दोनों ही पक्ष भाजपा के साथ दिखाई देते हैं।

ध्यातव्य है कि यदि विधेयक लोकसभा में पारित हो जाता, तो यह नारी सशक्तीकरण की ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में भाजपा के खाते में जाता और अब जब यह ठहर गया है, तब विपक्ष का नारी विरोधी चरित्र उजागर हो गया है।

पार्टी ने इस मुद्दे को तुरंत जनआंदोलन का रूप देते हुए अपनी महिला सांसदों को आगे किया है, धरना-प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं और विपक्ष पर सीधे हमले तेज़ हो गए हैं। यह मुद्दा भावनात्मक हो गया है। आधी आबादी की संसद से सड़क तक पीड़ा दिखने लगी है। स्थिति यह है कि विपक्ष, विधेयक को रोककर भी सहज नहीं है। उसके नेता भले ही अपनी ‘रणनीतिक जीत’ पर संतोष व्यक्त कर रहे हों, लेकिन जनमानस में उठ रहे प्रश्न और भाजपा की आक्रामक रणनीति ने उन्हें रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है।

आश्चर्य होता है कि लोकसभा चुनाव के समय जो दल ‘संविधान बचाने’ की दुहाई दे रहे थे, उन्होंने ही डॉ. आंबेडकर के संवैधानिक स्वप्न (समानता) का गला घोंटा है। विपक्ष का असाधारण दोहरापन एक बार फिर बेनकाब हो गया।

विदित हो कि जब-जब इतिहास ने कठिन प्रश्न खड़े किए हैं, तब-तब इसी परंपरा ने उत्तर दिया है। धारा 370 का अंत हो, 35A का निष्कासन, अयोध्या में श्रीराम मंदिर का स्वप्न साकार होना या CAA जैसा साहसिक निर्णय… हर बार असंभव को संभव करने का संकल्प इसी विचारधारा ने निभाया है।

अब पुनः वही क्षण है।
आधी आबादी को नेतृत्व में भागीदारी अब केवल एक विधेयक का प्रश्न नहीं रहा, यह राष्ट्रव्यापी जनचेतना का विषय बन चुका है।
सदन भले ठहर गया हो…
पर समाज चल पड़ा है।

scroll to top