प्रो. कुसुमलता केडिया
दिल्ली। कुछ लोग कह रहे है कि आप लोग तो मोदी जी के प्रषंसक थे। अब क्या हो गया, बड़ी आलोचना करने लगे है। तो, हम तीनों तो प्रशंसक हैं ही। थे ही। हम लोग ही क्यों, लाखों लाखों लोग उनके प्रशंसक थे। इसीलिए वो इतनी बाधाओं को पार करते हुए इतने काम सुविधा पूर्वक कर पा रहे थे। तो मोदी जी के प्रशंसक क्यों थे? क्योंकि ऐसा लगता था कि भारत राष्ट्र को, भारतीय समाज को, सनातन धर्म को, जो चाहिए वो मोदी जी का नेतृत्व पूरा करेगा। बहुत लोग मानते थे पूरा करेगा, बहुत लोग मानते थे बहुलांश करेगा, बहुत लोग मानते थे कि भाई अन्यों से तो काफी ठीक करेगा यह नेतृत्व। इसीलिए तो मोदी जी के प्रशंसक थे। 2014 के पहले ये जो प्रशंसक लोग हैं इनमें अधिकांश को मोदी जी के बारे में बहुत एक सीमित जानकारी थी और उस सीमित जानकारी से ही यह आशा बंधी थी कि यह एक दृढ़ चरित्र के, प्रशासन में दक्ष और भारत राष्ट्र की बहुत उच्च आकांक्षाओं को पूरा करने में समर्थ एक नेता है।
मुख्यमंत्री के रूप में उनकी भूमिका का यह आकलन था। अब विरोध हो रहा है। विरोध होने का निश्चित कारण है। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने अनेकानेक योजनाएं पूरी कीं या उन पर कार्य किया।
यानी एक प्रकार से वो जो स्वयं बताते हैं, उन्होंने कई नई चीजों की आधारशिला रखी। पूराना मलबा साफ किया, झमेलों को साफ किया। एक अनुशासन का वातावरण बनाया। फिर ब्यूरोक्रेसी को टाइट किया। इसको टाइट किया, उसको टाइट किया, उसको दबाया, उसको ठीकठाक किया, और दूसरे कार्यकाल में तो दो चार बहुत ही बड़े-बड़े काम उन्होंने किए और दसवें स्थान से भारत को चौथे स्थान पर ले जाना, दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्रों की तुलना में आर्थिक दृष्टि से, सामरिक दृष्टि से भारत को समर्थ बनाया। हिंदू धर्म को लेके जैसे अयोध्या जी में ही रामलला की जो प्राण प्रतिष्ठा थी तो 12 दिन पूरे शास्त्रीय विधि विधान से उन्होंने उपवास किया, क्या-क्या किया जो भी बताया गया धर्माचार्यों के द्वारा किया। तो उनकी नीतियों को लेकर और वो जो दिख रहे थे सामाजिक मामलों में, राजनैतिक मामलों में, ‘परसेप्शन मैटर्स’। आप वस्तुतः क्या है? आपके हृदय में क्या है? यह तो भाई थोड़े से लोग जानते हैं। बहुत थोड़े से लोग। शेष तो चलता है कि दिख क्या रहा है? समझ में क्या आ रहा है? तो देखिए, समझ में आ रहा था कि कांग्रेस ने, नेहरू ने, इंदिरा गांधी ने, राजीव गांधी ने और बहुत सारे लोगों ने अनेकानेक प्रकार का जो नाश किया, उत्पात किया, विघ्न किया, अवरोध खड़ा किया, उसको यह व्यवस्थित ढंग से सूझबूझ से हटा रहे हैं। फिर अचानक यह यूजीसी वाला मामला आया तो सब फड़फड़ा गए। क्योंकि इस यूजीसी वाले मामले का जो सार था कि भारत का वह वर्ग जो सभी प्रकार के अनुचित अन्यायकारी आरक्षण के बावजूद पढ़ लिखकर सरकारी नौकरियों से वंचित रहकर भी राष्ट्र निर्माण में अभूतपूर्व योगदान दे रहा था, उसकी शिक्षा ही बाधित की जा रही है। अच्छा शिक्षा बाधित है, केवल इतना नहीं। शिक्षा का प्रयास करोगे तो यूनिवर्सिटी कॉलेज से बाहर जाना ही पड़ेगा। तो जीवन ही दंडित हो जाएगा। चाहे आप अपराध करो या अपराध ना करो।
भाई ये क्या है? यानी 10-11 साल में जो हुआ वो दो ढाई साल में साफ और केवल साफ नहीं, अगर इसको अबाधित चलने दिया गया तो आने वाला 10-20-30 साल गया। सब तो इतने धनी मानी नहीं है कि विदेश भाग जाएंगे। बहुलांश तो ऐसा है जिसको भारत में ही जीना मुश्किल हो रहा है। भारत के बाहर कहां से जाएगा? जब मोदी जी करीब 85 करोड़ लोगों को कहते हैं कि मैं बहुत कम दाम में सस्ते में लगभग मुफ्त राशन दे रहा हूं। तो यानी सरकार के अनुसार 85 करोड़ लोगों को भोजन की समस्या है। फिर षिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और दुनिया भर की और चीजें यानी आर्थिक रूप से कमजोर जिनको आप मान रहे है, राजनैतिक रूप से मान रहे हैं, प्रशासन की दृष्टि से, शासन की दृष्टि से मान रहे हैं कि इनको मुफ्त या नगण्य मूल्य पर अनाज उपलब्ध कराना है, 5 लाख का मेडिकल इंश्योरेंस, आयुष्मान योजना और दुनिया भर की चीजें, वो लोग पढ़ने विदेष कैसे जाएंगे। इतनी महंगी फीस। तो इसका विरोध आवश्यक था। फिर उसके तुरंत बाद वो रुचि तिवारी कांड हुआ। एक पत्रकार के साथ जो कपड़ा वपड़ा खींचा गया और बाकी सब खींचा गया और इस पर तो मोदी जी की या शासन की ना कोई त्वरित प्रक्रिया हुई, ना कमेंट आया तो कहा जाए कि भाई एक एक घटना पर प्रधानमंत्री थोड़ी टिप्पणी करेंगे। तो राहुल वेमुला वाला कांड पर भी टिप्पणी करने की क्या जरूरत थी? फिर ये जो गौ हत्या के लिए, गैया को तस्कर कसाई जो ले जाते हैं इनको रोकने वाले गौ रक्षकों को गुंडा गुंडा कहने की भी क्या जरूरत थी? अगर यह होता कि इन सब में भी कोई टिप्पणी उनकी नहीं आती तो इसमें भी अपेक्षा नहीं होती। कुछ चीजों में वो इतना आगे आगे बढ़ के बोलते हैं तो फिर इसमें भी अपेक्षा होगी ही और यह तो अत्यंत गंभीर है। जिस तरह देश की राजधानी में विष्वविद्यालय परिसर में महिला पत्रकार का पुलिस की उपस्थिति में कपड़ा फाड़ा जाए और उसमें यह ‘परसेप्शन’ हो, यह दिखाई दे कि शासन मन बढ़ा रहा है तो ऐसे को तो तुरंत थाम देना जरूरी है। चाहे आप प्रशंसक हैं या नहीं है। प्रषासन किस लिए हैं? राष्ट्र के लिए अशुभ हो रहा है, तो आप निष्क्रिय नहीं रह सकते। यह तो राष्ट्र के लिए घनघोर खराब हो रहा है।
लगातार दो-तीन महीने में कई घटनाएं हुई। दो एक मैं बता रही हूं। तरुण खटीक की हत्या वाला मामला। खुलेआम नागरिक नागरिक को मार दे रहा है और शासन कुछ नहीं कर रहा। फिर वह जो बिहार में मामला हुआ एक बच्ची के साथ और यह सब जाति के आधार पर और फिर एक इतनी बड़ी जनसंख्या को अपराधी घोषित कर देना, यह तो वैसा ही था जैसा सोनिया गांधी का लक्षित हिंसा बिल था। तो यह बहुत घनघोर घातक है राष्ट्र के लिए, समाज के लिए और धर्म के लिए। इस पर शासन की जो चुप्पी दिखी, पहले तो अंदाज लगाया कि भाई बहुत कुछ होता है, उठापटक होती रहती है, ऐसा है, वैसा होगा, लेकिन 13 जनवरी से 13 फरवरी 13 मार्च 13 अप्रैल बीत गया। तीन महीना बीत गया। परन्तु शासन की चुप्पी पूर्ववत है। तो विरोध तो आवश्यक है। अन्यथा यह वार्ताएं करने की आवश्यकता ही क्या है? ये एक प्रकार का शिक्षण और प्रबोधन ही तो है। तो शिक्षण और प्रबोधन मैं राष्ट्रभक्ति के प्रसार के लिए कर रही हूं। राष्ट्र, समाज, धर्म ये आपस में गुम्फित है। तीनों के लिए महाघातक, महाविनाशकारी नीतियां और लगातार जो घटना क्रम हुआ उससे लगा कि यह लगातार चलता जाएगा। इसके पहले अनेक घटनाएं हो चुकी थी। सुप्रीम कोर्ट ने शायद क्रीमी लेयर को हटाया। वस्तुतः इस प्रकार आरक्षण देना ही गलत है। देने के बाद जिन लोगों के नाम पर दिया जा रहा है उनको तो मिल ही नहीं रहा है। मिल किसको रहा है? बहुत थोड़े से लोग उसको ले पा रहे हैं। तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा भाई देना है तो इस प्रकार दो, क्रीमी लेयर हटाओ। उस मामले में शासन ने कहा कि नहीं। फिर सुप्रीम कोर्ट ने कहा – वह एससी एसटी एट्रोसिटी एक्ट में नेचुरल जस्टिस (प्राकृतिक न्याय) बाधित हो रहा है तो उसको हटाओ। परन्तु उसे और भयंकर कर दिया गया, वगैरह वगैरह।
यह जो पॉलिटिकल फ्यूचर ऑफ इंडिया का मुद्दा है, तो राजनीति जो है वो साधन है। अब भारत में पॉलिटिक्स हो रहा है। राजनीति तो हो ही नहीं रहा है। राजनीति होने के लिए राजा और प्रजा का संबंध आवश्यक है। जब राजा प्रजा का संरक्षण कर रहा है राज्य नामक संस्था के द्वारा तो उस राजा के राज्य की जो नीति है प्रजा के पोषण संवर्धन और संरक्षण के लिए वो राजनीति कही जाती है। 1947 के बाद इस संविधान के द्वारा वो राजनीति तो पूरी तरह गयी। समाप्त हुई। तो अब हो क्या रहा है पॉलिटिक्स। तो भारत का पॉलिटिकल फ्यूचर क्या है? तो पॉलिटिकल फ्यूचर भी अगर देखें तो भारत के राष्ट्र भारतीय समाज और सनातन धर्म के उन्नयन के लिए निरंतर स्टेट काम करें, यह उसका कर्तव्य है। वो स्टेट काम करें तो कैसे करें? हम लोगों ने देखा 2014 के पहले धीरे धीरे धीरे बेलगाम उच्छृंखल निरंकुश सत्ता आती गई। लेकिन ऐसा तो नहीं कि वो सब कर पाई अपने मन का। अपने मन का कर पाती तो नेहरू जी कोलकाता बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) को दे देते। पूरा कश्मीर नेहरू जी पाकिस्तान में मिलवा देते। जूनागढ़ पाकिस्तान में जाता। हैदराबाद इंडिपेंडेंट होता। नेफा भारत से बाहर होता। लेकिन नेहरू जी नहीं कर पाए। क्यों नहीं कर पाए ? भारतीय समाज के कारण और जब मैं भारतीय समाज कह रही हूं, स्वाभाविक है कि इसमें देशभक्तों की बात कर रही हूं। सजग जागरूक राष्ट्र चेतना से संपन्न नागरिकों की बात मैं कह रही हूं। मैं देशद्रोहियों, उपद्रवियों, बलवाइयों, बलात्कारियों, दंगाइयों, विभाजनकारियों की बात तो नहीं कर रहे। क्योंकि राज्य का काम तो उनको दंडित करना है। क्यों दंडित करना है? क्योंकि यह राष्ट्र के उन्नयन, संवर्धन और पोषण में बाधक तत्व है।
जैसे अमित शाह जी ने किया। यह जो लाल गलियारा की योजना थी, उसे नष्ट कर दिया। यह जो नक्सली मूवमेंट यानी मोटा मोटा अपराधियों का एक जुनूनी संगठित आपराधिक गिरोह था। जिसको अनेक राज्यकर्ताओं का संरक्षण था। बाहर का भी था, चीन का था, चर्च का था और इंडियन स्टेट का भी था। तो इंडियन स्टेट कहने का मतलब यह तो नहीं कि सभी राजनेता लेकिन इंडियन स्टेट के ड्राइविंग सीट पर जो बैठा हुआ है जैसे अभी मोदी जी इंडियन स्टेट के ड्राइविंग सीट पर बैठे है और कह सकते हैं भाजपा ड्राइविंग सीट पर बैठी। इनको कहेंगे। तो उसी प्रकार कांग्रेस आदि के शासन में जुनूनी संगठित आपराधिक गिरोहों को भरपूर संरक्षण दिया गया। अमित शाह ने उसका नाश कर दिया। तो उसका देश में स्वागत हुआ।
नाश क्यों किया गृहमंत्री अमित शाह जी ने? क्योंकि वह राष्ट्र के सभी प्रकार के सुख समृद्धि उन्नयन में बाधक था। अगर तीव्र गति से आर्थिक विकास चलाना है, मैं तो इसे कहूँगी कि भारत में समृद्धि लानी है तो इस प्रकार का हिंसक वातावरण उसमें बाधा डालता है। उसको नष्ट करना पड़ता है। यह जो इतना बड़ा यह लव जिहाद, हलाल इकॉनमी, वक्फ बोर्ड के नाम पर लूट, चर्च के नाम पर दी गई शासकीय भूमि और उनके द्वारा संचित सम्पत्तियों का दुरूपयोग सनातन धर्म को घोषित रूप से नष्ट करने के लिए और जिसको आतंकवाद कह रहे हैं उन सबका पोषण।
अतः इन सब को तो रोकना होगा। क्यों रोकना होगा? यदि देश को चौथी की जगह तीसरी, तीसरी की जगह दूसरी, दूसरी की जगह पहली इकॉनमी बनना है तो इन गिरोहों को रोकना ही होगा। यदि हम नहीं चाहते हैं कि डिफेंस पर ज्यादा खर्च हो। डिफेंस पर ज्यादा खर्च क्यों करना पड़ेगा? पाकिस्तान और चीन सर उठाएंगे। पाकिस्तान और चीन दोनों बॉर्डर पर लड़ के इंडियन आर्मी से नहीं जीत पाएंगे। तो क्या करते हैं? सारी दुनिया में जो होता है। देश के अंदर दुनिया भर की गड़बड़ी। अब दुनिया भर की गड़बड़ी में कुछ सेंसिटिव चीजों पर मैं बात कर रही हूं। जिसको हनी ट्रैप यानी गोपनीय दस्तावेज बाहर। कैसे बाहर? प्रधानमंत्री की बहू, प्रधानमंत्री के बेटे को हनी ट्रैप में ले लिया। राजीव गांधी को, लालू यादव को और बहुत बहुत पॉलिटिकल घरों की बहुऐं पत्नियां या बेटियां उस दायरे में आ गईं तो उससे क्या होगा? उस घर में जो सब प्रकार के लोग आते जाते है, बातें होती है, वह सब विदेष में भारत विरोधी एजेंसियों को जानकारी मिलती रहती है। इसी तरह आर्मी के बड़े अधिकारी, इसी तरह ब्यूरोक्रेट्स, इसी तरह जुडिशरी, वगैरह वगैरह। तो विदेशी शक्तियां क्या चाहती हैं? आप कमजोर रहें। यह वे केवल भारत के लिए थोड़ी चाहती है। चीन की विरोधी जो विदेशी शक्तियां है वो चीन को कमजोर चाहती है। रूस की विरोधी जो विदेशी शक्तियां है वो रूस को कमजोर चाहती हैं। अमेरिका की विरोधी जो विदेशी शक्तियां है वो अमेरिका को कमजोर चाहती है। जो भारत की विरोधी विदेशी शक्तियां है, शत्रु शक्तियां है वो भारत को कमजोर चाहती है। पॉलिटिकल फ्यूचर क्या होगा? ड्राइवर के सीट पर बैठा हुआ व्यक्ति तय नहीं करेगा। तय कौन करेगा? भारत के सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामरिक उन्नयन के लिए अभिलाषी सामर्थ्यवान काम करने वाले लोग। उनकी इच्छाएं, उनके संकल्प, उनकी अभीप्साएं, उनकी आकांक्षाएं, तय करेगी। इसीलिए 2014 में ऐसे लोगों ने नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री चुनकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया। भाजपा के समस्त विरोध के बावजूद। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भीतर एक धडे़ के प्रचंड विरोध के बावजूद। बाकी पार्टियों का वश चलता तो उनकी चटनी बना देते। तो उनको प्रधानमंत्री की कुर्सी पर किसने बैठाया? भारत के उन करोड़ों लोगों ने जिनको लगा कि जो उपलब्ध हैं, उनमें ये सर्वश्रेष्ठ हैं। क्योंकि हमारा तो काम यही होता है कि जो उपलब्ध है उसमें सबसे अच्छा क्या? तो उसमें परसेप्शन का महत्व है।
मोदी जी कौन है, क्या कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं, कोई भी उतना ही जानेगा जो पब्लिक डोमेन (सार्वजनिक जीवन) में जानकारी उपलब्ध है। उस जानकारी के आधार पर और उनके क्रियाकलाप और उनके भाषण। उनके कार्य जो वो गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में काम किए। जिस प्रकार से अन्य लोग उनका भीषण विरोध कर रहे थे। उससे लगा कि भाई क्यों कर रहे हैं? तो सार्वजनिक मामलों में ‘परसेप्शन मैटर्स अ लॉट’, तो उनको प्रधानमंत्री किसने बनाया? उन देशभक्त, राष्ट्रभक्त, राष्ट्र को पुनः सशक्त और समृद्धिशाली देखने की आकांक्षा वाले लोगों ने।



