जब सुप्रीम कोर्ट ने कदम पीछे खींचे: 2025 के पाँच प्रमुख न्यायिक पुनर्विचार

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दिल्ली । साल 2025 भारत की सुप्रीम कोर्ट के लिए असाधारण रहा। कई महत्वपूर्ण मामलों में अदालत ने अपने ही फैसलों पर पुनर्विचार किया, कभी जन विरोध के कारण, कभी प्रक्रियात्मक त्रुटियों की वजह से, तो कभी व्यापक जनहित को देखते हुए। कुछ ने इन्हें यू-टर्न कहा, कुछ ने न्यायिक सुधार। वास्तव में, ये पाँच बड़े मामले थे जहाँ समीक्षा, विरोध या नए तथ्यों ने अदालत को दिशा बदलने पर मजबूर किया। ये घटनाएँ न्यायपालिका की जीवंतता दिखाती हैं, लेकिन बार-बार बदलाव से संस्थागत विश्वसनीयता पर सवाल भी उठाती हैं।

पहला: अरावली पहाड़ियों की परिभाषा

अरावली विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में एक है, हिमालय से भी पुरानी। ये उत्तर भारत का पर्यावरणीय ढाल हैं: थार मरुस्थल को रोकती हैं, भूजल रिचार्ज करती हैं और दिल्ली जैसे शहरों को धूल भरे तूफानों से बचाती हैं। वर्षों से खनन और निर्माण ने इन्हें भारी क्षति पहुँचाई।

20 नवंबर 2025 को कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की समिति की रिपोर्ट स्वीकार कर अरावली की परिभाषा सीमित कर दी: स्थानीय स्तर से 100 मीटर ऊँची भूमि और 500 मीटर दायरे में जुड़े क्लस्टर। इसे वैज्ञानिक बताया गया, लेकिन पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी कि इससे बड़े क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएँगे, खनन और निर्माण के द्वार खुल जाएँगे। विरोध भड़क उठा, सोशल मीडिया से सड़कों तक हंगामा, प्रदर्शन और याचिकाएँ।

29 दिसंबर 2025 को छुट्टियों में विशेष बेंच ने स्वयं संज्ञान लिया। नवंबर फैसले पर रोक लगा दी और नई हाई-पावर एक्सपर्ट कमेटी गठित की, जो परिभाषा, छूट, खनन जोखिम और पूरी श्रृंखला की सेहत की जाँच करेगी। तब तक पूर्व प्रतिबंध बरकरार। यह जनता की आवाज़ की जीत थी, न्याय की बुद्धिमत्ता, जो गलती सुधारने में नहीं हिचकिचाती। अरावली अब भी खड़ी हैं, क्योंकि लोग और अदालत ने सुन लिया।

दूसरा: एक्स-पोस्ट-फैक्टो पर्यावरण मंज़ूरी
मई 2025 में वनशक्ति मामले में कोर्ट ने बाद में दी जाने वाली (एक्स-पोस्ट-फैक्टो) पर्यावरण मंज़ूरी को अवैध घोषित किया। कई परियोजनाएँ रुक गईं, इसे पर्यावरण संरक्षण की मजबूत मिसाल कहा गया। लेकिन नवंबर में समीक्षा पर तीन जजों की बेंच (2:1 बहुमत) ने फैसला पलट दिया। कुछ विशेष हालात में इन्हें मान्य किया, ताकि पूरी परियोजनाएँ ध्वस्त न हों और जनहित प्रभावित न हो। आलोचकों ने कहा यह उल्लंघन को वैध बनाता है, जबकि समर्थकों ने इसे व्यावहारिक बताया।

तीसरा: राज्यपालों की विधेयक स्वीकृति पर समय-सीमा
अप्रैल 2025 में कोर्ट ने राज्यपालों को विधेयकों पर समयबद्ध फैसला लेने का निर्देश दिया, जिससे राज्यों में राहत की लहर दौड़ी। लेकिन नवंबर में पाँच जजों की संविधान पीठ ने इसे रद्द कर दिया, कहा कि समय-सीमा तय करना न्यायपालिका का क्षेत्र नहीं। राज्यपालों की विवेक शक्ति बरकरार, लेकिन अनिश्चित देरी संघवाद के खिलाफ। यह राष्ट्रपति के संदर्भ पर दिया गया मत था, जो संघीय संतुलन की याद दिलाता है।

चौथा: भूषण पावर एंड स्टील दिवालिया मामला
मई 2025 में कोर्ट ने कंपनी को लिक्विडेशन का आदेश दिया, क्योंकि रिज़ॉल्यूशन प्लान में गंभीर प्रक्रियात्मक खामियाँ पाई गईं, यहाँ तक कि JSW की खरीद भी प्रभावित हुई। बाज़ार और कर्मचारियों में हड़कंप मचा। बाद में समीक्षा पर अदालत ने फैसला वापस लिया, त्रुटियाँ स्वीकारीं और कंपनी पुनर्जीवन की अनुमति दी। यह IBC के उद्देश्य, कंपनी बचाना, लिक्विडेशन अंतिम विकल्प, की पुनर्स्थापना थी।

पाँचवाँ: आवारा कुत्तों का पशु कल्याण मामला
शुरू में अगस्त 2025 में कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों, खासकर स्कूलों-अस्पतालों से कुत्तों को हटाने पर सख्ती दिखाई। पशु प्रेमियों के विरोध और प्रदर्शनों के बाद नीति संशोधित हुई, नसबंदी, टीकाकरण और वापस छोड़ने पर जोर, लेकिन संवेदनशील संस्थागत क्षेत्रों से हटाने की व्यवस्था बरकरार। यह जन सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन का प्रयास था।

ये पुनर्विचार गंभीर सवाल उठाते हैं: बीच का नुकसान, पर्यावरणीय क्षति, रुके निवेश, खोई नौकरियाँ, बढ़ते हमले, की जिम्मेदारी किसकी? अगर विरोध न होता, तो क्या गलत फैसले बने रहते? न्याय तब सच्चा होगा जब अदालतें त्रुटियाँ सुधारें, नुकसान का मूल्यांकन करें और सुनिश्चित करें कि हर आवाज़ सुनी जाए, चाहे जोरदार हो या नहीं।

2025 ने साबित किया: न्यायपालिका सुनती है, सुधारती है। लेकिन बार-बार बदलाव विश्वास हिलाते हैं। अंत में, ये लोकतंत्र की ताकत है, जनता की आवाज़ न्याय को नई दिशा देती है।

दो बैलों की जोड़ी से ट्रैक्टर तक, खेत से लैब तक: आज का किसान

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आगरा । सुबह की धूप अभी हल्की थी।
मेरठ जिले के एक गाँव में किसान रमेश अपने खेत पर खड़े थे। मोबाइल हाथ में थामे, वे स्क्रीन पर चमकते मौसम अलर्ट पर नजर गड़ाए हुए थे , “आज सिंचाई नहीं।”, उन्होंने तुरंत मोटर बंद कर दी। मुस्कराते हुए बोले, “अब खेत आसमान देखकर नहीं, ऐप देखकर चलते हैं।”

उनके दादा हरिया चौधरी के जमाने में यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। तब खेत का मिजाज मिट्टी की गंध से परखा जाता था, और बीज राम भरोसे बोए जाते थे। बरसात आई तो फसल, नहीं तो कर्ज़ और भूख। खेती तब अनुभव और विश्वास पर चलती थी, विज्ञान पर नहीं।
तीन पीढ़ियों में खेती ने जो छलांग लगाई है, वह केवल तकनीकी नहीं , मानसिकता की क्रांति है।

हरिया चौधरी के पास बैलों की जोड़ी थी, लकड़ी का हल, और अपने बचाए बीज; पैदावार सीमित थी, मगर मन में उम्मीद थी। वे कहते थे, “खेत को जितना दोगे, उतना लौटाएगा।”

आज वही खेत हरियाणा के चौधरी मुल्तान सिंह के लिए प्रयोगशाला बन चुका है , जहाँ मिट्टी में नमी सेंसर लगा है, ड्रिप पाइपें बिछी हैं, फसल की निगरानी ड्रोन करते हैं, और दाम व्हाट्सऐप पर तय होते हैं। खेती अब केवल मेहनत नहीं, डेटा, एल्गोरिद्म और सूचनाओं की साझेदारी है।
यह बदलाव केवल आगरा, हाथरस या मथुरा का नहीं, यह पूरे देश की कहानी है।

आजादी के बाद भारत भूखा था, अनाज कम, जनसंख्या अधिक। 1960 के दशक में जब सूखा पड़ा, तब अमेरिका से जहाजों में गेहूं मंगवाना पड़ा। दुनिया सवाल कर रही थी “क्या भारत खुद को कभी खिला सकेगा?” उत्तर मिला, हरित क्रांति के रूप में।

वैज्ञानिक आए, नए बीज आए, सिंचाई के साधन और खाद के प्रयोग शुरू हुए। किसान ने जोखिम उठाया और भरोसा किया। सरकार ने सहयोग दिया। वर्ष दर वर्ष खेतों ने जवाब दिया , हरे-भरे दानों की भाषा में।

1960 के दशक में खाद्यान्न उत्पादन कुल 50 से 60 मिलियन टन था। आज 2024-25 में भारत ने 357 मिलियन टन का रिकॉर्ड उत्पादन हासिल किया है। यही नहीं, भारत अब चावल का सबसे बड़ा निर्यातक और गेहूं में भी प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। कृषि निर्यात का मूल्य 50 अरब डॉलर पार कर चुका है, जो विदेशी मुद्रा के साथ करोड़ों किसानों की आय भी बढ़ा रहा है।

यह यात्रा भूख से आत्मनिर्भरता और फिर आत्मविश्वास तक की है , खेतों में हुई एक शांत वैज्ञानिक क्रांति।
रमेश बताते हैं, “अब खेती अंदाज़े से नहीं, आँकड़े से होती है। पहले एक फसल में जितना कमाते थे, अब दो में दोगुना हो जाता है।”

ड्रिप सिंचाई से पानी बचा, मल्चिंग से खरपतवार रुके, मिट्टी परीक्षण से खाद का सही संतुलन मिला। ड्रोन ने मेहनत घटाई, और AI ने मौसम के बदलते तेवर का अनुमान लगाया। खेती अब तकनीक और परंपरा की साझेदारी है।

इस बदलाव की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे पर्यावरण को भी राहत मिली है। कम पानी, कम कीटनाशक, और अधिक नियंत्रण , भूमिगत जल पर दबाव घट रहा है। मिट्टी की सेहत सुधर रही है। खेतों में जितना पानी बचेगा, नदियों में उतनी सांस बचेगी। अब खेती और पर्यावरण विरोधी नहीं, सहयोगी हैं।

इस क्रांति में महिलाएँ भी पीछे नहीं। “नमो ड्रोन दीदी” जैसी योजनाओं ने उन्हें तकनीकी रूप से सशक्त किया है। आज गाँव की महिलाएँ खेतों में ड्रोन उड़ा रही हैं, स्प्रे कर रही हैं, सर्वे कर रही हैं। यह केवल आय का नहीं, सम्मान का परिवर्तन है।

ब्रज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह इलाका, अब हरित संभावना का क्षेत्र बन चुका है। पॉलीहाउस में टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च जैसी फसलें सालभर उगाई जा रही हैं। मौसम की मार से सुरक्षित, कम जमीन में अधिक उत्पादन , यही है स्मार्ट खेती का मूलमंत्र। खेती अब केवल गुज़ारा नहीं, व्यापार है।
फिर भी चुनौतियाँ बाकी हैं।

मौसम का मिजाज बिगड़ता जा रहा है कभी बाढ़, कभी सूखा, कभी कीटों का हमला। मिट्टी थकान महसूस कर रही है। किसान चिंतित हैं, पर अब वे अकेले नहीं। उनके साथ हैं कृषि वैज्ञानिक, नीति निर्माता और तकनीक।

अब उम्मीद की खेती होती है, रमेश मुस्कराते हैं। शाम को जब वे खेत से लौटते हैं, तो घर की दीवार पर टंगी दादा हरिया की पुरानी तस्वीर को देखते हैं। धीमे स्वर में कहते हैं, “दादा ने जो खेत जोते, हम उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं, पर अब समस्याओं के हल हमारे दिमाग में नहीं, लैब में तैयार हो रहे हैं।”

हरित क्रांति की अनकही रीढ़ रहे हैं वे संस्थान, जिन्होंने खेत को दिशा दी , आगरा के बिचपुरी कृषि संस्थान जैसे केंद्रों ने प्रयोगशाला से खेत तक ज्ञान पहुँचाया। मिट्टी, बीज और पानी पर अनुसंधान हुए। नई किस्में विकसित हुईं, रोगरोधी पौधे बने। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान वैज्ञानिक सोच की ओर बढ़े।

आगरा की लोहा ढलाई इकाइयों ने इस यात्रा को औज़ार दिए , हल, हैरो, पंप, थ्रेशर, पूरे देश के खेतों तक पहुँचने वाली मशीनरी यहीं निर्मित हुई। हरित क्रांति को सिर्फ अच्छे बीज नहीं, मजबूत औज़ार भी चाहिए थे , और आगरा की फाउंड्रियों ने यह जिम्मेदारी निभाई।

आज जब भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर है, यह समझना जरूरी है कि यह संघर्ष केवल धरती का नहीं, सोच का भी था।
1970 के दशक में जब लोग भूख से मरते थे, आज कोविड के बाद के भारत में करोड़ों गरीबों को मुफ्त अनाज मिल रहा है। यह परिवर्तन किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है, पर यह हर किसान के पसीने से लिखी सच्ची गाथा है।
भारतीय कृषि अब पीछे नहीं देख रही। हल से ड्रोन तक, बैलों से सेंसर तक, खेत से लैब तक , किसान ने खुद को बदला है, और इसी बदलाव ने भारत को विश्व कृषि मानचित्र पर अग्रणी बनाया है।
भविष्य की खेती स्मार्टफोन और मिट्टी, दोनों के मेल से चलेगी , जहाँ परंपरा की जड़ें विज्ञान के पंखों से जुड़ी होंगी।

घूंघट की घुटन से मुक्ति: खामोश बगावत की आहट

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मथुरा । उत्तर प्रदेश के प्रयागराज ज़िले के एक छोटे से गाँव की धूल भरी गलियों में, एक 18 वर्ष की लड़की सुनीता रानी (काल्पनिक नाम), दुल्हन बनकर आई। चेहरा लाल घूंघट में ढका हुआ था। स्कूल की दहलीज़ अभी पीछे छूटी ही थी कि वह एक ऐसी दुनिया में दाख़िल हो गई, जहाँ रिवायत का मतलब था, ख़ामोशी और ओझल रहना। उस सुबह किसी ने उसका चेहरा नहीं देखा, बस घूंघट देखा गया। वही उसकी पहचान बन गया। उसका नाम मिटकर “बहू” हो गया, सर ढका रहे, नज़रें झुकी रहें और ज़ुबान बंद।

घूंघट सिर्फ़ कपड़ा नहीं था, हुक्म था, न देखो, न बोलो, न इजाज़त के बिना बाहर निकलो। इसे मर्यादा कहा जाता था। उसके लिए यह घूंघट की घुटन थी। हँसी भी क़ायदे में बंधी थी। मर्द बोलते थे, औरतें सुनती थीं।

यह घूंघट सिर्फ़ चेहरा नहीं छुपाता था, पहचान भी मिटा देता था। शादियों में दुल्हनें एक-सी लगती थीं। भीड़ में औरतें रास्ता खो देती थीं, कभी-कभी ख़ुद को भी। ऐसे में अजीब-क़िस्से जन्म लेते, किसी ने घूंघट न करने पर बीवी को तलाक़ दे दिया, कोई घूंघट में ग़लत बस में बैठकर दूसरे गाँव पहुँच गई। इन क़िस्सों को “संस्कृति” कहकर टाल दिया जाता, लेकिन इनके पीछे एक गहरी त्रासदी छुपी थी। सुनीता को स्कूल की बेंच और ब्लैकबोर्ड याद आते थे, जहाँ मास्टरजी उसे “तेज़ समझदार” कहते थे। वह चिंगारी अब भी ज़िंदा थी।

इतिहास बताता है कि घूंघट कोई सनातन हिंदू परंपरा नहीं, बल्कि उधार ली गई रिवायत है। प्राचीन भारत की मूर्तियों और ग्रंथों में महिलाएँ बिना घूंघट के दिखाई देती हैं, ख़ासकर दक्षिण और पूर्व भारत में। माना जाता है कि सातवीं सदी में फ़ारसी असर और बाद में मुग़ल दौर में यह रिवायत मज़बूत हुई। कुछ क्षेत्रों में इसे शान और हैसियत का निशान माना गया जो धीरे-धीरे पितृसत्ता का औज़ार बन गया। परिवार की “इज़्ज़त” के नाम पर यह औरतों की आज़ादी पर ताला बन गया, जिसे समाज सुधारकों ने ज़ुल्म कहा।

महात्मा गांधी ने पर्दा प्रथा को “अमानवीय और अनैतिक” बताया और लिखा कि यह स्वराज के रास्ते में रुकावट है। समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी घूंघट को पिछड़ेपन की निशानी बताते हुए इसके ख़ात्मे की माँग की। फिर भी यह चलन ज़िंदा रहा, क्योंकि ख़ामोशी से ताक़त को फ़ायदा होता है।

सुनीता की ज़िंदगी में पहला मोड़ तालीम से आया। ताने मिले, “ज़्यादा पढ़-लिखकर क्या करेगी?” लेकिन उसने पढ़ाई पूरी की। फिर 2018 में वह आशा कार्यकर्ता बनी। शुरुआत में घूंघट में ही वह घर-घर जाकर टीकाकरण, पोषण और सुरक्षित डिलीवरी की बात समझाने लगी। औरतें उसकी बात सुनती थीं, क्योंकि वह उन्हीं में से एक थी।

धीरे-धीरे घूंघट सरकने लगा, पहले मीटिंग में, फिर रास्ते में, और आख़िरकार घर में। कोई नारा नहीं, कोई शोर नहीं, बस ख़ामोश हौसला। डॉक्टरों से बात करना, रजिस्टर भरना, सवालों के जवाब देना, सब उसने सीखा। इल्म से हिम्मत आई, काम से इज़्ज़त मिली, और कमाई से आवाज़। गाँव ने यह बदलाव देखा। जो बुज़ुर्ग पहले डाँटते थे, अब सेहत के लिए उससे मशविरा लेने लगे। जो औरतें हँसती थीं, वे भी अपना घूंघट ढीला करने लगीं, बग़ावत में नहीं, सुकून में।

देश भर के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन शहरों में यह चलन कम हो रहा है। महिला केंद्रित योजनाओं ने लाखों ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है।

भारतीय सिनेमा ने भी घूंघट पर सवाल उठाए हैं। पाकीज़ा और उमराव जान जैसी फ़िल्मों में घूंघट में क़ैद औरतों की तन्हाई दिखी। हाल की फ़िल्म लापता लेडीज़ (2023) में एक-से घूंघट की वजह से दो दुल्हनों का अदला-बदली होना, इस रिवायत की बेवक़ूफ़ी को हँसी में उजागर करता है।

आज तमाम शिक्षित महिलाएं बिना घूंघट चल रही हैं। उनकी चाल में भरोसा है। आंखों में चमक, उत्साह है। बच्चे उनका चेहरा देखते हैं, बेटियाँ सपने देखती हैं, घूंघट से परे। घूंघट अब भी कई घरों में टंगा है, इज़्ज़त के नाम पर। लेकिन सुनीता, आशा, रानी, देवी जैसी युवा महिलाओं की कहानियाँ इस प्रथा की गिरफ़्त ढीली कर रही हैं। बदलाव शोर से नहीं आता, आहिस्ता, हौले हौले आता है, शिक्षा से, कानून से, सोशल मीडिया से। जब कोई औरत अपना घूंघट उठाती है और ग़ायब होने से इंकार कर देती है, तब एक नई सुबह की शुरुआत होती है।

एक जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और देश विरोधी गैंग सक्रिय

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दिल्ली । माननीय सुप्रीमकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में फरवरी 2020 में उत्तर- पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के मुख्य आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी। इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक घायल हुए थे। इसी केस में उमर और शरजील के 5 साथियों को 12 कड़ी शर्तो के साथ जमानत मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उमर और शरजील इमाम पर कड़ी टिप्पणियां करी हैं । अब ये दोनों अभियुक्त आने वाले एक साल में जमानत के लिए अपील भी नहीं कर पाएंगे।

फरवरी 2020 के दिल्ली दंगे अत्यंत वीभत्स दंगो में से एक थे। इस दंगे में मारे गए 53 निर्दोष लोगों में एक युवा आईबी अधिकारी अंकित शर्मा, पौढ़ी गढ़वाल से पांच महीने पहले आया गरीब माता का बेटा दिलबर नेगी और दो पुलिस कर्मी भी शामिल थे। ऐसे कुख्यात दंगों के अपराधियों को जमानत न मिलने पर सर्व साधारण में संतोष का भाव है किन्तु कुछ लोग इस पर भी तुष्टीकरण की रोटियां सेंकते हुए उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए न केवल आंसू बहा रहे हैं वरन अनर्गल प्रलाप भी कर रहे हैं ।

शरजील इमाम केवल दिल्ली दंगों का ही अपराधी नहीं है वरन चिकन नेक तोड़कर पूर्वोत्तर भारत को देश से अलग करने कि बात करने वाला देशद्रोही है । शरजील इमाम भारत को खंड -खंड मे विभाजित देखना चाहता हैं। भारत के जो विपक्षी दलो ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत ण मिलने पर उसको सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं क्या वे इन विचारों से सहमत हैं?

दरअसल उमर व शरजील के साथ खड़े लोग अपनी कुंठा और हताशा को ही जगजाहिर कर रहे हैं। इस कुंठित टोली मे कोई जमानत न मिलने को कायरता पूर्ण कार्रवाई कह रहा है तो कोई इसे बेतुका बता रहा है जबकि कोई इसे अत्याचार बता रहा है । एक ने तो सारी लज्जा त्यागते हुए इसे लोकतंत्र के लिए काला दिन बता दिया। एक व्यक्ति ने कहा कि 5 साल से अधिक बिना किसी दोष साबित हुए जेल में रखना बर्बरता बता दिया। यह बात भारतीय जनमानस के समझने योग्य है कि इन सेक्युलर नेताओं को सुप्रीम कोर्ट का फैसला बर्बर लग रहा है। अमेरिकी अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था कि जो अदालतों के अधिकार व उनके फैसलों को नकारता है वह राष्ट्र की नींव को नकारता है ।

इस तुष्टीकरण गैंग से पूछा जाना चाहिए कि आज देश में 4 लाख 34 हजार 302 विचाराधीन कैदी हैं जो सजा पाए बिना जेल में बंद हैं। करीब 26 हजार ऐसे कैदी हैं जो 3 से 5 साल तक जेल में बंद हैं और करीब साढ़े 11 हजार ऐसे कैदी हैं जो 5 वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं । यह आंकड़े केवल 2020 तक के ही हैं । इंडिया जस्टिस रिपोर्ट- 2025 के अनुसार यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है। इसमें भी अधिकांश बंदी जन गरीब, दलित अल्पसंख्यक व महिला समाज के हैं । इन कैदियों के लिए टुकड़े टुकड़े गैंग के समर्थकों का मन कभी नहीं छटपटाता है। यह लोग उन उमर खलिद और शरजील इमाम के लिए रो रहे हैं जिनकी जमानत के फैसले से पूर्व ही न्यूयार्क के मेयर ममदानी का एक आपत्तिजनक पत्र सार्वजनिक हो गया था। ममदानी के पत्र से पता चलता है कि भारत के खिलाफ कितनी गहरी साजिशें रची जा रही हैं। यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तार किया गया शरजील इमाम राष्ट्र द्रोही व घातक व्यक्ति है।

चिंता का विषय है कि उमर खालिद और शरजील इमाम के बचाव में अदालत में जो लोग खड़े हुए हैं वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं अपितु देश के पूर्व केंद्रीय मंत्री, वरिष्ठ काग्रेंस नेता और प्रभावशाली व्यक्ति हैं। इनमें कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, अश्विनी कुमार जैसे नाम शामिल हैं जिन्होंने कांग्रेस सरकार मेंं बडे मंत्रालय संभाले। इसके अतिरिकत सिद्धार्थ दवे, सिद्धार्थ लूथरा, त्रिदीप पैइस भी इनके वकील रहे।प्रश्न यह उठता है कि ”क्या यह केवल कानूनी सहायता है” या ”किसी विशेष मानसिकता का स्पष्ट संकेत ?”

यह सब चल ही रहा था तभी बीच में जेएनयू के ढपली वालों ने आकर ताल से ताल मिला दी। दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की जमीन से एक बार फिर देश के विरुद्ध आपतिजनक नारे लगे। दस साल पूर्व भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह -इंशा अल्लाह के नारे लगाए गएा थे उसी जगह “मोदी तेरी कब्र खुदेगी , अमित शाह तेरी कब्र खुदेगी खुदेगी“ जैसे आपत्तिजनक नारे लगाए गए। इस गैंग की नारेबाजी की वजह थी दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत की अर्जी का खारिज होना। कांग्रेस व उसके अन्य विरोधी दलों के नेताओं ने इस प्रदर्शन व नारेबाजी को गुस्से ,नाराजगी के प्रकटीकरण का तरीका बता दिया।

दिल्ली दंगो से सम्बंधित एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय दिल्ली में आप मुखिया अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री थे। दंगो की जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि हिंसा अचानक नहीं हुई थी आप पार्षद ताहिर हुसैन और विधायक अमानतुल्लाह खान की इसमें बड़ी भूमिका थी, इनकी जांच प्रगति पर है और अभी कोई बरी नहीं हुआ है। केजरीवाल मुख्यमंत्री रहते सरकारी तौर पर इन तत्वों को बचाने का पूरा प्रयास किया गया और उन्हीं की वजह से आज भी वह जमानत पर घूम रहे हैं । जब तक दिल्ली में केजरीवाल मुख्यमंत्री रहे तब तक उनकी ओर से दिल्ली दंगो की जांच में कोई सहयोग नहीं किया जा रहा था। अब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में संभव है फरवरी 2020 के पीड़ितों को न्याय मिल जाए ।

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