संत और महंत की कैफ़ियत

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दयानंद पांडेय

लखनऊ । अविमुक्तेश्वरानंद और अखिलेश यादव दोनों ही योगी आदित्यनाथ को संत नहीं मानते l नकली संत बताते नहीं अघाते l अविमुक्तेश्वरानंद से लखऊ में आज मिलने के बाद अखिलेश यादव ने योगी के यह संत न होने वाली बात दुहराई भी l पोलिटिकली भी इन दिनों दोनों साथ हैं l दोनों का लक्ष्य भी इस समय एक है , योगी सरकार को उखाड़ फेकना l पर यह दोनों ही भूल जा रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ गोरखनाथ मंदिर के महंत हैं l

योगी की पहचान यही है l

महंत और संत दोनों दो बात है l इस एक बात को यह दोनों ही नहीं जानते l यह भी कि महंत को कोई हटा नहीं सकता , जब तक महंत ख़ुद न चाहे l गोरखनाथ मंदिर में यही परंपरा है l अब के समय बहुत कम लोग जानते हैं कि महंत दिग्विजयनाथ की मृत्यु के बाद नौमीनाथ गोरखनाथ मंदिर के महंत बनाए गए थे l दिग्विजयनाथ के उत्तराधिकारी वही थे l पर प्रशासनिक और प्रबंधकीय मामलों में वह अपने को सक्षम नहीं पा रहे थे सो कुछ ही दिनों में उन्हों ने गोरखनाथ मंदिर के महंत की गद्दी ख़ुद ही छोड़ दी l और यह गद्दी अवैद्यनाथ को सौंप दी l

महंत अवैद्यनाथ ने अपने प्रशासनिक कौशल और दूरदर्शिता से गोरखनाथ मंदिर को न सिर्फ़ नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया बल्कि उस के सेवा के विस्तार को भी नया फ़लक दिया l गोरखनाथ मंदिर और उस के अन्य निकाय जितना महंत अवैद्यनाथ के समय में दिन दूना , रात चौगुना फूले-फले, महंत दिग्विजयनाथ के कार्यकाल में कभी सोचा भी नहीं गया l गोरखनाथ मंदिर का भव्य स्वरूप , स्कूल , कालेज , अस्पताल और अन्य सामाजिक काम महंत अवैद्यनाथ के समय में अकल्पनीय विस्तार पा गए l योगी आदित्यनाथ ने इस विस्तार को पंख दे दिया l स्वास्थ्य कारणों से महंत अवैद्यनाथ ने जीते जी आदित्यनाथ को गद्दी सौंप दी थी l

योगी आदित्यनाथ ने गोरखनाथ मंदिर ही नहीं , पहले पूरे गोरखपुर , फिर गोरखपुर से जुड़े तमाम इलाक़े, फिर पूर्वांचल और इस के विकास को उड़ान दिया l गगन दिया और अब मुख्य मंत्री बनने के बाद समूचे उत्तर प्रदेश के विकास को राकेट बना दिया है l उत्तर प्रदेश की क़ानून व्यवस्था अब पूरे देश में मिसाल बन कर उपस्थित है l योगी की अब तमन्ना देश के समूचे आकाश और धरती के विकास को गति दे कर राकेट बनाने की है l

ग़ौरतलब है कि महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवैद्यनाथ दोनों ही क्रमश: गोरखपुर के सांसद रहे थे l योगी आदित्यनाथ भी l महत्वपूर्ण यह भी है कि महंत दिग्विजयनाथ , महंत अवैद्यनाथ और महंत योगी आदित्यनाथ तीनों ही राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख स्तंभ हैं l अयोध्या में जब मूर्ति प्रकट हुई तब महंत दिग्विजयनाथ उपस्थित थे l राम मंदिर आंदोलन में महंत अवैद्यनाथ ज़मीनी तौर पर बहुत सक्रिय रहे l राम मंदिर निर्माण में महंत योगी आदित्यनाथ की भूमिका को दुनिया ने देखा है l

महंत योगी आदित्यनाथ के बारे में कोई कुछ भी कहे और अवधारणा रखे l योगी आदित्यनाथ की अपनी अवधारणा है कि गो और ब्राह्मण के रक्षा और संरक्षण बिना सनातन की कल्पना नहीं की जा सकती l महंत योगी आदित्यनाथ को जो लोग सिर्फ़ संत या नक़ली संत मान कर अपना माथा फोड़ रहे हैं, उन्हें अपना यह भ्रम दूर कर लेना चाहिए l साथ ही संत न छोड़े संतई . . . याद कर लेना चाहिए l वह संत और गोरखनाथ मंदिर जिस का अरबों रुपए का साम्राज्य है , उस का महंत कहता हो कि जो वस्त्र मेरी देह पर है , यही मेरी निजी संपत्ति है l और कुछ नहीं l

असहमति और लोकतंत्र पर मणि शंकर अय्यर के नाम एक खुला पत्र

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शशि थरूर

दिल्ली । कांग्रेस के लोकसभा सांसद शशि थरूर ने हाल ही में मणि शंकर अय्यर द्वारा उनके विचारों और उनके “चरित्र” को लेकर की गई टिप्पणी का जवाब दिया है।

अय्यर जी।

लोकतंत्र की खूबी यही है कि लोग अलग-अलग राय रख सकते हैं। असहमति होना गलत नहीं है।
लेकिन सिर्फ इसलिए कि कोई विदेश नीति को थोड़ा अलग तरीके से देखता है, उसकी नीयत या देशभक्ति पर सवाल उठाना ठीक नहीं है। आपने मेरे विचारों और मेरे चरित्र के बारे में जो सार्वजनिक टिप्पणी की है, उसका जवाब देना जरूरी हो गया है।

मैंने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मामलों को भारत के राष्ट्रीय हित के नजरिए से देखा है। मेरे लिए भारत की सुरक्षा, भारत की अर्थव्यवस्था और दुनिया में भारत की इज्जत सबसे ऊपर है। दुनिया की राजनीतिक हकीकत को समझना और भारत के हितों को ध्यान में रखकर फैसला लेना कोई “मोरल सरेंडर” नहीं है — यह जिम्मेदार स्टेटक्राफ्ट है।

भारत की विदेश नीति हमेशा principle और pragmatism दोनों का संतुलन रही है।
Jawaharlal Nehru की Non-Alignment policy से लेकर आज की multi-alignment diplomacy तक भारत का मकसद हमेशा एक ही रहा है, अपनी संप्रभुता की रक्षा करना और दुनिया में न्याय की बात करना। संसद में हो या संसद के बाहर, मेरा रिकॉर्ड इसी संतुलन को दिखाता है।

देशभक्ति पर किसी एक पीढ़ी का अधिकार नहीं है। और न ही गांधी जी या नेहरू जी को समझने का अधिकार किसी एक समूह के पास है। असली सम्मान यही है कि उनके विचारों को आज के समय की हकीकत के साथ समझकर लागू किया जाए।

इतिहास में भी भारत ने कई बार ऐसा किया है कि किसी देश की गलत कार्रवाई को तुरंत सार्वजनिक रूप से नहीं ललकारा, क्योंकि हमारे अपने राष्ट्रीय हित उससे जुड़े हुए थे। उदाहरण के लिए, सोवियत यूनियन के साथ हमारे रिश्ते इतने महत्वपूर्ण थे कि हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और अफगानिस्तान के मामलों में भी भारत ने बहुत संतुलित रुख अपनाया।

आज भी खाड़ी देशों के साथ भारत के बहुत बड़े हित जुड़े हैं। लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार, हमारी energy security, और करीब 90 लाख भारतीय वहाँ काम कर रहे हैं। ऐसे में विदेश नीति बनाते समय इन सब बातों को ध्यान में रखना पड़ता है।

यथार्थ को समझना किसी के आगे झुकना नहीं होता। आज अमेरिका में ऐसी सरकार है जो अंतरराष्ट्रीय कानून को हमेशा उसी तरह प्राथमिकता नहीं देती जैसे हम देना चाहते हैं। लेकिन अगर हम उसे खुलकर चुनौती देते हैं तो उसके परिणाम भी हो सकते हैं।

अपने हाल के Indian Express लेख में मैंने साफ लिखा है कि यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है, इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं और इसे तुरंत खत्म होना चाहिए। लेकिन साथ ही मैंने यह भी कहा कि अमेरिका के साथ हमारे कई महत्वपूर्ण हित जुड़े हैं, उन्हें खतरे में डालना समझदारी नहीं होगी। विदेश नीति आखिरकार राष्ट्रीय हित के बारे में ही होती है, केवल भाषण देने या दिखावे की राजनीति करने के बारे में नहीं।

मेरी विदेश यात्राओं को लेकर जो आरोप लगाए गए हैं, वे बिल्कुल बेबुनियाद हैं।
Operation Sindoor को छोड़कर मेरी बाकी विदेश यात्राएँ मेरी private capacity में होती हैं। न उन्हें सरकार आयोजित करती है, न सरकार उनका खर्च उठाती है। दुनिया भर के कई विश्वविद्यालय और संस्थान मुझे बुलाते हैं, जितने निमंत्रण आते हैं, उनमें से ज्यादातर को मैं अपने काम के कारण स्वीकार भी नहीं कर पाता।

जहाँ तक क्षेत्रीय राजनीति की बात है, मेरे विचार सालों से एक जैसे रहे हैं।
मैंने हमेशा Israel और Palestine के बीच two-state solution का समर्थन किया है। और यह भी कहा है कि पाकिस्तान में अक्सर ऐसा लगता है कि वहाँ सेना के पास देश है, न कि देश के पास सेना।

Operation Sindoor के बाद जब हमने दुनिया में भारत का पक्ष रखा, तो मेरा संदेश साफ था —
“भारत बुद्ध और गांधी की भूमि है। हम शांति चाहते हैं। लेकिन शांति का मतलब कमजोरी नहीं होता। अगर आतंकवाद हमारे लोगों की जान लेगा, तो भारत मजबूती से जवाब देगा।”

सबरीमाला के मुद्दे पर भी आपकी आलोचना मुझे थोड़ी अजीब लगी। एक तरफ आप मुझे “गलत विचारों” के लिए कोसते हैं, दूसरी तरफ उसी मुद्दे पर पार्टी के निर्णय के साथ खड़े होने के लिए भी आलोचना करते हैं।

मेरी जन्मतिथि को लेकर की गई टिप्पणी भी इस बहस से जुड़ी नहीं है। महात्मा गांधी का सम्मान करने के लिए यह जरूरी नहीं कि किसी को उनकी गोद में खेलने का मौका मिला हो। मैंने गांधी जी और नेहरू जी पर काफी लिखा है और उनका सम्मान मेरे विचारों में गहराई से मौजूद है।

विदेश नीति के तरीकों पर मतभेद होना स्वाभाविक है। लेकिन principled pragmatism को गलत समझना ठीक नहीं है। मेरा मानना है कि भारत को ऐसी राष्ट्रवादी सोच की जरूरत है जो नैतिक मूल्यों और वास्तविक दुनिया की राजनीति, दोनों को साथ लेकर चले।

आपने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में मेरा समर्थन किया, उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।
और जब आपको पार्टी से निलंबित किया गया था, तब मैंने भी आपके समर्थन में आवाज उठाई थी। मुझे खुशी है कि वह निर्णय बाद में ठीक किया गया।

आपने अपने पत्र के अंत में “रास्ते अलग होने” की बात कही। सच यह है कि आपरेशन सिंदूर पर मेरे बोलने के बाद से ही आप लगातार मेरे बारे में कई टिप्पणियाँ कर रहे थे। मैंने अब तक सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन आपकी हाल की टिप्पणियों के बाद जवाब देना जरूरी हो गया, इसलिए दे रहा हूँ।

महिला दिवस किसके लिए? टूटती हदें: जब सास-बहू का झगड़ा जानलेवा हो जाए

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मुंबई : अगर पुरानी फिल्मों वाली ललिता पवार टाइप सास आज की मॉडर्न बहू से टकरा जाए, तो मंजर कैसा होगा?
और अगर टीवी सीरियल “वसुधा” की सास-बहू की लड़ाई असल जिंदगी में उतर आए, तो घर की कहानी कुछ और ही होगी।
बरसों से सास-बहू का रिश्ता टीवी सीरियलों, बॉलीवुड फिल्मों और डिनर टेबल की गपशप का पसंदीदा विषय रहा है। आम तौर पर इसे हल्के-फुल्के मज़ाक या ड्रामे के तौर पर दिखाया जाता है: चालाक सास और बेचारी, सताई हुई बहू।
लेकिन पिछले कुछ सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों से जो खबरें आई हैं, वे इस मज़ाकिया तस्वीर को बिल्कुल झुठला देती हैं।
अब यह रिश्ता सिर्फ तानों, शिकायतों और चुप्पी भरे झगड़ों तक सीमित नहीं रहा। कई जगह यह टकराव हिंसा और कत्ल तक पहुँच गया है।
महाराष्ट्र से तमिलनाडु तक, संयुक्त परिवार की जो चमकदार तस्वीर दिखाई जाती थी, उसके पीछे छिपे तनाव अब खुलकर सामने आने लगे हैं।
सबसे हैरान करने वाली बात है इन मामलों की बर्बरता।
अब यह सिर्फ दहेज उत्पीड़न या आत्महत्या के लिए उकसाने तक सीमित नहीं रहा। कई मामलों में सीधे-सीधे हत्या हो रही है।
जनवरी 2026 में महाराष्ट्र के ठाणे में 60 साल की एक सास पर आरोप लगा कि उसने अपनी बहू का गला घोंट कर उसे मार डाला। वजह कोई मामूली घरेलू झगड़ा नहीं था। असल लड़ाई सरकारी नौकरी के फायदे और मुआवज़े को लेकर थी।
सास को लगता था कि बेटे की मौत के बाद यह हक उसका है।
लेकिन कानून के मुताबिक वह रकम बेटे की विधवा पत्नी को मिलनी थी।
यानी दुख, आर्थिक डर और असुरक्षा ने मिलकर गुस्से को कातिलाना शक्ल दे दी।
ऐसे मामले पहले भी सामने आए हैं।
2016 में मुंबई के पास मुंब्रा में एक सास ने अपनी बहू और उसकी माँ की गला रेत कर हत्या कर दी। वजह सिर्फ इतनी थी कि उसका बेटा अपनी बीवी को ज्यादा तवज्जो देता था।
यह सास-बहू संघर्ष का सबसे पुराना और बुनियादी रूप है; बेटे या शौहर पर भावनात्मक कब्ज़े की जंग।
2019 में वसई में एक सास ने बहू को चाकू मार दिया। बाद में वह खुद खून से सने हाथों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंच गई।
इससे साफ है कि घरेलू सत्ता की लड़ाई में कभी-कभी होश-ओ-हवास भी गायब हो जाते हैं।
ये घटनाएँ किसी एक प्रदेश तक सीमित नहीं हैं।
यह एक तरह से पूरे हिंदुस्तान की कहानी बनती जा रही है।
2025 में झारखंड में 60 साल की अनीता देवी को अपनी बहू को जहर देने के जुर्म में उम्रकैद की सज़ा हुई।
उत्तर प्रदेश में वजहें और भी दिलचस्प हैं।
2023 में अमरोहा में एक सास ने अपनी बहू को गोली मार दी। वजह बताई गई; उसका “मॉडर्न लाइफस्टाइल” और घर के कामों में दिलचस्पी न लेना।
यह दरअसल दो पीढ़ियों की टक्कर है। एक तरफ पारंपरिक सोच वाली सास, जिसे आज्ञाकारी गृहिणी चाहिए।
दूसरी तरफ नई पीढ़ी की औरत, जो अपने करियर, आज़ादी और जिंदगी के फैसले खुद करना चाहती है।
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।
हर बार सास ही हमलावर नहीं होती।
अब कई मामलों में बहू भी पलटवार कर रही है: और वह भी बेहद खतरनाक तरीके से।
2025 में दिल्ली में एक गर्भवती महिला ने अपनी सास को चाकू मारकर हत्या कर दी। फिर लूट का नाटक रचा और सबूत मिटाने के लिए लाश को आग लगा दी।
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में भी बहू ने घरेलू सामान और जिम्मेदारियों को लेकर हुए झगड़े में अपनी बुजुर्ग सास पर तेज हथियार से हमला किया।
झांसी में जमीन के झगड़े और कथित अवैध रिश्तों के शक ने बहू को अपनी सास को जहर देने तक पहुंचा दिया।
इन घटनाओं से एक बात साफ हो जाती है।
“बेचारी बहू” और “जालिम सास” वाला पुराना स्टीरियोटाइप अब टूट रहा है।
असलियत कहीं ज्यादा जटिल और जहरीली है।
शायद सबसे सिहराने वाला मामला 2026 की शुरुआत में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची से सामने आया।
यहां एक सास, मैरी, और उसकी बेटी एमिली ने मिलकर 25 साल की नंदिनी को कथित अवैध संबंधों के शक में बहला-फुसला कर मार डाला। बाद में उसकी लाश नदी किनारे फेंक दी गई।
यह घटना दिखाती है कि कई बार परिवार के लोग मिलकर “बाहरी” बहू के खिलाफ साजिश रच लेते हैं।
तो आखिर इन खौफनाक घटनाओं की जड़ क्या है?
असल वजह भारतीय परिवार की कुछ पुरानी कमजोरियां हैं।
संयुक्त परिवार, जो कभी सहारा और सुरक्षा का सिस्टम माना जाता था, अब कई बार प्रेशर कुकर बन जाता है।
सास, जो अक्सर विधवा होती है या जिसने पूरी जिंदगी परिवार के लिए कुर्बान कर दी, अपनी पहचान और सुरक्षा बेटे से जोड़ कर देखती है।
ऐसे में बहू का घर में आना उसे अपने रुतबे और जगह के लिए खतरा लगता है।
उधर बहू को हर वक्त की दखलअंदाजी और नियंत्रण घुटन जैसा महसूस होता है। पैसे, निजी जगह, बच्चों की परवरिश, हर मुद्दा ताकत की लड़ाई बन जाता है।
और जब बातचीत बंद हो जाए, और बेटा या पति चुप तमाशबीन बना रहे, तो छोटे-छोटे झगड़े कभी-कभी खूनी हादसों में बदल जाते हैं।
ये घटनाएँ एक कड़वी चेतावनी हैं।
सास-बहू का रिश्ता अब सिर्फ टीवी सीरियल का मसाला या पारिवारिक ड्रामा नहीं रहा।
यह मानसिक तनाव, आर्थिक असुरक्षा और पितृसत्तात्मक सोच का ऐसा संगम बनता जा रहा है जो कई घरों को क्राइम सीन में बदल रहा है।
अगर परिवारों ने समय रहते इज्ज़त, दूरी और समझदारी के नए उसूल नहीं अपनाए, तो ऐसे सुर्खियां शायद और आम होती जाएंगी।

भारत का शोर उत्सव: जब हर जश्न लाउडस्पीकर बन जाता है!

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दिल्ली । भारत में एक चीज़ बहुत तेजी से विलुप्त हो रही है, खामोशी।
जैसे जंगलों से बाघ गायब होते हैं, वैसे ही शहरों से सन्नाटा।
यह देश त्योहारों का है, रस्मों का है, जुलूसों का है। लेकिन इन सबके बीच एक और चीज़ है, अखंड और असीम शोर।
शादी हो तो ऐसा लगता है मानो पूरा ब्रह्मांड नाचने बुलाया गया हो। घोड़ी पर बैठा दूल्हा, पीछे डीजे का ट्रक।बॉलीवुड के रीमिक्स 100 डेसिबल पर चीखते हुए। दूल्हे से ज्यादा थके हुए घोड़े के कान।
अजीब विडंबना है।
शादी प्यार का उत्सव है, लेकिन संगीत ऐसा कि दिल नहीं, कान फट जाएं।
और अगर आप सोचते हैं कि शोर सिर्फ खुशी का हिस्सा है, तो श्मशान घाट का चक्कर लगा लीजिए। अब तो उठावनी से भी शांति गायब हो चुकी है, प्रवचन बाज आ चुके हैं। वहाँ भी लाउडस्पीकर लगे मिलेंगे।
मृत्यु, जो कभी शांत, गंभीर और चिंतन का क्षण हुआ करती थी, अब एम्पलीफायर पर विदाई बन गई है।
भजन भी ऐसे बजते हैं जैसे स्वर्ग का दरवाज़ा खोलने के लिए भगवान को जगाना पड़ रहा हो।
भारत का त्योहार कैलेंडर किसी ध्वनि विस्फोट का टाइम टेबल जैसा है।होली आती है, ढोल, डीजे, चीखती भीड़। घिसे पिटे फिल्मी गाने।
कई तरह की चतुर्थी, जयंती, भंडारे, रात्रि जागरण, जयकारे, मूर्ति विसर्जन, बेचारे मच्छर भी बिलबिला जाते हैं! सड़कों पर जुलूस, ढोल-ताशे और सबवूफर। पूजा होती है, कोलकाता की गलियाँ थरथराती हैं।दीवाली पर आसमान पटाखों से नहीं, डेसिबल से भर जाता है। ऐसा लगता है जैसे हर त्योहार एक प्रतियोगिता हो रही है! कौन ज्यादा शोर मचा सकता है।
कागज पर नियम मौजूद हैं। 2000 के Noise Pollution Rules साफ कहते हैं कि रिहायशी इलाकों में दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल की सीमा है। अस्पतालों और स्कूलों के पास तो इससे भी कम। लेकिन कागज की दुनिया और भारतीय सड़कों की दुनिया में जमीन-आसमान का फर्क है।
दिल्ली और मुंबई में ट्रैफिक का औसत शोर 80 डेसिबल के आसपास रहता है। पीक आवर में यह 100 तक पहुंच जाता है। यानी हम रोज़ाना लगभग जेट इंजन की आवाज़ में जी रहे हैं। कोई प्रेशर हॉर्न बजाता है, कोई साइलेंसर निकलकर पूरी कॉलोनी के कई चक्कर लगाता है!
सवाल उठता है, हम इतने शोर-प्रिय क्यों हैं? इतिहास कुछ संकेत देता है।
प्राचीन भारत में युद्ध और विजय के समय शंख और नगाड़े बजते थे। ध्वनि को शक्ति का प्रतीक माना जाता था।
मान्यता थी कि तेज आवाज़ बुरी आत्माओं को दूर भगाती है और देवताओं का ध्यान आकर्षित करती है।
लेकिन आज का शोर आध्यात्मिक कम और सामाजिक प्रदर्शन ज्यादा है।
राजनीति ने इसे और बढ़ाया।
चुनावी रैलियाँ, माइक, स्पीकर, नारे, गाड़ियों के काफिले।
ऐसा लगता है लोकतंत्र की ताकत वोट में नहीं, लाउडस्पीकर में है।
धार्मिक मंच भी पीछे नहीं हैं।
हर उपदेशक के हाथ में माइक्रोफोन।
ज्ञान कम, वॉल्यूम ज्यादा।
टीवी डिबेट्स से लेकर मंदिर प्रवचन तक; एक ही नियम है: जो सबसे जोर से बोलेगा, वही जीतेगा।
फिर आया तकनीक का चमत्कार या आविष्कार, लाउडस्पीकर देव।
1920 के दशक में यह उपकरण थिएटर और सभाओं में स्पष्ट आवाज़ के लिए बना था। लेकिन भारत में यह सांस्कृतिक विस्फोटक साबित हुआ है। आजकल एक ही जगह पर सौ सौ decks लगाए जाते हैं, कोई चैन से न जीए।
आज हर मंदिर, हर मस्जिद, हर जुलूस, हर सभा, सबके पास अपनी ध्वनि सेना है। जहाँ पहले घंटी बजती थी, अब बास स्पीकर गूंजते हैं।
कभी-कभी लगता है कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता भक्ति से नहीं, वॉट्स से होकर जाता है।
दुनिया के सबसे शोर भरे शहरों की सूची में भारतीय शहर नियमित रूप से जगह बनाते हैं।
लगातार शोर का असर गंभीर है; हाई ब्लड प्रेशर, नींद की कमी, मानसिक तनाव, सुनने की क्षमता का ह्रास।
हर साल हजारों लोग समय से पहले बहरे हो जाते हैं; कारण कोई वायरस नहीं, डेसिबल।
लेकिन शोर का दायरा सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं। हिमालय की शांत घाटियाँ भी अब सुरक्षित नहीं रहीं।
त्योहारों और पर्यटन के मौसम में 90 डेसिबल तक शोर दर्ज किया गया है।
पक्षी घोंसले छोड़ देते हैं।
जानवर जंगलों में भाग जाते हैं।
प्रकृति, जिसे हमने ध्यान और योग की भूमि कहा था, अब लाउडस्पीकर के बीच ध्यान करने की कोशिश कर रही है।
विडंबना देखिए।
ऋषियों की भूमि में योग शिविर भी माइक्रोफोन पर चलते हैं। कोचिंग क्लासेज भी ! प्राणायाम की गहरी सांसें भी स्पीकर से गूंजती हैं।
खामोशी, जो आध्यात्मिक अनुभव की आत्मा है, अब एलिट शौक समझी जाती है। सच्चाई शायद थोड़ी असहज है।
यह शोर हमारी सांस्कृतिक ऊर्जा जितना ही हमारी सामूहिक बेचैनी का संकेत भी है। एक ऐसा समाज जहाँ हर कोई सुना जाना चाहता है। जहाँ ध्यान पाने का सबसे आसान तरीका है, आवाज़ बढ़ा देना।
इसलिए हर मंच पर माइक है।
हर जुलूस में स्पीकर।
हर गली में डीजे।
लेकिन सवाल अभी भी वही है?
क्या भगवान सचमुच इतने दूर हैं कि उन्हें सुनाने के लिए हमें 100 डेसिबल चाहिए?
या हम अपनी ही खालीपन को आवाज़ से भरने की कोशिश कर रहे हैं?
भारत की असली ताकत उसकी विविधता है, उसकी संस्कृति है, उसका उत्सव है।
लेकिन उत्सव का मतलब कोलाहल नहीं होना चाहिए।
कभी-कभी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान शोर नहीं, संयम होती है।
शायद समय आ गया है कि हम जश्न मनाना सीखें: बिना पड़ोसी के कान फाड़े। माइक थोड़ा कम।
ढोल थोड़ा धीमा। और शायद, बस शायद, भारत फिर से खामोशी की संगीत सुन सके।

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