एशियाई पैरा खेलः 8 स्वर्ण, 9 रजत और 9 कांस्य सहित भारत ने जीते 26 पदक

Screenshot-2023-10-24-at-4.56.22 PM.png

चीन के हांगझू में एशियाई पैरा खेलों में भारत ने अब तक 8 स्वर्ण, 9 रजत और 9 कांस्य सहित 26 पदक जीत लिये हैं। आज के मुकाबलों में रवि रंगोली ने पुरुषों की एफ-40 गोला फेंक स्‍पर्धा में रजत पदक जीता। उन्‍होंने 9.92 मीटर गोला फेंका। वहीं रूद्रांश खंडेलवाल ने पुरुषों की 10 मीटर एयर पिस्‍टल एसएच-1 स्‍पर्धा में रजत पदक जीता, जबकि मनीष नरवाल ने इसी स्‍पर्धा में कांस्‍य पदक हासिल किया। 16 वर्षीय खंडेलवाल ने अभी चल रहे पैरा खेलों में इस बार दूसरा पदक जीता है।

इससे पहले अजय कुमार ने टी-64 वर्ग में पुरुषों की 400 मीटर दौड़ में रजत पदक जीता। एकता भयान ने एफ-23 वर्ग में महिला पैरा क्लब थ्रो में कांस्य पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया। दीप्ति जीवनजी ने महिलाओं की 400 मीटर टी-20 श्रेणी में 56.69 सेकेंड के शानदार समय के साथ स्‍वर्ण पदक हासिल किया। पुरुषों की पैरा कैनोइंग में गजेन्‍द्र सिंह ने वीएल-2 श्रेणी में कांस्य पदक जीता। मनीष कौरव ने केएल-3 श्रेणी में कांस्‍य पदक अपने नाम किया।

पैरा मिक्स्ड डबल्स के एसएल-3 और एसयू-5 श्रेणी में प्रमोद भगत और मनीषा रामदास सेमीफाइनल में पहुंच गए हैं और देश के लिए एक पदक पक्का कर लिया है। इससे पहले महिलाओं की पैरा कैनोइंग केएल-2 श्रेणी में प्राची यादव ने 54.962 के प्रभावशाली समय के साथ आज का पहला स्वर्ण और अपना दूसरा पदक हासिल किया। महिलाओं की 100 मीटर दौड़ में सिमरन ने आज असाधारण प्रदर्शन करते हुए रजत पदक हासिल किया।

मणिपुर हिंसा में सीमा-पार के तत्व शामिल थेः मोहन भागवत

Screenshot-2023-10-24-at-4.56.29 PM.png

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि मणिपुर की हिंसा में सीमा पार के उग्रवादी तत्व शामिल थे। उन्होंने कहा कि मेइती और कुकी समुदाय के लोग कई वर्षों से साथ रह रहे हैं।

उन्होंने आज नागपुर में वार्षिक आरएसएस दशहरा रैली को संबोधित करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में अचानक हिंसा कैसे भड़क सकती है। डॉ. भागवत ने विपरीत परिस्थितियों में हिंसा प्रभावित मणिपुर में आरएसएस कार्यकर्ताओं के काम की सराहना की। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि सरकार ने मणिपुर में शांति बहाली के लिए सब कुछ किया है। गृहमंत्री अमित शाह तीन दिनों तक स्वयं मणिपुर में रहे।

एशियाई खेलों में भारत की उपलब्धि के बारे में डॉ. भागवत ने कहा कि हमारा देश सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने अन्य बातों के अलावा अर्थव्यवस्था, डिजिटल प्रौद्योगिकी, स्टार्टअप के संदर्भ में भारत के विकास का उल्लेख किया। जाने-माने गायक और संगीत निर्देशक शंकर महादेवन इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।

शंकर महादेवन ने राष्ट्र निर्माण, संस्कृति, परंपरा और अखंड भारत की विचारधारा को संरक्षण देने में आरएसएस की विचारधारा की प्रशंसा की। उन्होंने लोगों से अपने-अपने क्षेत्र में विशेष कार्यों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में योगदान की अपील की। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस भी उपस्थित थे।

श्री विजयादशमी उत्सव पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के उद्बोधन के मुख्य बिन्दु…..

Vijayadashami-Mohan-Bhagwat.jpeg.webp

– मीडिया स्कैन संवाददाता

जी20 – अर्थ केंद्रित विचार अब मानव केंद्रित हो गया

हमारा देश, जी-20 नामक प्रमुख राष्ट्रों की परिषद का यजमान रहा। वर्षभर सदस्य राष्ट्रों के राष्ट्र प्रमुख, मंत्रीगण, प्रशासक तथा मनीषियों के अनेक कार्यक्रम भारत में अनेक स्थानों पर सम्पन्न हुए। भारतीयों के आत्मीय आतिथ्य का अनुभव, भारत का गौरवशाली अतीत तथा वर्तमान की उमंगभरी उड़ान सभी देशों के सहभागियों को प्रभावित कर गई। अफ्रीकी यूनियन को सदस्य के नाते स्वीकृत कराने में तथा पहले ही दिन परिषद का घोषणा प्रस्ताव सर्व सहमति से पारित करने में भारत की प्रामाणिक सद्भावना तथा राजनयिक कुशलता का अनुभव सबने पाया। भारत के विशिष्ट विचार व दृष्टि के कारण संपूर्ण विश्व के चिंतन में वसुधैव कुटुम्बकम् की दिशा जुड़ गई। जी-20 का अर्थकेन्द्रित विचार अब मानव केन्द्रित हो गया।

भारतीयों का गौरव व आत्मविश्वास बढ़ाने वाला कार्य

हमारे देश के खिलाड़ियों ने एशियाई खेलों में पहली बार 100 से अधिक – 107 पदक (28 सुवर्ण, 38 रजत तथा 41 कांस्य) जीतकर हम सब का उत्साहवर्धन किया है। उनका हम अभिनन्दन करते हैं।
हमारे वैज्ञानिकों के शास्त्रज्ञान व तन्त्र कुशलता के साथ नेतृत्व की इच्छाशक्ति जुड़ गई। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष युग के इतिहास में पहली बार भारत का विक्रम लैंडर उतरा। समस्त भारतीयों का गौरव व आत्मविश्वास बढ़ाने वाला यह कार्य सम्पन्न करने वाले वैज्ञानिक तथा उनको बल देने वाला नेतृत्व संपूर्ण देश में अभिनंदित हो रहा है।

अपने मन के राम को जागृत करते हुए मन की अयोध्या सजे

संविधान की मूल प्रति के एक पृष्ठ पर जिनका चित्र अंकित है, ऐसे धर्म के मूर्तिमान प्रतीक श्रीराम के बालक रूप का मंदिर अयोध्या जी में बन रहा है। श्रीराम अपने देश के आचरण की मर्यादा के प्रतीक हैं, कर्तव्य पालन के प्रतीक हैं, स्नेह व करुणा के प्रतीक हैं। अपने-अपने स्थान पर ही ऐसा वातावरण बने। राम मंदिर में श्रीरामलला के प्रवेश से प्रत्येक ह्रदय में अपने मन के राम को जागृत करते हुए मन की अयोध्या सजे व सर्वत्र स्नेह, पुरुषार्थ तथा सद्भावना का वातावरण उत्पन्न हो ऐसे, अनेक स्थानों पर परन्तु छोटे छोटे आयोजन करने चाहिए।

वीरांगना रानी दुर्गावती

अस्मिता व ‘स्व’तंत्रता के लिए बलिदान देने वाली, उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति व पराक्रम के साथ-साथ अपनी प्रशासन कुशलता व प्रजाहित दक्षता के लिए आदर्शभूत महारानी दुर्गावती का 500वाँ जयंती वर्ष है। भारतीय महिलाओं के सर्वगामी कर्तृत्व, नेतृत्व क्षमता, उज्ज्वल शील तथा जाज्वल्य देशभक्ति की वे देदीप्यमान आदर्श थीं।

छत्रपति शाहू जी महाराज

अपनी प्रजाहित दक्षता तथा प्रशासनपटुता के साथ, सामाजिक विषमता के जड़मूल से निर्मूलन के लिए जीवनभर अपनी संपूर्ण शक्ति लगाने वाले कोल्हापुर (महाराष्ट्र) के शासक छत्रपति शाहूजी महाराज का यह 150वाँ जयंती वर्ष है।

संत श्रीमद् रामलिंग वल्ललार

देश की ‘स्व’तंत्रता की अलख अपने जीवन के यौवनकाल से ही जगाना प्रारंभ किया, गरीबों के अन्नदान कार्यक्रम हेतु जिनका सुलगाया हुआ पहला चूल्हा आज भी तमिलनाडु में प्रदीप्त है और अपना काम कर रहा है, ऐसे तमिल संत श्रीमद् रामलिंग वल्ललार का 200वाँ वर्ष इसी महीने सम्पन्न हो गया। ‘स्व’तंत्रता के साथ-साथ समाज की आध्यात्मिक सांस्कृतिक जागृति तथा सामाजिक विषमता के सम्पूर्ण निर्मूलन के लिए वे जीवनभर कार्य करते रहे।

हिमालय क्षेत्र सर्वथा रक्षणीय है

हिमालय के क्षेत्र में हिमाचल और उत्तराखंड से लेकर सिक्किम तक लगातार प्राकृतिक आपदाओं का प्राणांतिक खेल हम देख रहे हैं। भविष्य में किसी गंभीर व व्यापक संकट का पूर्वाभास इन घटनाओं के द्वारा हो रहा हो, ऐसी शंकाओं की चर्चा भी है।
देश की सीमा सुरक्षा, जल सुरक्षा तथा पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिए भारत की उत्तर सीमा को निश्चित करने वाला यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है, किसी भी कीमत पर सर्वथा रक्षणीय है। सुरक्षा, पर्यावरण, जन सांख्यिकी व विकास की दृष्टि से इस पूरे क्षेत्र को एक इकाई मानकर हिमालय क्षेत्र का विचार करना होगा।

‘स्व’ आधारित ‘स्व’देशी विकासपथ अपनाएँ

अधूरी, निपट जड़वादी तथा पराकोटि की उपभोगवादी दृष्टि पर आधारित विकास पथों के कारण, मानवता व प्रकृति धीरे-धीरे परंतु निश्चित रूप से विनाश की ओर अग्रसर हो रही है। संपूर्ण विश्व में यह चिंता बढ़ी है। उन असफल पथों को त्याग कर अथवा धीरे-धीरे वापिस मोड़कर भारतीय मूल्यों पर तथा भारत की समग्र एकात्म दृष्टि पर आधारित, काल सुसंगत व अद्यतन, अपना अलग विकास पथ भारत को बनाना ही पड़ेगा। यह भारत के लिए सर्वथा उपयुक्त तथा विश्व के लिए भी अनुकरणीय प्रतिमानक बन सकेगा। उपनिवेशी मानसिकता से मुक्त होकर, अपने देश में जो है उसको युगानुकूल बनाते हुए, हम अपना ‘स्व’ आधारित ‘स्व’देशी विकासपथ अपनाएँ, यह समय की आवश्यकता है।

मणिपुर हिंसा क्यों हुई?

मणिपुर की वर्तमान स्थिति को देखते हैं तो यह बात ध्यान में आती है । लगभग एक दशक से शांत मणिपुर में अचानक यह आपसी फूट की आग कैसे लग गई? क्या हिंसा करने वाले लोगों में सीमापार के अतिवादी भी थे? अपने अस्तित्व के भविष्य के प्रति आशंकित मणिपुरी मैतेयी समाज और कुकी समाज के इस आपसी संघर्ष को सांप्रदायिक रूप देने का प्रयास क्यों और किसके द्वारा हुआ? वर्षों से वहाँ पर सबकी समदृष्टि से सेवा करने में लगे संघ जैसे संगठन को बिना कारण इसमें घसीटने का प्रयास करने में किसका निहित स्वार्थ है? इस सीमा क्षेत्र में नागाभूमि व मिजोरम के बीच स्थित मणिपुर में ऐसी अशांति व अस्थिरता का लाभ प्राप्त करने में किन विदेशी सत्ताओं को रुचि हो सकती है? क्या इन घटनाओं की कारण परंपराओं में दक्षिण पूर्व एशिया की भू- राजनीति की भी कोई भूमिका है? देश में मजबूत सरकार के होते हुए भी यह हिंसा किन के बलबूते इतने दिन बेरोकटोक चलती रही है? गत 9 वर्षों से चल रही शान्ति की स्थिति को बरकरार रखना चाहने वाली राज्य सरकार होकर भी यह हिंसा क्यों भड़की और चलती रही? आज की स्थिति में जब संघर्षरत दोनों पक्षों के लोग शांति चाह रहे हैं, उस दिशा में कोई सकारात्मक कदम उठता हुआ दिखते ही कोई हादसा करवा कर, फिर से विद्वेष व हिंसा भड़काने वाली ताकतें कौन सी हैं?

बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता

समस्या के समाधान के लिए बहुआयामी प्रयासों की आवश्यकता रहेगी। इस हेतु जहां राजनैतिक इच्छाशक्ति, तदनुरूप सक्रियता एवं कुशलता समय की मांग है, वहीं इसके साथ-साथ दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति के कारण उत्पन्न परस्पर अविश्वास की खाई को पाटने में समाज के प्रबुद्ध नेतृत्व को भी एक विशेष भूमिका निभानी होगी। संघ के ‘स्व’यंसेवक तो समाज के स्तर पर निरंतर सबकी सेवा व राहतकार्य करते हुए समाज की सज्जनशक्ति का शांति के लिए आह्वान कर रहे हैं। सबको अपना मानकर, सब प्रकार की कीमत देते हुए समझाकर, सुरक्षित, व्यवस्थित, सद्भाव से परिपूर्ण और शान्त रखने के लिए ही संघ का प्रयास रहता है।

मंत्र विप्लव

समाज विरोधी कुछ लोग अपने आपको सांस्कृतिक मार्क्सवादी या वोक (Woke) यानी जगे हुए कहते हैं। परंतु मार्क्स को भी उन्होंने 1920 दशक से ही भुला रखा है। विश्व की सभी सुव्यवस्था, मांगल्य, संस्कार, तथा संयम से उनका विरोध है। मुठ्ठी भर लोगों का नियंत्रण सम्पूर्ण मानवजाति पर हो, इसलिए अराजकता व स्वैराचरण का पुरस्कार, प्रचार व प्रसार करते हैं। माध्यमों तथा अकादमियों को हाथ में लेकर देशों की शिक्षा, संस्कार, राजनीति व सामाजिक वातावरण को भ्रम व भ्रष्टता का शिकार बनाना उनकी कार्यशैली है। आपसी झगड़ों में उलझकर असमंजस व दुर्बलता में फंसा व टूटा हुआ समाज, अनायास ही इन सर्वत्र अपनी ही अधिसत्ता चाहने वाली विध्वंसकारी ताकतों का भक्ष्य बनता है।

मंत्र विप्लव का सही उत्तर समाज की एकता

मंत्र विप्लव का सही उत्तर तो समाज की एकता से ही प्राप्त होना है। हर परिस्थिति में यह एकता का भान ही समाज के विवेक को जागृत रखने वाली वस्तु है। संविधान में भी इस भावनिक एकता की प्राप्ति एक मार्गदर्शक तत्व के नाते उल्लेखित है। हर देश में इस एकता के भाव को पैदा करने वाला अपना-अपना धरातल अलग-अलग रहता है। हमारा यह देश एक राष्ट्र के नाते, एक समाज के नाते, विश्व के इतिहास के सारे उतार चढ़ाव पार कर आज भी अपने भूतकाल के सूत्र से अविछिन्न सम्पर्क बनाए रखकर जीवित खड़ा है।
यूनान मिस्र रोमा सब मिट गए जहां से, अब तक मगर है बाक़ी नामो निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा

हमारी सर्वसमावेशक संस्कृति

भारत के बाहर के लोगों की बुद्धि चकित हो जाए, परंतु मन आकर्षित हो जाए ऐसी एकता की परंपरा हमारी विरासत में हमको मिली है। उसका रहस्य क्या है? नि:संशय वह हमारी सर्व समावेशक संस्कृति है। पूजा, परंपरा, भाषा, प्रान्त, जातिपाती इत्यादि भेदों से ऊपर उठकर, अपने कुटुंब से संपूर्ण विश्वकुटुंब तक आत्मीयता को विस्तार देने वाली हमारी आचरण की व जीवन जीने की रीति है।

महापुरुष अनुकरणीय

अपनी ‘स्व’तंत्रता के 75वें वर्ष के निमित्त हमने ‘स्व’तन्त्रता संग्राम के महापुरुषों का स्मरण किया। हमारे धर्म, संस्कृति, समाज व देश की रक्षा, समय समय पर उनमें आवश्यक सुधार तथा उनके वैभव का संवर्धन जिन महापुरुषों के कारण हुआ, वे हमारे कर्तृत्व सम्पन्न पूर्वज हम सभी के गौरवनिधान हैं तथा अनुकरणीय हैं।

हमारी एकता के अक्षुण्ण सूत्र

हमारे देश में विद्यमान सभी भाषा, प्रान्त, पंथ, संप्रदाय, जाति, उपजाति इत्यादि विविधताओं को एक सूत्र में बाँधकर एक राष्ट्र के रूप में खड़ा करने वाले तीन तत्व (मातृभूमि की भक्ति, पूर्वज गौरव, व सबकी समान संस्कृति) हमारी एकता का अक्षुण्ण सूत्र हैं।

देश का पैसा देश में ही काम आए

वर्ष 2025 से 2026 का वर्ष संघ के 100 वर्ष पूरे होने के बाद का वर्ष है। सभी क्षेत्रों में संघ के स्वयंसेवक कदम बढ़ाएंगे। समाज के आचरण में, उच्चारण में संपूर्ण समाज और देश के प्रति अपनत्व की भावना प्रकट हो। मंदिर, पानी, श्मशान में कहीं भेदभाव बाकी है, तो वह समाप्त हो। परिवार के सभी सदस्यों में नित्य मंगल संवाद, संस्कारित व्यवहार व संवेदनशीलता बनी रहे, बढ़ती रहे व उनके द्वारा समाज की सेवा होती रहे। सृष्टि के साथ संबंधों का आचरण अपने घर से पानी बचाकर, प्लास्टिक हटाकर व घर आँगन में तथा आसपास हरियाली बढ़ाकर हो। ‘स्व’देशी के आचरण से ‘स्व’-निर्भरता व स्वावलंबन बढ़े, फिजूलखर्ची बंद हो। देश का रोजगार बढ़े व देश का पैसा देश में ही काम आए।

हमारे अमर राष्ट्र के नवोत्थान का प्रयोजन

समाज की एकता, सजगता व सभी दिशा में निस्वार्थ उद्यम, जनहितकारी शासन व जनोन्मुख प्रशासन ‘स्व’ के अधिष्ठान पर खड़े होकर परस्पर सहयोगपूर्वक प्रयासरत रहते है, तभी राष्ट्र बल वैभव सम्पन्न बनता है। बल और वैभव से सम्पन्न राष्ट्र के पास जब हमारी सनातन संस्कृति जैसी सबको अपना कुटुंब मानने वाली, तमस से प्रकाश की ओर ले जाने वाली, असत् से सत् की ओर बढ़ाने वाली तथा मर्त्य जीवन से सार्थकता के अमृत जीवन की ओर ले जाने वाली संस्कृति होती है, तब वह राष्ट्र, विश्व का खोया हुआ संतुलन वापस लाते हुए विश्व को सुख-शांतिमय नवजीवन का वरदान प्रदान करता है। सद्य काल में हमारे अमर राष्ट्र के नवोत्थान का यही प्रयोजन है।

पद्मश्री शंकर महादेवन जी के बौद्धिक के बिन्दु

– मैं सिर्फ धन्यवाद कर सकता हूं। हमारे अखंड भारत का जो विचार है हमारे कल्चर, हमारे ट्रेडिशन, हमारी संस्कृति बचाकर रखने में इस देश में आप लोगों से ज्यादा किसी और का योगदान नहीं है।
– जब मैं स्वयंसेवकों को देखता हूँ वो देश में कोई भी घटना हो, कोई भी प्रॉब्लम हो, जब जरूरत है वो भी पीछे खड़े होकर silently अपने देश के लिए काम करते हैं तो अगर हम कहेंगे कि हमारा देश एक गीत है तो हमारे स्वयंसेवक उसके पीछे की सरगम हैं| जो गीत को जान देते हैं|
– इस वक्त मैं ऐसा महसूस कर रहा हूँ। विश्व भर में भारत और भारतीय नागरिक को पूरा विश्व सम्मान की नजरों से देखने लगा है। इसलिए मैं कहता हूँ कि जहाँ भी हो, जहाँ भी जाओ, जब भी जाओ सर उठाकर गर्व से कहो मैं भारत का नागरिक हूँ।
– जब मैं गा रहा हूँ| अपनी संस्कृति के बारे में, अपने शास्त्रीय संगीत अपना कल्चर अगली पीढ़ी को बताने का कर्त्तव्य मैं समझता हूँ|
– हमारी संस्कृति और परंपरा की रक्षा में आप सभी का योगदान अतुलनीय है।
– मेरा मानना है कि संगीत और गीतों के माध्यम से हमारी संस्कृति को भविष्य की पीढ़ियों तक शिक्षित और प्रसारित करना मेरा कर्तव्य है। मैं युवाओं और बच्चों के साथ अपनी बातचीत में, अपने शो, रियलिटी शो और यहां तक कि फिल्मी गानों में भी ऐसा करने की कोशिश करता हूं।

दशहरा : केवल उत्सव ही नहीं समाज और राष्ट्र निर्माण का संकल्प

650x_2018101818590781.jpg

–रमेश शर्मा

सनातन परंपरा में मनाये जाने वाले तीज त्यौहार केवल उत्सव भर नहीं होते । उनमें जीवन को सुन्दर बनाने का संदेश होता है । दशहरा उत्सव में भी संदेह है । यह संदेश है व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र की समृद्धि का जो इसकी कथा और उसे मनाने के तरीके से बहुत स्पष्ट है ।
विजय दशमी उत्सव पूरे देश में मनाया जाता है । विभिन्न प्रदेशों में इस उत्सव के नाम अलग हैं मनाने के तरीके भी विभिन्न हैं पर सबमें शक्ति पूजा ही प्रमुख अभीष्ट है । इस उत्सव के दो नाम हैं। एक दशहरा और दूसरा “विजय दशमीं” । इस आयोजन का एक आदर्श वाक्य है- “असत्य पर सत्य की विजय” । पुराण कथाओं के अनुसार दो महासंग्राम इस उत्सव की पृष्ठभूमि है । एक भगवान राम और रावण के बीच महायुद्ध । यह युद्ध नौ दिन चला और दसवें दिन रामजी को विजय मिली। दूसरी कथा है माता शक्ति भवानी और महिषासुर के बीच हुये महासंग्राम की । यह संग्राम भी नौ दिन चला और दसवें दिन महिषासुर का अंत हुआ । महिषासुर पूरी सृष्टि से सत्य और धर्म के विनाश पर आमादा हो गया था । शक्ति भवानी ने उसका अंतकर सृष्टि को सुरक्षित किया । दोनों कथाओं की पृष्ठभूमि नौ दिनों के युद्ध और सत्य विजय की है । शक्ति भवानी ने सत्य की स्थापना के लिये स्वयं चंडी का रूप लिया और रामजी ने विराट शक्ति का आव्हान किया। नौ दिन के भीषण युद्ध के बाद दशवें दिन विजय मिली । इसलिए केवल एक दिन का विजय स्मृति दिवस के रूप में यह उत्सव आयोजन हो सकता था । किन्तु भारतीय ऋषि मनीषी भविष्य के लिये भी समाज को सचेत रखना चाहते थे इसलिये पूरे दस दिनों का उत्सव विधान बनाया गया और दोनों युद्धकाल के नौ दिनों को नवदुर्गा उत्सव के रूप में शक्ति उपासना से जोड़ा गया । शक्ति के विभिन्न रूप होते हैं। जैसे शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति, बौद्धिक शक्ति, संगठनात्मक शक्ति सामाजिक शक्ति आदि । इन नौ दिनों की उपासना में शक्ति के इन सभी आयामों को छुआ गया है । एकांत पूजन उपासना, व्रत, साधना और खाद्य पदार्थ सेवन में शारीरिक शुद्धि, मन की एकाग्रता, बौद्धिक विकास की प्रक्रिया निहित है । नौ दिन की साधना को यदि आयुर्वेद और योग की भाषा में समझें तो यह कायाकल्प की प्रक्रिया है । जो आरोग्य वद्धि और आलौकिक शक्तियों से साक्षात्कार का माध्यम है । यदि साधना एकांत की है तो प्रति दिन शाम को भजन कीर्तन के माध्यम से समाज का एकत्रीकरण एवं दसवें दिन सामूहिक विसर्जन के माध्यम से सभी समाजों का संगठनात्मक एकत्रीकरण का संदेश है । रामजी का विजय उत्सव मनाने में भी नौ दिन रामलीला होती है और दसवें दिन विजय प्रतीक के रूप में रावण का पुतला जलाया जाता है । दशहरे के दिन शस्त्र और अश्व पूजन होता है । इन नौ दिनों की दिनचर्या का निर्धारण कुछ ऐसा है जिससे हम आरोग्य, मानसिक एवं बौद्धिक सामर्थ्य की वृद्धि, शारीरिक, संगठनात्मक एवं सामरिक सशक्तीकरण की ओर अग्रसर होते हैं।

लंका विजय का संदेश

विजय दशमीं के लिये सर्वाधिक लोकप्रिय कथा श्रीराम जी की लंका विजय करने की है । इस कथा का संदेश समझने केलिये हमें उस महायुद्ध के घटनाक्रम को समझना होगा । न तो रामजी साधारण थे और न रावण । रामजी स्वयं नारायण के अवतार थे और रावण उनका पार्षद जय था जो ऋषि श्राप के कारण धरती पर आया था और नारायण स्वयं उसे लेने आये थे । तब क्या जय ने अपने स्वामी को न पहचाना होगा? और नारायण ने अपने पार्षद को न पहचाना ? फिर भी मानों लीला की या अभिनय किया । यह अभिनय या लीला समाज को शिक्षित करने के लिये थी । यह संदेश रामजी की युक्ति और पूरी योजना में है । रावण परम् शक्तिशाली था । उस पर शिवजी की कृपा थी । जबकि रामजी के साथ अनुज लक्ष्मण के अतिरिक्त कोई न था । उन्होंने हनुमान जी को जोड़ा, सुग्रीव को जोड़ा, हनुमान जी माध्यम से विभीषण को जोड़ा तब युद्ध हुआ । कब कौन किससे युद्ध करेगा यह भी निश्चित हुआ । कल्पना कीजिए यदि तंत्र साधना करते समय मेघनाथ पर हमला न किया जाता तो सफलता मिलती । यदि विभीषण रावण वध का सूत्र न बताता तो रावण का अंत हो सकता था ।
रामजी के अभियान को सफलता संगठन, आंतरिक अनुशासन होना, सबकी एक राय होना, उचित व्यक्ति को उचित काम देने से मिली । जबकि रावण की असफलता का कारण असहयोग, असंगठन था । भाई विरुद्ध हो गया । पत्नि अंततक सहमत न हो सकी । कितने सभासद, कितने अन्य संबंधी रावण से युद्ध न करने केलिये अंत तक कहते रहे । प्रश्न यहाँ उचित और अनुचित का नहीं सबको एकता के सूत्र में बंधकर किसी अभियान में सहभागी बनने का है । सफलता के लिये एकता का, सभी स्वजनों के एक स्वर का संदेश परिवार के लिये भी है और राष्ट्र के लिये भी । जिन परिवारों में मतभेद होते हैं। जिन देशों में शासक के निर्णय का समर्थन समाज नहीं करता वहाँ सदैव समस्या आती है । सामान्य स्थिति में मतभेद हों तो भी चलता है लेकिन युद्ध जैसी आपात स्थिति में भी लोग सहयोग न करें तो राष्ट्र पर संकट घिर आना स्वाभाविक है जैसा श्रीलंका पर घिर गया ।

प्रतिपल सावधानी आवश्यक

महासंग्राम के विवरण से यह तो स्पष्ट है ही सफलता के सूत्र क्या हैं। पर इस उत्सव में यह संदेश भी है कि सफलता के बाद सदैव सावधान रहना आवश्यक है । सावधानी हटी कि दुष्टों की सक्रियता बढ़ी। युद्ध चाहे महिषासुर के विरुद्ध हुआ हो अथवा रावण के विरुद्ध। इन महायुद्धों का उद्देश्य सत्ता का विस्तार अथवा संपत्ति का हरण नहीं था । न तो देवी ने महिषासुर का वध करके अपनी सत्ता स्थापित की, और न रामजी ने लंका विजय के बाद सिंहासन संभाला। रामजी ने तो लंका में प्रवेश तक न किया था । विजय के बाद विभीषण को ही सिंहासन सौंपा। यह दोनों महासंग्राम सत्य की स्थापना के लिये हुये । दोनों युद्ध मर्यादा के हरण और सीमा के उलंघन पर हुये । महिषासुर ने दूसरों के राज्य का हरण किया तो रावण ने सती नारी का हरण किया । इसलिए दोनों दंड के अधिकारी बने ।
इन दोनों लीलाओं में एक और बहुत स्पष्ट संदेश है कि सत्य की स्थापना और सफलता के शीर्ष पर पहुँचने के बाद सावधानी आवश्यक है । सत्य की स्थापना केलिये जितनी शक्ति और समझ की आवश्यकता होती है उतनी सत्य की सुरक्षा के लिये भी होती है । देवताओं के असावधान होने के कारण ही महिषासुर प्रबल हुआ और वनक्षेत्र के संकट का आकलन न करने के कारण ही सीताजी का हरण हुआ । समृद्धि जहाँ ठग लुटेरों को आकर्षित करती है वहीं व्यक्ति की बढ़ती प्रतिष्ठा ईर्ष्यालुओं को एकत्र कर देती है । इसलिये सफलता की सुरक्षा के लिये भी प्रतिक्षण सतर्कता की आवश्यकता है ।

दशहरा नामकरण

शक्ति भवानी की जीत स्वयं के भीतर अलौकिक शक्ति से हुई और रामजी की जीत स्वयं की शक्ति और संगठन क्षमता से हुई । ये दोनों विशेषताएँ इस उत्सव के नाम में निहित हैं। सामान्यतः दशहरे नाम को तिथि के दसवें अंक से माना जाता है । यह सही है पर दशहरे का एक और अर्थ है । “दश” का अर्थ गतिमान रहना, चैतन्य रहना और सक्रिय रहना भी होता है । जबकि “हरे” का आशय नारायण एवं शिव दोनों से है । “हर” कहा गया शिवजी को और “हरि” नारायण को । इन दोनों की संधि से शब्द बनता है “हरे” इसलिये कीर्तन में प्रभुनाम के आगे “हरे हरे” उच्चारण आता है । “हरे” में तीनों गुण और पांचों तत्व समाये होते है। अब “दशहरे” का आशय हुआ पाँचों तत्व और तीनों के अनुरुप कार्य करना । यही प्रभु का काज है । इसके लिये सदैव चैतन्य रहना । सत्य की रक्षा और धर्म की स्थापना प्रकृति का कार्य है इसी के लिये ये दोनों युद्ध हुये । इसलिए इस त्यौहार का नाम “दशहरा” रखा गया ।

scroll to top