आशुतोष कुमार सिंह
यदि सच में बिहार को उसके गौरवशाली अतीत के स्वर्णिम दिनों की ओर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लौटाना चाहते हैं तो उन्हें कौटिल्य के राज-शासन के सिद्धांतों को आत्मसात करते हुए अभ्यास में लाना होगा।
पटना । वर्तमान का बिहार जो कभी मगध साम्राज्य का वाहक था में आज एक सम्राट ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है। आजादी के बाद एक ऐसी सरकार का गठन हुआ है, जो एक राष्ट्र-श्रेष्ठ राष्ट्र के मूल मंत्र को आगे बढ़ाने का काम करती रही है। इस मौके पर मुझे बिहार के अतीत को याद करने का मन कर रहा है। जब मैं राजनीतिक शास्त्र पढ़ रहा था तब मुझे आचार्य कौटिल्य यानी चाणक्य के बारे में पढ़ने एवं समझने का मौका मिला था। उनका संबंध भी आज के बिहार एवं तब के मगध से था। उन्होंने भी एक राष्ट्र, सशक्त राष्ट्र का सपना देखा था। उन्होंने भी भारत एवं भारतीयता का संकल्प लिया था।
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) का संकल्प और मगध साम्राज्य का उत्थान भारतीय इतिहास की सबसे रोमांचक और युगान्तरकारी घटनाओं में से एक है। यह केवल एक राज्य की विजय नहीं, बल्कि एक शिक्षक के अपमान का प्रतिशोध और एक ‘अखंड भारत’ के निर्माण की विजय गाथा है। मगध के तत्कालीन शासक घनानंद ने अपने दरबार में आचार्य चाणक्य का घोर अपमान किया था। घनानंद अपनी विलासिता और क्रूरता के लिए कुख्यात था। अपमानित होकर चाणक्य ने अपनी शिखा खोल दी और प्रण लिया कि जब तक वह इस अहंकारी नंद वंश का समूल नाश नहीं कर देंगे, तब तक अपनी शिखा नहीं बांधेंगे। उनका संकल्प केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध तक सीमित नहीं था। उस समय भारत छोटे-छोटे जनपदों में बंटा था और उत्तर-पश्चिम से सिकंदर (Alexandra) के आक्रमण का खतरा मंडरा रहा था। कौटिल्य का वास्तविक संकल्प एक केंद्रीकृत और शक्तिशाली ‘अखंड भारत’ का निर्माण करना था।
कौटिल्य ने अपने संकल्प को सिद्ध करने के लिए चंद्रगुप्त मौर्य को तैयार किया। उन्होंने एक साधारण बालक को राजनीति, कूटनीति और युद्धकला में प्रशिक्षित कर उसे एक चक्रवर्ती सम्राट बनाया। पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) इस विशाल साम्राज्य की राजधानी बनी। कौटिल्य ने मगध को एक ऐसा प्रशासनिक ढांचा दिया जहां कर प्रणाली, गुप्तचर व्यवस्था और न्याय प्रणाली अत्यंत सुदृढ़ थी।
वर्तमान बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट के साथ भी इसी तरह का एक संकल्प जुड़ता है। जो राजनीति से प्रेरित था। बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी का संकल्प काफी चर्चा का विषय रहा है, जिसकी तुलना अक्सर ऐतिहासिक रूप से आचार्य चाणक्य की प्रतिज्ञा से की जाती है।
सम्राट चौधरी, जो बिहार के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रमुख नेता हैं, ने नीतीश कुमार के खिलाफ एक गंभीर व्यक्तिगत और राजनीतिक प्रण लिया था। यह घटना तब की है जब नीतीश कुमार ने एनडीए (NDA) का साथ छोड़कर आरजेडी (RJD) के साथ मिलकर महागठबंधन की सरकार बनाई थी। उस समय सम्राट चौधरी ने विरोध स्वरूप अपने सिर पर मुरैठा (पगड़ी) बांधी थी। सम्राट चौधरी ने कसम खाई थी कि वह अपने सिर से यह मुरैठा तब तक नहीं उतारेंगे, जब तक वह नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी से नहीं हटा देते। उनका यह संकल्प व्यक्तिगत विरोध से ज्यादा वैचारिक विरोध का प्रतीक था। समय के साथ बिहार की राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और जनवरी 2024 में नीतीश कुमार वापस एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए। इस नई सरकार में सम्राट चौधरी खुद उप मुख्यमंत्री बने। चूंकि नीतीश कुमार अब उनके गठबंधन के साथी और मुख्यमंत्री थे। सम्राट चौधरी ने अपने संकल्प को पूरा करने के लिए अयोध्या जाने का निर्णय लिया। जुलाई 2024 में उन्होंने अयोध्या में रामलला के चरणों में अपना मुरैठा समर्पित किया और सरयू नदी में स्नान कर अपना मुंडन करवाया। और आज यानी 15 अप्रैल 2026 को सम्राट चौधरी जब बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे तो मुझे उनकी इस कसम की याद आ रही थी।
अपने संकल्पों के कारण बेशक सम्राट चौधरी को कौटिल्य यानी आचार्य चाणक्य के संकल्प से राजनीतिक पंडित जोड़ते आ रहे हैं लेकिन चाणक्य से तुलना न्यायोचित नहीं है। चाणक्य के सप्तांग सिद्धांत को यदि सम्राट चौधरी बिहार के विकास का मूल मंत्र बना लें तब शायद कालांतर में उनकी तुलना एक स्तर पर आचार्य चाणक्य से की शायद किया जा सके।
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य की संरचना को समझाने के लिए ‘सप्तांग सिद्धांत’ का प्रतिपादन किया है। उन्होंने राज्य को एक शरीर के रूप में देखा है, जिसके सात मुख्य अंग होते हैं। सप्तांग सिद्धांत के अनुसार, राज्य के ये सात अंग हैं: स्वामी (राजा), अमात्य (मंत्री), जनपद (क्षेत्र और जनता), दुर्ग वह (किला), कोष (खजाना), दंड (सेना) और मित्र देश। राजा को राज्य का शीर्ष (सिर) माना गया है। कौटिल्य के अनुसार, राजा को दूरदर्शी, आत्म-संयमी, कुलीन और बुद्धिमान होना चाहिए। इसी तरह अमात्य यानी वर्तमान के मंत्री राज्य की आंखें होते हैं। इसमें उच्च कोटि के मंत्री, सचिव और प्रशासनिक अधिकारी शामिल हैं। राजा को चाहिए कि वह ईमानदार और योग्य अमात्य की ही नियुक्ति करे, क्योंकि शासन की सफलता उन्हीं पर निर्भर करती है। जनपद को राज्य की जंघाएं (पैर) के रूप में परिभाषित हैं। इसका अर्थ है राज्य का निश्चित भू-भाग और उसमें निवास करने वाली जनता। कौटिल्य के अनुसार, भूमि उपजाऊ होनी चाहिए और जनता मेहनती व राजा के प्रति वफादार होनी चाहिए। दुर्ग को राज्य की भुजाएं (हाथ) माना गया है। राज्य की रक्षा के लिए मजबूत किलेबंदी अनिवार्य है। कौटिल्य ने चार प्रकार के दुर्ग बताए हैं: औदिक दुर्ग: जिसके चारों ओर पानी हो। पार्वत दुर्ग: जो ऊँचे पहाड़ों पर हो। धान्वन दुर्ग: जो मरुस्थल में हो और वन दुर्ग: जो घने जंगलों के बीच हो। कोष को राज्य का मुख कहा गया है। किसी भी राज्य के संचालन, सेना के रख-रखाव और कल्याणकारी कार्यों के लिए धन की आवश्यकता होती है। कौटिल्य का मानना था कि कोष धर्म-पूर्वक एकत्रित किए गए करों से भरा होना चाहिए। दंड (सेना) राज्य का मस्तिष्क या बल है। राजा के पास एक शक्तिशाली और अनुशासित सेना होनी चाहिए ताकि वह आंतरिक विद्रोहों और बाहरी आक्रमणों से राज्य की रक्षा कर सके और सातवां सिद्धांत है-मित्र (मित्र देश) मित्र राज्य के कान होते हैं। एक आदर्श राज्य के मित्र ऐसे होने चाहिए जो आवश्यकता पड़ने पर सहायता करें और जिनकी निष्ठा पर संदेह न किया जा सके। कौटिल्य का मानना था कि जिस प्रकार शरीर का कोई भी अंग खराब होने पर पूरा शरीर प्रभावित होता है, उसी प्रकार राज्य के इन सात अंगों में से किसी एक की भी कमजोरी पूरे राज्य के पतन का कारण बन सकती है।
जिस सुशासन बाबू का तमगा लेकर नीतीश बाबू ने अपनी पहचान बनाई और बिहार ही नहीं भारत की राजनीति में एक कुशल राजनेता के रूप में स्थापित हुए उसका मूल आधार आचार्य चाणक्य द्वारा बताए गए सप्तांग सिद्धांत ही है।
यदि सच में बिहार को उसके गौरवशाली अतीत के स्वर्णिम दिनों की ओर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी लौटाना चाहते हैं तो उन्हें कौटिल्य के राज-शासन के सिद्धांतों को आत्मसात करते हुए अभ्यास में लाना होगा। तब जाकर बिहार वास्तव में वैसा बिहार बन सकेगा, जैसा बिहार वह बन सकता है, बनाया जा सकता है और बनना भी चाहिए। बिहार-मगध और चाणक्य को एक सूत्र में बांधना होगा। यहीं से बिहार के उत्थान का राह प्रशस्त होता है। यही बिहार में वास्तविक बहार लाने का एकमात्र उपाय है।
(लेखक स्वस्थ भारत के चेयरमैन एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)



