दो बार कार्यकारी प्रधानमंत्री बने फिर भी मकान नहीं खरीद पाये

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भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे मनीषी हुये जो अपने जीवन में बहुत शांत और सरल लेकिन अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। श्री गुलजारी लाल नंदा ऐसे विलक्षण राजनेता थे, जो तीन बार देश के ग्रहमंत्री और दो बार कार्यकारी प्रधानमंत्री रहे फिर भी अपना निजी मकान नहीं बना पाये और न उन्होंने अपने किसी परिवारिक सदस्य को राजनीति में बढ़ावा दिया ।

श्री गुलजारी लाल नंदा का पूरा जीवन शांत, सात्विक और संकल्पनिष्ट रहा है । भारतीय राजनीति में वे ऐसे विरले राजनेता थे जो सत्ता की भव्यता और उच्चतम अधिकार प्राप्त करके भी साधारण रहे । उनकी सादगी और सिद्धांत के प्रति दृढ़ रहने के प्रसंग समय समय पर अनेक लेखकों और पत्रकारों ने लिखे हैं। वे शांत रहते थे, कम बोलते थे और सुनते अधिक थे । मतभेद होने पर विवाद नहीं करते थे, अपना मार्ग बदल लेते थे । राजनीति से मार्ग बदलने का भी यही कारण था । प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाधीँ से उनके मतभेद हुये । वे शांत रहे । 1971 के लोकसभा चुनाव में प्रचार भी किया और परिणाम के तुरन्त बाद राजनीति से संयास लेने की घोषणा कर दी । वे अपने राजनैतिक और सार्वजनिक जीवन में कितने सरल और ईमानदार थे इसका वर्णन एक पुस्तक “भारत के प्रधानमंत्री” में है । इस पुस्तक के लेखक अपने समय के वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई हैं। उन्होंने लिखा है कि जब नंदाजी ने राजनीति छोड़ी तो उनके पास आजीविका का कोई साधन नहीं था । आर्थिक कठिनाई के बीच वे अक्सर दिल्ली के कनॉट प्लेस में बस स्टॉप पर बस का इंतजार करते दिख जाते थे। सामान्य और सरल जीवन शैली का उनके जीवन का एक प्रसंग अपने समय बहुत चर्चित रहा है । राजनीति से संन्यास लेकर वे नई दिल्ली की फ्रेंड्स कॉलोनी में किराये का घर लेकर रहने लगे थे । लेकिन कुछ स्थिति ऐसी बनी कि किराया न दे पा रहे थे, किराया चढ़ा तो मकान मालिक मकान खाली कराने के लिये झगड़ा करने लगा । मोहल्ले के लोग एकट्ठे हो गये । उनमें एक पत्रकार भी थे । अगले दिन यह समाचार प्रमुखता से छपा तो अधिकारी और राजनेता उनके निवास पर पहुँचे। सबने उनसे शासकीय आवास में आने को कहा । पर उन्होंने इंकार कर दिया । उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पाँच सौ रुपये प्रतिमाह सम्मान निधि दी जाती थी । नंदाजी इस निधि को यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में किसी सम्मान निधि केलिये भाग नहीं लिया था । लेकिन इस घटना के बाद उन्होंने यह निधि स्वीकार की । और इसी निधि में वे अपना खर्च चलाते थे । नंदाजी श्रीमद्भगवत गीता का नियमित पाठ करते थे, भगवान श्रीकृष्ण उनके ईष्ट थे । समय के साथ कुरुक्षेत्र आ गये । कुरुक्षेत्र वहीं स्थान जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवत गीता का उपदेश दिया था । नंदा जी ने स्वयं को कुरुक्षेत्र के विकास के लिये समर्पित कर दिया । उन्होंने कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड का गठन करके कार्य आरंभ किया । आज कुरुक्षेत्र का जो व्यवस्थित स्वरूप हम देखते हैं । यह नंदाजी के कारण ही विकसित हुआ। उनके प्रयासों से कुरुक्षेत्र आज विश्व के प्रमुख पर्यटक और पुरातात्विक महत्व के स्थलों के रूप में जाना गया । उन्होंने लगभग बाईस वर्ष तक कुरूक्षेत्र की सेवा की । वृद्धावस्था और स्वास्थ्य की गिरावट के बाद भी वे कुरुक्षेत्र विकास के लिये समर्पित रहे । उन्होंने “नवजीवन संघ”और “मानव धर्म मिशन” जैसी संस्थाओं की नींव रखी ।

राजनेता के साथ नंदाजी की पहचान एक लेखक के रूप में भी रही । उनकी मुख्य पुस्तक रचनाओं में “आस्पेक्ट्स ऑफ खादी”, “अप्रोच टू द सेकंड फ़ाइव इयर प्लान”, “गुरु तेगबहादुर”, “संत एंड सेवियर”, “हिस्ट्री ऑफ़ एडजस्टमेंट इन द अहमदाबाद टेक्सटाल्स” और “फॉर ए मौरल रिवोल्युशन तथा सम बेसिक कंसीड्रेशन” हैं। भारत सरकार ने 1997 में उन्हें सर्वोच्च सम्मान “भारत रत्न” से सम्मानित किया ।

संक्षिप्त जीवन परिचय

ऐसी विलक्षण प्रतिभा के धनी श्री गुलजारीलाल नंदा का जन्म 4 जुलाई 1898 को सियालकोट में हुआ था । अब यह क्षेत्र पाकिस्तान में है। पिता बुलाकी राम नंदा शिक्षक थे और माता श्रीमती ईश्वर देवी भारतीय परंपराओं के प्रति समर्पित ग्रहणी थीं। गुलजारी लाल जी की प्राथमिक शिक्षा सियालकोट में हुई । इंटर की पढ़ाई लाहौर के ‘फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज’ में तथा आगे कला संकाय में स्नातकोत्तर एवं क़ानून की पढ़ाई इलाहाबाद से की । पढ़ाई के बीच में ही अठारह वर्ष की आयु में इनका विवाह लक्ष्मी देवी के साथ हुआ । समय के साथ दो पुत्र और एक पुत्री के पिता बने ।

जब वे इलाहाबाद में अपनी वकालत की पढ़ाई के साथ ही स्वाधीनता आँदोलन से जुड़ गये थे। पढ़ाई पूरी करके मुम्बई आये । यहाँ नेशनल कॉलेज में व्याख्याता हो गये । लेकिन यहाँ अधिक न रुक सके । वहाँ से अहमदाबाद आये । अहमदाबाद में टेक्सटाइल्स इंडस्ट्री लेबर एसोसिएशन के सचिव के रूप में जुड़ गये । इस संस्था के सचिव के रूप में वे श्रमिक वर्ग के समीप आये, उनकी व्यवसायिक और व्यक्तिगत समस्याओं से जुड़े और इस वर्ग के प्रति सदैव संवेदनशील रहा । समय के साथ गाँधी जी के निकट आये । वे गाँधी जी के चिंतन और सादगी से बहुत प्रभावित हुये और अपने सार्वजनिक जीवन में गाँधीजी को ही अपना आदर्श मानते थे । नंदाजी ने गाँधी के आव्हान पर प्रत्येक आँदोलन में हिस्सा लिया । इनमें 1921 के असहयोग आँदोलन के साथ 1932 में सत्याग्रह और 1942 का अँग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन भी था । वे तीनों आँदोलन जेल भी गये । अंग्रेजी काल में हुये आंतरिक विधानसभा चुनावों में वे

नंदा बॉम्बे विधानसभा क्षेत्र से 1937 से 1939 तक और 1947 से 1950 तक विधायक रहे। इस दौरान उन्होंने मुम्बई सरकार में श्रम एवं आवास मंत्रालय का कार्यभार भी संभाला। 1947 में काँग्रेस की श्रमिक इकाई ‘इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की स्थापना नंदा जी पहल पर हुई थी।

स्वतंत्रता के बाद जब वे 1951 में राष्ट्रीय योजना समिति के सदस्य बने । योजना समिति और आयोग में अशासकीय संस्थाएँ भी सहभागी बने, इसके लिये नंदाजी ने अशासकीय व्यक्तियों का एक नेटवर्क तैयार किया । जो आगे चलकर भारत सेवक समाज के रूप में उभरा । भारत सेवक समाज के गठन के बाद भारत साधु समाज की नीव भी नंदाजी ने रखी । इसके अतिरिक्त मानव धर्म मिशन, श्री सनातन महावीर दल, रास्ट्रीय लोक सेना, कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड, भारतीय संस्कृति रक्षा संस्थान,नव जीवन संघ ,भारतीय जाग्रत समाज,श्री कृष्ण आयुर्वेदिक फार्मेसी, मानव धर्म सम्मेलन जैसी लगभग दो दर्जन संस्थाओं के गठन का श्रेय भी नंदा जी को जाता है । नंदा जी चाहते थे कि शासकीय योजनाओं, नीति निर्माण और उनके क्रियान्वयन में जन भागीदारी हो । इसके लिये लगभग दो दर्जन संस्थाओं का गठन कर समाज के विभिन्न वर्ग समूहों के अशासकीय व्यक्तियों को जोड़ा । योजना आयोग के साथ वे केन्द्रीय मंत्री भी बने । केन्द्रीय मंत्री रहते हुये भी योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे । भारत की आरंभिक पंचवर्षीय योजना बनाने का श्रेय भी नंदा जी को जाता है । 1957 से 1967 तक सिंचाई, रोजगार, योजना आदि विभिन्न विभागों के केंद्रीय मंत्री रहे । 1963 में केन्द्रीय ग्रहमंत्री मंत्री का प्रभार भी उनके पास रहा । नंदाजी की छवि एक ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ट एवं अपने कार्य के प्रति समर्पित राजनेता के रूप में रही । वे मिलावट और भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ थे । उन्होंने अपने मंत्रालयों में कई ऐसी नीतियां दी जो विभागों प्ररेणा बनीं। वे भारत के तीनों आरंभिक प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और श्रीमती इंदिरा गांधी के मंत्रीमंडल में रहे और दो बार कार्यकारी प्रधानमंत्री बने । दोनों बार उनके कार्यकारी प्रधानमंत्री रहने की अवधि तेरह तेरह दिन रही । पहली बार 1964 में पं जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद और दूसरी बार 1966 श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने। 1971 में उन्होंने राजनीति से संयास लिया और समाज सेवा में जुट गये । जीवन के अंतिम समय में वे अपनी बेटी के पास अहमदाबाद चले गये थे । अंत में सौ वर्ष की आयु में 15 जनवरी 1998 को उन्होंने संसार से विदा ली । उनके द्वारा संस्थापित कुछ संस्थाएँ आज भी समाज सेवा में सक्रिय हैं।

दिल्ली में ‘राष्ट्रसमर्था अहिल्याबाई होलकर’ की नाट्य प्रस्तुति ।

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नाट्य लेखिका – डॉ वृषाली जोशी (राष्ट्रीय संगठन मंत्री विश्व मांगल्य सभा

डायरेक्टर (निर्देशक) – सुबोध सुरेजकर

पुण्यशोलका लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के मानेकसॉ ऑडिटोरियम में शनिवार को “राष्ट्रसमर्था अहिल्याबाई होलकर” की नाट्य प्रस्तुति हुई । मानेकसॉ के जोरावर ऑडिटोरियम में इस नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से देवी अहिल्याबाई होलकर की जीवनी का इतिहास वर्तमान में जीवंत हो उठा । इस नाटक की लेखिका विश्व मांगल्य सभा की राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ वृषाली जोशी हैं जो एक फिजियोथैरेपिस्ट हैं । इस नाट्य मंचन के निर्देशक जाने-माने डायरेक्टर सुबोध सुरेजकर हैं । “राष्ट्रसमर्था अहिल्याबाई होलकर” का नाट्यमंचन पूरे देश में लगभग 101 अलग – अलग स्थानों पर चल रहा है । दिल्ली में ये नाट्य प्रस्तुति भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और विश्व मांगल्य सभा के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया ।

दिल्ली में इस नाट्य प्रस्तुति का आयोजन विश्व मांगल्य सभा की दिल्ली प्रांत की अध्यक्ष सुरभि तिवारी और संगठन की अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री सुश्री पूजा देशमुख के मार्गदर्शन में हुआ ।

इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष एडवोकेट आलोक कुमार जी और बीजेपी के उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सांसद और जाने माने गायक मनोज तिवारी रहे ।

“राष्ट्रसमर्था अहिल्याबाई होलकर” की नाट्यमंचन से पहले विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार जी ने कहा कि “अहिल्या बाई होलकर की जीवनी भारत के संस्कृति की परिचायक है । जो बताता है कि भारत कि स्त्री जब आदिदेव महादेव शिव को हाथों में रख कर जब एक योद्धा बनती है तो बड़े -बड़े आक्रांता पीछे हट जाते हैं । एक शासक के तौर पर देवी अहिल्याबाई होलकर ने जिस तरह से साम्राज्य की सुरक्षा की और भारत की संस्कृति की रक्षा के साथ साथ उसका विस्तार किया आज भारत की हर बेटी हर स्त्री को अपने अंदर की अहिल्याबाई को जगाना होगा । शिवाला के साथ-साथ अपने अंदर की शक्ति को जगाना होगा और भारत की संस्कृति का विस्तार करना होगा । मंदिरों के पुनरउद्धार के साथ-साथ जिस तरह से रानी अहिल्या ने नदियों पर घाट बनवाये , धर्मशाला बनवाये वो उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है । उन्होंने उस समय अर्थव्यवस्था के महत्व को समझा और माहेश्वरी साड़ी के रूप बुनकरों को टेक्सटाइल इंडस्ट्री दिया ।

दिल्ली के उत्तर -पूर्वी दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी ने कहा कि किसी भी बच्चे के लिए उसकी माँ ही प्रथम गुरु होती है और विश्व मांगल्य सभा एक संगठन के रूप में जिस तरह समाज में मातृ निर्माण का कार्य कर रही है उससे नए और संस्कारित भारत का निर्माण हो रहा है ।
जिसका जीता जागता उदाहरण वो ख़ुद अपने घर में देखते हैं । विश्व मांगल्य सभा की दिल्ली प्रांत की अध्यक्ष सुरभि तिवारी भले उनकी पत्नी हैं लेकिन मातृत्व के जिस तरह के संस्कार और संस्कृति का धारा प्रवाह वो समाज में कर रहीं है उसकी छाप पूरी तरह से उनके घर पर और बच्चों में दिखता है । उन्होंने कहा कि देवी अहिल्याबाई के जीवनी को आज पूरे भारत में शहर -शहर और गाँव -गाँव प्रसारित करने की ज़रूरत है और घर -घर में जीवंत करने की ज़रूरत है ।

विश्व मांगल्य सभा की राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ वैशाली जोशी ने कहा कि अगर हमें देश में शिवाजी जैसे बच्चे चाहिए तो हमें अपनी बेटियों को माता जीजा बाई जैसी माँ बनाना होगा । महिलाओं को लेकर एक नैरेटिव बना कि भारत की महिलाए कमजोर होती हैं और समाज में दबी -कुचली होती । ऐसे विमर्श को खत्म करने के लिए हमें हमारी वीरांगनाओं और आदर्श नारियों के इतिहास को जन-जनतक पहुंचाना होगा । लोगों को अवगत करवाना होगा कि समाज भारत की नारियों को लेकर कितना सकारात्मक और सम्मान भारी दृष्टि रखता था । भारत की नारियां हमेशा से सशक्त थी । उन्होंने कहा कि विश्व मांगल्य सभा घर-घर मातृत्व और नारीत्व निर्माण का कार्य कर रहा है ।

विश्व मांगल्य सभा की स्थापना 19 जनवरी 2010 को हुई जो देश में राष्ट्रीय स्तर पर एक महिला जन संगठन के रूप में काम कर रही है । अपने विशिष्ट कार्यपद्धति से भारत की स्त्री वर्ग को “माँ” अभिव्यक्ति के साथ एक सूत्र में बांधने का कार्य कर रही है । आधुनिकता से समन्वय बनाते हुए भारत की आध्यात्मिक , राष्ट्रीय ,पारंपरिक गृहरचना और महापुरुषों को जन्म देने वाली शक्ति केंद्र बने यह समय की माँग है । भारत के देश -धर्म के काम से परिपूर्ण , सौभाग्यशाली , तेजस्वी माता का घर -घर में निर्माण हो ये विश्व मांगल्य सभा का मुख्य उद्देश्य है । सामाजिक उत्थान और देश में सुसंस्कृत और नैतिकता से परिपूर्ण समाज बनाने के उद्देश्य से विश्व मांगल्य सभा वैश्विक महिला संगठन महिलाओं में मातृत्व की भावना जागृत करने का कार्य कर रही है ।

केजरीवाल ही शराब घोटाले के किंगपिन: अनुराग सिंह ठाकुर

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नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री व हिमाचल के हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद श्री अनुराग सिंह ठाकुर ने भाजपा के केन्द्रीय कार्यालय में प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए सीएजी रिपोर्ट के 10 निष्कर्षों को मीडिया के समक्ष रखा और शराब घोटाले के जरिए हुए₹2,026 करोड़ के राजस्व नुकसान के लिए आम आदमी पार्टी की जमकर आलोचना की। श्री अनुराग सिंह ठाकुर ने सीएजी रिपोर्ट को पेश न करने को लेकर आम आदमी पार्टी से तीखे प्रश्न करते हुए अरविंद केजरीवाल पर जनता को ठगने के आरोप लगाए।

श्री अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि “वित्तीय वर्ष 2025 है, लेकिन शराब घोटाला ₹2026 करोड़ का हुआ है। आम आदमी पार्टी ने कहा था कि पाठशाला बनाएंगे,लेकिन पाठशाला की जगह मधुशाला जरूर बना दी। ये झाड़ू की बात करते थे, झाड़ू से दारू पर आ गए। स्वराज की बात करते थे लेकिन स्वराज से शराब पर आ गए। 10 वर्षों की घोटालों की यात्रा ‘आप’ के‘पाप’ की यात्रा है। आम आदमी पार्टी की सरकार के 8 मंत्री जेल गए, 15 विधायक जेल गए, 1 सांसद जेल गया और मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री भी जेल गए हैं। भारत की आजादी के बाद शायद ही ऐसी कोई सरकार होगी जिसने इतने पाप किए हों। इसलिए ‘आपदा’ का जाना जरूरी है। जब कोविड के समय दिल्ली के लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी, ऑक्सीजन और सुविधाओं की कमी थी, जनता त्रस्त थी तब आम आदमी पार्टी मस्त थी। उस समय आम आदमी पार्टी शराब घोटाले का ताना बाना बुन रही थी। शराब घोटाला करने वाले मंत्री ने पाठशाला की जगह मधुशाला बनाया”

श्री अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि “सीएजी की रिपोर्ट में यह स्पष्ट निष्कर्ष सामने आए हैं कि शराब घोटाले से ₹2026 करोड़ का राजकोषीय घाटा हुआ है, नीति के उद्देश्यों के साथ खिलवाड़ हुआ, विशेषज्ञ पैनल की राय को मंत्रियों के समूह ने नजरअंदाज किया, शिकायतों के बावजूद संस्थाओं को बोली लगाने की अनुमति दी गई, बोली लगाने वालों की वित्तीय स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया, लाइसेंस जारी करने के दौरान भी नियमों का उल्लंघन किया गया, उल्लंघन करने वालों को कोई सजा नहीं दी गई और मूल्य निर्धारण में भी पारदर्शिता की कमी पाई गई। कैबिनेट और उप राज्यपाल की अनुमति भी नहीं ली गई। आज यदि दिल्ली को ₹2026 करोड़ का राजस्व हानि हुआ है तोउसके जिम्मेदार केवल अरविन्द केजरीवाल हैं। शराब घोटाले के असली किंगपिन भी अरविन्द केजरीवाल ही हैं। आबकारी नियमों को अनुमोदित करने के लिए विधानसभा में नहीं लाया गया, इसलिए सीएजी ने 10 मुख्य मुद्दों की जांच रिपोर्ट पेश की है। यह रिपोर्ट किसी राजनीतिक दलया राजनीतिक विरोधी ने नहीं बनाई है, बल्कि यह देश की उस संस्था ने पेश की है जो जिम्मेदारी तय करती है”

श्री अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि “जब उप राज्यपाल ने विधानसभा में सीएजी रिपोर्ट को पेश करने की बात कही थी तो मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना की ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि उन्होंने अब तक उन्होंने इस रिपोर्ट को पेश नहीं किया। शीशमहल से लेकर शराब घोटाले तक, इनके सभी घोटालों एवं भ्रष्टाचार का उल्लेख इस रिपोर्ट में हुआ है। आगामी विधानसभा चुनाव में जब जनता वोट देने जाएगी तो एक बार यह विचार अवश्य करेगी कि 11 वर्ष पहले न बड़ा घर लेने, न गाड़ी लेने और न ही सुरक्षा लेने की बात करने वाले केजरीवाल ने 8 घरों को मिलाकर शीशमहल बनाया है, सबसे बड़ी गाड़ी ली, दो राज्यों की सुरक्षा ली और एक नहीं अनेक घोटाले किए। “आप” के पाप के नेतृत्वकर्ता अरविंद केजरीवाल हैं।मुख्यमंत्री आतिशी मर्लेना स्वयं को मुख्यमंत्री मानती नहीं है, चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा नहीं जा रहा है। अरविंद केजरीवाल ने पिछले कार्यकाल में कई पाप किए हैं और वे मुख्यमंत्री भी नहीं बन सकते तो आम आदमी पार्टी के पास चुनाव लड़ने के लिए एक भी ईमानदार चेहरा नहीं बचा है। इन पापों की सजा तो केजरीवाल को भुगतनी पड़ेगी और उत्तर भी देना होगा कि सीएजी की रिपोर्ट को पेश क्यों नहीं किया गया। अरविंद केजरीवाल को सीएजी रिपोर्ट के इन 10 निष्कर्षों पर भी उत्तर देना होगा। केजरीवाल को बताना होगा कि नियमों की अनदेखी क्यों की गई? उपराज्यपाल और कैबिनेट की मंजूरी क्यों नहीं ली गई? दिल्ली प्रदेश को ₹2026 करोड़ का राजस्व हानि हुआ, तो उस हानि का मुनाफा किसे हुआ?

“आप के पाप”
निष्कर्ष 1
‘राजस्व हानि: 2,026 करोड़ रुपये’
निष्कर्ष 2
‘नीति के उद्देश्यों से विचलन’
निष्कर्ष 3
‘विशेषज्ञ पैनल की सिफारिशों को जीओएम ने नजरअंदाज किया’
निष्कर्ष 4
‘शिकायतों के बावजूद सभी संस्थाओं को बोली लगाने की अनुमति दी गई’
निष्कर्ष 5
‘बोलीदाताओं की वित्तीय स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया’
निष्कर्ष 6
‘लाइसेंस जारी करने में उल्लंघन’
निष्कर्ष 7
‘उल्लंघनों पर जुर्माना नहीं लगाया गया’
निष्कर्ष 8
‘मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता की कमी’
निष्कर्ष 9
‘कई महत्वपूर्ण निर्णयों पर कैबिनेट और एलजी की मंजूरी नहीं ली गई’
निष्कर्ष 10
‘आबकारी नियमों को अनुमोदन के लिए विधानसभा के समक्ष नहीं रखा गया’

वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट में मध्यमवर्गीय परिवारों को देनी होगी राहत

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किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को गति देने में मध्यमवर्गीय परिवारों की प्रमुख भूमिका रहती है। देश में ही निर्मित होने वाले विभिन्न उत्पादों की मांग इन्हीं परिवारों के माध्यम से निर्मित होती है। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे परिवार जब मध्यमवर्गीय परिवारों की श्रेणी में शामिल होते हैं तो उन्हें नया स्कूटर, नया फ्रिज, नया एयर कंडिशनर, नया टीवी एवं इसी प्रकार के कई नए पदार्थों (उत्पादों) की आवश्यकता महसूस होती है। साथ ही, नए मकानों की मांग भी मध्यमवर्गीय परिवारों के बीच से ही निर्मित होती है। इसीलिए यह कहा जाता है कि जिस देश में मध्यमवर्गीय परिवारों की संख्या जितनी तेजी से बढ़ती है उस देश का आर्थिक विकास भी उतनी ही तेज गति से आगे बढ़ता है। भारत में भी हाल ही के वर्षों में मध्यमवर्गीय परिवारों की संख्या में भारी वृद्धि दर्ज हुई है। परंतु, मुद्रा स्फीति, कर का बोझ एवं इन परिवारों की आय में वृद्धि दर में आ रही कमी के चलते इन परिवारों की खर्च करने की क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है, जिससे कई कम्पनियों का यह आंकलन सामने आया है कि विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में उपभोग की जाने वाली वस्तुओं की मांग में कमी दृष्टिगोचर हुई है। विशेष रूप से उपभोक्ता वस्तुओं (Fast Moving Consumer Goods – FMCG) के क्षेत्र में उत्पादन करने वाली कम्पनियों का इस संदर्भ में आंकलन बेहद चौंकाने वाला है। साथ ही, वित्तीय वर्ष 2023-24 की द्वितीय तिमाही में इन कम्पनियों द्वारा उत्पादित उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री एवं लाभप्रदता में भी कमी दिखाई दी है।

गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के लिए केंद्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा चलायी जा रही विभिन्न सहायता योजनाओं का लाभ अब सीधे ही इन परिवारों को पहुंचने लगा है। 80 करोड़ से अधिक नागरिकों को प्रतिमाह मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया जा रहा है। किसानों के खातों में सहायता राशि सीधे ही जमा की जा रही है। विभिन्न राज्यों द्वारा लाड़ली लक्ष्मी योजना, लाड़ली बहिना योजना आदि माध्यम से महिलाओं के खातों में सीधे ही राशि जमा की जा रही है। इसके साथ ही इन परिवारों के सदस्यों को रोजगार के नए अवसर भी उपलब्ध होने लगे हैं। जिससे इस श्रेणी के परिवारों में से कई परिवार अब मध्यमवर्गीय श्रेणी के परिवारों में शामिल हो रहे हैं।

केंद्रीय श्रम मंत्री ने हाल ही में भारतीय संसद को बताया है कि देश में पिछले 10 वर्षों में रोजगार उपलब्ध नागरिकों की संख्या 36 प्रतिशत बढ़कर वित्तीय वर्ष 2023-24 में 64.33 करोड़ के स्तर पर आ गई है, यह संख्या वर्ष 2014-15 में 47.15 करोड़ के स्तर पर थी। वर्ष 2024 से वर्ष 2014 के बीच, 10 वर्षों में रोजगार में लगभग 7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई थी अर्थात इस दौरान केवल 2.9 करोड़ अतिरिक्त नौकरियां सृजित हो सकीं थी, जबकि वर्ष 2014 से वर्ष 2024 के बीच 17.19 करोड़ अतिरिक्त नौकरियां सृजित हुई हैं, यह लगभग 6 गुना से अधिक की वृद्धि दर्शाता है। पिछले केवल एक वर्ष अर्थात वित्तीय वर्ष 2023-24 के बीच ही देश में लगभग 4.6 करोड़ नौकरियां सृजित हुई हैं। कृषि क्षेत्र में वर्ष 2004 से वर्ष 2014 के बीच रोजगार में 16 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी जबकि वर्ष 2014 से वर्ष 2023 के बीच कृषि के क्षेत्र में रोजगार में 19 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई हैं। इसी प्रकार विनिर्माण के क्षेत्र में भी वर्ष 2004 से वर्ष 2014 के बीच रोजगार में केवल 6 प्रतिशत दर्ज हुई थी जबकि वर्ष 2014 से वर्ष 2023 के बीच विनिर्माण के क्षेत्र में रोजगार में 15 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। सेवा के क्षेत्र में तो और भी अधिक तेज वृद्धि दर्ज हुई है। वर्ष 2004 से वर्ष 2014 के बीच सेवा के क्षेत्र में रोजगार 25 प्रतिशत की दर से बढ़ा था, जबकि वर्ष 2014 से वर्ष 2023 के बीच इसमें 36 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इस सबका असर बेरोजगारी की दर में कमी के रूप में देखने में आया है। देश में बेरोजगारी की दर वर्ष 2017-18 के 6 प्रतिशत से वर्ष 2023-24 में घटकर 3.2 प्रतिशत रह गई है। इसका सीधा असर कामकाजी आबादी अनुपात पर भी पड़ा है जो वर्ष 2017-18 के 46.8 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 58.2 प्रतिशत पर पहुंच गया है। सबसे अच्छी स्थिति तो संगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे नागरिकों की संख्या में वृद्धि से बनी है। क्योंकि संगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे युवाओं को नियोक्ताओं द्वारा कई प्रकार की अतिरिक्त सुविधाएं केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा जारी नियमों के अंतर्गत प्रदान की जाती है। संगठित क्षेत्र में शामिल होने वाले युवाओं (18 से 28 वर्ष के बीच की आयु के) की संख्या में सितम्बर 2017 से सितम्बर 2024 के बीच 4.7 करोड़ की वृद्धि दर्ज हुई है, ये युवा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ई पी एफ ओ) से भी जुड़े हैं।

यदि किसी देश में मुद्रा स्फीति की दर लगातार लम्बे समय तक उच्च स्तर पर बनी रहे एवं नागरिकों की आय में वृद्धि दर मुद्रा स्फीति में हो रही वृद्धि दर से कम रहे तो इसका सीधा असर मध्यमवर्गीय परिवार के बचत एवं खर्च करने की क्षमता पर पड़ता है। यदि मध्यमवर्गीय परिवार के खर्च करने की क्षमता कम होगी तो निश्चित ही बाजार में विभिन्न उत्पादों की मांग भी कम होगी इससे विभिन्न कम्पनियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री भी कम होगी। यह स्थिति हाल ही के समय में भारत की अर्थव्यवस्था में दृष्टिगोचर है। अतः वित्तीय वर्ष 2024-25 के बजट से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार द्वारा इस प्रकार के प्रयास किए जाएंगे जिससे मुद्रा स्फीति की दर देश में कम बनी रहे एवं मध्यमवर्गीय परिवारों की आय में वृद्धि हो। साथ ही, मध्यमवर्गीय परिवारों की आय पर लगाए जाने वाले आय कर में भी कमी की जानी चाहिए। बैकों द्वारा प्रदान किए जा रहे ऋणों पर ब्याज दरों में कमी की घोषणा द्वारा भी मध्यमवर्गीय परिवारों को कुछ हद्द तक राहत पहुंचाई जा सकती है। ऋण पर ब्याज दरों में कमी करने से मध्यमवर्गीय परिवारों द्वारा ऋण खातों में जमा की जाने वाली मासिक किस्त की राशि में कमी होती है और उनकी खर्च करने की क्षमता में कुछ हद्द तक सुधार होता है। मध्यमवर्गीय परिवारों के हित में यदि उक्त उपाय नहीं किया जाते हैं तो बहुत सम्भव है कि यह मध्यमवर्गीय परिवार एक बार पुनः कहीं गरीबी रेखा के नीचे नहीं खिसक जाय। अतः वित्तीय वर्ष 2024-25 के बजट के माध्यम से मध्यमवर्गीय परिवारों को राहत प्रदान करने का भरपूर प्रयास किया जाना चाहिए।

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