रायपुर । कल यूट्यूब पर Curly Tales की “मकान देखो” श्रृंखला में कुमार विश्वास का नोएडा स्थित “साधारण” घर देखा। वीडियो लंबा था, पर दस मिनट में ही समझ आ गया कि अगर यह साधारण है तो बाकी जनता शायद अब तक तंबुओं में ही रह रही है।
कुमार विश्वास बड़े विनम्र भाव से मेजबान को अपने “साधारण” घर में बुलाते हैं। अब घर में साठ फुट लंबी पेंटिंग हो, जिसे कोई नामचीन कलाकार आकर बनाए, घर के भीतर सैलून हो, दीवारों पर गीता के श्लोक हों, एक तरफ राम दरबार, दूसरी तरफ बुद्ध प्रतिमा, और बाहर पुलिस चौकी प्रहरी की तरह खड़ी हो,तो इसे साधारण कहने के लिए या तो अद्भुत आत्मविश्वास चाहिए या फिर जनता की स्मृति पर अटूट भरोसा।
घर देखकर ऐसा लग रहा था मानो आध्यात्म, ऐश्वर्य और आर्ट गैलरी ने मिलकर कोई गठबंधन सरकार बना ली हो। राम नाम भी अंकित है, हनुमान जी भी विराजमान हैं, बुद्ध भी मुस्कुरा रहे हैं। बस कबीर कहीं कोने में बैठे यह सोच रहे होंगे-
“साईं इतना दीजिए…”
कुमार विश्वास वाकपटु हैं, इसमें कोई संशय नहीं। शब्दों को मोड़ना, तुक में लपेटना और भावनाओं को पैक करके बेच देना उनकी पुरानी कला है। किंतु जब वे इतने वैभवशाली भवन को “साधारण” कहते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई उद्योगपति अपनी प्राइवेट जेट को “छोटी सी गाड़ी” बता रहा हो।
संदेश साफ़ है:
“देखो, मैं जमीन से जुड़ा हूँ… बस जमीन थोड़ी ज़्यादा महंगी है।”
धन कमाना अपराध नहीं है। एक कवि, लेखक या वक्ता यदि प्रतिभा से वैभव अर्जित करे तो उसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। समस्या तब शुरू होती है जब मंच पर वैराग्य का प्रवचन हो और बैकग्राउंड में इटैलियन मार्बल चमक रहा हो।
एक पुराना वीडियो याद आया जिसमें कुमार विश्वास कहते थे कि इबादत करते हुए लोग उन्हें सम्मोहित करते हैं, उन्हें बड़ा चैन मिलता है। अफ़सोस, वह चैन शायद घर के नक्शे में फिट नहीं बैठा। अगर आलीशान मंदिर की जगह कोई “शांतिगाह” बनवा लेते, जहाँ सामूहिक इबादत होती, तो भक्तिरस का ROI और बेहतर आता।
ख़ुद को असफल नेता बताते हुए वे कहते हैं:” मैं सफल कवि हूँ, असफल नेता।”
बिल्कुल। सफल नेता तो आप तब होते जब मित्र वादा निभाकर राज्यसभा भेज देते। असफलता का यह दुख भी बड़ा विलक्षण है कि जनता ने नहीं हराया, बस दोस्ती की डिलीवरी लेट हो गई।
और हाँ, “भक्त” शब्द को राजनीतिक गाली में बदलने का श्रेय भी आपको जाना चाहिए । आपने ही मोदीजी को चाहने वालों को “भक्त” कहकर ऐसा नया संदर्भ दिया कि “अंधभक्त” लोकतंत्र का सबसे लोकप्रिय विशेषण बन गया। शब्दों की केमिस्ट्री में आपका कोई मुकाबला नहीं। आप भावनाओं को ऐसे डिस्टिल करते हैं कि श्रोता ताली भी बजाए और बाद में सोचे भी: “अरे, अभी हुआ क्या था?”
“कोई दीवाना कहता है…” से शुरू हुई यात्रा अब “जय श्रीराम” के भव्य इंटीरियर तक पहुँच चुकी है। प्रेमरस से भक्तिरस की यह तीर्थयात्रा बड़ी लाभकारी सिद्ध हुई है। सच पूछिए तो इस घर की असली नींव सीमेंट पर नहीं, समय की हवा पहचानने की कला पर रखी गई है। आपसे बढ़िया समय भांपने वाला मौजूदा हस्ती और कोई नहीं है ना आगे होगी!
फिर भी, घर शानदार है। आलीशान है। मेहनत और नेटवर्क, दोनों का असर साफ़ दिखता है। इसे साधारण कहकर अपने वैभव का अपमान मत कीजिए। गर्व से कहिए कि आपने कविता, राजनीति, टीवी डिबेट, रामकथा और रिश्तों, सबको मिलाकर ऐसा मुकाम पाया है जहाँ “वैराग्य” भी imported lighting में चमकता है।
रही बात राजनीति की,उसके दरवाज़े कभी बंद नहीं होते। दिल्ली में विचारधारा से ज़्यादा ज़रूरी बस सही ड्रॉइंग रूम होता है।
ख़ास आपके लिए अर्ज़ है:
राम नाम दीवार पर, भीतर सत्ता-प्यास,
साधु जैसी वाणी रखे, जीवन पूरा खास।
भक्त कहे जो कल तलक, आज वही श्रीराम
मौसम जैसा धर्म हो, उसका क्या ईमान!
Mann Jee
सही कहा मन्न जी ये कुमार विश्वास मौसम विज्ञानी है , राजनीतिक हवा ,बारिश ,अकाल सबका रुख पहचान लेते है , समय के साथ कवि सम्मेलनों की लोकप्रियता को भुनाने के साथ केजरीवाल के साथ अन्ना आंदोलन में लगे तो 2018,19तक मौके की राह में केजरी के साथ लगे रहे जबकि केजरी अपनी धूर्तता ,भ्रष्ट स्वरूप ,झूठ बोलने की कला सब दिखा चुके थे 2014से ही , उसके बाद केजरी से राज्यसभा की मलाई न मिली तो उसे छोड़ हवा के रुख के साथ राम भक्त बन गए और राम कथा वाचक बन गए , किसी भी राज्य में सत्ता बदलती है तो हर नए हर पार्टी के मुख्यमंत्री के सामने सरकारी समारोह में ये मंच पर दिख जाते है , छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने इनसे राम कथा करवाई तो सत्ता बदलते ही कुछ माह में भाजपा मुख्यमंत्री के सामने ये दिख गए सरकारी आमंत्रण पर !
09 मई को ही पश्चिम बंगाल में पहुंच चुके है सुनील बंसल और अन्य भाजपा नेताओं के सामने राम कथा भी हो चुकी !



