अब समय रैना ‘अश्लील’ नहीं रहा

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दिल्ली। भाजपा के सोशल मीडिया योद्धा अभी भी उसी कुर्सी पर बैठे हैं, जहाँ से उन्होंने कुछ महीने पहले उन्हें ‘दो कौड़ी का कॉमेडियन’ घोषित किया था। ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ के उन संवादों पर, जिन्हें संस्कृति का अपमान बताया गया था, अब वही महाराष्ट्र सरकार सम्मान की माला पहना रही है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने साइबर जागरूकता कार्यक्रम में रैना को सम्मानित किया। वही साइबर सेल, जिसने कभी उनके शो के क्लिप्स पर कार्रवाई की थी, अब उन्हें मंच पर बुलाकर फूलमाला दे रही है।

तथ्य साफ हैं। 2024-25 में ‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ के विवादित एपिसोड के बाद मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र साइबर सेल सक्रिय हुई। दिव्यांगों पर असंवेदनशील टिप्पणियों और अश्लील अंदाज को लेकर कई एफआईआर दर्ज हुईं। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में मामलों को रद्द किया, लेकिन तब तक नैरेटिव तय हो चुका था—यह ‘ह्यूमर’ नहीं, मर्यादा का उल्लंघन है। भाजपा समर्थक मंचों पर रैना और रणवीर इलाहाबादिया को निशाना बनाया गया। ‘लौंडे’ जैसे शब्द उसी बहस का हिस्सा बने। कार्यकर्ताओं ने रात-दिन पोस्ट किए कि ऐसी भाषा युवाओं को बिगाड़ रही है।

अब वही चेहरा सरकारी अभियान का हिस्सा है। 26 अगस्त 2026 को मुंबई के सह्याद्री गेस्ट हाउस में ‘डिजिटल अरेस्ट’ शॉर्ट फिल्म और ‘1930 महाराष्ट्र साइबर एंथम’ का लोकार्पण हुआ। फडणवीस ने कलाकारों को धन्यवाद दिया कि वे साइबर ठगी के खिलाफ जागरूकता फैला रहे हैं। रैना उनमें शामिल थे। मंच पर उन्होंने खुद मजाक उड़ाया—“महाराष्ट्र साइबर सेल से मेरा रिश्ता बहुत पुराना है। 1930 वाकई बढ़िया नंबर है, मैंने सेव कर रखा है क्योंकि अक्सर वहीं से कॉल आते हैं। पहली बार साइबर सेल वाले घर से उठाकर सम्मानित करने आए।” हंसी गूंजी, कैमरे चमके।

कार्यकर्ता की पीड़ा यहीं से शुरू होती है। जो भाई महीनों से ‘अभिव्यक्ति की सीमा’ पर पोस्ट कर रहे थे, उन्हें अब समझ नहीं आ रहा कि वैधता किसे मिली। कल तक जो भाषा अश्लील थी, आज वही भाषा सरकारी मंच पर ‘ह्यूमर’ बन गई। फडणवीस स्वयं पहले कह चुके हैं कि स्टैंड-अप कॉमेडी मर्यादा के न्यूनतम मापदंडों के साथ होनी चाहिए। कुणाल कामरा के मामले में ‘लो-लेवल कॉमेडी’ कहकर माफी मांगी गई थी। अब वही सरकार उसी धारा के कॉमेडियन को अपना चेहरा बना रही है।

भाजपा आईटी सेल वालों के लिए अब कुणाल कामरा या रणवीर इलाहाबादिया पर कुछ कहना खतरे से खाली नहीं। क्या पता कल वे भी किसी सरकारी अभियान में शामिल कर लिए जाएं। जंतर-मंतर की जेन-जी भाषा पर अब कैसे आपत्ति जताई जाए, जब समय जैसे ‘गालीबाज’ को अपने मंच पर बुलाकर सम्मानित किया जा रहा है? कार्यकर्ता सोच रहे होंगे—हम नैरेटिव की लड़ाई लड़ रहे थे, ऊपर से फैसला आ गया कि वही नैरेटिव सरकारी मुहर लगाकर चल सकता है।

यह दोहरापन महाराष्ट्र सरकार की शैली बनता जा रहा है। सिद्धांत तब तक सिद्धांत रहते हैं, जब तक फोटो-सेशन की जरूरत न पड़े। साइबर ठगी रोकना जरूरी है, जागरूकता अभियान भी सही है। लेकिन जिस व्यक्ति को कल तक संस्कृति का दुश्मन बताया गया, उसे आज उसी संस्कृति की रक्षा करने वाली सरकार का ब्रांड एंबेसडर बनाना विरोधाभास है। कार्यकर्ता पूछ रहे हैं-आखिर लड़ाई किससे थी? भाषा से, अंदाज से, या सिर्फ उस व्यक्ति से जो उस समय सत्ता के अनुकूल नहीं था?

‘जो अपना है वो दो कौड़ी का है’-यह हीनभावना भाजपा को बार-बार घेरती है। अपने कार्यकर्ताओं द्वारा खड़े किए गए नैरेटिव को सत्ता में आकर खुद ध्वस्त कर देना, फिर उनसे उम्मीद करना कि वे चुपचाप नए नैरेटिव को स्वीकार कर लें। समय रैना अब अश्लील नहीं रहे, क्योंकि सरकार ने उन्हें अश्लील न मानने का फैसला कर लिया। कार्यकर्ता अभी भी उसी कुर्सी पर बैठे हैं। बस कुर्सी अब थोड़ी और अकेली पड़ गई है।

यह झूठ है कि अंबेडकर द्वारा दिया गया पानी मदन मोहन मालवीय ने नहीं पिया

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दयानंद पांडेय

लखनऊ। अपनी घृणा में लथपथ कितना तो कम जानते हैं आप मदन मोहन मालवीय के बारे में l जानते तो रमेश भाटी के इस विष में अपना विष भी न मिलाते l आप हाला कि सब जानते हैं पर अपने एजेंडे में इतना व्यस्त , न्यस्त और त्रस्त हो चुके हैं कि तथ्य से आप का अब कुछ लेना देना नहीं रह गया है l कान के लिए कौए के पीछे भागने की लत लग गई है आप को।

मदन मोहन मालवीय और अंबेडकर की उम्र का फर्क जानते हैं ? मदन मोहन मालवीय और गांधी की उम्र का फर्क जानते हैं ? मदन मोहन मालवीय इन दोनों से न सिर्फ़ उम्र में बड़े हैं , काम में भी बहुत बड़े हैं l बस प्रचार के दुकानदार नहीं हैं। जब गांधी और अंबेडकर परिदृश्य में भी नहीं थे तब मदन मोहन मालवीय ने कलकत्ते से अछूतोद्धार आंदोलन शुरू किया था और बहुत सफल रहा था। प्रोफ़ेसर मुकुट बिहारी द्वारा लिखित मदन मोहन मालवीय की जीवनी कभी पढ़िए। मालवीय जी के तमाम काम आप को मालूम हो जाएंगे।

एक वाक़या है बाबू जगजीवनराम का। जगजीवनराम बी एच यू में पढ़ते थे। हॉस्टल में रहते थे। मदन मोहन मालवीय को मालूम हुआ कि जगजीवन राम मेस में नहीं खाते। उन की थाली भी अलग है। उन का भोजन उन के कमरे में दे दिया जाता है। मदन मोहन मालवीय एक दिन भोजन के समय हॉस्टल आए। जगजीवन राम को उन के कमरे से लिवा कर मेस में आए। उन के साथ बगल में बैठ कर न सिर्फ़ भोजन किया बल्कि सब को साथ बिठाया। सब ने साथ भोजन किया। फिर मदन मोहन मालवीय ने जगजीवन राम की थाली भी ख़ुद धोई।

दूसरे दिन से जगजीवन राम मेस में सब के साथ सामान्य ढंग से भोजन करने लगे। माहौल बदल गया था। ऐसे अनेक काम हैं दलित उद्धार और छुआछूत के ख़िलाफ़ मदन मोहन मालवीय के। और आप का प्रिय भाटी बता रहा है कि आंबेडकर का दिया पानी नहीं पिया मालवीय ने और इस बेसिर पांव की बात को ले कर आप अपनी घृणा में ले कर उछल पड़े हैं।

रमेश भाटी तो जहरीला और अनपढ़ आदमी है पर आप को अभी तक पढ़ा लिखा आदमी मानने के लिए मेरा विवेक कहता है। फिर भी बड़े सम्मान और आदर के साथ आप को चुनौती दे कर पूछता हूं कि अंबेडकर द्वारा दिया गया पानी मदन मोहन मालवीय ने पीने से इंकार कर दिया, इस का कोई प्रामाणिक आधार है, आप के पास तो कृपया उपस्थित कीजिए। जानता हूं, आप अपने एजेंडे के तहत ऐसा नहीं कर सकेंगे l इस लिए भी नहीं कर सकेंगे कि इस का कोई आधार या प्रमाण नहीं है दुनिया में। अपने एजेंडे के जहर के प्रभाव में इस कमेंट की नोटिस नहीं लेंगे। इस लिए भी कि लोकतंत्र और संवाद में अब आप का यकीन नहीं रहा। सिर्फ अपनी गोलबंदी के कुएं में ही आप कैद हो कर रह गए हैं। फासिज्म की इंतिहा है यह।

आप नहीं जानते और स्वीकारते तो यह एक तथ्य और जान लीजिए कि मदन मोहन मालवीय महात्मा गांधी के मेंटर थे l गांधी ने यह ख़ुद स्वीकार किया है। गांधी वांगमय में संकलित चिट्ठियों में लिखा है, गांधी ने l स्वदेशी आंदोलन और हरिजन प्रेम गांधी ने मदन मोहन मालवीय से सीखा l स्वदेशी आंदोलन के जनक हैं मदन मोहन मालवीय l उस समय न सिर्फ़ स्वदेशी आंदोलन शुरू किया मालवीय ने बल्कि मुकदमा कर अंग्रेजों को प्रति वर्ष इंग्लैंड भेजी जा रही अंग्रेज़ों को पाँच करोड़ की पेंशन बंद करवा दिया l चौरीचौरा कांड के 99 प्रतिशत को फाँसी की सज़ा से ही नहीं , बाईज्जत बरी करवा दिया l अंबेडकर ने किसी एक भी स्वतंत्रता सेनानी को कभी छुड़ाया ? कोई मुकदमा लड़ा ? थे तो वह भी बैरिस्टर ही। लेकिन दुर्भाग्य कि लोग सिर्फ बी एच यू के लिए जानते हैं मदन मोहन मालवीय को। मालवीय जी ने सिर्फ़ बी एच यू ही नहीं बनाया l आज जो आप उर्दू मिश्रित हिंदी पढ़ते हैं , मदन मोहन मालवीय की देन है ।

ऐसा बहुत कुछ है जो आप मदन मोहन मालवीय के बारे में नहीं जानते l बी बी सी वाले मधुकर उपाध्याय को तो आप जानते ही हैं l मदन मोहन मालवीय पर लिखी उन की किताब ही पढ़ लीजिए l मधुकर उपाध्याय न संघी हैं , न भाजपाई l पर आप इन दिनों अपनी घृणा में इतने लथपथ हैं कि कुछ जानने समझने का अवकाश कहां रह गया है आप के पास ?

पुन: चुनौती दे कर पूछ रहा हूं कि अंबेडकर द्वारा दिया गया पानी मालवीय द्वारा न पिए जाने का क्या प्रमाण है ? कोई प्रामाणिक दस्तावेज या कोई किताब है ? कि अंबेडकर ने कहीं लिखा है ? एक बात और जान लेनी चाहिए आप और आप जैसे घृणा और नफरत में लोटपोट लोगों को कि मदनमोहन मालवीय महान स्वतंत्रता सेनानी थे। अंबेडकर स्वतंत्रता सेनानी नहीं , अंग्रेजों के ख़ास पिट्ठू थे। गांधी ने उन्हें इस पिट्ठूगीरी से कैसे और किस कीमत पर निकाला , यह जानने के लिए भी गांधी वांग्मय पढ़िए और पूना पैक्ट के डिटेल भी।

छुट्टी लीजिए अपनी घृणा और नफ़रत से l इस फेर और कुटैव में आप अपनी रचनात्मकता बिसार गए हैं l यह बहुत ही अफ़सोसजनक है हमारे जैसे आप के प्रिय लोगों के लिए l कि आप को मदन मोहन मालवीय जैसे विराट व्यक्ति के बारे में इस तरह कीचड़ में नहाना पड़ा है l नहीं जानते तो अब से जान लीजिए कि मदन मोहन मालवीय बैरिस्टर ही नहीं , बहुत बड़े पत्रकार और संपादक भी रहे हैं l मालवीय जी के संपादक और उस की रीढ़ के बारे में सुनेंगे तो दांतों तले उंगली दबा लेंगे l मदन मोहन मालवीय के संपादक का भी एक क़िस्सा सुन लीजिए। राजा कालाकांकर रामपाल सिंह ने अंग्रेजों से लड़ने के लिए 1887 में इलाहाबाद से एक अख़बार हिंदुस्तान निकाला। मदनमोहन मालवीय को दो सौ रुपए महीने पर संपादक बनाया। जो आज के कोई बीस लाख रुपए महीने से भी अधिक ठहरेगा। अक्सर मालिकान संपादकों से शर्त रखते हैं। हिंदुस्तान में मालवीय जी ने अखबार मालिक से एक शर्त रखी कि जब भी कभी आप शराब पिए हों तो मुझे भूल कर भी नहीं बुलाएं। कोई ढाई साल तक राजा कालाकांकर ने मालवीय जी की इस बात का ख्याल रखा। और शराब पिए रहने पर कभी नहीं बुलाया।

एक रात वह यह बात भूल गए।

शराब पी ली और मालवीय जी को बुला लिया। मालवीय जी गए और उलटे पांव लौट आए । इस्तीफ़ा भेज दिया। राजा कालांकाकर ने इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं किया। मालवीय जी फिर भी नहीं गए। पर दो सौ रुपए महीने मालवीय जी के घर राजा कालांकाकर भिजवाते रहे। यह सोच कर कि शायद मालवीय जी लौट आएं। बहुत समय बाद किसी कार्यक्रम में दोनों की भेंट हुई। मालवीय जी ने कहा कि हमने आप के अख़बार की नौकरी छोड़ दी है फिर भी आप पैसे भिजवा रहे हैं। राजा साहब ने कहा कि हमने आप को कर्मचारी नहीं रखा था। आप परिवार के सदस्य हैं। इस लिए पैसे भेजता रहूंगा। मालवीय जी फिर भी अखबार में नहीं लौटे।

जानिए कि एक समय मदन मोहन मालवीय और मोतीलाल नेहरू दोनों ही बड़े वकील थे। दस हज़ार रुपए रोज की प्रैक्टिस थी मालवीय जी की। पर अंग्रेजों से लड़ने के लिए दस हज़ार रुपए की रोज की प्रैक्टिस छोड़ दी। मोतीलाल नेहरू ने आनंद भवन बनाया इलाहाबाद में। एक-एक रुपए बटोर कर मालवीय जी ने बी एच यू बनवाया। कोई भवन नहीं। स्वत्रंत्रता संग्राम के अलावा शिक्षा , वकील , पत्रकार , स्वदेशी , हरिजनों का उद्धार , हिंदी आदि ऐसे अनेक काम हैं मदन मोहन मालवीय के। मदन मोहन मालवीय ने अंग्रेजों की लाठियां भी बहुत खाईं और जेल भी बहुत बार गए। लेकिन अंबेडकर ने न कभी कोई एक लाठी खाई , न जेल गए। पूना पैक्ट ज़रूर किया। अंबेडकर तो टाई बांध कर कार से चलते थे। अंबेडकर ब्राह्मण सरनेम है , आप जानते ही होंगे। अंबेडकर का सही सरनेम सकपाल है। मदन मोहन मालवीय बहुत गरीब परिवार से थे। घर-घर कथा बांच कर अपनी पढ़ाई का , परिवार का खर्च चलाते थे। किसी राजा बड़ौदा या अंग्रेजों के खर्च से पढ़ाई नहीं की मालवीय जी ने। मालवीय जी उपवास भी कर जाते थे कई बार। घर के लोग भी। क्यों कि घर में खाने को कुछ नहीं होता था। यह भी जानिए कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी मालवीय जी का क्या योगदान है l सर सैय्यद भी मालवीय जी के शिष्य हैं l बहुतेरी बातें हैं l फिर कभी l
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Vishnu Nagar भारत सरकार ने जैसे गांधी वांगमय सौ खंड में प्रकाशित किया है ठीक वैसे ही अंबेडकर वांगमय के चालीस खंड भी छापा है l इन में से किसी खंड में ऐसा कोई ज़िक्र नहीं है जिस में लिखा हो कि मदन मोहन मालवीय ने अंबेडकर का दिया पानी नहीं पिया।

इतिहास की किसी भी प्रामाणिक पुस्तक, आधिकारिक दस्तावेजों, या डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के संपूर्ण लेखन और भाषणों (BAWS) में इस तरह की किसी भी घटना का कोई उल्लेख नहीं है। यह पूरी तरह से किसी व्यक्ति द्वारा गढ़ी गई एक काल्पनिक कहानी या नैरेटिव है, जिसे भावनात्मक रंग देकर सोशल मीडिया पर वायरल किया गया है। और आप ने अपनी दुकानदारी में इसे गप्प से लपक लिया है।

अम्बेडकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि स्कूल, बड़ौदा रियासत और कॉलेज के दिनों में उन्हें पानी छूने की मनाही थी।

डॉ. अम्बेडकर ने अपनी आत्मकथात्मक संस्मरण वेटिंग फॉर ए वीजा’ में अपने जीवन के कड़वे अनुभवों (जैसे कोरेगांव में बैलगाड़ी की यात्रा, बड़ौदा में रहने के दौरान आवास मिलने में कठिनाई आदि) का जिक्र किया है, और बचपन में सार्वजनिक प्याऊ या स्कूल के बर्तन से पानी पीने को लेकर सामाजिक भेदभाव का सामना करने की बात भी इतिहास का हिस्सा है। लेकिन लंदन के गोलमेज सम्मेलन के दौरान मालवीय जी के साथ पानी की इस तथाकथित घटना का जिक्र उनकी किसी भी आत्मकथा या दस्तावेज में नहीं है।
[एक मित्र की पोस्ट पर मेरा यह एक कमेंट।]

ताजी सूचना यह है कि मित्र ने अपनी यह भ्रामक पोस्ट ख़ुद ही मिटा दी है। यह अच्छी बात है कि मालवीय जी की सचाई की आंच वह समझ गए l इस बीच उन्हों ने एक लिंक भी दिया कमेंट में। वह लिंक भी फर्जी निकला l मित्र विद्वान आदमी हैं। संवेदनशील कवि और पत्रकार हैं l 46 बरस पुराने मित्र हैं। आदरणीय हैं , हमारे। बस एजेंडे की नैरेटिव में फंस गए थे। अच्छी बात है कि एजेंडे से बाहर निकल गए।

बदलाव की दहलीज पर आगरा: ताज के साये से विकास के नए क्षितिज तक

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दिल्ली । आगरा शायद अब खुद को भी चौंकाने की तैयारी में है। सदियों से यह शहर एक खूबसूरत मगर कठिन दुविधा में जीता आया है। ताजमहल ने आगरा को दुनिया भर में शोहरत दी, लेकिन उसी ताज की हिफाजत के नाम पर औद्योगिक विकास पर तरह-तरह की पाबंदियां भी लगती रहीं। कारखाने शक की निगाह से देखे गए, नए प्रोजेक्ट्स को मंजूरियों के जंगल से गुजरना पड़ा और हर बड़ी योजना फाइलों, समितियों, एनओसी व अदालतों के चक्कर काटती रही।
अब यह तस्वीर बदलती दिख रही है। जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने ताज ट्रेपेजियम जोन (लगभग 10,400 वर्ग किमी) में दो साल पुराना व्यापक प्रतिबंध हटाया। कोर्ट ने गैर-प्रदूषणकारी सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के करीब 400 लंबित आवेदनों पर टीटीजेड प्राधिकरण को विशेषज्ञ निगरानी (नीरी व सीईसी के प्रतिनिधियों की सहमति) के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दी। इससे पर्यावरण मानकों के भीतर स्वच्छ उद्योगों के लिए रास्ता खुला है। विधानसभा चुनाव (अपेक्षित फरवरी-मार्च 2027) से पहले अगले महीने-वर्ष आगरा के इतिहास में निर्णायक साबित हो सकते हैं। कई परियोजनाएं पूरी होने के करीब हैं, अनेक निर्माणाधीन हैं और कई पाइपलाइन में हैं।
असली सवाल विकास और विरासत के बीच संतुलन साधने का है। आगरा को धुआं उगलती चिमनियां नहीं चाहिएं; उसे चाहिए स्वच्छ उद्योग, नई तकनीक, सेवा क्षेत्र, पर्यटन आधारित कारोबार और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग। ताज की हिफाजत भी जरूरी है और आगरा के नौजवानों को रोजगार भी।
आगरा की आर्थिक बुनियाद पहले से मजबूत है। यह देश के सबसे बड़े पर्यटन केन्द्रों में शामिल है। जूता उद्योग, संगमरमर की जड़ाई, हस्तशिल्प, कालीन, फाउंड्री, कांच के सामान और पेठा जैसे छोटे-मझोले कारोबार यहां की पुरानी पहचान हैं। शिक्षा क्षेत्र भी फैल रहा है। भौगोलिक स्थिति इसकी बड़ी ताकत है; दिल्ली, जयपुर, ग्वालियर, लखनऊ से सड़क-रेल कनेक्टिविटी शानदार है। यमुना एक्सप्रेसवे और अन्य मार्गों ने यात्रा का नक्शा बदल दिया है।
सबसे बड़ा बदलाव आगरा मेट्रो ला रही है। ताज ईस्ट गेट से मनकामेश्वर (करीब 6 किमी) प्राथमिक खंड मार्च 2024 से संचालित है। मनकामेश्वर से आईएसबीटी तक ट्रायल और सीएमआरएस निरीक्षण अगस्त 2026 में सफल रहे। कॉरिडोर-1 (सिकंदरा से ताज ईस्ट गेट, 14.25 किमी) नवंबर 2026 में पूर्ण संचालन के लक्ष्य पर है; सिकंदरा से ताज तक यात्रा समय घटकर करीब 28 मिनट रह जाएगा। कॉरिडोर-2 (आगरा कैंट से कालिंदी विहार) पर भी निर्माण तेज है। कभी तांगे-रिक्शे और जाम की पहचान वाला शहर आधुनिक जन परिवहन के युग में प्रवेश कर रहा है।
हवाई अड्डे का नया सिविल टर्मिनल भी उम्मीद जगा रहा है। अगस्त 2026 तक करीब 70 प्रतिशत काम पूरा; 30 नवंबर 2026 तक हैंडओवर का लक्ष्य। क्षमता बढ़कर लगभग 1400 यात्रियों तक पहुंचेगी, मल्टीलेवल पार्किंग, एयरोब्रिज और आधुनिक सुविधाएं होंगी। बेहतर कनेक्टिविटी पर्यटकों को दिल्ली से दिनभर की यात्रा के बजाय दो-तीन दिन रुकने के लिए प्रेरित कर सकती है।
सड़कों पर चौड़ीकरण, फ्लाईओवर, रेलवे ओवरब्रिज, नए पुल और ड्रेनेज योजनाएं शहर की सूरत बदल रही हैं। यमुना पर मेट्रो पुल समेत कई पुलों का काम आगे बढ़ रहा है। ग्रेटर आगरा की टाउनशिप और अटल टाउनशिप योजनाएं भीड़भाड़ वाले पुराने शहर से बाहर विकास फैलाने की कोशिश हैं; कई टाउनशिप में प्लॉट आवंटन प्रक्रिया चल रही है।
शिल्पग्राम के पास यूनिटी मॉल (लगभग 128 करोड़ रुपये) उत्तर प्रदेश के ओडीओपी व जीआई टैग उत्पादों और पारंपरिक हस्तशिल्प को बड़ा बाजार दे सकता है। अगस्त 2026 तक करीब 42 प्रतिशत काम पूरा; नवंबर लक्ष्य है, हालांकि गति पर प्रशासनिक निगरानी बढ़ी है। पर्यटन अब सिर्फ ताजमहल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आगरा किला, फतेहपुर सीकरी, मेहताब बाग, बटेश्वर और ब्रज क्षेत्र मिलकर बड़ा सर्किट बना रहे हैं। हेरिटेज वॉक, होमस्टे और बेहतर सुविधाएं रुकने की अवधि बढ़ा सकती हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज म्यूजियम (पहले मुगल म्यूजियम का नाम बदला गया) तेज गति से तैयार हो रहा है; लक्ष्य 2026 का अंत। कोठी मीना बाजार में शिवाजी स्मारक (50 फुट प्रतिमा, म्यूजियम आदि) पर भी काम आगे बढ़ रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में एसएन मेडिकल कॉलेज को मिनी एम्स स्तर पर विकसित किया जा रहा है: किडनी ट्रांसप्लांट शुरू, क्रिटिकल केयर यूनिट और अन्य ब्लॉक निर्माणाधीन; पूर्ण रूप 2027 तक अपेक्षित। लेडी लॉयल अस्पताल का विस्तार भी चल रहा है। साइंस पार्क व नक्षत्रशाला (लगभग 40 करोड़) भूमि संबंधी बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ रहा है। कैलाश मंदिर का कायाकल्प चरणबद्ध तरीके से हो रहा है। हाईकोर्ट बेंच की मांग अभी भी लंबित है और अधिवक्ता आंदोलनरत हैं।
ताज के पास प्रस्तावित बैराज/रबर डैम वर्षों से एनओसी और अध्ययनों में अटका है; बजट आवंटित होने के बावजूद निर्माण शुरू नहीं हुआ। पर्यावरण संबंधी चिंताएं जायज हैं, मगर फाइलों को धूल खाने देना भी संरक्षण नहीं कहलाता। ब्यूरोक्रेसी की सुस्ती विकास की बड़ी बाधा बनी हुई है।
आगरा शहर की आबादी लाखों में है; मेट्रो क्षेत्र अनुमानित 25 लाख से अधिक। तेज बढ़ोतरी ने मकान, पानी, सीवर, सड़क, कचरा प्रबंधन और परिवहन पर दबाव डाला है। समाधान शहर की बढ़त रोकना नहीं, बल्कि समझदारी से बढ़ाना है।
अगले बारह महीने अहम हैं। मेट्रो का विस्तार, एयरपोर्ट टर्मिनल, नई सड़कें-पुल, टाउनशिप, पर्यटन परियोजनाएं और स्वच्छ उद्योगों पर नीतिगत फैसले मिलकर तकदीर बदल सकते हैं। आगरा चौराहे पर खड़ा है; एक रास्ता जाम, प्रदूषण और लालफीताशाही की तरफ; दूसरा स्वच्छ उद्योगों, बेहतर कनेक्टिविटी, रोजगार और आधुनिक विकास की ओर। अगर स्वच्छ उद्योग, आधुनिक बुनियादी ढांचा और पर्यावरण संरक्षण हमसफर बन जाएं, तो आगरा सिर्फ ताज का शहर नहीं, उत्तर भारत का बड़ा विकास केन्द्र बन सकता है।

BBC के CNR में क्या मुस्लिम वीडियो एडिटर और हिंदुओं के लिए है ना

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विवेक गुप्ता

खुर्जा (उप्र) : मीडिया की विश्वसनीय वेबसाइट भड़ास4मीडिया में शीर्षक “भड़ास में खबर छपने के बाद बीबीसी इंडिया से इकबाल का इस्तीफा वापस; ये पाँच बड़े अपडेट पढ़िए!” से छपी खबर के माध्यम से मीडिया की अनकही,अपचनीय,काली और भूरी सच्चाई बताने की कोशिश करूंगा.

भड़ास लिंक 1:
https://www.bhadas4media.com/bbc-india-five-big-updates/

विश्वसनीय वेबसाइट भड़ास4मीडिया में छपी इस खबर में ‘5 अपडेट’ की बात की गई है. जिसमें से पहला अपडेट मैंने हूबहू लिख दिया है.

पहला: आपने जो खबर प्रकाशित की थी कि इकबाल अहमद ने इस्तीफा दे दिया है,वह अब वापस हो गया है. बताया जा रहा है कि आपकी (Bhadas4Media) खबर प्रकाशित होने के बाद उनका इस्तीफा वापस ले लिया गया.

इसका मतलब,इस बात की संभावना ज्यादा हैं कि इकबाल अहमद ने खुद या अपने किसी साथी की मदद से ये खबर भड़ास को भेजी हो. जिससे कलेक्टिव न्यूज रूम के निर्णायक लोगों पर दवाब बने और उनका इस्तीफा वापस ले लिया जाए. क्योंकि कोई भी संस्थान विवादों में नहीं फंसना चाहता और बीबीसी के कंटेंट पार्टनर कलेक्टिव न्यूजरूम को आए अभी चंद महीने ही हुए हैं.

उनके इस्तीफे की जो खबर छपी थी उसे भी नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके पढ़िए…

भड़ास लिंक 2:

https://www.bhadas4media.com/collective-newsroom-muslim…/

बेहद जरूरी और आंखें खोलने वाली पोस्ट का पूरा मर्म समझने के लिए आप इन दो लिंक पर क्लिक करके Bhadas4media में छपी ये दोनों खबरें जरूर पढ़ें…
इस खबर में लिखा भी है.

“सीएनआर के प्रबंध निदेशक संजय मजूमदार से इकबाल अहमद की मार्च महीने में ओखला स्थित दफ्तर में खुल कर मतभेद हुए और इकबाल ने उन्हें इस बात का दोषी ठहराते हुए सीईओ से शिकायत की. मामला एचआर तक गया जहां संजय की सुनी गयी क्योंकि उनका तर्क सही साबित हुआ. इकबाल ने क्रोधित होते हुए अपना त्यागपत्र उसी रात सीएनआर और बीबीसी प्रबंधन को भेज दिया.

सुनवाई में कम्पनी के बोर्ड ने एकमत से उन्हें पद छोड़ने को कहा और उनके इस्तीफे की सूचना संजय मजूमदार ने एक मेल के जरिए सभी स्टाफ को दे दी है.”
इस खबर में भी साफ लिखा है मामला HR तक गया जहां संजय मजूमदार का तर्क सही साबित हुआ. जब संजय जी सही साबित हुए तो इकबाल जी अप्रत्यक्ष रूप से दवाब क्यों बना रहे थे.

पता नहीं देश में एक धर्म विशेष के लोग हमेशा विक्टिम कार्ड क्यों खेलते हैं. सनातन का विरोध करना,राष्ट्रवादी नेताओं,राष्ट्रवादी विचारधारा को गरियाना,हिन्दू लड़कियों को बहकाना,भड़काना, रिझाना ही एक धर्म विशेष के वामपंथियों का मुख्य काम बन गया है.

इकबाल अहमद जी इस्तीफा कोई जबरदस्ती वापस नहीं ले सकता. अगर वाकई आपने इस्तीफा दिया था और आपका कलेक्टिव न्यूज रूम पर दवाब बनाने का कोई प्रयास नहीं था तो आपको कोई जबरदस्ती रीजॉइनिंग के लिए नहीं बुला सकता. ना ही आपका कोई फंड या पैसा रोक सकता है. तो आप अगर इस नाटक के पीछे नहीं हैं तो साफ बोल दीजिए मैंने इस्तीफा अपनी मर्जी से दिया है और अब मैं ज्वाइन नहीं कर पाऊंगा.

अब आते हैं दूसरे अपडेट पर…
दूसरा: वहां काम करने वाले कुछ लोगों का कहना है कि यह कहना सही नहीं है कि BBC इंडिया BBC News हिन्दी में मुसलमानों को मौका नहीं मिलता. उनके मुताबिक,उन्हें पर्याप्त अवसर मिलते हैं,बल्कि कुछ विभागों में उनकी संख्या अधिक है. उदाहरण के तौर पर,वीडियो एडिटर टीम का प्रमुख मुस्लिम है और दावा किया जा रहा है की टीम में अधिकांश सदस्य मुस्लिम हैं तथा उसने कोई हिंदू नियुक्त नहीं किया.

अगर विश्वसनीय भड़ास और भड़ास के पक्के सोर्स पर यकीन करें तो इस बहुसंख्यक देश में जहां मीडिया में मुसलमानों की संख्या बहुत कम है,वहीं एक बड़े संस्थान में वीडियो एडिटर टीम में अधिकांश सदस्य मुस्लिम होना क्या साबित करता है? इस वीडियो एडिटर ने कोई हिन्दू नियुक्त नहीं किया? अगर ये सच है तो इसका मतलब ये वीडियो एडिटर पूरी तरह मुस्लिम परस्त है,और इसके चयन के पैमाने में सबसे अनिवार्य शर्त थी आपका गैर हिन्दू होना या यूं कहें आपका मुस्लिम होना? यानी दलितों,आदिवासियों और पिछड़ों की खबरों से नंबर और व्यूज लेकर इनके साथ भी इस वीडियो एडिटर और इस जैसे अन्य मुस्लिम वामपंथी ने खेला कर दिया? क्योंकि दलित,पिछड़े,आदिवासी ना ही गैर हिन्दू हैं और ना ही मुस्लिम.

 

पता नहीं बीबीसी के कंटेंट पार्टनर कलेक्टिव न्यूजरूम में वीडियो एडिटर के जैसे और कितने लोग हैं? पता नहीं यहां वीडियो एडिट के सेक्शन की तरह और इस तरह के कितने सेक्शन हैं जहां इस तरह की चीजें हो रहीं हैं?
खैर ये तो कोई बड़ी बात नहीं अपने अनुभव से पक्का कह रहा हूं मुस्लिम वामपंथी अंदर से कट्टर मुस्लिम,सनातन विरोधी होते हैं.(यहां अपवाद नहीं है,बस आपको अधिकतम 72 घंटे इनके साथ रहना है. एक बार चेहरा जरूर सामने आ जाएगा.) जब कभी मुस्लिम वामपंथी के बारें में लिखता या सोचता हूं तो मुझे कश्मीरी पुलाव याद आ जाता है,जिसमें कश्मीर नहीं होता जैसे मुस्लिम वामपंथी में वामपंथ नहीं होता.

वैसे अगर यहां मुस्लिमों को बड़ी संख्या में रखना भी था तो उसमें मुस्लिम फीमेल की संख्या अच्छी होनी चाहिए थी. जिससे जेंडर बैलेंस बना रहता. जब एजुकेशन इंस्टीट्यूट और ऑफिस में मुस्लिम मेल,मुस्लिम फीमेल की तुलना में बहुत ज्यादा होंगे तो लव जेहाद या बहकाना,भड़काना,रिझाना जेहाद के मामले सामने आएंगे ही.
एजुकेशन इंस्टीट्यूट और मीडिया ऑफिस में सवर्ण हिंदू लड़कियों की संख्या बहुत होती हैं. ये अपेक्षाकृत देखने में भी बेहतर होती हैं. अक्सर ये लिबरलता के विषाणु से ग्रसित होती हैं. जिससे ये आसानी से आधुनिकता की आड़ लेकर अपने नापाक मकसद को पूरा करने वाले मुस्लिम वामपंथियों के बहकावे में आ जाती हैं. एक काफिर को मुसलमान बनाने में जन्नत पक्की होती ही है तो कौन बेवकूफ मौका छोड़ेगा.

पहले NDTV और अब News24 में काम कर रहे छद्म वामपंथी आरिफ मंसूरी का उदाहरण ले लीजिए. ये भी वामपंथ की आड़ में आधुनिकता के हथियार से लिबरल सवर्ण हिंदू लड़कियों को बहकाने,भड़काने,रिझाने का काम करता है. जो भी इसके नापाक इरादों के आड़े आता है,इसका काला सच बताकर सबको आगाह करना चाहता है,ये उस मासूम को छद्म वामपंथी देशबंधु सिंह,छद्म वामपंथी समरजीत सिंह,छद्म वामपंथी विवेक रस्तोगी और सेक्सुअल हैरेसमेंट का मेलधारी रविकांत ओझा की मदद से अपने रास्ते से पूरी तरह हटा देता है.

जिसके बाद देशबंधु सिंह के दिए अंधाधुंध अधिकार और छूट आरिफ मंसूरी को ऑफिस में जूनियर लड़कियों के साथ द्विअर्थी मजाक करने,”आज तो महक रही हो,बाबू” के संबोधन से ऑफ़िस के अंदर उन्हें संबोधित करने,लड़कियों को ऑफ़िस के बाद कॉल और मैसेज करने में बहुत मदद करते हैं. ध्यान रहे जब आपके पास पावर है,आप शिफ्ट इंचार्ज हैं तब आपकी बात सबको सुननी तो पड़ेगी ही.

क्या BBC News के कलेक्टिव न्यूज रूम में भी कोई आरिफ मंसूरी जैसा है? अगर ऐसा है तो किसी को सामने आकर सच बताना होगा. जिससे मासूमों को बचाया जा सके. किसी का नाम सामने नहीं आएगा. अगर कोई सबूत मिल जाए तो फिर हनुमान जी की जय…

अब ध्यान रखिएगा यहां के PM मोदी जी Narendra Modi हैं ना कि एंडी बर्नहैम और ये 1947 से पहले का समय नहीं चल रहा है…
इस पोस्ट के कमेंट में मैंने भड़ास की खबर के स्क्रीन शॉट डाल दिए हैं,जिससे आपको समझने में आसानी हो.

(लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। इनसे मीडिया स्कैन की सहमति या समर्थन अनिवार्य नहीं है।यदि इस लेख पर आपकी कोई प्रतिक्रिया है अथवा दूसरे पक्ष को अपनी बात रखनी हो, तो कृपया mediainvite2017@gmail.com पर भेजें)

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