चुनावी विसात पर प्रभावी होता बेदख़ली अभियान

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आचार्य श्रीहरि
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गुवाहाटी: असम दोरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस असम को घुसपैठियों का राज्य बनाना चाहती है और घसुपैठियों को संरक्षण देती है। असम की भाजपा सरकार घुसपैठियों को नियंत्रित करने के लिए मियां मुस्लिम बेदखली अभियान चला रही है। मियां मुस्लिम उन लोगों को कहा जाता है जो बाग्लादेशी मूल के हैं और अवैध रूप से भारत में आकर बसे हुए हैं। ऐसे इस तरह के लोगों को अन्य नाम से भी पुकारा जाता है, पहचान किया जाता है, अन्य नामों में बांग्लादेशी, रोहिंग्या शामिल है। खासकर असम में मियां मुस्लिम एक अपमानजनक पदवि है और पहचान है। मियां मुस्लिम‘ समूह पर आरोप है कि इन लोगों ने बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान से आकर असम की डेमोग्राफी को बदला है, सरकारी जमीन को कब्जा किया है, जंगलांें का सफाया किया है, पहाडों को तोडा है, इस प्रकार से इन लोगों ने असमियां समाज के संतुलन रेखा बिगाडी है और असम के पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाया है, दफन किया है। आमतौर पर यह धारणा असम के अंदर मजबूत है और इसी के ईद-गिर्द असम की राजनीति भी धूमती-फिरती है, सतारूढ दल की भी सोच यही है, सत्ता रूढ दल जहां मियां मुस्लिम बेदखली अभियान से लाभार्थी होने की रणनीतियां बिछाता है वहीं विपक्ष कांग्रेस और अन्य मुस्लिम राजनीतिक पार्टियां मियां मुस्लिम बेदखली अभियान को मुसलमानों को अपमानित करने और मुसलमानों को प्रताड़ित करने के साथ ही साथ उन्हें घेर-बार से वंचित करने के तौर पर देखता है, प्रचालित करता है और अपना जनाधार विकसित करता है। इसलिए यह कहना कि फायदे की राजनीति, तनाव की राजनीति, नफरत की राजनीति सिर्फ सत्ताधारी पार्टी भाजपा ही करती है, पूरी तरह से सच नहीं है। मियां मुस्लिम, रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों के संरक्षण देकर बसाने और रोजगार उपलब्ध करा कर अपना जनाधार संरक्षित करने का काम कांग्रेस और मुस्लिम पार्टियां भी करती हैं। लेकिन सच को दबाया नहीं जा सकता है, छुपाया नहीं जा सकता है। मियां मुस्लिम,रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ एक सच है जो चाकचैबंद है और प्रमाणित है। मियां मुस्लिम, रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैइ के कारण न सिर्फ असम की डेमोग्राफी बदली हैं, खतरनाक हुई है, हिंसक हुई है बल्कि देश के अन्य भागों में इसकी एक झलक देखने को मिलती है। मियां मुस्लिम, रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ को राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रतीक और सनातन सहंार का विषय और कारण मान लिया गया है।

ऐलानिया तौर पर असम में मियां मुस्लिम बेदखली अभियान जोरों पर है। इसको लेकर असम की भाजपा सरकार भी गंभीर है और सक्रिय है तथा आक्रामक है। असम भाजपा सरकार कोई कोताही बरतने के लिए तैयार नहीं है। अभियान को जोरशोर से चलाया जा रहा है। अभी तक हजारो घरों को दफन कर दिया गया, उस पर बुलडोजर चला दिया गया, खेती की जमीन पर अतिक्रमण हटा दिया गया। बुलडोजर किस आधार पर चलता है? बुलडोजर चलने का आधार यह है कि सरकारी जमीन है जिस पर अवैध कब्जा है। सरकारी जमीन पर कभी जंगल था, सरकारी जमीन पर कभी पहाड था, कभी पेड-पौधे थे जिसे काटकर घर बनाये गये और खेती के लिए जमीन बनायी गयी। यह बात सही है कि निजी संपत्ति पर इस तरह के कब्जे नहीं होते हैं। इस तरह के अवैध कब्जे सरकारी जमीन पर होते हैं, जंगल की जमीन और पहाड की जमीन के साथ ही साथ नदियों के किनारे की जमीन ही निशाने पर होती है। अवैध घूसपैठियों के पास धन-दौलत तो होता नहीं, उनके पास सिर्फ और सिर्फ लक्ष्य होता है। लक्ष्य भी हिंसक और खतरनाक होता है और नफरत भरा होता है। लक्ष्य इनका इस्लाम के प्रचार-प्रसार और विस्तार होता है, सनातन का संहार और भारत को मुस्लिम राष्ट्र के रूप में तब्दील करने की इनकी मानसिकता भी होती है। अगर इनकी ऐसी मानसिकता और लक्ष्य नहीं होते तो फिर इनकी घुसपैठ के खिलाफ इतना आक्रोश भी नहीं होते और बेदखली अभियान भी मानवीय अवधारणा से प्रेरित होते। अवैध घुसपैठिये अपनी गुंडागर्दी और हिंसा पर कुछ ज्यादा ही निर्भर रहते हैं और स्थानीय मुस्लिम विसात भी उन्हें हिंसक और खतरनाक बनाने की भूमिका निभाते हैं और डरने की बात को खारिज करने की सीख देते हैं। इसलिए मूल निवासियों और घुसपैठियों के बीच में नफरत की एक दीवार खींच जाती है, एक हिंसक लक्ष्मण रेखा भी खींच होती है।

असम में मियां मुस्लिम बेदखली अभियान के खिलाफ आक्रोश भी कम नहीं है, राजनीतिक तनाव भी कम नहीं है और आमने-सामने की स्थिति भी उत्पन्न हुई है। मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रसिद्ध वकील एआर भुइयां कहते हैं कि कब और कौन कहां से आया है? इसका निर्धारण करना मुश्किल है, रंग रूप और कपडों का आधार बना कर किसी को मियां मुस्लिम घोषित कर देना अन्याय है, जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर और डेमोग्राफी चेंज का हौवा खडा कर हम एक बडे समूह को बेदखल नहीं कर सकते हैं, उन्हें हाशिये पर खडा नहीं कर सकते हैं। हम कानून के राज में गतिशील होते हैं जबकि भावनाओं के आधार पर पूरा बेदखली अभियान जारी है, भावनाओं का राज बनाना लोकतंत्र की हत्या है। भुइयां की यह बात तो सही है कि मानवाधिकारी अवधारणा की जरूरत होनी चाहिए। पर कानून की बात को भी हमें भूलना चाहिए या नहीं? इस पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। अब यहां प्रश्न यह उठता है कि बेदखली अभियान को लेकर असम के नियम-कानून क्या कहते हैं?े वन कानून 1891 और 1995 बेदखली अभियान को मजबूत बनाते हैं। ये कानून सरकार को वन विभाग और सरकारी जमीन को वापस लेने के अधिकार सरकार को देते हैं। बेदखली के लिए सुनावाई और नोटिस की अनिवार्यता होती है। इस साल के अगस्त महीने में गुवाहाटी हाई कोर्ट का फैसला भी उल्लेखनीय है। हाईकोर्ट ने एक याचिका पर फैसला देकर बेदखली अभियान को सही ठहराया था और सात्त दिनों के अंदर कब्जाधारियों को जमीन मुक्त करने का आदेश दिया था। लेकिन आदिवासी समूह को बेदखली अभियान से मुक्त रखा गया है। आखिर क्यों? इसलिए कि वन अधिकार कानून 2006 के अनुसार उन्हें सुरक्षा मिली हुई है। मूल आदिवासियों को जंगल पर परमपरागत अधिकार हासिल हैं।

अगले वर्ष असम में चुनाव है। चुनाव के दृष्टिकोण से ही बेदखली अभियान प्रभावी है। पर भाजपा का आरोप और भी है। भाजपा का आरोप है कि मियां मुस्लिम ग्रेटर राज के लिए घुसपैठ जारी है। हिन्दुओं को बलपूर्वक भयभीत किया जा रहा है और उन्हें अपने मूल स्थान से भागने के लिए विवश किया जा रहा है। सही तो यही है कि असम के कई जिले देखते-देखते मुस्लिम बहुल हो गये, कई विघान सभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल हो गये, जहां पर मुस्लिम उम्मीदवार की ही जीत अनिवार्य हो गयी है। असम में मुसलमानों की एक नयी पार्टी भी बन गयी है जो न केवल प्रभावी है बल्कि अपना दखल भी विशेष रखती है। असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम की मुस्लिम पार्टी पर विदेशी घुसपैठियों को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं। असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फं्रट का मुखिया मौलाना बदरूउदीन हैं जो मुसलमानों के नेता के तौर पर स्थापित हैं और अपने मुस्लिम भडकाउ बयानों के लिए कुख्यात है। असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फंट का कांग्रेस के साथ समझौता है। कांग्रेस स्वयं के बल पर असम में सरकार नहीं बना सकती है, कांग्रेस के लिए मुस्लिम समर्थन की अनिवार्यता होगी। इसी कारण कांग्रेस मौलाना बदरूउदीन के शर्तो के सामने झुकती रही है। बदखली अभियान से भाजपा अपने हिन्दुत्व वोटों को संतुष्ट रखना चाहती है और असम में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना चाहती है। असम में भाजपा सरकार का मियां मुस्लिम बेदखली अभियान का अर्थ और लक्ष्य यही है।

आईजीएनसीए में ‘भारतीय जनजातीय समाज’ पुस्तक का हुआ लोकार्पण

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नई दिल्ली: इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के जनपद सम्पदा विभाग ने ‘ज्ञानपथ शृंखला’ के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘भारतीय जनजातीय समाज (शिक्षित एवं सशक्त भूमिका में आत्मनिर्भरता की ओर)’ के लोकार्पण एवं चर्चा सत्र का आयोजन किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केन्द्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री श्री किरन रिजिजू थे। वहीं विशिष्ट अतिथि थे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग के अध्यक्ष श्री अंतर सिंह आर्य। उन्होंने जनजातीय समाज से जुड़े समकालीन विमर्श, नीतिगत प्रयासों तथा सांस्कृतिक संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। विशेष अतिथि के रूप में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग की सदस्य डॉ. आशा लकड़ा उपस्थित रहीं, जिन्होंने पुस्तक की विषयवस्तु को सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में रेखांकित किया। पुस्तक की लेखिका हैं समाजशास्त्री एवं शिक्षिका डॉ. स्वीटी तिवारी। कार्यक्रम का स्वागत वक्तव्य आईजीएनसीए के जनपद सम्पदा विभाग के अध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने दिया। उन्होंने ‘ज्ञानपथ शृंखला’ की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए इसे समकालीन बौद्धिक संवाद का एक सशक्त मंच बताया। इस अवसर वनवासी कल्याण आश्रम के श्री सुरेश कुलकर्णी की भी गरिमामय उपस्थिति रही।
मुख्य अतिथि किरन रिजिजू ने कहा कि जनजातीय समुदायों को जो सम्मान मिलना चाहिए था, आज़ादी के 60-70 सालों तक नहीं मिला। बस उनका प्रतिनिधित्व सांकेतिक ही रहा। जब मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ता था तो मुझे लगा कि आदिवासी क्षेत्र में काम करने वाले और आदिवासियों को समझने वाले कुछ लोग और कुछ संगठन ही हैं। जैसे वनवासी कल्याण आश्रम और कुछ दूसरे संगठन हैं। वे सेवा भाव के साथ, उनके बीच में रहकर काम करते हैं। उन्होंने कहा कि अगर आप आदिवासियों के बीच में जाकर उनकी सेवा का नाम पर उनका धर्मांतरण करेंगे, तो उनका आइडेंटिटी बदल जाएगी। उनके सशक्तिकरण के नाम पर आप उनके कल्चर को डाइल्यूट कर देंगे। मूल रूप से, आदिवासी की पहचान अगर आप खत्म कर देंगे तो फिर सेवा का कोई मतलब नहीं होता है। आदिवासियों के लिए उनकी पहचान, उनका सम्मान दोनों बहुत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण के लिए महत्त्वपूर्ण काम किया है। उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में जनजातीय समुदाय के तीन लोगों को मंत्री बनाया। पहली बार किसी सरकार में जनजातीय समुदाय से तीन लोगों को मंत्री बनाया गया है। उन्होंने अपने मंत्रियों से कहा कि जनजातीय समुदाय के लोगों के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को रेखांकित कीजिए। प्रधानमंत्री ने भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिन 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की। यह बिरसा मुंडा का जन्म दिवस ही नहीं, बल्कि पूरे आदिवासियों को सम्मान देने का कार्यक्रम है।

उन्होंने कहा, भारत में जनजातीय समुदाय का बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन हम जनजातीय लोग खुद नहीं जानते कि हमारा योगदान क्या है। अपनी क्षमता को नहीं पहचानते कि हम क्या कर सकते हैं! ऐसे समय में एकेडमिक सेक्टर में इस तरह की पुस्तक आना बहुत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने लेखिका की प्रशंसा करते हुए कहा, मैं भी अपनी तरफ से किताब को आगे बढ़ाने, इसके प्रचार-प्रसार की कोशिश करूंगा।

लेखिका स्वीटी तिवारी ने पुस्तक के बारे में बताते हुए जनजातीय समुदायों की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा पर विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि घोर अंधकार में भी जनजातीय समाज की लौ क्षीण नहीं हुई। जनजातीय समाज के प्रति उपेक्षा के भाव को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि हम ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की बात करते हैं, लेकिन ‘गंगा-दामोदर तहज़ीब’ बात नहीं करते। ग़ौरतलब है कि दामोदर जनजातीय बहुलता वाले राज्य झारखंड की एक प्रमुख नदी है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा केवल साक्षरता नहीं है, बल्कि अधिकार बोध है।

यह कार्यक्रम विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संस्कृति-अध्ययन से जुड़े प्रबुद्ध श्रोताओं की उल्लेखनीय उपस्थिति के बीच सम्पन्न हुआ। यह आयोजन भारतीय जनजातीय समाज की बहुआयामी समझ को गहराई प्रदान करने वाला तथा अकादमिक दृष्टि से अत्यंत सार्थक सिद्ध हुआ।

नेहरू ने ‘विदेशी महिला के पुत्र’ को इंदौर का राजा बनने से मना करके राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के प्रधानमंत्री पद पर बैठना भी रोक दिया

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सुभाष चन्द्र

इंदौर: लोकसभा के 2004 चुनाव के बाद डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने राष्ट्रपति के सामने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने को चुनौती दी थी और कई आपत्तियां दर्ज करा कर उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था – लेकिन सोनिया की संतानों राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के प्रधानमंत्री पद पर बैठने पर तो नेहरू के एक फैसले रोक लगी हुई है –

इंदौर के महाराजा यशवंत राव होलकर-II ने अपने उत्तराधिकारियों में अपनी बड़ी बेटी उषा राजे होलकर और शिवाजी राव होलकर का नाम लिखा था लेकिन विदेशी पत्नी से उत्पन्न पुत्र शिवाजी राव होलकर को नेहरू ने उत्तराधिकारी मानने से मना कर दिया –
नेहरू, सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद ने आपत्ति जताई कि a son with “foreign blood” could not inherit the princely title after India’s independence और इसलिए यशवंत राव होलकर -II की पहली पत्नी से बड़ी बेटी उषा राव होलकर को “औपचारिक अध्यक्ष) मतलब यशवंत राव का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया –

यशवंत राव होलकर की 3 पत्नियां थी –
-संयोगिता बाई (1924 में शादी – 1937 में मृत्यु)
उनकी और यशवंत राव की बेटी थी उषा राजे होलकर;
-Marguerite Lawler, अमेरिकन पत्नी (शादी 1938 और तलाक़ 1943)
उषा राजे को उन्होंने संयोगिता की मृत्यु के बाद गोद लिया था;
-Euphemia “Fay” Watt (शादी 1943, तलाक़ 1960) – ये भी अमेरिकन थी –
उनका और यशवंत राव होलकर का पुत्र था शिवाजी राव होलकर, उन्हें उनकी माँ ने nickname दिया था Richard)

यशवंत राव होलकर के इंदौर राज्य का 1947 में भारत में विलय हो गया लेकिन 1 जनवरी, 1950 को उन्होंने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए और 1961 में उनकी मृत्यु के बाद उषा राजे को उनका औपचारिक उत्तराधिकारी बनाया गया जिससे राज्य की संपत्तियों का रख रखाव किया जा सके जो वे अभी भी कर रही हैं –

लेकिन नेहरू, पटेल और राजेंद्र प्रसाद का यह कहना कि (” Son of foreign blood” could not inherit the princely title after India’s independence) अपने आप में बहुत कुछ कह देता है – वह विचार अगर उस समय उपयुक्त थे तो वो आज भी उपयुक्त हैं – सोनिया गांधी भले ही भारतीय नागरिक हो गई हैं लेकिन मूल तो उनका विदेश का ही है – उस समय यशवंत राव की पत्नियों के लिए भारतीय नागरिक बनने का कोई नियम था ही नहीं –

नेहरू, पटेल और राजेंद्र प्रसाद का कथन बिलकुल आचार्य चाणक्य के विचार से लिया हुआ लगता है, कि विदेशी महिला से उत्पन्न संतान कभी देश के लिए निष्ठावान नहीं हो सकती और यह राहुल गांधी सही साबित कर भी रहा है -नेहरू पटेल और राजेंद्र प्रसाद तीनो के जो नाम इस कथन के साथ दिए गए है, वो नेहरू के ही माने जाने चाहिए क्योंकि नेहरू को विदेश का अनुभव ज्यादा था और पटेल की तो 1950 में ही मृत्यु हो चुकी थी जब उषा राजे को यशवंत राव को उत्तराधिकारी बनाया गया –

इसलिए नेहरू के बनाए हुए नियमों के अनुसार ही राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा प्रधानमंत्री पद पर बैठने योग्य नहीं हैं – जब नेहरू ने अमेरिका महिला के उत्पन्न पुत्र को इंदौर जैसे छोटे से राज्य का महाराजा नहीं बनने दिया तो राहुल और प्रियंका को देश का प्रधानमंत्री कैसे बनाया जा सकता है!

कन्वर्जन के विरोध में सर्व समाज का 24 दिसंबर को प्रदेशव्यापी बंद

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रायपुर : छत्तीसगढ़ में लगातार बढ़ती कन्वर्जन की घटनाओं से सर्व समाज में आक्रोश व्याप्त है. सर्व समाज ने इस मुद्दे पर प्रदेश व्यापी बंद का ऐलान किया है. मंगलवार को सर्व समाज ने प्रेस वार्ता कर 24 दिसंबर को होने वाले प्रदेशव्यापी बंद की जानकारी दी. सर्व समाज के पदाधिकारीयों ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा, सर्व समाज, छत्तीसगढ़ यह स्पष्ट रूप से अवगत कराता है कि प्रदेश में लगातार उत्पन्न हो रही सामाजिक अशांति, जनजातीय आस्था पर आघात तथा संगठित रूप से पैदा किए जा रहे सांस्कृतिक टकराव के विरोध में दिनांक 24 दिसंबर 2025 को प्रदेशव्यापी छत्तीसगढ़ बंद का आह्वान किया गया है। यह बंद पूर्णतः शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक दायरे में आयोजित किया जाएगा, जिसमें सर्व समाज के विभिन्न सामाजिक, जनजातीय एवं नागरिक संगठन सहभागिता करेंगे. सर्व समाज का कहना है, कांकेर जिले के आमाबेड़ा क्षेत्र में हाल ही में घटित घटना कोई पहली या एकमात्र घटना नहीं है। इस प्रकार की घटनाएं इससे पूर्व भी छत्तीसगढ़ के ना सिर्फ जनजातीय एवं ग्रामीण अंचलों में सामने आती रही हैं, बल्कि कई बार मैदानी क्षेत्रों में भी विवाद की स्थिति बनी है. एक निश्चित पैटर्न के अंतर्गत ईसाई मिशनरियों एवं उनसे जुड़े कन्वर्जन-प्रेरित समूहों द्वारा सुनियोजित ढंग से ऐसे हालात निर्मित किए जा रहे हैं, जिनसे समाज में तनाव, टकराव और सामाजिक वैमनस्य फैल रहा है। दुर्भाग्यवश, इन घटनाओं का सीधा दुष्परिणाम सर्व समाज, विशेषकर जनजातीय समुदायों को भुगतना पड़ रहा है.

आमाबेड़ा की घटना ने इस वास्तविकता को और अधिक उजागर किया है कि पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित जनजातीय क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका, जनजातीय आस्था एवं परंपराओं की संवैधानिक सुरक्षा को गंभीर रूप से नजरअंदाज किया गया. स्थानीय विरोध और संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद जिस प्रकार जिला पुलिस-प्रशासन की निष्क्रियता, भीम आर्मी जैसे बाहरी संगठनों की संगठित भूमिका तथा पक्षपातपूर्ण कार्रवाइयां सामने आई, उसने जिला पुलिस-प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं.

*सामाजिक तथा आर्थिक संगठनों का समर्थन*
सर्व समाज के इस महाबंद को प्रदेश भर के सामाजिक एवं व्यावसायिक तथा छतीसगढ़ चैबर ऑफ़ कॉमर्स जैसे संगठनों का समर्थन मिला है. महाबंद के दौरान जिला प्रशासन को ज्ञापन दिया जाएगा. इस महा बंद को लेकर प्रत्येक जिले में सर्व समाज द्वारा बैठक आयोजित की जाएगी.

*सर्व समाज की मांग*

1. राज्य में धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को यथाशीघ्र प्रभावी एवं सख्ती के साथ लागू किया जाए, जिससे प्रलोभन, दबाव अथवा षड्यंत्रपूर्वक किए जा रहे धर्मातरण पर नियंत्रण स्थापित हो सके। साथ ही पूरे प्रदेश में कन्वर्जन के माध्यम से उत्पन्न की ना रही सामाजिक वैमनस्य की परिस्थितियों को गम्भीरता से लेते हुए शासन-प्रशासन सख्ती बरतें, एवं दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे.

2. कांकेर जिले में जनजातीय समाज पर हुए संगठित हमले के लिए जिम्मेदार भीम आर्मी से जुड़े तत्वों एवं कन्वर्टेड ईसाई समूहों के सभी आरोपियों के विरुद्ध कठोरतम धाराओं के अंतर्गत तत्काल कार्रवाई की जाए.

3. जनजातीय समाज के लोगों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने तथा शांतिपूर्ण ग्रामीणों पर असंगत एवं अत्यधिक पुलिस बल का प्रयोग करने के गंभीर आरोपों को देखते हुए— जिला पुलिस अधीक्षक, कांकेर इंदिरा कल्याण एलेसेला का शासन द्वारा किया गया स्थानांतरण पर्याप्त नहीं है। हमारी मांग है कि उन्हें तत्काल निलंबित किया जाए तथा उनकी संदिग्ध भूमिका की स्वतंत्र , निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।

4. शव दफन की प्रक्रिया के दौरान पक्षपातपूर्ण प्रशासनिक रवैया अपनाने तथा हिंदू समाज पर दुर्भावनापूर्ण एवं असत्य आरोप लगाने वाले एसडीएम, ए. एस. पैकरा एवं तहसीलदार सुधीर खलखो को निलंबित कर उनकी संदिग्ध भूमिका की निश्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

5. जनजातीय ग्रामीणों के विरुद्ध पक्षपातपूर्ण ढंग से की गई पुलिस एवं प्रशासनिक कार्रवाइयों को तत्काल निरस्त किया जाए, उन पर लगाए गए आपराधिक प्रकरणों एवं धाराओं को वापस लिया जाए, तथा हिंसा एवं बल प्रयोग से पीड़ित ग्रामीणों को समुचित मुआवजा प्रदान किया जाए।

सर्व समाज, छत्तीसगढ़ यह स्पष्ट करना चाहता है कि यह आंदोलन किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों, जनजातीय आस्था, सामाजिक समरसता और प्रदेश में कानून के शासन की रक्षा के लिए है। यदि शासन-प्रशासन समय रहते निष्पक्ष एवं ठोस निर्णय लेने में विफल रहता है, तो सर्व समाज को लोकतांत्रिक एवं कानूनी दायरे में अपने आंदोलन को और व्यापक करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

प्रेस वार्ता के दौरान केंद्रीय अध्यक्ष छत्तीसगढ़ मनवा कुर्मी क्षत्रिय समाज खेड़िस राम कश्यप, उमेश कच्छप उरांव समाज प्रमुख, कृष्ण कुमार खेलकर प्रदेश संरक्षक प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज, बंशीलाल कुर्रे (पूर्व एएसपी) राजमहंत छत्तीसगढ़ सतनामी समाज, प्रमोद कुमार नामदेव (श्री नामदेव समाज विकास परिषद), बसंत तारख धीवर समाज, प्रदीप साहू प्रदेश सयुक्त सचिव छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ, विकास चंद्र सिन्हा छत्तीसगढ़ कलार समाज, उमर कांत सिन्हा प्रांतीय कार्यकारिणी छत्तीसगढ़ कलार समाज समेत अनेक समाज के प्रतिनिधि उपस्थित रहे.

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