म्यांमार के खनिज, भारत की रणनीति और चीन की चुनौती

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अंशुमान
दिल्ली । हाल ही हुई म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग की भारत यात्रा दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा और गति देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी गई। यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब भारत और म्यांमार क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने की दिशा में नए अवसर तलाश रहे हैं। इस दौरान दोनों देशों ने आपसी संपर्क को बेहतर बनाने, व्यापार एवं आर्थिक सहयोग का विस्तार करने तथा सीमा पार होने वाले अपराधों, तस्करी और अन्य अंतरराष्ट्रीय आपराधिक गतिविधियों से संयुक्त रूप से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।
यात्रा के बाद आयोजित संयुक्त प्रेस वार्ता में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग के बीच व्यापार, सीमा प्रबंधन और कनेक्टिविटी जैसे पारंपरिक मुद्दों के अलावा क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ तत्वों के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर भी विस्तृत चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने भी स्पष्ट किया कि भारत इस रणनीतिक क्षेत्र में म्यांमार के साथ दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करने का इच्छुक है। दरअसल, वैश्विक स्तर पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा और महत्वपूर्ण खनिजों की मांग को देखते हुए म्यांमार के विशाल रेयर अर्थ भंडार का महत्व लगातार बढ़ रहा है। हालांकि, इन संसाधनों की रणनीतिक उपयोगिता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही आवश्यक यह आकलन करना भी है कि मौजूदा राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियों में क्या म्यांमार भारत के लिए इन खनिजों का एक विश्वसनीय, स्थिर और दीर्घकालिक आपूर्तिकर्ता बन सकता है।
यही प्रश्न भारत की भविष्य की खनिज सुरक्षा रणनीति के केंद्र में है।आज म्यांमार दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रेयर अर्थ उत्पादक देश बन चुका है। वर्ष 2024 में यहां लगभग 31,000 टन रेयर अर्थ तत्वों का उत्पादन हुआ। म्यांमार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां डिस्प्रोसियम और टर्बियम जैसे भारी रेयर अर्थ तत्व बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों यानी EV, पवन ऊर्जा संयंत्रों, अत्याधुनिक चुंबकों और आधुनिक रक्षा उपकरणों के निर्माण में किया जाता है। दुनिया के अधिकांश देशों में हल्के रेयर अर्थ तत्व अधिक मिलते हैं, जबकि भारी रेयर अर्थ तत्व अपेक्षाकृत दुर्लभ होते हैं।
यही कारण है कि म्यांमार का महत्व और बढ़ जाता है। इन खनिजों का अधिकांश उत्पादन काचिन राज्य के चिपवी और मोमौक क्षेत्रों में होता है। पिछले एक दशक में यहां खनन गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। हालांकि, वर्ष 2021 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद नागरिक प्रशासन लगभग पूरी तरह कमजोर हो गया और कई इलाकों में सरकार का नियंत्रण समाप्त हो गया। परिणामस्वरूप, इन क्षेत्रों में बिना पर्याप्त सरकारी निगरानी और नियमों के बड़े पैमाने पर खनन जारी है।रेयर अर्थ के अलावा म्यांमार में टिन, टंगस्टन, और जेड जैसे बहुमूल्य खनिजों के भी विशाल भंडार हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स, विशेष मिश्रधातुओं और रक्षा उद्योग में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसलिए म्यांमार केवल रेयर अर्थ का ही नहीं, बल्कि कई रणनीतिक खनिजों का भी महत्वपूर्ण स्रोत है।
दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत रेयर अर्थ भंडार चीन के पास हैं और वैश्विक स्तर पर निकाले जाने वाले रेयर अर्थ तत्वों का लगभग 90 प्रतिशत प्रसंस्करण भी चीन ही करता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में चीन की लगभग एकाधिकार जैसी स्थिति बन गई है।हाल के वर्षों में चीन ने रेयर अर्थ खनिजों और उनसे जुड़ी प्रोसेसिंग तकनीक के निर्यात पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। इससे स्पष्ट हो गया कि वह इन संसाधनों का उपयोग केवल आर्थिक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक दबाव बनाने के लिए भी कर सकता है। ऐसे माहौल में म्यांमार के भारी रेयर अर्थ भंडार का महत्व और भी बढ़ जाता है।भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत के पास लगभग 69 लाख टन रेयर अर्थ ऑक्साइड का भंडार है, जो दुनिया के बड़े भंडारों में गिना जाता है। लेकिन इनमें अधिकांश हल्के रेयर अर्थ तत्व हैं। भारत का वैश्विक रेयर अर्थ खनन उत्पादन में योगदान एक प्रतिशत से भी कम है और प्रोसेसिंग तथा रिफाइनिंग क्षमता तो इससे भी बहुत कम है। इसलिए भारत की आवश्यकता उन भारी रेयर अर्थ तत्वों की है जो म्यांमार के काचिन क्षेत्र में बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं।
भारत ने वर्ष 2025 में राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन  शुरू किया। इसके अलावा खान एवं खनिज अधिनियम, 1957 में वर्ष 2023 और 2025 में संशोधन भी किए गए ताकि महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सके। इस दिशा में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड यानी IRELऔर खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड यानी KABIL जैसी संस्थाओं को भी मजबूत भूमिका दी गई है। सरकार समझती है कि केवल घरेलू संसाधनों से भारत की बढ़ती जरूरतें पूरी नहीं होंगी। इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा निर्माण जैसे क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती मांग को देखते हुए भारत को विदेशों से भी महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी।यहीं पर म्यांमार भारत के लिए स्वाभाविक विकल्प बनकर सामने आता है। भारत और म्यांमार की 1,643 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है। भौगोलिक निकटता के कारण म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया या अर्जेंटीना जैसे दूर स्थित देशों की तुलना में अधिक व्यावहारिक साझेदार बन सकता है, जहां KABIL पहले से खनिज खोज समझौते कर चुका है।हालांकि सबसे बड़ी चुनौती यह है कि म्यांमार के अधिकांश महत्वपूर्ण रेयर अर्थ भंडार सीधे वहां की सैन्य सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं। काचिन राज्य के जिन क्षेत्रों में सबसे अधिक खनिज मौजूद हैं, वहां नियंत्रण मुख्य रूप से काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी यानी KIA के पास है। वर्ष 2021 के सैन्य तख्तापलट और विशेष रूप से ऑपरेशन 1027 के बाद KIA ने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों का काफी विस्तार किया है।

इसका अर्थ यह है कि भारत यदि म्यांमार के रेयर अर्थ क्षेत्र में निवेश करना चाहता है तो केवल सरकार से समझौता करना पर्याप्त नहीं होगा। अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से उसे ऐसे सशस्त्र गैर-सरकारी संगठन से भी जुड़ने की चुनौती सामने आ सकती है जिसे म्यांमार की सरकार आधिकारिक मान्यता नहीं देती और जिसके साथ भारत का पहले कोई औपचारिक संवाद तंत्र भी नहीं रहा है।कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि चीन के निर्यात प्रतिबंधों के बाद भारत ने इस क्षेत्र के सशस्त्र समूहों के साथ चुपचाप रेयर अर्थ आपूर्ति की संभावनाएं तलाशनी शुरू की हैं। हालांकि इन दावों को  काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी और भारतीय अधिकारियों दोनों ने सार्वजनिक रूप से खारिज किया है। भारत की एक और बड़ी चुनौती चीन का पहले से स्थापित प्रभाव है। पिछले कई दशकों से चीन ने म्यांमार में सड़क, व्यापार और अन्य बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया है। उसने स्थानीय व्यापारियों और मध्यस्थों का मजबूत नेटवर्क भी तैयार कर लिया है। वर्तमान में काचिन राज्य से निकलने वाला अधिकांश रेयर अर्थ अयस्क सीधे चीन के युन्नान प्रांत पहुंचता है, जहां विशाल प्रोसेसिंग संयंत्र पहले से मौजूद हैं।चीन की कंपनियों ने केवल सरकारी समझौतों के आधार पर नहीं बल्कि स्थानीय सशस्त्र समूहों और मिलिशिया के साथ व्यावहारिक संबंध बनाकर इस व्यापार पर अपनी पकड़ बनाए रखी है। यही कारण है कि वर्ष 2018 के निर्यात प्रतिबंध, 2021 के सैन्य तख्तापलट और कई बार सीमा बंद होने के बावजूद यह व्यापार पूरी तरह बंद नहीं हुआ। यहां तक कि वर्ष 2024 में चीन ने युद्धविराम वार्ता के दौरान  काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी पर दबाव बनाने के लिए आंशिक व्यापार प्रतिबंध लगाए, लेकिन उसके बाद भी यह नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

इन सब घटनाक्रम के बाद भारत इन जटिल परिस्थितियों को अच्छी तरह समझता है। यही कारण है कि राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग की यात्रा के दौरान विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने केवल इतना कहा कि क्रिटिकल मिनरल्स का मुद्दा द्विपक्षीय विचार-विमर्श के तहत है और दोनों देश इस विषय पर संपर्क बनाए रखेंगे।इस यात्रा के दौरान न तो कोई समझौता ज्ञापन हुआ, न कोई खनिज खरीद समझौता और न ही किसी संयुक्त उद्यम की घोषणा की गई। इससे स्पष्ट है कि भारत फिलहाल बहुत सावधानी से आगे बढ़ना चाहता है। यदि भारत वास्तव में इस व्यापार का बड़ा हिस्सा अपनी ओर मोड़ना चाहता है तो केवल राजनीतिक समझौता पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए सड़क, बंदरगाह, परिवहन, वित्तीय निवेश और लॉजिस्टिक्स का ऐसा मजबूत ढांचा तैयार करना होगा जो अभी मौजूद नहीं है।

भारत की कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना और भारत–म्यांमार–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी दो प्रमुख संपर्क परियोजनाएं वर्षों से अधूरी हैं। इसका उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बंगाल की खाड़ी और दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ते हुए क्षेत्रीय व्यापार, संपर्क और सामरिक पहुंच को मजबूत करना है। किंतु वर्ष 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद राखाइन और चिन राज्यों में बिगड़ी सुरक्षा स्थिति ने इन परियोजनाओं की प्रगति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। हिंसा, सशस्त्र संघर्ष और अस्थिर प्रशासनिक व्यवस्था के कारण निर्माण कार्य बार-बार बाधित हुआ और समय-सीमा लगातार आगे खिसकती गई।

हाल ही में 9 जुलाई को आयोजित एक समन्वय बैठक में म्यांमार की सैन्य सरकार ने अपने कार्यकाल के भीतर दोनों परियोजनाओं को पूरा करने की प्रतिबद्धता दोहराई। हालांकि, जमीनी स्थिति अभी भी इस आश्वासन का समर्थन नहीं करती। परियोजनाओं के कई हिस्सों में सुरक्षित आवाजाही संभव नहीं है, जबकि अनेक मार्गों के पुनर्निर्माण और कुछ नए संपर्क मार्गों के विकास की आवश्यकता है। इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए केवल पर्याप्त वित्तीय निवेश ही नहीं, बल्कि स्थिर सुरक्षा व्यवस्था, प्रभावी प्रशासनिक समन्वय और अपेक्षाकृत शांत राजनीतिक वातावरण भी अनिवार्य है। मौजूदा परिस्थितियों में निकट भविष्य में ऐसी अनुकूल स्थिति बनती नहीं दिखती।  फिर भी, इन चुनौतियों से म्यांमार का भारत के लिए रणनीतिक महत्व कम नहीं होता। बल्कि यही परिस्थितियां इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि भारत को तात्कालिक लाभ की अपेक्षा दीर्घकालिक, यथार्थवादी और संतुलित रणनीति अपनानी होगी, जिसमें संपर्क परियोजनाओं, आर्थिक सहयोग और सामरिक हितों को म्यांमार की बदलती राजनीतिक एवं सुरक्षा परिस्थितियों के अनुरूप आगे बढ़ाया जाए।

मई 2026 में भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के बीच शुरू हुई क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव फ्रेमवर्क भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकती है। इस मंच के माध्यम से भारत ऐसे साझेदार देशों के साथ मिलकर काम कर सकता है जिनके पास पूंजी, आधुनिक तकनीक, खनिज प्रसंस्करण क्षमता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक अनुभव मौजूद है।विशेष रूप से जापान इस दिशा में उपयोगी सहयोगी साबित हो सकता है क्योंकि उसे खनिज प्रोसेसिंग और बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण का व्यापक अनुभव है। हालांकि अभी तक इस ढांचे के अंतर्गत म्यांमार से जुड़ा कोई औपचारिक कार्यक्रम शुरू नहीं हुआ है। इसका कारण यही है कि वहां अभी भी गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है और लगभग सभी बाहरी देश अत्यधिक सावधानी बरत रहे हैं।
इस स्थिति में कूटनीतिक दृष्टिकोण से भारत को नेपीडाॅ की सरकार के साथ संवाद जारी रखना चाहिए और GSI, KABIL तथा IREL जैसी संस्थाओं के माध्यम से तकनीकी और व्यावसायिक सहयोग बढ़ाना चाहिए। इससे भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, खनिज खोज और भविष्य के निवेश की संभावनाएं बनी रहेंगी, भले ही अभी बड़े पैमाने पर खनन संभव न हो। इसके अलावा भारत को क्वाड जैसे छोटे लेकिन प्रभावी बहुपक्षीय समूहों का अधिक उपयोग करना चाहिए। जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ साझेदारी से भारत को निवेश, प्रोसेसिंग तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने में मदद मिल सकती है। तीसरा, भारत की नीति इतनी लचीली होनी चाहिए कि वह म्यांमार की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल सके। गृह संघर्ष अभी समाप्त होने से बहुत दूर है और भविष्य में अलग-अलग क्षेत्रों पर अलग-अलग पक्षों का नियंत्रण हो सकता है। इसलिए भारत को केवल सैन्य सरकार या केवल प्रतिरोधी समूहों पर निर्भर रहने के बजाय ऐसी नीति अपनानी चाहिए जो वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार प्रभावी नियंत्रण रखने वाले पक्षों के साथ व्यावहारिक संवाद की गुंजाइश बनाए रखे, जबकि उसकी व्यापक विदेश नीति के सिद्धांत भी सुरक्षित रहें।
अंततः भू राजनीतिक तौर पर देखें तो म्यांमार को भारत के लिए तत्काल समाधान के रूप में नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। इस अवसर को वास्तविक सफलता में बदलने के लिए दोनों देशों की केंद्रीय और राज्य स्तरीय एजेंसियों के बीच लगातार सहयोग, संपर्क परियोजनाओं का समय पर पूरा होना, सुरक्षित परिवहन मार्ग, पर्याप्त प्रोसेसिंग क्षमता और म्यांमार की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप लचीली नीति आवश्यक होगी।जब तक ये सभी परिस्थितियां अनुकूल नहीं होतीं, तब तक म्यांमार का विशाल रेयर अर्थ खनिज भंडार भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संभावना तो रहेगा, लेकिन उसे पूरी तरह व्यावहारिक और उपयोगी संसाधन में बदलने में अभी समय लगेगा।

पश्चिम ने लेखन का उपयोग किया साम्राज्य निर्माण में

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राकेश उपाध्याय

 

दिल्ली। मनु स्मृति का जब जब उल्लेख होगा तो विलियम जोन्स का नाम मनु के साथ जुड़ा ही रहेगा। कारण ये है कि वर्तमान मनु स्मृति का मूल संपादन तो विलियम जोन्स ने ही किया था। इस प्रकार मनु स्मृति के नाम पर जो संकलन है, उसकी एक-एक पंक्ति यदि किसी की निगाह से प्रकाशन के पहले गुजरी थी तो वह विलियम जोन्स ही थे। इसीलिए मैं इसे जोन्स स्मृति कहने से नहीं हिचकता।

मुझे विलियम जोन्स से जुड़े अनेक मौलिक दस्तावेजों को देखने का अवसर मिला है। मेरे गुरुदेव पूज्य प्रो. स्व. कमलेश दत्त त्रिपाठी की प्रेरणा थी कि मैं इस पर ध्यान दे सका।
हुआ यह था कि मैं कौटिल्य अर्थशास्त्र पर एक लेक्चर की तैयारी कर रहा था। उसी समय कौटिल्य अर्थशास्त्र में मुझे अनेक स्थानों पर मनु के उद्धरण दिखाई दिए। कौटिल्य ने बड़े सम्मान से मनु का जिक्र अनेक नीतिपरक वाक्यों में किया है।

जनपद स्थापना के अध्याय में कौटिल्य ने शूद्र वर्ण के अधिकारों की चर्चा की है, ग्राम बसावट में शूद्र वर्ण की पूरी व्यवस्था सुनिश्चित की और विद्या अधिकार में भी शूद्र वर्ण को संपूर्ण सुविधा के निर्देश हैं।
तभी मेरे मन में प्रश्न उठा था कि ये जो आज की मनु स्मृति है, इसके भीतर के विभेदकारी वाक्यों को कौटिल्य ने आखिर क्यों स्वीकार नहीं किया? अथवा ये मनु स्मृति कौटिल्य के सामने थी ही नहीं, कोई और थी? गुरुवर ने तब समाधान दिया।

उन्होंने मुझे अनेेक अनुभव सुनाए और प्रेरित किया कि मैं विलियम जोन्स के पत्रों के संग्रह का अवलोकन करूं जिसे उनकी मौत के बाद उनके मित्र लॉर्ड टीगनमाउथ ने 1807 में Memoirs of the life, writings and correspondence of Sir William Jones के नाम से पुस्तक रूप में लंदन से प्रकाशित किया है। टीगनमाउथ ही वारेन हेस्टिंग्स के बाद 1793 में बंगाल के गवर्नर जनरल नियुक्त हुए थे। उन्हें जॉन शोर के रूप में जाना गया।
उल्लेखनीय है कि विलियम जोन्स का निधन 27 अप्रैल 1794 को हुआ था। इसी वर्ष उन्होंने मनु स्मृति का संपादित दूसरा अंग्रेजी संस्करण भी इंस्टीट्यूट ऑफ हिंदू लॉ के रूप में प्रकाशित कर दिया था। यही प्रारंभिक दौर था जबकि अंग्रेज जाति मनु स्मृति की खोज कर उसे प्रकाशित करने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही थी।

इस पुस्तक में अनेक मौलिक और विचारणीय संदर्भ हैं। 14 सितंबर 1790 दिनांकित एक चिट्ठी मूल रूप में ऊपर वर्णित पुस्तक में है। विलियम जोन्स ने इसे कृष्णा नगर, कोलकाता से किन्हीं डॉ. प्राइस को लिखा है। वह अपने कार्य का ब्यौरा देते हुए लिखते हैं कि-

“हमारे नियंत्रण में बीस मिलियन (दो करोड़) भारतीय नागरिक/प्रजा हैं (मैं यह बात पुख्ता जानकारी के साथ कह रहा हूँ), जिनकी पारंपरिक  विधिशास्त्र को मैं इस समय संकलित और व्यवस्थित कर रहा हूँ, इस आशा के साथ कि उनकी संपत्ति उनके और उनके उत्तराधिकारियों के लिए सुरक्षित की जा सके।” (पृ. 422, टिगनमाउथ)
18 अक्टूबर 1791 दिनांकत पत्र जोसेफ बैंक्स ( अध्यक्ष, रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ लंदन) को संबोधित है। इसमें विलियम जोन्स ने बहुत सी दुर्लभ भारतीय वानस्पतिक प्रजातियों का विस्तृत ब्यौरा दिया है।
इसके अंतिम पैरा में उन्होंने अपने स्वास्थ्य से आशंकित होकर लिखा है कि-

”मैं आपको संस्कृत, अरबी की अनमोल पांडुलिपियों से भरा बक्सा भेज रहा हूं। यह आपके संरक्षण में रहेगी। मेरे इंग्लैंड लौटने पर आप इसे मुझे सौंप दीजिएगा।…और यदि मैं चीन की समुद्री यात्रा के बीच ही मर जाता हूं या ईरान की समुद्री यात्रा के मध्य ही मेरा निधन हो जाता है तो आप अपनी इच्छा से इन पांडुलिपियों का निस्तारण कर दीजिएगा।” (p.434, टीगनमाउथ) 20 अक्टूबर 1791 को वॉरेन हेस्टिंग्स को संबोधित पत्र में विलियम जोन्स ने लिखा है कि-

यहां पंडितों के साथ मैं उनकी देववाणी संस्कृत में धाराप्रवाह बातचीत करता हूं। कोर्ट के काम के अतिरिक्त मैं मनु के अनुवाद में जुटा हूं। इस बारे में मेरे कहे अनुसार ग्रंथ संपादित हो रहा है।

…सैमुएल डेविस ने सूर्य सिद्धांत का अंग्रेजी अनुवाद किया है, उसे इंडियन एस्ट्रोनॉमी (भारतीय खगोल विज्ञान) के अध्ययन में लगाया है और विल्फोर्ड मेरे मार्गदर्शन में बनारस का भोगौलिक अध्ययन कर रहे हैं. मुझे पता चला है कि स्कंद पुराण में उन्हें अफ्रीका, यूरोप और यहां तक कि ब्रिटेन का भी संदर्भ मिल गया है। भारत के राजनीतिक मामलों में बहुत निश्चितता के साथ नहीं कह सकता लेकिन मैसूर में हालात हमारे अनुकूल नहीं हैं।
इसी पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 438 पर लेखक टीगनमाउथ मनु स्मृति के अनुवाद के पीछे के कारण को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-

“In the beginning of 1794, Sir William Jones published a work in which he had long been engaged: a translation of the Ordinances of Manu, comprising the Indian system of religious and civil duties. This task was suggested by the same motives that had induced him to undertake the compilation of the Digest, to aid the benevolent intentions of the Legislature of Great Britain…”

“1794 के प्रारंभ में, सर विलियम जोन्स ने एक ऐसी कृति प्रकाशित की जिसमें वे लंबे समय से जुटे थे: मनु के निर्देशों (मनुस्मृति) का एक अनुवाद, जिसमें धार्मिक और नागरिक कर्तव्यों की भारतीय संहिता शामिल थी। इस कार्य की प्रेरणा उन्हीं उद्देश्यों से मिली थी जिन्होंने उन्हें ‘डाइजेस्ट’ (कानूनी संकलन) तैयार करने के लिए प्रेरित किया था, ताकि ग्रेट ब्रिटेन की संसद (विधायिका) के परोपकारी इरादों को पूरा करने में सहायता दी जा सके…”
इसी में पृष्ठ क्रमांक 439 पर लिखा है कि-

“…yet I wish to complete the system of indian laws while I remain in India, because I wish to perform whatever I promise, with the least possible imperfection, so that they might administer justice to the Indians according to their own laws.”

“…फिर भी मेरी इच्छा है कि मैं भारत में रहते हुए ही भारतीय कानूनों की इस प्रणाली (संकलन) को पूरा कर लूँ, क्योंकि मैं जो भी वादा करता हूँ, उसे न्यूनतम संभव त्रुटि (कम से कम कमियों) के साथ निभाना चाहता हूँ, ताकि वे (ब्रिटिश न्यायाधीश) भारतीयों को उनके अपने ही कानूनों के अनुसार न्याय प्रदान कर सकें।”

दरअसल ब्रिटिश सुप्रीम कोर्ट के जजों का बंगाली पंडितों से बहुत से न्यायिक विषयों में वाद-विवाद हो जाता था। जजों का आरोप था कि पंडित लोग मनमाने तरीके से व्याख्या कर रहे हैं। हर पंडित के पास अपनी अलग विधि संहिता है, जहां वह कई तरह से विधि की व्याख्या करता है। इसलिए एक कॉमन संहिता जरूरी हो गई। इसी कारण से विलियम जोन्स जो पहले से भाषाविद् थे, उन्होंने संस्कृत भाषा के लिए पंडित रामलोचन को अपना शिक्षक नियुक्त किया। और कुछ ही वर्षों में वह खुद भी विद्वान बन गए।

उन्होंने उस समय के बड़े बंगाली विद्वानों की सूची तैयार की। सबके पास जो भी विधि संहिता की मूल पांडुलिपियां थीं, उन्होंने मुंहमांगे दाम पर एकत्रित करनी प्रारंभ कर दी। 11 बंगाली पंडितों की समिति गठित की गई। उस समिति को देश भर से जुटाए गई पोथियां दी गईं। इसमें अनेक पाठ, मत-मतांतर शामिल थे।

विलियम जोन्स जीवन भर खुद को भारत की विद्याओं के लिए समर्पित करते रहे। लेकिन चुपके से उन्होंने कई विषबीज रोप दिए। आर्यों के आगमन का सिद्धांत वही लेकर आए। उन्होंने सिद्धांत दिया कि संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, जर्मनिक और पर्शियन (फारसी) भाषाओं के व्याकरण और शब्दों में गहरी समानता है। ये सभी भाषाएँ एक ही मूल भाषा परिवार से निकली हैं, जिसे बाद में ‘इंडो-यूरोपियन भाषा परिवार’ कहा गया।

भाषा विज्ञान से जुड़ी जोन्स की इस खोज ने ही अनजाने में यूरोप और भारत के लोगों के एक ही मूल (आर्य) से जुड़े होने के विचार की नींव रखी, जिसमें यह संकेत उन्होंने ही दिया कि आर्यों का बाहर से आगमन हुआ था। इसके साथ वह बहुत सी गलत व्याख्याएं करते चले गए। किसी ने उस समय उन्हें चुनौती नहीं दी।

बहुत से विद्वान विलियम जोन्स की विद्वत्ता पर मुग्ध रहते हैं। उनके विरुद्ध कोई शब्द सुनना ही नहीं चाहते। तर्क दिया जाता है कि वह शुद्ध वि्दवान थे, उनके मन में कोई और दूषित तत्व नहीं था। हालांकि लॉर्ड टीगनमाउथ ने पृष्ठ 453 पर स्वयं ही लिखा है कि-

The conversion of the hindus to the Christian religion would have afforded him the sincerest pleasure, his wish that it should take place , is still more clearly expressed in his hymns to Lachsmi.

“हिंदुओं का ईसाई धर्म में परिवर्तन (धर्मातंरण) से उन्हें सबसे सच्ची प्रसन्नता मिलती; ऐसा होने की उनकी यह इच्छा, देवी लक्ष्मी को समर्पित उनकी कविता (Hymns to Lakshmi) में और भी अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है।”

वस्तुतः विलियम जोन्स ने हिंदु ग्रंथों में वर्णित अनेक देवी-देवताओं पर मौलिक कविता जैसी पंक्तियां लिखी थीं। इसी में एक कविता लक्ष्मी माता पर है जिसमे उन्होंने अंत में संकेत में अपनी कुत्सित मनोवृत्ति का परिचय दिया है कि भारत के लोग अंततः ‘अज्ञानता के अंधकार’ से निकलकर ‘ईसाई धर्म के प्रकाश’ (सत्य) को स्वीकार कर लें, इसी में सबकी भलाई है।

कुछ यही विचार व्हाइट्स मेन बर्डेन में रूडयार्ड किपलिंग ने विलियम जोन्स के गुजर जाने के 100 साल बाद प्रकट किए थे।

जैसे जोन्स का मानना था कि हिंदू धर्म और उसकी संस्कृति कितनी भी समृद्ध क्यों न हो, वह ईसाई धर्म से नीचे है। उनकी इच्छा थी कि भारत के लोग अपनी अज्ञानता छोड़कर ईसाई धर्म को अपना लें।
रुडयार्ड किपलिंग की भी यही भावना दिखती है। किपलिंग ने 1899 में लिखी अपनी कविता में गैर-सफेद (एशियाई और अफ्रीकी) लोगों को नस्लभेद के आधार पर “अधूरे शैतान और अबोध” (Half devil and half child) कहा है।
उनका मानना था कि इन ‘अंधकार में जीने वाले जंगली लोगों’ को सभ्य बनाना, इन्हें ईसाई मूल्यों से परिचित कराना और इन पर शासन करना गोरे लोगों (White Men) का एक नैतिक और कष्टदायी कर्तव्य (Burden/बोझ) है।
इस प्रकार दोनों ही यह मानते हैं कि भारतीय या गैर-यूरोपीय लोग आध्यात्मिक और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए हैं और उन्हें “सभ्यता के प्रकाश” (जो कि ईसाईयत और पश्चिमी तौर-तरीके हैं) की जरूरत है।

मनु स्मृति का अनुवाद ब्रिटिश सरकार ने जिस मकसद से किया था, उसका असर आज पूरे विषैले मकर-जंजाल  के रूप में भारतीय जीवन धारा पर छाया दीख रहा है। इससे मुक्ति आवश्यक है।

विलियम जोन्स ने मनु स्मृति के रूप में वस्तुतः विषबीज का वपन किया था। इसमें उसने षड्यंत्र पूर्वक मिलावट की थी। यही ग्रंथ आगे मनु स्मृति के अन्य प्रकाशनों का मूल आधार बना। इसे स्वामी दयानंद सरस्वती ने चुनौती दी।
इसकी मिलावट को उन्होंने 1870-75 के आस-पास दिए गए अपने प्रवचनों में स्पष्ट बता दिया था। कालांतर में उनके शिष्यों ने भी शोधपूर्वक बताया कि मनुस्मृति के कुल 2,685 श्लोकों में से 1,471 श्लोक मिलावटी (नकली) हैं और केवल 1,214 श्लोक ही महर्षि मनु के मूल श्लोक हैं।

वस्तुतः पूरा एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल मिलावट के काम में चुपचाप सक्रिय था। रिश्वत देकर जो ब्रिटिश अफसरों ने चाहा, उसे लिखवाया गया। भारतीय राजनीति, प्रशासन, समाज और भारत की समस्त देशी संरचनाओं पर कहर बरपा दिया गया।

कल्पना करिए कि इसी मिलावटी मनु स्मृति को गढ़कर, फिर उसे पढ़ने के लिए राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, पुणे में ज्योतिराव फुले, बाद में डॉ. भीमराव अंबेडकर को भी यही मिलावटी ग्रंथ थमा दिया गया तो इनके मन में क्या विचार पनपा होगा।

बारी-बारी सभी अंग्रेजों की गलत शिक्षा, षड्यंत्र के शिकार हुए, किंतु किसी ने यह नहीं सोचा कि अंग्रेजों के आगमन के बाद ही मनु स्मृति आदि भारतीय इतिहास के पन्नों को लेकर विभ्रम पैदा किया जा रहा है तो क्यों किया जा रहा है। आखिर क्यों चोखामेला महार ने, या संत शिरोमणि रैदास ने मनु स्मृति पर तीखे सवाल नहीं किए थे। आखिर कबीर जैसा अध्येता क्यों मनु स्मृति पर खामोश रह गया। मतलब साफ है कि ऐसी कोई स्मृति थी ही नहीं।
विलियम जोन्स ने 1882 से 1894 के 12 सालों में(1782 से 1794 corrected) भारत के विध्वंस की पूरी तकनीकी तैयार की। इसी तकनीकी पर आगे बांटों और राज करो की राजनीति ब्रिटिश अफसरों ने विकसित की। इसी राजनीति को हमारे देश के अनेक नेता आज भी बढ़ाने में जुटे हैं। ऐसे तत्वों से मुक्ति का यही समय है, सही समय है। हमें अकादमिक रीति से प्रारंभ करना होगा। सप्रमाण आगे बढ़ना होगा।

(मार्च 1783 में ब्रिटिश सम्राट ने विलियम जोन्स को बंगाल सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में नियुक्त किया था और जोन्स ने सितंबर 1783 में भारत आकर कार्यभार ग्रहण कर लिया। उन्हें कालांतर में सर की उपाधि मिली। 15 जनवरी 1784 को गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स के मार्गदर्शन में उन्होंने एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना की। पहले अध्यक्ष के रूप में वॉरेन हेस्टिंग्स का नाम प्रस्तावित था, किंतु व्यस्त होने के कारण हेस्टिंग्स ने अध्यक्ष के रूप में विलियम जोन्स को ही नामित किया। पहली बैठक की अध्यक्षता रॉबर्ट चैंबर्स ने की जो बाद में रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ लंदन के अध्यक्ष नियुक्त हुए।)

Saudi Jets over Iraq: When the Ghost of Karbala Entered a Modern War

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Arpit jain

Delhi : The first shock came from the sky. The second came from history.

When Saudi fighter aircraft joined the United States in striking Popular Mobilisation Forces positions across Iraq, Riyadh did more than retaliate against alleged drone attacks on its oil infrastructure. It crossed a political threshold. The operation was widely described as Saudi Arabia’s first publicly acknowledged military intervention inside Iraq since the 1991 Gulf War—and the first time Riyadh had openly joined American strikes in the present conflict with Iran.

The PMF said at least 20 of its members were killed and 32 wounded. Funerals followed. Protesters in Baghdad demanded the expulsion of the Saudi ambassador. Kataib Hezbollah warned that a response was inevitable. The airstrikes may have destroyed weapons and logistics sites, but they also handed Iran-aligned factions something equally valuable: a grievance capable of mobilising Iraq’s Shia street.

Saudi Arabia says drones launched from Iraqi territory had targeted petroleum facilities in Riyadh and the Eastern Province. US Central Command said more than 30 drone attacks had been directed by Iran’s Islamic Revolutionary Guard Corps against American forces and Saudi energy infrastructure within 72 hours. Iraqi factions denied responsibility, suggesting Yemen’s Houthis were behind the attacks. Baghdad said it was investigating when the bombs fell.

Riyadh invoked Article 51 of the United Nations Charter and called the operation self-defence. Iraq called it a violation of sovereignty. The PMF saw something more combustible: a Sunni Arab monarchy ruled by the House of Saud attacking armed Shia formations on Iraqi territory.

In the Middle East, geography has a memory.

Karbala has the longest one.

The modern strikes were not an attack on the shrine of Imam Husayn. Saudi Arabia in 2026 is not the Emirate of Diriyah. Crown Prince Mohammed bin Salman’s state is built around investment, technology and economic transformation, not the territorial expansionism of an eighteenth-century Najdi emirate.

Yet historical memory does not operate like a court of law. It does not ask whether two events are identical. It asks whether they feel connected.

In 1801—or April 1802, according to the chronology accepted by many historians—forces of the First Saudi State entered Ottoman Iraq and sacked Karbala. Led by Saud bin Abdulaziz, thousands of fighters attacked the city, killed inhabitants and plundered the shrine of Husayn ibn Ali, the Prophet Muhammad’s grandson and the central martyr of Shia Islam. Academic accounts describe the campaign as explicitly sectarian pillage.

The raid combined strategy, wealth and doctrine. The Saudi-Wahhabi alliance was expanding beyond Najd. Karbala’s shrine contained valuable donations. But ideology supplied the moral licence. The movement associated with Muhammad ibn Abd al-Wahhab condemned shrine veneration and several Shia religious practices as unacceptable innovations, even forms of polytheism.

To the attackers, Karbala represented religious corruption. To Shias, its desecration represented an attack on faith, identity and the family of the Prophet.

More than two centuries later, the PMF does not need to prove that 1802 has returned. It only needs Iraqi Shias to feel that it might have.

That is the hidden danger of the Saudi intervention. A destroyed warehouse can be rebuilt. Missiles can be replaced. Historical trauma, once reactivated, becomes political ammunition.

The Sunni-Shia division began with the dispute over political and religious leadership following the Prophet’s death. But the conflict did not remain a theological argument. The killing of Imam Husayn at Karbala in 680 gave Shia Islam its enduring narrative of martyrdom: a righteous minority confronting overwhelming and illegitimate power.

Empires later weaponised the division. The Ottoman-Safavid contest gave sectarian identity territorial borders. Iran’s 1979 revolution transformed Shia political mobilisation into a challenge to the conservative Arab order. The American invasion of Iraq in 2003 then overturned a Sunni-dominated regime and opened Baghdad to Shia parties, several with deep connections to Tehran.

Saudi Arabia watched Iran gain what geography had long denied it: strategic depth through Iraq, Syria and Lebanon. Tehran presented itself as the defender of Shia communities and the sponsor of an “axis of resistance.” Riyadh positioned itself as a leading Sunni Arab power resisting Iranian expansion.

The rivalry spread. Hezbollah became Iran’s dominant partner in Lebanon. Syria turned into a regional battlefield. Bahrain’s Shia opposition was viewed through the lens of Iranian influence. Yemen’s Houthi movement brought the conflict to Saudi Arabia’s southern border and the Red Sea. Local struggles were absorbed into a larger confrontation in which sectarian identity supplied the slogans and geopolitical competition supplied the weapons.

Iraq became the most valuable arena because it is Arab, oil-rich and Shia-majority. It is also institutionally divided.

The PMF emerged as a powerful force in 2014 after the Iraqi army collapsed before Islamic State, a violently anti-Shia Sunni extremist organisation. Its fighters helped stop the jihadist advance and gained enormous legitimacy. Baghdad later incorporated the PMF into the national security structure, yet several factions retained independent commanders, economic networks and close ties to Iran.

This contradiction now sits at the centre of the crisis. Washington and Riyadh describe their targets as Iranian proxies. Baghdad must explain why foreign aircraft bombed men formally attached to the Iraqi state. PMF leaders can present themselves simultaneously as national soldiers, victims of foreign aggression and guardians of the Shia community.

Prime Minister Ali al-Zaidi faces a trap with no clean exit. His government has pledged to bring weapons under state control by September 30, when remaining American forces are expected to withdraw. Powerful factions such as Kataib Hezbollah have rejected disarmament. Before the airstrikes, al-Zaidi could argue that militias would have no justification for retaining independent arsenals after the US departure. Now their commanders have a devastating reply: who will defend Iraq when American and Saudi aircraft return?

Riyadh faces its own paradox. The operation was intended to restore deterrence. But by joining strikes inside Iraq, Saudi Arabia may have damaged the PMF militarily while rescuing it politically. Tehran could hardly design a more effective recruitment image than Saudi jets over Iraqi soil as Shia pilgrims travelled towards the holy cities.

None of this means the present confrontation is merely another round of an eternal Sunni-Shia war. That argument is attractive because it is simple. It is also wrong.

Saudi Arabia and Iran are competing over strategic depth, energy routes, regime security, American power and the political future of the Arab world. Religion does not explain every missile launch. It does, however, provide the language through which power struggles are legitimised—and through which compromise becomes betrayal.

Baghdad must now decide whether it is a sovereign state with one military or an arena containing several armies. If al-Zaidi moves forcefully against the militias, he risks being branded Washington and Riyadh’s local enforcer. If he retreats, Iraq remains a launch pad for Iran’s regional network and a target for further Saudi or American retaliation.

In 1802, fighters from Najd entered Karbala carrying swords, muskets and a doctrine that treated the shrine as an offence. In 2026, Saudi pilots arrived with precision weapons, intelligence support and a legal claim of self-defence.

The methods have changed. The Saudi state has changed. The strategic contest has changed.

But across the Shia political imagination, one image may survive every qualification: armed power from Arabia has again crossed into Iraq.

And once Karbala enters the argument, a military confrontation stops being only strategic.

It becomes sacred.

अखिल भारतीय हिंदू महासभा की लीडरशिप पर आरोप, पांच अगस्त को पाटियाला हाउस कोर्ट में अहम सुनवाई

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– चुने गए सदस्यों का आरोप दो दशकों से महासभा अनाधिकृत नियंत्रण में
– स्वघोषित अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणी महाराज की पहचान और दस्तावेज पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं
नई दिल्ली : अखिल भारत हिंदू महासभा (ABHM) से जुड़ा एक लंबे कानूनी और प्रशासनिक विवाद की आगामी पांच अगस्त को पटियाला हाउस कोर्ट में अहम सुनवाई होगी। अखिल भारतीय हिंदू महासभा एक दशक से भी पुराना ऐतिहासिक महत्व वाला सामाजिक राजनीतिक संगठन है। महासभा के चयनित सदस्यों का आरोप है कि सबसे पुराने और राजनीनिक महत्व के हिंदुओं के इस अहम संगठन पर अनाधिकृत लोगों ने कब्जा कर रखा है। सदस्यों ने जारी एक बयान में कहा कि उन्होंने न्यायपालिका से आग्रह किया है कि वह हिंदु महासभा की संपत्तियों और दस्तावजों पर कब्जा करने वाले स्वामी चक्रपाणि नाम के व्यक्ति की पहचान और सदस्यता की गंभीर पड़ताल करें।
मालूम हो कि अखिल भारतीय हिंदू महासभा की चयनित सदस्यों में श्री दिनेश चंद्र त्यागी को वर्ष 2006 में संगठन के वैध राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर चुना गया। उनका दावा है कि लीडरशिप को लेकर चल रही कानूनी चुनौती के बावजूद, स्वामी चक्रपाणि ने भारत के चुनाव आयोग और मीडिया के सामने खुद को ABHM के अधिकृत पदाधिकारी के रूप में पेश किया। चुनी हुई टीम का यह भी आरोप है कि बाद में संगठन के नाम और प्रतिष्ठा का इस्तेमाल निजी हितों के लिए किया गया, जिससे लंबे समय तक कानूनी मुकदमे और प्रशासनिक विवाद हुए।
इस मामले को संगठन के अंदरूनी विवाद से कहीं आगे का मामला बताते सदस्यों का कहना है कि महासभा के नये चयनित सदस्यों ने लीडरशिप ने सभी दस्तावेज़ी सबूतों की पारदर्शी न्यायिक जांच की मांग की है। उनका कहना है कि इसके नतीजे का असर ऐतिहासिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता के भरोसे पर पड़ेगा। यह मामला अभी नई दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में चल रहा है और अगली सुनवाई 5 अगस्त 2026 को तय की गई है।
प्रेस बयान में स्वघोषित अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि की पहचान पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिसमें उन दस्तावेजों का हवाला दिया गया है जो कथित तौर पर अदालत के सामने पेश किए गए हैं। महासभा के चयनित सदस्यों के अनुसार वर्ष 2005 में जारी राशन कार्ड में “चक्रपाणि महाराज” की पहचान बी. लाल के बेटे के रूप में की गई है, जिनका जन्म वर्ष 1933 है। हालांकि, उनका आरोप है कि 2007 में जारी पासपोर्ट में व्यक्ति का जन्म वर्ष 1975 दर्ज है, जिसमें जनार्दन देव और श्याम प्यारी देवी को उनके माता-पिता के रूप में नामित किया गया है। वे इसके तुरंत बाद जारी एक गजट अधिसूचना की ओर भी इशारा करते हैं, जिसमें कथित तौर पर बी. लाल के बेटे राजेश श्रीवास्तव से स्वामी चक्रपाणि महाराज में नाम परिवर्तन दर्ज है, जबकि उनका दावा है कि गजट में दी गई जानकारी पासपोर्ट और पहले के राशन कार्ड, दोनों से अलग है।
चयनित लीडरशिप ने वर्ष2012 में जारी जन्म प्रमाण पत्र और वर्ष 2022 में फिर से जारी पासपोर्ट का भी जिक्र किया है, और आरोप लगाया है कि इन दस्तावेजों में व्यक्ति के माता-पिता और पहचान के संबंध में और भी विसंगतियां हैं। उनका दावा है कि चक्रपाणि जी महाराज के मूल जन्म पहचान स्थापित करने वाला कोई ठोस दस्तावेजी सबूत अदालत के सामने पेश नहीं किया गया है और आरोप है कि स्थायी आवासीय पते के बजाय ABHM के पंजीकृत कार्यालय के पते का उपयोग करके कई पहचान दस्तावेज जारी किए गए थे।
अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सदस्यों का यह भी कहना है कि अदालतों ने पिछले कुछ सालों में संगठन में किसी व्यक्ति की सदस्यता और चुनाव से जुड़े मामलों की जांच नहीं की है। उनका यह भी दावा है कि तथाकथित स्वामी चक्रपाणि ने वर्ष 2012 और 2022 में सुप्रीम कोर्ट में जो अपीलें दायर की थीं, उन्हें खारिज कर दिया गया था। इसके अलावा, चुनी हुई लीडरशिप ने धार्मिक संस्थाओं से जुड़े घटनाक्रमों का ज़िक्र करते हुए आरोप लगाया है कि भले ही अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने 2018 में स्वामी चक्रपाणि को ब्लैकलिस्ट कर दिया था, लेकिन बाद में जूना अखाड़ा ने उन्हें जगद्गुरु शंकराचार्य घोषित कर दिया। प्रेस बयान में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है और कानूनी कार्यवाही चल रही है। बयान में स्वामी चक्रपाणि या उनके प्रतिनिधियों की ओर से कोई प्रतिक्रिया शामिल नहीं थी।
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