उर्मिला, राम के वनवास का हिस्सा भी नहीं…

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भोपाल । राम वन गए। अयोध्या रोई। दशरथ टूट गए। राजमहल की दीवारें करुणा से कांप उठीं। माताओं की आंखें सूख गईं। कैकेयी इतिहास के कटघरे में खड़ी कर दी गईं। सीता त्याग की प्रतिमा बनकर राम के साथ चल पड़ीं। लक्ष्मण भ्रातृभक्ति के अमर प्रतीक बन गए।

लेकिन उसी अयोध्या में एक स्त्री और थी… जो न वन गई, न इतिहास में ठीक से दर्ज हुई…*वह उर्मिला थीं।*

रामायण जब भी सुनाई जाती है, लोग राम के वनवास पर रोते हैं, सीता की अग्निपरीक्षा पर विचलित होते हैं, लक्ष्मण की सेवा और समर्पण पर अभिभूत हो जाते हैं। लेकिन बहुत कम लोग उस स्त्री को याद करते हैं, जिसने इन सबके बीच सबसे लंबा, सबसे मौन और सबसे एकाकी वनवास जिया।

*उर्मिला राम के वनवास का हिस्सा भी नहीं थीं… फिर भी सबसे अधिक वनवास उन्हीं ने सहा।* क्योंकि वन केवल जंगलों में नहीं होता। वन वहां भी होता है, जहां प्रतीक्षा हो। जहां विरह हो। जहां हर रात किसी की अनुपस्थिति सिरहाने बैठकर रोती हो। जहां हर सुबह किसी की आवाज़ के बिना खुलती हो। जहां जीवन चलता तो रहे, मगर भीतर सब थम चुका हो। अयोध्या के राजमहल में रहकर भी वह भीतर से वनवासी थीं। हर रात उन्होंने स्मृतियों का एक वन पार किया होगा। हर सुबह उन्होंने अपने टूटे हुए हृदय को फिर से समेटा होगा।

लक्ष्मण जब राम के साथ वन जाने के लिए खड़े हुए होंगे, तब इतिहास ने उनकी निष्ठा देखी। लेकिन उसी क्षण उर्मिला के भीतर क्या टूटा होगा, इसका कोई श्लोक नहीं लिखा गया। किसी कवि ने नहीं लिखा कि उस रात उर्मिला ने कितना रोया होगा।

किसी महाकाव्य ने यह नहीं बताया कि चौदह वर्षों की उस पहली रात उन्होंने अपने आंसुओं को कैसे चुप कराया होगा। किसी ने यह नहीं पूछा कि जिस स्त्री का पति अभी-अभी उससे दूर गया हो, वह अगली सुबह कैसे उठी होगी।

उर्मिला ने लक्ष्मण का हाथ पकड़कर यह नहीं कहा “मुझे भी साथ ले चलिए।” उन्होंने कोई प्रश्न नहीं किया। कोई प्रतिकार नहीं किया। कोई शिकायत नहीं की। और शायद यहीं से उनका तप शुरू होता है।

सीता वन गईं, इसलिए संसार ने उनके त्याग को देखा। उर्मिला महल में रहीं, इसलिए उनके दुःख को किसी ने देखा ही नहीं। लेकिन कभी-कभी पीछे छूट जाना, साथ चलने से कहीं अधिक कठिन होता है।

रामचरितमानस में तुलसीदास लिखते हैं…
“रघुकुल रीति सदा चलि आई,
प्राण जाए पर वचन न जाई।”
इस मर्यादा की रक्षा में राम वन गए। लक्ष्मण सेवा में गए।
*लेकिन उर्मिला…?*
उर्मिला ने भी उसी मर्यादा के लिए अपने समस्त स्त्रीत्व, अपने प्रेम, अपने यौवन और अपने अधिकारों का मौन समर्पण कर दिया। उन्होंने पति को रोका नहीं। क्योंकि वह जानती थीं कि लक्ष्मण केवल उनके पति नहीं, राम के अनुज भी हैं। धर्म के प्रहरी भी हैं। मर्यादा के सैनिक भी हैं। परंतु क्या कोई समझ सकता है कि उस स्त्री के भीतर कैसी आंधियां चली होंगी, जिसने अपने सुहाग को चौदह वर्षों के लिए स्वयं अपने हाथों से वन की ओर विदा किया हो?

उर्मिला ने लक्ष्मण को जाने दिया… लेकिन स्वयं वहीं ठहर गईं, जहां समय ठहर जाता है। लक्ष्मण वन में जागते रहे। लोककथा कहती है कि उर्मिला ने उनकी नींद अपने हिस्से में ले ली थी।
यह कथा चाहे प्रतीक हो, किंतु उसके भीतर छिपा सत्य बहुत गहरा है। क्योंकि हर महान पुरुष के पीछे अक्सर एक ऐसी स्त्री होती है, जो स्वयं अंधेरे में रहकर उसके भीतर का प्रकाश बचाए रखती है।

यदि लक्ष्मण चौदह वर्षों तक राम की सेवा में अडिग खड़े रह सके, तो उसके पीछे उर्मिला का मौन त्याग भी था। क्योंकि जिसे घर की चिंता न हो, जिसे पीछे छूटे रिश्तों की बेचैनी न सताए, वही पूरी निष्ठा से धर्मयुद्ध लड़ पाता है।

लक्ष्मण को *’कालजयी लक्ष्मण’* बनाने में उर्मिला का योगदान उतना ही बड़ा है, जितना दीपक में बाती का होता है। लौ दिखाई देती है, बाती नहीं। प्रकाश की प्रशंसा होती है, धीरे-धीरे जलती हुई सूत की डोरी का कोई स्मरण नहीं करता। *उर्मिला वही अदृश्य बाती हैं।*

उन्होंने युद्ध नहीं लड़ा… फिर भी हर दिन भीतर एक युद्ध जिया। उन्होंने कोई अग्निपरीक्षा नहीं दी, फिर भी चौदह वर्षों तक हर रात अपने हृदय को अग्नि में तपाया।

रामायण का प्रत्येक पात्र किसी न किसी रूप में गौरव प्राप्त करता है। राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। सीता त्याग और पवित्रता की प्रतिमा बनीं। भरत भ्रातृप्रेम के शिखर बने। हनुमान भक्ति के प्रतीक बने। लक्ष्मण सेवा और समर्पण के अमर आदर्श बने।
पर उस स्त्री का क्या, जिसने सबसे लंबा विरह जिया? उन्हें इतिहास ने बस ‘लक्ष्मण की पत्नी’ कहकर छोड़ दिया। किसी ने यह नहीं कहा कि वह विरह की सबसे बड़ी तपस्विनी थीं। किसी ने यह नहीं लिखा कि चौदह वर्षों तक उन्होंने अपने अकेलेपन को किस धैर्य से जिया।

लेकिन किसी रात, किसी एकांत क्षण में यदि कोई हृदय सचमुच विरह की तपस्या को समझना चाहेगा, तो उसे अयोध्या के किसी मौन कक्ष में बैठी उर्मिला अवश्य दिखाई देंगी…दीपक की उस अदृश्य बाती की तरह, जो स्वयं जलती रही… ताकि दूसरों का प्रकाश अमर बना रहे।

उन्होंने न धन मांगा। न यश। न स्मृति। न सम्मान। उन्होंने बस प्रेम निभाया। और प्रेम का सबसे ऊंचा रूप वही होता है, जहां अधिकार नहीं, समर्पण बचा रह जाए। उर्मिला की करुणा यह नहीं थी कि उनके पति दूर चले गए। उनकी करुणा यह थी कि उन्हें अपने दुःख को भी मौन रखना पड़ा। अयोध्या को संभालना था। माताओं को सहारा देना था। राजमहल की मर्यादा को टूटने नहीं देना था।
वह टूटी होंगी…
लेकिन चुपचाप।
वह रोई होंगी…
लेकिन अकेले।
वह जली होंगी…
लेकिन बिना धुएं के।
इतिहास तलवार उठाने वालों को याद रखता है।
लेकिन जो लोग भीतर-ही-भीतर जलकर दूसरों को प्रकाश देते हैं, वे अक्सर इतिहास के हाशिए पर छूट जाते हैं। *उर्मिला वही हाशिए पर छूटी हुई ज्योति हैं।* और शायद इसीलिए उनका त्याग सबसे बड़ा है। क्योंकि उन्होंने किसी विजय की आकांक्षा नहीं की। किसी प्रशंसा की इच्छा नहीं की। उन्होंने केवल इतना चाहा कि लक्ष्मण अपने धर्म से विचलित न हों।

रामायण/राम चरित मानस यदि त्याग का महाकाव्य है, तो उर्मिला उसका सबसे शांत, सबसे उपेक्षित और सबसे करुण अध्याय हैं।

उन्होंने कोई प्रश्न नहीं किया।
कोई प्रतिकार नहीं किया।
बस अपने हिस्से का प्रेम, अपने हिस्से का जीवन और अपने हिस्से का स्त्रीत्व चुपचाप धर्म के चरणों में समर्पित कर दिया। शायद इसलिए उर्मिला भारतीय नारी की वह अनकही पीड़ा हैं, जो साथ न चलकर भी सबसे अधिक साथ निभाती है।

रामायण के सबसे लंबे विरह की कोई चौपाई नहीं लिखी गई… क्योंकि वह उर्मिला की आंखों में मौन रह गई।

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