मन में 2047 में देश विभाजन का डर नहीं, अखंड भारत का संकल्प मजबूत बनाओ

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मुंबई : देश विरोधी शक्तियों के देश विभाजन के मंसूबों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक जी ने कहा कि आप 2047 में देश विभाजन का डर पालने की बजाय, अखंड भारत के उदय की कल्पना करो। जो 500 साल में सुल्तान बादशाह यहां रहकर नहीं कर सके, 200 साल में अंग्रेज नहीं कर सके। वह स्वतंत्र भारत में क्यों व कैसे होगा, यह 1947 नहीं है। हम बहुत आगे बढ़ गए हैं, अब भारत को तोड़ने वाले टूट जाएंगे। भारत जुड़ जाएगा, और यह होगा। यह संकल्प मन में मजबूत बनाओ। तो ये जो कुछ लोग दुस्वप्न देख रहे हैं, उनके मंसूबे कभी सफल नहीं होंगे। हम सब लोग हैं, हम होने नहीं देंगे।

संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘संघ यात्रा के १०० वर्ष : नए क्षितिज’ दो दिवसीय संवाद कार्यक्रम में मुंबई के ९०० से अधिक प्रतिष्ठित मान्यवरों को संबोधित किया। नेहरू सेंटर सभागार, वरळी में रविवार, ०८ फरवरी को संपन्न प्रश्नोत्तर सत्र में डॉ. मोहन भागवत जी ने उपस्थित सदस्यों द्वारा विभिन्न राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विषयों पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दिए। इस अवसर पर मंच पर पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाडेसिया, कोंकण प्रांत संघचालक अर्जुन चांदेकर, मुंबई महानगर संघचालक सुरेश भगेरिया उपस्थित थे। पूछे गए कुल १४३ प्रश्नों को १४ श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। इनमें संघ नीति, हिन्दुत्व, राष्ट्रीय परिदृश्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति, विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, संस्कृति, कला, खेल व भाषा, जीवनशैली, पर्यावरण आदि विभिन्न विषयों से जुड़े प्रश्न शामिल रहे।

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार पर सरसंघचालक जी ने बांग्लादेश के सवा करोड़ हिन्दुओं से संगठित होने का आह्वान किया। ऐसा होने पर अत्याचार पर स्वतः ही रोक लग जाएगी।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र इनमें से कोई नहीं, बल्कि हिन्दू ही संघ का सरसंघचालक होगा। उन्होंने कहा कि संघ का सरसंघचालक बनने के लिए किसी भी जाति का होना न तो बाधा है और न ही कोई अनिवार्य योग्यता। भविष्य में अनुसूचित जाति या जनजाति के कार्यकर्ता भी सरसंघचालक बन सकते हैं।

जिन पर पीढ़ी दर पीढ़ी अन्याय या अत्याचार हुआ है, उनके सर्वांगीण उत्थान होने तक तथा उनके मन में सुरक्षा की भावना उत्पन्न होने तक संविधान सम्मत आरक्षण जारी रहना चाहिए, यह संघ की स्पष्ट भूमिका है।

संघ के स्वयंसेवकों को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तथा सभी प्रकार के प्रयासों में सहभागी होना चाहिए, यह संघ की भूमिका है। किंतु केवल कानून बनाकर भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना कठिन है, इसके लिए संस्कारित समाज मन का निर्माण उतना ही महत्वपूर्ण है। साथ ही कोई भी व्यवस्था मूल रूप से भ्रष्ट नहीं होती, बल्कि उस व्यवस्था में कार्य करने वाले व्यक्तियों का मन भ्रष्ट होता है और उसी कारण व्यवस्था भ्रष्ट होती है।

जबरदस्ती या लालच देकर धर्मांतरण किया जाता है तो वह निंदनीय है और उसका प्रत्युत्तर घर वापसी होगा, यह स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा या स्वप्रेरणा से धर्म परिवर्तन करता है तो उसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। जनसंख्या का अनुपात केवल जन्मदर में कमी से नहीं बदलता, बल्कि धर्मांतरण और अवैध घुसपैठ के कारण भी बदलता है, इस ओर ध्यान दिलाते हुए अवैध घुसपैठ के संदर्भ में ‘डिटेक्ट एंड डिपोर्ट’ नीति को कठोरता से लागू करने का आह्वान किया।

हिन्दू और सिक्ख पहले से ही एक थे और आज भी उनके बीच रोटी-बेटी के संबंध हैं। उनका रक्त संबंध है। पूजा पद्धति अलग मानी जा सकती है, उनकी विशिष्टता को मान्यता दी जानी चाहिए, लेकिन वे अलग नहीं हैं। हम सभी धर्म एक ही परंपरा से आए हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में केवल सिक्ख गुरुओं की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत के संतों की वाणी संकलित की गई है। ‘हिंद की चादर’ के रूप में पहचानी जाने वाली यह प्राचीन एकता पुनः स्थापित करनी है। समाज के नाते हम सभी एक हैं, यह ध्यान में रखना चाहिए। हिन्दू नाम से कोई अलग धर्म अस्तित्व में नहीं है। आज जिसे हिन्दू धर्म कहा जाता है, वही प्राचीन सनातन धर्म है। तथागत बुद्ध ने अपने उपदेशों के माध्यम से इसी सनातन धर्म में समयानुकूल सुधार किए। आधुनिक काल में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने भी इस ओर इंगित किया।

ईसा मसीह द्वारा प्रतिपादित ईसाईयत और पैगंबर मोहम्मद द्वारा बताए गए इस्लाम का स्वरूप आज उसी रूप में दिखाई नहीं देता। इसका कारण यह है कि उनके बाद इन दोनों पंथों पर तत्कालीन राजनीति का प्रभाव बढ़ गया। परिणामस्वरूप इन पंथों की आध्यात्मिकता पीछे रह गई और राजनीतिक हित अधिक प्रभावी हो गए। इन पंथों के मूल आध्यात्मिक तत्वों को प्रोत्साहन दिया जाए तो विश्वभर के राजनीतिक संघर्ष कम हो सकते हैं।

भारत रत्न सम्मान प्राप्त न होने पर भी स्वातंत्र्यवीर सावरकर करोड़ों भारतीयों के हृदय पर राज कर रहे हैं। किंतु यदि उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाता है, तो इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

भाजपा के सत्ता में आने से संघ को कोई प्रत्यक्ष लाभ हुआ ऐसा नहीं है, बल्कि समाज में संघ की बढ़ती शक्ति और स्वीकार्यता का लाभ समान विचारधारा और भारतीय नीतियों का पालन करने वाले दलों को मिला है। संघ के स्वयंसेवकों के निरंतर परिश्रम तथा समाज द्वारा संघ को मिले स्नेह और विश्वास के कारण ही संघ का कार्य बढ़ा है। संघ से संबंधित संस्थाओं, संगठनों या दलों पर संघ दबाव नहीं डालता। यहां कार्य करने वाले स्वयंसेवकों को पर्याप्त स्वतंत्रता होती है, जिससे वे अपने क्षेत्र में आवश्यक निर्णय और प्रयोग जिम्मेदारी से कर सकते हैं। वे जो अच्छे कार्य करते हैं, उसका श्रेय उन्हीं को जाता है, लेकिन जहां कमियां रह जाती हैं, उसके प्रश्न अभिभावक के नाते हमारे पास आते हैं और उसकी नैतिक जिम्मेदारी हम लेते हैं। संघ का कार्य केवल व्यक्ति निर्माण का कार्य है। किसी विशेष क्षेत्र में कार्य करना संघ का कार्य नहीं है।

समान नागरिक संहिता पर अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि समाज की मानसिकता तैयार करके तथा सभी समाज घटकों को विश्वास में लेकर इस प्रकार का कानून लागू किया जाना चाहिए। उत्तराखंड तथा अन्य कुछ राज्यों में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, इसलिए हम उसका स्वागत करते हैं। भारत विविधता में एकता को बनाए रखने वाला देश है, यह सिद्धांत ऐसे कानून बनाते समय प्राथमिकता से ध्यान में रखना चाहिए।

संघ के कार्यकर्ताओं की औसत आयु २८ वर्ष है और इसे २५ वर्ष से नीचे लाने का प्रयास चल रहा है। देश का युवा देशभक्त और नैतिक आचरण करने वाला है। यदि उन्हें उनकी भाषा में विषय समझाए जाएं, तो वे उन्हें स्वीकार करते हैं और उसका आचरण भी करते हैं। इसलिए तार्किक पद्धति से उन्हें अपने मूल विचारों तक पहुंचाया जाना चाहिए। उन्हें प्रयोग करने की स्वतंत्रता और अवसर देना चाहिए तथा यदि प्रयोग में कोई त्रुटि हो जाए तो उनके पीछे दृढ़ता से खड़ा रहना चाहिए। यदि वर्तमान पीढ़ी युवाओं की जिज्ञासा शांत करने की क्षमता विकसित करे, तो युवा पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी के समन्वय से भविष्य का सशक्त भारत निर्माण होगा। भारतीय दर्शन का प्रभाव अंतरात्मा तक पहुंचता है, जबकि पाश्चात्य प्रभाव बाहरी स्तर तक सीमित रहता है।

बांग्लादेश: नरसिंगदी में पत्रकारों पर हमला, PEC ने अंतरिम सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग

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नवा ठाकुरिया

जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड): बांग्लादेश के नरसिंगदी ज़िले में 26 जनवरी को रंगदारों और आतंकवादी तत्वों के एक समूह ने कम से कम 12 बांग्लादेशी पत्रकारों पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया। ये सभी पत्रकार बांग्लादेश क्राइम रिपोर्टर्स एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में भाग लेने के बाद बस से ढाका लौट रहे थे। सरकारी समाचार एजेंसी बांग्लादेश संवाद संस्था (Bangladesh Sangbad Sangstha—BSS) के अनुसार, घायल पत्रकारों को नरसिंगदी सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पत्रकारों को ले जा रही बस सड़क किनारे खड़ी थी, तभी स्थानीय रंगदारों के एक समूह ने टोल के नाम पर अवैध वसूली की मांग की। पत्रकारों द्वारा विरोध किए जाने पर हमलावरों ने हथियारों से उन पर हमला कर दिया। BSS ने यह भी बताया कि हमलावरों ने पत्रकारों के साथ मौजूद उनकी पत्नियों और बच्चों को जान से मारने की धमकी दी।

इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए वैश्विक मीडिया सुरक्षा और अधिकार संगठन प्रेस एम्बलम कैंपेन (Press Emblem Campaign-PEC) ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से दोषियों को न्याय के कटघरे में लाने की मांग की है। PEC के अध्यक्ष ब्लेज़ लेम्पेन ने कहा, “यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि चुनाव की तैयारी कर रहा बांग्लादेश बीते कुछ हफ्तों में मीडिया पर हमलों की कई घटनाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। नरसिंगदी में पत्रकारों ने जबरन वसूली की कोशिश का विरोध किया और इसके जवाब में उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ा, जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।”

PEC के दक्षिण एशिया प्रतिनिधि नव ठाकुरीया ने बताया कि बांग्लादेश पुलिस ने अब तक दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि शेष गिरोह की तलाश के लिए अभियान जारी है। 170 मिलियन से अधिक आबादी वाले मुस्लिम-बहुल देश बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की निगरानी में 12 फरवरी को 13वें राष्ट्रीय चुनाव कराए जाने हैं। हाल ही में, कार्यवाहक सरकार के प्रमुख और नोबेल पुरस्कार विजेता यूनुस ने देशवासियों को स्वतंत्र, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक भावना से परिपूर्ण चुनाव कराने का आश्वासन दिया था। उल्लेखनीय है कि इसी महीने 5 जनवरी को बांग्लादेश में पत्रकार राणा प्रताप बैरागी (45) की हत्या की खबर सामने आई थी, जो संयोगवश इस वर्ष दुनिया भर में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा का पहला दर्ज मामला बताया गया।

Bangladesh scribes attacked by extortionists, PEC demands probe

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Nava Thakuria

Geneva (Switzerland): At least 12 Bangladeshi journalists were injured in an attack by extortionists and terrorists in Narsingdi locality of the south Asian nation on 26 January 2026 as the media professionals were returning to Dhaka by bus after attending a leisurely program of Crime Reporters Association of Bangladesh. According to Bangladesh Sangbad Sangstha, the Dhaka-based government sponsored news agency, reported that the wounded scribes were rushed to Narsingdi Sadar Hospital. The bus carrying the media persons was parked by the roadside when a group of local extortionists demanded money as tolls. As the journalists protested, an altercation ensued, after which the attackers assaulted them with locally made weapons, added the BSS report. The attackers even threatened to burn their accompanying wives and children.

The global media safety and rights body Press Emblem Campaign (PEC) condemned the attack and urged the interim government in Dhaka to bring the group of extortionists to justice. “It’s so unfortunate that the poll-bound Bangladesh remains in media headlines for a number of events revealing media atrocities in the last few weeks. In Narsingdi of Bangladesh, the journalists protested against an extortion bid by some unruly individuals and had to face the attacks, which is unacceptable by any means,” said Blaise Lempen, president of PEC (pressemblem.net).

PEC’s south Asia representative Nava Thakuria informed that the Bangla police have already arrested two accused continuing search operations for the rest of the gang. The Muslim majority nation of over 170 million people is preparing for its 13th national election on 12 February under the patronage of an interim regime led by Nobel laureate Dr Muhammad Yunus. Recently, the caretaker government chief assured the countrymen of a free, fair and festive polling with a truly democratic spirit. The country on 5 January reported the murder of journalist Rana Pratap Bairagi (45), who incidentally became the first journo-victim across the world this year.

राहुल गांधी द्वारा संसद में दिखाई गई नरवणे की ‘अप्रकाशित’ किताब पर विवाद गहराया, पेंग्विन ने स्पष्ट किया – प्रकाशन नहीं हुआ

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ए के मिश्रा

नई दिल्ली: पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित संस्मरण ‘Four Stars of Destiny’ को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पिछले सप्ताह इस किताब के अंशों का हवाला देते हुए सरकार पर हमला किया था, लेकिन अब प्रकाशक पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने स्पष्ट किया है कि किताब अभी तक किसी भी रूप में प्रकाशित नहीं हुई है।

राहुल गांधी ने संसद में हार्डकॉपी दिखाते हुए दावा किया कि किताब उपलब्ध थी, लेकिन “सरकार ने इसे गायब करवा दिया”। उन्होंने 2023 में जनरल नरवणे के एक पुराने ट्वीट का हवाला दिया, जिसमें लिखा था, “मेरी किताब उपलब्ध है, लिंक फॉलो करें।”

राहुल ने कहा, “या तो नरवणे झूठ बोल रहे हैं या पेंग्विन झूठ बोल रहा है। मुझे पूर्व सेना प्रमुख पर भरोसा है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि किताब में 2020 के गलवान संघर्ष के दौरान राजनीतिक नेतृत्व द्वारा स्पष्ट निर्देश न दिए जाने का जिक्र है, जो सरकार के लिए असुविधाजनक है।

हालांकि, पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने सोमवार को बयान जारी कर कहा, “हमारे पास ‘Four Stars of Destiny’ के एकमात्र प्रकाशन अधिकार हैं। किताब अभी प्रकाशन के लिए नहीं गई है। कोई प्रिंट या डिजिटल कॉपी प्रकाशित, वितरित, बेची या सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं की गई है।” प्रकाशक ने चेतावनी दी कि अनधिकृत रूप से प्रसारित कोई भी संस्करण कॉपीराइट उल्लंघन है और इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।जनरल नरवणे ने भी मंगलवार को पेंग्विन के बयान को शेयर करते हुए लिखा, “यह किताब की स्थिति है।” इससे पहले, दिल्ली पुलिस ने किताब के कथित लीक और प्रसार पर FIR दर्ज की है, जिसकी जांच स्पेशल सेल कर रही है।

प्रश्न उठ रहा है कि यदि किताब कभी प्रकाशित नहीं हुई और रक्षा मंत्रालय से मंजूरी लंबित है, तो राहुल गांधी को हार्डकॉपी कैसे मिली?

क्या यह अनधिकृत लीक है या कोई अन्य स्रोत? मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिष्ठित प्रकाशकों द्वारा बिना लोकार्पण, समीक्षा या शोर-शराबे के ऐसी महत्वपूर्ण किताब रिलीज होना असंभव है। यदि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होती, तो सोशल मीडिया पर समीक्षाएं और फोटो बाढ़ मार देती।विपक्ष का दावा है कि किताब में चीन के साथ टकराव में “राजनीतिक नेतृत्व द्वारा सेना को छोड़ दिए जाने” का जिक्र है, जबकि सत्ताधारी पक्ष इसे राजनीतिक स्टंट बता रहा है। विवाद अब कोर्ट और संसदीय समितियों तक पहुंच सकता है, जहां तथ्य और सबूतों की जांच होगी।यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रकाशन प्रक्रिया और संसद में अप्रकाशित सामग्री के उपयोग से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है। फिलहाल, किताब की सत्यता और उसके स्रोत पर बहस जारी है।

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