कर्नल मूल भार्गव
कैनबरा ( ऑस्ट्रेलिया)। यह कहना कि तेल की कीमतों में स्थिरता केवल चुनावी रणनीति थी, पूरी तरह सत्य नहीं है। इसके पीछे आर्थिक और रणनीतिक कारण भी थे।
1. सुदृढ़ अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार
भारत के पास मौजूद मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और स्थिर अर्थव्यवस्था के कारण हम शुरुआत के कुछ सप्ताहों तक बाहरी दबाव को झेलने में सक्षम थे। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है: यदि किसी परिवार पर अचानक कोई वित्तीय संकट आए या नौकरी चली जाए, लेकिन उनके पास पर्याप्त ‘बैंक बैलेंस’ और बचत हो, तो वे तुरंत अपने खर्चों में कटौती नहीं करते। भारत ने भी अपनी बचत के दम पर शुरुआती झटकों को बखूबी प्रबंधित किया। लेकिन, यह व्यवस्था अनंत काल तक नहीं चल सकती; यदि संकट लंबा खिंचे, तो कटौती अनिवार्य हो जाती है।
2. वैश्विक परिस्थितियों में अस्थायी सुधार
जब चुनाव शुरू हुए, तब ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम हो रहा है। कच्चे तेल के दाम गिरने लगे थे और आपूर्ति बढ़ने के संकेत मिल रहे थे। उस समय पूरे विश्व में यह आशा जागी थी कि संकट टल गया है। ऐसे माहौल में तेल के दाम बढ़ाना न तो आर्थिक रूप से तर्कसंगत था और न ही राजनीतिक रूप से। हालांकि इसमें एक राजनीतिक पहलू भी रहा होगा, लेकिन वह मुख्य कारण नहीं था।
3. वर्तमान संकट: युद्ध की वापसी
पिछले एक सप्ताह में परिस्थितियां फिर से बदल गई हैं। युद्ध की आग दोबारा भड़क उठी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों में उछाल आया है और भारतीय रुपया कमजोर हुआ है। शांति की जो उम्मीद जगी थी, वह अब धूमिल हो चुकी है। स्पष्ट है कि यह स्थिति भारत के आंतरिक कारणों से नहीं, बल्कि वैश्विक उथल-पुथल का परिणाम है।
4. अपरिहार्य कटौती और सरकार की भूमिका
अब जबकि यह संकट लंबा खिंचता नजर आ रहा है और इसका कोई तत्काल अंत दिखाई नहीं देता, तब संसाधनों में कटौती करना अनिवार्य हो गया है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी की ‘कटौती और बचत’ की अपील बिल्कुल उचित है। हमें देश को एक गहरे आर्थिक संकट से बचाना होगा।
”अर्थव्यवस्था कितनी भी मजबूत क्यों न हो, यदि तेल की आपूर्ति ही बाधित हो जाए, तो विकल्प सीमित हो जाते हैं।”
5. नेतृत्व को पेश करना होगा उदाहरण
इस त्याग की शुरुआत शीर्ष स्तर से होनी चाहिए। यदि सरकार, मंत्री और उच्च अधिकारी अपने खर्चों में कटौती कर एक उदाहरण पेश करें—जैसे हवाई यात्राओं और गाड़ियों के काफिलों में कमी—तभी सामान्य जनमानस को इसके लिए प्रेरित किया जा सकेगा।
यह एक वैश्विक संकट है। वर्तमान में कोई भी देश ट्रंप या ईरान को नियंत्रित करने की स्थिति में नहीं है; पूरी दुनिया इस चुनौती से जूझ रही है। अब हमारे पास दो ही मार्ग हैं: या तो हम राजनीति में उलझकर देश का नुकसान करें, या फिर एकजुट होकर इस संकट का सामना करें। निर्णय हमारा है।



