बिहार उप चुनाव पर आई प्रतिक्रियाएं

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सुभाष चन्द्र लिखते हैं:

क्या बिहार की राजनीति नए समीकरणों की ओर बढ़ रही है?

बिहार की राजनीति एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनावों के बाद बदलते राजनीतिक समीकरणों को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। इन्हीं चर्चाओं के बीच एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि क्या राज्य में विपक्ष की राजनीति को नए सिरे से आकार देने की कोशिश हो रही है?

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विपक्ष में एक नया चेहरा मजबूत होकर उभरता है, तो पारंपरिक विपक्षी दलों के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है। वहीं दूसरी राय यह भी है कि यदि विपक्ष कई हिस्सों में बंटता है, तो इसका लाभ सत्तारूढ़ दल को मिल सकता है। ऐसे में यह चर्चा भी हो रही है कि क्या किसी नए राजनीतिक नेतृत्व के उभार से विपक्ष का स्वरूप बदलेगा या वह केवल पारंपरिक दलों की राजनीतिक जमीन को प्रभावित करेगा।

प्रशांत किशोर की सक्रिय राजनीति में भूमिका को लेकर भी कई तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि वे बिहार की राजनीति में नया विकल्प देने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि आलोचकों का आरोप है कि उनकी राजनीति अंततः विपक्षी वोटों के पुनर्वितरण का कारण बन सकती है। हालांकि, इन दावों के समर्थन में अभी कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें राजनीतिक अटकलों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या प्रशांत किशोर स्वयं को राज्य के प्रमुख विपक्षी चेहरे के रूप में स्थापित कर पाते हैं, या फिर पारंपरिक दल अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखते हैं। इतना तय है कि बिहार विधानसभा का आगामी कार्यकाल राजनीतिक रणनीतियों, आरोप-प्रत्यारोप और नए समीकरणों के लिहाज से काफी रोचक रहने वाला है।

राजनीति में अंतिम फैसला जनता के जनादेश से ही तय होता है। इसलिए वर्तमान में चल रही तमाम चर्चाओं और कयासों का वास्तविक उत्तर आने वाले चुनावी परिणाम ही देंगे।

कर्मेंन्दु शिशिर लिखते हैं :

बाँकीपुर पटना की सीट अगर प्रशांत किशोर जीत जाते हैं, जैसी प्रबल उम्मीद है। लगभग निश्चित,तो यह बिहार के लिए एक चमत्कार ही होगा।

चमत्कार इसलिए कि बिहार जाति और  धर्म से मुक्त विचारधारात्मक लड़ाई लड़ता तो है लेकिन चुनाव में जाति निर्णायक हो जाती है। इस बार अलग होने जा रहा है।यह बहुत ही स्वागत योग्य है। जब-जब बिहार ने चुनाव में ऐसा किया है, बड़ा बदलाव हुआ है। बिहार में जाति की जकड़न इतनी प्रबल है कि यहाँ के बुद्धिजीवी तक इसका खुलकर लाभ उठाते हैं।आप अपराधी-शिरोमणि रहिए या शीर्ष भ्रष्टाचारी आपको भरपूर समर्थन मिल जायेगा।इसलिए यहाँ लूट की छूट जातिगत समर्थन पर निर्भर है । पूर्व सवर्ण अपराधियों और भ्रष्टाचारियों से लेकर आज तक इसकी परंपरा बदस्तूर कायम है।

मेरे सहपाठी और परिचितों में भी जिनके पास पटना में रात को टिकने की जगह नहीं होती थी ,आज अरबपति हैं।डंके की चोट पर वे और उनके समर्थक इस तरह उनके पक्ष में सशस्त्र रहते हैं कि अगर आपने उनके सच की चर्चा कर दी तो आपको वे लहूलुहान कर सकते हैं।

ऐसे समय में प्रशांत किशोर की जीत एक उम्मीद तो जगाती ही है। लेकिन यह जीत भी बहुत उत्साहित करने वाली साबित होगी ही, ऐसा नहीं है।प्रशांत किशोर हर घाट का पानी पी चुके हैं। इनका लिंक कहाँ है, कोई नहीं जानता।जो आदमी यह कहे कि उसकी कोई विचारधारा नहीं, वह सबसे खतरनाक विचारधारा वाला है।जनता प्रवाह में बह जाती है। सम्राट चौधरी और भाजपा अध्यक्ष के गरूर को मरोड़ने के नजरिए से इस निश्चित संभावित जीत का खूब स्वागत होना चाहिए।

रुद्र विक्रम सिंह लिखते हैं :

दतिया और बांकीपुर विधानसभा सीट के परिणाम ने ये बता दिया कि भाजपा के उस दौर की धीरे धीरे समाप्ति हो रही है जिसमे गधे घोड़े सब जीत जाया करते थे,
समय रहते अगर आपने प्रदेशों में जो सांकेतिक मुख्यमंत्री बनाये रखे हैं उन्हें नहीं बदला गया तो परिणाम ऐसे ही होंगे !

राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की वो सीट जिसपर भाजपा 1995 से कभी नहीं हारी वहाँ हारना यह बताता है कि डमी अध्यक्ष और कैंडिडेट्स को अब जनता नकारना सीख गई है !
प्रशांत किशोर को बधाई, आशा है बिहार में अब मुद्दों के बात की शुरुआत होगी !

विनय चतुर्वेदी लिखते हैं :

सच बतायें, बांकीपुर ने क्या कहा ….
भाजपा ने सही उम्मीदवार नहीं दिया।
कायस्थ को ही टिकट देना था, तो किसी योग्य को देते।
सम्राट मुख्यमंत्री पद के योग्य नहीं।
तेजस्वी विपक्षी नेता के योग्य नहीं।
विधानसभा में एक गरजने वाला विपक्षी नेता होना चाहिए।
किसी को टिकट देंगे और सोचेंगे कि वह जीत जायेगा, यह भ्रम है।
सही विकल्प दिखा, तो आपको ऐसे ही टाटा-बाय बाय कर देंगे।
अहंकार कम करें और जितना शीघ्र हो, धरातल पर लौटें।
विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष की क्षमता यही है।
कोर वोटरों को परेशान करने का यहीं हस्र होता है।
कोई भी सीट किसी जाति या पार्टी की बपौती नहीं होती।

देवांशु झा लिखते हैं :

दीदीजी कह रही हैं कि परसांत किसोर भाजपा का लोमड़ी है। परसांत किसोर के समर्थक कह रहे हैं कि बिहार में अब सूराजे सुराज है। सुवर्ण परतिसोध! दूसौदू सीट जो जीते थे सब सुन्ना हो गया। दतिया में जुबराज का जलवा काम कर गया है। परिबर्तन और किरांती के बीच बिनोदबा कह रहा है कि हम को हाॅग के जाना है नहीं तो पैंटे में हाॅग देंगे! देसभक्त लोग अलगे गरज रहे हैं। बोले रनबीर कपुरवा गाय खाया है ऊ राम बनेगा रे…गोभिल जी ही आखरी राम हैं! समाप्त. दी अंड

पटना से गौरव राय की टिप्पणी :

जो प्रशांत पाड़े के समर्थक है आप पेज से जा सकते हैं। चाहे कोई भी हो न मैं आपका रोज़ी रोटी चलाता हूँ न आप मेरा।

न मुझे लाइक और सब्सक्राइब से पैसा चाहिए न लेता हूँ। सार्वजनिक जीवन में अपनी सुनता हूँ और नफ़ा नुक़सान अब इस उम्र में कोई मायने नहीं रखता। गाली बकोगे गाली सुनना ही होगा उन फ्रेंड उन फ़ॉलो का डर तनिक नहीं है। पाँच मित्र रहेंगे न उसमे भी मैं ख़ुश रहूँगा।

प्रियरंजन कुमार शर्मा लिखते हैं :

बाँकीपुर पिछले 30 साल से भाजपा का गढ़ रहा था। विश्व की सबसे बड़ी पार्टी का मुखिया और उसका परिवार इसी क्षेत्र से लगातार जीतता आ रहा था। इस बार के उपचुनाव में भी सब कुछ झोंक दिया गया था। हर मोहल्ला में जोरदार प्रचार करने के लिए भाजपा के 4-5 दिग्गज उतार दिए गए थे।
बावजूद इनके, भाजपा हार गई। वह भी किससे? उस ‘जन सुराज’ से, पिछले विधानसभा चुनाव में जिसके जीरो प्रत्याशी जीते थे। जिस पार्टी के 238 उम्मीदवारों में से 236 की जमानत ही जब्त हो गई थी।
यह तगड़ा झटका लगना जरूरी भी था। भरत तिवारी एनकाउंटर के मामले में बिहार सरकार संवेदनहीनता की चरम सीमा को पार कर गई थी। जबकि एक अंधा भी साफ साफ महसूस कर सकता था कि इस मामले को लेकर यहाँ की जनता में कितना उबाल है। क्या पिछड़ा, क्या दलित, और क्या सामान्य वर्ग सब एकजुट हो गए थे। यहाँ तक कि खुद भाजपा और उनके सहयोगी दलों के ही कई दिग्गज नेता अपनी सरकार के खिलाफ मुखर हो गए थे।
यूजीसी, पेपर लीक, सीबीएसई आदि मुद्दे की चिंगारी तो कबसे सुलग ही रही थी।
प्रशांत किशोर मौके की नजाकत को भांपकर ही इस उपचुनाव में स्वयं प्रत्याशी बन गए थे। अन्यथा सोचने वाली बात है कि पिछले विधानसभा चुनाव में उसने अपने 238 नेताओं को उतार दिया था, लेकिन खुद उस पार्टी का लीडर होकर भी उम्मीदवार नहीं बने थे। जबकि उसकी पार्टी पहली बार ही किसी चुनाव में उतरी थी।
ऐसे में, घोर आश्चर्य है कि भाजपा तत्कालीन माहौल को कैसे भांप नहीं पाई थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह भांपकर भी घमंड में चूर-चूर होने के कारण हवा में उड़ रही थी?
खैर, कारण जो भी हो, भाजपा वह पार्टी है जो अपने हर एक हार पर पूरी गहराई से मंथन करती है। अपनी हार का ठीकरा ईवीएम पर नहीं फोड़ती है। उम्मीद है कि वह इस हार को लेकर भी करेगी, और उस मंथन से मिले परिणामों से सबक लेकर अपनी उक्त गलतियों में सुधार करेगी।

पवन विजय लिखते हैं :
सामान्य वर्ग और नए वोटर का विश्वास डांवाडोल है, बाकी समूह पहले से ही किसी और नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्ध हैं, सर  के बल खड़े हो जाओ, इक्का दुक्का ही आयेंगे लेकिन उसके चक्कर में आपका कोर वोट भसक जाएगा।

दतिया और बांकीपुर एक सबक है, यदि कोई इससे सीख गया तो समझिए दऊ सीधे है।

संघ प्रार्थना : गीता के परिप्रेक्ष्य में’ पुस्तक का लोकार्पण सम्पन्न

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राजीव तुली

दिल्ली। सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. मार्कंडेय आहूजा की पुस्तक ‘संघ प्रार्थना : गीता के परिप्रेक्ष्य में’ का लोकार्पण समारोह 3 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित विचार विनिमय न्यास सभागार, केशव कुंज, झंडेवाला में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह श्री (डॉ.) कृष्ण गोपाल मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे, जबकि प्रख्यात गीता मनीषी एवं जीओ गीता के संस्थापक स्वामी श्री ज्ञानानन्द महाराज ने अपना आशीर्वचन प्रदान किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में सुरुचि प्रकाशन के प्रबंध निदेशक रजनीश जिंदल ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और सुरुचि प्रकाशन की साहित्यिक यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि देशभर के 150 से अधिक पुस्तक-विक्रय केंद्रों और ऑनलाइन माध्यमों के द्वारा विभिन्न विषयों पर आधारित 600 से अधिक शीर्षक पाठकों के लिए उपलब्ध हैं।

इस अवसर पर पुस्तक के लेखक डॉ. मार्कंडेय आहूजा ने पुस्तक की रचना-प्रक्रिया और उसके मूल उद्देश्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ प्रार्थना केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि वह भारतीय जीवन-दृष्टि, राष्ट्रचेतना, कर्तव्यबोध और आध्यात्मिक मूल्यों का सजीव घोष है। उन्होंने यह भी बताया कि पुस्तक में भगवद्गीता के आलोक में संघ प्रार्थना के विविध आयामों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

अपने उद्बोधन में डॉ. कृष्ण गोपाल ने भारतीय चिंतन की परंपरा, गीता के सार्वकालिक संदेश और राष्ट्रजीवन में प्रार्थना के महत्त्व पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गीता ने विश्व के सामने एक नवीन प्रकार का दर्शन प्रस्तुत किया है। गीता मनुष्य को उसके कर्तव्य का बोध कराती है। उन्होंने कहा कि लेखक ने पुस्तक की कुछ पंक्तियों के माध्यम से उस भाव को जागृत करने का प्रयास किया है, जिसकी आज आवश्यकता है। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मोह का निवारण किया था, उसी प्रकार यह पुस्तक स्वयंसेवकों के मन में कर्तव्य और राष्ट्रभाव को जागृत करने का कार्य करेगी।

स्वामी श्री ज्ञानानन्द महाराज ने उपस्थित जनों को गीता के संदेश को अपने जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि संघ की प्रार्थना का मूल भाव गीता के संदेश से ही प्रेरित है और उसका उद्देश्य मन पर पड़े अज्ञान के आवरण को दूर करना है। उन्होंने इस संदर्भ में सूर्य और बादलों का उदाहरण देते हुए कहा कि सत्य सदैव विद्यमान रहता है, आवश्यकता केवल उसके आवरण को हटाने की होती है। अपने आशीर्वचन के अंत में उन्होंने उपस्थित सभी लोगों से सामूहिक प्रार्थना कराई तथा लेखक और प्रकाशक को शुभकामनाएँ दीं।

कार्यक्रम के अंत में सुरुचि प्रकाशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अंकुर पाठक ने सभी अतिथियों और उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली, न्यासी मनमोहन सिंह, सुमित मालूजा और राहुल सिंह सहित शिक्षा, साहित्य, अध्यात्म तथा सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। अतिथियों ने पुस्तक की विषयवस्तु की सराहना करते हुए इसे भारतीय चिंतन को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कृति बताया।

कार्यक्रम का संचालन संपूर्ण बागड़ी ने किया तथा वन्दे मातरम् के सामूहिक गायन के साथ समारोह का समापन हुआ।

भाजपा से कहाँ हुई भूल 

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प्रियांक / कल्पेश पटेल
बाँकीपुर में भाजपा के पास योग्य उम्मीदवारों की कमी नहीं थी। किन्तु यदि मजबूत एवं योग्य व्यक्ति भाजपा से चुनाव जीतता तो हो सकता था कि वह आगे जम जाता! ऐसे में कभी वापस आना होता वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष जी को तो फिर दिक्क़त हो जाती!

इसलिए भाजपा के “थिंक टैंक” (??) ने सोचा कि बाँकीपुर तो अब इतनी सुरक्षित सीट है कि यदि वहाँ से कुत्ता-बिल्ली किसी को खड़ा कर देंगे तो वह चुनाव जीत ही जाएगा! एक तरह से बाँकीपुर के मतदाताओं को यह बेइज्जती ही महसूस हुई होगी कि हम लोगों का प्रतिनिधि इतना गया-गुजरा बन सकता कि किसी को भी खड़ा कर दो तो वह जीत जाएगा!

बस यहीं से अक्खड़ किन्तु भाजपा के कमजोर उम्मीदवार से लाख गुना बेहतर प्रशांत किशोर जी को बाँकीपुर के मतदाताओं ने चुन लिया! अब यहाँ से PK यदि अपने अक्खड़पन को छोड़ आगे बढ़ जाए तो बिहार में भाजपा का तो फिलहाल नहीं, किन्तु एक मजबूत विपक्ष शनै: शनै: तैयार हो जाएगा और राजद की परिवारवादी राजनीति केवल उसके जातीय समर्थकों तक ही सीमित रह जाएगी! बाकी काम AIMIM कर देगी।

यदि भाजपा ने अब भी खुद को नहीं संवारा और मन ही मन कमजोर विपक्ष के कारण भविष्य में भी जीतने का सपना देखती रही तो आगे PK बिहार की राजनीती में पकड़ बना सकते हैं। इसलिए PK भी समझ रहे होंगे कि एक जो उनका काम है चुनावों में राजनीतिक दलों का मैनेजमेंट संभालना, या फिर अब विधायक बनने के बाद यहाँ से आगे निकल कर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को विस्तार देना, दोनों में कोई एक राह अब चुन ले!

व्यक्तिगत रूप से बाँकीपुर से अयोग्य भाजपा उम्मीदवार का हारना मुझे सुकून दे रहा क्योंकि यदि यह अयोग्य उम्मीदवार जीत जाता तो यह मतदाताओं की संकीर्णता को ही दर्शाता तथा भाजपा और Arrogant हो जाती! अच्छा हुआ हारी। स्वस्थ लोकतंत्र हेतु यह जरुरी है जब आप लोकतंत्र को अपनी दुकान समझने लगे तो!

ऐसा नहीं कि भाजपा कोई बहुत बेस्ट है… बस यह सभी खराबों में सबसे कम खराब है! वह भी इसलिए कि आज भी यही इकलौती पार्टी है जिसके हारने पर चीन और पाकिस्तान खुश होंगे बाकी विपक्षियों के साथ! मेरे लिए अपनी तमाम कमियों के बावजूद, सनद रहे, तमाम कमियों के बावजूद फिलहाल यह कामचलाऊ ठीक है बाकियों की तुलना में!

हालांकि पेपर लीक न रोक पाना, कोई भी भाजपा ज्वाइन कर लेने के बाद दूध का धुला हो जाना, योग्यता से ज्यादा अब यहाँ भी चाटुकारिता, धन एवं तीन-पांच पर जरुरत से ज्यादा बल देना, बाकी राजनीतिक दलों की तरह ही केवल चुनाव जीतने पर हद से ज्यादा Involve रहना इत्यादि इसकी बड़ी कमियाँ हैं।

बाकी जिनको लगता है कि राहुल गाँधी जी के डिंपल बनते गाल में इसलिए उनको PM होना चाहिए या भाजपा EVM के कारण जीतती है, तो उनकी बुद्धि पर तरस ही आता है! एक मजबूत योग्य विपक्ष होता तो भाजपा पिछला चुनाव ही हार जाती। पर विपक्ष का रद्दी होना और तुष्टीकरण का वाहक होना, भाजपा को वाकओवर दे जाता है!

भारत में ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ का औचित्य…?

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– प्रशांत पोळ

दिल्ली । 09  अगस्त को ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ (World Indigenous Day) हैं. सन १९९४ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस दिवस की घोषणा की थी. इस कल्पना को लेकर सन १९८२ में Working Group on Indigenous People इस समूह की पहली बैठक ९ अगस्त को हुई थी. इसलिए ९ अगस्त को ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ मनाया जाता हैं.

इसके पीछे संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका बड़ी स्पष्ट हैं. उनके अनुसार विश्व के लगभग ९० देशों में ४७.६ करोड़ मूल निवासी रहते हैं, जो विश्व की जनसंख्या के ५% के बराबर हैं. किन्तु दुनिया भर के गरीबों में मूल निवासियों की संख्या १५% हैं. ऐसे मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए, उनका जीवन स्तर बढ़ाने के लिए, संयुक्त राष्ट्र संघ, यह दिवस मनाता हैं.

प्रश्न हैं, मूल निवासी कौन हैं ? हम सभी जानते हैं, की सन १४९२ में भारत जाने के प्रयास में, कोलंबस अमेरिका पहुच गया. पहुचने के बाद उसे लगा, यही ‘इंडिया’ हैं. इसलिए वहां पहले से जो लोग रहते थे, उन्हे ‘इंडियन’ नाम दिया गया. बाद में कोलंबस की गलतफहमी दूर हुई और उसे पता चला की यह इंडिया (भारत) नहीं हैं. किन्तु वहां के मूल रहिवासियों को दिया गया नाम, ‘इंडियन्स’, वैसे ही चलता रहा. पहले उन्हे ‘रेड इंडियन्स’ कहा जाता था. आज ‘अमेरिकन इंडियन्स’ (या नेटिव अमेरिकन्स) कहा जाता हैं.

ये हैं मूल निवासी..!

१४९२ मे, जब सबसे पहले कोलंबस के साथ युरोपियन्स वहां पहुचे, तब वहां के मूल निवासी, अर्थात अमेरिकन इंडियन्स की संख्या, हेनरी डोबीन्स (Henry F Dobyns) के अनुसार १ करोड़ ८० लाख थी. जनसंख्या वृध्दी के अनुपात के अनुसार, आज यह संख्या १५ करोड़ के लगभग होना चाहिए थी. लेकिन पिछले चार सौ / पांच सौ वर्षों में, अमेरिका में बसने आए अंग्रेज़, फ्रेंच, स्पेनिश आदि युरोपियन्स ने इन मूल निवासियों पर जबरदस्त अत्याचार किए, उनका वंशच्छेद किया. कई फैलने वाली बीमारियां इन ‘इंडियन्स’ के बीच लायी गई, जिनके कारण बड़ी संख्या में ये अमेरिकी इंडियन्स चल बसे. इन सबके कारण २०१० की अमेरिकी जनगणना के अनुसार, इन मूल निवासियों की संख्या हैं, ५५ लाख, जो अमेरिकी जनसंख्या की १.६७ % मात्र हैं.

ये हैं अमेरिका के मूल निवासी…!

ऑस्ट्रेलिया में सर्वप्रथम सन १७७० में जेम्स कुक यह ब्रिटिश सेना का लेफ्टिनेंट पहुचा. तब ब्रिटिश सरकार, अपने कैदियों को रखने के लिए एक बड़ा सा द्वीप खोज रही थी. जेम्स कुक और उसके साथी जोसेफ बैंक्स के कहने पर ब्रिटिश सरकार ने ऑस्ट्रेलिया यह द्वीप इस कार्य के लिए निश्चित किया. १३ मई १७८७ को ११ जहाजों में भरकर, डेढ़ हजार से ज्यादा अंग्रेज़, इस द्वीप पर पहुचे, इनमे ७३७ कैदी थे. ऑस्ट्रेलिया में उपनिवेशवाद की यह शुरुआत थी.

उस समय ऑस्ट्रेलिया में जो मूल निवासी रहते थे, वे दो प्रमुख समूहों में थे. उनके नाम भी इन अंग्रेजों ने ही रखे. वे थे – Torres Strait Islanders और Aboriginal. दोनों को मिलकर, उन दिनों उनकी कुल संख्या थी, दस लाख से ज्यादा. जनसंख्या वृध्दी के अनुपात के अनुसार, आज वह साठ लाख से ज्यादा होना चाहिए थी. लेकिन २०१६ की जनगणना के अनुसार यह मात्र सात लाख नब्बे हजार हैं, जो ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या का ३.३ प्रतिशत हैं.

ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की संख्या इतनी कम कैसे हुई..? वही, जो अमेरिका में हुआ. बर्बरता से किया गया इन मूल निवासियों का नरसंहार और बाहर के देशों से आए हुए अनेक रोगों के कारण इन मूल निवासियों की स्वाभाविक दिखने वाली मृत्यु.

अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों में मूल निवासियों की हालत अत्यंत खराब थी. इन युरोपियन्स ने उनको कही का नहीं छोड़ा था. अमेरिका ने उनको ‘सिविलियन’ बनाने की ठानी. पहले राष्ट्राध्यक्ष, जॉर्ज वॉशिंग्टन के जमाने से इन मूल निवासी अर्थात ‘अमेरिकन इंडियन्स’ को जबरदस्ती ‘सिविलियन’ बनाने की नीति आज तक जारी हैं. इन सारे मूल निवासियों को इन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने जड़ों से तोड़ा हैं. वे कही के नहीं बचे हैं. अनेक अमेरिकी मूल निवासी, आज गरीबी रेखा के अंदर आते हैं.

ये ऐसे वंचित और उपेक्षित लोगों के लिए हैं, ‘मूल निवासी दिवस’!

*भला भारत में इस दिवस का क्या औचित्य ? यहां तो हम सभी मूल निवासी हैं. हां, मुस्लिम आक्रांता जरूर आए थे बाहर से. ईरान (पर्शिया), इराक, अफगानिस्तान, तुर्कस्तान, किर्गिस्तान, उजबेकिस्तान… आदि अनेक देशों से. तो संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार चले तो, इन आक्रांताओं को छोडकर, भारत में सभी मूल निवासी हैं.*

बाहर से आए तो अंग्रेज़ भी थे. किन्तु १९४७ में स्वतंत्रता मिलने के पश्चात वे भारत छोडकर चले गए.

*तो फिर भारत में इस ‘विश्व मूल निवासी दिवस’ का बहुत ज्यादा औचित्य नहीं होना चाहिए. विश्व के अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के मूल निवासियों के हक के प्रति सहानुभूति और समर्थन, इतनी सीमित भूमिका हमारी होनी चाहिए थी.*

किन्तु ऐसा हुआ नहीं.

आजकल अपने देश में भी यह दिवस मनाने का चलन प्रारंभ हुआ हैं. अनेक राज्य इसे ‘आदिवासी दिवस’ के रूप में मनाते हैं. छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश जैसे राज्य तो कुछ वर्ष पहले तक, ९ अगस्त को ऐच्छिक अवकाश घोषित करते थे.

यह सब कैसे हो गया…?

इसका उत्तर हैं, वामपंथियों की एक बहुत सोची समझी रणनीति के कारण.

अब इसमे वामपंथ कहां से आया ?

वामपंथ की मूल सोच हैं, समाज में वर्गसंघर्ष खड़ा करना. प्रस्थापित व्यवस्था के विरोध में संघर्ष निर्माण करना. इस संघर्ष से अराजक फैलेगा और अराजकता में ही क्रांति के बीज होते हैं. इसलिए इसमे से सर्वहारा क्रांति होगी ! अर्थात वर्गसंघर्ष के लिए ‘मूल निवासी दिवस’ एक अच्छा साधन हैं. इसका पूरा फायदा वामपंथी विचारकों ने उठाया.

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ‘मूल निवासी दिवस’ की घोषणा होने के बाद, अपने देश में ‘आदिवासी ही इस देश के असली (मूल) नागरिक हैं, और बाकी सारे बाहर से आए हैं’ यह विमर्श चल पड़ा. ‘आर्य बाहर से आएं’ यह सिध्दांत तो प्रस्थापित था ही, जो शालाओं में भी पढ़ाया जाता था. यह सिध्दांत अंग्रेजों ने बनाया. उन्होने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि देशों में जाकर, वहाँ के मूल निवासियों को भगाकर या मारकर अपना साम्राज्य प्रस्थापित किया था. इसलिए ‘भारत में भी सारे बाहर से ही आएं हैं, तो अंग्रेजों के आने से कोई फरक नहीं पड़ता’ यह उस सिध्दांत का आधार था.

किन्तु स्वतंत्रता मिलने के बाद भी, हमारे वामपंथी विचारकों द्वारा इस प्रकार का विमर्श खड़ा करना यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण था. आज से चौदह वर्ष पहले, अर्थात १२ जनवरी, २०११ को ‘द हिन्दू’ इस अंग्रेजी समाचार पत्र में एक आलेख छपा, “India, largely a country of immigrants’. इस में कहा गया, “If North America is predominantly made up of new immigrants, India is largely a country of old immigrants. इस में ज़ोर देकर प्रतिपादित किया गया हैं, की इस देश के मूल निवासी तो केवल आदिवासी ही हैं, जो ८ % हैं. बाकी सारे ९२ % लोग बाहर से आए हुए हैं. These facts lend support to the view that about 92 per cent of the people living in India are descendants of immigrants.“

इस बात का आधार क्या हैं…?

अंग्रेजों ने लिखी हुई, The Cambridge History of India (Volume 1) का उध्दरण इस आलेख के लिए लिया गया हैं.

इससे बड़ा व्यंग क्या हो सकता हैं…? ऐसे अनेक आलेख पिछले कुछ वर्षों में माध्यमों में आए हैं. ‘आर्य बाहर से आए’ यह विमर्श अब गलत साबित हुआ हैं. सारे तथ्य, प्रमाण और DNA की जांच से यह सिध्द हुआ हैं, की हम सब इसी भारत देश के मूल निवासी हैं. इसके ठीक विपरीत, OIT (Out ऑफ India Theory) की मान्यता बढ़ रही हैं. इस सिध्दांत के अनुसार भारत जैसे संपन्न देश से, कुछ समुदाय भारत से बाहर स्थलांतरित हुए हैं. केल्टिक समुदाय, येजीदी समुदाय इनके उदाहरण हैं. कोनराड ईस्ट जैसे विचारकोंने इसे प्रतिपादित किया हैं.

संयुक्त राष्ट्र संघ, लगभग पांच सौ से एक हजार वर्षों में, जिन देशों में बाहर से आए लोगों ने सत्ता और शासन प्राप्त किया, उन्ही देशों के मूल निवासियों को यह ‘मूल निवासी’ का दर्जा दे रहा हैं. किन्तु अपने देश में तो वेद / उपनिषद / पुराण कई हजार वर्ष पहले के हैं. सारे उदाहरण, सारे प्रमाण, सारे तथ्य कम से कम आठ / दस हजार वर्षों तक के इतिहास तक हमे पहुचाते हैं. *अर्थात मुस्लिम आक्रांताओं का अपवाद छोड़ा तो हम सभी मूल निवासी हैं.*

और जिन्हे ‘आदिवासी’ कहा जाता हैं, वे ‘आदिम युग’ में जीने वाले आदिवासी नहीं हैं, अपितु वनों में, ग्रामों में रहने वाले ‘जनजातीय समाज’ हैं. ये अत्यंत प्रगत और प्रगल्भ समाज हैं. इनका जल व्यवस्थापन, इनका समाज जीवन, इनका पर्यावरण के साथ जीना…. सभी अद्भुत हैं. लगभग पांच सौ वर्ष पहले, हमारे गोंडवाना की वनवासी रानी दुर्गावती, बंदूक चलाने में माहिर थी. ऐसा समाज वंचित, शोषित कैसा हो सकता हैं ? इसलिए मूल निवासियों में मामले में हमारी तुलना अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ करना गलत और अन्यायपूर्ण हैं.

एक गहरी साजिश के तहत, भारत में ‘मूल निवासी दिवस’ को ‘आदिवासी दिवस’ बनाया गया हैं. यह देश की एकता तोड़ने वाला कृत्य हैं. इसे पूरी ताकत लगाकर रोकना चाहिए. भारत में हम सभी मूल निवासी हैं, यही सत्य हैं और यही भाव होना चाहिए..!

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