अमेरिका के सामने झुक गया भारत ! आरोप और वैश्विक हकीकत

donald-trump_large_1133_23.webp

-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारतीय राजनीति में आरोपों की कमी कभी नहीं रहती। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु जब आरोप तथ्यों और वैश्विक वास्तविकताओं से कटकर राजनीतिक बयान बन जाते हैं तब वे स्‍वभाविक तौर पर अपनी गंभीरता खो देते हैं। हाल के दिनों में कांग्रेस की ओर से यह आरोप लगाया गया कि भारत की सरकार अमेरिका के सामने झुक गई है, ठीक वैसा ही है।

वस्‍तुत: यह आरोप सुनने में भले ही तेज और आक्रामक लगे, पर यदि इसे वैश्विक राजनीति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और दुनिया की वास्तविक परिस्थितियों की रोशनी में देखा जाए तो यह लगभग खोखला और निराधार प्रतीत होता है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि दुनिया की शक्ति संरचना कैसी है। आज भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कुछ ही देश ऐसे हैं जिनका प्रभाव राजनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक और सुरक्षा के क्षेत्र में व्यापक रूप से दिखाई देता है। अमेरिका उन देशों में सबसे प्रमुख है। उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, उसकी तकनीकी कंपनियां वैश्विक नवाचार की दिशा तय करती हैं और उसकी सैन्य शक्ति का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि दुनिया भर के देश उसके साथ सहयोग और साझेदारी की कोशिश करते हैं।

किसी देश की वास्तविक ताकत का सबसे बड़ा संकेत यह नहीं होता कि उसके बारे में राजनीतिक भाषणों में क्या कहा जा रहा है, वस्‍तुत: यह होता है कि दुनिया के लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं। यदि हम इस कसौटी पर अमेरिका को देखें तो एक सच्चाई साफ नजर आती है। दुनिया भर के करोड़ों लोग आज भी अमेरिका को अवसरों की भूमि मानते हैं। भारत, चीन, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के कई देशों से लाखों लोग हर साल अमेरिका में पढ़ने, काम करने और बसने का सपना देखते हैं।

यदि वैश्विक शक्ति के अन्य आयामों पर नजर डालें तो अमेरिका की बढ़त कई क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई देती है। तकनीकी क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां वहीं से निकली हैं और सिलिकॉन वैली आज भी नवाचार का प्रमुख केंद्र मानी जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में भी कई शीर्ष विश्वविद्यालय अमेरिका में स्थित हैं और यही कारण है कि दुनिया भर के छात्र वहां उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते हैं। अर्थव्यवस्था के स्तर पर अमेरिकी डॉलर अभी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में सबसे प्रभावशाली मुद्रा बना हुआ है।

इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी गंतव्य बना हुआ है और वहां प्रवासी मूल के लोगों की संख्या करोड़ों में है। यह केवल कानूनी रास्तों तक सीमित नहीं है। अमेरिका मेक्सिको सीमा पर हर साल हजारों लोग अवैध रूप से प्रवेश करने की कोशिश करते हैं। कठिन रेगिस्तानी रास्ते, नदियों का जोखिम और सख्त सीमा सुरक्षा के बावजूद लोग उस दिशा में बढ़ते रहते हैं। कई बार यह प्रयास दुखद घटनाओं में बदल जाता है और कुछ लोग अपनी जान तक गंवा बैठते हैं। इसके बावजूद अमेरिका जाने का सपना खत्म नहीं होता। यह एक कठोर किंतु स्पष्ट सच्चाई है कि यदि कोई देश इतना महत्वहीन या कमजोर होता तब भला क्‍यों लोग अपनी जिंदगी को खतरे में डालकर वहां पहुंचने की कोशिश करते?

अमेरिका की ताकत उसकी सेना या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी संस्थाएं हैं। वहां का संविधान, न्यायपालिका और नागरिक अधिकारों की व्यवस्था दुनिया में मजबूत लोकतांत्रिक ढांचे का उदाहरण मानी जाती है। इसी का एक ताजा उदाहरण जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को लेकर चल रही बहस है। अमेरिका में कई धार्मिक संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय से अपील की है कि जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता को सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रयास में “हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन” ने प्रमुख भूमिका निभाई है। इस संगठन ने सत्तावन धार्मिक संगठनों के साथ मिलकर संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में एक मित्र याचिका दायर की है। यह याचिका ट्रंप बनाम बारबरा नामक मामले में दी गई है जो इस समय न्यायालय में विचाराधीन है।

यह विवाद उस समय सामने आया जब दो हजार पच्चीस की शुरुआत में “डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन” ने एक कार्यकारी आदेश के माध्यम से जन्मसिद्ध नागरिकता को सीमित करने का प्रयास किया। अमेरिका के संविधान के चौदहवें संशोधन में स्पष्ट रूप से लिखा है कि संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति नागरिक माना जाएगा। यही प्रावधान अमेरिकी लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों में से एक है और इसी कारण इस विषय पर व्यापक बहस चल रही है।

इस बहस में एक दिलचस्प पहलू यह भी सामने आया है कि हिन्‍दू समुदाय ने अपने तर्क यहां सिर्फ संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर ही सिद्ध करने के प्रयास नहीं किए हैं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर भी रखे हैं। “हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन” का कहना है कि हिंदू परंपरा पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की शिक्षा देती है। यह विचार महा उपनिषद में व्यक्त “वसुधैव कुटुंबकम” के सिद्धांत में मिलता है, जिसका अर्थ है कि उदार विचार वाले लोगों के लिए पूरी दुनिया एक परिवार होती है। संकीर्ण सोच वाले लोग किसी को अपना और किसी को पराया मानते हैं, लेकिन उदार विचार वाले लोगों के लिए पूरी दुनिया एक परिवार होती है।

इसी प्रकार तैत्तिरीय उपनिषद में “अतिथि देवो भव” का संदेश दिया गया है, जिसमें अतिथि को देवता के समान सम्मान देने की बात कही गई है। कहा गया है कि अतिथि को देवता के समान मानकर उसका सम्मान करना चाहिए। यह उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता के विचार और मूल्य आज भी दुनिया के दूसरे हिस्सों में बसे भारतीय समुदाय के जीवन और सोच का हिस्सा हैं। फाउंडेशन ने यह भी कहा कि जन्मसिद्ध नागरिकता अमेरिका में धार्मिक विविधता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इन सभी तथ्यों के बीच भारत और अमेरिका के संबंधों को समझना भी जरूरी है। यह संबंध किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल की देन नहीं हैं। पिछले कई दशकों से भारत की विदेश नीति में अमेरिका के साथ सहयोग एक महत्वपूर्ण तत्व रहा है। दो हजार आठ का भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु समझौता इसका एक प्रमुख उदाहरण है। इसके बाद 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से लगातार रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ता गया है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार का स्तर भी तेजी से बढ़ा है और यह आंकड़ा सैकड़ों अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।

यहां भारतीयों के लिए समझने के लिए बहुत कुछ है, वस्‍तुत: कूटनीति का मूल सिद्धांत ही यही है कि कोई देश अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां बनाते हैं। इसमें भावनात्मक नारेबाजी का कोई औचित्‍य नहीं है, बल्कि व्यावहारिक सोच की आवश्यकता होती है। इसी दृष्टि से देखें तो भारत का अमेरिका के साथ सहयोग वर्तमान की कोई कमजोरी नहीं है, यह तो एक सोचा-समझा निर्णय है। यही कारण है कि कांग्रेस का यह आरोप कि भारत- अमेरिका के सामने झुक गया है, वास्तविकता से बहुत दूर दिखाई देता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हर देश अपने हितों को ध्यान में रखकर फैसले करता है। अभी आपको जो दिख रहा है, इसे आप केंद्र सरकार की व्यावहारिक कूटनीति का हिस्सा कह सकते हैं।

बीबीसी की रिपोर्ट और ग़ाफ़िरा क़ादिर का मामला: एकतरफा नैरेटिव या प्रोपगेंडा?

2.png

दिल्ली। बीबीसी हिंदी और उर्दू ने हाल ही में ग़ाफ़िरा क़ादिर नामक कश्मीरी रिपोर्टर की कहानी पर एक वीडियो रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें दावा किया गया कि दिल्ली में एक कश्मीरी मुस्लिम महिला के लिए किराए का घर ढूंढना बेहद मुश्किल है। रिपोर्ट में दिखाया गया कि ग़ाफ़िरा को एक महीने से अधिक समय लग गया, क्योंकि कई मकान मालिकों ने कश्मीरियों या मुसलमानों को घर देने से इनकार कर दिया। यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, लेकिन साथ ही विवाद भी खड़ा हो गया।

रिपोर्ट का मुख्य दावा

रिपोर्ट में ग़ाफ़िरा की व्यक्तिगत अनुभवों को आधार बनाकर दिल्ली में कश्मीरियों और मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव को हाइलाइट किया गया। यह सुझाव दिया गया कि पहचान के आधार पर पूर्वाग्रह आम है, और यह समस्या कई कश्मीरी महिलाओं के साथ है। बीबीसी ने इसे सामान्य शहरी भारत की समस्या के रूप में पेश किया।

सवाल जो उठ रहे हैं

दिल्ली की मुस्लिम आबादी 16% से अधिक है, और यहां लाखों मुसलमान किराए पर रहते हैं। कई इलाके जैसे जामा मस्जिद, शाहीन बाग, जहांगीरपुरी, सीमापुरी आदि मुस्लिम बहुल हैं, जहां किराए के मकान आसानी से उपलब्ध होते हैं। फिर भी रिपोर्ट में मुख्य फोकस हिंदू-बहुल इलाकों पर रहा, जहां इनकार हुआ। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने पूछा: मुस्लिम परिवारों ने ग़ाफ़िरा को घर क्यों नहीं दिया? क्या यह जानबूझकर हिंदू मकान मालिकों को निशाना बनाने का प्रयास था?

कई पोस्ट्स में दावा किया गया कि दिल्ली में किराए के घर ढूंढना हर व्यक्ति के लिए चुनौतीपूर्ण है—चाहे वह किसी भी धर्म का हो—क्योंकि मकान कम हैं और मांग ज्यादा। लेकिन रिपोर्ट में इसे केवल धार्मिक भेदभाव से जोड़ा गया, बिना संतुलित दृष्टिकोण के।

प्रोपगेंडा का आरोप

बीबीसी पर अक्सर भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने का आरोप लगता रहा है। यह रिपोर्ट भी इसी कड़ी में देखी जा रही है, जहां एक व्यक्तिगत अनुभव को पूरे समुदाय या शहर पर थोपने की कोशिश दिखती है। कुछ यूजर्स ने इसे मुसलमानों को बदनाम करने या हिंदुओं में डर फैलाने का षड्यंत्र बताया। हालांकि, रिपोर्ट में कोई स्पष्ट सबूत नहीं कि यह जानबूझकर बदनामी के लिए बनाई गई। यह बीबीसी की पुरानी शैली से मेल खाती है, जहां चुनिंदा कहानियां भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव दिखाने के लिए इस्तेमाल होती हैं।

दूसरी ओर, हिंदू मकान मालिकों के इनकार के पीछे सुरक्षा, सांस्कृतिक अंतर या अतीत की घटनाओं का डर भी हो सकता है, लेकिन रिपोर्ट ने इसे नजरअंदाज किया।

यह रिपोर्ट व्यक्तिगत संघर्ष को दिखाती है, लेकिन इसे व्यापक साजिश या प्रोपगेंडा कहना अतिशयोक्ति होगी। फिर भी, इसमें संतुलन की कमी है-मुस्लिम-बहुल इलाकों का जिक्र न करना और सवाल उठाना कि क्यों हिंदू इलाकों पर फोकस? दिल्ली जैसे शहर में आवास संकट सबके लिए है, लेकिन धार्मिक लेबलिंग इसे और जटिल बनाती है। सच्चाई बीच में है: भेदभाव मौजूद है, लेकिन इसे एकतरफा पेश करना विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। बेहतर होगा कि ऐसी रिपोर्ट्स में सभी पक्षों को जगह मिले, ताकि समाज में समझ बढ़े, न कि विभाजन।

Voting concludes in Nepal, voters’ turnout 60 %

epa_69a9a7c1c8d2-1772726209.jpg.webp

Nava Thakuria

Guwahati: Polling peacefully concluded in the Himalayan nation of Nepal this evening (5 March 2026) to elect a new Parliament in Kathmandu amid tight security cover where over 60 % of 19 million Nepali electors cast their votes. Nepal Election Commission established 23,112 polling centres under 10,963 polling stations across 77 districts of the south Asian nation where voting started at 7 am (NPT, which is 15 minutes ahead of Indian standard time). The voting under a single phase polling concluded at 5 pm under the security cover of 341,113 security personnel including 149,000 temporary election police personnel.

Counting of ballot papers also began to identify the winners for filling up 275 seats in the House of Representatives. Every voter was allowed to cast two votes, one for his/her preferred candidates and other for parties. A total of 3,406 candidates, representing over 65 political parties and 1,143 independent contestants, remained in the fray for 165 seats under the first-past-the-post system, while another 3,135 candidates were vying for 110 seats through the proportional representation system.

Front runners for the post of Prime Minister include Balendra Shah (popularly known Balen) of Rastriya Swatantra Party, KP Sharma Oli of Communist Party of Nepal (Unified Marxist–Leninist), Gagan Thapa of Nepali Congress and Pushpa Kamal Dahal alias Prachanda of Nepali Communist Party. Amazingly, both Shah and Oli are contesting from the same constituency (Jhapa-5 in eastern Nepal), which is adjacent to Siliguri corridor (also known as Chicken’s neck). Once the election outcomes come out and the winner takes power, the term of interim government led by retired Nepal Supreme Court chief justice Sushila Karki will be concluded.

She accepted the responsibility last year during September when the deadly anti-corruption agitation by the Nepali youths compelled the Oli-led government alliance government of CPN-UML and Nepali Congress. Casting her votes in a Kathmandu polling station in the morning hours, Ms Karki expressed her happiness that election day passed without any bloodshed. Earlier, she addressed the nation on Monday ahead of Holi and national elections urging the citizens to exercise the franchise maintaining peace and harmony. Ms Karki asserted that the government and election authorities were fully prepared to conduct the polling in a fair, free and fearless manner.

Mainstream political outfit Rastriya Prajatantra Party, during campaigning, had raised voices for bringing back the constitutional monarchy and restoring Nepal’s political status of a Sanatani Hindu Rashtra. The right-wing party, which has fielded a number of candidates across the country, used to organize public rallies supporting the last Nepal king, Gyanendra Bir Bikram Shah Dev, who now leads a private life in Kathmandu after dethroning from the palace nearly two decades back. Now a section of hardcore Hindu nationalists demands the restoration of monarchy even as a ceremonial head of Nepal (in place of the President). The pro-monarchists often hit the streets waving national flags, placards and chanting slogans, whenever the septuagenarian royal scion visits rural areas.

चटगांव हिल ट्रैक्ट्स: क्या पूर्वोत्तर भारत के लिए उभरती सुरक्षा चुनौती?

Northeast_india.png

नव ठाकुरीया

गुवाहाटी : दक्षिण बांग्लादेश का चटगांव हिल ट्रैक्ट्स (सीएचटी) क्षेत्र, जो भारत के त्रिपुरा, मिजोरम और असम की सीमाओं से सटा है, आज पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर रहा है। क्या यह इलाका बांग्लादेश, म्यांमार के अराकान राज्य और उत्तर–पूर्व भारत से जुड़े विभिन्न हथियारबंद समूहों के लिए धीरे-धीरे एक मंच बनता जा रहा है?

इसके साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि क्या भारत सरकार सीएचटी में रहने वाले मूल पहाड़ी समुदायों की समस्याओं को केवल बांग्लादेश का आंतरिक मामला मानकर अनदेखा करती रहेगी। 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में हुए चटगांव हिल ट्रैक्ट्स शांति समझौते का पूर्ण कार्यान्वयन आज भी अधूरा है, जिसके कारण चकमा सहित कई आदिवासी समुदायों में असंतोष बना हुआ है।

हाल ही में गुवाहाटी में आयोजित एक सम्मेलन ने इस मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया। ऑल इंडिया चकमा स्टूडेंट्स यूनियन (AICSU) की तीसरी वार्षिक बैठक 6–7 मार्च 2026 को शिल्पग्राम स्थित नॉर्थ ईस्ट जोन कल्चरल सेंटर (NEZCC) में आयोजित हुई। सम्मेलन में शिक्षाविदों, अधिवक्ताओं, पत्रकारों और छात्र नेताओं ने सीएचटी की मौजूदा स्थिति तथा वहां के पहाड़ी समुदायों के मानवाधिकारों से जुड़े प्रश्नों पर गंभीर चर्चा की।
वक्ताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि शांति समझौते पर हस्ताक्षर के लगभग तीन दशक बाद भी चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी है। समझौते ने भले ही दो दशक लंबे सशस्त्र संघर्ष को औपचारिक रूप से समाप्त किया हो, लेकिन न्याय, वास्तविक स्वायत्तता और भूमि अधिकारों से जुड़े कई वादे आज भी अधूरे हैं।

आज भी इस क्षेत्र में भारी सैन्य उपस्थिति, भूमि विवाद, कमजोर नागरिक संस्थाएं और मानवाधिकार उल्लंघन जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। चूंकि यह इलाका भारत और म्यांमार की सीमाओं से लगा एक संवेदनशील भू-राजनीतिक क्षेत्र है, इसलिए यहां की अस्थिरता का प्रभाव व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है।

AICSU के अध्यक्ष दृश्य मुनि चकमा का कहना है कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति स्थिर और शांतिपूर्ण पड़ोस को प्राथमिकता देती है, ताकि मानव तस्करी, अवैध आव्रजन, उग्रवादी नेटवर्क और बाहरी रणनीतिक हस्तक्षेप जैसे खतरों को रोका जा सके। यदि सीएचटी में प्रशासनिक शून्यता या हिंसा की स्थिति बनी रहती है, तो इसका लाभ गैर-राज्य तत्व या क्षेत्रीय भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धी उठा सकते हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र संवेदनशील रहा है। भारत के विभाजन के समय चटगांव इलाके में लगभग 95 प्रतिशत आबादी गैर-मुस्लिम थी, लेकिन इसे पूर्वी पाकिस्तान में शामिल कर दिया गया। इसके बाद 1960 के दशक में कप्ताई बांध परियोजना के कारण हजारों पहाड़ी परिवारों को विस्थापित होना पड़ा। विभिन्न आकलनों के अनुसार इस परियोजना से लगभग एक लाख लोग प्रभावित हुए, जिनमें से कई परिवार त्रिपुरा सीमा पार कर भारत में आ बसे।
1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के बाद आदिवासी नेताओं ने स्वायत्तता की मांग उठाई, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया। इसके बाद बड़ी संख्या में भूमि-विहीन बंगाली मुस्लिम आबादी को चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में बसाया गया और उनकी सुरक्षा के लिए सेना की तैनाती बढ़ाई गई। इससे स्थानीय पहाड़ी समुदायों में असंतोष बढ़ा और धीरे-धीरे यह आंदोलन सशस्त्र संघर्ष में बदल गया।

1977 से 1997 तक चले इस संघर्ष में 30 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए। परबत्य चटगांव जनसंहति समिति (PCJSS) की सशस्त्र शाखा ‘शांति वाहिनी’ और बांग्लादेशी सुरक्षा बलों के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा। अंततः 2 दिसंबर 1997 को शेख हसीना की सरकार और पीसीजेएसएस के बीच शांति समझौता हुआ, जिसने सशस्त्र आंदोलन को समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया।
हालांकि इस समझौते के तहत पहाड़ी समुदायों को कुछ सांस्कृतिक अधिकार और सीमित स्वायत्तता देने का प्रावधान था, लेकिन स्थानीय समुदाय आज भी इसके पूर्ण क्रियान्वयन की मांग कर रहे हैं। बौद्ध, हिंदू और अन्य जातीय समुदाय अपने क्षेत्रों में भूमि अधिकार, सुरक्षा और अधिक प्रशासनिक स्वायत्तता चाहते हैं।

गुवाहाटी सम्मेलन के एक सत्र में यह भी चर्चा हुई कि यदि सीएचटी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है, तो सीमापार जातीय संबंधों के कारण वहां के लोग पूर्वोत्तर भारत में शरण लेने को मजबूर हो सकते हैं। साथ ही यह आशंका भी व्यक्त की गई कि यदि इस क्षेत्र में उग्रवादी गतिविधियां दोबारा बढ़ती हैं—जिनमें रोहिंग्या से जुड़े आतंकी संगठनों या कुछ भारत-विरोधी तत्वों की भूमिका शामिल हो—तो इससे पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा स्थिति प्रभावित हो सकती है।
सम्मेलन के इस सत्र का संचालन AICSU के पूर्व अध्यक्ष श्यामल विकास चकमा ने किया। इसमें डॉ. अनुराग चकमा, डॉ. अंकिता दत्ता, नरेश चकमा, अधिवक्ता कुलदीप बैश्य सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे। चर्चा में रंगमती, खगराचारी और बंदरबन जिलों में स्थापित जिला परिषदों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए, जहां लंबे समय से नियमित चुनाव नहीं हुए हैं।

वक्ताओं का मानना था कि क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए चटगांव हिल ट्रैक्ट्स समझौते का पूर्ण और पारदर्शी क्रियान्वयन आवश्यक है। साथ ही स्थानीय समुदायों को भी अपने अधिकारों की लड़ाई को लोकतांत्रिक और परिपक्व तरीकों से आगे बढ़ाने की जरूरत है।
(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

scroll to top