इच्छाशक्ति, नियति, करुणा और प्रेम का महाकाव्यात्मक आख्यान : दि ओडिसी

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प्रखर शर्मा

​दिल्ली। ‘दि ओडिसी’ की कथा मुख्य पात्र ओडिशियस के राजभवन से शुरू होती है, जहाँ कई विलासी आगंतुकों ने अपना डेरा डाल रखा है। वे सभी इस लालच में वहाँ जमे हैं कि किसी तरह यह साम्राज्य उन्हें मिल जाए। ओडिशियस समुद्र के रास्ते ‘ट्रॉय’ के युद्ध में गया था और लगभग 20 वर्षों से वापस नहीं लौटा है। भवन में ओडिशियस की उदात्त चरित्र वाली पत्नी (पेनेलोपे) मौजूद है, और वे अय्याश आगंतुक इस आस में टिके हैं कि रानी उनमें से किसी एक से विवाह कर ले। यहाँ विडंबना यह है कि रानी न चाहते हुए भी इन अय्याशों की खातिरदारी करने के लिए विवश है, क्योंकि ज्यूस (देवताओं के राजा) का नियम है कि द्वार पर आए अतिथि का आदर-सत्कार होना ही चाहिए—आगंतुक के वेश में देवता भी हो सकते हैं।

​आगे हम देखते हैं कि ओडिशियस की पत्नी और उसके बेटे (टेलीमैकस) के बीच संवाद होता है, जहाँ वह बेटे को समझाती है कि अभी उसमें राज्य सँभालने की परिपक्वता नहीं आई है। माता की इस बात से व्यथित होकर बेटा स्पार्टा जाने का मन बनाता है, क्योंकि स्पार्टा में कई ऐसे योद्धा हैं जो ट्रॉय को नेस्तनाबूद करने के बाद लौटे हैं। वहाँ उसे राजा और उनके परिजन मिलते हैं, जो ट्रॉय की तबाही की गाथा सुनाते हैं। वे उस काष्ठ-अश्व का ज़िक्र करते हैं, जिसके भीतर छिपकर उन्होंने ट्रॉय की प्राचीर में प्रवेश किया था और वहाँ की जनता का बेदर्दी से संहार किया था। प्रकारांतर से यह स्पष्ट होता है कि यह विनाशकारी युद्ध विश्व की सबसे सुंदर स्त्री ‘हेलेना’ के लिए लड़ा गया था। एक स्त्री के लिए इतना बड़ा संहार! जहाँ न बच्चे बख्शे गए, न स्त्रियाँ। इस निरर्थक हिंसा पर एक शायर की पंक्तियाँ याद आती हैं—

​मैं दुश्मनों से अगर जंग जीत भी जाऊँ तो उन की औरतें क़ैदी नहीं बनाऊँगा

तुम्हें पता तो चले बे-ज़बान चीज़ का दुख मैं अब चराग़ की लौ ही नहीं बनाऊँगा

​आगे चलकर इस विभीषिका और निरर्थक रक्तपात का गहरा पश्चाताप स्वयं ओडिशियस को भी होता है।

​युद्ध विजय के बाद सभी योद्धा समुद्र के रास्ते अपने-अपने घरों की ओर रवाना होते हैं, और यहीं से कथा के मूल दार्शनिक संदेश की शुरुआत होती है। उस दौर में सीमित संसाधनों के कारण समुद्री मार्ग अत्यंत भयानक और चुनौतीपूर्ण होते थे। ओडिशियस और उसके सैनिक जब इथाका (अपने राज्य) की ओर बढ़ते हैं, तो मार्ग में उन्हें जीवन के कड़वे सत्यों से रूबरू होना पड़ता है। यात्रा में आने वाले अतिमानव और दैत्य दरअसल जीवन की विकट कठिनाइयों और मानसिक व्याधियों के प्रतीक हैं। सफ़र के दौरान ओडिशियस को मृत आत्माओं से संवाद का अवसर मिलता है, जहाँ युद्ध में मारे गए योद्धा उसे जीवन का गूढ़ ज्ञान देते हैं। वे उसे सचेत करते हैं कि जब तुम अपने राज्य पहुँचो, तो छद्म वेष बनाकर जाना; पहले अपनी पत्नी की निष्ठा को परखना, फिर अपना भेद खोलना।

​इस पूरे महाकाव्यात्मक आख्यान में ओडिशियस के चरित्र और उसकी यात्रा को आकार देने में ‘नियति’ की सर्वोपरि भूमिका है। ओडिशियस का अपना परिवार छोड़कर ट्रॉय युद्ध में जाना महज़ उसकी व्यक्तिगत आकांक्षा नहीं थी, बल्कि नियति द्वारा तय किया गया एक ऐसा पथ था जिसे टाला नहीं जा सकता था। युद्ध के बाद ओडिशियस जब दस वर्षों तक भटकता है और कैलिप्सो (द्वीप की महिला) के निष्काम प्रेम व अमरता के आकर्षण में बंधता है, तब भी अंततः वह स्वयं को नियति के हाथों ही सौंप देता है और अपने देश की ओर बढ़ चलता है। ओडिशियस को यह गहरा बोध है कि मनुष्य कितना भी पराक्रमी क्यों न हो, वह नियति-चक्र से परे नहीं हो सकता। नियति ही उसे एक क्रूर योद्धा से एक संवेदनशील और चेतनावान मनुष्य में रूपांतरित करती है। जैसा कि कथा में संवाद भी आता है—“जो हमारी नियति में है वह हमें ज़रूर मिलता है और जो हमारी नियति में नहीं है वह हमें मिल भी जाए, फिर भी हमसे छूट जाता है।”

​इस कठिन यात्रा में ओडिशियस के कई साथी एक-एक कर मारे जाते हैं और अंततः एक प्रचंड तूफ़ान में सभी की मृत्यु हो जाती है। केवल ओडिशियस अधमरी हालत में एक अनजान तट (द्वीप) पर लगता है। वहाँ की एक महिला (कैलिप्सो) उसकी सेवा-शुश्रूषा कर उसे नवजीवन देती है और उससे अगाध प्रेम करने लगती है। किंतु, याददाश्त लौटने पर ओडिशियस उसे छोड़कर पुनः अपने राज्य लौट आता है। इसके बाद उस महिला का कोई ज़िक्र नहीं मिलता। यह बात खटकती भी है कि जिसने तुम्हें नवजीवन दिया, दस वर्षों तक अपने प्रेम की छाँव में रखा, उसके प्रति ऐसी उपेक्षा दुखी करती है। हालाँकि, यह द्वीप की महिला का निष्काम प्रेम ही था जिसने बिना किसी शर्त के ओडिशियस को संरक्षण दिया, जो प्रेम की असीम उदात्तता को दर्शाता है।

​यात्रा के अंत तक ओडिशियस को अपने सभी कर्मों के नैतिक-अनैतिक पक्षों का बोध हो जाता है। वह समझता है कि इस विशाल युद्ध को जीतने के बाद भी उसे क्या मिला—समुद्र का भटकाव? निर्दोषों की हत्या का पाप? या अपने सैनिकों को सम्मान न दे पाने वाले एक क्रूर सेनापति का कलंक?

​अंततः ओडिशियस अपने राज्य पहुँचकर छद्म वेष में उन सभी अय्याश अनाचारियों का अंत करता है। वह अपने पुत्र को राज्य सौंपता है और अपने दिवंगत साथियों को अंतिम सम्मान देने के उद्देश्य से पुनः सुदूर यात्रा पर निकल जाता है।

​समुद्र की भयावह परिस्थितियाँ वास्तव में जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्षों का रूपक हैं। इन परिस्थितियों से पार पाने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति अनिवार्य है। ओडिशियस अपने साथियों से इसी मामले में विशिष्ट है—जहाँ उसके साथी विपत्ति में अपनी इच्छाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण खो देते हैं, वहीं ओडिशियस स्वयं को साधे रखता है। देवी एथेना उसकी मार्गदर्शिका के रूप में दिखती हैं, जो प्रकारांतर से उसकी अपनी प्रखर इच्छाशक्ति और विवेक का ही प्रतीक हैं।

​इस आख्यान में पात्रों के चरित्र में अद्भुत उदात्तता और संवादों में गहरा कसाव है:

​ओडिशियस सत्य, धर्म और अपने कर्तव्य के प्रति कटिबद्ध दिखता है।​उसकी पत्नी (पेनेलोपे) का चरित्र असीम करुणा और धैर्य का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपने पति से दूर रहकर, दुधमुँहे बच्चे को सँभालते हुए बीस वर्षों तक साम्राज्य और अपनी निष्ठा की रक्षा करती है।​द्वीप की महिला का प्रेम समर्पण और उदात्तता की पराकाष्ठा है।
क्रिस्टोफर नोलन ने होमर के इस कालजयी महाकाव्य ‘द ओडिसी’ को जिस सिनेमाई संतुलन, भव्यता और गहराई के साथ निर्देशित किया है, वैसा काम पर्दे पर कम ही देखने को मिलता है। उन्होंने नियति और मानवीय संवेदनाओं के इस ताने-बाने को बहुत ही सुंदर ढंग से जीवंत किया है।

वह तब के पत्रकार थे , यह अब के पत्रकार हैं

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दयानंद पांडेय

दिल्ली । इंडियन एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका जब प्रभाष जोशी को संपादक बनाने के लिए दिल्ली के गांधी स्मारक निधि, राजघाट में उनके निवास पर उन से मिलने के लिए अचानक पहुंचे तो प्रभाष जी के पास गोयनका जी को बैठाने के लिए सही सलामत कुर्सी भी नहीं थी । एक ही कुर्सी थी जिस का एक पैर टूटा हुआ था । और उसे किसी तरह ईटा जोड़ कर टिका रखा था । जोशी जी ने सकुचाते हुए गोयनका जी को उसी पर बैठाया था । बाद के दिनों में जब जनसत्ता अपने उरुज पर था तब गोयनका जी जोशी जी का वेतन कुछ ज़्यादा ही बढ़ाना चाहते थे लेकिन जोशी जी ने एक शर्त रख दी कि अगर जनसत्ता के सभी सहयोगियों का वेतन बढ़ा दिया जाए उन के साथ तभी उन का वेतन बढ़ाया जाए । गोयनका जी चुप हो गए ।

बी जी वर्गीज को जब रामनाथ गोयनका ने इंडियन एक्सप्रेस का चीफ़ एडीटर बनाने का प्रस्ताव रखा साथ ही तब के समय में बीस हज़ार रुपए महीने वेतन का प्रस्ताव रखा । वर्गीज साहब ने गोयनका से कहा , यह तो बहुत ज़्यादा है । ज़्यादा से ज़्यादा दस हज़ार रुपए दे दीजिए । लेकिन गोयनका जी ने कहा कि हमारे यहां संपादकों का वेतन तो बीस हज़ार रुपए महीना ही है । उस समय तक वर्गीज साहब हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक रह चुके थे । प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार भी रह चुके थे ।

थोड़ा और पीछे चलते हैं । पंडित मदन मोहन मालवीय को राजा साहब कालाकांकर ने हिदोस्थान का संपादक बनाया । वेतन दिया दो सौ रुपया महीना । जो बहुत नहीं तो आज के दस लाख रुपए के बराबर समझ लीजिए । यह ब्रिटिश पीरियड की बात है । मालवीय जी ने राजा साहब से सिर्फ़ एक शर्त रखी और कहा कि आप जब कभी शराब पिए हुए हों तो मुझे भूल कर भी अपने पास नहीं बुलाएं , न मुझ से बात करें । जिस दिन आप ने यह शर्त तोड़ी , मैं अख़बार छोड़ दूंगा । राजा साहब ने सहर्ष यह शर्त स्वीकार ली । अखबार चल निकला । राजा साहब बहुत समय तक इस शर्त को निभाते रहे । एक रात उन्हों ने मालवीय जी को बुलाया । राजा साहब शराब पिए हुए थे । मालवीय जी उलटे पांव लौटे । और इस्तीफ़ा भेज दिया । समय बीतता रहा । बहुत समय बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दोनों की मुलाकात हुई तो मालवीय जी ने राजा साहब से कहा कि मैं ने आप के अख़बार से संपादक का दायित्व तो कब का त्याग दिया लेकिन आप मुझे वेतन नियमित क्यों भेजते जा रहे हैं । राजा साहब ने हाथ जोड़ कर मालवीय जी से कहा , मैं तब भी आप को वेतन नहीं भेजता था , न अब भेज रहा हूं । आप को संपादक का दायित्व दिया था , कर्मचारी नहीं बनाया था । बाक़ी मेरी ख़ुशी है , इसे बने रहने दें । और मालवीय जी को दो सौ रुपए महीना पूर्ववत भेजते रहे ।

अरविंद कुमार सरिता , मुक्ता , कैरवां वाले दिल्ली प्रेस में सहायक संपादक थे । सभी पत्रिकाओं के प्रभारी संपादक । दिल्ली प्रेस के स्वामी , प्रकाशक विश्वनाथ जी अरविंद जी के रिश्तेदार भी थे । अरविंद जी विश्वनाथ जी को अपना गुरु भी मानते हैं । इस दिल्ली प्रेस में अरविंद कुमार ने बाल श्रमिक के तौर पर कम्पोजीटर से भी नीचे बतौर डिस्ट्रीव्यूटर काम शुरू किया था । और इस मुकाम तक पहुंचे थे । लेकिन एक बार किसी बात पर विश्वनाथ जी उन से नाराज हो गए । उन के कमरे से कुर्सी निकलवा कर स्टूल रखवा दिया । सहयोगियों को उन से मिलने पर पाबंदी लगा दी । तरह-तरह से उन्हें तंग किया गया । इसी बीच टाइम्स आफ़ इंडिया ग्रुप की मालकिन रमा जैन ने उन्हें बुलाया और हिंदी फ़िल्मी पत्रिका माधुरी का संपादक बनने का प्रस्ताव दे दिया । अरविंद कुमार ने ज्वाइन करने के लिए थोड़ा समय मांग लिया । और इस विपरीत हालात में भी दिल्ली प्रेस नियमित जाते रहे । अंततः विश्वनाथ जी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्हों ने अरविंद जी से इस बात को स्वीकार करते हुए उन्हें उन का रुतबा वापस दे दिया । तब जा कर अरविंद जी ने अपना इस्तीफ़ा देते हुए उन से माधुरी जाने के लिए विदा मांगी । विश्वनाथ जी हतप्रभ रह गए यह जान कर कि टाइम्स आफ इंडिया के प्रस्ताव के बावजूद अरविंद जी विपरीत स्थितियों में भी दिल्ली प्रेस में बने रहे । खैर अरविंद जी मुम्बई गए और एक शानदार पत्रिका माधुरी निकाली। चौदह बरस बाद थिसारस पर काम करने के लिए माधुरी छोड़ दिया । पर यह प्रत्यक्ष कारण था । यह बात सब लोग जानते हैं । अरविंद जी ख़ुद भी यही बताते हैं । पर बहुत कम लोग जानते हैं कि अरविंद कुमार के माधुरी छोड़ने के पीछे एक अप्रत्यक्ष कारण भी था । यह कारण था कि तब के दिनों नवभारत टाइम्स से अक्षय कुमार जैन रिटायर होने वाले थे और प्रबंधन ने अरविंद कुमार को नवभारत टाइम्स का संपादक बनने का प्रस्ताव रखा था जिस पर अरविंद कुमार ने सहमति दे दी थी । लेकिन अक्षय जी रिटायर हुए तो अज्ञेय जी नवभारत टाइम्स के संपादक हो गए । अरविंद जी ने बिना कुछ इधर-उधर कहे-सुने माधुरी से चुपचाप इस्तीफ़ा दे कर थिसारस का काम शुरू कर दिया । यह एक पत्रकार , एक संपादक के स्वाभिमान का प्रश्न था । जिसे अरविंद कुमार ने ख़ामोशी से निभाया ।

किस्से और भी बहुतेरे हैं पत्रकारों , संपादकों और उन के स्वाभिमान के । उन की आन , बान और शान के ।

और आज के पत्रकारों के ?

आप ने देखा ही होगा कि आज लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता खड़गे ने ए बी पी न्यूज़ चैनल में मालिकाना हक बदलने के चलते चैनल से बाहर हुए दो एंकर सहित तीन लोगों का मामला बड़े जोर-शोर से उठाया । एन डी टी वी समेत तमाम चैनलों से , अख़बारों से हज़ारों लोग इधर निकाले गए हैं । कांग्रेस सहित किसी भी पार्टी ने यह मामला कभी संसद में क्यों नहीं उठाया । लाखो , करोड़ो के पैकेज पर काम कर रहे इन चैनलों के लोगों की आवाज़ संसद से सोशल मीडिया तक चौतरफा सुनाई दे गई । पर इन्हीं चैनलों और अख़बारों में बेचारे अल्प वेतन भोगी पत्रकारों की बात लोकसभा में कभी किसी ने उठाई क्या ? इन्हीं मीडिया संस्थानों में दिल्ली , मुम्बई , लखनऊ , पटना , भोपाल , चेन्नई , बेंगलूर आदि जगहों पर दिहाड़ी मजदूरों से भी कम पैसे तीन हज़ार , पांच हज़ार , दस हज़ार रुपए में हज़ारों लोग काम कर रहे हैं , किसी ने कोई सुधि क्यों नहीं ली । मजीठिया आयोग की सिफारिशें किसी मीडिया हाऊस ने क्यों नहीं अभी तक लागू किया । सुप्रीम कोर्ट में सैकड़ो लोग इस बाबत लड़ रहे हैं , लेबर कोर्टों में लड़ रहे है । क्या संसद के लोग नहीं जानते । नहीं जानते कि मीडिया हाऊसों ने सारे लेबर कोर्ट , सुप्रीम कोर्ट तक खरीद लिए हैं । लेकिन इस गूंगी , बहरी संसद को तब पता ज़रूर चलता है जब करोड़ो रुपए के पैकेज पर उन की कुत्तागिरी करने वालों के हितों को चोट पहुंचती है । धूमिल ने ठीक ही लिखा है :

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ–
‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’
मेरे देश की संसद मौन है।

यह पोस्ट दयानंद पांडेय जी की है, मुझे लगा कि कामकाजी दुनिया में आज प्रोफेशनलिज्म के नाम पर निष्ठा व समर्पण की कोई कीमत नहीं रह गई है, इसलिए साझा कर रहा हूँ।

संगठन का आधार 

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प्रकाश शर्मा

जयपुर : मुझे यह तो नहीं पता ये किसने लिखा है किसी निष्ठावान समर्पित कार्यकर्ता ने मुझे भेजा तो आत्ममंथन के लिए सबके ध्यान में लाने से स्वयं को नहीं रोक सका……..

आज सौ वर्ष के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की और बारह वर्ष लगातार केंद्रीय सत्ता में रहते हुए देश पर राज करने वाली भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती अपनी प्राथमिकताओं का बदलता हुआ मनोविज्ञान है।

ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें उन लोगों की स्वीकार्यता अधिक महत्वपूर्ण लगने लगी है जो या तो वैचारिक रूप से उनका विरोध करते हैं या उनके अस्तित्व से ही असहज रहते हैं।

दूसरी ओर, जो लोग वर्षों से उनके साथ खड़े रहे, संघर्ष किया, समर्थन दिया और कठिन समय में भी विश्वास बनाए रखा, वे कई बार स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं।

खैर यह केवल एक राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि मनुष्य के स्वभाव की भी एक पुरानी प्रवृत्ति है।

घर में माता-पिता अक्सर उस संतान पर अधिक ध्यान देने लगते हैं जो उनसे दूर हो गई हो, जबकि जो संतान हर परिस्थिति में साथ रहती है, उसे सहज मान लिया जाता है।

किसी व्यापारी को भी कई बार नए ग्राहक को आकर्षित करने की चिंता अधिक रहती है, जबकि पुराने और वफ़ादार ग्राहक की अपेक्षाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। परिणाम यह होता है कि नया ग्राहक भी पूरी तरह नहीं जुड़ता और पुराना भी धीरे-धीरे निराश होने लगता है।

समाज हो, संगठन हो या सियासत हो, यह मनोविज्ञान ही प्रभावी है।

यदि कोई दल अपने मूल समर्थकों को यह संदेश देने लगे कि उनका समर्थन तो “पक्का” है, इसलिए उनकी भावनाओं, अपेक्षाओं या असंतोष की चिंता कम की जा सकती है, तो यह दीर्घकाल में जोखिमपूर्ण रणनीति बन सकती है। क्योंकि किसी भी संगठन की सबसे बड़ी पूंजी उसका समर्पित कार्यकर्ता और उसका स्थायी समर्थक होता है, न कि केवल वह वर्ग जो परिस्थितियों के अनुसार कभी समर्थन दे और कभी विरोध।

भारतीय दर्शन में मृगतृष्णा का उदाहरण यूँ ही नहीं दिया गया है। हिरण दूर चमकती रेत को पानी समझकर दौड़ता रहता है, लेकिन जितना दौड़ता है, पानी उतना ही दूर दिखाई देता है। अंततः वह थक जाता है, जबकि वास्तविक जल किसी और दिशा में होता है।

राजनीति में भी यदि किसी संगठन का ध्यान केवल उन लोगों की स्वीकृति पाने पर केंद्रित हो जाए जो शायद कभी उसके साथ आने वाले ही नहीं हैं, तो वह अपने सबसे बड़े आधार को कमजोर करने का जोखिम उठा सकता है।

विस्तार करना अच्छी बात है, नए लोगों को जोड़ना भी आवश्यक है। लेकिन विस्तार की कीमत अपने मूल आधार की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। पेड़ की नई शाखाएँ तभी तक हरी रहती हैं, जब तक उसकी जड़ों को पर्याप्त जल मिलता रहे। यदि जड़ों को ही यह महसूस होने लगे कि अब उनकी आवश्यकता नहीं रही, तो सबसे पहले वही शक्ति क्षीण होती है जिसने उस वृक्ष को खड़ा किया था।

हर संगठन को समय-समय पर यह प्रश्न स्वयं से पूछना चाहिए—क्या हम उन लोगों को पाने की दौड़ में हैं जो शायद कभी हमारे नहीं होंगे, या उन लोगों का विश्वास भी उतनी ही गंभीरता से संभाल रहे हैं जिनकी निष्ठा ने हमें यहाँ तक पहुँचाया है?

यही प्रश्न किसी भी दीर्घकालीन संगठन की सफलता या संकट का आधार बनता है।

थोड़ा समय निकाल कर इसे अवश्य पढ़िए

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गिरीश जी जोशी

नागपुर।  विचारणीय है।
आखिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री अतुल लिमये ने युवाओं से CJP आंदोलन का अध्ययन करने का आग्रह क्यों किया?

आखिर इस आंदोलन में ऐसा क्या है जिसे आज के युवाओं के लिए समझना आवश्यक बताया गया?
इसका उत्तर श्री अतुल लिमये के भाषण में मिलता है। उनके मूल मराठी भाषण का सरल हिंदी सार इस प्रकार है-
आज जब CJP से जुड़ा आंदोलन सामने आया, तब यह और स्पष्ट हो गया कि युवाओं के बीच राष्ट्रीय दृष्टि से काम करने वाले संगठनों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि इस आंदोलन को केवल एक घटना मानकर नहीं देखना चाहिए। यह कई वर्षों से चल रही एक प्रक्रिया का परिणाम है। इसलिए इसका Case Study करना जरूरी है। इसके लिए हमें इसकी Chronology (घटनाक्रम), Methodology (कार्यपद्धति), Support System (समर्थन तंत्र), Network, Innovations (नए प्रयोग) और इसके पीछे की Ideology (विचारधारा) को समझना होगा।
आंदोलन कैसे आगे बढ़ा?
श्री लिमये के अनुसार, अभिजीत दिपके ने सबसे पहले ऑनलाइन माध्यम से CJP की शुरुआत की। शुरुआती दो-तीन दिनों में उसे अच्छा समर्थन मिला। इसके बाद वे 6 जून को भारत आए और 7 जून से आंदोलन शुरू किया। शुरुआत में अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिला।
फिर 7 जून से 19 जून तक वे देश के कई शहरों में गए, लेकिन वहाँ भी विशेष सफलता नहीं मिली। इसके बाद 20 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना शुरू हुआ और यहीं से आंदोलन का स्वरूप बदलने लगा।
यह बदलाव कैसे आया?
उनका कहना है कि इस प्रश्न का उत्तर आंदोलन से जुड़ी संस्थाओं और संगठनों की सूची देखने से मिलेगा। इससे यह समझा जा सकता है कि इसके पीछे किस प्रकार का Support Network काम कर रहा था।
चूँकि यह मुख्य रूप से युवाओं और विद्यार्थियों का आंदोलन था, इसलिए अनेक छात्र संगठन इससे जुड़े। इनमें AISA, SFI सहित कई अन्य छात्र संगठन सक्रिय रहे।
इसके अलावा मानवाधिकार, आदिवासी, महिला, मुस्लिम, ईसाई, किसान, मजदूर, पर्यावरण, पत्रकारिता और विधिक सहायता से जुड़े अनेक संगठनों ने भी इसमें भाग लिया या समर्थन दिया।
उनका प्रश्न था कि इतने विविध संगठनों को एक मंच पर लाने का काम किसने किया? यदि आंदोलन की कार्यप्रणाली को समझना है तो इस नेटवर्क का अध्ययन आवश्यक है।
आंदोलन की दिशा कैसे बदली?
श्री लिमये के अनुसार, यदि आंदोलन के मंच से दिए गए भाषणों, नारों और उसमें शामिल लोगों का अध्ययन किया जाए तो कई प्रश्न सामने आते हैं-
* कुछ मंचों पर हिंदू-विरोधी स्वर क्यों सुनाई दिए?
* विवादास्पद नारे लगाने या उनका समर्थन करने वाले लोग वहाँ क्यों उपस्थित थे?
* वामपंथी विचारधारा का प्रभाव कैसे बढ़ा?
* विभिन्न राजनीतिक दल इसमें कैसे जुड़े?
* एक छात्र आंदोलन धीरे-धीरे राजनीतिक आंदोलन में कैसे बदल गया?
* पूरे देश में एक जैसी गतिविधियों का समन्वय किस प्रकार हुआ?
* इसका विस्तार विदेशों तक कैसे पहुँचा?
इन सभी प्रश्नों का अध्ययन आवश्यक है।
वैकल्पिक राजनीति (Alternative Politics) की अवधारणा
उन्होंने योगेंद्र यादव के एक कथन का उल्लेख किया—
“भविष्य का लोकतंत्र केवल संसद नहीं, बल्कि सड़कें तय करेंगी। केवल चुनाव नहीं, बल्कि प्रतिरोध (Resistance) तय करेगा।”
श्री लिमये के अनुसार, इस कथन के पीछे की वैचारिक सोच को समझना आवश्यक है।
उनका कहना था कि किसी आंदोलन की शुरुआत किसी वास्तविक समस्या से हो सकती है, लेकिन बाद में उसका नेतृत्व और नियंत्रण किन शक्तियों के हाथ में जाता है, इसका विश्लेषण भी जरूरी है।
वामपंथी सोच और आंदोलन
उनके अनुसार, वामपंथी विचारधारा ऐसे आंदोलनों को Alternative Politics का सफल मॉडल मानती है।
इस सोच में यह माना जाता है कि लोकतंत्र द्वारा दिए गए अधिकारों-जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धरना, प्रदर्शन और आंदोलन-का उपयोग करके लोकतांत्रिक व्यवस्था को भीतर से चुनौती दी जा सकती है। इसे उन्होंने “Subversion of Democracy through Democratic Means” की अवधारणा से जोड़ा।
ग्राम्शी का सिद्धांत
उन्होंने इतालवी विचारक Antonio Gramsci की Cultural Hegemony (सांस्कृतिक वर्चस्व) की अवधारणा का उल्लेख किया।
उनके अनुसार, इस विचार में केवल आर्थिक संघर्ष पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और मूल्यों को भी चुनौती दी जाती है।
इसी संदर्भ में Deconstruction जैसी अवधारणाओं का भी उल्लेख किया गया, जिनके माध्यम से स्थापित परंपराओं, प्रतीकों और मान्यताओं पर प्रश्न उठाए जाते हैं।
आंदोलन की रणनीति
श्री लिमये के अनुसार, इस प्रकार की रणनीति में सामान्यतः कुछ चरण होते हैं-
* विभिन्न संस्थाओं में वैचारिक प्रवेश (Infiltration)
* संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमजोर करना
* Narrative War (विचारों की लड़ाई) चलाना
* शिक्षा, साहित्य, मीडिया, सिनेमा और विश्वविद्यालयों के माध्यम से वैकल्पिक सोच तैयार करना
* अंततः बड़े जन-आंदोलनों के माध्यम से दबाव बनाना
सामाजिक प्रभाव
उन्होंने कहा कि ऐसी विचारधाराओं का प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवहार पर भी पड़ता है।
उनके अनुसार, भारतीय संस्कृति स्त्री को मातृभाव से देखने की शिक्षा देती है, जबकि कुछ आंदोलनों में इसके विपरीत भाषा और व्यवहार देखने को मिला।
डॉ. आंबेडकर का संदर्भ
उन्होंने संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 को डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा दिए गए अंतिम भाषण का भी उल्लेख किया।
डॉ. आंबेडकर ने स्वतंत्र भारत में संवैधानिक मार्ग अपनाने पर बल दिया था और असंवैधानिक या हिंसक आंदोलनों से सावधान रहने की बात कही थी। उन्होंने इसे “Grammar of Anarchy” अर्थात अराजकता का व्याकरण कहा था।
युवाओं के लिए संदेश
अंत में श्री लिमये ने कहा कि यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है तो युवाओं की ऊर्जा सही दिशा में लगनी चाहिए।
युवाओं में राष्ट्रभक्ति, सेवा, सामाजिक उत्तरदायित्व और सकारात्मक नेतृत्व के संस्कार विकसित करना आवश्यक है।
ऐसे आंदोलनों को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय, सामाजिक और संवैधानिक दृष्टि से भी समझने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि इसका उत्तर केवल आलोचना नहीं है, बल्कि युवाओं के बीच सकारात्मक संवाद, राष्ट्रभावना, सेवा और समाज-निर्माण के कार्यों का व्यापक विस्तार करना ही सबसे प्रभावी मार्ग है।

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