एक ड्राइवर की कहानी जो यहां से शुरू हुई….!

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“मैं ओला चलाता हूँ।ज़्यादातर नाइट शिफ्ट करता हूँ। पिछले हफ्ते रात ग्यारह बजे एक बुज़ुर्ग सज्जन को उठाया। सफ़ेद पंजाबी धोती, आँखों में थकान-लेकिन आवाज़ में अजीब-सी दृढ़ता।
गाड़ी में बैठते ही बोले, “आज रात मुझे पाँच जगहों पर ले चलना होगा । मैं तुम्हें 5000 रुपये दूँगा। नकद, लेकिन अंत तक कारण मत पूंछना।”

यह कहकर एक कागज़ आगे बढ़ाया। उस पर पाँच पते लिखे थे ।
पहला पड़ाव-
दक्षिण कोलकाता का एक पुराना घर।

मैंने गाड़ी रोकी। वे उतरे नहीं। सिर्फ़ खिड़की का शीशा नीचे करके देखते रहे। दस मिनट तक।
आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे, लेकिन कोई आवाज़ नहीं।
“चलो… अगला।”
दूसरा पड़ाव-
एक प्राथमिक विद्यालय। गेट बंद। अंदर अँधेरा मैदान।
वे उतरकर धीरे-धीरे झूले तक गए। एक झूले पर बैठकर हल्के-हल्के झूलने लगे।
बीस मिनट बाद लौटे। बोले –
“यहीं पढ़ाता था। तैंतालीस साल। ज़िंदगी का सबसे अच्छा समय यही था।”
तीसरा पड़ाव-
एक छोटा पुराना कॉफ़ी हाउस।
अंदर जाकर एक कप चाय मँगाई। कोने की मेज़ पर अकेले बैठे रहे। चाय को छुआ तक नहीं। बस चारों ओर देखते रहे।
पंद्रह मिनट बाद लौटकर हल्के से मुस्कुराए –
“यहीं, मेरी और मिताली (उनकी पत्नी) की पहली मुलाक़ात हुई थी। 1969 में।”
चौथा पड़ाव-
निमतला श्मशान घाट।
वे उतरे। चिताभस्म के पास एक फ़लक के सामने खड़े होकर धीमे-धीमे कुछ बोलते रहे। मैं सुन नहीं पाया।
आधे घंटे बाद लौटे। आँखें लाल थीं।
“आज तीन साल हो गए उसे गए।”
पाँचवाँ पड़ाव-
एक बड़ा सरकारी अस्पताल।
गाड़ी पार्क करने को कहा। फिर मेरी ओर देखा –
“अब कारण बताता हूँ। मुझे चौथे स्टेज का कैंसर है। डॉक्टर ने कहा है- कुछ हफ़्ते…शायद कुछ दिन। आज मैं अपनी पूरी ज़िंदगी आख़िरी बार देख लेना चाहता था।”

मैं स्टीयरिंग पर सिर रखकर रोने लगा।
उन्होंने कहा—
“वो घर—जहाँ बच्चों को बड़ा किया।
वो स्कूल—जहाँ अपना उद्देश्य पाया।
वो कॉफ़ी हाउस—जहाँ प्यार हुआ।
वो श्मशान—जहाँ आख़िरी विदाई दी।
और ये अस्पताल—जहाँ आज भर्ती होऊँगा। अब घर वापसी नहीं होगी।”
उन्होंने मेरे हाथ में 5000/- रुपये रख दिए।
“धन्यवाद, तुमने मुझे मेरी ज़िंदगी एक बार फिर घुमा दी। मेरे आख़िरी अजनबी इंसान…जिसने मेरे साथ कोमल व्यवहार किया।”
मैंने कहा-
“नहीं, ये मैं नहीं ले सकता ।”
वे बोले-
“लो, देने के लिए मेरा कोई नहीं। बच्चों ने इतनी दूरी बना ली है कि अब वो बात नहीं करते। यार-दोस्त कोई बचा नहीं, एक-एक करके सब विदा हो गये। तुमने तीन घंटे दिए—तीन घंटे की इंसानियत। उसकी कीमत पैसे से ज़्यादा है।”
छोटा सूटकेस लेकर वे अंदर चले गए।
अगले दिन मैं अस्पताल गया। पूछा-“श्री अनिरुद्ध मुखर्जी। केबिन 412”।
फूल लेकर अंदर गया। मुझे देखकर मुस्कुराए –
“तुम आए?”
“आपको ऐसे छोड़ नहीं पाया।”
दो घंटे बातें हुईं—मिताली देवी की, उनके छात्रों की, उनके रूठे हुए बच्चों की।
मैं रोज़ जाने लगा। चाय ले जाता। अख़बार पढ़कर सुनाता। कभी चुपचाप बैठा रहता।
एक दिन बोले –
“सोचता था अकेला मरूँगा। लेकिन तुम हो। आख़री वक़्त में एक अजनबी, परिवार बन गया। तुम्हें मेरा बहुत-बहुत आशीर्वाद।”
मैंने उनका हांथ पकड़ा :
“आप अकेले नहीं हैं।”
*मंगलवार भोर 3 बजकर 17 मिनट पर वे स्वर्ग चले गए।*
मैं उनका हांथ पकड़े बैठा था।
आख़िरी शब्द थे :
“सबसे कहना… अजनबियों की ओर देखना। सचमुच देखना। हम सब कहीं जा रहे हैं—कोई तेज़, कोई धीरे। जाते हुए राह में दया करना। तुमने की। तुमने मेरे आख़िरी दिनों को जीने लायक बना दिया।”
मॉनिटर की आवाज़ सीधी रेखा बन गई।
श्मशान में उनके दाह-संस्कार के समय थे—कुल छः लोग –
मैं,
तीन नर्स,
एक वकील,
और एक पूर्व छात्र।
तैंतालीस साल की शिक्षकी।
बावन साल का दांपत्य।
इक्यासी साल की ज़िंदगी।
छह लोग।
मैंने कहा—
“अनिरुद्ध बाबू ने मुझे सिखाया-
हर अजनबी किसी का पूरा संसार होता है।
हर यात्री एक कहानी है।
हर इंसान जी रहा है, मर रहा है, इंतज़ार कर रहा है—कोई उसे देखे।
उन्होंने मुझे 5000/- रुपये दिए थे जीवन की सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए।
लेकिन जो शिक्षा दी—उसकी कीमत पैसे से कहीं ज़्यादा है।
“मानवता कोई अतिरिक्त चीज़ नहीं। यही सब कुछ है।”

आज भी वो 5000/- रुपये मेरे ग्लव बॉक्स में रखे हैं। खर्च नहीं किए।
क्योंकि हर यात्री शायद अपनी आख़िरी यात्रा पर हो। हर अजनबी शायद आख़िरी विदाई दे रहा हो।
इसलिए अब मैं अलग तरह से गाड़ी चलाता हूँ।
पूंछता हूँ। सुनता हूँ। लोगों को देखता हूँ।

क्योंकि एक बुज़ुर्ग शिक्षक ने एक कोमल रात माँगी थी-और एक अजनबी रुक गया था।
निशब्द क्षण, अनकहा सत्य।

केजरीवाल ने दिल्ली वालों का भरोसा खो दिया है

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दिल्ली आज देश की जनता को संबोधित करते हुए एक रिकॉर्डेड वीडियो अरविन्द केजरीवाल ने अपने एक्स हैंडल पर दस बजकर एक मिनट पर अपलोड किया है। उसमें उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता का मुद्दा उठाया है। उनके अनुसार अब वे उनकी कोर्ट में नहीं जाएंगे और ना ही उनका कोई वकील बचाव करेगा।

इस तरह उन्होंने अपनी अराजकता वाली छवि को देश के सामने फिर से स्थापित किया है। अब वे उच्च न्यायालय से आए फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।

क्या अरविन्द जानते हैं कि उन्होंने चोरी की है इसलिए फैसला उनके खिलाफ जाएगा। अब वे मोरल ग्राउंड का हवाला देकर अपनी छवि को बचाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन देश की जनता उन्हें कहीं बेहतर तरीके से पहचान गई है।

अरविन्द केजरीवाल ने अपने बच्चे की झूठी कसम खाई। हर वह काम किया, जिसके ना करने का वादा उसने दिल्ली की जनता से किया था। अन्ना हजारे तक ने उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया।

अब उसके साथ वही एक दो लोग बचे जो उसके अपराध के साथी हैं। बाकि सब छोड़ चुके हैंं या सही समय का इंतजार कर रहे हैं।

अरविन्द के वीडियो के नीचे आए कुछ कमेन्ट

अरविन्द गांधी का नाम वीडियो में कई बार लिया। कमेन्ट बॉक्स में कोई आशीष गांधी @ASHISHG2242416 लिखते हैं
चल रे छोटा गिरगिट!
जज महोदया के सवालों का जवाब नहीं दे पा रहा!
इसीलिए सामने नहीं जाएगा !
अन्ना जी के साथ भी सत्याग्रह किया था फिर उनको ही दरकिनार कर दिया था !

RB :@Jediavatar
You cannot invite to Sheesh Mahal either
So sad 😞

भारत : @Lokeshs59793027
अब चोर तय करेंगे , की उन्हें अपना फैसला किस जज से करवाना है

Arya Acharya: @AryaAcharya7
The most Honest King of Sheesh Mahal decides how Judiciary should run 👌🏼😎👌🏼

GirijaShankarMishra : @GirijaS16761851
Bahut achha hai nautanki tumhare nas nas me Jbse tum durbhagya se rajniti me prakat huve tabse kalankit karte rahe. Aab vakta aa gaya hai Bharat sarkar ko tumko pakadkar police se lattam juttam aur muh pr itna police mare ki tumhare muh se nikle patit bhasha ka abhash hota rahe

ashish : @ashish47077903
जेल जाने से फट रही है क्या जो जनता को मुर्ख बनाने चल पड़े.. लोवर कोर्ट ने जमानत याचिका स्वीकार किया है पूर्ण रूप से जमानत नही मिला है 😂😂😂

Amit Chaudhary
@amit_ary

Ab aapko judge bhi apni pasand ke chahiye. Sir

भारत का पॉलिटिकल भविष्य : हमारी ‘च्वाइस’

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प्रो. कुसुमलता केडिया

दिल्ली। कुछ लोग कह रहे है कि आप लोग तो मोदी जी के प्रषंसक थे। अब क्या हो गया, बड़ी आलोचना करने लगे है। तो, हम तीनों तो प्रशंसक हैं ही। थे ही। हम लोग ही क्यों, लाखों लाखों लोग उनके प्रशंसक थे। इसीलिए वो इतनी बाधाओं को पार करते हुए इतने काम सुविधा पूर्वक कर पा रहे थे। तो मोदी जी के प्रशंसक क्यों थे? क्योंकि ऐसा लगता था कि भारत राष्ट्र को, भारतीय समाज को, सनातन धर्म को, जो चाहिए वो मोदी जी का नेतृत्व पूरा करेगा। बहुत लोग मानते थे पूरा करेगा, बहुत लोग मानते थे बहुलांश करेगा, बहुत लोग मानते थे कि भाई अन्यों से तो काफी ठीक करेगा यह नेतृत्व। इसीलिए तो मोदी जी के प्रशंसक थे। 2014 के पहले ये जो प्रशंसक लोग हैं इनमें अधिकांश को मोदी जी के बारे में बहुत एक सीमित जानकारी थी और उस सीमित जानकारी से ही यह आशा बंधी थी कि यह एक दृढ़ चरित्र के, प्रशासन में दक्ष और भारत राष्ट्र की बहुत उच्च आकांक्षाओं को पूरा करने में समर्थ एक नेता है।

मुख्यमंत्री के रूप में उनकी भूमिका का यह आकलन था। अब विरोध हो रहा है। विरोध होने का निश्चित कारण है। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने अनेकानेक योजनाएं पूरी कीं या उन पर कार्य किया।

यानी एक प्रकार से वो जो स्वयं बताते हैं, उन्होंने कई नई चीजों की आधारशिला रखी। पूराना मलबा साफ किया, झमेलों को साफ किया। एक अनुशासन का वातावरण बनाया। फिर ब्यूरोक्रेसी को टाइट किया। इसको टाइट किया, उसको टाइट किया, उसको दबाया, उसको ठीकठाक किया, और दूसरे कार्यकाल में तो दो चार बहुत ही बड़े-बड़े काम उन्होंने किए और दसवें स्थान से भारत को चौथे स्थान पर ले जाना, दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्रों की तुलना में आर्थिक दृष्टि से, सामरिक दृष्टि से भारत को समर्थ बनाया। हिंदू धर्म को लेके जैसे अयोध्या जी में ही रामलला की जो प्राण प्रतिष्ठा थी तो 12 दिन पूरे शास्त्रीय विधि विधान से उन्होंने उपवास किया, क्या-क्या किया जो भी बताया गया धर्माचार्यों के द्वारा किया। तो उनकी नीतियों को लेकर और वो जो दिख रहे थे सामाजिक मामलों में, राजनैतिक मामलों में, ‘परसेप्शन मैटर्स’। आप वस्तुतः क्या है? आपके हृदय में क्या है? यह तो भाई थोड़े से लोग जानते हैं। बहुत थोड़े से लोग। शेष तो चलता है कि दिख क्या रहा है? समझ में क्या आ रहा है? तो देखिए, समझ में आ रहा था कि कांग्रेस ने, नेहरू ने, इंदिरा गांधी ने, राजीव गांधी ने और बहुत सारे लोगों ने अनेकानेक प्रकार का जो नाश किया, उत्पात किया, विघ्न किया, अवरोध खड़ा किया, उसको यह व्यवस्थित ढंग से सूझबूझ से हटा रहे हैं। फिर अचानक यह यूजीसी वाला मामला आया तो सब फड़फड़ा गए। क्योंकि इस यूजीसी वाले मामले का जो सार था कि भारत का वह वर्ग जो सभी प्रकार के अनुचित अन्यायकारी आरक्षण के बावजूद पढ़ लिखकर सरकारी नौकरियों से वंचित रहकर भी राष्ट्र निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दे रहा था, उसकी शिक्षा ही बाधित की जा रही है। अच्छा शिक्षा बाधित है, केवल इतना नहीं। शिक्षा का प्रयास करोगे तो यूनिवर्सिटी कॉलेज से बाहर जाना ही पड़ेगा। तो जीवन ही दंडित हो जाएगा। चाहे आप अपराध करो या अपराध ना करो।

भाई ये क्या है? यानी 10-11 साल में जो हुआ वो दो ढाई साल में साफ और केवल साफ नहीं, अगर इसको अबाधित चलने दिया गया तो आने वाला 10-20-30 साल गया। सब तो इतने धनी मानी नहीं है कि विदेश भाग जाएंगे। बहुलांश तो ऐसा है जिसको भारत में ही जीना मुश्किल हो रहा है। भारत के बाहर कहां से जाएगा? जब मोदी जी करीब 85 करोड़ लोगों को कहते हैं कि मैं बहुत कम दाम में सस्ते में लगभग मुफ्त राशन दे रहा हूं। तो यानी सरकार के अनुसार 85 करोड़ लोगों को भोजन की समस्या है। फिर षिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और दुनिया भर की और चीजें यानी आर्थिक रूप से कमजोर जिनको आप मान रहे है, राजनैतिक रूप से मान रहे हैं, प्रशासन की दृष्टि से, शासन की दृष्टि से मान रहे हैं कि इनको मुफ्त या नगण्य मूल्य पर अनाज उपलब्ध कराना है, 5 लाख का मेडिकल इंश्योरेंस, आयुष्मान योजना और दुनिया भर की चीजें, वो लोग पढ़ने विदेष कैसे जाएंगे। इतनी महंगी फीस। तो इसका विरोध आवश्यक था। फिर उसके तुरंत बाद वो रुचि तिवारी कांड हुआ। एक पत्रकार के साथ जो कपड़ा वपड़ा खींचा गया और बाकी सब खींचा गया और इस पर तो मोदी जी की या शासन की ना कोई त्वरित प्रक्रिया हुई, ना कमेंट आया तो कहा जाए कि भाई एक एक घटना पर प्रधानमंत्री थोड़ी टिप्पणी करेंगे। तो राहुल वेमुला वाला कांड पर भी टिप्पणी करने की क्या जरूरत थी? फिर ये जो गौ हत्या के लिए, गैया को तस्कर कसाई जो ले जाते हैं इनको रोकने वाले गौ रक्षकों को गुंडा गुंडा कहने की भी क्या जरूरत थी? अगर यह होता कि इन सब में भी कोई टिप्पणी उनकी नहीं आती तो इसमें भी अपेक्षा नहीं होती। कुछ चीजों में वो इतना आगे आगे बढ़ के बोलते हैं तो फिर इसमें भी अपेक्षा होगी ही और यह तो अत्यंत गंभीर है। जिस तरह देश की राजधानी में विष्वविद्यालय परिसर में महिला पत्रकार का पुलिस की उपस्थिति में कपड़ा फाड़ा जाए और उसमें यह ‘परसेप्शन’ हो, यह दिखाई दे कि शासन मन बढ़ा रहा है तो ऐसे को तो तुरंत थाम देना जरूरी है। चाहे आप प्रशंसक हैं या नहीं है। प्रषासन किस लिए हैं? राष्ट्र के लिए अशुभ हो रहा है, तो आप निष्क्रिय नहीं रह सकते। यह तो राष्ट्र के लिए घनघोर खराब हो रहा है।

लगातार दो-तीन महीने में कई घटनाएं हुई। दो एक मैं बता रही हूं। तरुण खटीक की हत्या वाला मामला। खुलेआम नागरिक नागरिक को मार दे रहा है और शासन कुछ नहीं कर रहा। फिर वह जो बिहार में मामला हुआ एक बच्ची के साथ और यह सब जाति के आधार पर और फिर एक इतनी बड़ी जनसंख्या को अपराधी घोषित कर देना, यह तो वैसा ही था जैसा सोनिया गांधी का लक्षित हिंसा बिल था। तो यह बहुत घनघोर घातक है राष्ट्र के लिए, समाज के लिए और धर्म के लिए। इस पर शासन की जो चुप्पी दिखी, पहले तो अंदाज लगाया कि भाई बहुत कुछ होता है, उठापटक होती रहती है, ऐसा है, वैसा होगा, लेकिन 13 जनवरी से 13 फरवरी 13 मार्च 13 अप्रैल बीत गया। तीन महीना बीत गया। परन्तु शासन की चुप्पी पूर्ववत है। तो विरोध तो आवश्यक है। अन्यथा यह वार्ताएं करने की आवश्यकता ही क्या है? ये एक प्रकार का शिक्षण और प्रबोधन ही तो है। तो शिक्षण और प्रबोधन मैं राष्ट्रभक्ति के प्रसार के लिए कर रही हूं। राष्ट्र, समाज, धर्म ये आपस में गुम्फित है। तीनों के लिए महाघातक, महाविनाशकारी नीतियां और लगातार जो घटना क्रम हुआ उससे लगा कि यह लगातार चलता जाएगा। इसके पहले अनेक घटनाएं हो चुकी थी। सुप्रीम कोर्ट ने शायद क्रीमी लेयर को हटाया। वस्तुतः इस प्रकार आरक्षण देना ही गलत है। देने के बाद जिन लोगों के नाम पर दिया जा रहा है उनको तो मिल ही नहीं रहा है। मिल किसको रहा है? बहुत थोड़े से लोग उसको ले पा रहे हैं। तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा भाई देना है तो इस प्रकार दो, क्रीमी लेयर हटाओ। उस मामले में शासन ने कहा कि नहीं। फिर सुप्रीम कोर्ट ने कहा – वह एससी एसटी एट्रोसिटी एक्ट में नेचुरल जस्टिस (प्राकृतिक न्याय) बाधित हो रहा है तो उसको हटाओ। परन्तु उसे और भयंकर कर दिया गया, वगैरह वगैरह।
यह जो पॉलिटिकल फ्यूचर ऑफ इंडिया का मुद्दा है, तो राजनीति जो है वो साधन है। अब भारत में पॉलिटिक्स हो रहा है। राजनीति तो हो ही नहीं रहा है। राजनीति होने के लिए राजा और प्रजा का संबंध आवश्यक है। जब राजा प्रजा का संरक्षण कर रहा है राज्य नामक संस्था के द्वारा तो उस राजा के राज्य की जो नीति है प्रजा के पोषण संवर्धन और संरक्षण के लिए वो राजनीति कही जाती है। 1947 के बाद इस संविधान के द्वारा वो राजनीति तो पूरी तरह गयी। समाप्त हुई। तो अब हो क्या रहा है पॉलिटिक्स। तो भारत का पॉलिटिकल फ्यूचर क्या है? तो पॉलिटिकल फ्यूचर भी अगर देखें तो भारत के राष्ट्र भारतीय समाज और सनातन धर्म के उन्नयन के लिए निरंतर स्टेट काम करें, यह उसका कर्तव्य है। वो स्टेट काम करें तो कैसे करें? हम लोगों ने देखा 2014 के पहले धीरे धीरे धीरे बेलगाम उच्छृंखल निरंकुश सत्ता आती गई। लेकिन ऐसा तो नहीं कि वो सब कर पाई अपने मन का। अपने मन का कर पाती तो नेहरू जी कोलकाता बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) को दे देते। पूरा कश्मीर नेहरू जी पाकिस्तान में मिलवा देते। जूनागढ़ पाकिस्तान में जाता। हैदराबाद इंडिपेंडेंट होता। नेफा भारत से बाहर होता। लेकिन नेहरू जी नहीं कर पाए। क्यों नहीं कर पाए ? भारतीय समाज के कारण और जब मैं भारतीय समाज कह रही हूं, स्वाभाविक है कि इसमें देशभक्तों की बात कर रही हूं। सजग जागरूक राष्ट्र चेतना से संपन्न नागरिकों की बात मैं कह रही हूं। मैं देशद्रोहियों, उपद्रवियों, बलवाइयों, बलात्कारियों, दंगाइयों, विभाजनकारियों की बात तो नहीं कर रहे। क्योंकि राज्य का काम तो उनको दंडित करना है। क्यों दंडित करना है? क्योंकि यह राष्ट्र के उन्नयन, संवर्धन और पोषण में बाधक तत्व है।

जैसे अमित शाह जी ने किया। यह जो लाल गलियारा की योजना थी, उसे नष्ट कर दिया। यह जो नक्सली मूवमेंट यानी मोटा मोटा अपराधियों का एक जुनूनी संगठित आपराधिक गिरोह था। जिसको अनेक राज्यकर्ताओं का संरक्षण था। बाहर का भी था, चीन का था, चर्च का था और इंडियन स्टेट का भी था। तो इंडियन स्टेट कहने का मतलब यह तो नहीं कि सभी राजनेता लेकिन इंडियन स्टेट के ड्राइविंग सीट पर जो बैठा हुआ है जैसे अभी मोदी जी इंडियन स्टेट के ड्राइविंग सीट पर बैठे है और कह सकते हैं भाजपा ड्राइविंग सीट पर बैठी। इनको कहेंगे। तो उसी प्रकार कांग्रेस आदि के शासन में जुनूनी संगठित आपराधिक गिरोहों को भरपूर संरक्षण दिया गया। अमित शाह ने उसका नाश कर दिया। तो उसका देश में स्वागत हुआ।

नाश क्यों किया गृहमंत्री अमित शाह जी ने? क्योंकि वह राष्ट्र के सभी प्रकार के सुख समृद्धि उन्नयन में बाधक था। अगर तीव्र गति से आर्थिक विकास चलाना है, मैं तो इसे कहूँगी कि भारत में समृद्धि लानी है तो इस प्रकार का हिंसक वातावरण उसमें बाधा डालता है। उसको नष्ट करना पड़ता है। यह जो इतना बड़ा यह लव जिहाद, हलाल इकॉनमी, वक्फ बोर्ड के नाम पर लूट, चर्च के नाम पर दी गई शासकीय भूमि और उनके द्वारा संचित सम्पत्तियों का दुरूपयोग सनातन धर्म को घोषित रूप से नष्ट करने के लिए और जिसको आतंकवाद कह रहे हैं उन सबका पोषण।

अतः इन सब को तो रोकना होगा। क्यों रोकना होगा? यदि देश को चौथी की जगह तीसरी, तीसरी की जगह दूसरी, दूसरी की जगह पहली इकॉनमी बनना है तो इन गिरोहों को रोकना ही होगा। यदि हम नहीं चाहते हैं कि डिफेंस पर ज्यादा खर्च हो। डिफेंस पर ज्यादा खर्च क्यों करना पड़ेगा? पाकिस्तान और चीन सर उठाएंगे। पाकिस्तान और चीन दोनों बॉर्डर पर लड़ के इंडियन आर्मी से नहीं जीत पाएंगे। तो क्या करते हैं? सारी दुनिया में जो होता है। देश के अंदर दुनिया भर की गड़बड़ी। अब दुनिया भर की गड़बड़ी में कुछ सेंसिटिव चीजों पर मैं बात कर रही हूं। जिसको हनी ट्रैप यानी गोपनीय दस्तावेज बाहर। कैसे बाहर? प्रधानमंत्री की बहू, प्रधानमंत्री के बेटे को हनी ट्रैप में ले लिया। राजीव गांधी को, लालू यादव को और बहुत बहुत पॉलिटिकल घरों की बहुऐं पत्नियां या बेटियां उस दायरे में आ गईं तो उससे क्या होगा? उस घर में जो सब प्रकार के लोग आते जाते है, बातें होती है, वह सब विदेष में भारत विरोधी एजेंसियों को जानकारी मिलती रहती है। इसी तरह आर्मी के बड़े अधिकारी, इसी तरह ब्यूरोक्रेट्स, इसी तरह जुडिशरी, वगैरह वगैरह। तो विदेशी शक्तियां क्या चाहती हैं? आप कमजोर रहें। यह वे केवल भारत के लिए थोड़ी चाहती है। चीन की विरोधी जो विदेशी शक्तियां है वो चीन को कमजोर चाहती है। रूस की विरोधी जो विदेशी शक्तियां है वो रूस को कमजोर चाहती हैं। अमेरिका की विरोधी जो विदेशी शक्तियां है वो अमेरिका को कमजोर चाहती है। जो भारत की विरोधी विदेशी शक्तियां है, शत्रु शक्तियां है वो भारत को कमजोर चाहती है। पॉलिटिकल फ्यूचर क्या होगा? ड्राइवर के सीट पर बैठा हुआ व्यक्ति तय नहीं करेगा। तय कौन करेगा? भारत के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामरिक उन्नयन के लिए अभिलाषी सामर्थ्यवान काम करने वाले लोग। उनकी इच्छाएं, उनके संकल्प, उनकी अभीप्साएं, उनकी आकांक्षाएं, तय करेगी। इसीलिए 2014 में ऐसे लोगों ने नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री चुनकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया। भाजपा के समस्त विरोध के बावजूद। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर एक धडे़ के प्रचंड विरोध के बावजूद। बाकी पार्टियों का वश चलता तो उनकी चटनी बना देते। तो उनको प्रधानमंत्री की कुर्सी पर किसने बैठाया? भारत के उन करोड़ों लोगों ने जिनको लगा कि जो उपलब्ध हैं, उनमें ये सर्वश्रेष्ठ हैं। क्योंकि हमारा तो काम यही होता है कि जो उपलब्ध है उसमें सबसे अच्छा क्या? तो उसमें परसेप्शन का महत्व है।

मोदी जी कौन है, क्या कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं, कोई भी उतना ही जानेगा जो पब्लिक डोमेन (सार्वजनिक जीवन) में जानकारी उपलब्ध है। उस जानकारी के आधार पर और उनके क्रियाकलाप और उनके भाषण। उनके कार्य जो वो गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में काम किए। जिस प्रकार से अन्य लोग उनका भीषण विरोध कर रहे थे। उससे लगा कि भाई क्यों कर रहे हैं? तो सार्वजनिक मामलों में ‘परसेप्शन मैटर्स अ लॉट’, तो उनको प्रधानमंत्री किसने बनाया? उन देशभक्त, राष्ट्रभक्त, राष्ट्र को पुनः सशक्त और समृद्धिशाली देखने की आकांक्षा वाले लोगों ने।

ITBP Launches First CAPF Medical Teaching Institute

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New Delhi : In a landmark initiative, the Indo-Tibetan Border Police (ITBP) today inaugurated the Himveer Postgraduate Institute at CAPFs Referral Hospital, Greater Noida.

DG ITBP Shri Shatrujeet Kapur, IPS inaugurated the institute, marking the first medical teaching facility within CAPFs.

The upgraded 200-bedded hospital is now a tertiary care and academic centre, accredited by NBEMS and aligned with NMC norms.

The institute starts with PG seats across 05 disciplines, with DNB courses in General Medicine and Pathology, and Diploma courses in Paediatrics, Anaesthesia and Family Medicine. Six PG residents (ITBP & CRPF) have been inducted.

The initiative will boost in-house medical training, reduce dependence on external institutions, and strengthen healthcare capacity within CAPFs.
ITBP plans to develop it into a medical college with 50 MBBS seats in future.

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