प्रिया
पुणे : जून 2024 में मैंने पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) से फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स पूरा किया। कोर्स कोऑर्डिनेटर पंकज सक्सेना थे। कोर्स की अवधि में कई दिग्गज वक्ताओं ने व्याख्यान दिए, जिनमें अरुणा राजे पाटिल जैसी नामचीन हस्तियां भी शामिल थीं। हालांकि, इन सत्रों में वर्तमान सरकार और उसके नैरेटिव की आलोचना बार-बार दबे स्वर में सुनाई दी।
मेरे अनुभव के अनुसार, कोर्स में राष्ट्रवादी दृष्टिकोण वाली किसी भी फिल्म या वक्ता को जगह नहीं दी गई। अधिकांश चयनित फिल्में और वक्ता वामपंथी विचारधारा से गहराई से प्रभावित दिखे। भारतीय संस्कृति, सभ्यता, ऐतिहासिक गौरव और राष्ट्रवादी मूल्यों को दर्शाती फिल्मों पर ना के बराबर चर्चा हुई। उलटे, कुछ फिल्मों को सीधे ‘प्रोपेगेंडा’ का ठप्पा लगाकर खारिज कर दिया गया। ऐसा लगता था जैसे संस्थान का पूरा सिलेबस और चयन प्रक्रिया एक खास विचारधारा को ही बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया हो।
फिल्म अध्ययन जैसा विषय, जो दृश्य माध्यम के माध्यम से समाज, संस्कृति और इतिहास को समझने का माध्यम है, वहां वैचारिक विविधता की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से की जाती है। दुर्भाग्यवश, यहां केवल एक तरफा विमर्श ही प्रमुखता से रखा गया। छात्रों को भारतीय सिनेमा की समृद्ध विरासत—चाहे वह स्वतंत्रता संग्राम की फिल्में हों, सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कहानियां हों या समकालीन राष्ट्रवादी कथाएं—उनसे परिचित कराने का कोई प्रयास नहीं दिखा।
मेरा दृढ़ मानना है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान, खासकर सरकारी समर्थन वाले संस्थान में, वैचारिक विविधता अनिवार्य होनी चाहिए। वामपंथी, दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी या उदारवादी—सभी दृष्टिकोणों को समान अवसर मिलना चाहिए। छात्रों को केवल एक विचारधारा का पाठ नहीं, बल्कि बहुआयामी चिंतन सिखाया जाना चाहिए ताकि वे स्वतंत्र रूप से सोच सकें और अपनी समझ विकसित कर सकें।
एफटीआईआई जैसे संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे सच्चे अर्थों में रचनात्मक और बौद्धिक स्वतंत्रता का वातावरण बनाएं, न कि left orientation का प्रचार केंद्र। जब तक वैचारिक संतुलन नहीं होगा, छात्रों का समग्र विकास अधूरा रहेगा। मुझे आशा है कि संस्थान प्रबंधन इस ओर ध्यान देगा और भविष्य के कोर्स में वास्तविक विविधता सुनिश्चित करेगा।
(लेखिका के आग्रह पर नाम परिवर्तित किया गया है)



