चहुंओर विकास, भीतर उलझी राजनीति: कर्नाटक 2026 की दहलीज़ पर

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बैंगलोर : 2026 की शुरुआत में कर्नाटक एक अजीब विरोधाभास से गुजर रहा है। एक ओर राज्य की राजनीति कांग्रेस के भीतर नेतृत्व संघर्ष, गुटबाज़ी और सत्ता-संतुलन की रस्साकशी में उलझी है, तो दूसरी ओर अर्थव्यवस्था पूरे वेग से आगे बढ़ रही है। सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच ठंडी लेकिन लगातार बनी रहने वाली तनातनी ने राजनीतिक माहौल को अस्थिर बना रखा है, फिर भी विकास की गाड़ी रुकी नहीं है।

कर्नाटक की औद्योगिक तस्वीर बदल चुकी है। नई इंडस्ट्रियल पॉलिसी 2025–30 के तहत राज्य ने ₹7.5 लाख करोड़ निवेश और 20 लाख रोजगार का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। खास बात यह है कि 70 प्रतिशत से अधिक निवेश अब “बियॉन्ड बेंगलुरु” क्षेत्रों में जा रहा है।

टुमकुरु में इंडस्ट्रियल स्मार्ट सिटी, विजयपुरा में फूड व सोलर पार्क, चित्रदुर्ग में ड्रोन पार्क और चिक्कबल्लापुर–धारवाड़ में इलेक्ट्रिक व्हीकल क्लस्टर, ये सब संकेत हैं कि कर्नाटक अब एक शहर की अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ रहा है। मैसूर और ननजंगुड़ जैसे शहर भी औद्योगिक नक्शे पर उभर रहे हैं।
राज्य की वित्तीय सेहत फिलहाल मजबूत दिखती है। अप्रैल–नवंबर 2025–26 के दौरान कर्नाटक का अपना टैक्स रेवेन्यू 20.97 प्रतिशत बढ़कर ₹1,34,109 करोड़ तक पहुंच गया, जो देश में सबसे अधिक वृद्धि दर है। कुल राजस्व प्राप्तियां 2026 में ₹2.92 ट्रिलियन तक अनुमानित हैं।

निर्यात भी तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2025 में कर्नाटक का निर्यात ₹2,31,888 करोड़ (27.15 अरब डॉलर) रहा। इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी, एयरोस्पेस और इंजीनियरिंग उत्पाद राज्य की ताकत बने हुए हैं। यही वजह है कि युवा उद्यमी और पारंपरिक उद्योग घराने नए यूनिट्स लगाने में रुचि दिखा रहे हैं।
इस आर्थिक रफ्तार के उलट, राजनीति एक व्यस्त चौराहे जैसी हो गई है, जहां हर गुट को लगता है कि रास्ता उसी का है। कांग्रेस कागजों पर मजबूत है; 224 सदस्यीय विधानसभा में उसके 136 विधायक हैं। 2023 की जीत ने जनादेश दिया था, लेकिन आंतरिक कलह ने सरकार की ऊर्जा को बांट दिया है।
सिद्धारमैया अनुभव और सामाजिक समीकरणों के दम पर सत्ता में हैं। समर्थक उन्हें AHINDA (अल्पसंख्यक–पिछड़ा–दलित) राजनीति का प्रतीक मानते हैं, तो आलोचक उनकी कुर्सी को “लीज पर ली हुई” बताते हैं। डी.के. शिवकुमार संगठन के मजबूत स्तंभ हैं, लेकिन ढाई-ढाई साल के सत्ता-साझे का सवाल अधर में लटका है। दिल्ली दरबार के चक्कर, नेतृत्व परिवर्तन की अफवाहें और संभावित कैबिनेट फेरबदल शासन को अनिश्चित बना रहे हैं, विपक्ष, खासतौर पर जेडी यू, ताक लगाए बैठे हैं, कब सरकार लड़खड़ाए और वो शिकार करें।

कर्नाटक की राजनीति में जाति आज भी निर्णायक डोर है। सरकार का ₹3.71 लाख करोड़ का बजट और ‘गारंटी योजनाएं’, जैसे गृह ज्योति, जिसके तहत दो करोड़ घरों को मुफ्त बिजली, AHINDA राजनीति का विस्तार हैं। विपक्ष इसे विभाजनकारी कहता है, लेकिन खुद भी जातिगत गणित से बाहर नहीं निकल पाता। नतीजा यह कि विकास से ज्यादा पहचान का शोर सुनाई देता है।

बैंगलोर में विधान सौधा से बाहर तस्वीर उतनी चमकदार नहीं। बेंगलुरु राज्य की आय का 38 प्रतिशत देता है और देश के 40 प्रतिशत यूनिकॉर्न यहीं हैं, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था पिछड़ रही है। खेती 55 प्रतिशत लोगों को रोजगार देती है, पर विकास दर सीमित है। 2025 में 1200 से अधिक किसान आत्महत्याएं इस असंतुलन की गवाही देती हैं।

गारंटी योजनाएं लोकप्रिय हैं, पर महंगी भी। राज्य का कर्ज 4.2 लाख करोड़ तक पहुंच गया है और राजस्व अधिशेष घाटे में बदलकर लगभग ₹25,000 करोड़ हो चुका है। जीएसटी चोरी और खर्च बढ़ाने की राजनीति वित्तीय दबाव बढ़ा रही है।
बेंगलुरु आज अवसरों के साथ-साथ थकान की कहानी भी है। ट्रैफिक जाम से सालाना ₹19,000 करोड़ का नुकसान, पानी की भारी किल्लत और अनियंत्रित शहरी फैलाव निवेशकों को सोचने पर मजबूर कर रहा है। पर्यटन भी झटका खा रहा है, बंदीपुर क्षेत्र में 2025 की घटनाओं के बाद बुकिंग्स में भारी गिरावट आई।

स्थानीय निकाय चुनाव नजदीक हैं। कर्नाटक को अब गुटबाज़ी कम और शासन अधिक चाहिए। जातिगत नारों से ऊपर उठकर आर्थिक सपनों, रोजगार, टिकाऊ शहरों और संतुलित विकास पर फोकस जरूरी है।

कर्नाटक की असली परीक्षा यही है, क्या वह तेज़ आर्थिक रफ्तार को राजनीतिक स्थिरता और समावेशी विकास में बदल पाएगा, या फिर शोर भरी राजनीति विकास की आवाज़ को दबा देगी?

Bhogali Bihu: Assam’s way of celebrating India’s Harvest Season

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Delhi : Imagine a cold winter morning. You wake up after enjoying a hearty feast with your family the night before; wrapped in warm clothes you step out of your home and walk slowly toward the meji, the big bonfire built in the village. The fire is already burning and you stand near it to take blessings from the fire god Agni, feeling its warmth on your face and in your heart. Yes , you are in Assam, celebrating Magh Bihu. One of the major festivals of the state. Magh bihu also known as Bhogali Bihu is one of the three bihus of Assam along with Rongali Bihu and Kongali bihu. In Sudhakantha Bhupen hazarika’s word it’s the time of ‘lakhimi adora'( welcoming Lakshmi – the grain)which signifies welcoming the golden harvest to the bhoral ghor (granary).

Assam is a land rooted in agriculture where rice is the soul of every meal. Its three bihus celebrate the entire agriculture cycle. With the joy of Rongali Assamese people begin bhui rua (rice planting), sowing hope into the soil while in the quiet faith of Kongali, prayer rise for a good harvest and finally with the bhog of Bhogali the golden yield celebrated with feast, prayers and gratitude.

Magh bihu is observed at the turning point of Magh, on the final day of the month of Pooh or Pausha according to the lunar calendar. Uruka, the day before bihu, holds a special place in this celebration. Preparations for Magh Bihu begins a week before uruka. Young boys gathered bamboo, wood, nora (hay) and built bhelaghor,a temporary structure where people have the feast and stay over the uruka night which is followed by burning of the meji the next morning. On the uruka night womenfolk prepared laru-pitha for the next day. The uruka night culminates in a grand community feast featuring Assamese authentic dishes like maasor tenga, khar, duck curry and seasonal vegetables accompanied by folk music, laughter and dance.

The next day in the early morning after taking a bath everybody assembled and offered edibles made for the fire god Agni. After that doi (curd), Sira (flattened rice), sunga saul (sticky rice roasted within bamboo), pitha (sticky rice flour crisp stuffed with sesame or coconut filling), laru (laddu), kath aloo (yam) are eaten followed by namprasang. Namprasang is an expression of Bhakti Bhava through chanting the name of god particularly Ram and Krishna combined with storytelling, singing and spiritual discourse popularised by Srimanta Sankardev in Assam. Another fascinating part of this Bihu is its traditional games like tekeli bhonga (blindfolded pot breaking game), koni juj( egg tapping contest), rosi tona ( tug of war) and many more.

The festival also reflects a strong thread of cultural continuity across India rooted in the same agricultural rhythm while each region added its own touch. In the south, Tamil Nadu celebrates Pongal, a four day festival as a gratitude to the Sun God, nature, and cattle for agricultural prosperity. While the sacred annual festival Makaravilakku is observed at the Sabarimala Ayyappa Temple of Kerala, villages of Karnataka are decorated with sugarcane and mango leaves for Suggi Habba. Most of the northern states celebrate Makar Sankranti which signifies the sun’s transition into Capricorn. This auspicious beginning in Himalayan foothills known as magh Saaji. Punjab celebrates Lohri to mark the end of winter and the harvesting of rabi crops, while Gujarat observes Uttarayan with vibrant kite-flying festivities symbolising joy and abundance. In eastern states, indigenous communities of Jharkhand, Odisha and West Bengal celebrate Tusu Parab honouring Tusu the goddess of crops and prosperity. The names may be different but the feeling is the same. A deep, shared joy; a sense that we are all part of the same living civilisation which we call Bharat. That’s what Bharatbodh truly means.

Expressing gratitude towards natural elements like ritu(season), krishi ( agriculture), surya (sun) and Agni (fire) is a parampara bharatiya civilization and Indian festivals are a reflection of this gratitude. Bhogali, like other harvest festivals of this time, is no exception. It gently reminds us of the value of agriculture, the simple joy of sharing food, the warmth of conversation, the delight of being with loved ones, and the beauty of working together. Festivals like Bihu are not merely about rituals, they are about memories, moments that bring us closer, make us feel human, and remind us that we are cherished. So, the next time Bhogali Bihu arrives, don’t think of it as just an Assamese festival. Think of it as the essence that keeps Bharat and Bharatiya Sanskriti alive.

Sources: Goswami, Prafulla Dutta, Festivals of Assam.

अमेरिका की दादागिरी के माएने

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दिल्ली । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नोबेल शांति पुरस्कार पाने के लालायित थे और बार- बार अपनी यह इच्छा सार्वजनिक कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने विश्व के तमाम संघर्षों के विराम का श्रेय लेने का प्रयास किया, रूस -यूक्रेन युद्ध समाप्त करवाने का प्रयास करते दिखे किन्तु नोबेल नहीं मिला।अब ट्रम्प इसकी खीझ विश्व के तमाम देशों पर उतार रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति का विभिन्न देशों के शासनाध्यक्षों के प्रति व्यवहार और दिए गए वक्तव्य अत्यंत हैरान करने वाले हैं। अमेरिका की दादागिरी वाली हरकतों से पूरे विश्व में उथल -पुथल होनी स्वाभाविक है। वेनेजुएला पर हमला कर वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरै और उनकी पत्नी का अपहरण कर, अमेरिका लाकर वहां की अदालत में पेश करना नैतिक मापदंडों के पूर्णतया विरुद्ध है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एशिया, यूरोप और लैटिन अमेरिकी देशों को धमका रहे हैं। उन्होंने कहा है कि अगर कोलंबिया, मैक्सिको, क्यूबा तथा ईरान ने रवैया न सुधारा तो कार्रवाई करेंगे, ग्रीनलैंड अमेरिका को अपने लिए चाहिए। यह भी समाचार आ रहे हैं कि वेनेजुएला के समुद्र से जो रूसी जहाज तेल लेकर आ रहे हैं उन पर अमेरिकी सेनाएं कब्जा कर रही हैं जिसके कारण क्षेत्र में व्याप्त तनाव गहरा गया है। सैन्यशक्ति के मद में चूर ट्रम्प शासनाध्यक्षों का मजाक उड़ा रहे हैं। ट्रम्प ने अपने फ्रांसीसी समकक्ष इमैनुअल मैक्रो का मजाक उड़ाते हुए कहा कि वह (मैक्रॉन) अधिक टैरिफ लगाने की बात पर गिड़गिड़ाने लगे थे। भारत -अमेरिका रक्षा सहयोग के विषय में बड़ा झूठ बोलते हुए कहा कि भारत द्वारा 68 अपाचे हेलीकाप्टर की खरीद में पांच साल की देरी हुई। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुझे फोन पर कहा सर क्या मैं आपसे मिल सकता हूं ? स्पष्ट है कि अमेरिका एक राष्ट्र की तरह नहीं वरन अपने आपको विश्व का मालिक और सबसे बड़ा व्यापारी तथा दूसरे देशों को अपना पिछलग्गू समझ रहा है।

इस घटनाक्रम में एक बड़ी बात यह दिख रही है कि अमेरिका के धुर विरोधी व विस्तारवादी प्रवृत्ति वाले चीन और रूस जैसे देश केवल अमेरिका की निंदा करने तक ही सीमित हो गए हैं या फिर यह भी कहा जा सकता है कि अमेरिकी विरोधी गुट के नेता अभी बहुत सावधानी व सतर्कता बरत रहे हैं ताकि तृतीय विश्वयुद्ध न छिड़ जाए। आज अमेरिका जिस मानसिकता से वैश्विक जगत को धमका रहा है उसी मानसिकता से उसने हिरोशिमा और नागासकी पर परमाणु बम गिरा दिए थे। आज वह विश्व को टैरिफ वार के सहारे अपने चरणों में गिराना चाहता है।

अमेरिका की हरकतों से विश्व अचंभित है। उसने रूस के साथ मित्रता रखने वाले ब्रिक्स देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है जिसके कारण भारत सहित विश्व के कई देशों का शेयर बाजार टूट रहा है । ट्रम्प ने सैक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ- 2025 के मंजूरी दी है जो रूस से पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करने वाले देशों पर भारी -भरकम टैरिफ लगाने की अनुमति देता है। यह टैरिफ उन देशों पर लगाए जाएंगे जो रूस से यूरेनियम और पेट्रोलियम उत्पादों के आदान -प्रदान में जानबूझकर शामिल होते हैं। यह बिल भारत और चीन जैसे देशों से आयातित सामानों पर कम से कम 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की अनुमति देता है।

अमेरिका यह बिल रूसी सरकार व उनके मित्र राष्ट्रों को दंडित करने के उद्देश्य से लाया है क्योंकि रूस ने यूक्रेन के साथ शांति समझौता करने से इंकार कर दिया है। अमेरिका भारत के खिलाफ टैरिफ लगाने की जो धमकी दे रहा है उसके पीछे का प्रमुख कारण भारत का तीव्रता के साथ आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होना है। अमेरिका ने जब भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया तब भी भारत की अर्थव्यवस्था व ग्रोथ पर कोई बहुत बड़ा असर नहीं हो पाया। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पांच सौ प्रतिशत टैरिफ वाला बिल ट्रम्प के साथ मिलकर तैयार किया है। ग्राहम का कहना है कि यह बिल उन देशो को दंडित करेगा जो सस्ता रूसी तेल खरीदकर पुतिन को ईंधन दे रहे हैं। इसमें विशेष रूप से चीन, ब्राजील और भारत को निशना बनाया गया है यह सभी देश रूसी तेल के बड़े आयातक हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि रूस -यूक्रेन युद्ध तो एक बहाना भर है दरअसल अमेरिका को भारत की आर्थिक उन्नति पसंद नहीं आ रही है। आज पूरा विश्व भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था को देखकर हैरान है। विश्वभर के निवेशक भारत में निवेश करना चाहते हैं । ऐसा प्रतीत हो रहा है कि ट्रम्प की यह नीति भारत की इस सफलता को कुंद करने की कोशिश है। जारी अनुमानों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025- 26 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.4 प्रतिशत रहने की संभावना है, यह विगत वर्ष की 6.5 प्रतिशत ग्रोथ से अधिक है। प्रमुख आर्थिक समाचार पत्रों के अनुसार भारत यह उपलब्धि वैश्विक चुनैतियों जैसे अमेरिकी टैरिफ और मुदा्रस्फीति के बावजूद प्राप्त कर रहा है। यह ग्रोथ भारत को एशिया में ही नहीं वैश्विक जगत में भी मजबूती प्रदान कर रही है।
ट्रम्प की नीतियों को सरसरी तौर पर देखा जाए तो यह रूस -यूक्रेन युद्ध से जुड़ी लग सकती हैं किन्तु गंभीरता से देखने पर पता चलता है कि यह भारत की आर्थिक स्वतंत्रता पर हमला है। ट्रम्प ने चुनाव अभियान में भारत को टैरिफ किंग कहा था और दावा किया था भारत अमेरिका से अधिक टैरिफ वसूलता है।अब रूस से तेल खरीद को बहाना बनाकर ट्रम्प भारत पर दबाव बना रहे हैं लेकिन यदि भारत ने रूस से तेल खरीद कम कर ली है तो फिर धमकी क्यों दी जा रही है ? ट्रम्प की नीति भारत को कमजोर करने की लग रही है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था में मुद्रस्फीति और बेरोजगारी है,अमेरिका में महंगाई चरम सीमा पर है। कुछ दिन पूर्व ही वहां सबसे बड़ा शटडाउन हो चुका है। अमेरिका में नया निवेश आ नहीं रहा है जबकि भारत में निवेश बढ़ रहा है।
एफडीआई में वृद्धि और अब उसमें विदेशी निवेश शत प्रतिशत कर दिया गया है। भारत का स्टॉक मार्केट नई ऊँचाई की ओर जा रहा।
यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका जिन देशों को धमका रहा है उन सभी देशों का विकास व जन्म अमेरिका के ही कारण हुआ है। अमेरिका जिन देशों को धमका रहा है वह परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र नहीं है। वेनेजुएला जैसे देशो की सत्ताएं भ्रष्टाचार व आर्थिक अव्यवस्था का अड्डा बन चुकी हैं । अमेरिकी राष्ट्रपति जिन देशों को धमका रहे हैं उन सभी देशों के शासनाध्यक्षों ड्रग्स तस्करी का आरोप लगा रहे हैं। अगर भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र न होता और उसके पास अपनी ब्रहमोस, पिनाका और प्रलय तथा अग्नि जैसी मारक मिसाइलें न होती तब आज विश्व में भारत की क्या स्थिति होती?

आज भारत आर्थिक और सामरिक रूप से सशक्त और समृद्ध है साथ ही उसके पास नरेंद्र मोदी जैसा वैश्विक पकड़ वाला नेतृत्व है। आज का भारत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की धमकियों से डरने और झुकने वाला नहीं है। अगर भारत ने आँखें फेर लीं तो अमेरिका को भी भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है । अमेरिका दादागिरी दिखा रहा है जबकि भारत, “वसुधैव कुटुम्बकम” की राह अपनाकर चल रहा है । अमेरिकी दादागिरी कुछ समय के लिए तो विश्व को उसके पक्ष में ला सकती है किंतु विश्व के समक्ष अंतिम विकल्प भारत का “वसुधैव कुटुम्बकम” का भाव ही होगा ।

पहले काला पानी की सजा फिर जेल से लौटकर डाक्टर बनीं

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कोलकाता । स्वाधीनता आंदोलन में डाक्टर की डिग्री लेकर राष्ट्र और समाज के लिये अपना जीवन समर्पित कर देने के उदाहरण तो अनेक हैं पर क्रांतिकारी आंदोलन में एक नाम ऐसा भी है जिन्हे पहले काला पानी का कारावास मिला फिर वे देश की प्रख्यात डाक्टर बनीं ।

यह नाम है डाक्टर सुनीति चौधरी का। उनका जन्म 22 मई 1917 को हुआ। वे अभी स्कूल की विद्यार्थी थीं कि उन्होंने मात्र 14 वर्ष की आयु में अपनी साथी शाँति घोष के साथ मिलकर 24 दिसम्बर 1931 को मजिस्ट्रेट बी जी स्टीवेंसन उनके कार्यालय में घुसकर गोली मारी। दोनों बालिकाओं ने मिलने की अनुमति मांगी और कमरे में पंहुचते ही गोली चला दी । निशाना अचूक था, स्टीवेंसन वहीं मर गया। दोनों वीर बालाएं गिरफ्तार कर ली गयीं । 27 फरवरी 1932 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा घोषित करके कालापानी भेज दिया गया। इधर पुलिस ने परिवार पर अत्याचार किये जिसमें एक भाई की मौत हुई । परिवार बिखर गया । अंततः 6 दिसंबर,1939 को द्वितीय विश्व-युद्ध के पहले आम माफी की वार्ता के अंतर्गत वे रिहा हुईं ।

तब सुनीति 22 वर्ष की हो गई थीं । जेल से रिहा होकर उन्होंने पहले अपनी आजीविका के कयी काम आरंभ किये और जोरशोर से पढ़ाई आरंभ की । बंगाल के आशुतोष कॉलेज से प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और 1944 में मेडिसिन एंड सर्जरी में डिग्री के लिए कैम्पबेल मेडिकल स्कूल में प्रवेश लिया। डाक्टरी परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद क्रांतिकारी प्रद्योत कुमार घोष से विवाह कर लिया । विवाह के बाद चंदननगर बस गयीं और शीघ्र ही ख्याति प्रतिष्ठित डॉक्टर के रूप में हो गई । स्वतंत्रता के बाद डॉ. सुनीति घोष को कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों राजनैतिक दलों की ओर से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव आया पर उनकी रुचि राजनीति में नहीं थी वे पूरी तरह समाज की सेवा को समय देना चाहतीं थीं । और 12 जनवरी, 1988 को 71 वर्ष की आयु इस क्रांतिकारी महिला ने संसार से विदा ले ली ।

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