मिथक गढ़ने में बहुत कुशल होते हैं वामपंथी

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कोलकाता । अभी लेनिन की चार पाँच दिनों से ज़्यादा याद सताने लगी है तब से सोशल मीडिया पर एक मिथक घुमा रहे हैं।

उनका रचा मिथक यह है कि जब भगतसिंह को फाँसी होने वाली थी तो वे लेनिन की पुस्तक पढ़ रहे थे और उन्होंने कहा कि रुको अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से बात कर रहा है।

सबसे पहले तो यह कि पढ़ने से आप उस विचारधारा के अनुयायी हो जाते हैं क्या? तब तो हम जैसे बहु-अधीत क्या क्या न हुए।

पर सवाल यह है कि वामपंथी दावे का कोई प्रत्यक्ष प्रामाणिक जेल रिकॉर्ड (जैसे आधिकारिक जेल लॉग, वार्डर की आधिकारिक रिपोर्ट या एक्जीक्यूशन सर्टिफिकेट) क्यों उपलब्ध नहीं है।

प्राण नाथ मेहता (भगत सिंह के वकील) ने उन्होंने 23 मार्च 1931 को फाँसी से कुछ घंटे पहले मुलाकात की। उन्होंने भी इस पंक्ति का कोई उल्लेख नहीं किया।

इस मिथक के भी दो मुख्य संस्करण चलते हैं क्योंकि पुस्तक का नाम ठीक ठीक स्थिर नहीं कर पाये हैं — क्लारा जेटकिन की Reminiscences of Lenin (विकिपीडिया और कई वामपंथी स्रोतों में) या लेनिन की खुद की State and Revolution।

1931 में The Hindu, Bombay Chronicle आदि में फाँसी की खबर है, विरोध का उल्लेख है, संपादकीय छपे, लेकिन सेल के अंदर की यह निजी घटना नहीं।

मनमथनाथ गुप्त इसे प्रचारित करने वाले शख़्स थे पर उन्होंने भी इसे दूसरे क्रांतिकारियों से सुना था। मन्मथनाथ गुप्त स्वयं मार्क्सवादी क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के सदस्य थे।

जबकि ऐतिहासिक सच्चाई यह थी कि 13 नवंबर 1930 को The Workers’ Weekly CPI के मुखपत्र ने भगतसिंह और उनके साथियों के कार्यों को “a psychology of revenge and not revolution” कहकर आलोचना की थी।तब लाहौर षड्यंत्र केस का मुक़दमा चल रहा था।

और जो लोग गाँधी जी की आलोचना यह कहते हुए करते हैं कि उन्होंने भगत सिंह की फाँसी को रुकवाने में कोई मदद नहीं की, वे स्वयं कम्युनिस्टों की आलोचना नहीं करते कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने अपने किसी अधिवेशन या सम्मेलन में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी न देने का कोई औपचारिक संकल्प (resolution) पारित नहीं किया।

बल्कि यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि रणदिवे और मुजफ्फर अहमद आदि कम्युनिस्टों ने भगतसिंह और उनके साथियों को एडवेंचरिस्ट और काउंटर प्रोडक्टिव कहा था। मजे की बात है कि इनके लिए भगतसिंह एडवेंचरिस्ट थे पर नक्सल न थे। कि जैसे भगतसिंह mass revolution इनके हिसाब से इन मेथड्स से नहीं करवा सकते थे तो नक्सल mass revolution करवा सकते थे!

बल्कि कांग्रेस ने तो फिर भी कराची अधिवेशन (29 मार्च 1931) में प्रस्ताव पारित किया, जिसमें उनकी बहादुरी की प्रशंसा की गई, फाँसी को “wanton vengeance” (निरर्थक बदला) कहा गया और ब्रिटिश सरकार की आलोचना की गई। यह कांग्रेस का आधिकारिक स्टैंड था। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) ने अपने किसी अधिवेशन या सम्मेलन में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी की निंदा का कोई औपचारिक प्रस्ताव (resolution) पारित नहीं किया।

लेकिन मिथक तो गढ़ा ही जा सकता है ताकि भगतसिंह के आकर्षण का विनियोग अपने हित में किया जा सके और गढ़ने वाला स्वयं साहित्यकार हो तो और कुशलता से।

अब एक मिथक और ताजा ताजा आया है। कि सुभाष ने किसी मंदिर से बाहर निकलते समय अपना तिलक पोंछ लिया और कहा कि वर्दीधारियों का कोई धर्म नहीं होता।

और इसे भी वे ही वामपंथी प्रचारित कर रहे हैं जो सुभाष को Tojo’s dog,” a “running dog of Japanese imperialism,” “quisling,” या “agent of fascism” कह रहे थे।

पर इस बार की गढ़न उतनी भी साहित्यिक नहीं है। अंतर्विरोधी अलग है।यदि उस समय सुभाष वर्दी में थे और धर्म व कर्त्तव्य में इस द्वैत के प्रति सजग थे तो वर्दी में मंदिर गये ही क्यों थे? गये थे तो तिलक लगवाया ही क्यों था? और बाहर निकलकर ही क्यों पोंछा था, वहीं क्यों नहीं पोंछ दिया ?

और वैसे थोड़ी देर बाद सभी पोंछ देते हैं पर उनसे इनका नैरेटिव निर्माण नहीं होता।

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