डॉ. स्वीटी तिवारी
दिल्ली । भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी संबंध नहीं, बल्किएक व्यापक सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक संस्था है, जो परिवार औरसमाज की स्थिरता की आधारशिला मानी जाती है। भारतीय परंपरा मेंविवाह को “संस्कार” के रूप में देखा गया है, जहाँ संबंध अधिकारों कीप्रतिस्पर्धा पर नहीं, बल्कि दायित्व, समर्पण, सहमति और पारस्परिक सम्मानपर आधारित होते हैं। किंतु आधुनिक समय में जब “वैवाहिक बलात्कार” (Marital Rape) जैसे प्रश्न उठते हैं, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हमअधिकार और यथार्थ के बीच संतुलन स्थापित करते हुए इस विषय कोभारतीय दृष्टि से समझें।
भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 375 में बलात्कार की परिभाषा दी गईहै, किंतु इसमें निहित अपवाद यह स्पष्ट करता है कि पत्नी (यदि वह 18 वर्षसे अधिक आयु की है) के साथ पति द्वारा स्थापित यौन संबंध को बलात्कारनहीं माना जाएगा। यह प्रावधान अक्सर आलोचना का विषय बनता है, क्योंकि यह महिला की सहमति के प्रश्न को गौण कर देता है। एकसमाजशास्त्री के रूप में मेरा यह मानना है कि यह बहस केवल कानूनीप्रावधान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सामाजिक संरचना सेजुड़ी है, जिसमें विवाह, परिवार और लैंगिक संबंधों को परिभाषित कियाजाता है। संघ की विचारधारा समाज को एक सजीव और संगठित इकाई केरूप में देखती है, जिसमें परिवार उसकी मूल इकाई है। यदि परिवार सुदृढ़ है, तो समाज भी सशक्त रहता है। इस दृष्टिकोण में विवाह को केवलव्यक्तिगत अधिकारों के संदर्भ में नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता औरसांस्कृतिक निरंतरता के रूप में समझा जाता है। अतः यह विचार महत्वपूर्णहो जाता है कि क्या प्रत्येक वैवाहिक असहमति या तनाव को आपराधिककानून के दायरे में लाना उचित होगा, या फिर इसके लिए अधिकसंवेदनशील और संतुलित सामाजिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। यहस्वीकार करना आवश्यक है कि किसी भी प्रकार की हिंसा-चाहे वहशारीरिक हो, मानसिक हो या यौन-अस्वीकार्य है। विवाह के भीतर भी यदिकिसी महिला के साथ जबरदस्ती या अमानवीय व्यवहार होता है, तो वहनिंदनीय है और उसके विरुद्ध संरक्षण आवश्यक है। किंतु भारतीय संदर्भ मेंइस समस्या का समाधान केवल दंडात्मक कानूनों के माध्यम से करनापर्याप्त नहीं होगा। यदि हम बिना सामाजिक चेतना के विकास के सीधेकठोर कानूनी प्रावधान लागू करते हैं, तो उनके दुरुपयोग और सामाजिकविघटन की संभावना भी बढ़ सकती है।
मेरे सामाजिक अनुभव और अध्ययन यह संकेत करते हैं कि भारतीय समाजमें वैवाहिक संबंधों के भीतर उत्पन्न होने वाले अनेक तनाव संवादहीनता, लैंगिक संवेदनशीलता की कमी और पारंपरिक भूमिकाओं की कठोरता सेजुड़े होते हैं। ऐसे में यदि हर समस्या का समाधान केवल आपराधिक कानूनके माध्यम से खोजा जाएगा, तो यह परिवार संस्था के भीतर अविश्वास औरटकराव को बढ़ा सकता है। इसलिए आवश्यक है कि हम इस विषय कोकेवल “अधिकार बनाम अपराध” के रूप में न देखें, बल्कि इसे “संबंधों केपुनर्संतुलन” के रूप में समझें। National Family Health Survey (NFHS-5) के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि भारत में घरेलू हिंसा एकवास्तविक समस्या है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। किंतु इन आंकड़ों कोसमझते समय यह भी ध्यान रखना होगा कि हिंसा के विभिन्न रूपों केसमाधान के लिए केवल एक ही प्रकार का कानूनी दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं होसकता। सामाजिक परामर्श, पारिवारिक मार्गदर्शन और नैतिक शिक्षा जैसेउपाय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर United Nations Women और World Health Organization जैसे संस्थान महिलाओं के अधिकारों की रक्षा पर जोर देतेहैं, जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। किंतु भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में इनसिद्धांतों को लागू करते समय स्थानीय सांस्कृतिक संदर्भों और सामाजिकसंरचनाओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। बिना इस संदर्भ के किसी भीकानून का प्रभाव सीमित रह सकता है। Justice Verma Committee नेवैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने की सिफारिश की थी, जो इसविषय की गंभीरता को दर्शाती है। वहीं Delhi High Court में इस मुद्दे परहुई बहस यह संकेत देती है कि भारतीय न्यायपालिका भी इस विषय कोलेकर एकमत नहीं है। यह असहमति इस बात का प्रमाण है कि यह विषयसरल नहीं, बल्कि बहुआयामी और जटिल है।
एक समाजशास्त्री और लेखिका के रूप में मेरा स्पष्ट मत यह है किमहिलाओं की गरिमा, सहमति और सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार कासमझौता नहीं किया जा सकता। किंतु इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक हैकि विवाह संस्था की संवेदनशीलता और सामाजिक भूमिका को समझते हुएही कोई भी कानूनी निर्णय लिया जाए। यदि हम केवल दंडात्मक दृष्टिकोणअपनाते हैं, तो हम समस्या के मूल कारणों-जैसे पितृसत्तात्मक मानसिकता, संवाद की कमी और सामाजिक असमानता को अनदेखा कर देंगे।इसलिएसमाधान एक समन्वित दृष्टिकोण में निहित है, जिसमें कानून, समाज औरसंस्कृति तीनों का संतुलन हो। वैवाहिक संबंधों में सहमति और सम्मान कोबढ़ावा देने के लिए शिक्षा, जागरूकता और मूल्य-आधारित प्रशिक्षणआवश्यक है। परिवार के भीतर संवाद और पारस्परिक समझ को सशक्तकरना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भारतीयता के मूल में स्थित वैवाहिक संस्था के साथ बलात्कार जैसे शब्दोंका प्रयोग अनुचित है। ऐसा करना न केवल विभत्स है बल्कि वैवाहिक संस्थाके आधार पर ही प्रश्नचिह्न लगाना है। वैवाहिक संबंधों में होने वाले अपराधोंके लिए IPC की धाराओं में पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। इसलिए वैवाहिकबलात्कार के संदर्भ में बनने वाला कानून अव्यावहारिक है तथा इसकेदुरुपयोग की संभावना अधिक है। अंततः, “अधिकार और यथार्थ” के इसविमर्श में यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय समाज को एक ऐसे संतुलितमार्ग की आवश्यकता है, जहाँ महिलाओं की अस्मिता और अधिकारों कीरक्षा भी सुनिश्चित हो, और साथ ही परिवार संस्था की स्थिरता औरसामाजिक समरसता भी बनी रहे। यही वह दृष्टिकोण है, जो भारतीयपरिप्रेक्ष्य में अधिक व्यवहारिक, संवेदनशील और दीर्घकालिक समाधानप्रदान कर सकता है।
संदर्भ सूची (Bibliography)
प्राथमिक स्रोत (Primary Sources)
1. भारत सरकार – भारतीय दंड संहिता, 1860 (धारा 375 एवं अपवादप्रावधान)
2. भारत सरकार – घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005
3. भारत का विधि आयोग – बलात्कार कानूनों की समीक्षा पर 172वींरिपोर्ट (2000)
4. न्यायमूर्ति वर्मा समिति – आपराधिक कानून संशोधन पर समिति कीरिपोर्ट (2013)
5. भारत का सर्वोच्च न्यायालय – इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ (2017)
6. दिल्ली उच्च न्यायालय – RIT फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2022)
7. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5), 2019–21
द्वितीयक स्रोत (Secondary Sources)
8. संयुक्त राष्ट्र महिला — महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर कानून निर्माणहेतु हैंडबुक (2012)
9. विश्व स्वास्थ्य संगठन – महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के प्रसार का अनुमान(2021)
10. सिल्विया वॉल्बी – पितृसत्ता का सिद्धांत (Theorizing Patriarchy)
11. सिमोन द बोउवार – द सेकंड सेक्स (The Second Sex)
12. पियरे बोरदियो – पुरुष वर्चस्व (Masculine Domination)
13. एंथनी गिडेन्स – समाजशास्त्र (Sociology)
14. कमला भसीन – पितृसत्ता क्या है?
15. फ्लाविया एग्नेस – “वैवाहिक बलात्कार: भारत में महिलाओं केअधिकारों का प्रश्न



