दिल्ली । पत्रकारिता के नाम पर आजकल जो कुछ चल रहा है, उसमें आपदा सबसे बड़ा अवसर बन गई है। गाजियाबाद के इंदिरापुरम में गौर ग्रीन एवेन्यू, अभय खंड की उस सोसायटी में आग लगी, जहां अजित अंजुम रहते हैं। आठ-दस फ्लैट जलकर खाक हो गए। जिन परिवारों की जिंदगी भर की कमाई, यादें, सामान और सपने राख में तब्दील हो गए, उनकी मनःस्थिति की कल्पना आसाननहीं है। वे खाली हाथ भागे, कपड़े तक नहीं बचे। नए सिरे से सब कुछ शुरू करना होगा-महीनों, शायद सालों की जद्दोजहद। लेकिन अजित अंजुम की पोस्ट पढ़िए तो लगता है मानो आपदा उनके ही घर के इर्द-गिर्द घूम रही थी।
अजित अंजुम ने एक्स पर जो लिखा, उसमें ‘मेरे ठीक सामने’, ‘मेरा घर आग की चपेट में आते-आते बचा’, ‘हम लोग हिम्मत करके डटे रहे’, ‘मैंने पानी मारा’, ‘मेरा मेंटल ट्रॉमा’ जैसे शब्द बार-बार आए। सामने वाली टावर की नौवीं मंजिल पर आग लगी, उन्होंने वीडियो बनाया, लोगों को टैग किया, फिर खुद नीचे भागे, फिर ऊपर गए, पांच लोग मिलकर पानी डाला-सब कुछ उनके इर्द-गिर्द। सोसायटी के अन्य लोग अलग-अलग फ्लोर से पानी मार रहे थे, फायर ब्रिगेड आई लेकिन शुरू में हेल्पलेस थी क्योंकि हाइड्रोलिक सीढ़ी नहीं थी। दो फ्लैटों में चार लोग फंसे रहे, उन्हें बालकनी से बचाया गया। “ऊपर वाले की मेहरबानी से सबकी जान बच गई” -यह लाइन जरूर लिखी, लेकिन पीड़ित परिवारों के नाम, उनकी कहानी, उनकी क्षति का विस्तार? शून्य।
यह दोहरा चरित्र है। एक तरफ ‘निष्पक्ष पत्रकार’ होने का दावा, दूसरी तरफ आपदा को अपने एंगल से सेल्फ-प्रमोशन में बदल देना। जिनके घर पूरी तरह जल गए, वे कौन हैं? उनके परिवार कहां शिफ्ट हुए? उनकी आर्थिक क्षति कितनी भारी है? एक-एक फ्लैट की कीमत गौर ग्रीन एवेन्यू में आज एक करोड़ से ढाई करोड़ रुपये के आसपास है। जिनके घर राख हुए, उनकी पूंजी लाखों-करोड़ों में स्वाहा हो गई। लेकिन अजित अंजुम ने यह नहीं बताया। आग कैसे लगी-एसी कंप्रेसर का ब्लास्ट या कोई और वजह-इसकी भी सही पड़ताल नहीं।
उनके मित्र रवीश कुमार ने लिखा“सात-आठ फ्लैट एक सिरे से जले हैं। बगल में अजीत जी का घर है। लपटें वहां तक भी पहुंच रही थीं।” मतलब आग पड़ोस में लगी, अजित का घर बाल-बाल बचा, लेकिन पोस्ट का केंद्र “अजीत अंजुम का घर बचाना” बन गया। वरिष्ठ पत्रकार मिलिंद खांडेकर ने भी यही टोन अपनाई-अजित का फ्लोर, उनकी स्थिति। पीड़ित परिवारों की चिंता गौण। कवयित्री स्वाति खुशबू ने ठीक पकड़ा: ग्रीन गौर में अच्छी-खासी आग लगी, दस फ्लैट लपेटे में आ गए, उसकी चिंता नहीं, मगर ‘अजीत अंजुम के यहां आग पहुंच सकती है’ की चिंता है। कहीं यह “सच की आवाज दबाने की साजिश” न घोषित कर दी जाए!
यह पैटर्न नया नहीं। अजित अंजुम, रवीश कुमार समेत कुछ यू-ट्यूबर पत्रकार सामाजिक होने का दिखावा करते हैं। लेकिन जब असली पीड़ा उनके घर के ठीक बगल में हो रही हो, तो भी रिपोर्टिंग ‘मैं, मेरा, हमारा’ पर अटक जाती है। एक भी पीड़ित परिवार की आवाज उनकी पोस्ट में नहीं आई। न उनके विस्थापन की, न आर्थिक तबाही की, न भविष्य की अनिश्चितता की। फ्लैट की कीमत, अजित ने अपना घर कब खरीदा, अब उसकी वैल्यू कितनी है-ये जानकारियां भी दर्शक ही मांग रहे हैं, क्योंकि पत्रकार ने नहीं दीं।
आपदा में अवसर तलाशना पुराना खेल है। पहले टीआरपी के लिए, अब व्यूज, लाइक्स, फॉलोअर्स और ‘मैंने बचाया’ वाले नैरेटिव के लिए। अजित अंजुम ने सामने वाली टावर की आग को रिपोर्ट नहीं किया, उसे अपने मेंटल ट्रॉमा और हिम्मत की कहानी में बदल दिया। रवीश कुमार और मिलिंद खांडेकर जैसे लोग भी उसी सुर में सुर मिला रहे हैं। सामाजिक होने का दावा करने वाले ये लोग, जब असली समाज उनके सामने जल रहा हो, तो भी खुद को केंद्र में रख लेते हैं।
सच तो यह है कि पत्रकारिता के वेश में आज कई ज़ॉम्बी घूम रहे हैं-अभिसार, साक्षी, विनोद कापरी, आशुतोष गुप्ता और इसी लाइन के अन्य नाम हैं। आज उनका दोहरा चरित्र बहुत से लोगों को समझ में नहीं आता, लेकिन जब कोई ईमानदारी से इनके कामों की समीक्षा करेगा, तो एक-एक करके एक्सपोज होंगे। आपदा पीड़ितों की मदद करने वाले असली लोग चुपचाप काम करते हैं। ये लोग कैमरा और पोस्ट के लिए हिम्मत दिखाते हैं।
गौर ग्रीन एवेन्यू की आग सिर्फ फ्लैट नहीं, कुछ पत्रकारों के चरित्र को भी जला कर राख कर गई है। लेकिन वे उस राख से भी नया अवसर निकाल लेंगे-शायद अगली पोस्ट में ‘मैंने कैसे सामना किया’ या ‘सिस्टम की नाकामी’ के नाम पर।
पीड़ित परिवार उसी वक्त नए सिरे से जिंदगी शुरू करने की जद्दोजहद में लगे रहेंगे, बिना किसी ‘निष्पक्ष’ पत्रकार की आवाज के।



