मुगल सत्ता का स्याह सच धर्मांतरण की जिद और साहिबजादों का बलिदान

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । इतिहास जितनी बार दोहराया जाए हर बार कोई न कोई सबक सिखाता है, कुछ तिथियां इतिहास की ऐसी होती हैं जिन्‍हें आप चाहकर भी भूला नहीं सकते हैं । ऐसा ही दिन आज का है जब सत्ता ने अपने मजहब को हथियार बनाया और छोटे मासूम बच्‍चों तक की हत्‍या करने में देरी नहीं की। मध्यकालीन भारत में इस्‍लामिक मुगल शासन के दौर में गैर मुसलमानों पर अनेक जुल्म ढाए गए। करों दंडों और भय के सहारे जबरन मजहबीकरण (धर्मांतरण) की कोशिशें की गईं। इसी अंधकार में दो नन्हे दीपक साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह ऐसे जले कि अत्याचार की दीवारें भी कांप उठीं। उनका हुतात्‍मा हो जाना आज सिर्फ सिख इतिहास भर नहीं है, यह घटना भारतीय आत्मसम्मान की अमिट गाथा है।

मुगल साम्राज्य में जजिया जैसे कर मंदिरों पर आक्रमण तीर्थों पर प्रतिबंध और विद्रोह कुचलने के लिए प्रलोभन के सहारे धर्मांतरण की नीति अपनाई गई। इसी पृष्ठभूमि में सिख पंथ अन्याय के प्रतिरोध का स्वर बना। गुरु नानक देव जी की करुणा से लेकर गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान तक सिख परंपरा ने धर्म की स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना। कहा जाता है कि गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान कश्मीरी पंडितों की आस्था की रक्षा के लिए था, किंतु यह नैरेटिव भी पूरा सच नहीं है, क्‍योंकि उस वक्‍त तक सिख पंथ कहीं से भी अलग नहीं था, वह पूरी तरह से हिन्‍दू धर्म की एक संत परंपरा आधारित दर्शन धारा थी, उस समय इस संत परंपरा के जितने अनुयायी थे वे सभी हिन्‍दू समाज के अभिन्‍न अंग थे, जिसमे कि स्‍वयं गुरु तेग बहादुर जी भी।

ऐसे में स्‍वभाविक तौर पर इस्‍लामिक अत्‍याचार से त्रस्‍त होकर अनेक हिन्‍दू समाज के लोग गुरु तेग बहादुर जी के पास गए थे और मुगल हिंसा के समाधान के लिए मार्ग प्रशस्‍त करने के लिए निवेदन किया गया था। तब गुरु जी ने स्‍वयं से आगे होकर मुगल सत्‍ता से बात करने का आश्‍वासन दिया, इसके परिणाम में तत्‍कालीन इस्‍लामिक मुगल शासक औरंगजेब ने क्‍या किया! दिल्‍ली में सिख पंथ के नौवें गुरु तेग बहादुर जी की चांदनी चौक दिल्ली में 24 नवंबर 1675 को शीश काटकर बलिदान हुआ। गुरु तेग बहादुर जी ने स्पष्ट कहा था कि वे न तो इस्लाम स्वीकार करेंगे और न ही किसी को जबरन धर्म बदलने देंगे।

गुरु जी से पहले शहीद किए गए उनके तीन प्रमुख अनुयायियों पर भयंकर हिंसा की गई। भाई मती दास जी जोकि गुरु जी के प्रमुख सेवक थे, उन्‍हें मुगलों ने जिंदा आरी से चीर दिया, किंतु भाई मती दास जी ने अंतिम क्षणों में भी जाप और ध्यान नहीं छोड़ा। उनका बलिदान इतिहास के सबसे क्रूर अत्याचारों में गिना जाता है। इसी तरह से भाई सती दास जोकि भाई मती दास के छोटे भाई थे, इस्‍लाम के अनुयायी मुगलों ने उन्‍हें रुई में लपेटकर जिंदा जला दिया गया, क्‍योंकि उन्होंने भी धर्म परिवर्तन से इंकार कर दिया था। उन्‍होंने भी अपने बड़े भाई की तरह ही अत्याचार के बीच भी गुरु और ईश्वर में अडिग आस्था रखी। इन दोनों की तरह ही भाई दयाला जोकि गुरु जी के परम भक्त थे उन्‍हें उबलते पानी में डालकर मार दिया गया, उन्होंने भी अंतिम सांस तक इस्लाम स्वीकार नहीं किया। आगे गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने धर्म पर अडिग रहने की इस परंपरा को और सुदृढ़ किया और न्याय आत्मसम्मान तथा साहस की शिक्षा अपने शिष्‍यों को दी।

सन् 1704–1705 की सर्दियों में आनंदपुर साहिब की घेराबंदी इसी संघर्ष का निर्णायक अध्याय बनी। मुगलों ने गुरु गोबिंद सिंह जी पर इस्‍लाम कबूल करलेने का दबाव बढ़ाया। ऐसे में संघर्ष स्‍वभाविक था, तब सरसा नदी पार करते समय परिवार बिछुड़ गया। माता गुजरी जी अपने दो नन्हे पोतों साहिबजादा जोरावर सिंह नौ वर्ष और साहिबजादा फतेह सिंह सात वर्ष के साथ अलग हो गईं। वे सरहिंद के सूबेदार नवाब वजीर खान की कैद में पहुंच जाती हैं। यहीं इस्‍लामिक सत्ता का क्रूर हिंसक चेहरा एक बार फिर उजागर होता है जहां नाबालिगों पर भी दमन चक्र चलाया गया।

ठंडे बुर्ज की यातनाएं दी गईं, ताकि मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके और बच्‍चे इस्‍लाम का अपना लें। भय अकेलापन और प्रलोभन के सहारे आस्था को तोड़ने की तमाम कोशिशें हुईं। दरबार में बच्चों को इस्लाम स्वीकार करने पर धन महल और सुरक्षा का लालच दिया गया। किंतु इन दो नन्हे बालकों ने वह दृढ़ता दिखाई जो किसी भी साम्राज्य से बड़ी थी। उनका उत्तर स्पष्ट था कि धर्म बिकाऊ नहीं और सत्य पर समझौता अस्वीकार्य है।

वजीर खान का क्रोध उसी क्षण फूट पड़ा । सबसे क्रूर दंड का आदेश दिया गया। 26 दिसंबर 1705 की वह सुबह भारतीय इतिहास की सबसे करुण और सबसे प्रेरक सुबहों में से एक है। ईंट गारे से उठती दीवार के साथ साहस भी ऊंचा होता गया। न आंसू न भय सिर्फ अपने विश्वास पर विश्‍वास। माता गुजरी जी ने भी गहरे शोक में प्राण त्याग दिए। दोनों नन्‍हें बालकों जिंदा ही दीवार में चुनवा दिया गया।

साहिबजादों के बलिदान ने यह संदेश दिया कि आस्था किसी भी बल प्रयोग से कहीं ऊपर है। यही कारण है कि यह घटना सिख समुदाय की स्मृतियों के साथ संपूर्ण हिन्‍दू समाज के लिए मुखर चेतना बनी। आज वीर बाल दिवस इसी स्मृति को राष्ट्रीय सम्मान देता है। वर्ष 2022 में 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस घोषित कर भारत ने यह स्वीकार किया कि बच्चों की वीरता भी राष्ट्र की नींव होती है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि आज का भारत जैसा भी, जितना भी शेष है वह इन नन्‍हें बलिदानियों की कसौटी के परिणाम का सुफल है।

कहना होगा कि साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह हर भारतीय की स्‍मृतियों में जो अपने देश से अपार प्रेम करते हैं उनके बीच अमर हैं क्योंकि उन्होंने सिद्ध किया कि वीरता उम्र की मोहताज नहीं होती है। उनकी शहादत हर पीढ़ी को यह प्रश्न पूछने पर विवश करती है कि क्या हम अन्याय के सामने खड़े होने का साहस रखते हैं? जब तक यह प्रश्न जीवित है तब तक भारत अपने संपूर्ण स्‍वर और चेतना के साथ मुखरता से खड़ा हुआ है। दोनों साहिबजादों के श्रीचरणों में शत् शत् नमन…..

राज्यों के निकाय चुनाव परिणामों के संदेश

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दिल्ली । राजधानी दिल्ली के नगर निगम चुनावों से आरम्भ हुआ भाजपा गठबंधन की विजय का रथ अब केरल, महाराष्ट्र, अरुणाचल और गोवा तक पहुंच गया है। हाल में महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश और फिर गोवा से निकाय चुनावों के परिणाम भाजपा के पक्ष में आए। इससे पहले केरल के चुनाव परिणाम आए जिसमें केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम में पहली बार भाजपा का मेयर बना जिसकी चर्चा पूरे भारत में हो रही है। महाराष्ट्र और अरुणाचल के नतीजे कई मायने में महत्वपूर्ण हैं। महाराष्ट्र में 288 नगर परिषदों और नगर पंचायतों के चुनाव में महायुति ने जबर्दस्त प्रदर्शन किया है। भाजपा ने कुल 3325 सीटों पर विजय प्राप्त करके कुल पार्षदों का 48 प्रतिशत अपने नाम किया है। नगर परिषद अध्यक्षों में से करीब 75 प्रतिशत महायुति के हैं। जिनमे सबसे बड़ा योगदान भाजपा का है। भजपा ने 2017 के निकाय चुनावों मे 1602 सीटों पर विजय प्राप्त की थी जबकि अबकी बार उसकी दोगुनी से भी अधिक 3,325 सीटें जीतने में सफलता प्राप्त की है। भाजपा को महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में भी भारी सफलता मिली है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का कहना हे कि 2014 से लेकर अभी तक भाजपा शहरी पार्टी मानी जाती थी किंतु अब भाजपा महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपना दबदबा बढ़ा रही है। 

आज महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन अपनी अंतिम सांसे गिनता दिखाई पड़ रहा है। मुंबई नगर निगम के लिए उद्धव और राज हाथ मिला चुके हैं । अगर कुछ अन्य शेष बड़े नगर निगमों में भी विपक्षी गठबंधन जीत नहीं पाता तो वह बुरी तरह से बिखर सकता है। 

महाराष्ट्र में भाजपा की सफलता का सबसे अधिक श्रेय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को जाता है जबकि शिवसेना (उद्धव गुट) अपनी दुर्गति के लिए स्वयं दोषी है। शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे ने जिन उद्देश्यों के लिए शिवसेना का गठन किया था उससे वह पूरी तरह से भटक चुकी हैं। बांग्लादेश में हिंदुओ के साथ हो रहे अमानवीय अत्याचारों पर शिवसेना (उद्धव गुट )के मुंह में ताला लगा है। वो बांग्लादेश की घटनाओं की निंदा तक नहीं कर पा रही है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्यभर में 30 से अधिक रैलियां कीं जबकि ठाकरे बंधु अपने महल से बाहर ही नहीं निकले। 

भाजपा की अरुणाचल विजय – सुदूर सीमावर्ती राज्य अरुणाचल प्रदेश के निकाय चुनावों में भी भाजपा ने जिला परिषद और ग्राम पंचायत की अधिकांश सीटों पर जीत प्राप्त की और अपना दबदबा कायम रखा। भाजपा ने 245 सीटों में से 170 सीटों पर जीत दर्ज की जिनमें से 59 सीटों पर निर्विरोध विजय हुई। यहां के ग्रामीण इलाकों में भी भाजपा ने मजबूत उपस्थिति दर्ज की, जिसमें ग्राम पंचायत की 8,208 सीटों में से 6,085 सीटों पर जीत दर्ज की है। राजधानी ईटानगर के नगर निगम में भी भाजपा ने 20 मे से 14 सीटो पर विजय प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है यहां नगर परिषद की 59 सीटों पर भाजपा विजयी रही। चुनाव परिणामों से गदगद भाजपा के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा कि राज्य में एनडीए के मजबूत प्रदर्शन से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत और विकसित अरुणाचल के दृष्टिकोण के प्रति जनता का दृढ़ समर्थन झलकता है। 

गोवा में भी भजपा की विजय – गोवा में भी जिला पंचायत चुनाव 2025 के सभी परिणाम सामने आ चुके है। ये चुनाव बैलेट बाक्स के माध्यम से हुए थे किंतु यहां पर भी भाजपा को विजय प्राप्त हुई और कांग्रेस व सहयोगी दलों को करारी पराजय का सामना करना पड़ा। गोवा की 50 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा गठबंधन 30 से अधिक सीटें जितने में सफल रहा। यह विजय भाजपा के लिए शुभ संकेत है गोवा में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केरजीवाल भी यहाँ दम भर रहे हैं और जनता से कह रहे हैं कि कांग्रेस को वोट मत देना क्योंकि उनके विधायक भाजपा में शामिल हो जाते हैं । शेष अन्य दल गोवा में सुस्त पड़े हैं । 

भाजपा कि जीत का यह दौर जारी रहने वाला है क्योंकि कांग्रेस का रेडियो “वोट चोरी“ पर रुक गया है। देश का जनमानस कांग्रेस व राहुल गांधी को बार -बार संदेश भेज रहा है किंतु यह लोग सुधर नहीं रहे हैं और विदेशों में जाकर भारत की आलोचना कर रहे हैं । यह लोग विदेश जाकर जितना भारत विरोधी एजेंडा चलाएंगे देश की जनता इन्हें उतना ही गर्त में धकेल देगी।
भारत की जनता की आकांक्षाएं और अपेक्षाएं बदल चुकी हैं, आम जनता की आँखों ने विकसित भारत का सपना देख लिया है और जो लोग भी विकसित भारत की राह में बाधक बन रहे हैं वह धीरे -धीरे नेपथ्य में जा रहे हैं।

एक लेखक: पूरे भारत के 36 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश और सभी 7 महाद्वीपों की यात्रा पूरी करने वाले पहले भारतीय बने

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दिल्ली। प्रख्यात लेखक, देशभक्ति एवं यात्रा विषयक अपनी रचनाओं के लिए प्रसिद्ध डॉ. ऋषि राज ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने भारत के सभी 36 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों तथा विश्व के सभी सात महाद्वीपों की यात्रा पूरी कर ली है।

17 नवंबर 2025 को डॉ. ऋषि राज ने अपने इस महायात्रा के अंतिम पड़ाव अंटार्कटिका पर कदम रखा। वहाँ उन्होंने भारतीय तिरंगा लहराकर एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना और राष्ट्रीय गौरव का संदेश दिया।

यह उपलब्धि उन्हें वह गौरव प्रदान करती है कि वे ऐसे पहले भारतीय बन गए हैं, जिन्होंने भारत की संपूर्ण विविधता सभी 36 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश का भ्रमण करने के साथ-साथ विश्व के सभी सात महाद्वीपों की यात्रा भी सफलतापूर्वक पूरी की है।

उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान “धरती माता की रक्षा के संकल्प” का संदेश देते हुए एक बैनर भी प्रदर्शित किया, जिससे पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता झलकती है।

इसके साथ ही, सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में, उन्होंने आयरन मैन की तस्वीर वाला विशेष बैनर प्रदर्शित कर राष्ट्र के इस महान एकीकर्ता को श्रद्धांजलि अर्पित की। दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन में अपर महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत ऋषि राज ने ये अनूठी उपलब्धि हासिल की है।

डॉ. ऋषि राज की यात्राओं का आरंभ वर्ष 1994 में हुआ, जब उन्होंने भारतीय रेल में अपनी सेवा प्रारंभ की। पहले उन्होंने भारत के अधिकांश राज्यों का भ्रमण किया। वर्ष 2008 में सभी ज्योतिर्लिंगों और चार धामों की यात्रा पूरी की। इसके बाद 2012 में जब उन्होंने कैलाश मानसरोवर यात्रा की, तभी से उनकी वैश्विक यात्रा का नया अध्याय शुरू हुआ। पिछले 31 वर्षों की यह सतत यात्रा उन्हें आज इस ऐतिहासिक मुकाम तक ले आई है।

अंटार्कटिका से डॉ. ऋषि राज का संदेश:

“हिमालय से लेकर अंटार्कटिका तक, मैंने भारत की आत्मा को अपने साथ लेकर यात्रा की है। यह सफर सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि एकता, देशभक्ति और पृथ्वी के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है। जहाँ भी जाता हूँ, भारत मेरे साथ चलता है।”

अपने पेशेवर दायित्वों के अलावा, डॉ. ऋषि राज एक बहुमुखी लेखक हैं, जिन्होंने इतिहास एवं देशभक्ति पर आधारित बच्चों की कहानियों सहित 28 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। इसके साथ ही, उनके चैनल Exploring India with Rishi के माध्यम से वे 600 से अधिक लघु फिल्मों में भारत की सांस्कृतिक एवं देशभक्ति की धरोहर को प्रदर्शित कर चुके हैं।

डॉ. ऋषि राज अब इस उपलब्धि को राष्ट्र के युवाओं में देशभक्ति, सतत यात्रा एवं जलवायु जागरूकता को बढ़ावा देने हेतु समर्पित करने की योजना रखते हैं। वे इस उपलब्धि के लिए प्रमुख रिकॉर्ड बुक्स में आवेदन की तैयारी भी कर रहे हैं।

ताजमहल की छाँव में ग़ालिब की तन्हाई: आगरा ने अपने शायर-ए-आज़म को क्यों भुला दिया?

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लखनऊ: शहर आगरा, जहाँ संगमरमर मोहब्बत की दास्तान सुनाता है, चाँदनी में ताज मुस्कुराता है और यमुना सदियों के राज़ फुसफुसाती है, उसी शहर में उर्दू अदब का बादशाह मिर्ज़ा ग़ालिब आज एक बुझती हुई शमा बन चुके हैं। जैसे किसी आह का धुआँ हवा में गुम हो गया हो।
27 दिसंबर 1797, आगरा की इसी मिट्टी में जन्मे ग़ालिब, जिनकी ग़ज़लों ने इश्क़, दर्द और फ़िक्र को नए मायने दिए। दिल्ली दरबारों की रौनक रहे यह शायर आज अपनी जन्मभूमि में गुमनामी की धूल ओढ़े हैं। उनकी सालगिरह बस एक रस्मी मुशायरा बनकर रह गई है, किसी होटल के बंद हॉल में, जहाँ अल्फ़ाज़ तो गूँजते हैं, मगर रूह ग़ायब रहती है।

आगरा की गलियाँ आज भी पूछती हैं: उस काला महल में, जहाँ ग़ालिब ने पहली साँस ली, कोई यादगार क्यों नहीं? न कोई पट्टिका, न स्मारक, न कोई ऐसी निशानी जो बताए कि यहाँ उर्दू का सूरज उगा था। दशकों से आगरा विश्वविद्यालय में “ग़ालिब चेयर”, ऑडिटोरियम और रिसर्च लाइब्रेरी की माँग फाइलों में धूल फाँक रही है, अधूरी ख़्वाहिशों की तरह।
आगरा कभी उर्दू अदब की त्रिमूर्ति का केंद्र था: मीर तकी मीर, मिर्ज़ा ग़ालिब और नज़ीर अकबराबादी का शहर। लेकिन आज पत्थर के महल तो जगमगा रहे हैं, मगर संस्कृति, ज़बान और साहित्य—जो असली विरासत हैं, हाशिए पर जा चुके हैं। विरासत सिर्फ़ इमारत नहीं होती, याददाश्त भी होती है, और यही याददाश्त अब मुरझा रही है।

सैलानी, ख़ासकर वेस्ट एशिया से आने वाले, आज भी ग़ालिब की हवेली पूछते हैं। एक स्थानीय होटल संचालक का दर्द साफ़ झलकता है, “टूरिज़्म विभाग से कितनी बार कहा, कुछ ढंग का स्मारक बनाइए, पर जवाब में बस सन्नाटा।”
ग़ालिब उर्दू के लिए वही हैं जो अंग्रेज़ी के लिए शेक्सपियर। बचपन में आगरा छोड़ा, दिल्ली पहुँचे और बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में उनकी शायरी परवाज़ भरती रही। 1869 में दिल्ली में उनका इंतक़ाल हुआ, मगर उनका असर अब तक ज़िंदा है, उनकी पंक्तियाँ हर ऐसे दिल में गूँजती हैं जो मोहब्बत और मायूसी से गुज़रा हो।
स्थानीय लोग बार-बार एक ही बात कहते हैं: “जिस हवेली में ग़ालिब पैदा हुए, सरकार उसे ख़रीद ले और यादगार बना दे।” दरअसल, यह किसी एक मकान का मामला नहीं, पूरे शहर की आत्मा का सवाल है। केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर अगर ग़ालिब स्मारक, उर्दू लाइब्रेरी और वार्षिक साहित्य सम्मेलन शुरू करें, तो आगरा का सांस्कृतिक परिदृश्य फिर से जीवंत हो सकता है।
आगरा को मोहब्बत, भक्ति और कला का शहर कहा जाता है। यह ब्रज और उर्दू, दोनों परंपराओं का संगम रहा है। मगर आज उर्दू शायरी ठिठक-सी गई है, नए शायर पहचान के मोहताज हैं, और ग़ालिब की आवाज़ धीरे-धीरे इतिहास की परतों में दबी जा रही है।

आगरा में आज ग़ालिब के नाम पर बस एक छोटा-सा पार्क है, वह भी कैंटोनमेंट इलाके में, नाम भर की श्रद्धांजलि। साहित्य और समाज के बीच बढ़ती दूरी बताती है कि हम धीरे-धीरे बंजर ज़मीन बनते जा रहे हैं।
ग़ालिब ने कभी लिखा था कि दुनिया दिल टूटने की जगह है, मगर हर टूटा दिल एक नई शायरी रचता है। शायद अब आगरा को वही शायरी दोबारा लिखनी होगी, अपने शायर की याद में।
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कौन है जो ग़ालिब को नहीं जानता:
“दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है”
“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले”
“ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता”
“हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है”
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ये शहर ताजमहल की छाँव में जीता है, पर अब उसे उस शायर को भी याद करना चाहिए, जिसने मोहब्बत को लफ़्ज़ और लफ़्ज़ों को रूह दी। ऐ आगरा, उठो, इस बुझती चिंगारी को फिर हवा दो। ग़ालिब को याद करना सिर्फ़ अतीत नहीं, आत्मा को पुकारना है। वरना वह आख़िरी शेर भी ख़ामोशी में गुम हो जाएगा।

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