भारत ने रूसी तेल खरीदने के लिए अमेरिका से ‘इजाज़त’ नहीं मांगी

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दिल्ली। यह दावा कि भारत ने अमेरिका से पूछा कि क्या हम रूस से तेल खरीद सकते हैं, और फिर अमेरिका ने ‘छूट’ दे दी-यह पूरी तरह से गलत है। यह कहानी भारत की संप्रभुता और ऊर्जा नीति को कमजोर दिखाने की कोशिश है।

असली कहानी क्या है?

6 मार्च 2026 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने एक अस्थायी 30 दिनों की छूट (waiver) जारी की। यह छूट रूसी मूल के तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के लिए है, जो 5 मार्च 2026 तक जहाजों पर लोड हो चुके थे। यह छूट केवल भारत को उन कार्गो को खरीदने और प्राप्त करने की अनुमति देती है, जो पहले से समुद्र में फंसे हुए हैं। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने खुद कहा कि यह कदम “वैश्विक बाजार में तेल का बहाव जारी रखने” के लिए है। इसका मकसद पश्चिम एशिया (ईरान संकट और होरमुज़ जलडमरूमध्य पर तनाव) से सप्लाई में रुकावट को कम करना है, ताकि दुनिया भर में तेल की कीमतें अचानक न बढ़ें।

यह फैसला अमेरिका का अपना एकतरफा कदम है। इसमें भारत की कोई आधिकारिक मांग या अनुरोध शामिल नहीं है। अमेरिका ने यह इसलिए किया क्योंकि ईरान से जुड़े तनाव से वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है। अगर सप्लाई रुकती है, तो कीमतें बढ़ती हैं-जिसका असर अमेरिका की अपनी अर्थव्यवस्था, महंगाई और राजनीति पर पड़ता है। इसलिए उन्होंने एक छोटी, सीमित छूट दी, जो केवल फंसे कार्गो पर लागू है और रूस को ज्यादा फायदा नहीं पहुंचाएगी।

भारत की ऊर्जा नीति कभी ‘परमिशन’ पर नहीं टिकी

भारत तीन साल से ज्यादा समय से रूस से तेल खरीद रहा है। यह खरीद कभी कम हुई, कभी बढ़ी-सब बाजार की स्थिति, कीमत, उपलब्धता और राष्ट्रीय हित के आधार पर। जनवरी 2026 में रूसी तेल का हिस्सा कम हुआ था, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में जोखिम बढ़ने पर रिफाइनरों ने फिर से रूसी कार्गो उठाने शुरू किए। यह सामान्य प्रक्रिया है। कोई भी समझदार देश सस्ता, भरोसेमंद और समय पर मिलने वाला तेल चुनता है। इसमें किसी देश से ‘हाँ’ या ‘नहीं’ की जरूरत नहीं पड़ती।

भारत 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। पेट्रोलियम मंत्रालय या विदेश मंत्रालय किसी बाहरी दबाव से फैसला नहीं लेते। फैसले बाजार की जरूरत, सप्लाई रिस्क, रिफाइनरी की क्षमता और देश के हित पर आधारित होते हैं। अमेरिका की इस छूट का भारत के फैसले से कोई सीधा संबंध नहीं। भारत ने न मांगा, न इंतजार किया।

यह छूट किसके लिए ज्यादा फायदेमंद है?

यह कदम मुख्य रूप से अमेरिका के अपने हित में है। वैश्विक तेल बाजार स्थिर रहे, कीमतें न उछलें—यह अमेरिका की महंगाई और अर्थव्यवस्था को बचाता है। भारत को फायदा मिल सकता है, लेकिन यह कोई ‘उपकार’ नहीं। भारत अपना तेल वही लेगा जहां सस्ता, सुरक्षित और फायदेमंद हो।

जो यह कहानी फैला रहे हैं

जो लोग इसे ‘इजाज़त मांगने’ की कहानी बना रहे हैं, वे या तो जियोपॉलिटिक्स नहीं समझते या जानबूझकर गलत नैरेटिव चला रहे हैं। भारत की संप्रभुता रोज के फैसलों में दिखती है—न कि किसी की मुहर या ट्वीट में। भारत अपने हित में फैसला खुद करता है, बिना किसी से पूछे। यह सच्चाई है, और इसे तोड़-मरोड़कर पेश करना देश की मजबूत नीति को कमजोर दिखाने की नाकाम कोशिश है।

भाजपा को सावधान करने वाले ‘लक्षण’ दिखने लगे बंगाल में

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कोलकाता। पश्चिम बंगाल में भाजपा समर्थकों के सामने 2026 विधानसभा चुनाव की चुनौतियाँ बहुआयामी और गहन हैं। 2021 के चुनाव में भाजपा ने 77 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल किया था, लेकिन उसके बाद से स्थिति में सुधार के बजाय कई मोर्चों पर पीछे धकेल दिया गया है। कार्यकर्ताओं का कैमरे पर बोलने से इनकार, पीआर एजेंसियों को ग्राउंड रिपोर्टर्स न मिलना। इस अविश्वास और भय के माहौल को रेखांकित करती हैं, जो अब भाजपा की सबसे बड़ी बाधा बन चुका है।

प्रमुख चुनौतियां

· सबसे प्रमुख चुनौती कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और संगठनात्मक कमजोरी है। लगातार हत्याएँ, हमले, घरों पर आगजनी और पलायन ने बूथ स्तर पर भाजपा की मौजूदगी को कमजोर कर दिया है।
· कई स्वयंसेवक और समर्थक अब खुलकर बोलने या सक्रिय होने से हिचकिचाते हैं, क्योंकि TMC की मशीनरी (पुलिस, प्रशासन, स्थानीय गुंडे) के दबदबे में विरोध का मतलब प्रतिशोध है।
· इससे ग्राउंड रिपोर्टिंग, कैंपेन और voter mobilization प्रभावित हो रहा है।
· 2021 के बाद 50 से अधिक विधायकों और नेताओं का TMC में जाना (defections) संगठन को और खोखला कर चुका है।

ध्यान देने वाली बात

· TMC की मजबूत ग्राउंड मशीनरी और वेलफेयर पॉलिटिक्स।
· ममता बनर्जी की सरकार ने लाखों-करोड़ों लोगों को लाभकारी योजनाओं (कन्याश्री, लक्ष्मीर भंडार, स्वस्थ साथी आदि) से जोड़ा है, जिसे भाजपा ‘doles’ कहकर आलोचना करती है, लेकिन ये योजनाएँ आम जनमानस में TMC के प्रति निष्ठा पैदा करती हैं।
· एंटी-इनकंबेंसी के बावजूद लोग बदलाव से डरते हैं, क्योंकि TMC से जुड़े लाभ मिलते हैं और विरोध करने पर नुकसान का खतरा रहता है। राज्य की मशीनरी पूरी तरह TMC के नियंत्रण में है, जो चुनावी प्रक्रिया में भी फायदा देती है।

क्षेत्रीय असमानता और वोटर बेस

· भाजपा का मजबूत आधार उत्तर बंगाल (दार्जीलिंग, कूच बिहार, जलपाईगुड़ी) में है, जहाँ वह 2021 में अच्छा प्रदर्शन कर चुकी है।
· लेकिन दक्षिण बंगाल (कोलकाता, हावड़ा, 24 परगना आदि) में TMC का दबदबा
अटूट है।
· अल्पसंख्यक (मुस्लिम) वोट बैंक TMC के साथ मजबूती से खड़ा है, और भाजपा की हिंदुत्व/घुसपैठ वाली रणनीति वहाँ उल्टी पड़ रही है।
· SIR (Special Intensive Revision) जैसे मुद्दे पर विवाद ने भी polarize किया है, लेकिन TMC इसे ‘disenfranchisement’ (मताधिकार) के रूप में पेश कर अपनी स्थिति मजबूत कर रही है।

नैरेटिव और मीडिया कंट्रोल

· TMC की सरकार मीडिया, इन्फ्लुएंसर्स और सोशल मीडिया पर हावी है। भाजपा के प्रयास (परिवर्तन यात्रा, मोदी रैली आदि) के बावजूद ग्राउंड पर TMC का नैरेटिव (ममता vs केंद्र की साजिश) ज्यादा प्रभावी है।
· बांग्लादेश से जुड़े सुरक्षा मुद्दे भाजपा उठाती है, लेकिन वे वोट में तब्दील नहीं हो
पा रहे।

भाजपा के सामने 2026 में जीत के लिए 7-10% वोट स्विंग की जरूरत है, लेकिन संगठनात्मक कमजोरी, कार्यकर्ता भय और TMC की जमीनी ताकत इसे बेहद कठिन बनाती है।

यदि भाजपा बूथ स्तर पर मजबूत नहीं हुई, तो 2021 का प्रदर्शन दोहराना भी मुश्किल होगा।

कांग्रेस का असली खेल: कांग्रेस ने मुसलमानों-ईसाइयों में भी जाति पैदा की

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दिल्ली। भाजपा और कांग्रेस की वैचारिक कहा सुनी में यह बात कांग्रेस ने साबित कर दी है कि भाजपा हिन्दू मुस्लिम करती है। भाजपा सत्तर सालों में यह बात साबित नहीं कर पाई कि कांग्रेस अगड़ा पिछड़ा करती है। उसने समाज को जाति के नाम पर बांटा और जो मुसलमान और क्रिश्चियन गर्व से कहते थे कि उनमें अगड़ा पिछड़ा नहीं है। कांग्रेस ने अपने सत्तर सालों की राजनीति में उनके बीच भी अगड़े और पिछड़े बनाए।

यह सच है कि कांग्रेस हिन्दू-मुसलमान नहीं करती। लेकिन कांग्रेस ने हिन्दू को हिन्दू से लड़ाया। क्रिश्चियन को क्रिश्चियन के खिलाफ खड़ा किया और मुसलमान-मुसलमान के बीच भेद पैदा किया। यह सिम्पल सी बात भाजपा भारतीय समाज को समझाने में सफल नहीं हो पाई है।

भाजपा पर हिंदू-मुस्लिम विभाजन का आरोप कांग्रेस ने स्थापित कर दिया है, जबकि कांग्रेस ने इससे कहीं अधिक सूक्ष्म और प्रभावी तरीके से समाज के हर तबके में जाति आधारित भेदभाव पैदा किया, यहां तक कि उन समुदायों में भी जहां जाति की अवधारणा मूल रूप से लागू नहीं होती।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुस्लिम समुदाय है। इस्लाम में जाति-व्यवस्था हराम मानी जाती है और कुरान-सुन्नत में सब मुसलमान बराबर बताए गए हैं। लेकिन कांग्रेस ने मुसलमानों के बीच भी ‘अगड़ा-पिछड़ा’ का फर्क पैदा किया। विभिन्न राज्यों में कांग्रेस सरकारों ने मुस्लिम समुदाय की कई जातियों या उप-समूहों को OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) में शामिल किया, जैसे कर्नाटक में ‘श्रेणी 2बी’ के तहत मुस्लिमों को अलग आरक्षण दिया गया। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी कांग्रेस ने मुस्लिमों के लिए 4-5% आरक्षण की कोशिश की, जिसे OBC कोटा से अलग या उसके अंदर व्यवस्थित किया। इससे मुसलमानों में ‘पिछड़े मुसलमान’ और ‘अन्य’ का विभाजन हुआ। कई मुस्लिम नेता और संगठन रिजर्वेशन के लालच में इस्लामी सिद्धांतों को नजरअंदाज कर कांग्रेस के साथ खड़े हो गए।

इसी तरह ईसाई समुदाय में भी कांग्रेस ने ST (अनुसूचित जनजाति) और OBC जैसी श्रेणियां बनाईं। दलित ईसाई या आदिवासी ईसाई को अलग लाभ देने की नीतियां अपनाईं, जिससे एक समान धर्म के लोग आपस में बंट गए। हिंदुओं में तो कांग्रेस ने जाति को राजनीतिक हथियार बनाया ही-ओबीसी, एससी, एसटी के नाम पर वोट बैंक बनाए और अगड़े-पिछड़े की लड़ाई को भड़काया। यह बात जो सार्वजनिक है, भाजपा अपने मतदाताओं को भी आज तक समझा नहीं पाई है।

कांग्रेस की यह नीति ‘तुष्टिकरण’ से आगे बढ़कर समाज को अंदर से तोड़ने वाली रही। मुसलमान जो होली में रंग छू जाने भर से, मरने मारने को उतारू हो जाता है। अपने Religious texts को लेकर इतना प्रतिबद्ध समाज, रिजर्वेशन के लिए जाति स्वीकार करने को तैयार हो गया। मानों मुसलमानों के वर्ग ने कांग्रेस के बहकावे में आकर अपने सेल्फ रिस्पेक्ट से ही समझौता कर लिया! इस तरह कांग्रेस ने मुसलमानों के एक वर्ग को मुसलमानों की मुख्यधारा से काट दिया। कांग्रेसी बहकावे में आकर वे तैयार हो गए एक ही सफ में खड़े होने वालों के बीच अलग सफ में खड़े होने को।

ईसाई समुदाय में भी भेद पैदा हुआ। यह विभाजन कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति के लिए किया, लेकिन भाजपा इसे प्रभावी ढंग से उजागर नहीं कर पाई। इस तरह कांग्रेस ने साबित किया कि वह ‘बांटो और राज करो’ की सबसे बड़ी मास्टर है-न सिर्फ हिंदू-हिन्दू में-मुस्लिम-मुस्लिम में, बल्कि हर समुदाय के अंदर।

संघ द्वारा चलाए जा रहे पंच परिवर्तन कार्यक्रम से समाज परिवर्तन सम्भव है  

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ग्वालियर : आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं और यदि हम संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर दृष्टि डालें, तो ध्यान में आता है कि संघ के स्वयसेवकों ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विचार और क्रियाशीलता के स्तर पर सक्रिय योगदान दिया है। वे अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के वाहक भी बने हैं। प्रारम्भ का सीमित संघ कार्य, समय के साथ व्यापक होता गया है। समाज की विभिन्न आवश्यकताओं को समझते हुए स्वयंसेवक विविध आयामों में अपने सहयोगियों के साथ क्रियाशील बने हैं। परिणामतः संघ के उद्देश्य के अनुरूप, देश में हिंदुत्व का जागरण करने की दिशा में विशेष प्रगति हुई है। हिंदुत्व के जागरण से, समाज में जाति, वर्ग, भाषा इत्यादि के आधार पर होने वाले अनेक प्रकार के भेदभाव, धीरे धीरे कम होने लगे हैं। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन, अयोध्या मंदिर में श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा, कुम्भ जैसे विराट आयोजन इत्यादि अनेक ऐसे अवसर आए हैं – जहां हिंदू समाज का एक संगठित, भव्य और उच्च आदर्शों से युक्त स्वरूप सामने आया है। यह दृश्य समाज में आत्मविश्वास जगाने वाला बन रहा है। हम सब मिलकर देश के भविष्य को उज्जवल एवं सुदृढ़ बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सकारात्मक वातावरण निर्मित कर सकते हैं। इसलिए ये हमारी राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने वाले आयोजन सिद्ध हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष केवल इतिहास की उपलब्धियां नहीं है, बल्कि भविष्य की दिशा का संकल्प हैं।

आज, जब हम राष्ट्रीयस्वयं संघ की 100 वर्षों की इस यात्रा को देखते हैं, तो यह भी स्पष्ट होता है कि समाज में जिस परिवर्तन के लिए संघ के स्वयंसेवक सक्रिय रहे हैं वह अब दिखाई देने लगा है। हिंदुत्व और इसकी परम्पराओं पर लोगों का विश्वास बढ़ा है। समाज के अनेक लोग इस तथ्य को स्वीकार कर रहे हैं और इसका अनुभव भी कर रहे हैं। हिंदुत्व की इस जागृति के कारण लोग अब हिंदू होने में गर्व का अनुभव कर रहे हैं। एक समय था जब सार्वजनिक जीवन में हिंदू समाज की कमियों को ही उजागर किया जाता था, जिससे अनेक लोग हिंदुत्व की अच्छाईयों को पहचान नहीं पाए, किंतु अब स्थिति बदल रही है। लोग अपने पूर्वजों के धर्म और परम्पराओं को महत्व देने लगे हैं। वे अपने बच्चों के नामकरण से लेकर विवाह पद्धति तक में हिंदू संस्कारों का समावेश कर रहे हैं। घर की परम्पराओं को आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है।

उक्त वर्णित सम्पूर्ण प्रक्रिया का उद्देश्य है – एक सच्चरित्र, प्रामाणिक और संस्कारवान पीढ़ी का निर्माण करना। ऐसी पीढ़ी समाज का वातावरण सुधार कर घर और समाज में सुख शांति स्थापित कर सकती है। इसलिए, इन मूल्यों और संस्कारों को महत्व देने और उन्हें अपने जीवन में उतारने के प्रयास आज घर घर में होने लगा हैं। लोग अब ऐसे सभी मंचों और माध्यमों से जुड़ने के लिए प्रयत्नशील हैं जो इस दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। संघ को भी लोग इस दृष्टि से एक महत्वपूर्ण माध्यम मानने लगे हैं और विश्वासपूर्वक संघ से जुड़ने का उत्साह दिखा रहे हैं। जैसे जैसे हिंदुत्व पर विश्वास बढ़ रहा है, वैसे वैसे भारत के प्रति श्रद्धा और विश्वास, व्यापक और गहरा हो रहा है। संघ का मानना है कि “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श पर चलकर भारत न केवल अपने समाज को सशक्त करेगा, बल्कि पूरी दुनिया को शांति, सद्भाव और सहयोग का संदेश देकर विश्वगुरु की भूमिका निभाएगा। यह सब भारतीय समाज में परिवर्तन लाकर ही फलिभूत हो सकता है। संघ द्वारा अपनी स्थापना के समय लिए गए संकल्पों को शीघ्र ही पूर्ण करने के उद्देश्य से अपने इस शताब्दी वर्ष में कुछ विशेष कार्यक्रमों के माध्यम से भारतीय समाज को (1) अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजग करने, (2) पर्यावरण के प्रति सचेत करने, (3) नागरिकों में स्व के भाव को जगाने एवं स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने, (4) कुटुम्ब प्रबोधन के माध्यम से पारिवारिक भावना जागृत करने एवं (5) समाज में समरसता के भाव को सुदृद्ध करने के लिए गम्भीर प्रयास किए जा रहे हैं। इस कार्यक्रम को “पंच परिवर्तन” का नाम दिया गया है और इसका आह्वान परम पूजनीय सर संघचालक श्री मोहन जी भागवत द्वारा किया गया है ताकि अनुशासन एवं देशभक्ति से ओतप्रोत युवा वर्ग अनुशासित होकर अपने देश को आगे बढ़ाने की दिशा में कार्य करे। इस पंच परिवर्तन कार्यक्रम को सुचारू रूप से लागू कर समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।

व्यवहार में पंच परिवर्तन को समाज में किस प्रकार लागू करना है इस हेतु हम समस्त भारतीय नागरिकों को मिलकर प्रयास करने होंगे, क्योंकि पंच परिवर्तन केवल चिंतन, मनन अथवा बहस का विषय नहीं है बल्कि इस हमें अपने व्यवहार में उतारने की आवश्यकता है। उक्त पांचों आचरणात्मक बातों का समाज में होना सभी चाहते हैं, अतः छोटी-छोटी बातों से प्रारंभ कर उनके अभ्यास के द्वारा इस आचरण को अपने स्वभाव में लाने का सतत प्रयास अवश्य करना होगा। जैसे, समाज के आचरण में, उच्चारण में संपूर्ण समाज और देश के प्रति अपनत्व की भावना प्रकट हो, प्रत्येक घर में सप्ताह में कम से कम एक बार पूजा या धार्मिक आयोजन हो एवं अपने परिवार के बच्चों के साथ बैठकर महापुरुषों के सम्बंध में सप्ताह में कम से कम एक घंटे चर्चा हो, परिवार के सभी सदस्यों में नित्य मंगल संवाद, संस्कारित व्यवहार व संवेदनशीलता बनी रहे, बढ़ती रहे व उनके द्वारा समाज की सेवा होती रहे, आदि बातों का ध्यान रखकर कुटुंब प्रबोधन जैसे विषय को आगे बढ़ाया जा सकता है।

मंदिर, पानी, श्मशान के सम्बंध में कहीं भेदभाव बाकी है, तो वह शीघ्र ही समाप्त होना चाहिए। हम लोग अपने परिवार सहित त्यौहारों के समय अनुसूचित जाति के बंधुओं के घर जाएं और उनके साथ चाय पान करें। साथ ही, हम अनुसूचित जाति के बंधुओं को सपरिवार अपने परिवार में बुलाकर सम्मान प्रदान करें। कुल मिलाकर समस्त समाज एक दूसरे के त्यौहारों में शामिल हों ताकि आपस में भाई चारा बढ़े एवं देश में सामाजिक समरसता स्थापित हो सके।

सृष्टि के साथ संबंधों का आचरण अपने घर से पानी बचाकर, प्लास्टिक हटाकर व घर आंगन में तथा आसपास हरियाली बढ़ाकर हो सकता है। अपने घरों में जल का कोई अपव्यय नहीं हो रहा है एवं अपने परिवार में हरियाली की चिंता की जा रही है। अपने घर में, रिश्तेदारी में, मित्रों के यहां सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग न करने का आग्रह किया जा रहा है आदि बातों पर ध्यान देकर देश में पर्यावरण को सुधारा जा सकता है।

स्वदेशी के आचरण से स्व-निर्भरता व स्वावलंबन बढ़ता है। फिजूलखर्ची बंद होनी चाहिए, देश का रोजगार बढ़े व देश का पैसा देश में ही काम आए, इस बात का ध्यान देश के समस्त नागरिकों को रखना चाहिए। इसीलिए कहा जा रहा है कि स्वदेशी का आचरण भी घर से ही प्रारंभ होना चाहिए। समस्त नागरिकों के घर में स्वदेशी उत्पाद ही उपयोग होने चाहिए।

देश में कानून व्यवस्था व नागरिकता के नियमों का भरपूर पालन होना चाहिए तथा समाज में परस्पर सद्भाव और सहयोग की प्रवृत्ति सर्वत्र व्याप्त होनी चाहिए। इन्हें हमारे नागरिक कर्तव्यों के रूप में देखा जाना चाहिए। समाज में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन हेतु हम सबको मिलकर प्रयास करने होंगे। विशेष रूप से युवाओं में नशाबंदी समाप्त करने के लिए, मृत्यु भोज रोकने के लिए तथा विभिन्न समाजों में व्याप्त दहेज की कुप्रथा समाप्त करने के गम्भीर प्रयास हम समस्त नागरिकों को मिलकर ही करने होंगे।

समाज की एकता, सजगता व सभी दिशा में निस्वार्थ उद्यम, जनहितकारी शासन व जनोन्मुख प्रशासन स्व के अधिष्ठान पर खड़े होकर परस्पर सहयोगपूर्वक प्रयासरत रहते है, तभी राष्ट्रबल वैभव सम्पन्न बनता है। बल और वैभव से सम्पन्न राष्ट्र के पास जब हमारी सनातन संस्कृति जैसी सबको अपना कुटुंब माननेवाली, तमस से प्रकाश की ओर ले जानेवाली, असत् से सत् की ओर बढ़ानेवाली तथा मृत्यु जीवन से सार्थकता के अमृत जीवन की ओर ले जानेवाली संस्कृति होती है, तब वह राष्ट्र, विश्व का खोया हुआ संतुलन वापस लाते हुए विश्व को सुखशांतिमय नवजीवन का वरदान प्रदान करता है।

संघ की दृष्टि बहुत स्पष्ट है कि सम्पूर्ण भारत की पहचान जिससे है, उस आध्यात्म आधारित एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि को दुनिया हिंदुत्व अथवा हिंदू जीवन दृष्टि के नाते जानती है, उस हिंदुत्व को जगाकर सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में जोड़कर निर्दोष और गुणवान हिंदू समाज के संगठन का यह कार्य जो वर्ष 1925 में प्रारम्भ हुआ वह आज भी निरन्तर जारी है और आगे भी जारी रहेगा।

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