कांग्रेस का असली खेल: कांग्रेस ने मुसलमानों-ईसाइयों में भी जाति पैदा की

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दिल्ली। भाजपा और कांग्रेस की वैचारिक कहा सुनी में यह बात कांग्रेस ने साबित कर दी है कि भाजपा हिन्दू मुस्लिम करती है। भाजपा सत्तर सालों में यह बात साबित नहीं कर पाई कि कांग्रेस अगड़ा पिछड़ा करती है। उसने समाज को जाति के नाम पर बांटा और जो मुसलमान और क्रिश्चियन गर्व से कहते थे कि उनमें अगड़ा पिछड़ा नहीं है। कांग्रेस ने अपने सत्तर सालों की राजनीति में उनके बीच भी अगड़े और पिछड़े बनाए।

यह सच है कि कांग्रेस हिन्दू-मुसलमान नहीं करती। लेकिन कांग्रेस ने हिन्दू को हिन्दू से लड़ाया। क्रिश्चियन को क्रिश्चियन के खिलाफ खड़ा किया और मुसलमान-मुसलमान के बीच भेद पैदा किया। यह सिम्पल सी बात भाजपा भारतीय समाज को समझाने में सफल नहीं हो पाई है।

भाजपा पर हिंदू-मुस्लिम विभाजन का आरोप कांग्रेस ने स्थापित कर दिया है, जबकि कांग्रेस ने इससे कहीं अधिक सूक्ष्म और प्रभावी तरीके से समाज के हर तबके में जाति आधारित भेदभाव पैदा किया, यहां तक कि उन समुदायों में भी जहां जाति की अवधारणा मूल रूप से लागू नहीं होती।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुस्लिम समुदाय है। इस्लाम में जाति-व्यवस्था हराम मानी जाती है और कुरान-सुन्नत में सब मुसलमान बराबर बताए गए हैं। लेकिन कांग्रेस ने मुसलमानों के बीच भी ‘अगड़ा-पिछड़ा’ का फर्क पैदा किया। विभिन्न राज्यों में कांग्रेस सरकारों ने मुस्लिम समुदाय की कई जातियों या उप-समूहों को OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) में शामिल किया, जैसे कर्नाटक में ‘श्रेणी 2बी’ के तहत मुस्लिमों को अलग आरक्षण दिया गया। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी कांग्रेस ने मुस्लिमों के लिए 4-5% आरक्षण की कोशिश की, जिसे OBC कोटा से अलग या उसके अंदर व्यवस्थित किया। इससे मुसलमानों में ‘पिछड़े मुसलमान’ और ‘अन्य’ का विभाजन हुआ। कई मुस्लिम नेता और संगठन रिजर्वेशन के लालच में इस्लामी सिद्धांतों को नजरअंदाज कर कांग्रेस के साथ खड़े हो गए।

इसी तरह ईसाई समुदाय में भी कांग्रेस ने ST (अनुसूचित जनजाति) और OBC जैसी श्रेणियां बनाईं। दलित ईसाई या आदिवासी ईसाई को अलग लाभ देने की नीतियां अपनाईं, जिससे एक समान धर्म के लोग आपस में बंट गए। हिंदुओं में तो कांग्रेस ने जाति को राजनीतिक हथियार बनाया ही-ओबीसी, एससी, एसटी के नाम पर वोट बैंक बनाए और अगड़े-पिछड़े की लड़ाई को भड़काया। यह बात जो सार्वजनिक है, भाजपा अपने मतदाताओं को भी आज तक समझा नहीं पाई है।

कांग्रेस की यह नीति ‘तुष्टिकरण’ से आगे बढ़कर समाज को अंदर से तोड़ने वाली रही। मुसलमान जो होली में रंग छू जाने भर से, मरने मारने को उतारू हो जाता है। अपने Religious texts को लेकर इतना प्रतिबद्ध समाज, रिजर्वेशन के लिए जाति स्वीकार करने को तैयार हो गया। मानों मुसलमानों के वर्ग ने कांग्रेस के बहकावे में आकर अपने सेल्फ रिस्पेक्ट से ही समझौता कर लिया! इस तरह कांग्रेस ने मुसलमानों के एक वर्ग को मुसलमानों की मुख्यधारा से काट दिया। कांग्रेसी बहकावे में आकर वे तैयार हो गए एक ही सफ में खड़े होने वालों के बीच अलग सफ में खड़े होने को।

ईसाई समुदाय में भी भेद पैदा हुआ। यह विभाजन कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति के लिए किया, लेकिन भाजपा इसे प्रभावी ढंग से उजागर नहीं कर पाई। इस तरह कांग्रेस ने साबित किया कि वह ‘बांटो और राज करो’ की सबसे बड़ी मास्टर है-न सिर्फ हिंदू-हिन्दू में-मुस्लिम-मुस्लिम में, बल्कि हर समुदाय के अंदर।

संघ द्वारा चलाए जा रहे पंच परिवर्तन कार्यक्रम से समाज परिवर्तन सम्भव है  

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ग्वालियर : आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं और यदि हम संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें, तो ध्यान में आता है कि संघ के स्वयसेवकों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विचार और क्रियाशीलता के स्तर पर सक्रिय योगदान दिया है। वे अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के वाहक भी बने हैं। प्रारम्भ का सीमित संघ कार्य, समय के साथ व्यापक होता गया है। समाज की विभिन्न आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवक विविध आयामों में अपने सहयोगियों के साथ क्रियाशील बने हैं। परिणामतः संघ के उद्देश्य के अनुरूप, देश में हिंदुत्व का जागरण करने की दिशा में विशेष प्रगति हुई है। हिंदुत्व के जागरण से, समाज में जाति, वर्ग, भाषा इत्यादि के आधार पर होने वाले अनेक प्रकार के भेदभाव, धीरे धीरे कम होने लगे हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, अयोध्या मंदिर में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा, कुम्भ जैसे विराट आयोजन इत्यादि अनेक ऐसे अवसर आए हैं – जहां हिंदू समाज का एक संगठित, भव्य और उच्च आदर्शों से युक्त स्वरूप सामने आया है। यह दृश्य समाज में आत्मविश्वास जगाने वाला बन रहा है। हम सब मिलकर देश के भविष्य को उज्जवल एवं सुदृढ़ बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सकारात्मक वातावरण निर्मित कर सकते हैं। इसलिए ये हमारी राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने वाले आयोजन सिद्ध हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष केवल इतिहास की उपलब्धियां नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा का संकल्प हैं।

आज, जब हम राष्ट्रीयस्वयं संघ की 100 वर्षों की इस यात्रा को देखते हैं, तो यह भी स्पष्ट होता है कि समाज में जिस परिवर्तन के लिए संघ के स्वयंसेवक सक्रिय रहे हैं वह अब दिखाई देने लगा है। हिंदुत्व और इसकी परम्पराओं पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। समाज के अनेक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर रहे हैं और इसका अनुभव भी कर रहे हैं। हिंदुत्व की इस जागृति के कारण लोग अब हिंदू होने में गर्व का अनुभव कर रहे हैं। एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में हिंदू समाज की कमियों को ही उजागर किया जाता था, जिससे अनेक लोग हिंदुत्व की अच्छाईयों को पहचान नहीं पाए, किंतु अब स्थिति बदल रही है। लोग अपने पूर्वजों के धर्म और परम्पराओं को महत्व देने लगे हैं। वे अपने बच्चों के नामकरण से लेकर विवाह पद्धति तक में हिंदू संस्कारों का समावेश कर रहे हैं। घर की परम्पराओं को आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है।

उक्त वर्णित सम्पूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य है – एक सच्चरित्र, प्रामाणिक और संस्कारवान पीढ़ी का निर्माण करना। ऐसी पीढ़ी समाज का वातावरण सुधार कर घर और समाज में सुख शांति स्थापित कर सकती है। इसलिए, इन मूल्यों और संस्कारों को महत्व देने और उन्हें अपने जीवन में उतारने के प्रयास आज घर घर में होने लगा हैं। लोग अब ऐसे सभी मंचों और माध्यमों से जुड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं जो इस दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। संघ को भी लोग इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण माध्यम मानने लगे हैं और विश्वासपूर्वक संघ से जुड़ने का उत्साह दिखा रहे हैं। जैसे जैसे हिंदुत्व पर विश्वास बढ़ रहा है, वैसे वैसे भारत के प्रति श्रद्धा और विश्वास, व्यापक और गहरा हो रहा है। संघ का मानना है कि “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श पर चलकर भारत न केवल अपने समाज को सशक्त करेगा, बल्कि पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और सहयोग का संदेश देकर विश्वगुरु की भूमिका निभाएगा। यह सब भारतीय समाज में परिवर्तन लाकर ही फलिभूत हो सकता है। संघ द्वारा अपनी स्थापना के समय लिए गए संकल्पों को शीघ्र ही पूर्ण करने के उद्देश्य से अपने इस शताब्दी वर्ष में कुछ विशेष कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय समाज को (1) अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजग करने, (2) पर्यावरण के प्रति सचेत करने, (3) नागरिकों में स्व के भाव को जगाने एवं स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने, (4) कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से पारिवारिक भावना जागृत करने एवं (5) समाज में समरसता के भाव को सुदृद्ध करने के लिए गम्भीर प्रयास किए जा रहे हैं। इस कार्यक्रम को “पंच परिवर्तन” का नाम दिया गया है और इसका आह्वान परम पूजनीय सर संघचालक श्री मोहन जी भागवत द्वारा किया गया है ताकि अनुशासन एवं देशभक्ति से ओतप्रोत युवा वर्ग अनुशासित होकर अपने देश को आगे बढ़ाने की दिशा में कार्य करे। इस पंच परिवर्तन कार्यक्रम को सुचारू रूप से लागू कर समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।

व्यवहार में पंच परिवर्तन को समाज में किस प्रकार लागू करना है इस हेतु हम समस्त भारतीय नागरिकों को मिलकर प्रयास करने होंगे, क्योंकि पंच परिवर्तन केवल चिंतन, मनन अथवा बहस का विषय नहीं है बल्कि इस हमें अपने व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। उक्त पांचों आचरणात्मक बातों का समाज में होना सभी चाहते हैं, अतः छोटी-छोटी बातों से प्रारंभ कर उनके अभ्यास के द्वारा इस आचरण को अपने स्वभाव में लाने का सतत प्रयास अवश्य करना होगा। जैसे, समाज के आचरण में, उच्चारण में संपूर्ण समाज और देश के प्रति अपनत्व की भावना प्रकट हो, प्रत्येक घर में सप्ताह में कम से कम एक बार पूजा या धार्मिक आयोजन हो एवं अपने परिवार के बच्चों के साथ बैठकर महापुरुषों के सम्बंध में सप्ताह में कम से कम एक घंटे चर्चा हो, परिवार के सभी सदस्यों में नित्य मंगल संवाद, संस्कारित व्यवहार व संवेदनशीलता बनी रहे, बढ़ती रहे व उनके द्वारा समाज की सेवा होती रहे, आदि बातों का ध्यान रखकर कुटुंब प्रबोधन जैसे विषय को आगे बढ़ाया जा सकता है।

मंदिर, पानी, श्मशान के सम्बंध में कहीं भेदभाव बाकी है, तो वह शीघ्र ही समाप्त होना चाहिए। हम लोग अपने परिवार सहित त्यौहारों के समय अनुसूचित जाति के बंधुओं के घर जाएं और उनके साथ चाय पान करें। साथ ही, हम अनुसूचित जाति के बंधुओं को सपरिवार अपने परिवार में बुलाकर सम्मान प्रदान करें। कुल मिलाकर समस्त समाज एक दूसरे के त्यौहारों में शामिल हों ताकि आपस में भाई चारा बढ़े एवं देश में सामाजिक समरसता स्थापित हो सके।

सृष्टि के साथ संबंधों का आचरण अपने घर से पानी बचाकर, प्लास्टिक हटाकर व घर आंगन में तथा आसपास हरियाली बढ़ाकर हो सकता है। अपने घरों में जल का कोई अपव्यय नहीं हो रहा है एवं अपने परिवार में हरियाली की चिंता की जा रही है। अपने घर में, रिश्तेदारी में, मित्रों के यहां सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करने का आग्रह किया जा रहा है आदि बातों पर ध्यान देकर देश में पर्यावरण को सुधारा जा सकता है।

स्वदेशी के आचरण से स्व-निर्भरता व स्वावलंबन बढ़ता है। फिजूलखर्ची बंद होनी चाहिए, देश का रोजगार बढ़े व देश का पैसा देश में ही काम आए, इस बात का ध्यान देश के समस्त नागरिकों को रखना चाहिए। इसीलिए कहा जा रहा है कि स्वदेशी का आचरण भी घर से ही प्रारंभ होना चाहिए। समस्त नागरिकों के घर में स्वदेशी उत्पाद ही उपयोग होने चाहिए।

देश में कानून व्यवस्था व नागरिकता के नियमों का भरपूर पालन होना चाहिए तथा समाज में परस्पर सद्भाव और सहयोग की प्रवृत्ति सर्वत्र व्याप्त होनी चाहिए। इन्हें हमारे नागरिक कर्तव्यों के रूप में देखा जाना चाहिए। समाज में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन हेतु हम सबको मिलकर प्रयास करने होंगे। विशेष रूप से युवाओं में नशाबंदी समाप्त करने के लिए, मृत्यु भोज रोकने के लिए तथा विभिन्न समाजों में व्याप्त दहेज की कुप्रथा समाप्त करने के गम्भीर प्रयास हम समस्त नागरिकों को मिलकर ही करने होंगे।

समाज की एकता, सजगता व सभी दिशा में निस्वार्थ उद्यम, जनहितकारी शासन व जनोन्मुख प्रशासन स्व के अधिष्ठान पर खड़े होकर परस्पर सहयोगपूर्वक प्रयासरत रहते है, तभी राष्ट्रबल वैभव सम्पन्न बनता है। बल और वैभव से सम्पन्न राष्ट्र के पास जब हमारी सनातन संस्कृति जैसी सबको अपना कुटुंब माननेवाली, तमस से प्रकाश की ओर ले जानेवाली, असत् से सत् की ओर बढ़ानेवाली तथा मृत्यु जीवन से सार्थकता के अमृत जीवन की ओर ले जानेवाली संस्कृति होती है, तब वह राष्ट्र, विश्व का खोया हुआ संतुलन वापस लाते हुए विश्व को सुखशांतिमय नवजीवन का वरदान प्रदान करता है।

संघ की दृष्टि बहुत स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भारत की पहचान जिससे है, उस आध्यात्म आधारित एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि को दुनिया हिंदुत्व अथवा हिंदू जीवन दृष्टि के नाते जानती है, उस हिंदुत्व को जगाकर सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में जोड़कर निर्दोष और गुणवान हिंदू समाज के संगठन का यह कार्य जो वर्ष 1925 में प्रारम्भ हुआ वह आज भी निरन्तर जारी है और आगे भी जारी रहेगा।

हिन्दू राष्ट्र पर श्री गोलवलकर गुरू जी के विचार

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प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर गुरू जी के हिन्दू राष्ट्र से संबंधित विचार उनके भाषणों में स्पष्ट है, जो ‘‘विचार नवनीत’’ नामक संकलन में दिये गये है। ‘‘विचार नवनीत’’ के अध्याय-9 एवं 10 में इस विषय पर अधिक स्पष्टता से प्रकाश डाला गया है। उनका कहना है कि ‘‘अनादिकाल से एक महान एवं सुसंस्कृत समाज यहां भारत भूमि की संतति के रूप में निवास कर रहा है। उसे ही हिन्दू कहते है। कुछ लोग हिन्दू के स्थान पर आर्य अथवा भारतीय नाम का सुझाव देते है। निस्सन्देह ‘‘आर्य’’ एक स्वाभिमान पूर्ण प्राचीन नाम है। परन्तु इसका प्रयोग विगत एक हजार वर्षों में अधिक प्रचलन में नहीं रहा। 19वीं शताब्दी में अंग्रेजों तथा अन्य यूरोपीय द्वारा ऐतिहासिक शोध की झूठी आड में आर्य द्रविड के नस्लवादी विभाजन खड़े कर दिये गये। अतः अब इन दिनों ‘‘आर्य’’ नाम का प्रयोग उद्देश्य की सिद्धि में बाधक होगा। क्योंकि हमें हिमालय से कन्याकुमारी तक फैले हुए सम्पूर्ण समाज का साक्षात् करना है। ‘‘भारतीय’’ भी प्राचीन नाम है। वेदों और पुराणों में ‘‘भारत’’ नाम का प्रयोग हुआ है। यहां के निवासियों को पुराणों में ‘‘भारती’’ कहा गया है। किन्तु आज इस नाम को लेकर समस्या यह आ गई है कि भारत के मुसलमान, ईसाई, पारसी आदि सभी भारतीय शब्द से ही संबोधित होते है। अतः यह शब्द वर्तमान में हिन्दुओं के लिए अपर्याप्त है। वर्तमान में हम प्राचीन काल से चले आ रहे भारत भूमि की संततियों के समाज को हिन्दू कहे, तो ही स्पष्टता होगी। पृथ्वीराज चौहान के दिनों से इस नाम का प्रयोग प्रचुरता से मिलता है। यद्यपि वृहस्पति आगम में तो बहुत पहले कहा गया है :-
हिमालयं समारभ्य यावदिन्दु सरोवरम्।
तं देव निर्मितं देश हिदुस्थानं प्रचक्ष्यते।।
गुरू गोविन्द सिंह, स्वामी विद्यारण्य और छत्रपति शिवाजी महाराज आदि महान पराक्रमी महापुरूषों का लक्ष्य ‘हिन्दू स्वराज’ की स्थापना करना ही था। हमारे वेदों का एक प्रिय उद्घोष है – पृथिव्यायै समुद्रपर्यंताया एकराष्ट्र’। अर्थात समुद्र पर्यंत फैली हुई पृथ्वी हमारा एक राष्ट्र है। इसे हम विष्णुपुराण और ब्रह्म पुराण के उद्धरणों से समझ सकते है –
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेष्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।।
उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में अपनी शाखाओं प्रशाखाओं के साथ फैला हुआ हिमालय और इन महती शाखाओं के अंतर्गत प्रदेशों के साथ यह हमारा भारत वर्ष है। कोई भी शक्तिशाली और बुद्धिमान राष्ट्र पर्वतों की चोटियों को अपनी सीमा नहीं बनाता। क्योंकि ऐसा करना आत्मघाती होता है। अतः पर्वत चोटियों से उत्तर, पूर्व और पश्चिम तक फैला हुआ यह हमारा भारत राष्ट्र है। महामति चाणक्य ने कहा है :-
‘‘हिमवत्समुद्रान्तरमुदीचीनं योजनसह्स्त्रपरिमाणाम्।’’
समुद्र से उत्तर एक सहस्र योजन तक विस्तृत भारत है। महाकवि कालीदास ने भी हिमालय को पूर्व और पश्चिम में फैली हुई भुजाओं वाला तथा पृथ्वी के मानदंड की तरह कहा है जो भुजाएं समुद्र को पूर्व और पश्चिम में छूती है। अतः यह विराट क्षेत्र भारत राष्ट्र है। महाराज रघु की विजय यात्रा में इस क्षेत्र का वर्णन हुआ है। हिमालय के पश्चिम में आर्यान (इरान) और पूर्व में श्रृंगपुर (सिंगापुर) की ओर फैली दोनों भुजाओं द्वारा पर्वत राज समुद्र का अवगाहन करते है। हिन्दू महासागर में कमल की पंखुडी के समान विद्यमान लंका मानों भारत माता के चरणों में चढ़ाई गई पंखुडी है। अपनी मातृभूमि का यह चित्र। सहस्त्रों वर्षों से हिन्दू जनमानस में देदीप्यमान है।

हमारे लिए यह सम्पूर्ण भूमि तपो भूमि है। इस पवित्र तपो भूमि के प्रत्येक कण के स्वातंत्र्य और सम्मान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने की भावना ही इस महान राष्ट्र की भक्ति है। ऐसा राष्ट्र भक्त कभी अपनी मातृभूमि की किसी प्रकार की अवज्ञा सहन नहीं कर सकता। यह विजिगीषु वृत्ति ही हमारी राष्ट्र भक्ति का प्रमाण है।

यह हमारा राष्ट्र हिमालय की समस्त शाखाओं प्रशाखाओं के साथ समुद्र तक फैली भूमि के सभी प्रदेशों और हिन्दु महासागर स्थित समस्त द्वीप समूहों के साथ एक नैसर्गिक राष्ट्र है। इस तथ्य का साक्षी हमारा हजारों वर्षों का इतिहास है। हिन्दू ही इस भूमि की संतति के रूप में रहते आये है।
इसके स्थान पर अंग्रेजों और बाद में कांग्रेस ने प्रादेशिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया। परन्तु इसका परिणाम विघातक और पतनकारी ही सिद्ध हुआ। हमारे राष्ट्रीय नेताओं को युद्धप्रिय, उपद्रवी मुसलमानों से यह कहने का साहस होना चाहिए था कि आप सब के पूर्वज भी हिन्दू ही थे और इसलिए एक स्वाभिमानी समुदाय के समान आपको पुनः हिन्दू समाज में लौट आना चाहिए। उसके लिए आक्रामक वृत्ति का त्याग कर देना चाहिए और राष्ट्र जीवन की राष्ट्रीय धारा में स्वयं को विलीन कर देना चाहिए। परन्तु यह कहने के लिए सत्य की परम महत्ता में अविचल निष्ठा आवश्यक है और परिस्थिति के कठोर सत्य का सामना करने का अदम्य साहस अपेक्षित है। परन्तु हमारे उस समय के अनेक अग्रणी व्यक्तियों में सत्य के प्रति दृढ़ आग्रह का अभाव था और निर्भयता का भी अभाव था। मुसलमानों के दुराग्रह का सामना करने की उनमें न तो इच्छा थी और न ही निष्ठा। वे मुसलमानों से कभी यह कहने का साहस नहीं कर सके कि अपनी विघटनकारी वृत्ति को अब आप लोगों को त्यागना होगा। उसके स्थान पर वे हिन्दुओं से कहने लगे कि मुसलमानों के द्वारा किये गये ध्वंस और अत्याचारों को भूल जाओं। यदि वे तुम्हारी पूजा और शोभा यात्रा से कुपित होते है, तो पूजा मत करो और शोभा यात्रा मत निकालो। यदि वे तुम्हारी पत्नी और बेटियों को ले जाते है, तो ले जाने दें। उन्हें बाधा मत दो। जब हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने गाय काटी, तब हिन्दुओं से कहा गया कि वह मुसलमानों का धार्मिक अधिकार है। एक प्रसिद्ध हिन्दू राजनेता ने तो यह तक कह दिया कि स्वराज पाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता आवश्यक है और इसका सरलतम मार्ग यह है कि सभी हिन्दू अब मुसलमान बन जाये। उन्होंने इतना तक नहीं समझने का प्रयास किया कि ऐसा होने पर वह हिन्दू-मुस्लिम एकता किस प्रकार कही जायेगी? वह तो केवल मुस्लिम एकता कहलायेगी।
इन विचित्र बातों के द्वारा हिन्दुओं को बार-बार यह समझाया गया कि तुम अशक्त हो और निर्जीव हो। तुममें मुस्लिम रक्त प्रविष्ट होगा तभी तुम मातृभूमि के लिए लड़ सकोगें।

(इसी बात को भांति-भांति से कहा गया। यह कहा गया कि हमें मुस्लिम शरीर में हिन्दू मन चाहिए। अर्थात सभी हिन्दू मुसलमानों से एकाकार हो जाये कोष्ठक में ये तीन वाक्य लेखक की ओर से अर्थात मेरी ओर से है।)

वस्तुतः ऐसी विचित्र घोषणा करने वाले लोगों ने हिन्दू समाज के प्रति सबसे बड़े द्रोह का अपराध किया है। उन्होंने एक महान प्राचीन समाज को हतोत्साह करने का जघन्य पाप किया है। समाज को नंपुसक्ता का उपदेश देना और महावीर्य सम्पन्न हिन्दू समाज के आत्म विश्वास एवं चैतन्य को भंग करना संसार का सबसे बड़ा विश्वासघात है जो इस प्रकार के विचित्र हिन्दुओं ने किया है। ऐसे लोगों ने मानों हिन्दू समाज के समस्त पौरूष का क्षय करने की प्रतिज्ञा की है। इन्हें केवल धिक्कारा जा सकता है। ऐसे ही विश्वासघातियों के कारण भारत का विभाजन हुआ, और लाखों परिवार अपने पैतृक गृहों से उन्मूलित हो गये। अनेक प्रांत रक्त की नदियों के बहने से लाल हो गये और चारों ओर मृत्यु, विनाश तथा अपकीर्ति का ही प्रसार हुआ।

उन्माद से भरपूर मजहबी लोग राष्ट्र की सुरक्षा के लिए संकट है। ऐसे लोग भारत पर मानो सतत आक्रमण कर रहे समुदाय है। वे भारत वर्ष को पूरी तरह मुसलमान राज्य बना डालना चाहते है। यह बात विख्यात इतिहासज्ञ अर्नाल्ड टायनबी ने दो बार भारत देश की यात्रा कर और राष्ट्रीय गतिविधियों का निकट से अध्ययन कर लिखें गये अपने निबंध में कही है।

ऐसे उन्मादी लोगों ने देश में जगह-जगह अगणित छोटे-छोटे पाकिस्तान बना डाले है। अपने इलाके को ये अपना स्वतंत्र प्रदेश ही मान बैठते है। इसी प्रकार का आंतरिक संकट ईसाई मिशनरी भी भारत के लिए बनते है। वे अंतर्राष्ट्रीय ईसाई आंदोलन के एजेंट बन जाते है। कम्युनिज्म तो राष्ट्र के लिए विघातक सभी कार्यों में आग में घी का काम करता ही है। ऐसी स्थिति में राष्ट्र की प्रतिभा को पुनरूज्जीवित करना ही एक मात्र वरण योग्य मार्ग है।

आप खड़े-खड़े थक गए होंगे. प्लीज बैठ कर विरोध कीजिए

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~दिलीप सी मंडल

दिल्ली । तुर्की की जनता ने खलीफा को हटाया, आप खिलाफत के लिए खड़े हो गए. इराकी शासन ने सद्दाम हुसैन को फांसी दी. आप खड़े हो गए. गाजा में हमास और इजराइल में पंगा हुआ, आप खड़े हो गए. अब ईरान पर खड़े हो गए. सीरिया में शिया-सुन्नी लड़े. आप खड़े हो गए. सूडान के मसले पर खड़े हो गए. म्यामार में अलग देश मांगने वाल रोहंगिया के पक्ष में खड़े हो गए.

प्रिय भारत के वामपंथियों, आप थक गए होंगे. प्लीज बैठ कर गुस्सा कीजिए.

वैसे अब शिया ईरान के मिसाइल अरब सुन्नी देशों पर गिर रहे हैं, आप खड़े हैं, ये तो दिख रहा है. पर शिया के पक्ष में खड़े हैं या सुन्नी के? या दोनों के पक्ष में खड़े हैं. या दोनों के विरोध में खड़े हैं.

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