खुला पत्र : प‍ीयूष बंसल के नाम-

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पीयूष; तुम्‍हारी इस सफाई का क्‍या औचित्‍य! भारत में जब भारतीय संस्‍कृति ही नहीं रहेगी तब फिर कैसा भारत ?

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल । भारत कोई साधारण राष्ट्र नहीं है, यह एक ऐसी सनातन सभ्यता है, जिसने समय के हर प्रहार को सहते हुए भी अपनी आत्मचेतना को जागृत और अक्षुण्ण बनाए रखा है। यह वही भूमि है जहाँ मनुष्य चेतन्‍य आत्मा माना गया; जहाँ जीवन का उद्देश्य लोकमंगल है। यहाँ की संस्कृति ने “एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” के माध्यम से विविधता में एकता का अद्भुत दर्शन किया है। किंतु आज जब आधुनिकता के नाम पर वैश्विक कॉरपोरेट कल्‍चर भारत में अपनी जड़ें जमाता हुआ दिखता है, तब बहुत दुख होता है।

आश्‍चर्य तो यह है कि दुनिया में इस्‍लामवादी जहां पर भी हैं, वहां विकसित एवं विकासशील दोनों ही देशों में हिजाब, बुर्का, दाड़ी से लेकर अपने मजहबी नियमों को आग्रह और दबाव दोनों तरीके से स्‍वीकार करने के लिए उद्यत रहते हैं और इसी का परिणाम है जो लेंसकार्ट जैसी पीयूष गोयल की भारतीय कंपनी अपने ड्रेस कोड में इस्‍लाम के सामने तो झुकती है, पर जहां इस मिट्टी की मूल संस्‍कृति को स्‍वीकारने के स्‍थान पर तमाम नियम उसके विरोध में लागू कर देती है!

ऐसे में स्‍वभाविक है, एक गंभीर प्रश्न उठ खड़ा होता है, क्या हम आधुनिकता के नाम पर विकास की दौड़ में अपनी पहचान खो दें? या फिर हमें अपनी सभ्‍यता और संस्‍कृति के मान बिन्‍दुओं पर भरोसा ही नहीं अथवा हम इनके बारे में कुछ जानते नहीं और न ही भविष्‍य में अपनी पीढ़‍ियों को इसके बारे में ज्ञान देना चाहते हैं!

वस्‍तुत: हाल ही में इससे जुड़ा विवाद इसी प्रश्न को केंद्र में ला खड़ा करता है। एक कथित ‘ग्रूमिंग पॉलिसी’ के वायरल दस्तावेज में यह दावा किया गया कि बिंदी, तिलक और कलावा जैसे हिंदू आस्था के प्रतीकों पर रोक है जबकि हिजाब और पगड़ी को शर्तों के साथ अनुमति दी गई है। देखा जाए तो यह मामला उस मानसिकता का दर्पण बन गया है, जिसमें अपनी ही जड़ों को लेकर असहजता और बाहरी प्रतीकों के प्रति अति-संवेदनशीलता दिखाई देती है।

अब जब इस विषय पर प्रश्न उठे, तो कंपनी के सह-संस्थापक पीयूष बंसल ने इसे पुराना और भ्रामक दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि कंपनी सभी धर्मों का सम्मान करती है। यह स्पष्टीकरण आवश्यक था, लेकिन क्या यह पर्याप्त है? तुम्‍हारी बात कौन मानेंगा कि सच बोल रहे हो? और क्‍यों मानें? हो सकता है, “नासिक कार्पोरेट जिहाद” के सामने आने के बाद और तुम्‍हारी कंपनी से जुड़ा ये सच, इसके बाहर आने पर जो तुम ट्रोल हुए हो, उसकी प्रतिक्रिया स्‍वरूप ये तुम्‍हारा वक्‍तव्‍य हो। क्योंकि प्रश्न कंपनी के दस्तावेज की सत्यता का अब नहीं रह गया, यह तो उस विचारधारा का है जोकि इस प्रकार की नीतियों को जन्म देती है।

यह सच है कि कॉरपोरेट जगत अक्सर ‘प्रोफेशनल लुक’ और ‘ब्रांड इमेज’ का हवाला देकर ड्रेस कोड निर्धारित करता है, किंतु क्या प्रोफेशनलिज्‍म का अर्थ अपनी सांस्कृतिक पहचान को त्याग देना है? क्या एक महिला के माथे की बिंदी उसकी कार्यक्षमता को प्रभावित करती है? क्या एक व्यक्ति की कलाई पर बंधा कलावा उसकी पेशेवर योग्यता को कम कर देता है? यदि उत्तर “नहीं” है और निश्चित रूप से नहीं है तब फिर इन प्रतीकों पर आपत्ति क्यों?

दरअसल, पीयूष; ये समस्या नियमों की नहीं, दृष्टिकोण की है। जब अपनी ही संस्कृति के प्रतीकों को ‘अनप्रोफेशनल’ माना जाने लगे और अन्य प्रतीकों को ‘संवेदनशीलता’ के नाम पर स्वीकार किया जाए, तब यह संतुलन के स्‍थान पर सीधे तौर पर असंतुलन का स्पष्ट संकेत है। काश; पीयूष तुम एक हिन्‍दू घर में जन्‍म लेने के बाद इस बात को अंदर से महसूस करते! शार्क टैंक इंडिया में तो बहुत ज्ञान देते थे, कुछ ज्ञान सनातन प्रतीकों के अर्थ को गहराई से जानने के लिए भी प्राप्‍त कर लेते! यकीन मानों, तुम्‍हें पता चल जाता कि हमारी परंपराओं में चेतना से जुड़ा हुआ अपार ज्ञान निहित है।

हिंदू सनातन संस्कृति में प्रतीकों का अत्यंत गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। वस्‍तुत: बिंदी केवल सौंदर्य का चिह्न होने के साथ ही चेतना और एकाग्रता का प्रतीक है। माथे का तिलक धर्म, विजय और आत्मसम्मान का संकेत है। कलावा व्यक्ति को उसके संस्कारों और दायित्वों से जोड़ने वाला पवित्र सूत्र है। यह संकल्‍प भी है, इसके भाव बहुत गहरे हैं, राजा बली को संकल्‍प सूत्र से ही तो बांधा गया था। फिर इसके लिए स्‍वयं भगवान विष्‍णु, वामन देव के रूप में अवतरित हुए हों या फिर मां लक्ष्‍मी द्वारा राजा बलि‍ को रक्षासूत्र बांधा गया हो। देवी लक्ष्मी ने राजा बलि को अपना भाई बनाकर उनके हाथ में रक्षासूत्र जब बांधा था, तब उन्होंने इसी भाव से उनकी सुरक्षा और वचन की कामना की थी।

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥

आज भी ब्राह्मण अपने यजमानों को और बहनें अपने भाइयों को राखी बांधते समय इसी मंत्र का उच्चारण करती हैं ताकि वे सुरक्षित और धर्म के मार्ग पर रहें। इन प्रतीकों को नकारना, दरअसल उस सांस्कृतिक विरासत को नकारना है जिसने इस देश को हजारों वर्षों तक जोड़े रखा। जिनके कारण से ही भारत, आज भी भारत है। अन्‍यथा उन 57 देशों की तरह जोकि पूरी तरह से मुस्‍लिम हैं और वे 158 देश जोकि ईसाई बहुसंख्‍यक हैं, उनमें और भारत में क्‍या फर्क रह जाएगा?

यह सच है कि आज भारत का कॉरपोरेट सेक्टर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ना चाहता है, यह स्वाभाविक और आवश्यक भी है, किंतु क्‍या अपनी प्रगति अपनी जड़ों से कटकर हो, वह क्‍या समग्र प्रगति होगी? लेंसकार्ट के पदाधिकारियों मत भूलो! भारत कोई पश्चिमी समाज नहीं है, जहाँ सांस्कृतिक पहचान को निजी दायरे तक सीमित कर दिया गया हो। इसके उलट भारत में तो आस्था जीवन का अभिन्न अंग है; वह हमारे पहनावे, व्यवहार और सोच में स्वाभाविक रूप से झलकती है। ऐसे में यदि कंपनियाँ इस वास्तविकता को नजरअंदाज करती हैं, तब कहना यही होगा कि वे न सिर्फ कर्मचारियों की भावनाओं को आहत करती हैं, बल्कि अपने ही समाज से दूरी भी बना लेती हैं।

इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण पहलू उभरकर सामने आया, वह है जनभावना की तीव्र प्रतिक्रिया। जैसे ही यह मुद्दा उठा, लोगों ने खुलकर अपनी नाराजगी लेंसकार्ट से व्यक्त की। यह सिर्फ ‘ट्रोलिंग’ नहीं थी, एक गहरी असहजता का संकेत था; एक ऐसा एहसास कि कहीं न कहीं अपनी ही संस्कृति को हाशिए पर डाला जा रहा है जोकि अनुचित है।

अत: इस प्रकरण के बाद यह एक स्पष्ट संदेश भारत के बहुसंख्‍यक हिन्‍दू समाज ने कंपनियों को दे दिया है, भारत में व्यापार करना है तो उत्पाद बेचने के साथ ही समाज के बीच संवेदनशील संवाद और परंपराओं का सम्‍मान बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। जिसमें भारत की सभ्‍यता और संस्‍कृति अंतर्निहित है। वस्‍तुत: भारत की पहचान उसकी संस्कृति से ही है। यदि वही धीरे-धीरे कमजोर होने लगे, तब फिर भारत राष्ट्र रहा ही कहां? वह तो एक आर्थिक इकाई बनकर रह जाएगा!

अब इससे बात नहीं बननेवाली कि “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़माँ हमारा। क्‍योंकि जिसने ये लिखा, वह अल्लामा इकबाल तो ‘पाकिस्तान का वैचारिक जनक’ (Spiritual Father of Pakistan) है। क्योंकि उसने ही 1930 के इलाहाबाद अधिवेशन में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए एक अलग राजनीतिक ढांचे का विचार रखा था। वह हिन्‍दुओं को भ्रम में रखा रहा, हिन्‍दू इसी में फूले नहीं समा रहे और विभाजन का दंश करोड़ों लोगों के झेलने के बाद आज भी उनकी आंखें नहीं खुल रही हैं, मजे से अब भी गाए जा रहे हैं; “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी…!

हां, भले ही यह सत्य है कि भारत की संस्कृति कमजोर नहीं, वह सहनशील है, लचीली है और आत्मसुधार की क्षमता रखती है, किंतु इसका दूसरा पक्ष भी है, वह भी उतना ही सच है, जहां भारत की संस्‍कृति कमजोर पड़ी, वहीं विदेशी सभ्‍यता और संस्‍कृति हावी हो गई। विभाजन सिर्फ पाकिस्‍तान का नहीं हुआ था, गहराई से देखें ओर पीछे जाएं तो स्‍पष्‍ट हो जाएगा कि आज जो भारत उपमहाद्वीप है, वह महाद्वीप था, पिछले 2500 वर्षों में भारत के लगभग 24 विभाजन हुए हैं।

भारत की मूल हिन्‍दू संस्‍कृति का ह्रास हुआ और भारत टुकड़ों-टुकड़ों में बंटता चला गया, अरे! पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका, तिब्बत और मालदीव, मलेशिया, इंडोनेशिया, और थाईलैंड तो हमारे सामने-सामने के विभाजन हैं। इसलिए पीयूष बंसल एवं लेंसकार्ट वालों वर्तमान में जो भी जैसा भी भारत है, उसकी मूल संस्‍कृति का संरक्षण आवश्‍यक है, उसकी परंपराओं का निर्वाहन आवश्‍यक है। समझें; भारत की शक्ति उसकी संस्कृति में है और यह संस्कृति मंदिरों, ग्रंथों में होने के साथ ही हमारे दैनिक जीवन में जीवित रहती है।

सम्राट को सुशासन का हस्तांतरण 

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मृत्युंजय दीक्षित
दिल्ली । लम्बे संघर्ष और राजनैतिक उतार -चढ़ाव के बाद भारतीय जनता पार्टी को बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने का अवसर मिल गया है। यह अवसर राजग गठबंधन के माध्यम से आया है । अभी तक बिहार में भाजपा जद (यू) के साथ छोटे भाई की भूमिका मे थी अब बड़े भाई की भूमिका में आ गई है। जब बिहार से विधायक नितिन नवीन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए तभी से बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की रणनीति पर काम चल रहा था। बिहार के निवर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपना मन बनाया और राज्यसभा जाने के लिए तैयार हो गए। नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने से लेकर सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण तक सारी प्रक्रिया बहुत ही सधी हुई रही जिससे न तो विरोधी दलों को कोई अवसर मिला और न ही पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समर्थक नाराज होकर कोई गठबंधन विरोधी कार्य कर सके। बिहार में नीतीश कुमार के युग का नयी पीढ़ी के सम्राट को हस्तांतरण हो गया है। यह निश्चित है कि बिहार में केवल मुख्यमंत्री का केवल चेहरा बदला है सरकार नीतीश कुमार जी के निर्देशन व उनके किए गए कार्यों के आधार पर ही चलने वाली है।
सम्राट चौधरी के साथ जदयू के दो नेताओं विजय चौधरी और विजेंद्र यादव ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। मंत्रिमंडल विस्तार बाद में किया जाएगा। अभी तक भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में गठबंधन की राजनीति में ऐसा सत्ता परिवर्तन किसी भी राज्य में कहीं भी नहीं देखा गया है। यह नेतृत्व परिवर्तन भारतीय राजनीति में एक नया इतिहास लिख रहा है। मुख्यमंत्री के पद पर सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण के बाद भाजपा नेताओं ने दावा किया कि जैसे पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने बिहार की जनता की 18 वर्षों से भी अधिक समय तक सेवा की वैसे ही अब सम्राट चौधरी भी 20 वर्षों तक बिहार की सेवा करने वाले हैं।
कौन हैं सम्राट चौधरी – सम्राट चौधरी बिहार के 24वें मुख्यमंत्री बने हैं और राजनीतिक दृष्टिकोण से युवा हैं। सम्राट चौधरी ओबीसी के कोइरी समुदाय से आते हैं। सम्राट चौधरी को बिहार के सवर्ण समाज मे भी पसंद किया जाता है। सवर्णों के मुद्दों पर भी वह मुखर रहे हैं। सम्राट की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत 1990 में हुई और वे लालू यादव की राजद से वर्ष 2000 में परबत्ता विधानसभा सीट से विधायक और लालू यादव की सरकार में मंत्री बने। 2014 में वो नीतीश कुमार जी के साथ आ गए किन्तु जदयू के साथ उनकी मित्रता अधिक दिनों तक नहीं चली और वह 2017 में बीजेपी में शामिल हुए। वर्ष 2023 में बिहार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाए गये। जनवरी 2024 में वह नीतीश सरकार में उपमुख्यमंत्री बने और कई महत्वपूर्ण विभागों वित्त, स्वास्थ्य, शहरी विकास, पंचायती राज को संभाला। मात्र आठ से नौ वर्षों मे ही उनकी भाजपा मे तेज तरक्की पार्टी की ओबीसी राजनीति और रणनीति का अहम हिस्सा है। भाजपा ने सम्राट चौधरी का चयन काफी सोच समझ कर किया है ताकि पिछड़ों – दलितों -महादलितों की सियासत में कोई नया खालीपन न पैदा हो।

सम्राट चौधरी को भले ही भाजपा में बाहर से आया नेता बताया जा रहा हो किंतु वह काफी दमदार हैं और उनकी शैली आक्रामक है। वह लालू यादव के समीकरण को ध्वस्त करने की क्षमता रखते हैं क्योकि उनकी राजनीति का सफर लालू यादव की राजद से ही प्रारंभ हुआ था और फिर वह नीतीश की पार्टी में भी गए और उसके बाद जीतनराम मांझी के साथ रहे। सम्राट के माध्यम से भाजपा ने पश्चिम बंगाल के ओबीसी समाज को एक बहुत बड़ा राजनैतिक संदेश भेजा है। बंगाल में ओबीसी समाज का मतदता बड़ी संख्या में है । वर्ष 2027 की शुरूआत मे ही उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में विधानसभा चुनाव होंगे उसको भी ध्यान में रखा गया है । राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि जातीय जनगण्ना की उथल पुथल के बीच बीजेपी को एक कद्दावर ओबीसी नेता की तलाश थी जो सम्राट चौधरी पूरी कर रहे हैं।

विचार करने वाली बात है कि क्या भारत में रूपयों के पेड़ लग गये है?

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सुखबीर सिंह डडवाल

रायपुर । देश मे कहीं भी चले जाइए,किसी भी सड़क पर, सभी जगह काम चल रहा है। पुरानी सड़क चौड़ी हो रही है, नई सड़क बन रही है, 2 Lane वाली 4 lane हो रही है।
नए Expressway बनाये जा रहे हैं।
शहरों में flyover बन रहे हैं ।

शायद ही कोई रेलवे स्टेशन ऐसा होगा जहां काम न लगा हो।
नई रेलवे लाइनें बिछ रही हैं।जो single Track थे उनको Double और Electrify किया जा रहा है। देश मे 4 तो नए DFC बोले तो Dedicated Freight Corridor बोले तो वो नई रेल लाइन बनाई जा रही हैं जिन पर सिर्फ मालगाड़ियां दौड़ेंगी।

देश की जितनी भी Unmanned Railway Crossing बोले तो मानव रहित रेलवे फाटक थे उनके नीचे से अंडरपास बनाये जा रहे हैं।

सन 2026 तक पूरे देश मे हर घर में नल से पानी ( कम से कम 55 लीटर पानी , प्रतिव्यक्ति , प्रतिदिन )देने की जोरदार तैयारियां चल रही है।
कई गीगावाट सोलर पॉवर की तैयारी है। भविष्य में फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी के लिए हाइड्रोजन को एक डॉलर प्रति किलो से नीचे बेचने की तैयारी चल रही है ।
सेना को आधुनिक बनाने के लिए हर हफ्ते नई मिसाइल का परीक्षण , एक से बढ़कर एक आधुनिक हथियारों की खरीदारी और आगे उनको देश में ही बनाने का जुनून भी सर पर हावी है ।100 से ज़्यादा शहरों में तो स्मार्ट सिटी का ही निर्माण कार्य चल रहा है।

नमामि गंगे में ही गंगा और उनकी सभी सहायक नदियों के किनारे बसे शहरों में बड़े बड़े गहरे सीवर पाइप लाइन बिछा के Sewage Treatment Plant बनाये जा रहे हैं। बनारस का Sewage Treatment Plant बनारस से 30 Km दूर 30 एकड़ जमीन पर बनाया जा रहा है।

पूरे बनारस शहर का Sewage वहां पाइप लाइन से जाएगा और ट्रीट हो के उस पानी को कृषि कार्यों में उपयोग होगा, ये सैकड़ों करोड़ का प्रोजेक्ट है और ऐसे ही Sewage Treatment Plants लगभग हर शहर कस्बे में बन रहे हैं।
भारत माला, सागर माला , चार धाम आल वेदर रोड , पूरे चीन बॉर्डर पर आल वेदर रोड्स , बिल्कुल नया दिल्ली – मुम्बई एक्सप्रेस वे जैसे वृहद प्रोजेक्ट्स पर कार्य चल रहा है।

Bullet Train प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। देश मे 100 से ज़्यादा Airports और हवाई पट्टी अपग्रेड की जा रही हैं।

देश मे 13 करोड़ शौचालय और 3 करोड़ मकान बन गए प्रधान मंत्री आवास योजना में, ये जो मैंने काम गिनाए ये देश मे समानांतर चल रहे कुल विकास / निर्माण कार्यों का 1% भी नही है।

गांव गिरांव में आ के देखिये, एक जेसीबी खाली नही है। सब किसी न किसी हाईवे निर्माण में लगी है।अब मुझे यह समझ में नही आ रहा कि ये जो देश भर में इतना निर्माण कार्य चल रहा है इसे बना कौन रहा है ? ये सब काम कर कौन रहा है ?

अलादीन का चिराग और उसका जिन्न हाथ आ गया है क्या ?

विपक्ष और प्रेस्टीट्यूट मीडिया कहता है कि सरकार रोज़गार देने में विफल रही…

आखिर ये सब निर्माण कार्य करने वाले कामगार जापान से आये हैं या सिंगापुर से ?

सड़क पर काम मे लगी जेसीबी कौन चला रहा है ? अडानी या अम्बानी ?

रोज़गार कहते किसे हैं ?
क्या सिर्फ सरकारी नौकरी को ?

(प्रस्तुति : कल्पेश पटेल)

क्या लैपटॉप को टेलीप्रॉम्प्टर (Teleprompter) की तरह किया जा सकता है इस्तेमाल

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भोपाल । हाँ, बिल्कुल! लैपटॉप को टेलीप्रॉम्प्टर (Teleprompter) की तरह आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। ये वीडियो बनाने वालों (YouTubers, content creators) के लिए बहुत आम और सस्ता तरीका है। आपको महँगा hardware खरीदने की जरूरत नहीं – सिर्फ सॉफ्टवेयर या ब्राउज़र से काम हो जाता है।
आपका स्क्रिप्ट स्क्रीन पर बड़े अक्षरों में स्क्रॉल होता रहेगा, और आप कैमरे की तरफ देखते हुए नेचुरली बोल सकेंगे। इससे आँखें कैमरे में ही रहेंगी, वीडियो प्रोफेशनल लगेगा और री-टेक्स की संख्या कम हो जाएगी।
1. सबसे आसान और फ्री तरीके (कोई इंस्टॉल नहीं)
• Teleprompter.com (ब्राउज़र में चलता है):
वेबसाइट खोलें → https://app.teleprompter.com
अपना स्क्रिप्ट पेस्ट करें → फॉन्ट साइज़, स्पीड, कलर एडजस्ट करें → Full Screen कर लें।
Voice recognition से ऑटो स्क्रॉल भी हो जाता है (आप बोलते जाओ, वो खुद आगे बढ़ता है)।
वीडियो रिकॉर्डिंग का ऑप्शन भी है।
• CuePrompter या NanoPrompter (100% फ्री ब्राउज़र टूल):
बस स्क्रिप्ट पेस्ट करके शुरू करें। कोई अकाउंट नहीं चाहिए।
ये दोनों लैपटॉप, विंडोज/मैक किसी पर भी काम करते हैं।
2. बेहतर कंट्रोल के लिए फ्री सॉफ्टवेयर (रेकमेंडेड)
QPrompt – ये बेस्ट फ्री ओपन-सोर्स ऐप है (2026 में भी पॉपुलर)।
• Windows, Mac, Linux सब पर चलता है।
• डाउनलोड: qprompt.app या GitHub से (बहुत हल्का और स्मूथ)।
• फीचर्स: स्पीड कंट्रोल, मिरर मोड, कीबोर्ड शॉर्टकट, रिमोट कंट्रोल सपोर्ट।
• एक बार इंस्टॉल करके हमेशा इस्तेमाल कर सकते हैं।
3. बिना किसी एक्स्ट्रा सॉफ्टवेयर के (पुराना लेकिन काम का तरीका)
• Microsoft Word या Google Docs में स्क्रिप्ट लिखें।
• बड़े फॉन्ट (48-72 size), छोटी-छोटी लाइनें।
• Full Screen मोड → माउस व्हील से स्क्रॉल करें (या Word में Auto Scroll फीचर ऐड करें)।
• PowerPoint में भी स्लाइडशो मोड में इस्तेमाल कर सकते हैं।
लैपटॉप को सेटअप कैसे करें (प्रैक्टिकल टिप्स)
1. पोजीशन: लैपटॉप को कैमरे के ठीक नीचे या बगल में रखें (किताबों के स्टैक या लैपटॉप स्टैंड पर)। जितना करीब कैमरा लेंस के पास होगा, उतना बेहतर आँखों का कॉन्टैक्ट बनेगा।
2. कैमरा:
• लैपटॉप की वेबकैम यूज कर रहे हैं तो स्क्रिप्ट स्क्रीन के ऊपरी हिस्से में रखें।
• बेहतर है → एक्सटर्नल कैमरा/फोन + ट्राइपॉड यूज करें, लैपटॉप को प्रॉम्प्टर के रूप में नीचे रखें।
3. रिकॉर्डिंग: OBS Studio, Riverside.fm या Zoom में रिकॉर्ड करें (ये सब टेलीप्रॉम्प्टर के साथ काम करते हैं)।
4. स्क्रिप्ट टिप: छोटी-छोटी लाइनें लिखें, बोलने जैसी भाषा रखें। स्पीड 100-140 WPM के आसपास रखें।
अतिरिक्त फायदे
• Riverside.fm या Vimeo जैसे टूल्स में बिल्ट-इन टेलीप्रॉम्प्टर है – स्क्रिप्ट + रिकॉर्डिंग एक जगह।
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