करुणा सागर पण्डा
रायपुर । केवल दीर्घायु हो जाने से ही जीवन श्रेष्ठ बन जाता है, ऐसा नहीं है। जीवन की श्रेष्ठता उसकी आयु से नहीं, कर्मों की प्रगाढ़ता से होती है। शायद इसीलिए इतिहास कभी वर्षों की गिनती को याद नहीं रखता, वह परिवर्तन के हस्ताक्षर को याद रखता है। आयु का संबंध केवल घड़ी की सुइयों और कैलेंडर के पन्नों तक ही है।
देखिए न! एक व्यक्ति मात्र आठ वर्ष की अपनी आयु में एक ऐसा सपना संजोता है कि उसे उस समय के खंडित होते भारत को एक वैचारिक और सांस्कृतिक इकाई के रूप पुनर्स्थापित करना है… और वह बत्तीस वर्ष की आयु के होते तक भारत की आध्यात्मिक चेतना और भौगोलिक सीमाओं को अद्वैत के सिद्धांत में ऐसा बांधता है कि तब का वह देश, एक राष्ट्र बनकर मुस्कुराने लगता है। क्यों, है न यह एक व्यक्ति के कालजयी होकर समय की सीमा को अपने पुरुषार्थ से छोटा कर देने वाली बात? बिल्कुल है!
जी हाँ ! मैं बात कर रहा हूँ आचार्य शंकर की….
यदि आपने सत्य को ज्यों का त्यों परोसने वाले किसी इतिहासकार की कोई पुस्तक पढ़ी है तो याद कीजिए आठवीं सदी का वह समय जब बौद्ध मत अपने उत्कर्ष पर था और वैदिक धर्म पतन की ओर अग्रसर था, तब कैसे आचार्य शंकर ने अपने तर्कों और अद्वैत दर्शन के माध्यम से वैदिक धर्म का पुनरुद्धार किया था? कैसे उन्होंने दक्षिण और उत्तर के पुजारियों के लिए विनिमय नियम बनाए ताकि सांस्कृतिक मेलजोल बना रहे? कैसे उन्होंने पूरे भारत की यात्रा की और शास्त्रार्थ के माध्यम से विभिन्न मतों के विद्वानों को पराजित कर अद्वैत वेदांत की स्थापना की, जिससे वैचारिक एकता आई? कैसे उन्होंने षठमत की स्थापना कर धार्मिक मतभेद को समाप्त किया? कैसे उन्होंने संन्यास की दशनामी परंपरा को स्थापित कर भारत भर के साधु-संतों को एक अनुशासित व्यवस्था में बांध सके? कैसे उन्होंने उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता पर भाष्य लिखकर दार्शनिक एकता को स्थापित किया? और, कैसे उन्होंने देश की चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना कर यह सुनिश्चित किया था कि भारत के अलग-अलग कोनों में रहने वाले लोग भाषा और वेशभूषा के अंतर के बाद भी एक ही आध्यात्मिक चेतना से जुड़े रहें।
यह सत्य है कि भारत की पुण्यधरा पर जब-जब वैचारिक शून्यता और अधर्म का अंधकार गहराया, तब-तब किसी महापुरूष ने आकर ज्ञान के दीपक को प्रज्वलित किया है। आचार्य शंकर को भी उसी बौद्धिक आर्ष परंपरा का सबसे बड़ा पुनरुद्धारक माना जाता है। जब यह परंपरा लुप्त हो रही थी या भ्रांतियों में घिरी हुई थी, तब आचार्य शंकर ने ही अपने भाष्यों के माध्यम से ऋषि-मत को पुनः शुद्ध रूप में स्थापित कर भारतीय चिंतन की दिशा बदली थी।
मैं कुछ दिन पहले जब एस.एल. भैरप्पा जी की पुस्तक ‘सार्थ’ को पढ़ रहा था जिसमें भैरप्पा कहते हैं कि शंकराचार्य केवल सन्यासी नहीं बल्कि एक युग प्रवर्तक थे जो हमेशा ही प्रासंगिक रहेंगे…. तो उनकी इस बात पर मेरे मित्र को आपत्ति होती है। वह आचार्य शंकर की शाश्वत प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाता है। वह पूछता है कि क्या ग्यारह सौ साल पहले का कोई दर्शन आज के इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीक के युग में भी प्रासंगिक हो सकता है?
मैं कहता हूँ – “हाँ! हो सकता है।”
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केवल सूचना दे सकता है, चेतना नहीं। मनुष्य की विशिष्टता प्राप्त सूचनाओं में नहीं, उसकी चेतना और आत्म-बोध पर टिकी है। जब तक इस संसार में दुख है और सत्य की खोज की प्यास है… आचार्य शंकर हमेशा ही प्रासंगिक बने रहेंगे। आचार्य शंकर के दर्शन का सातत्य हमेशा भारतीय जनमानस में जीवित ही बना रहेगा।
वैशाख शुक्ल पंचमी – भगवत्पाद आदिगुरु शंकराचार्य की जयंती शुभ हो!



